मुल्क कितना ही ताकतवर क्यों न हो मेरे दोस्त, अमन के अलावा चारा नहीं
31 दिसंबर 2025
भारत में अभी कुछ हफ्ते पहले एक शहर में कुछ नाबालिग स्कूली छात्रों को पकड़ा गया जो कि पाकिस्तान स्थित इस्लामिक आतंकियों के प्रचार के झांसे में आ गए थे। टेलिफोन और तरह-तरह के दूसरे मैसेंजरों पर इनके संदेश पकड़ाए, तो देश की खुफिया एजेंसी ने इन पर निगरानी रखना शुरू किया, और सुबूत जुटते चले गए। यह किस प्रदेश के किस शहर में हुआ है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि हिंदुस्तान के कुछ मुस्लिम बच्चे ऐसे झांसे में आ गए, और वे इंटरनेट पर डार्क वेब पर हथियारों के बारे में भी पूछताछ करने लगे। जब जांच एजेंसियों ने इन बच्चों से पूछताछ की, तो पता लगा कि इन्हें स्कूल में दूसरे बच्चे इनके धर्म की वजह से चिढ़ाते रहते थे, परेशान करते थे, पाकिस्तानी और आतंकी कहते थे, इन सबकी वजह से इनके मन में बड़ा रंज था, और सोशल मीडिया के रास्ते ऐसे रंज पर नजर रखने वाले पाकिस्तानी एजेंटों ने इन तक पहुंच की, और इनका ब्रेनवॉश किया। खतरा यह भी था कि इन बच्चों के मन में रंज इतना था कि वे हथियार पाकर हिंसा करने की सोच रहे थे। अब देश के कानून के तहत किसी नाबालिग पर जो भी कार्रवाई हो सकती है, वह कार्रवाई जांच एजेंसियां करेंगी, लेकिन इस नौबत के बारे में भी सोचना चाहिए कि स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों के मन में दूसरे बच्चों को धर्म को लेकर इस तरह के हमले करना सूझता कहां से है, उनके मन में यह जहर आता कहां से है कि किसी धर्म के बच्चों को आतंकी कहकर पाकिस्तान जाने को कहा जाए।
अभी हफ्ते भर में ही हमने इस बात पर भी लिखा है कि स्कूली बच्चों को अखबार पढ़ाना यूपी में शुरू किया गया है, और कुछ दूसरे प्रदेश ऐसा करने का सोच रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि अखबारों में अगर बच्चों को भडक़ाने वाली ऐसी खबरें छपेंगी, और उन्हें स्कूलों में औपचारिक रूप से पढ़ाया जाएगा, या अखबार पढऩे को कहा जाएगा, तो उनके मन में दुनिया की जानकारी आएगी, या अपने देश के लिए जहर आएगा? इस खतरे के बारे में हम अपने इस कॉलम में, और अपने यू-ट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बार-बार लिखते-बोलते हैं कि अगर आहत आबादी का एक बहुत छोटा सा हिस्सा भी रंज में बदला लेने पर ऊतारू हो जाएगा, तो न तो ऐसे हर व्यक्ति की शिनाख्त हो सकेगी, न ही ऐसे हर व्यक्ति को समय रहते रोका जा सकेगा। पूरी दुनिया में जगह-जगह बिना किसी बड़े संगठन से जुड़े हुए अकेले हमलावर बहुत सा नुकसान कर देते हैं। अमरीका में तो हर बरस दर्जनों ऐसी गोलीबारी होती है जो एक अकेला निराश, हताश, या आक्रोशित व्यक्ति कोई ऑटोमेटिक बंदूक लेकर कर देता है, और एक-एक घटना में कई लोग मारे जाते हैं। अभी ऑस्ट्रेलिया में एक यहूदी त्यौहार के वक्त भारत से ऑस्ट्रेलिया जाकर बसे एक मुस्लिम आदमी ने अपने जवान बेटे के साथ मिलकर यहूदियों को मारने की नीयत से गोलीबारी की, और 15 लोगों को मार डाला। ऐसे लोगों को दुनिया में लोन-वुल्फ कहा जाता है, यानी एक अकेला भेडिय़ा जो कि मनमाने हमले कर देता है। (यह शब्दावली अंग्रेजी में इस्तेमाल होती है, हालांकि इसे गढऩे वाले लोगों को ऐसा एक भी भेडिय़ा नहीं मिलेगा जो इस किस्म का खून-खराबा करता होगा।) भारत में अभी जिन बच्चों को आतंकी प्रचार का शिकार पाया गया है, उन बच्चों के बारे में ऐसी गारंटी कौन ले सकते हैं कि वे ऐसे प्रचार के झांसे में नहीं आएंगे, और आगे कोई हिंसा नहीं करेंगे? आज तो पंजाब जैसे सरहदी राज्यों से हर हफ्ते खबरें आती हैं कि किस तरह पाकिस्तान से नशा, और हथियार लेकर ड्रोन आते हैं, उन्हें सुरक्षा एजेंसियां कभी पकड़ लेती हैं, गिरा लेती हैं, लेकिन हो सकता है कि ऐसे आने वाले हथियार इस देश के भीतर पाकिस्तान के कुछ एजेंट किसी तबके के बेचैन लोगों तक पहुंचाएं, और उन्हें आतंकी हमला करने के लिए उकसाएं। अभी कुछ हफ्ते पहले ही दिल्ली में लाल किले के इलाके में जो विस्फोट हुआ था, उससे जुड़े हुए तमाम तार कश्मीर और यूपी के कई मुस्लिम डॉक्टरों और दूसरे लोगों तक पहुंचे ही थे जिनकी गिरफ्तारियां हुई हैं, और वे आतंकी हमलों की तैयारी में थे। अब उनके पास बड़ी मात्रा में विस्फोटक पहुंचे थे, शायद दूसरे हथियार भी जब्त हुए थे। जहां तक हथियारों की बात है, तो भारत की हर तरफ की जमीनी सरहद उससे नाखुश देशों से ही घिरी हुई है। बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, और पाकिस्तान, किसी भी तरफ से, या हर तरफ से हथियार यहां आ सकते हैं। हथियारों का अपना कोई धर्म नहीं होता, उनकी अपनी कोई विचारधारा भी नहीं होती। और यह भी जरूरी नहीं है कि इन देशों की सरकारें ही वहां से ये हथियार भेजें, इन देशों के कारोबारी भी किसी आतंकी संगठन से भुगतान पाकर ऐसे हथियार तस्करी से भारत पहुंचा सकते हैं, शायद पहुंचा भी रहे हैं। मणिपुर जब जल रहा था, उस वक्त वहां के लोगों के हाथों में ढेरों गैर-कानूनी हथियार थे, जो कि जाहिर तौर पर सरहद पार से आए हुए लगते थे।
हम बार-बार इस बात को उठाते हैं कि लोगों को देश के माहौल को अच्छा रखना चाहिए, इसलिए भी कि खराब माहौल में पूरे देश की हिफाजत कर पाना किसी के बस का नहीं हो सकता। पूरी दुनिया में जो अमरीका सबसे अधिक सुरक्षित देश माना जाता है, उसकी ही कारोबारी राजधानी न्यूयॉर्क में उसकी प्रतिष्ठा की प्रतीक वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की जुड़वां इमारतों को ओसामा के आतंकी हवाई हमले ने पलभर में गिराकर मिट्टी में मिला दिया था, और हजारों लोगों को मार भी डाला था। अब अमरीका से अधिक मजबूत खुफियातंत्र दुनिया में कम ही देशों का होगा, अमरीका से अधिक सुरक्षा जांच और सुरक्षा इंतजाम भी कम ही देशों में होंगे। फिर भी वह अपने-आपको पूरी तरह से सुरक्षित नहीं कर पाया। ऐसे में आज दुनिया के हर देश को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके अपने भीतर के लोग इतने पीडि़त और प्रताडि़त न हों कि वे कुछ बाहरी आतंकी ताकतों के हाथों इस तरह हथियार बनकर अपने ही लोगों का नुकसान करने पर ऊतारू हो जाएं। दुनिया का इतिहास बताता है कि धर्म जैसी सोच, राजनीतिक विचारधारा, राष्ट्रवाद या रंगभेद जैसी बातों से परे दुनिया में बहुत से हमले पेशेवर कातिल और हमलावर भी करते हैं जो कि पैसों के लिए हर तरह का जुर्म करने के लिए तैयार रहते हैं, और जिनकी सेवाएं डार्क वेब पर ढूंढी जा सकती हैं। ऐसे लोग दुनिया के कई बहुत बड़े-बड़े अपराधों के पीछे जिम्मेदार रहे हैं, और इंटरनेशनल एजेंसियां इनकी तलाश भी करती रहती हैं। अब दुनिया के कई देश एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए भाड़े के ऐसे हत्यारे और हमलावर भेजकर भी आतंकी हमले करवा सकते हैं, और उस देश में तनाव फैलाने के लिए उसकी तोहमत किसी स्थानीय तबके पर लगवा सकते हैं।
