सुप्रीम कोर्ट में इतनी बार घिरकर जाने क्या लगता होगा सरकार को

30  जून 2021

 कोरोना के मोर्चे पर एक बार फिर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में बहुत बुरी तरह घिरी है। सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाई गई थी कि कोरोना से मरने वालों के परिवारों को 4-4  लाख मुआवजा दिया जाए। इस पर केंद्र सरकार ने पहले तो सुप्रीम कोर्ट में कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें कोरोना से बहुत बुरी आर्थिक स्थिति से गुजर रही हैं और ऐसा कोई मुआवजा दे पाना उनकी क्षमता से परे हैं। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया गया उस वक्त सरकारी वकील ने वहां पर यह कहा कि आर्थिक क्षमता कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन जिस कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट यह मुआवजा देने की बात सुन रहा उस कानून के तहत ऐसा मुआवजा देने की कोई अनिवार्यता नहीं है। इस पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण कानून को पढक़र सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कहा कि इस कानून के तहत मुआवजा देने की अनिवार्यता है, और केंद्र सरकार यह मुआवजा दे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे की रकम तय करने से इंकार कर दिया और इसे सरकार के ऊपर छोड़ा। सुप्रीम कोर्ट का ताजा रुख जनहित का दिख रहा है और आम जनता के हिमायती होने का संकेत है। अभी कुछ अरसा पहले तक देश का सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार की ही एक संस्था की तरह काम करते दिख रहा था, और देश के लोगों को उससे बड़ी निराशा हो रही थी। अब ताजा फर्क नए मुख्य न्यायाधीश के आने के बाद दिखाई पड़ रहा है, लेकिन यह कब तक जारी रहेगा यह अंदाज लगाना कुछ मुश्किल है। फिर भी आज इतनी बात तो राहत की है ही कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में अगर घिर रही है तो इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार की मनमानी नहीं सुन रहा है।

लोगों को याद होगा कि अभी कुछ हफ्ते पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कोरोना वैक्सीन के मामले में बुरी तरह से घेरा और सरकार की हर लापरवाही, अनदेखी पर ढेर सवाल किए, तो उन्हीं का नतीजा निकला कि कटघरे में खड़ी हुई मोदी सरकार ने अदालत के बाहर खुद होकर देश के तमाम लोगों को मुफ्त वैक्सीन लगाने की घोषणा की। वरना इसके पहले बहुत से राज्य, केंद्र सरकार के सामने इस बात की अपील करते हुए थक गए थे, एक दर्जन गैर-एनडीए दलों ने कई बार ऐसी मांग की थी कि सरकार प्रधानमंत्री के नाम से बनाए गए एक नए फंड की रकम का इस्तेमाल करके, या बजट में रखे गए 30 हजार करोड़ रुपए का इस्तेमाल करके पूरे देश को मुफ्त में वैक्सीन लगाएं। महीनों तक यह खींचतान चली और आखिर में जब सुप्रीम कोर्ट में सरकार बुरी तरह घिर गई, तब जाकर प्रधानमंत्री ने इस बात की घोषणा की। पता नहीं केंद्र सरकार में प्रधानमंत्री के स्तर पर फैसला लेने के वक्त कौन उनके सलाहकार चल रहे हैं, लेकिन यह बात जाहिर है कि पिछले काफी समय से केंद्र सरकार के सर्वोच्च फैसलों में से कई फैसलों ने सरकार को बहुत ही फजीहत में डाला है। अब अगर यह फैसले प्रधानमंत्री अकेले ले रहे हैं, तो वे इस फजीहत के खुद ही हकदार हैं, लेकिन अगर फैसले लेने में कुछ और लोग भी शामिल हैं तो उन सब लोगों को काम के अपने तौर-तरीकों के बारे में फिर से सोचना चाहिए। राहुल गांधी की ट्वीट के कुछ या कई हफ्ते बाद जिस तरह से सरकार को उसकी एक-एक बात माननी पड़ रही है हालांकि उसके पहले मोदी सरकार और उसके समर्थकों के अनगिनत ट्वीट राहुल गांधी के खिलाफ आ चुके रहते हैं, और आखिर में जाकर केंद्र सरकार राहुल की बातों पर अमल करती है। 

यह सिलसिला आज के इस माहौल में ठीक नहीं है जब कोरोना ने लाखों परिवारों से लोगों को छीना है, माहौल पिछले महीनों में इतना खराब था कि लोग अपने परिवार के लोगों को आखिरी हफ्ते-दस दिन देख भी नहीं पाए और न उनका अंतिम संस्कार कर पाए। दूसरी तरफ लॉकडाउन की वजह से देश में अर्थव्यवस्था का जो हाल है, कारोबार जिस तरह से चौपट हो गया है, लोगों के पास बस सरकारी राशन की वजह से जिंदगी बचाने का एक जरिया बचा है, ऐसे वक्त पर केंद्र सरकार का बार-बार बदलता रूख, बार-बार अनचाहे और मजबूरी में अपने फैसलों को बदलना, बार-बार टीकों को लेकर नीति बदलना, बार बार अडऩा, और बार-बार झुकना, इस पूरे सिलसिले ने देश के लोगों का भरोसा तोड़ा है, और केंद्र सरकार की साख खराब की है। यह सिलसिला जितनी जल्द खत्म हो उतना अच्छा है क्योंकि सरकार तो 5 बरस के लिए चुनी गई है, और अभी खासा अरसा बाकी है इसलिए देश में सरकार तो यही चलनी है, लेकिन उसका ऐसा रुख लोकतंत्र पर से लोगों का भरोसा तोड़ रहा है। जिस वक्त निर्वाचित सरकार जनकल्याण के फैसलों से कतराए, और अदालत को बांह मरोड़ कर उससे जनकल्याण के काम करवाने पड़ें, तो यह बहुत ही अजीब सी नौबत रहती है, क्योंकि जजों को तो कोई चुनाव लडऩा नहीं है, उन्हें तो लुभावने फैसले देने नहीं हैं, लेकिन सरकार अपनी जिम्मेदारियों से इस हद तक कतराए या अच्छी बात नहीं है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जून 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जून 2021


 

हिंदुस्तान में बड़े ओहदों की गैरजिम्मेदारी के दो मामले !

 29  जून 2021

 जब बड़े जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोग कोई लापरवाह बात कहते हैं तो अटपटा लगता है। आमतौर पर अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी या जमानत जैसे देश के सबसे ज्वलंत मामले में ही मुंह खोलने वाले भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अभी अपने गांव जाकर वहां एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच से जब यह कहा कि उन्हें 5 लाख रूपये तनख्वाह मिलती है, लेकिन उनमें से पौने तीन लाख तो इनकम टैक्स कट जाता है, और एक शिक्षक की तनख्वाह उनसे ज्यादा बचती है, तो लोगों को बात अटपटी लगी। अटपटी कई मायनों में लगी, एक तो इस हिसाब से कि लोगों का सामान्य ज्ञान और कानून की सामान्य जानकारी यह कहती है कि राष्ट्रपति की तनख्वाह इन्कम टैक्स से मुक्त रखी गई है। दूसरी बात यह कि इन 3 दिनों में हिंदुस्तान के मीडिया में से किसी भरोसेमंद मीडिया ने, या कि राष्ट्रपति भवन ने इस बात का खुलासा नहीं किया है कि नियमों में चली आ रही टैक्स छूट की व्यवस्था अगर खत्म हो चुकी है तो कब खत्म हुई है, और कब से राष्ट्रपति को टैक्स देना पड़ रहा है? और तीसरी बात यह कि क्या हिंदुस्तान का राष्ट्रपति देश के सबसे बड़े रिहायशी मकान में रहते हुए, तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर रहते हुए, देश का प्रथम नागरिक बने हुए, क्या अपनी तनख्वाह और उस पर कटने वाले टैक्स पर मलाल जाहिर करते हुए गरिमापूर्ण लग रहा है? यह पूरा सिलसिला अटपटा था और बदमज़ा था, जिन लोगों ने रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बाद से अब तक उनकी आलोचना की कोई बात नहीं पाई थी, उनको भी लगा कि क्या राष्ट्रपति टैक्स को लेकर ऐसी बात करते हुए अच्छे लग रहे हैं? और दूसरी बात यह कि लोगों के पास उनकी बात पर भरोसा करने की कोई वजह नहीं है क्योंकि देश में टैक्स की अधिकतम सीमा इतनी नहीं है कि पांच लाख की तनख्वाह पर पौने तीन लाख टैक्स लग जाए। सच जो भी होगा, कभी ना कभी सामने आएगा। 

इसी किस्म की दूसरी बात कल सामने आई जब बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने प्रदेश के राज्यपाल जगदीप धनखड़ पर यह आरोप लगाया कि 1996 के जैन हवाला कांड की चार्जशीट में उनका नाम आया था, वह एक भ्रष्ट आदमी हैं, और केंद्र सरकार को उन्हें हटाना चाहिए। ममता ने यह भी कहा कि अगर केंद्र सरकार को इस बात की जानकारी नहीं है कि आरोपपत्र में राज्यपाल का नाम है, तो मैं उन्हें बतला रही हूं और केंद्र सरकार इसका पता लगा ले। राज्यपाल ने इस बात को पूरी तरह बेबुनियाद बताया और कहा कि यह बात कुछ इस तरह की है कि उनके बारे में कहा जाए कि वह चांद पर गए थे।

अब यह दोनों बातें दो जिम्मेदार लोगों द्वारा कही गई हैं, एक भारत का राष्ट्रपति है, और एक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। कायदे से तो इन पदों पर बैठे हुए लोगों को कोई भी तथ्यविहीन या गलत तथ्यों वाली कोई बात नहीं करना चाहिए, लेकिन सच यह है कि राष्ट्रपति की सेवा शर्तों की जो जानकारी किताबों में दर्ज है, या तो वह गलत है या राष्ट्रपति की दी गई जानकारी गलत है। इसी तरह या तो ममता गलत हैं, या जगदीप धनखड़ गलत हैं। सही कौन है इसके फैसले में देश का बहुत बड़ा वक्त भी बर्बाद हो रहा है, मीडिया का एक गैर जरूरी ध्यान इस तरफ जा रहा है, सोशल मीडिया पर लोग इन बातों को लेकर काफी कुछ लिख रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि दिल्ली के जिस मीडिया की पहुंच राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रपति की जानकारी तक है, और जो भारत के टैक्स ढांचे के बारे में भी वित्त मंत्रालय से बात कर सकते हैं उनमें से किसी ने भी अब तक इस विवाद पर सच सामने रखा हो, ऐसा हमारे देखने में नहीं आया है। ममता बनर्जी के हाथ बड़े-बड़े वकील हैं, पूरी सरकार है, और जैन हवाला केस ऐसा नहीं था कि उसका कोई भी पहलू कानूनी दस्तावेजों में ना आया हो, सरकारी कागजात में ना आया हो, मीडिया में न आया हो। इसलिए राज्यपाल के बारे में भ्रष्टाचार के बयान के पहले ममता बनर्जी भी कागजात जुटा सकती थीं और फिर सामने रख सकती थी कि ऐसे व्यक्ति को बंगाल का राज्यपाल ना रखा जाए। 

इन दोनों ही मामलों में यह भी लगता है कि मीडिया ने भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई है जिन्हें राष्ट्रपति भवन में एक पूर्णकालिक प्रेस सचिव रहते हुए उससे उसका पक्ष नहीं लिया कमा और राष्ट्रपति की बात को सही या गलत ठहराने की अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की। इसी तरह ममता बनर्जी के आरोपों पर मीडिया ने उनसे यह नहीं कहा कि इसके तथ्य साबित करते हुए दस्तावेज कहां हैं? लोकतंत्र में यह सिलसिला अपने आपको चौथा स्तंभ कहने वाले मीडिया की गैरजिम्मेदारी का भी है और राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री तक के लापरवाह बयानों का भी है। जब देशभर के सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति की तनख्वाह को लेकर दिए गए उनके बयान पर विवाद खड़ा हो रहा है तो अगर राष्ट्रपति ने सही बात कही है तो राष्ट्रपति भवन के प्रेस सचिव को इस बारे में तुरंत एक बयान जारी करना चाहिए था, और अटकलबाजी को खत्म करना चाहिए था। हिंदुस्तान में मीडिया के साथ एक दिक्कत यह है कि वह अपना जिम्मा निभाने के बजाए एक हरकारे  की तरह काम करने लगता है, एक व्यक्ति के बयान को लेकर दूसरे व्यक्ति से उसका पक्ष ले लेता है, दूसरे के बयान को पहले के बयान के साथ जोडक़र दिखा देता है, लेकिन इतनी जहमत नहीं उठाता कि सच को तलाशने की अपनी जिम्मेदारी भी पूरी कर ले। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। 

जिस वक्त हिंदुस्तान में मीडिया नाम की कोई चीज नहीं थी, और महज प्रेस हुआ करता था उस वक्त अखबारनवीस अधिक जिम्मेदार हुआ करते थे लेकिन जैसे-जैसे अखबारों का एकाधिकार खत्म हुआ और टीवी का दाखिला हुआ, धीरे-धीरे डिजिटल मीडिया आया, और जिम्मेदारी बहुत हद तक खत्म हो गई। जहां मीडिया को बड़े तल्ख सवालों के साथ राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री तक से जवाब लेना था, वहां पर आज का मीडिया एक पहलू को ही एक खबर बनाकर लोगों के सामने पेश कर रहा है। जो बातें सरकारी अदालती कागजों में दर्ज हैं उनको भी नहीं देख रहा है। हिंदुस्तान की जनता नेताओं से लेकर मीडिया तक की ऐसी गैरजिम्मेदारी का नुकसान झेल रही है, और यह लोकतंत्र परिपक्व हो ही नहीं पा रहा है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जून 2021