आज दुनिया के बहुत से देशों के बीच कई तरह के खुले टकराव चलते हैं, और कई तरह के शीतयुद्ध भी चलते हैं। भारत के ऊपर भी कनाडा और अमरीका जैसे देशों में ऐसे आरोप लगे हैं कि भारत की सरकारी एजेंसियों से जुड़े लोगों ने इन दोनों देशों में खालिस्तानियों पर हमले करवाए। अमरीका की एक अदालत में तो ऐसा मुकदमा ही चल रहा है जिसमें भारत से जुड़ा एक आदमी भाड़े के एक हत्यारे के साथ मोल-भाव करके उसे सुपारी दे रहा है कि उसे किस पर हमला करना है। अमरीकी एजेंटों ने ऐसी पूरी कार्रवाई को रिकॉर्ड भी किया है, और यह वहां की अदालती खबरों में सामने आ भी चुकी है। अब दुनिया के कई दूसरे देश, कई आतंकी संगठन ऐसे भी हो सकते हैं जो कि भारत में इस तरह की हिंसा करवाने का किसी को ठेका दें, और उसके बाद उसकी तोहमत किसी स्थानीय व्यक्ति या संस्था पर लगाकर एक बड़ा सामाजिक तनाव खड़ा करके इस देश में बेचैनी और बदअमनी फैलाएं। आज दुनिया में सिर्फ सरकारें और आतंकी संगठन ऐसा नहीं कर रहे, कई जगहों पर तो कारोबारी भी किसी सरकार को बदनाम करने के लिए, किसी इलाके में हिंसा फैलाने के लिए इस तरह की हरकतें करते हैं। कहीं पर आतंकी और कारोबारी मिल जाते हैं, कहीं पर कारोबारी और सरकारें मिल जाते हैं, और कहीं-कहीं पर तो सरकारें भी दूसरे देशों की जमीन पर बड़े जुर्म करने के लिए आतंकियों को भी भाड़े पर ले लेती हैं। ऐसे में जौन एलिया का एक शेर याद आता है, अब नहीं कोई बात खतरे की, अब सभी को सभी से खतरा है।
इसलिए अमन ही अकेली हिफाजत हो सकती है।
एआई से बने बंदर, या पोर्नो से असली इंसानों के पेट पर पड़ रही लात
30 दिसंबर 2025
एआई के बारे में लिखते हुए थकने की नौबत ही नहीं आती। जब तक आज का यह संपादकीय लिखना पूरा होगा, तब तक दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में कई और चीजें इतनी जुड़ चुकी होंगी, कि आज की आखिरी लाईन लिखने के बाद कल के लिए पहली लाईन लिखना फिर शुरू किया जा सकता है। अब एक खबर यह आई है कि एआई से तरह-तरह के वीडियो बनाकर लोग सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं, और उन्हें बड़ी संख्या में दर्शक मिल रहे हैं। यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर दर्शकों की संख्या से ही कमाई जुड़ी रहती है, जितने अधिक दर्शक, उतनी ही अधिक कमाई, इसलिए इस प्लेटफॉर्म पर लोगों का अकेला मकसद अधिक से अधिक दर्शक पाना रहता है। इस काम में लोग पहले से वीडियो बनाते आए हैं, लेकिन अब एआई की मदद से घटिया वीडियो बनाकर इंसानों के बनाए हुए असली वीडियो से अधिक कमाई हो रही है। अभी अमरीका में किए गए एक शोध में यह पता लगा है कि भारत में ऐसा एक चैनल, बंदर अपना दोस्त, है जो भारत में सबसे अधिक देखा जा रहा है, और 240 करोड़ बार देखे गए इसके वीडियो की वजह से इसे 35 करोड़ तक कमाई का अंदाज है। कहने के लिए एआई की मदद से बनाए गए घटिया वीडियो को स्लॉप कहा जाता है, यानी कचरा या बेकार। लेकिन ऐसे वीडियो धड़ल्ले से चल रहे हैं, और सच तो यह है कि ये इंसानों के हक को भी खा रहे हैं।
एआई वीडियो शुरू होने के पहले एक वीडियो बनाने के लिए, लेखक, कैमरापर्सन, एंकर, एडिटर, कई लोग लगते थे, संगीत देने वाले लगते थे। अब एआई अकेला ही मुफ्त में ये सारे काम कर दे रहा है। और तो और कंटेंट भी एआई सुझा देता है, उस पर आपके कोई सुझाव हों, तो उन्हें तुरंत ही जोड़-घटाकर वह पलक झपकते नया कटेंट बना देता है। हम अपने इस अखबार में संपादकीय के लिए कभी विषय तलाशते हुए अलग-अलग एआई औजारों से कहते हैं कि कोई विचारोत्तेजक विषय एडिटोरियल, या वीडिटोरियल के लिए 25-25 शब्दों में सुझाएं, तो एआई आधे मिनट के भीतर ही ऐसे 25 विषय सुझा देता है, और कभी-कभी इनमें से कोई विषय काम का रहने पर उसके बारे में और विस्तार से पूछने पर भी वह जानकारी दे देता है। ऐसी जानकारी हम अपने संपादकीय पेज पर एक लेख की तरह चैटजीपीटी के हवाले से, उससे मिलते-जुलते एक काल्पनिक नाम, चित्रगुप्त नाम से प्रकाशित भी कर देते हैं। लेकिन हम तो बिल्कुल ही बचकानी पूछताछ करते हैं, असली पेशेवर लोग तो एआई का इस्तेमाल धोबी की गधे की तरह खूब सारा बोझ लादकर करते हैं, और वे उससे वीडियो, संगीत, सभी कुछ बनवा लेते हैं। अब जो होनहार या प्रतिभाशाली, मौलिक और रचनात्मक लोग अभी तक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालते थे, उनके पेट पर एआई की लात बड़ी जोर की पड़ी है। कहने के लिए तो इंटरनेट पर सभी के लिए बहुत सी जगह है, लेकिन दुनिया की आबादी तो सीमित है, और उनमें से जिन लोगों की पहुंच इंटरनेट तक है, उनकी जिंदगी इस काम के लिए घंटे भी सीमित हैं। अब उन घंटों को अगर एआई-सामग्री चुराने लगे, तो जिनका पेट और मुंह है, वे तो भूखे रह जाएंगे। यह सिलसिला अभी शुरू ही हुआ है, आगे यह कहां तक पहुंचेगा, इसका ठिकाना नहीं है। एआई से बनाए हुए बंदर के कुछ वीडियो हमने भी देखे हैं, उसमें बड़ी तीखी राजनीतिक बातों की वजह से लोग बंधे रह जाते हैं, और उन मुद्दों पर कुछ और देखने-सुनने की उनकी जरूरत बाद में कम रह जाती है।
अभी दो-चार दिन पहले ही एक किसी अंतरराष्ट्रीय समाचार-पॉडकास्ट पर एक रिपोर्ट थी कि किस तरह दुनिया में वयस्क मनोरंजन बनाने वाली पोर्न इंडस्ट्री एआई की मार झेल रही है। असली पोर्नो बनाने में वयस्क कलाकार लगते थे, उसकी शूटिंग में बहुत सारे लोग लगते थे, उसकी एडिटिंग में बहुत लोग लगते थे। अब एआई की मेहरबानी से लोग अपनी पसंद का पोर्नो छांट सकते हैं। वे अपनी चाहत को डाल सकते हैं कि उन्हें मर्द किस रंग या राष्ट्रीयता का चाहिए, लडक़ी किस रंग, राष्ट्रीयता, कद-काठी की चाहिए, वे इनके बीच किस तरह की सेक्स फिल्म देखना चाहते हैं। वे सेक्स को लेकर अपनी सारी हसरत को उगल सकते हैं, और एआई उसके मुताबिक पोर्नो पेश कर सकता है। यह सिलसिला पोर्नो के ग्राहकों की पसंद को इस हद तक पूरा करने वाला है कि असली सेक्स फिल्में उसका मुकाबला नहीं कर सकती। अभी असली, जिंदा सेक्स-कलाकारों वाले पोर्नो की ग्राहकी बची हुई है, तो वह इसलिए कि जिंदा लोगों के बीच सेक्स में जो स्वाभाविक और प्राकृतिक हलचल दिखती है, वह कई लोगों को अभी भी अधिक सुहाती है, लेकिन एआई से बने हुए, और असली कलाकारों वाले वीडियो के बीच में फर्क तेजी से घटते चले जाना है। आज जब डीपफेक नाम की तकनीक से किसी जिंदा व्यक्ति की फोटो से भी उसका पोर्नो बनाया जा सकता है, तो फिर एआई से बनने वाले पोर्नो का आसमान अंतरिक्ष तक बढ़ गया मान लिया जाना चाहिए।
दुनिया के अधिकतर लोगों की जरूरत बहुत अधिक मौलिक या रचनात्मक सामग्री की नहीं रहती। हम जिस तरह कुछ मुद्दों पर एआई से बात करके अपने पाठकों की जरूरत के लायक लेख तैयार करवा लेते हैं, वह किसी इंसान का लिखा हुआ मौलिक लेख नहीं रहता, लेकिन वह अधिकतर पाठकों की जरूरत पूरी करने वाला रहता है। कुछ ऐसा ही एआई से बनने वाले पोर्नो, या गैरपोर्नो वीडियो का भी है कि अधिकतर दर्शकों को मौलिकता से कोई अधिक लेना-देना नहीं रहता। ऐसे में एआई को एक रोबो की तरह इस्तेमाल करके रोबो-कैफे की तरह का कोई कारोबार चलाने वाले लोग घर बैठे, चुटकियां बजाते सामग्री बनाते जाएंगे, और कहीं नग्न देह वाले वीडियो, तो कहीं प्रवचनकर्ता बंदर वाले वीडियो बनाकर नोट छापते रहेंगे, और असली वीडियो बनाने वाले लोग धीरे-धीरे कमाई और अधिक हद तक खोते जाएंगे।
एआई कितनी तरह से लोगों को बेरोजगार करेगा, यह कई अलग-अलग दायरों से निकलकर आ रहा है, लेकिन वीडियो और सोशल मीडिया पर एआई को एक पालतू जानवर की तरह इस्तेमाल करने वाले लोग उससे इतने नोट कमा रहे हैं कि उसे ढोने के लिए उन्हें एक पालतू असली गधा लगेगा। आगे-आगे देखें, होता है क्या।
अगले सेल्फ-गोल करने की प्रैक्टिस में लगे दिग्विजय...
29 दिसंबर 2025
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के ठीक पहले दिग्विजय सिंह ने अपनी सालाना आदत के मुताबिक मधुमक्खी के छत्ते में जोरों से एक पत्थर मारा। उन्होंने एक पुरानी फोटो पोस्ट की जिसमें भाजपा के एक सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी गुजरात के किसी कार्यक्रम में कुर्सी पर बैठे हैं, और उनके ठीक सामने से नीचे बैठने वालों का सिलसिला शुरू हो रहा है जिसमें पहले ही नंबर पर, आडवाणीजी के पैरों के पास नरेंद्र मोदी बैठे हुए हैं। बाकी नेता भी पीछे दिख रहे हैं। दिग्विजय ने इस फोटो को पोस्ट करते हुए लिखा- यह चित्र बहुत ही प्रभावशाली है, किस प्रकार आरएसएस का जमीनी स्वयंसेवक व जनसंघ का कार्यकर्ता नेताओं के चरणों में फर्श पर बैठकर प्रदेश का मुख्यमंत्री, और देश का प्रधानमंत्री बना। यह संगठन की शक्ति है। जय सियाराम।
अब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के ठीक पहले दिग्विजय का यह फोटो पोस्ट करना जिन लोगों को बहुत मासूम हरकत लग रही होगी, उन्हें दिग्विजय की काबिलीयत का अंदाज नहीं है। इस पोस्ट से लेकर कार्यसमिति की बैठक निपट जाने तक यह सुगबुगाहट चलती रही कि क्या दिग्विजय कांग्रेस संगठन में बदलाव की तरफ इशारा कर रहे हैं? कांग्रेस पार्टी ने औपचारिक रूप से दिग्विजय के एक और बयान को सिरे से खारिज कर दिया, और कहा कि कांग्रेस और भाजपा में फर्क है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह भी गिना दिया कि कांग्रेस कभी धर्म की राजनीति नहीं करती। इसके बाद कांग्रेस के एक स्थायी असहमत, असंतुष्ट, और बागी माने जाने वाले सांसद शशि थरूर भी एक कार्यक्रम में दिग्विजय के साथ बैठे मिले। लोगों ने दो और दो चार जोड़कर यह अटकलें भी लगाईं कि क्या अब कांग्रेस के एक पुराने चुनाव चिन्ह की तरह यह बागी बैला-जोड़ी बन रही है? कांग्रेस के मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा ने दिग्विजय के बयान पर आरएसएस को नाथूराम गोडसे से जोड़ा और कहा कि जो संगठन गोडसे के नाम से जाना जाता है, वह गांधी की ओर से बनाए गए संगठन को क्या सिखा सकता है? कांग्रेस के एक और नेता मणिकम टैगोर ने दिग्विजय की पोस्ट को सेल्फ-गोल बताया, और कहा कि आरएसएस से सीखने की कोई जरूरत नहीं है, जो कि नफरत पर बना है, नफरत फैलाता है। उन्होंने कहा कि आप अलकायदा से क्या सीख सकते हैं? लेकिन कांग्रेस के एक और नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि दिग्विजय पूरी तरह पार्टी लीडरशिप के साथ हैं, और हम सभी आरएसएस की विचारधारा को खारिज करते हैं। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने पार्टी के औपचारिक रुख को बताते हुए कहा कि कांग्रेस को गोडसे के संगठन आरएसएस से कुछ सीखने की जरूरत नहीं है।
दिग्विजय सिंह और मणिशंकर अय्यर समय-समय पर अपने कई बयानों को पार्टी की तरफ से खारिज पाते रहे हैं। फिर भी वे मानो अपनी एक अलग सोच सामने रखने के लिए सालाना लीज नवीनीकरण करवाते रहते हैं। कांग्रेस का भी हक है कि अपने नेताओं को समय-समय पर झिड़की देते रहे, और उसने किसी नेता के बयान के गुण-दोष को देखे बिना भी उसे खारिज करने पर महारत हासिल कर रखी है, कई दूसरी पार्टियों की तरह। अब ऐसे में दिग्विजय की कही बात के तर्क को सुनने और समझने वाले कांग्रेस पार्टी में अगर कोई होंगे भी, तो भी उनके सामने चुप रहने की मजबूरी है। दूसरी कई बड़ी पार्टियों की तरह कांग्रेस में भी लीडरशिप के खिलाफ कुछ कहने का रिवाज रह नहीं गया है।
अभी चार दिन ही हुए हैं, कांग्रेस के भीतर से यह आवाज उठी थी कि प्रियंका गांधी को पार्टी की लीडरशिप देनी चाहिए। फिर मानो यह बात कांग्रेस के प्रथम-परिवार के भीतर दरार की अफवाहें पैदा करने के लिए काफी न हों, प्रियंका के विवादास्पद पति, रॉबर्ट वाड्रा ने सार्वजनिक रूप से कहा कि चारों तरफ से यही मांग है, और आज उनके खुद के भी राजनीति में आने की जरूरत है...