 

स्टेज पर ट्रे लिए खड़ी लडक़ी

 27 जून  2021

 छत्तीसगढ़ में अभी खबर वीडियो के साथ तैर रही है कि एक आदिवासी इलाके में महिला सरपंच का पति किस तरह गुंडागर्दी कर रहा है, और कैसे एक म्युनिसिपल इलाके में महिला नगर पालिका अध्यक्ष का पति गुंडागर्दी कर रहा है। कानून बनने से महिला आरक्षित सीट पर महिला पंच-सरपंच, या पार्षद-महापौर बन जाती हैं लेकिन उनके नाम पर उनके पति ही दफ्तर चलते हैं, गुंडागर्दी करते हैं। महिला की सहमति बिना किस तरह वसूली-उगाही करते हैं। कानून ने गांव और शहर में तो महिला को बराबरी का दर्जा दे दिया है, लेकिन घर के भीतर वह गुलाम ही है। 

अगर महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की सोच सचमुच ही हो तो कुछ बातों के बारे में सोचना जरूरी है। हममें से हर कोई अपने बचपन से ही स्कूलों में और दूसरे जलसों में यह देखते आए हैं कि किस तरह स्टेज पर एक महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति को माला पहना रहे हैं या शॉल, या उन्हें कोई किताब, स्मृति चिन्ह भेंट कर रहे हैं।  इन सबको एक ट्रे में लेकर वहां सुंदर से कपड़ों में एक लडक़ी या महिला को खड़ा कर दिया जाता है। सौ फीसदी मामलों में इन्हें सजावट के सामान की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और इनकी और कोई भूमिका नहीं होती, इनका कहीं नाम भी नहीं लिया जाता, और इनकी तरफ कोई गौर से देखते तक नहीं हैं। तो एक मजदूर की ऐसी भूमिका में एक पुतले की तरह सजाकर किसी महिला को ऐसे खड़ा करना तमाम महिलाओं के अपमान से कम नहीं है। इस बारे में सोचना चाहिए कि न तो मुख्य अतिथि की भूमिका में आमतौर पर महिलाएं रहतीं, न ही किसी संस्था या संगठन के प्रमुख के रूप में मुख्य अतिथि का स्वागत करने वाली महिला रहती, और महिलाओं को इस स्टेज पर जगह आमतौर पर सिर्फ ट्रे थामे हुए सजावट के सामान की तरह मिलती है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। 

एक ऐसी तस्वीर की कल्पना क्या की जा सकती है जिसमें मुख्य अतिथि कोई महिला हो, स्वागत करने वाली कोई महिला हो, और कोई पुरुष ट्रे में माला या गुलदस्ता लेकर मदद करने के लिए वहां खड़े हुए हो ? क्या ऐसा किया जा सकता है? इसकी कल्पना भी मुश्किल होगी क्योंकि हमें सांस्कृतिक रूप से यही समझाया गया है कि स्टेज पर दिया जलाने के लिए दीपक लेकर एक लडक़ी को या महिला को खड़े होना है, वह दिया जलाने वाले लोग आमतौर पर पुरुष होंगे। यह एक अलग बात है कि जिस प्रतिमा के सामने दिया जलाया जाएगा वह आमतौर पर एक महिला की होगी सरस्वती की। लेकिन सच तो यह है कि एक महिला को महत्व पाने के लिए हिंदुस्तान में आमतौर पर प्रतिमा बनना जरूरी होता है चाहे वह कोई धार्मिक प्रतिमा हो चाहे वह ओलंपिक से मेडल लेकर या अंतरिक्ष जाकर लौटी हुई भारतवंशी सुनीता विलियम्स हो। प्रतिमा के दर्जे पर पहुंचने के पहले सम्मान की कोई गुंजाइश नहीं है। स्कूल कॉलेज के बच्चों के सामने से स्टेज पर ट्रे थामे महिला का नजारा खत्म करना होगा, तभी इस पीढ़ी का दिमाग ठीक हो पायेगा। 

इन दिनों सोशल मीडिया पर महिलाओं को लेकर बहुत किस्म की बहस चल रही है, और कई महिलाओं ने खुलकर इस बात को लिखा है कि उनके परिवार के बुजुर्ग साफ-साफ यह कहते थे कि उन्हें मिक्सी में बनाई हुई चटनी पसंद नहीं है, उन्हें सिलबट्टे पर हाथों से पीसी हुई चटनी ही अच्छी लगती है, या कुछ बुजुर्ग ऐसे भी रहते थे जो कहते थे कि उन्हें कुकर में बनाया हुआ खाना अच्छा नहीं लगता, उनके लिए अलग-अलग बर्तनों में बिना किसी प्रेशर के खाना पकाया जाए, तो ही वे खा सकते हैं। दुनिया के जितने किस्म के उपकरण रसोईघर में महिला के काम में मदद करने के लिए बने हैं, उनसे लोगों का ऐसा लगता है कि स्वाद फीका आता है। जबकि ऐसी कोई वजह नहीं है और सिलबट्टे की जिद करना या बटलोई में दाल पकाने की जिद करना, इन सबका बोझ सीधा-सीधा महिला के ऊपर जाता है। कुछ लोगों को गैस चूल्हे पर बनी रोटी पसंद नहीं आती और अगर उनके सामने विकल्प रहे तो वे घर की महिला से कहें कि लकड़ी के चूल्हे पर बनी हुई रोटी ही सबसे अच्छी रहती है। यह एक अलग बात है कि अकेले हिंदुस्तान में हर बरस 10 लाख से अधिक महिलाएं घरेलू चूल्हे से होने वाले प्रदूषण से मारी जाती हैं। यह आंकड़ा अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक ने पिछले 50 वर्षों में भारत आकर लगातार काम करके वैज्ञानिक जांच-पड़ताल के बाद निकाला है।

एक महिला का शोषण करने के जितने तरीके हो सकते हैं उन सबमें हिंदुस्तान ने एक महारत हासिल की हुई है। विख्यात उपन्यासकार और कहानी लेखिका शिवानी की एक कहानी याद पड़ती है जिसमें पहाड़ी पर बसे एक परिवार में बूढ़ा पति अपनी जवान बीवी के सामने खाना खाने के बाद उसी थाली को उसकी तरफ आगे बढ़ा देता था और उम्मीद करता था कि वह जूठन खाए और उसका चेहरा भी देखते रहता था कि थाली उसकी तरफ बढ़ाने पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है। घरों में यह आम बात है कि आदमी पहले खा लेते हैं लडक़े खा लेते हैं और लड़कियों और महिलाओं की बारी सबसे आखिर में आती है। घर में अगर एक बच्चे को पढ़ाने की गुंजाइश है तो वह लडक़े को पढ़ाया जाएगा, एक बच्चे के इलाज की गुंजाइश है तो वह लडक़े का इलाज होगा। पहले भी इसी जगह पर हम इस बात को लिख चुके हैं कि किस तरह मुंबई के टाटा कैंसर अस्पताल में एक सर्वे किया था कि वहां पर जिन बच्चों को कैंसर की शिनाख्त होती है उनमें से लडक़ों को तो तकरीबन सभी को इलाज के लिए वापस लाया, लेकिन लड़कियों में से गिनी-चुनी ही ऐसी रहती हैं जिनको मां-बाप इलाज के लिए वापस लाते हैं। लडक़ी को भला खर्च करके क्यों जिन्दा रखें? 

लड़कियों और महिलाओं से गैरबराबरी के बर्ताव, और उन पर हिंसा के बारे में लगातार बात करने की जरूरत है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जून 2021


 

मेनका गाँधी को इस जुर्म की सजा न मिली तो फिर यह लोकतंत्र बोगस ही है

 24  जून 2021

 देशभर के पशु चिकित्सकों ने कल भाजपा सांसद मेनका गांधी के खिलाफ आंदोलन किया। मेनका गांधी लोगों से बदजुबानी के लिए बदनाम हैं और टेलीफोन पर पशु चिकित्सकों को गालियां देने के बहुत से काम उन्होंने किए हैं। यह पहला मौका नहीं है जब उनकी बदजुबानी इस तरह से सुबूतों सहित सामने आई है, लेकिन यह पहला मौका जरूर है कि 13 मिनट की एक टेलीफोन कॉल में वे गंदी से गंदी गालियां देते नजर आईं, जातिसूचक गालियां देते नजर आईं, गांव के लोगों को गालियां देते नजर आईं, और एक पढ़े-लिखे पशु चिकित्सक को यह कर कह कर भी गालियां दे रही हैं कि उनका बाप कोई माली या ऐसा कोई रहा होगा। उन्होंने तरह-तरह की धमकियां दी, कलेक्टर की धमकी दी, पुलिस की धमकी दी, यह धमकाया कि जिसके कुत्ते का इलाज किया है, जाकर उसी दिन उसके मालिकों को 70 हजार रुपये का चेक देकर आए वरना वे देख लेंगी। हिंदुस्तान में किसी महिला के मुंह से जैसी गालियां सुनने की उम्मीद भी कोई नहीं करते हैं, वैसी ढेर सारी गालियां उन्होंने इस पशु चिकित्सक को बुरी तरह से धमकाते हुए दीं। उसे बार-बार हरामजादा कहा, और न लिखने लायक गालियां देती ही चली गईं। जिन भरोसेमंद वेबसाइटों पर मेनका गांधी का यह ऑडियो क्लिप सुनाया जा रहा है उन्हें दर्जनों बार मेनका गांधी की गालियों को मौन करना पड़ रहा है क्योंकि वह लोगों को सुनाने लायक नहीं हैं। कौन यह उम्मीद कर सकता है कि भारतीय संस्कृति की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी की कई बार की सांसद, जो कि पहले केंद्रीय मंत्री भी रह चुकी हैं, और जिनका बेटा भी भाजपा का सांसद रह चुका है, वह इस तरह की गंदी गालियां देकर एक डॉक्टर को धमकाएगी? यह हक्का-बक्का करने वाली हरकत है, और इससे मेनका गांधी के बारे में पहले से प्रचलित यह चर्चा सही साबित होती है कि वह अधिकारियों को डॉक्टरों को और पशुओं से जुड़े  हुए किसी भी तरह के लोगों को इसी तरह धमकाती हैं, इसी तरह गालियां देती हैं।

मेनका गांधी जब केंद्रीय मंत्री थी तब भी वह देश भर की राज्य सरकारों में काम करने वाले अधिकारियों को फोन पर धमकाने का काम करती थीं, और कहीं भी किसी वन्य पशु के साथ किसी ज्यादती होने की आशंका उनको होती थी, तो वे बदजुबानी पर उतर आती थी। अभी कुछ वक्त पहले छत्तीसगढ़ में जब लगातार हाथी मर रहे थे, उस वक्त भी मेनका गांधी ने रात-दिन फोन कर-करके छत्तीसगढ़ सरकार के बड़े दिग्गज अफसरों को खूब धमकाया था, जबकि न तो वह केंद्र सरकार में किसी मंत्री के पद पर थीं, और ना ही राज्य सरकार के अधिकारी उनके प्रति किसी भी बात के लिए जवाबदेह थे। लेकिन उनका वैसा बर्ताव शुरू से चले आ रहा है और उनके बारे में यह बात प्रचलित है कि अगर मेनका गांधी से अच्छा बर्ताव पाना है तो आपका पशु होना जरूरी है आपके इंसान होने से आपको अच्छा बर्ताव उनसे मिल जाए ऐसी कोई गारंटी नहीं हो सकती। ऐसी चर्चा उनके बारे में हमेशा से चलती रही है और अब जो ताजा ऑडियो सामने आया है, जिसे लेकर देशभर के पशु चिकित्सक आंदोलन कर रहे हैं वह मेनका गांधी के ऊपर कम से कम आधा दर्जन अलग-अलग किस्म के जुर्म दर्ज करने के लिए काफी है। यह अलग बात है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है और वहां पर पुलिस की इतनी मजाल नहीं हो सकती कि भाजपा के एक सांसद के खिलाफ वह कोई कार्यवाही करे, लेकिन हमारा यह मानना है कि ना सिर्फ उत्तर प्रदेश की इस सांसद के खिलाफ बल्कि ऐसी बदजुबानी करने वाले, ऐसी गुंडागर्दी करने वाले, जितने भी किस्म के दूसरे नेता हो सकते हैं, उन सबके खिलाफ ऐसे सबूतों को लेकर पुलिस में रिपोर्ट होनी चाहिए, अदालत में केस होना चाहिए, और ऐसे कुछ लोगों को कैद होनी चाहिए जिससे कि बाकी लोगों को ऐसी गंदी जुबान इस्तेमाल करने, ऐसी गुंडागर्दी करने, ऐसी धमकियां देने के खतरे समझ में आएं। 

इसी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के ताकतवर मंत्री रहे हुए आजम खान ने जब बलात्कार की शिकार एक बच्ची के बारे में तरह-तरह की गंदी बातें कहीं और उसे एक राजनीतिक साजिश करार दिया तो उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने आजम खान को बुलाकर कटघरे में खड़ा किया खूब जमकर फटकार लगाई और आजम खान से उनका बयान वापस करवाकर उनसे माफी मंगवाई थी। हमारा यह मानना है कि डॉक्टरों का जो संगठन आज मेनका गांधी के खिलाफ आंदोलन कर रहा है, कल देशभर में उनके खिलाफ प्रदर्शन किए गए हैं, ऐसे डॉक्टरों को अदालत जाना चाहिए और मेनका गांधी के खिलाफ कार्रवाई की मांग करनी चाहिए क्योंकि उनके पास एक टेलीफोन पर यह पूरा सुबूत है और टेलीफोन कॉल रिकॉर्ड से भी यह निकल सकता है कि मेनका गांधी ने कब-कब फोन करके इस डॉक्टर को धमकाया है। आखिर में एक बात और, मेनका गाँधी का बर्ताव उनके गुजर चुके पति संजय गाँधी की इमर्जेन्सी की ज्यादतियों की याद दिलाता है। मेनका उस वक्त संजय के साथ थीं, और ये तेवर बताते हैं कि उस वक्त की बददिमागी भाजपा में आने के बाद भी उनके मिजाज में जारी है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जून 2021