कुल मिलाकर प्रियंका के किसी चापलूस ने, और प्रियंका के पति ने मिलकर ऐसी किसी दरार की अफवाहों को पुख्ता कर दिया। अब राहुल गांधी अपनी अब तक की बड़ी अस्पष्ट लीडरशिप क्षमता के चलते हुए सवालों के घेरे में रहते आए हैं, लोकसभा में प्रियंका के एक दो धांसू भाषणों को देखते हुए उन्हें पार्टी का लीडर बनाने की अफवाहें जोर पकड़ रही हैं। मतलब यह कि पार्टी के औपचारिक अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पार्टी की सबसे वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी, पार्टी के चार दिन पहले तक भविष्य समझे जा रहे राहुल गांधी, और अब पार्टी की एक नई संभावना बताई जा रही प्रियंका गांधी के बीच लीडरशिप की धुंध और गहरा गई है।
दिग्विजय ने तो चाहे इशारे में, चाहे अपनी किसी अतृप्त हसरत के चलते, नीचे से उठकर लीडरशिप के टॉप तक पहुंचने की जो बात सार्वजनिक रूप से उठाई है, वह बात हमला तो गांधी परिवार पर ही करती है, फिर चाहे दिग्विजय की नीयत किसी और पर हमला करने की क्यों न हो। फिर हम तर्क की बात अगर करें, तो दिग्विजय की बात इसलिए बहुत खोखली है कि आज पार्टी के अध्यक्ष पद पर मल्लिकार्जुन खड़गे हैं जो कि जमीन से उठकर इस जगह तक पहुंचे हुए एक दलित नेता हैं। कांग्रेस के पास आज इससे बड़ा तो कोई पद देने के लिए है नहीं। ऐसे में नरेंद्र मोदी के नीचे बैठे हुए फोटो से दिग्विजय भला क्या साबित कर सकते हैं? सोनिया, राहुल, और प्रियंका के परिवार ने अगर मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी का अध्यक्ष बनाना बेहतर समझा है, तो इसके बाद किसी को यह शिकायत तो होनी नहीं चाहिए कि नीचे से ऊपर पहुंचने का मौका इस पार्टी में किसी को नहीं मिलता। जब तक राहुल अध्यक्ष थे, तब तक भी अगर दिग्विजय ने यह बात कही होती, तब भी कोई बात होती। आज तो यह बात पूरी तरह बेबुनियाद, गैरजरूरी, और नाजायज भी लगती है।
बीच-बीच में कांग्रेस में जब कभी अध्यक्ष बनाने की बात उठती थी, कभी अशोक गहलोत के नाम पर चर्चा होती थी, तो कभी किसी और नाम पर, तब भी हर बार आधा दर्जन नामों में दिग्विजय के नाम की भी चर्चा होती थी। और तकरीबन हर बार दिग्विजय के किसी सेल्फ गोल की वजह से, किसी बेमौके के बयान की वजह से उनका नाम चर्चा से हट जाता था। दिग्विजय को व्यक्तिगत रूप से जानने वाले लोग यह मानते हैं कि कांग्रेस में आज आरएसएस और भाजपा से सीधी टक्कर की लड़ाई लेने वाले ऐसे और बहुत नेता नहीं हैं, जैसे दिग्विजय हैं। दूसरी बात यह कि अर्जुन सिंह जैसे संक्रमणकाल के वक्त भी दिग्विजय ने कभी कांग्रेस नहीं छोड़ी। फिर मध्यप्रदेश खोने के बाद दिग्विजय दस बरस के स्वघोषित संन्यास पर भी चले गए थे। इन सबके चलते हुए उनके अपने ही बयान समय-समय पर उन्हें सीढ़ी से नीचे गिरा देते हैं, वरना दूसरे कई पार्टी अध्यक्षों के मुकाबले दिग्विजय अधिक असरदार और बेहतर अध्यक्ष साबित हुए रहते।
एक बड़ी पार्टी में रहते हुए या तो किसी को बगावत ही करनी हो, तब तो बागी तेवरों के बयान सुहाते हैं। लेकिन अपने ही बयानों का पार्टी की तरफ से हर साल-छह महीने में औपचारिक खंडन करवाकर कोई भी नेता महज यही साबित कर सकते हैं कि पार्टी की रीति-नीति, और उसकी वर्तमान सोच का उन्हें ठीक से अंदाज नहीं है। ऐसा साबित करना पार्टी के भीतर, और पार्टी के बाहर किसी भी नेता के वजन को कम ही करता है। दिग्विजय सिंह पता नहीं क्यों इस आदत से ऊबर नहीं पाते हैं। एक बड़े संगठन में सही कुछ नहीं होता, जो पार्टी को माकूल बैठता है, वही सही होता है। फिर दिग्विजय की इस फोटो वाली पोस्ट पर एक दूसरी हैरानी भी होती है कि जिस संगठन, आरएसएस से वे रात-दिन जूझते हैं, जिस भाजपा से वे अपनी बाकी जिंदगी भी विरोधी ही बने रहेंगे, उन संगठनों की तारीफ किसी भी संदर्भ में करना, किसी भी असहमत पार्टी के लिए असहनीय बात ही होने वाली थी। अगर संगठन की कोई मिसाल देनी ही थी, तो दिग्विजय को कोई ऐसा संगठन छांटना था जो कि कांग्रेस को बर्दाश्त भी हो सकता। आरएसएस और भाजपा को लेकर तो कांग्रेस ने पलभर में गांधी और गोडसे से रिश्ता जोड़कर दिग्विजय को पूरी तरह खारिज कर दिया। अब जाने और कितना वक्त उन्हें इस सबसे ताजा नुकसान से उबरने में लगेगा। जब तक इस तस्वीर से उपजे जख्म भरेंगे, हमारा अंदाज है कि दिग्विजय फिर कोई और सेल्फ-गोल करने की प्रैक्टिस कर चुके रहेंगे।
भूपेश बघेल, बागेश्वर, और बीजेपी, सब बी से ही क्यों शुरू होते हैं ?
28 दिसंबर 2025
छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में अतिचर्चित और घोर विवादास्पद चमत्कारी कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ऊर्फ बागेश्वर सरकार को लेकर पिछले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के भूपेश बघेल ने एक मोर्चा खोला है। आमतौर पर भारतीय राजनीति के लोग धर्म के चोले में रहने वाले किसी भी किस्म के इंसान से पंगा नहीं लेते हैं क्योंकि ऐसे लोगों के प्रभाव में उनके धर्म या संप्रदाय के काफी वोटर होने की आशंका नेताओं को रहती है, और किसी धर्मगुरू, कथावाचक, या चमत्कारी चोले से टक्कर लेना चुनावी राजनीति वाले नेता के लिए एक खतरा माना जाता है। फिर भी भूपेश बघेल ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर एक असाधारण हल्ला बोला है, और उसे इस राज्य की कांग्रेस-भाजपा की राजनीति से भी जोड़ दिया है। भूपेश का कहना है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री धार्मिक आयोजनों की आड़ में पैसा बटोरने छत्तीसगढ़ आते हैं, और वे भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। भूपेश के इस बयान पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने जवाबी हमला बोला है। सीएम ने कहा है कि उन्हें राजनीतिक दल का एजेंट कहना न केवल एक संत का अपमान है, बल्कि सनातन धर्म की परंपरा पर भी प्रहार है।
भूपेश बघेल का बाकी बयान भी गौर करने लायक है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पैदा भी नहीं हुए थे तब से मैं हनुमान चालीसा पढ़ रहा हूं, वह कल का बच्चा है, मेरे बेटे से भी उम्र में दस साल छोटा है, और वह हमें सनातन धर्म सिखाने चला है। उन्होंने कहा कि अगर दिव्य दरबार में लोग ठीक हो रहे हैं, तो फिर मेडिकल कॉलेज खोलने की जरूरत क्यों पड़ रही है? उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती कबीर साहेब और गुरू घासीदास की आध्यात्मिक परंपरा की है, यहां किसी बाहरी व्यक्ति से सीखने की जरूरत नहीं है। भूपेश ने यह भी कहा है कि कथावाचक यहां आकर अंधविश्वास फैलाते हैं।
अब पता नहीं बेलपत्री में शहद लगाकर शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद परीक्षा पास करने के लिए पढ़ाई की जरूरत न रहने की बात को भूपेश कैसे अंधविश्वास कह रहे हैं? जिस प्रवचनकर्ता की बात पर लाखों लोगों को भरोसा है, उसके दावे को देखते हुए स्कूल-कॉलेज की जरूरत भी क्यों होनी चाहिए?
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री नाम का यह नौजवान अपनी जुबान की वजह से खबरों में बने रहता है, और खासकर इलेक्ट्रॉनिक समाचार चैनलों की लार टपकती रहती है कि इस बाबा के मुंह से क्या निकले, उसमें कौन से गिने-चुने सनसनीखेज, आपत्तिजनक, अपमानजनक, भडक़ाऊ, विवादास्पद, और ओछे शब्दों वाले हिस्से को काटकर बार-बार, बार-बार दिखाया जाए। शायद टीवी चैनलों की ऐसी लार ही रहती है जिस पर फिसलना बड़बोले लोगों को अच्छा लगता है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जिस तरह की भाषा में धर्म के बारे में कहते हैं, उससे तो देश के शंकराचार्य भी हक्का-बक्का हैं, यह एक अलग बात है कि अब शंकराचार्यों के नाम पर भीड़ उतनी नहीं जुटती है क्योंकि वे उतनी छिछोरी जुबान में नहीं बोल पाते। अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के भिलाई में अपने प्रवचन या कथावाचन, जो भी कहें, उसके बीच धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने पत्रकारों के बारे में जिस गंदी जुबान में कहा, वह भी गौर करने लायक है कि धर्म के नाम पर चल रहे कार्यक्रम में जैसी भाषा, जैसी चुनौती, चेतावनी, और धमकी वे देते हैं, क्या वह किसी भी धर्म के गौरव को बढ़ाने वाली भाषा है? जिन लोगों को लगता है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री हिंदुओं को जोडऩे का काम कर रहे हैं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि क्या वे भारतीय समाज को तोडक़र हिंदुओं को उसके एक टुकड़े के रूप में एक टापू में जोडऩे की कोशिश नहीं कर रहे हैं? भारत का सांस्कृतिक इतिहास सभी धर्मों के ताने-बाने का रहा है, आज उसमें से हिंदुओं को अलग कर लेने, या दूसरे धर्म के लोगों को निकाल देने से, महज ताने-ताने, या महज बाने-बाने बच जाएंगे, देश नाम का यह कपड़ा नहीं रह जाएगा।
हम भूपेश बघेल के उठाए किसी मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहे, वे सक्रिय राजनीति में हैं, और अपने बयान पर आए हुए जवाबों का जवाब देने के लिए जरूरत से अधिक ही सक्रिय रहते हैं। लेकिन मैं धर्म और राजनीति के घालमेल के बारे में जरूर बोलना चाहूंगा, और यह बात किसी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तक सीमित नहीं है, जब यह नौजवान पैदा भी नहीं हुआ था, उसकी सौ-पचास पीढिय़ां पहले के उसके पुरखे रहे होंगे, तब भी इस दुनिया में धर्म और राजनीति की पार्टनरशिप फर्म कामयाबी से काम कर रही थी। उसे रजिस्टर इसीलिए करवाया गया था कि ये दोनों एक-दूसरे को पाल-पोस सकें। धर्म की जनता को झांसा देने की अपार क्षमता राजाओं के भी पहले कबीलों के सरदारों को भी सुहाती रही है। जब कुछ सौ या हजार लोगों के कबीले रहते थे, तब भी वहां का सरदार मंतर पढऩे वाला कोई ओझा, बैगा, गुनिया रखता था, जो लोगों को बरगलाते रहता था कि राजा का साथ किसलिए देना चाहिए। बाद के बरसों में जब औपचारिक राजपाठ कायम हुआ, तब राजा ने औपचारिक धर्म की स्थापना की, उसका विस्तार किया, उसे स्थापित किया।
मुझे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पर अधिक लिखने की जरूरत नहीं है, ऐसे कई बुलबुले इस महान देश के इतिहास में हवा में उठे और वक्त के साथ फूट गए। फूटने के पहले तक वे किसी बड़े से बुलबुले की तरह चमकदार रंगों वाले भी रहे, और लोग उन्हें मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब अविभाजित मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग होने का दौर था, और भोपाल से उस वक्त के छत्तीसगढ़ के सबसे ताकतवर मंत्री सत्यनारायण शर्मा एक रावतपुरा सरकार नाम के प्राणी को ले आए थे, उसका यहां पर आश्रम स्थापित कर दिया था, और रातों-रात हजारों कांग्रेसी इस सरकार के अंदाज में ही सिर पर पगड़ीनुमा गमछा बांधने लगे थे। उस वक्त कांग्रेस के लोगों को लगता था कि राज्य बनेगा तो सत्यनारायण शर्मा शायद मुख्यमंत्री बनेंगे। और भावी मुख्यमंत्री जिसे गुरू मानें, उसे राजनीति के लोग अपना महागुरू मान लेते हैं। ऐसे में रावतपुरा सरकार नाम से प्रचलित रविशंकर महाराज का गौरवगान छत्तीसगढ़ में इतना चला कि रायपुर में उनके कार्यक्रम के लिए एक बड़े आईपीएस अफसर ने पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के सैकड़ों प्रशिक्षु सिपाहियों की ड्यूटी इस कार्यक्रम में लगा दी थी। अभी तो इस नौजवान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आगमन पर पुलिस के उस इलाके के टीआई ने जूते उतारकर, टोपी उतारकर बागेश्वर महाराज की चरणरज पाकर अपना जीवन धन्य किया था, लेकिन इसे मुद्दा बनाने वाले लोगों को अभी महज 25 बरस पहले इसी राज्य में रावतपुरा सरकार का डंका-मंका भूल गया है। आज रावतपुरा सरकार की हालत यह है कि अपने मेडिकल कॉलेज के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन को रिश्वत देते हुए वे टेलीफोन कॉल और संदेशों में कैद हैं, और सीबीआई ने अदालत में जो चार्जशीट पेश की है, उसमें उनका नाम भी सजा हुआ है। अब पता नहीं अदालत में उनकी पेशी पर उनके लिए मंच बनाकर सिंहासन लगाया जाएगा, या कटघरे में उनकी पूजा होगी।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि रावतपुरा सरकार पूरी तरह से कांग्रेसी थे, और इसलिए मोदी की सीबीआई ने उन्हें धांस दिया है। अब मोदी की सीबीआई हो या ट्रंप का सीआईए, कोई एजेंसी भला किसी को रिश्वत देने पर मजबूर कर सकती है? और अगर रावतपुरा सरकार के ऐसे ही चमत्कार थे, तो फिर लोगों को रिश्वत देने की नौबत क्यों आई?