 

सबको मालूम है आंकड़ों की हकीकत लेकिन दिल के बहलाने को रिकॉर्ड का तरीका अच्छा है

23  जून 2021

 अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर देशभर में जलसे किए गए और इस दिन कोरोना वैक्सीनेशन का एक नया रिकॉर्ड बनाने के लिए कई राज्यों ने बड़ी मेहनत की। खासकर भाजपा के राज वाले पांच राज्यों ने इस दिन इतनी बड़ी संख्या में टीके लगाए कि भारत के कुल आंकड़े केंद्र सरकार के मुताबिक एक टीकाकरण विश्व रिकॉर्ड बना रहे हैं। यह एक अलग बात है कि चीन में टीकाकरण कई हफ्तों से लगातार इसके खूब अधिक चल रहा है और भारत के आंकड़े कहीं दूर-दूर तक उसे छू भी नहीं पा रहे हैं। भारत में हर दिन 25 30 लाख लोगों को टीके लग रहे थे और अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के दिन यह टीकाकरण बढक़र 1 दिन में 85 लाख पहुंच गया। इसे बहुत बड़ी कामयाबी बताया गया लेकिन इन आंकड़ों की हकीकत देखना हो तो टीकाकरण के कुछ दिन पहले और उसके बाद के आंकड़े देखना जरूरी है। भाजपा के पांच राज्यों में 21 जून योग दिवस के पहले के दिनों में टीकाकरण कम किया गया और रोक कर रखे गए सारे टीके रिकॉर्ड बनाने के इस दिन लगाए गए। मध्यप्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, गुजरात, और हरियाणा, इन सभी जगहों पर करीब एक सा ट्रेंड देखने मिला। मध्य प्रदेश के आंकड़े सबसे अधिक हैरान करते हैं जहां 20 जून को 700 से कम लोगों को टीके लगाए गए, 21 जून को 16 लाख 93 हजार लोगों को टीके लगाए गए, और 22 जून को 48 सौ लोगों को टीके लगाए गए। यह उतार-चढ़ाव इस बात का सुबूत है कि कई राज्यों ने टीकाकरण के दिन रिकॉर्ड बनाने के लिए टीके  बचाकर रखे।

आंकड़ों का यह खेल हिंदुस्तान में कोई नई बात नहीं है, यह पहले से चले आ रहा एक ऐसा खेल है जिसे रिकॉर्ड बनाने के लिए लोग इस्तेमाल करते हैं। लोगों को याद होगा कि आपातकाल में नसबंदी का रिकॉर्ड बनाने के मुकाबले में अफसर और नेता लगे रहते थे और संजय गांधी को खुश करने के लिए एक-एक नसबंदी कैंप में हजारों लोगों को दरी पर लिटाकर और तमाम किस्म की गंदगी के बीच रफ्तार से उनकी नसबंदी की जाती थी, और वे किसी सामान की तरह, बड़े-बड़े कमरों या हॉल में फर्श पर डाल दिए जाते थे। इसके बाद भी कभी किसी एक जिले में किए जाने वाले ऑपरेशन, या कभी किसी एक दिन में करने वाले सर्वाधिक नसबंदी का रिकॉर्ड, आंखों के ऑपरेशन के मामले में भी कई जगह किया जाता है। डॉक्टर रफ्तार से ऑपरेशन करते हैं और आंकड़ों का रिकॉर्ड बनाते हैं। ऐसा ही अभियान पौधे लगाने का होता है और एक-एक दिन में दसियों लाख से लेकर करोड़-करोड़ तक पौधे लगाने का अभियान छेड़ा जाता है फिर चाहे उनमें से दो चार फ़ीसदी भी पौधे जिंदा ना बचें.  कुछ संगठन रक्तदान का भी ऐसा रिकॉर्ड बनाते हैं फिर चाहे दान में मिले उतने खून को रखने की क्षमता ब्लड बैंक की हो या ना हो। रिकॉर्ड बनाने की चाह इंसान की जिंदगी की एक बड़ी चाह रहती है। सरकारों के अलग-अलग तबके इस फेर में रहते हैं कि कैसे कोई बड़ा रिकॉर्ड बने, और कैसे वह बड़ी खबर बने, और कैसे किसी विश्वसनीय या अविश्वसनीय रिकॉर्ड कंपनी की तरफ से एक सर्टिफिकेट हासिल करके उसे दीवार पर टंगा जाए। यह सिलसिला बड़ा खराब है। हिंदुस्तान में योग दिवस के दिन अधिक से अधिक टीके लगाने का रिकॉर्ड बनाने के लिए राज्य सरकारों ने कई दिन पहले से ही टीकों की रफ्तार घटा दी थी। जानकार लोगों ने यह सवाल भी उठाया है कि जिन लोगों को 4 दिन पहले टीके लग सकते थे उन्हें रोककर योग दिवस के दिन टीका लगाने से उनकी जिंदगी 4 दिन अधिक तो खतरे में पड़ेगी क्योंकि टीके का जो फायदा उन्हें जिस दिन मिलना शुरू हो सकता था उसे 4 दिन लेट किया गया।

सरकारों का ऐसा मिजाज देखना है तो लोक अदालतों में देखना चाहिए जो कि अपने प्रदेश के हाईकोर्ट जजों को खुश करने के लिए या जिला अदालत के जजों को खुश करने के लिए लगाई जाती हैं. उनमें आंकड़ों की भरमार करने के लिए छोटे-छोटे ट्रैफिक चालान रोककर रखे जाते हैं जिन्हें लोक अदालत में ही निपटाया जाए, राशन के या आबकारी के छोटे-छोटे मामले बनाए जाते हैं और उन्हें रोक कर रखा जाता है ताकि लोक अदालत की रिकॉर्ड बनाने के हसरत का पेट भरा जा सके। ऐसी लोक अदालतों में लोगों के बीच के छोटे-छोटे झगड़ों का निपटारा जो कि पहले हो चुका रहना चाहिए था उन्हें पुलिस या अदालत के पास रोक कर रखा जाता है कि इन्हें लोक अदालत में पेश किया जाएगा ताकि वहां अधिक से अधिक मामले निपटाने का एक नया रिकॉर्ड कायम हो सके। आंकड़ों की यह मोह माया बहुत ही गलत है और खासकर उस वक्त जब यह लोगों की सेहत से जुड़ी हुई है।

लोगों ने सोशल मीडिया पर यह गिनाया भी है कि हिंदुस्तान में जो लोग इसे भारत की एक दिन की सबसे बड़ी उपलब्धि करार दे रहे हैं और इसे दुनिया में एक दिन का सबसे अधिक टीकाकरण करार दे रहे हैं उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि चीन में पिछले कई हफ्तों से हर दिन औसतन डेढ़ करोड़ लोगों को टीके लग रहे हैं. हिंदुस्तान तो हफ्ते भर के टीके को रोककर भी इसके किसी किनारे तक नहीं पहुंच पाया है, शायद इसके आधे तक ही पहुंचा है। सेहत को लेकर ऐसे रिकॉर्ड कायम करने के खिलाफ किसी अदालती आदेश की जरूरत है क्योंकि सरकारों में बैठे हुए लोग तो अपनी कामयाबी दिखाने के लिए आंकड़ों पर सवार रहते ही हैं, यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। जिस दिन जिस प्रदेश के हाथ में जितने टीके थे, उन्हें जल्दी से जल्दी लोगों को लगाना चाहिए था। अगर लोगों को किसी दिन के इंतजार में टीकों को फ्रिज में रखना है और लगवाने वालों को इंतजार करवाना है तो यह एक जुर्म है. भारत में अभी एक आईआईटी ने कोरोना की तीसरी लहर को लेकर अपना जो अंदाज यह सामने रखा है, वह दिल दहलाने वाला है इसके मुताबिक सितंबर के बीच तक कोरोना के आंकड़े पिछली लहर के सबसे अधिक से भी सवा गुना अधिक पहुंच जाएंगे। और ऐसी लहर के पहले जिस तरह देश की अधिकतर आबादी के टीकाकरण का काम हो जाना चाहिए, वह किसी किनारे लगते नहीं दिख रहा है। जो देश अपनी झूठी कामयाबी के झूठे आत्मगौरव में डूबा रहता है उसे कड़वी और खुरदरी जमीनी हकीकत का एहसास भी नहीं हो पाता, क्योंकि क्योंकि उसके पांव ही जमीन पर नहीं पड़ते हैं। हिंदुस्तान को ऐसे झूठे और फर्जी आत्मगौरव से बचना चाहिए क्योंकि ऐसी उपलब्धि का एक झूठा एहसास उसे सचमुच की मेहनत करने से रोक रहा है, उसे अपने सामने खड़ी हुई असली चुनौती को देखने से रोक रहा है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जून 2021


 

दिग्गज विशेषज्ञों की तमिलनाडु राज्य आर्थिक परिषद, बाक़ी देश के लिए भी सबक़

21  जून 2021

 तमिलनाडु सरकार ने अभी विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान यह घोषणा करवाई कि वह एक आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन कर रही है जिसमें एक नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री एस्थर दुफ्लो भी सदस्य होंगी। लेकिन उनके साथ-साथ कुछ और नाम भी इस परिषद के लिए घोषित किए गए हैं जो नोबेल पुरस्कार विजेता तो नहीं है, लेकिन किसी मायने में उनसे कम भी नहीं है। इन नामों में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रहे हुए रघुराम राजन, और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम का नाम है, देश के एक चर्चित अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का नाम है, और एक पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव एस नारायण भी इस परिषद में रखे गए हैं। राज्यपाल का अभिभाषण राज्य सरकार का तैयार किया हुआ होता है और उसमें कहा गया है कि आर्थिक सलाहकार परिषद की सिफारिशों के आधार पर सरकार सुनिश्चित करेगी कि आर्थिक विकास समाज के हर क्षेत्र तक पहुंचे।


भारत के संघीय ढांचे की खूबी यही है कि केंद्र सरकार से परे अलग अलग राज्य सरकारें अपनी-अपनी सोच के मुताबिक बहुत से मौलिक प्रयोग कर सकती हैं, और उन प्रयोगों से बाकी देश की कई बार कई चीजें सीखता है कि उन प्रयोगों के मुताबिक काम करना है, या उन प्रयोगों से परहेज करते हुए काम करना है. तजुर्बे का फायदा भी मिलता है या एक नसीहत मिलती है।  लोगों को अगर याद होगा कि यूपीए सरकार के 10 वर्ष में दिल्ली में सोनिया गांधी की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनी थी जिसमें सामाजिक क्षेत्र के कुछ लोग मनोनीत किए गए थे. उसमें भारत सरकार के एक रिटायर्ड सचिव भी थे और गरीबों के कल्याण की अर्थव्यवस्था के देश के एक सबसे बड़े जानकार ज्यां द्रेज भी उस एनएसी के एक मेंबर थे। एक समय छत्तीसगढ़ में कलेक्टर और कमिश्नर रह चुके हर्ष मंदिर भी सोनिया गांधी की उस सलाहकार परिषद के सदस्य थे। ऐसा माना जाता है कि यूपीए सरकार की गरीब कल्याण की बहुत सी योजनाओं पर इस सलाहकार परिषद की छाप थी और सोनिया गांधी इन सलाहकारों से प्रभावित भी रहती थीं। भारत में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह से सरकारें अपने सलाहकार तय करती हैं। उनका सरकारों के कामकाज में काम या अधिक योगदान रहता है। यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अपने 3 साल के कार्यकाल में देश के कई ऐसे लोगों को प्रदेश का सलाहकार बनाया था जिन्होंने कोई भी योगदान नहीं दिया था, या राज्य सरकार उनका योगदान ले नहीं पाई थी। अभी मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने ही चार पुराने और करीबी साथियों को सलाहकार बनाकर जिम्मेदारी के काम दिए हैं और यह उम्मीद है की जाती है कि उनका योगदान राज्य सरकार को मिल रहा होगा।