धर्म और राजनीति के घालमेल का एक और किस्सा मुझे याद है जिसका जिक्र मैं कभी-कभी, मतलब है कि हर कुछ महीने में कर देता हूं। धर्म से मेरा खास लगाव है, धर्म के पूरे किरदार को मैं अच्छी तरह समझता हूं, और इसलिए पाखंडी धर्म-प्रचार के मुकाबले जनता को आगाह करना अपनी जिम्मेदारी भी समझता हूं। अविभाजित मध्यप्रदेश की बड़ी पुरानी बात है। एक मठ के महंत ने अपनी अत्यंत ‘करीबी’ एक महिला के नौजवान बेटे को पीट देने वाले लोगों को खुद खड़े रहकर अपने लठैतों से मरवाया था। जब इस हत्या की बात उस वक्त के मुख्यमंत्री तक पहुंची, तो वे परेशान हुए कि उनके राज में एक मठाधीश को फांसी की नौबत आ गई, तो वह बड़ी शर्मनाक नौबत होगी। उन्होंने इस मठाधीश से कॉलेजों के लिए सैकड़ों एकड़ जमीनें दान करवाईं, और केस को रफा-दफा करवाया। उस सर्वोच्च वर्ण के मुख्यमंत्री का यह अपने किस्म का न्याय था कि इतना दान करवा देने से कत्ल की सजा देना हो गया। तो राजनीति, राजा, सत्ता, और धर्म का कुछ ऐसा ही घालमेल पूरी दुनिया के इतिहास में घुला-मिला है, भारत कोई अकेली मिसाल नहीं है।
दुनिया के इतिहास में जो बातें दर्ज हैं, और ये बातें मैं अपने शब्दों में नहीं लिख रहा हूं, इतिहास देखकर लिख रहा हूं, जब समाज कबीलाई था तब सरदार की शक्ति महज बाहुबल से नहीं चलती थी, उसे एक सर्टिफिकेट की कमी लगती थी कि वह सही है, ईश्वर का चुना हुआ है, प्रकृति की विशेष ताकत उसके साथ है। यहीं से ओझा, बैगा, या पुजारी जैसे लोग खड़े किए गए, जिनका काम था एक तथाकथित और काल्पनिक ईश्वर से अपने रिश्तों का झांसा देना, और कबीले के सरदार के फैसलों को ईश्वर का फरमान बताना। इतिहास लिखता है कि आस्था सत्ता का औजार बनी। धीरे-धीरे धर्म सत्ता का भागीदार होते गया, वह सरदार को जनता की नाराजगी के मुकाबले एक हिफाजत देता था, धर्म का डर, पाप की धारणा, और पुण्य से होने वाले फायदों का झांसा देता था, और इसके बदले राजा उसे राज्याश्रय देता था। ये दोनों जनता के शोषण के बुलडोजर के दो पहिए बन गए थे।
कुछ लोगों को लग सकता है कि यह बात कार्ल मार्क्स की लिखी हुई है, लेकिन मार्क्स जब पैदा भी नहीं हुआ था, तब भी बहुत से इतिहासकारों ने दुनिया में धर्म और राज्यसत्ता के गठजोड़ को दर्ज किया था। पुरोहित की मेहरबानी से राजा ईश्वर का प्रतिनिधि साबित कर दिया गया था। चीन में राजा के बारे में कहा जाता था कि वे स्वर्ग के आदेश से बने हैं, योरप में इसे ईश्वरीय अधिकार कहा जाता था, भारत में राजधर्म कहा जाता था, और लोकतंत्र के आने के पहले तक सारे के सारे तंत्र इसी गठजोड़ के थे।
शोषण को झेलना जनता की जिम्मेदारी मान ली गई थी, इसे उसके पिछले जन्मों के पाप से जोड़ दिया गया था, और असंतोष या विद्रोह को ऐसा पाप करार दे दिया गया था जिसका भुगतान अगले सात जनम तक करना पड़ेगा। धर्म ने, और यह बात सनातन या हिंदू धर्म की नहीं है, दुनिया के तकरीबन तमाम धर्मों में यही धारणा बढ़ाई गई कि इस जन्म में बगावत की बात सोचना भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी भुगतना पड़ेगा। धर्म लोगों को यह धैर्य सिखाता है कि आज उनकी जिंदगी में जितनी दिक्कतें हैं, उनका राजा से कोई लेना-देना नहीं है, यह सब उनके पिछले जन्मों के कुकर्मों का नतीजा है।अधिकतर धर्मों की प्रार्थनाओं और उनके ग्रंथों के लिखे हुए को देखें तो वे लोगों को हर तकलीफ के लिए ईश्वर की मर्जी का तर्क देने वाले हैं, उनके भाग्य में ही ऐसा लिखा हुआ था, यह समझाने वाले हैं, और पिछले जन्मों का फल गिनाने वाले धर्म तो मानो फलों का कोल्ड स्टोरेज ही हैं। हर तकलीफ के वक्त वे एक पेटी सेब निकालकर लोगों को दे देते हैं कि ये उनके पिछले जन्मों का फल है कि वे आज तकलीफ पा रहे हैं।
भारत जैसे लोकतंत्र में धर्म का इस्तेमाल अलग-अलग पार्टियां कम या अधिक दूर तक कर सकती हैं। पंजाब में अकाली दल तो पूरी तरह से धर्म आधारित पार्टी है, और अपने फैसलों के लिए वह सिख धर्म के सबसे बड़े धार्मिक संगठन के प्रति सीधी जवाबदेह भी रहती है, और उसकी सुनाई गई सजा को भी भुगतने के लिए तैयार रहती है। भारत में हजारों बरस से राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने की जो परंपरा चली आ रही थी, उसे बौद्ध धर्म ने बड़ी और कड़ी चुनौती दी थी, उसने न पुनर्जन्म माना, न भाग्य माना, और न राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना। वक्त के साथ बौद्ध धर्म की धार भोथरी होती चली गई, और जनता के जागरण में वह अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाया।
धर्म का जनकल्याणकारी रुख कितना हो सकता है, और कितना नहीं, यह देखना हो तो मुगल और अंग्रेज काल देखना होगा कि किस धर्म ने उस वक्त के शासकों के सामने दंडवत समर्पण किया, और किन धर्मों ने जनता के जागरण का काम किया। उस लंबे इतिहास में जाना आज मेरा मकसद नहीं है, और जिनकी दिलचस्पी अपने देश, धर्म, और राजतंत्र को जिम्मेदारी से जानने की हो, वे अलग-अलग जगहों से इस ताजा इतिहास को तलाश सकते हैं।
फिलहाल तो हालत यह है कि कांग्रेस का ताजा इतिहास भी धर्म से आजाद नहीं रहा। उसके अलग-अलग नेताओं ने अलग-अलग समय पर धर्म का इस्तेमाल किया, और खुद भी धर्म के काम आए। नेहरू के वक्त तक तो कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष बनी रही, लेकिन इंदिरा गांधी के राज में धर्मगुरुओं, ज्योतिषियों, गले में रूद्राक्ष, सिर पर देवरहा बाबा का पैर, ये तमाम तस्वीरें लोगों की याद में ताजा हैं। जिस तरह रूस के जार-राजाओं के पुरोहित हुआ करते थे, उसी मिसाल का इस्तेमाल इंदिरा गांधी के करीबी, तथाकथित योगगुरू धीरेंद्र ब्रह्मचारी के लिए किया जाता था। सफेद कपड़े के दाढ़ी वाले इस गुरू का बोलबाला इंदिरा की सत्ता में इतना था कि वह तरह-तरह के बड़े-बड़े सरकारी फायदे पाता था।