तमिलनाडु सरकार के इस ताजा फैसले से एक रास्ता खुलता है कि देश के बाहर काम करने वाली एक अर्थशास्त्री महिला को राज्य के विकास और जनकल्याण की इस परिषद में रखा गया है, और इसमें दो और ऐसे लोग हैं जिनका भारत के बाहर से रिश्ता रहा है। आरबीआई के भूतपूर्व गवर्नर रघुराम राजन लंबे समय से एक अमेरिकी विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे थे और भारत में अपना काम करने के बाद वे फिर अमेरिका ही लौट चुके हैं। एक अन्य नाम ज्यां द्रेज का ऐसा है जो कि विदेशी मूल का है। वे दशकों पहले यूरोप से हिंदुस्तान आए थे और तब से वे यहीं के होकर रह गए हैं, उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के साथ आधा दर्जन से अधिक किताबों में सह लेखक की हैसियत से काम किया है. और उनके काम का महत्व ऐसा है कि अमर्त्य सेन ने उनके बारे में यह कहा था कि वे ज्यां द्रेज के साथ किताब इसलिए लिखते हैं कि तमाम काम ज्यां द्रेज करते हैं, और अमर्त्य सेन को सहलेखक की वाहवाही मिलती है. भारत के हाल के बहुत सारे जनकल्याण के ऐसे काम हैं जो न सिर्फ यूपीए सरकार के वक्त बल्कि कई प्रदेशों में भी ज्यां द्रेज की सलाह से चले और उनसे गरीबों का बहुत भला हुआ। वे चाहे सोनिया गांधी की एनएसी के मेंबर थे, लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा की रमन सिंह सरकार ने उनकी सलाह पर अपनी पीडीएस योजना तैयार की थी, जिसकी देशभर में बड़ी वाहवाही हुई थी। आज छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के साथ ज्यां द्रेज बस्तर के आदिवासी आंदोलन के मुद्दे पर असहमत नजर आ रहे हैं, लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि जिस वक्त रमन सिंह सरकार ज्यां द्रेज के सुझाए हुए पीडीएस को लागू कर रही थी, उस वक्त भी वे इस सरकार की बस्तर की पुलिस नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में बहुत से मामले लड़ रहे थे।

देश-विदेश का तजुर्बा रखने वाले और अंतर्राष्ट्रीय समझ-बूझ रखने वाले ऐसे लोगों की सलाह किसी भी राज्य के काम की हो सकती है. तमिलनाडु की यह नई आर्थिक सलाहकार परिषद इस मायने में भी दिलचस्प है कि इसमें अमेरिकी पृष्ठभूमि से आए हुए दो अर्थशास्त्री हैं, और एक अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ऐसे हैं जिन्होंने कभी भी अमेरिका जाने का भी कोई न्यौता मंजूर नहीं किया। राज्य के आर्थिक विकास का यह तजुर्बा कितना कामयाब होता है यह तो आने वाले वर्षों में पता लगेगा और क्योंकि इस सरकार ने अपना कार्यकाल शुरू होते ही यह फैसला लिया है तो इसका कोई फायदा अगर होना है तो वह देखने के लिए इसका पूरा कार्यकाल ही सामने खड़ा रहेगा। तमिलनाडु एक बड़ी अर्थव्यवस्था है, और वहाँ सम्भावनाएँ भी बहुत हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों को एक दूसरे के तजुर्बे से इसलिए भी सीखना चाहिए कि प्रतिभा और मौलिक सोच, इन पर किसी का एकाधिकार तो है नहीं, और देश-प्रदेश की कोई भी सरकार अगर यह समझती है कि उसे किसी सलाह की जरूरत नहीं है, तो उसका जो नतीजा होता है वह देश आज देख ही रहा है।

हिंदुस्तान इस बात को देख और भुगत रहा है कि किस तरह यहां योजना आयोग को खत्म किया गया, और उसके नाम पर नीति आयोग नाम की एक छोटी सी ऐसी संस्था बना दी गई जिसमें राज्यों की व्यापक भागीदारी खत्म सरीखी हो गई है। एक वक्त था जब देश के राज्य, भारत के योजना आयोग में अपने तर्कों को रखते थे, अपनी योजना और अपनी सोच को रखते थे, देश के साधनों में अधिक हिस्सेदारी के अपने दावे तो पेश करते थे। लेकिन आज खुद योजना आयोग नाम की संस्था नहीं रह गई, और नीति आयोग नाम की संस्था की एक इतनी सीमित भूमिका रह गई है कि जब उसकी खुद की बात का कोई वजन नहीं है तो वह राज्यों की बात को सुनकर क्या कर ले। नतीजा यह है कि हिंदुस्तान के संघीय ढांचे के तहत योजना आयोग नाम की जिस संस्था में सारे वक्त राज्यों की बात सुनी जाती थी, उस मंच को ही खत्म कर दिया गया है। बिना योजना आयोग यह हुआ है कि मोदी सरकार अनगिनत ऐसे बड़े-बड़े फैसले रही है जिनसे ऐतिहासिक बर्बादी हुई है। लेकिन योजना आयोग जैसी कोई संस्था ऐसे फैसलों के वक्त ना अस्तित्व में थी और ना ही देश में किसी और संस्था से, किसी और मंत्रिमंडल से इनके बारे में कोई सलाह दी गई. नतीजा यह है कि हर कुछ बरस में बड़े-बड़े ऐतिहासिक फैसले सामने आए, कभी नोटबंदी का फैसला आया, तो कभी ऐसा जीएसटी आया कि जिसकी मरम्मत सालों से चल ही रही है, और कभी लॉकडाउन का, और किसी पारे की तरह अस्थिर वैक्सीन नीति का. ऐसे कई फैसले आए जिनमें विशेषज्ञ सलाह की कमी साफ-साफ दिखती रही। इसलिए लोकतंत्र में निर्वाचित लोगों को अपनी समझ पर एक सीमा से अधिक भरोसा नहीं होना चाहिए और दुनिया में विशेषज्ञता का सम्मान अधिकतर लोकतंत्रों में होता है। और जहां लोकतंत्र नहीं होता वहां के बारे में क्या कहा जा सकता है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जून 2021


 

आज एक छोटी सी, लेकिन बहुत जरूरी बात पर चर्चा

30  जून 2021

 हिंदुस्तान के अधिकतर हिस्सों में बोलचाल में गालियों का खूब चलन है। और यह बात महज बड़े लोगों के बीच नहीं हैं, बल्कि छोटे-छोटे बच्चे भी सडक़ों पर गालियां देते दिखते हैं और मां-बहन की गंभीर गालियां देते हैं। इतने छोटे बच्चे एक दूसरे की मां-बहन को लेकर सेक्स की गंदी गालियां देते हैं जिसका शायद वह मतलब भी ठीक से नहीं समझ पाते होंगे। लेकिन इनका मतलब यही है कि इन बच्चों के आसपास कोई बड़े लोग इस तरह की गालियां देते ही हैं और उन्हीं से सीखी हुई गालियां कुछ बच्चे शुरू करते हैं, और बाद में बाकी बच्चे उन्हें आगे बढ़ाते हैं। दिक्कत महज इन गालियों की नहीं है जिन्हें सुनते हुए आसपास भले लोगों को, या महिलाओं को और लड़कियों को वहां से गुजरना भी मुश्किल पड़ता हो, या वहां खड़े रहना मुश्किल पड़ता है, दिक्कत इससे आगे की है। जो हमलावर हरकत और सेक्स की गालियां छोटे-छोटे बच्चे देते हैं, वे उनके दिल दिमाग में बैठी रहती हैं। इसका असर यह होता है कि जब भी वे बड़े होते हैं और किसी लडक़ी के साथ छेडख़ानी या अधिक गंभीर सेक्स अपराध करने की कोशिश करते हैं, तो उनके दिमाग में लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार करने को लेकर कोई झिझक नहीं रहती। वह बरसों से, अपनी कम उम्र से, किसी दूसरे की मां बहन को लेकर सेक्स की गालियां इतनी दे चुके रहते हैं कि उनके लिए किसी के साथ सेक्स की ज्यादती करने में कोई झिझक नहीं रह जाती। इसलिए गालियों को महज गालियां मान लेना और उन्हें बदजुबान मान लेना काफी नहीं है। समाज में जब वह बच्चे गालियों से शुरुआत करते हैं और जाहिर तौर पर एक दूसरे की मां बहन को लेकर गालियां देते हैं, या खेल खेल में बिना किसी की मां-बहन को संबोधित किए हुए हवा में गालियां निकालते रहते हैं, क्रिकेट की गेंद को मां-बहन की गाली देते हैं, किसी स्कूटर या कार को मां-बहन की गाली देते हैं तो उसका नतीजा यही होता है कि किसी महिला के साथ सेक्स को लेकर संवेदनशीलता पूरी तरह से खत्म हो जाती है और वह उन्हें अपने अधिकार की बात लगने लगती है।

हिंदुस्तान कहने को अपनी संस्कृति पर बहुत गर्व करने वाला देश है लेकिन आज उसकी आम संस्कृति यह है कि सार्वजनिक जगहों पर लोग खूब गंदी-गंदी गालियां देते हैं, और कल परसों छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जिस तरह एक कांग्रेस नेता ने सडक़ पर एक ट्रैफिक सिपाही को पेट भर कर मां की गालियां दी हैं, अपनी बीवी की मौजूदगी में गालियां दी हैं, वही हिंदुस्तान की असल संस्कृति रह गई है। जो लोग अधिक समझदार और जिम्मेदार हैं वे सार्वजनिक रूप से गालियां नहीं देते लेकिन आपसी बातचीत में वह मौजूदा लोगों को देखकर जहां गुंजाइश रहती है वहां गालियां देकर अपनी भड़ास निकालते हैं। जो लोग बंद कारों में अकेले चलते हैं वह भी ट्रैफिक की दिक्कतों को लेकर बंद शीशों के भीतर किसी न किसी मां-बहन को गालियां देते रहते हैं, बड़बड़ाते रहते हैं। यह सिलसिला कम से कम सार्वजनिक जगहों पर पूरी तरह खत्म होना चाहिए क्योंकि हिंदुस्तान में ऐसे काम के लिए सजा का इंतजाम किया गया है। दिक्कत यह है कि कुछ लोगों की ऐसी गालियों के खिलाफ अगर पुलिस को बुलाया जाए, तो वह लाठी से हांकते हुए इससे भी बुरी गालियां देने लगती है। नतीजा यह होता है कि सार्वजनिक जगह पर गंदी जुबान को रोकने का मकसद ही हार जाता है।

कुछ लोगों को यह बात अटपटी लग सकती है कि मां-बहन की गालियां देने वाले क्या सचमुच ही बलात्कारी हो सकते हैं, लेकिन यह बात समझना चाहिए कि भाषा लोगों के दिल-दिमाग पर गहरा असर करती है। जिन परिवारों में और जिन समुदायों में बच्चों की भाषा को ठीक रखने की कोशिश की जाती है वहां बच्चों की हरकतें भी अपने आप ठीक होने लगती हैं। यह सिलसिला लंबा चलता है, लेकिन समाज की बेहतरी कोई छोटा काम नहीं है जो कि तेजी से करके जल्दी निपटाया जा सके। लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी खुद की जुबान ठीक रहे और आसपास अगर वे किसी को गंदी जुबान इस्तेमाल करते देखें तो टोकने से ना चूकें। बहुत से लोग बीच में पडऩे से परहेज करते हैं कि कौन उलझे, लेकिन लोगों को यह याद रखना चाहिए कि सार्वजनिक जगहों पर अगर इतनी गंदी भाषा इस्तेमाल हो रही है कि वहां से लड़कियां और महिलाएं निकलने में भी हिचकें  तो यह समाज की एक सामूहिक हार रहती है और लोगों को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी, सामाजिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जून 2021


 

एक उंगली देख कांप उठे भयभीत देश को दीवारों पर इश्तहारों से कोई दिक्कत नहीं

 20 जून  2021

 कुछ वक्त पहले हिंदुस्तान में एक फिल्म आई जिसमें अभिनेत्री स्वरा भास्कर अपने ही बदन को सेक्स सुख देते हुए दिख रही थी। हिंदी भाषा में लोग बात करते हुए सेक्स से जुड़े बहुत से शब्दों से परहेज करते हैं इसलिए हस्तमैथुन शब्द की जगह तरह-तरह के शब्द जोडक़र काम चलाना पड़ता है। इस फिल्म के इस सीन को लेकर जिसमें कोई अश्लीलता नहीं थी, और जो कि जिंदगी की एक हकीकत बयान करने वाला सीन था, उस पर खूब बवाल खड़ा हुआ। देश भर से उसके खिलाफ लिखा गया। लोग इस सीन के जितने खिलाफ थे, उतने ही इस बात के भी खिलाफ थे कि स्वरा भास्कर ने कुछ किया था। स्वरा अपनी राजनीतिक विचारधारा के चलते हुए और लगातार मुखर बने रहने की वजह से देश के करोड़ों नफरतजीवियों के निशाने पर हमेशा ही बनी रहती हैं। वे अगर सुबह उठकर ट्वीट करें कि आज पूरब की तरफ चलना चाहिए, तो महज उनकी बात को खारिज करने के लिए लाखों समर्पित लोग पश्चिम की तरफ चलने लगेंगे। ऐसी नफरत का केंद्र बनी हुई स्वरा न तो किसी हमले से डरती हैं और न ही सच को बोलने से परहेज करती हैं, इसलिए इस फिल्म के इस सीन से उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी जो कि हस्तमैथुन करने के बुनियादी इंसानी हक को महिलाओं को भी उतना ही देता है जितना कि पुरुषों के पास हमेशा से रहते आया है।

जिन लोगों को यह लगता है कि हस्तमैथुन कोई पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता का ईसाई प्रभाव है जो कि हिंदुस्तानी नौजवानों को बर्बाद कर रहा है तो उन्हें अपने ही देश के इतिहास को पढऩा चाहिए जिसमें दुनिया में सेक्स की सबसे मशहूर किताब तरह-तरह के तरीके बताती है कि कैसे अधिक से अधिक देहसुख हासिल किया जा सकता है, और जो सेक्स के 84 किस्म के आसन बताती है। लोगों को यह भी देखना चाहिए कि सैकड़ों बरस पहले बने इस देश के मंदिरों की दीवारों पर इंसानों के सेक्स और इंसानों के जानवरों के साथ सेक्स और हर किस्म के सेक्स की मूर्तियां कैसे बनाई गई थीं। इसलिए यह देश सेक्स से ऐसे बड़े परहेज वाला देश भी कभी नहीं रहा है।