इंदिरा के बाद राजीव गांधी ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो वाला फैसला पलटा था, जिस तरह अयोध्या में राम मंदिर के ताले खुलवाए थे, वह सबकुछ देखने लायक था, और इतिहास में बहुत अच्छी तरह दर्ज है। नरसिंह राव के कार्यकाल का हाल यह था कि दिल्ली के एम्स के कार्डियो थोरेसिक सेंटर के डायरेक्टर डॉ. वेणुगोपाल हफ्ते में तीन दिन पुट्टपर्थी जाकर वहां सत्यसाईं बाबा के अस्पताल में दिल के मरीजों का ऑपरेशन करते थे, और यह इंतजाम प्रधानमंत्री के आदेश से किया गया था। कांग्रेस के तकरीबन सारे ही मंत्री-मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री अपने-अपने धर्म के चरणों पर आए दिन दिखते ही थे। अकेले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ऐसे थे जो कि वोटरों और चुनाव पर अधिक निर्भर नहीं करते थे, और उन्होंने धर्म को, अपने सिख धर्म को निजी आस्था तक सीमित रखा, और कभी उसकी सार्वजनिक नुमाइश नहीं की।
हाल के बरसों में तो लोगों ने देखा हुआ है कि बापू कहलाने वाले बलात्कारी आसाराम के चरणों पर किस-किस पार्टी के कौन-कौन से नेता नहीं पड़े रहते थे। मोदी और आडवाणी के साथ-साथ दिग्विजय सिंह की भी अनगिनत तस्वीरें आसाराम के चरणों पर चारों तरफ फैली हुई हैं, जिन्हें देखना हो इंटरनेट सर्च पर बस नाम ही काफी है।
अभी छत्तीसगढ़ में जो विवाद चल रहा है, उसमें बागेश्वर सरकार जैसा करिश्मा दिखाने वाला बड़बोला कथाकार भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ अनगिनत बातें बोलता दिखता है, और वह यह स्थापित करने में लगा हुआ है कि भारत संवैधानिक रूप से भी एक हिंदू राष्ट्र है। वह अपने तथाकथित प्रवचनों में जिस अंदाज में पत्रकारों को और दूसरे लोगों को धमकियां देता है, बात-बात में लोगों की ठठरी बंधवा देने (अर्थी पर बंधवा देने) की बात कहता है, वह हिंसक अहंकार सुनना भी उन लोगों को तो भारी पड़ता है जिनके मन में इंसानियत की कुछ बुनियादी खूबियां अभी भी बाकी हैं। ऐसे बाबाओं के आयोजन करवाने वाले किस तरह के भू-माफिया रहते हैं, यह उनके अखबारी इश्तहारों और सडक़ों पर लगने वाले होर्डिंग्स से आसानी से समझ में आ जाता है। इसके साथ ही उनका जमीनों का अवैध कारोबार करोड़ों से अरबों का हो जाता है, और उसका एक टुकड़ा वे ऐसे आयोजनों के लिए डाल देते हैं।
भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में संविधानेत्तर ताकतों का ऐसा बोलबाला चलते ही रहता है। कई पार्टियां इन्हें विधानसभाओं, लोकसभा और राज्यसभा में भी भेज देती हैं, तरह-तरह का राजकीय दर्जा दे देती हैं। भारत में 75 बरसों के तथाकथित लोकतंत्र के इस छोटे से दौर को छोड़ दें, तो राजा और धर्म का ऐसा रिश्ता तो हमेशा से रहते आया है, पिछली पौन सदी में यह कई जगह खुलकर सामने आया, कुछ जगहों पर पर्दे के पीछे से चला। खुद कांग्रेस पार्टी को समय-समय पर कोई शंकराचार्य बहुत सुहाते रहे, और राजनीतिक चेतना की बातें कहने पर कई शंकराचार्य सत्ता की आंखों की किरकिरी भी रहे। छोट-मोटे प्रवचनकर्ता और कथाकार, चमत्कारी और करिश्माई बाबाओं की बात तो छोड़ दें, राम मंदिर के भूमिपूजन पर तो शंकराचार्यों को भी नहीं बुलाया गया था, ऐसे शंकराचार्यों को भी जो कि खुलकर हिंदुत्व की वकालत करते हैं।
धर्म और राजनीति के गठजोड़ की यह कहानी बड़ी लंबी जा सकती है, लेकिन आज के लिए इतनी चर्चा काफी है। भूपेश बघेल अपनी लड़ाई खुद लडऩे में सक्षम हैं, दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है, और देश के सबसे बड़े हिस्से पर आज उसका राज है, पूरे देश पर तो है ही, इसलिए वह भी अपनी मर्जी के लोगों को बढ़ाने और बचाने की पर्याप्त ताकत रखती है। मेरा कोई इरादा इन दो के बीच चल रही लड़ाई में पिसने का नहीं है। मैंने तो धर्म और राजनीति के बीच के रिश्तों के बारे में कुछ शब्दों में अपनी बात रखी है, बाकी तो ये तो पब्लिक है, ये सब जानती है।
(आज का यह साप्ताहिक कॉलम ‘आजकल’ और संपादकीय दोनों मिलाजुला-संपादक)
बघेल, बागेश्वर, और बीजेपी, सब बी से ही क्यों शुरू होते हैं ?
28 दिसंबर 2025
छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में अतिचर्चित और घोर विवादास्पद चमत्कारी कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ऊर्फ बागेश्वर सरकार को लेकर पिछले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के भूपेश बघेल ने एक मोर्चा खोला है। आमतौर पर भारतीय राजनीति के लोग धर्म के चोले में रहने वाले किसी भी किस्म के इंसान से पंगा नहीं लेते हैं क्योंकि ऐसे लोगों के प्रभाव में उनके धर्म या संप्रदाय के काफी वोटर होने की आशंका नेताओं को रहती है, और किसी धर्मगुरू, कथावाचक, या चमत्कारी चोले से टक्कर लेना चुनावी राजनीति वाले नेता के लिए एक खतरा माना जाता है। फिर भी भूपेश बघेल ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर एक असाधारण हल्ला बोला है, और उसे इस राज्य की कांग्रेस-भाजपा की राजनीति से भी जोड़ दिया है। भूपेश का कहना है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री धार्मिक आयोजनों की आड़ में पैसा बटोरने छत्तीसगढ़ आते हैं, और वे भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। भूपेश के इस बयान पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने जवाबी हमला बोला है। सीएम ने कहा है कि उन्हें राजनीतिक दल का एजेंट कहना न केवल एक संत का अपमान है, बल्कि सनातन धर्म की परंपरा पर भी प्रहार है।
भूपेश बघेल का बाकी बयान भी गौर करने लायक है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पैदा भी नहीं हुए थे तब से मैं हनुमान चालीसा पढ़ रहा हूं, वह कल का बच्चा है, मेरे बेटे से भी उम्र में दस साल छोटा है, और वह हमें सनातन धर्म सिखाने चला है। उन्होंने कहा कि अगर दिव्य दरबार में लोग ठीक हो रहे हैं, तो फिर मेडिकल कॉलेज खोलने की जरूरत क्यों पड़ रही है? उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती कबीर साहेब और गुरू घासीदास की आध्यात्मिक परंपरा की है, यहां किसी बाहरी व्यक्ति से सीखने की जरूरत नहीं है। भूपेश ने यह भी कहा है कि कथावाचक यहां आकर अंधविश्वास फैलाते हैं।
अब पता नहीं बेलपत्री में शहद लगाकर शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद परीक्षा पास करने के लिए पढ़ाई की जरूरत न रहने की बात को भूपेश कैसे अंधविश्वास कह रहे हैं? जिस प्रवचनकर्ता की बात पर लाखों लोगों को भरोसा है, उसके दावे को देखते हुए स्कूल-कॉलेज की जरूरत भी क्यों होनी चाहिए?