अब देखने की मजेदार बात यह है कि एक फिल्म में एक अभिनेत्री अगर अपने बदन को सेक्स सुख दे रही है तो उसकी एक उंगली से इस देश को इतनी बड़ी तकलीफ हो गई जितनी तकलीफ उसे कभी इस देश की दीवारों पर लिखे इसी बात के इश्तहारों से नहीं हुई थी। हिंदुस्तान की दीवारों को देखें तो वे गुप्त रोग विशेषज्ञों के इश्तहारों से भरी हुई हैं जिनमें से कोई भी शिक्षित या प्रशिक्षित डॉक्टर नहीं है, और सारे के सारे फर्जी इलाज करने वाले, नीम-हकीम कहे जाने वाले, नीम और हकीम दोनों शब्दों को बदनाम करने वाले लोगों के सेक्स क्लीनिक के हैं। हिंदुस्तानी दीवारों पर ऐसे सेक्स क्लीनिक के इश्तहार उस वक्त से चले आ रहे हैं जब पुरातत्व विभाग को खुदाई में दीवार मिली भी नहीं थी। जो सबसे पुरानी दीवारें हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में मिली होंगी, उन पर भी किसी डॉक्टर मुल्की या डॉक्टर शाह का इश्तिहार लिखा हुआ जरूर रहा होगा जिसे बाद में शर्मीले पुरातत्ववेत्ताओं ने मिटा दिया होगा। एक तरफ तो सेक्स के नाम पर बीमारियों का हौव्वा खड़ा करके उनके इलाज का दावा करने वाले ऐसे इश्तहारों का पहला ही शब्द लिखा रहता है कि बचपन से हस्तमैथुन करने की वजह से जो कमजोरी आ गई है उसका शर्तियां इलाज किया जाता है। इसका मतलब है कि यह समाज सेक्स और हस्तमैथुन इन दोनों के अस्तित्व को तो अनंत काल से देखते आ रहा है। सेक्स क्लीनिक के विज्ञापनों को किसी ने आपत्तिजनक माना हो और उनके खिलाफ आंदोलन छेड़े हों ऐसा तो पिछले 50 साल में कहीं पढऩे में नहीं आया क्योंकि यह इश्तहार मोटे तौर पर आदमियों को खींचने के लिए रहते हैं, लडक़ों को खींचने के लिए रहते हैं जिन्हें यह समाज यह मौलिक अधिकार देता है कि वह हस्तमैथुन भी कर सकते हैं, उसकी वजह से बीमारियों के शिकार भी हो सकते हैं, और फिर ऐसे फर्जी इलाज करने वाले गुप्त रोग विशेषज्ञों के पास भी जा सकते हैं। 

लडक़ों और पुरुषों के ऐसे काम करने पर समाज को कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर एक अभिनेत्री ने एक फिल्मी कहानी की जरूरत को पूरा करने के लिए अपने ही बदन पर अपनी उंगली धर दी तो मान लो यह पूरा देश ही सिहर उठा। सारे के सारे मर्दों को लगा कि यह उंगली तो उनकी मर्दानगी पर उठ गई है, हस्तमैथुन के उनके एकाधिकार पर उठ गई है। सेक्स के अधिकार पर उनकी मोनोपोली खतरे में पड़ गई है, और ऐसे हाल में तो आगे जाकर महिलाएं और भी हक मांगने लगेंगी, और फिर जो महिला अपने बदन को खुद सुख दे पाएगी उसे भला मर्द की जरूरत क्या रह जाएगी? यह समाज तो बहुत ही खतरनाक समाज हो जाएगा जहां औरत बिना मर्द के अपने बदन की जरूरत को पूरा कर लेगी !  

इसलिए ऐसी फिल्म के ऐसे सीन के खिलाफ और इसे करने वाली अभिनेत्री के खिलाफ जमकर लिखा गया उसे हिंदुस्तानी संस्कृति पर हमला मान लिया गया और उसे भारतीयता के खिलाफ मान लिया गया मानो हिंदुस्तानी दीवारों पर इश्तहार करने वाले सेक्स क्लीनिक के गैरचिकित्सक फर्जी डॉक्टर यूरोप और अमेरिका के लोगों का इलाज करते हैं और हिंदुस्तानी संस्कृति में तो मानो कोई हस्तमैथुन है ही नहीं जिसके लिए वे दीवारों पर इश्तहार लिखते हैं। यह अजीब सा पाखंडी समाज है जिसे एक औरत का उसकी देह पर उसका हक देखते भी नहीं बनता। यह देश ऐसे मर्दों का देश है जो कि खुद संतुष्टि पा लेने वाली महिला को देखकर दहशत में आ जाते हैं. जिन्हें किसी महिला की सेक्स की जरूरत मर्द पर आश्रित रहने तक ही अच्छी लगती है। ऐसा कायर देश जो कि स्वरा भास्कर की एक उंगली को देखकर कांप उठा था उसे देश पर मर्दों के लिए दीवारों पर लिखे गए सेक्स क्लीनिक के इश्तहारों के हस्तमैथुन से कोई दिक्कत नहीं दिखती है, ऐसा है मेरा देश!

अब यह वक्त आ गया है कि औरत से जुड़े हुए तमाम मुद्दों पर उनकी बात सुनी जाए, उनकी लिखी हुई बात को पढ़ा जाए, और हिंदुस्तानी मर्द अपनी सोच पर फिक्र करें कि कैलेंडर की 21वीं सदी के 21 साल में भी वे किस तरह हज़ारों बरस पहले की पत्थर की किसी गुफा में जी रहे हैं ! 

(Daily Chhattisgarh)

सत्तारूढ़ गुंडों के जुर्म पर पार्टी को बोलना और सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए

 30  जून 2021

 कल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में सत्ता की गुंडागर्दी का एक भयानक नजारा देखने मिला जब कांग्रेस पार्टी के एक ब्लॉक अध्यक्ष ने सडक़ पर गलत तरफ से स्कूटर चलाकर लाने पर रोकने वाले ट्रैफिक सिपाही को खूब मां बहन की गालियां बकी, उसे तरह-तरह की धमकियां दीं, उससे धक्का-मुक्की की, उसे मारने के लिए कई बार हाथ उठाया, और उसका मोबाइल फोन छीन लिया। यह सब कुछ दिनदहाड़े व्यस्त सडक़ पर बाजार के बीच किया। पुलिस की पोशाक में ड्यूटी पर तैनात, अपना काम करते हुए एक सिपाही के साथ इस तरह का सुलूक लोगों को कई बरस जेल भेजने के लिए काफी होना चाहिए।  यह तो अच्छा हुआ कि बिलासपुर की पुलिस ने अपने सिपाही का साथ दिया और कांग्रेस नेता के खिलाफ जुर्म दर्ज किया, उसकी गिरफ्तारी के लिए उसकी तलाश की जा रही है, वरना आमतौर पर सत्ताधारी गुंडों को बंद कमरे में बिठाकर, पुलिस के छोटे कर्मचारियों को दबाकर एक जुबानी समझौता करवा दिया जाता है। 

इसी तरह का नजारा छत्तीसगढ़ में कई जगह सत्तारूढ़ गुंडों की हरकतों का देखने मिला है, दिक्कत यह है कि अधिकतर मामलों में सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी दोनों ही चुप भी रह जाते हैं। यह कोई नई बात नहीं है, और न ही यह केवल छत्तीसगढ़ की बात है, हिंदुस्तान के अधिकतर प्रदेशों में हर सत्तारूढ़ पार्टी के मवाली इसी तरह का काम करते हैं और अपनी ड्यूटी पूरी कर रही पुलिस का साथ देने के लिए अक्सर उनके बड़े अफसर भी साथ नहीं रहते। यही वजह है कि छोटे पुलिस कर्मचारी चेहरा देख-देखकर काम करते हैं। राजनीतिक गुंडों पर हाथ डालना, अपना किसी मुश्किल इलाके में तबादला करवाने सरीखा काम माना जाता है। देश में जगह-जगह ऐसा होता भी है कि सत्तारूढ़ गुंडों पर जिसने हाथ डाला, तुरंत ही या कुछ दिन रुककर उन्हें किसी मुश्किल जगह भेज दिया जाता है और यह बाकी लोगों के लिए भी एक इशारा होता है कि सत्ता पर हाथ डालने से बचें। यह भी एक वजह रहती है कि किसी प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी में शामिल होने वाले लोग अधिक रहते हैं, और उसे छोडऩे वाले लोग कम रहते हैं। पश्चिम बंगाल में ही यह नजारा देखने लायक है कि जिन लोगों ने ममता बनर्जी की पीठ में छुरा भोंककर पार्टी छोड़ी थी और भाजपा में गए थे, उनमें से हजारों लोग आज कतार लगाकर घरवापिसी के लिए खड़े हैं और ऑटो रिक्शा में लाउडस्पीकर लगाकर पूरे शहर में मुनादी कर रहे हैं कि उन्होंने भाजपा में जाकर बहुत बड़ा गलत काम किया था, और अब दीदी के पास लौटना चाह रहे हैं। दीदी के पास लौटने की ऐसी और कोई मजबूरी नहीं है सिवाय इसके कि सत्तारूढ़ पार्टी की गुंडागर्दी और पुलिस के किसी मामले में फंसने पर विपक्ष में होने का नुकसान, इसका खतरा उन्हें दिख रहा है।

यह तो भला हो मोबाइल फोन पर वीडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा का जो कल बिलासपुर के बाजार में किसी ने कांग्रेसी गुंडे की इस हरकत को रिकॉर्ड कर लिया और यह भी रिकॉर्ड किया कि किस तरह एक पुलिस सिपाही सहनशील बना हुआ इस गुंडागर्दी के खिलाफ हाथ नहीं उठा रहा था वरना वह कद काठी में इतना था कि इस कांग्रेस नेता को वहीं पीटकर रख देता जिसने कि बाद में यह दावा किया है कि उसकी बीवी भी साथ में थी। यह बात भी सोचने के लायक है कि बीवी साथ में रहते कोई नेता सडक़ पर किस तरह की गुंडागर्दी कर सकता है और किस तरह पुलिस को गंदी गालियां दे सकता है। यह सिलसिला अधिकतर प्रदेशों में सत्ता की मेहरबानी से चलने वाली गुंडागर्दी को बढ़ाते भी चलता है। एक तरफ तो पुलिस सूरजमुखी की तरह हो जाती है जो कि सत्ता का चेहरा देख-देखकर यह तय करती है कि कौन सी बात जुर्म है, और कौन सी नहीं। 

दूसरी तरफ सरकारी वकील सत्तारूढ़ पार्टी के पसंदीदा और उसके तय किए हुए होते हैं इसलिए अदालत में सजा दिलवाने की उनकी दिलचस्पी उस वक्त घट जाती है जब कटघरे में उनके ही संगी साथी रहते हैं। फिर इसके बाद सत्ता की ताकत ऐसी रहती है कि पुलिस गवाहों को मार-मारकर भगा देती है या बागी बना देती है, तमाम सबूतों को बर्बाद कर देती है। और सच तो यह है कि सत्ता की मर्जी के खिलाफ किसी को सजा दिला पाना बहुत ही मुश्किल काम होता है। फिलहाल जिस घटना से यह लिखना शुरू हुआ है उसे लेकर प्रदेश कांग्रेस को अपना मुंह खोलना चाहिए और प्रदेश के गृह मंत्री को भी बताना चाहिए कि उनकी पार्टी के ब्लॉक अध्यक्ष जब उनकी उनके विभाग की पुलिस को पीट रहे हैं, मां-बहन की गालियां दे रहे हैं तो गृहमंत्री की जिम्मेदारी अपनी पार्टी के प्रति बनती है या अपने सिपाही के प्रति? 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जून 2021


 

एमपी में व्यवस्था से लड़ता एक नौजवान आईएएस

 19  जून 2021

 मध्यप्रदेश में एक आईएएस अधिकारी को लेकर बड़ा विवाद चल रहा है। इस नौजवान अफसर के तेवर कुछ ऐसे हैं कि 4 बरस में उसका 9 बार तबादला हो चुका है, और उसके खिलाफ कई तरह की कार्रवाई भी सरकार कर रही है। दूसरी तरफ इस अफसर ने अपने बड़े अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ सार्वजनिक रूप से भी बहुत सी बातें कही हैं जो कि लोगों को कुछ हैरान भी करती हैं। अब ताजा मामला यह है कि इस अफसर ने अपने से सीनियर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि उसने सीएम हाउस में किसी से बात की और इस जूनियर का तबादला करवा दिया। इसके साथ-साथ उसने यह भी कहा कि सीएम की पत्नी और इस कलेक्टर की पत्नी दोनों  एक जाति संगठन में अध्यक्ष और सचिव हैं, इस नाते उनका घरोबा है। लेकिन इस अधिकारी को अभी सरकार की तरफ से जो नोटिस मिला है वह इस बात के लिए हैं कि उसने राजधानी से एक बड़ी अफसर द्वारा टेलीफोन पर कही गई बातों को आईएएस अफसरों के एक व्हाट्सएप ग्रुप में पोस्ट किया। अपने से बड़ी अफसर के टेलीफोन कॉल को रिकॉर्ड करना और उसकी बातों को पोस्ट करना इसे सरकार ने बहुत बड़ा जुर्म माना है और इस नौजवान अफसर के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई है।

अब यहां पर दो-तीन बातों को देखना जरूरी है कि किसी अफसर को अगर उससे बड़े किसी अफसर ने टेलीफोन पर या रूबरू कोई बात कही है, तो उसे रिकॉर्ड करना क्या एक जुर्म माना जाना चाहिए? सवाल यह है कि एक सीनियर और एक जूनियर अफसर के बीच अगर कोई निजी बात हो रही है तो यह उनकी निजी हैसियत से होने वाली बात है इस पर कोई सरकारी नियम लागू नहीं हो सकते। दूसरी तरफ अगर उनके बीच सरकारी कामकाज को लेकर कोई बात हो रही है तो कोई भी बात रिकॉर्ड से परे की क्यों होनी चाहिए? अगर बात नियम-कानून के तहत सही है, तो उसे रिकॉर्ड पर लाने में क्यों दिक्कत होनी चाहिए, फिर चाहे वह फाइल हो या कोई व्हाट्सएप ग्रुप हो। इस देश में सूचना का अधिकार इसीलिए लागू किया गया है कि लोगों को सरकार से जुड़ी हुई तमाम बातों को मालूम करने का हक होना चाहिए। सूचना का अधिकार एक किस्म से सरकार की जवाबदेही तय करता है और कुछ वैसा ही काम इस अफसर ने किया है। उसने अपने से सीनियर अफसर की कही हुई बातों को अफसरों के समूह में पोस्ट किया। 

सरकारी ढांचे के फौलादी मिजाज को जो लोग बहुत इज्जत करने के लायक मानते हैं, उन लोगों को तो यह बात अटपटी लगेगी कि अपने सीनियर की बातों को कोई रिकॉर्ड करें। लेकिन सरकार में यह एक आम बात भी रहती है कि जिस फाइल पर चर्चा करें लिखा जाता है उस पर चर्चा के बाद फाइल में यह बात दर्ज भी की जाती है कि चर्चा क्या हुई। उसी बात को दर्ज करना अटपटा लग सकता है, जो बात किसी भ्रष्टाचार की हो जो बात नियमों के खिलाफ हो, जो बात किसी का पक्ष लेने की हो, या जो बात किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह की हो। ऐसी बातों से परे अगर नियम-कायदे की बात दो अफसरों के बीच हो रही है तो उसे रिकॉर्ड करने में क्यों दिक्कत होनी चाहिए? खासकर तब, जब वह बात सरकारी कामकाज को लेकर हो रही है। टेलीफोन की बातचीत को तो बाद में शब्दश: लिखा नहीं जा सकता, इसलिए उसे रिकॉर्ड कर लेना एक बेहतर तरीका है। 

हम मध्यप्रदेश के इसी मामले को लेकर नहीं, इसके पहले भी कई बार इस मुद्दे पर लिख चुके हैं कि लोगों को सरकारी कामकाज के सिलसिले में जो भी बातचीत करनी है उसे रिकॉर्ड करना चाहिए, ताकि अगर उसमें कोई गैरकानूनी सुझाव दिया जा रहा है, या कोई भ्रष्ट सुझाव दिया जा रहा है, तो उसके खिलाफ लडऩे के लिए एक सामान रहे। यह हर किसी का न सिर्फ एक हक है, बल्कि हर किसी की एक जिम्मेदारी भी है। अगर कोई सरकारी अफसर किसी दूसरे अफसर से फोन पर किसी नाजायज काम के लिए बात करें तो यह उस दूसरे अफसर की कानूनी जिम्मेदारी भी रहती है कि उसके नाजायज हिस्से को वह सरकार या कानून के सामने रखे। नाजायज बातें सुनकर उन पर चुप रहना यह जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाले लोगों की जिम्मेदारियों के खिलाफ है। इसलिए हम पहले से यह बात लिखते आए थे कि सरकारी बातचीत टेलीफोन पर मिलने वाले सरकारी निर्देश, इन सबको रिकॉर्ड करके रखना चाहिए और इसमें कोई सरकारी नियम आड़े नहीं आते। 

सरकार ने अपने किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को बर्खास्त करने के लिए एक ब्रह्मास्त्र बनाकर अपने हाथ में रखा हुआ है और सरकारी सेवा नियमों में एक लाइन जोड़ी है कि उनका बर्ताव सरकारी कर्मचारी या अधिकारी जैसा ना होने पर उनकी सेवा समाप्त की जा सकती है। अनबिकमिंग ऑफ एन ऑफिसर, नाम की यह शर्त पूरी तरह से धुंधली है और यह बेजा इस्तेमाल करने के लिए ही बनाई गई है। हम अभी मध्यप्रदेश के इस मामले में सही या गलत पर नहीं जा रहे हैं, कौन भ्रष्ट है और कौन नहीं, उस पर हम कोई बात नहीं कह रहे हैं, लेकिन हम इतना जरूर कह रहे हैं कि सरकारी कामकाज में कोई निजी बात क्यों रहना चाहिए जिसे कि रिकॉर्ड ना किया जाए या जिसे सार्वजनिक रूप से कहा न जा सके? ऐसे 10-20 और अफसर अगर सामने आएंगे तो बड़े मंत्रियों और बड़े अफसरों का मातहत अधिकारियों और कर्मचारियों को गलत काम करने के लिए कहना भी बंद होने लगेगा। लोकतंत्र के हित में यही है कि इस तरीके को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि सब कुछ पारदर्शिता से हो सके। अगर सरकार को अदालत में जाना पड़ा, तो वहां उसकी शिकस्त होगी। 

    (Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 18 जून 2021


 

कोरोना के मोर्चे पर फिक्र की दो अलग-अलग बातें

 18  जून 2021

 आज जब देश के बाकी तमाम हिस्सों में कोरोना की मार कुछ हल्की होती दिख रही है, तब महाराष्ट्र में यह अंदेशा जताया जा रहा है कि तीन-चार हफ्तों में कोरोना की तीसरी लहर वहां शुरू हो सकती है। लेकिन इस बीच एक बड़ी फिक्र की बात यह सामने आई है कि अहमदाबाद से लेकर असम तक जिन नदियों में कोरोना की जांच हुई, उन सारी नदियों के पानी के तमाम सैंपल कोरोना पॉजिटिव निकले। गुजरात में साबरमती नदी में पिछले 1 बरस में आईआईटी गांधीनगर ने जितने सैंपल लिए सब पॉजिटिव मिले और यह सैंपल सैकड़ों की संख्या में लिए गए। इसी तरह असम की कई नदियों से सैंपल लिए गए और उसमें भी कोरोना पॉजिटिव रिजल्ट आए। अब तक यह माना जा रहा था कि जो नाले-नालियों का पानी है जिनमें अस्पतालों से और कोरोनावायरस मरीजों के घरों से निकला हुआ पानी, अस्पताल के कचरे के बहकर आने से, कोरोना वायरस मिल रहा है, वह अब ऐसी नदियों के पानी में भी मिल रहा है जहां पर गंदा पानी सीधे नदी में नहीं मिलता है, और उन्हें जल शोधन संयंत्र से साफ करके ही नदी में भेजा जाता है फिर भी वहां कोरोना वायरस पाया गया है।

आईआईटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पहले तक केवल गंदे पानी की नालियों में ही कोरोना वायरस के जिंदा रहने की बात मिली थी, लेकिन अब उन नदियों के पानी में भी यह मिल रहा है जहां पर लोग नहाते हैं या जहां से पानी लेकर उसे लोगों के पीने के लिए भेजा जाता है, तो यह एक नए खतरे की नौबत है। इस बात को लेकर विज्ञान थोड़ा सा हैरान भी है लेकिन यह खतरा हमें बहुत अजीब नहीं लग रहा है। यह वायरस जिस रफ्तार से अपनी शक्ल बदल रहा है, और अलग-अलग तरह से यह विज्ञान के लिए चुनौती खड़ी कर रहा है, उसमें इसके हवा से फैलने या पानी से फैलने का खतरा महज कुछ दूर ही था, वह खतरा पूरी तरह से नामौजूद नहीं था। अब जब दुनिया के देश, कोई कोरोना की तीसरी लहर के कगार पर है, कोई कोरोना की दूसरी लहर के कगार पर, तब पानी में ऐसा खतरा मिलना एक बहुत ही फिक्र की बात है। और फिर ये सैंपल एक-एक नदी से सैकड़ों की संख्या में लिए गए, और हर सैंपल में कोरोना वायरस मिला। इसका मतलब यह है कि यह किसी गलती से निकाला गया नतीजा नहीं है। ऐसे में पानी में कोरोना का होना आगे किस तरह खतरा बन सकता है यह भी सोचने की बात है, और उसके लिए सावधानी बरतने की बात भी है।

आज जो लोग कोरोना को गुजर चुका मान रहे हैं, और वैक्सीन से परहेज कर रहे हैं या लापरवाह हो रहे हैं उन्हें भी इन ताजा नतीजों को देखते हुए अपने तौर-तरीके बदलने चाहिए। इन वैज्ञानिक निष्कर्षों को देखते हुए भारत सरकार को देश भर के लिए इससे बचाव के तरीके निकालकर राज्यों के साथ बांटने चाहिए और देश के दूसरे वैज्ञानिक संस्थानों के लोगों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए कि ऐसे खतरे से कैसे बचा जा सकता है। यह मामला महज एक-दो नदियों का नहीं है गुजरात में तो कई झीलों का पानी भी लिया गया और उनमें भी हर सैंपल में कोरोना वायरस मिला है। इसलिए यह किसी एक नदी के प्रवाह से फैला हुआ नहीं है, और यह बात भी है कि यह पानी में इस तरह जिंदा रह रहा है कि वह कई हफ्तों तक लगातार लिए गए नमूनों में लगातार बने रहा। आईआईटी गुजरात ने 4 महीने तक लगातार हर हफ्ते कई नदियों और झीलों से सैंपल लिए, और उनमें से हर किसी में कोरोना पॉजिटिव मिला। इस देश की शायद आधी आबादी सीधे नदी-तालाब में निस्तारी से काम चलाती है, और अगर इनके पानी से कोरोना अगर इंसानों में आने लगेगा, या जानवरों में जाने लगेगा तो क्या होगा?

एक दूसरा खतरा 
कांग्रेस पार्टी के एक प्रवक्ता ने ट्विटर पर यह पोस्ट करके एक बवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कोरोना वैक्सीन में नवजात बछड़े के खून से निकला गया सीरम मिलाया गया है? वैज्ञानिकों ने इस पर खुलासा किया है कि वैक्सीन विकसित करते हुए किसी एक स्तर पर बछड़े के सीरम का इस्तेमाल होता है, लेकिन लोगों तक पहुँचने वाली वैक्सीन में ऐसा कुछ भी नहीं मिला है। भाजपा ने भी कांग्रेस प्रवक्ता की इस बात को गलत बताया है, और इसे लोगों को वैक्सीन से दूर करने की गैरजिम्मेदार हरकत करार दिया है। कांग्रेस प्रवक्ता की ऐसी पोस्ट हम एक बहुत ही गैर जिम्मेदारी का काम मानते हैं, क्योंकि डायबिटीज के मरीजों के लिए इंसुलिन की दवाई हो या कई किस्म के टीके हों, इनको विकसित करते हुए कई बार जानवरों के शरीर के कुछ पदार्थ इस्तेमाल किए जा सकते हैं। हिंदुस्तान में हिंदुओं के बीच गाय को लेकर जैसी भावनाएं हैं, या मुस्लिमों के बीच में सूअर को लेकर जिस तरह की हिकारत है, या सिखों के बीच जानवरों को काटने के तरीके को लेकर अपनी मान्यताएं हैं, इन सबको पूरा करने की बात अगर की जाएगी तो दुनिया में कोई चिकित्सा-वैज्ञानिक परीक्षण हो भी नहीं सकेंगे। आज जब पूरी दुनिया महामारी का एक खतरा झेल रही है, आज इस वक्त हिंदुस्तान में इतनी बड़ी संख्या में लोग मारे जा चुके हैं, और तीसरी लहर के खतरे का अंदेशा बना हुआ है, उस वक्त इस किस्म की जटिल-वैज्ञानिक बात पोस्ट करना और एक सनसनीखेज समाचार की शक्ल में किसी वैज्ञानिक बात को, सच या झूठ को तोड़-मरोड़ कर सामने रखना, एक जुर्म सरीखा काम है। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है क्योंकि अगर हिंदुओं के बीच इस बात की दहशत हो गई कि इसमें गाय के शरीर के खून या किसी और चीज को मिलाया गया है, तो बहुत से लोग वैक्सीन से परहेज करने लगेंगे। 

लोगों को याद होगा कि जब पोलियो वैक्सीन दी जाती थी तो हिंदुस्तान के कुछ प्रदेशों में कई मुस्लिम इलाकों के बीच इसे लेकर तरह-तरह की आशंकाएं थीं और लोग अपने बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स नहीं पिलाते थे। किसी वैक्सीन को विकसित करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया में अगर किसी स्तर पर किसी जानवर के शरीर का निकला हुआ कोई अंश इस्तेमाल भी होता है तो उसे इस तरह सार्वजनिक मंच पर लापरवाही और गैरजिम्मेदारी से चर्चा और खबर में लाना, उसकी सनसनी फैलाना, एक बहुत ही गैरजिम्मेदारी का जुर्म है। कांग्रेस पार्टी पता नहीं क्या सोच कर अपने प्रवक्ता से ऐसा कहला रही है। अब तक तो कांग्रेस पार्टी का कोई खंडन अपने प्रवक्ता की ट्वीट के खिलाफ आया नहीं है, और उसने देश भर की फजीहत के इस सामान को लेकर अपनी आलोचना का एक बड़ा मौका विरोधी पार्टियों को दिया है। आज देश में तमाम लोगों को ऐसी सनसनी फैलाने से बचना चाहिए और कांग्रेस की इस गैरजिम्मेदारी का बुरा नतीजा पूरे देश में देखना पड़ सकता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 जून 2021


 

नफरत का ऐसा सैलाब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए है बहुत बड़ा खतरा

 17 जून 2021

 हिंदुस्तान बड़ा ही दिलचस्प देश है। लोगों को बारहमासी नफरत से कभी आजादी ही नहीं मिलती, और आबादी का एक बड़ा हिस्सा यह आजादी चाहता भी नहीं है। रात-दिन बहुत से लोग इस फिक्र में दुबले हुए रहते हैं कि हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच कोई तनातनी खड़ी क्यों नहीं हो पाई। जहां पर हिंदू-मुस्लिम विवाद की गुंजाइश कम दिखती है वहां पर लोग हिंदू-ईसाई झगड़ा ढूंढ निकालते हैं, जहां वह भी नहीं दिखता है वहां पर सवर्ण और दलित का झगड़ा ढूंढ निकालते हैं, आदिवासियों से शहरी लोग अपना झगड़ा ढूंढ निकालते हैं। यह सिलसिला कभी खत्म ही नहीं होता, और अब तो सोशल मीडिया की मेहरबानी से नफरत को किसी आग की तरह सुलगाते रहना आसान हो गया है। ताजा बवाल खड़ा किया जा रहा है एक मुस्लिम से शादी करने वाली हिंदू अभिनेत्री करीना कपूर का बहिष्कार करने का। 

ऐसी खबर आई ही थी कि सीता नाम की एक फिल्म बन रही है और उसमें सीता का किरदार निभाने के लिए करीना कपूर को छाँटा जा रहा है तो उसे लेकर कई हिंदू संगठन, और हिंदू धर्म के बहुत से स्वघोषित ठेकेदार विरोध करके अपने अस्तित्व को साबित करने में लग गए हैं कि वे अभी भी जिंदा है, और सक्रिय हैं। उनका विरोध है कि एक मुस्लिम अभिनेत्री को सीता के किरदार के लिए क्यों छांटा गया है। कई दिनों से ट्विटर पर बाइक और करीना खान नाम का एक बहिष्कार चलाया जा रहा था जिस पर दसियों हजार लोगों ने अपनी नफरत जाहिर की थी। आज नागपुर की खबर है कि वहां पर बजरंग दल के लोगों ने जाकर कलेक्टर को एक ज्ञापन दिया है कि अगर यह फिल्म बनी तो इसका जमकर विरोध किया जाएगा और विरोध करने की वजह में उन्होंने कुछ तस्वीरें भी लगाई हैं जिनमें करीना कपूर बिकनी पहने हुए दिख रही हैं और एक फोटो में वे अजमेर की दरगाह की यात्रा भी कर रही हैं। इन बातों को लेकर एक मुस्लिम अभिनेत्री के सीता का किरदार करने का विरोध किया जा रहा है। 

भाजपा से जुड़े हुए जितने अभिनेता और अभिनेत्री रहे हैं उन्होंने किस-किस फिल्म में किस धर्म के लोगों का किरदार निभाया था इसकी एक लंबी लिस्ट बन सकती है। लव जिहाद नाम का एक शब्द उछालकर जिस तरह से समाज में नफरत और दहशत दोनों फैलाई जा रही थी, उस वक्त भी नफरतजीवी लोग यह देखने से इंकार कर रहे थे कि किस तरह भाजपा की सांसद अभिनेत्री हेमा मालिनी ने पहले से शादीशुदा एक अभिनेता धर्मेंद्र से दूसरी शादी करने के लिए धर्म बदला था। अब यह बात लव जिहाद के दायरे में आती है या नहीं यह कहना मुश्किल है क्योंकि नफरतजीवी लोगों ने लव जिहाद की कोई सरकारी परिभाषा अभी तक जारी नहीं की है। लेकिन सवाल यह है कि अगर हिंदुस्तान में नफरत इस हद तक इस्तेमाल की जानी है कि किसी धर्म के किरदार को उसी धर्म के कलाकार निभाएं, तो फिर यहां एक धर्मराज की जरूरत है, यहां लोकतंत्र की जरूरत ही क्यों हैं?

यह बात हिंदू धर्म के देश के सबसे संगठित संगठन भाजपा की तरफ से औपचारिक रूप से नहीं उठाई गई है, लेकिन पिछले हफ्ते-दो हफ्ते से सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही सबसे घटिया और सबसे हिंसक इस नफरत का कोई विरोध भी भाजपा की तरफ से नहीं किया गया है, और न ही केंद्र सरकार ने ऐसी हिंसक नफरत पर कोई कार्रवाई की है जिसमें एक मुस्लिम से शादी करने वाली जन्म से हिंदू अभिनेत्री के एक हिंदू किरदार करने के खिलाफ यह आंदोलन चलाया जा रहा है। ऐसी नफरत फैलाना अगर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है तो फिर क्या उत्तर प्रदेश और दिल्ली में की जाने वाली एक-एक अकेली ट्वीट को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मान लेना ठीक है? चूँकि बजरंग दल देश में सत्तारूढ़ भाजपा के सहयोगी संगठन आरएसएस के तहत आने वाले दर्जनों संगठनों में से एक माना जाता है, इसलिए भाजपा और आरएसएस को भी इस मुद्दे पर अपनी राय जाहिर करनी चाहिए कि वे फिल्मी किरदार निभाने वाले लोगों के लिए धार्मिक अनिवार्यता तय करना चाहते हैं क्या? अगर ऐसा नहीं है तो हिंदुस्तान में आज की जलती-सुलगती दिक्कतों और बुनियादी मुद्दों की तरफ से ध्यान भटकाने के लिए इस किस्म के शिगूफे राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा क्यों बनने दिए जा रहे हैं? क्या अब कोई मुस्लिम लेखक हिंदू किरदारों को लेकर कोई कहानी भी नहीं लिख सकेंगे? या क्या अब राही मासूम रजा को कब्र से निकालकर रामायण लिखने की सजा सुनाई जाएगी? देश के इस खतरनाक होते माहौल पर राजनीतिक दलों की, और उनसे भी अधिक सरकार की चुप्पी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक खतरा है। एक तरफ तो देशभर में अलग-अलग प्रदेशों में सत्तारूढ़ दल से असहमति रखने वाले लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा अध्यादेश के तहत जुर्म दर्ज करने का काम थानेदार भी कर ले रहे हैं, और दूसरी तरफ पूरे देश में नफरत और हिंसा के ऐसे संगठित अभियान को चलाने वाले लोगों की नीयत और उनके खतरे को केंद्र सरकार इस हद तक अनदेखा कर रही है। आज यह नफरत फैलाने वाले लोग, लव जिहाद नाम का शब्द उछालकर हिंसा करने वाले लोग, इस बात को पूरी तरह अनदेखा करते हैं कि किस-किस राजनीतिक दल के कौन-कौन से सांसद और मंत्री ऐसे ही लव जिहाद के तहत अपना परिवार बसाकर सुख से जीते हैं।

एक तरफ तो बड़े-बड़े नेता अपनी खुद की शादी के वक्त ऐसे किसी फतवे की फिक्र नहीं करते, देश के बड़े-बड़े कामयाब लोग और दौलतमंद लोग ऐसे फतवों और झंडे-डंडों से परे जब चाहे जिससे शादी करते हैं, और अपनी मर्जी से धर्म निभाते हैं या नहीं निभाते हैं। लेकिन आम लोगों को ऐसे नफरत की मार मारने के लिए ऐसे ही बजरंग दल जैसे संगठनों के लोग झंडे-झंडे लेकर निकलते हैं। इनको अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए और उसे साबित करने के लिए ऐसे शिगूफा तलाशकर रखने पड़ते हैं। लेकिन ऐसी हरकतें हिंदुस्तान की राष्ट्रीय एकता के खिलाफ हैं, और जो राजनीतिक दल, जो सरकार इसके खतरों को कम आंकती हैं, वह हमारे हिसाब से कम गुनहगार नहीं हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 जून 2021


 

कानूनों के बेजा इस्तेमाल की सरकारी हरकत अंग्रेज सरकार के वक्त से बहुत अलग नहीं है..

16 जून 2021

 हिंदुस्तान के अदालती फैसलों में भी कोरोना सी लहर आते रहती हैं। पिछले कुछ हफ्तों से अदालतें एक बार फिर उम्मीदें जगा रही हैं कि वे सरकार की हामी भरने वाली संस्था ना होकर जनता और संविधान की भी फिक्र करने वाली जिम्मेदार अदालतें हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने कल 3 छात्र-छात्राओं को आतंकी आरोपों के मामले में जमानत देते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि सरकार की नजर में विरोध के संवैधानिक अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच फर्क करने वाली लकीर कुछ धुंधली हो गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इन गिरफ्तार लोगों को जमानत देते हुए केंद्र सरकार के यूएपीए कानून की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें आतंकवाद और आतंक शब्द की परिभाषा कहीं पर नहीं दी गई है। 

अदालत ने कहा कि यूएपीए में आतंकवादी काम की परिभाषा अस्पष्ट है और आतंकवादी काम का इस्तेमाल किसी भी आपराधिक काम के लिए नहीं किया जा सकता, खासकर ऐसे कामों के लिए जिनकी परिभाषा पहले से अन्य कानूनों में तय है। अदालत ने सरकार को सावधानी बरतने की नसीहत देते हुए कहा कि ऐसा न करने पर इस बेहद घृणित अपराध की गंभीरता खत्म हो जाएगी। पिछले साल दिल्ली में पिंजरातोड़ नाम के एक सामाजिक आंदोलन के कार्यकर्ता और जेएनयू-जामिया के तीन छात्र-छात्राओं को दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगे की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया था और वे लंबे समय से जेल में चले आ रहे थे। अब अदालत ने इन्हें जमानत देते हुए जो बातें कही हैं, उनमें यह भी है की असहमति को दबाने के लिए सरकार के जहन में विरोध के संवैधानिक अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच का फर्क धुंधला हो गया है, और अगर इस रवैया को बढ़ावा मिलता है तो यह लोकतंत्र के लिए दुखद दिन होगा।

देश के मीडिया का एक हिस्सा, और देश के बहुत से सामाजिक विचारक, कई राजनीतिक दल लगातार नौजवान छात्र-छात्राओं के ऐसे गंभीर कानून के तहत गिरफ्तारी के खिलाफ बोलते और लिखते चले आ रहे थे। लेकिन केंद्र सरकार के मातहत दिल्ली पुलिस ने इस तरह की बहुत सी गिरफ्तारियां की और उनमें देश के सबसे कड़े एक कानून को लागू करके इनकी जमानत अब तक नहीं होने दी थी। जब किसी बेकसूर सामाजिक कार्यकर्ता पर आतंकवादी होने का आरोप लगाया जाता है या उस पर देशद्रोह या राजद्रोह के आरोप लगा दिए जाते हैं या फिर उन पर सांप्रदायिकता फैलाने की बात कही जाती है और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी जाती है, तो इसका असल मकसद देश में ऐसे बाकी जागरूक लोगों का हौसला पस्त करना होता है। कुछ गिने-चुने लोगों को ऐसे कड़े कानूनों के तहत गिरफ्तार करके जेल में लंबे समय तक रखकर, मुकदमों को आगे न बढ़ाकर सरकारें लोकतांत्रिक आंदोलनों को खत्म करती हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश और उसकी इस टिप्पणी को देखते हुए देश में बाकी जगहों पर भी इस किस्म की कार्रवाई के बारे में दोबारा सोचना चाहिए।

छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता, मजदूर अधिकारों के लिए अदालतों में लडऩे वाली एक प्रमुख वकील सुधा भारद्वाज को भी महाराष्ट्र में गिरफ्तार हुए हजार दिन हो रहे हैं और वे भी अब तक बिना जमानत जेल में हैं। लोकतंत्र में सामाजिक कार्यकर्ताओं को अदालती फैसलों के भी पहले इस तरह की सजा देना सरकार के हाथ में है। ऐसे मामलों का जब अदालती निपटारा होगा, तब जाकर यह पता लगेगा कि उनके खिलाफ चलाए गए मुकदमे में कुछ दम था या नहीं। और उसके बाद भी देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंचने में फिर बरसों लग जाते हैं। लेकिन इस बीच ऐसे आंदोलनकारियों की जिंदगी तबाह करना सरकार के हाथ में रहता है और यह काम देशभर में जगह-जगह चल रहा है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। 

देश में ऐसे अलोकतांत्रिक कानूनों को भी खत्म करना चाहिए जो अंग्रेजों ने हिंदुस्तानियों पर राज करने के लिए एक बदनीयत से बनाए थे, और जो एक गुलाम देश के लायक थे. हिंदुस्तान के आजाद होने के बाद पौन सदी गुजर रही है और अब तक हिंदुस्तानी कानून अगर अंग्रेजों का पखाना ढोकर चल रहा है तो उसमें फेरबदल की जरूरत है. लेकिन दिक्कत यह है कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने कई कानूनों को और अधिक कड़ा किया है जिससे लोकतांत्रिक आंदोलनों की, असहमति की गुंजाइश और कम हो गई है। इसके अलावा ऐसे कानूनों के तहत नाजायज कार्रवाई के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और अदालतों से इनका निपटारा होने तक एक पूरी पीढ़ी के हौसले खत्म करने का सरकारी मकसद तो पूरा हो ही जाता है। अब यह समझ में नहीं आता है कि सरकार की ऐसी कार्यवाही के खिलाफ अदालतों से कैसे जल्दी इंसाफ मिल सके और कैसे ऐसी मिसाल कायम हो सके जो बाद में दूसरे मामलों में भी इस्तेमाल हो?

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 जून 2021


 

खुले धोखे को अनदेखा करने वाला मीडिया, सरकार, सब बराबरी से जिम्मेदार लूट के

  15  जून 2021

 इन दिनों बड़े से बड़े अखबार या टीवी चैनल की वेबसाइटों को देखें, या कुछ ऐसी वेबसाइटों को देखें जो न अखबार की हैं न टीवी चैनलों की, और जो सिर्फ बहुत ही प्रमुख और कामयाब वेबसाइट हैं, तो उन पर कई किस्म के झांसे के इश्तहार दिखाई पड़ते हैं. बहुत से इश्तहार तो खबरों के बीच में इस तरह से दबे-छुपे रहते हैं जिस तरह किसी पेड़ के तने या पत्तों के बीच में कुछ जानवरों के छुपने की तस्वीरें कभी-कभी सामने आती हैं कि उन्हें पेड़ से अलग करके देखना ही नहीं हो पाता। ऐसे इश्तहार आमतौर पर धोखा देने वाले रहते हैं, और चूँकि वेबसाइटों को विज्ञापन से कमाई का लेना-देना रहता है इसलिए वे इस बात की परवाह भी नहीं करतीं कि उनकी खबरों के बीच, उनके दूसरे पोस्ट के बीच किस तरह के झांसे वाले इश्तहार दिखाई पड़ रहे हैं। जाहिर तौर पर बहुत से लोग इन्हें देख कर धोखा खाते भी होंगे। 

अभी ऐसा ही एक इश्तहार एक फिल्म कलाकार सुशांत सिंह राजपूत से जुड़ी हुई एक तस्वीर के नीचे आया जिसे रायपुर के ही एक कंप्यूटर से वेबसाइट पर जाकर देखा गया था और उसके नीचे इस इश्तहार में नोटों का ढेर उठाए हुए एक गरीब आदमी की तस्वीर है और यह लिखा हुआ है कि रायपुर के एक गरीब मजदूर ने किस तरह 1 करोड़ 16 लाख  रुपए अपने मोबाइल फोन से कमा लिए। अब इस तरह की अविश्वसनीय कमाई के बहुत से इश्तहार वेबसाइटों पर दिखते हैं, और अगर कंप्यूटर का इंटरनेट किसी तकनीकी वजह से अपने को इंदौर के इलाके में बताता है तो इस इश्तहार में रायपुर की जगह इंदौर आ जाता है। देश के अलग-अलग कोनों में जिस इलाके से आप इंटरनेट पर पहुंचेंगे, इसी इश्तहार में सिर्फ शहर का नाम बदल जाएगा और उस शहर का मजदूर एक करोड़ 16 लाख रुपए अपने मोबाइल फोन से कमाते हुए दिखने लगेगा। ऐसे दूसरे को इश्तहारों में एक बहुत ही आलीशान कोठी के सामने एक बहुत ही महंगी विदेशी कार में बैठा हुआ एक नौजवान, या एक युवती दिखते हैं और उसके साथ भी कुछ इसी किस्म का एक उकसाता हुआ विज्ञापन स्लोगन लिखा रहता है कि किस तरह उन्होंने 1 महीने में ही कमाई करके यह बंगला, गाड़ी सब कुछ खरीद लिया। आप जिस शहर से इंटरनेट पर पहुंचें, उसी शहर का नाम उसी इश्तहार में दिखने लगता है। 

अब सवाल ये उठता है कि भारत सरकार का इतना कड़ा सूचना तकनीक कानून है कि जिसके तहत मामूली चूक करने वाले और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करने वाले लोग भी आए दिन कानून के फंदे में फंसते रहते हैं। दूसरी तरफ जो ठग, धोखेबाज, और जालसाज लगातार इस तरह इंटरनेट पर लोगों को धोखा देते हैं, वह हमारे जैसे साधारण समझ वाले लोगों को भी मामूली आंखों से समझ में आने वाले धोखेबाज़ हैं,  लेकिन भारत सरकार के साइबर क्राइम पकडऩे वाले लोगों को यह नहीं दिखता, न ही राज्यों को यह दिखता है कि इसमें क्या जालसाजी है। यह कुछ उसी किस्म का है जिस तरह एक फाड़े गए साइलेंसर वाली बड़ी सी मोटरसाइकिल भारी शोरगुल करते हुए चौराहे पर से पुलिस के सामने से निकल जाती है, लेकिन पुलिस को उसकी आवाज सुनाई नहीं पड़ती। फिर चाहे बाकी तमाम लोगों को शोरगुल से दिक्कत क्यों ना हो। इसी तरह ये जालसाज विज्ञापन लोगों को इंटरनेट पर दिखते हैं, लोगों के व्हाट्सएप पर आते हैं, लेकिन सरकार इनमें से कोई जालसाजी नहीं रोक पाती। दूसरी बात यह भी है कि जिन वेबसाइटों पर धोखाधड़ी के ऐसे विज्ञापन रात-दिन आते हैं और उन पर टंगे रहते हैं, क्या उन वेबसाइटों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वे अपनी सामग्री के साथ, अपनी खबरों के साथ, इस तरह की धोखाधड़ी के विज्ञापनों का दिखना बंद करें या फिर धोखे में भागीदारी करके भी कमाई करने की चाह में सब उलझे हुए हैं? 

यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ते चल रहा है और हर दिन लाखों नए लोग इंटरनेट पर जुड़ते हैं जो कि भरोसेमंद वेबसाइटों के विज्ञापनों को भी भरोसेमंद मान लेते हैं, और कई विज्ञापन तो ऐसे दबे-छुपे अंदाज में रहते हैं कि वे पहली नजर में खबर ही लगते हैं। इसलिए इस धोखाधड़ी को बंद करने का काम होना चाहिए और सरकार को इस पर कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए। दूसरी तरफ हिंदुस्तान में एक एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल नाम की एक संस्था है और वह संस्था भी धोखा देने वाले विज्ञापनों या झूठे दावे करने वाले विज्ञापनों पर कार्यवाही करने का दावा करती है। इस संस्था को भी ऐसे विज्ञापन देने वाले से पूछना चाहिए कि वह रायपुर के उस मजदूर की जानकारी दें जिसे एक करोड़ 16 लाख रुपए की कमाई अपने मोबाइल फोन से हुई है। यह सिलसिला इसी तरह चलते रहने देना गलत है, और यह बहुत से लोगों की गैर जिम्मेदारी का नतीजा है यह मीडिया की भी गैर जिम्मेदारी है, केंद्र और राज्य सरकारों की भी गैर जिम्मेदारी है और एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया की गैर जिम्मेदारी तो है। 

(Dailly Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 जून 2021


 

राम मंदिर के नाम पर क्या इतना बड़ा घोटाला हुआ है?

   14  जून 2021

 अयोध्या में बन रहे राम मंदिर को लेकर एक बड़ा ही खराब विवाद आज सामने आया है जिसे आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने भी उठाया है और उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने भी। अगर इनके आरोप सही हैं और इनके पेश किए गए दस्तावेज कोई जालसाजी नहीं हैं, तो यह एक भयानक भ्रष्टाचार का मामला दिख रहा है और चूंकि यह राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट को लेकर है जो कि केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया एक ट्रस्ट है इसलिए यह देश की सर्वोच्च स्तर की जांच के लायक मामला है। 

पहली नजर में जो दस्तावेज इन दोनों नेताओं ने पेश किए हैं उनके मुताबिक, मंदिर से लगी हुई जमीनों को खरीदने के लिए मंदिर ट्रस्ट लोगों से बात कर रहा था। जिस जमीन को मंदिर खरीदना चाहता था उसका सरकारी रजिस्ट्री रेट करीब 5 करोड़ बताया जाता है। और इस जमीन को दो और लोगों ने उसके मालिक से 2 करोड रुपए में खरीदा। इसे खरीदने के 10 मिनट के भीतर राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट ने उस जमीन को इन नए मालिकों से 18 करोड़ रुपए में खरीदने का एग्रीमेंट किया, और 17 करोड़ रुपए आरटीजीएस से इन नए मालिकों के खाते में डाल दे दिए। 10 मिनट पहले की खरीद-बिक्री में जो दो गवाह थे, उनमें से एक मंदिर ट्रस्ट के सदस्य हैं और दूसरे व्यक्ति अयोध्या के मेयर हैं। और यही दोनों गवाह 10 मिनट बाद की उस जमीन की 18 करोड़ की बिक्री के मामले में भी गवाह हैं। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने इन दोनों रजिस्टर्ड दस्तावेजों को मीडिया के सामने पेश किया है जिनमें भुगतान की जानकारी भी है। मंदिर ट्रस्ट की तरफ से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने इन आरोपों पर कहा कि उन पर तो महात्मा गांधी की हत्या के आरोप भी लगते रहे हैं और वे उसकी परवाह नहीं करते।

अब इस खरीद-बिक्री में जो दो खरीददार हैं उनमें एक हिंदू है और एक मुस्लिम है। इसके दोनों गवाह डॉ. अनिल मिश्रा और ऋषिकेश उपाध्याय मंदिर ट्रस्ट के सदस्य और अयोध्या के महापौर हैं। जमीन को बेचने वाले मूल स्वामी बाबा हरिदास हैं और खरीदने वाले मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपक राय हैं। समाजवादी पार्टी के विधायक और आम आदमी पार्टी के सांसद के उठाए हुए सवाल और उनके पेश किए हुए दस्तावेज हैरान करते हैं कि 5 करोड रुपए रजिस्ट्री दाम की जमीन को दो करोड़ में कैसे खरीदा गया और फिर 10 मिनट में ही उसे साढ़े 18 करोड़ में कैसे बेच दिया गया और आनन-फानन ट्रस्ट के 17 करोड़ों रुपए इस नए खरीददार के खाते में चले भी गए। 

जमीन जायदाद के काम करने वाले लोगों को यह बात बड़ी आसानी से समझ आ जाएगी कि यह गोरखधंधा किस तरह किया गया है। अब सवाल यह उठता है यह ट्रस्ट तो केंद्र सरकार का बनाया गया है, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बनाया गया है जिसमें केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि सदस्य हैं। इस तरह से यह धार्मिक ट्रस्ट होने के बावजूद सरकार निर्मित ट्रस्ट है, और इस पर अगर जमीन खरीदी में इतनी बड़ी रकम का घपला करने का ऐसा आरोप लगा है तो केंद्र सरकार को बिना देर किए हुए इसकी जांच करवानी चाहिए क्योंकि यह देश के करोड़ों राम भक्तों और हिंदुओं की आस्था का भी मामला है। इस मंदिर ट्रस्ट में जिस तरह शायद 5000 करोड़ का दान और चंदा  इकट्ठा किया है उसके इस्तेमाल पर भी एक बड़ा सवाल इन आरोपों से लगता है। 

उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा के ही मुख्यमंत्री हैं इसलिए इस मामले की सीबीआई जांच में राज्य सरकार की असहमति की कोई बात नहीं हो सकती है। देश के इस सबसे बड़े मंदिर निर्माण ट्रस्ट को लेकर जितने गंभीर आरोप लगे हैं प्रधानमंत्री को इस मामले की सीबीआई जांच के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कहना चाहिए कि वे इसकी सिफारिश करें और इसकी तेजी से जांच करवाई जाए, ताकि दान देने वाले, और दान ना देने वाले आस्थावान, लोगों की भी आस्था को चोट ना पहुंचे। तब तक इस ट्रस्ट की ऐसी किसी खरीदी-बिक्री पर रोक भी लगना चाहिए। 

ऐसे ट्रस्ट आमतौर पर स्थानीय कलेक्टर के नियंत्रण में माने जाते हैं, जिसके भी नियंत्रण में यह हो उन्हें तुरंत ही इसके बैंक खातों पर एक रोक भी लगानी चाहिए ताकि ऐसी धोखाधड़ी की और कोई खरीदी ना हो सके। ट्रस्ट के प्रभारी सचिव चंपक राय का बयान बहुत ही  बुरी तरह अहंकार से भरा हुआ है और गैर जिम्मेदारी का है। यह मौका ऐसे अहंकार को दिखाने का नहीं है कि महात्मा गांधी की हत्या का आरोप भी उन पर लगा था। वे यह भी साफ नहीं कर रहे हैं कि वह किस पर आरोप लगने की बात कर रहे हैं, व्यक्तिगत रूप से उन पर गांधी की हत्या के आरोप की बात कर रहे हैं, या इस ट्रस्ट को लेकर बयान दे रहे हैं। 

ट्रस्ट के किसी जिम्मेदार पद पर बैठे हुए व्यक्ति को ऐसी गैरजिम्मेदारी की बात नहीं करनी चाहिए और खासकर धार्मिक आस्था से जुड़े हुए ट्रस्ट के सबसे बड़े ट्रस्टी अगर आरोपों पर सफाई देने के बजाय अपने आपको गांधी हत्या के आरोप झेल चुका साबित कर रहे हैं, तो यह ट्रस्ट के लिए भी बहुत ही शर्मिंदगी की बात है। जो दो लोग इन दोनों  खरीद-बिक्री में गवाह रहे हैं, उन्होंने मुंह खोलने से मना कर दिया है, इसलिए यह पूरा मामला भारी संदेह से भरा हुआ है, और जिन-जिन लोगों पर इस ट्रस्ट की जिम्मेदारी आती है उन्हें, और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार, और केंद्र सरकार को तुरंत एक बड़ी जांच की घोषणा करनी चाहिए जिसके बिना इस ट्रस्ट के पास आए हुए हजारों करोड़ों रुपए खतरे में भी हैं और लोगों का भरोसा भी टूट रहा है।

(Dailly Chhattisgarh)