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री नाम का यह नौजवान अपनी जुबान की वजह से खबरों में बने रहता है, और खासकर इलेक्ट्रॉनिक समाचार चैनलों की लार टपकती रहती है कि इस बाबा के मुंह से क्या निकले, उसमें कौन से गिने-चुने सनसनीखेज, आपत्तिजनक, अपमानजनक, भडक़ाऊ, विवादास्पद, और ओछे शब्दों वाले हिस्से को काटकर बार-बार, बार-बार दिखाया जाए। शायद टीवी चैनलों की ऐसी लार ही रहती है जिस पर फिसलना बड़बोले लोगों को अच्छा लगता है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जिस तरह की भाषा में धर्म के बारे में कहते हैं, उससे तो देश के शंकराचार्य भी हक्का-बक्का हैं, यह एक अलग बात है कि अब शंकराचार्यों के नाम पर भीड़ उतनी नहीं जुटती है क्योंकि वे उतनी छिछोरी जुबान में नहीं बोल पाते। अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के भिलाई में अपने प्रवचन या कथावाचन, जो भी कहें, उसके बीच धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने पत्रकारों के बारे में जिस गंदी जुबान में कहा, वह भी गौर करने लायक है कि धर्म के नाम पर चल रहे कार्यक्रम में जैसी भाषा, जैसी चुनौती, चेतावनी, और धमकी वे देते हैं, क्या वह किसी भी धर्म के गौरव को बढ़ाने वाली भाषा है? जिन लोगों को लगता है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री हिंदुओं को जोडऩे का काम कर रहे हैं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि क्या वे भारतीय समाज को तोडक़र हिंदुओं को उसके एक टुकड़े के रूप में एक टापू में जोडऩे की कोशिश नहीं कर रहे हैं? भारत का सांस्कृतिक इतिहास सभी धर्मों के ताने-बाने का रहा है, आज उसमें से हिंदुओं को अलग कर लेने, या दूसरे धर्म के लोगों को निकाल देने से, महज ताने-ताने, या महज बाने-बाने बच जाएंगे, देश नाम का यह कपड़ा नहीं रह जाएगा।
हम भूपेश बघेल के उठाए किसी मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहे, वे सक्रिय राजनीति में हैं, और अपने बयान पर आए हुए जवाबों का जवाब देने के लिए जरूरत से अधिक ही सक्रिय रहते हैं। लेकिन मैं धर्म और राजनीति के घालमेल के बारे में जरूर बोलना चाहूंगा, और यह बात किसी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तक सीमित नहीं है, जब यह नौजवान पैदा भी नहीं हुआ था, उसकी सौ-पचास पीढिय़ां पहले के उसके पुरखे रहे होंगे, तब भी इस दुनिया में धर्म और राजनीति की पार्टनरशिप फर्म कामयाबी से काम कर रही थी। उसे रजिस्टर इसीलिए करवाया गया था कि ये दोनों एक-दूसरे को पाल-पोस सकें। धर्म की जनता को झांसा देने की अपार क्षमता राजाओं के भी पहले कबीलों के सरदारों को भी सुहाती रही है। जब कुछ सौ या हजार लोगों के कबीले रहते थे, तब भी वहां का सरदार मंतर पढऩे वाला कोई ओझा, बैगा, गुनिया रखता था, जो लोगों को बरगलाते रहता था कि राजा का साथ किसलिए देना चाहिए। बाद के बरसों में जब औपचारिक राजपाठ कायम हुआ, तब राजा ने औपचारिक धर्म की स्थापना की, उसका विस्तार किया, उसे स्थापित किया।
मुझे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पर अधिक लिखने की जरूरत नहीं है, ऐसे कई बुलबुले इस महान देश के इतिहास में हवा में उठे और वक्त के साथ फूट गए। फूटने के पहले तक वे किसी बड़े से बुलबुले की तरह चमकदार रंगों वाले भी रहे, और लोग उन्हें मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब अविभाजित मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग होने का दौर था, और भोपाल से उस वक्त के छत्तीसगढ़ के सबसे ताकतवर मंत्री सत्यनारायण शर्मा एक रावतपुरा सरकार नाम के प्राणी को ले आए थे, उसका यहां पर आश्रम स्थापित कर दिया था, और रातों-रात हजारों कांग्रेसी इस सरकार के अंदाज में ही सिर पर पगड़ीनुमा गमछा बांधने लगे थे। उस वक्त कांग्रेस के लोगों को लगता था कि राज्य बनेगा तो सत्यनारायण शर्मा शायद मुख्यमंत्री बनेंगे। और भावी मुख्यमंत्री जिसे गुरू मानें, उसे राजनीति के लोग अपना महागुरू मान लेते हैं। ऐसे में रावतपुरा सरकार नाम से प्रचलित रविशंकर महाराज का गौरवगान छत्तीसगढ़ में इतना चला कि रायपुर में उनके कार्यक्रम के लिए एक बड़े आईपीएस अफसर ने पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के सैकड़ों प्रशिक्षु सिपाहियों की ड्यूटी इस कार्यक्रम में लगा दी थी। अभी तो इस नौजवान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आगमन पर पुलिस के उस इलाके के टीआई ने जूते उतारकर, टोपी उतारकर बागेश्वर महाराज की चरणरज पाकर अपना जीवन धन्य किया था, लेकिन इसे मुद्दा बनाने वाले लोगों को अभी महज 25 बरस पहले इसी राज्य में रावतपुरा सरकार का डंका-मंका भूल गया है। आज रावतपुरा सरकार की हालत यह है कि अपने मेडिकल कॉलेज के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन को रिश्वत देते हुए वे टेलीफोन कॉल और संदेशों में कैद हैं, और सीबीआई ने अदालत में जो चार्जशीट पेश की है, उसमें उनका नाम भी सजा हुआ है। अब पता नहीं अदालत में उनकी पेशी पर उनके लिए मंच बनाकर सिंहासन लगाया जाएगा, या कटघरे में उनकी पूजा होगी।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि रावतपुरा सरकार पूरी तरह से कांग्रेसी थे, और इसलिए मोदी की सीबीआई ने उन्हें धांस दिया है। अब मोदी की सीबीआई हो या ट्रंप का सीआईए, कोई एजेंसी भला किसी को रिश्वत देने पर मजबूर कर सकती है? और अगर रावतपुरा सरकार के ऐसे ही चमत्कार थे, तो फिर लोगों को रिश्वत देने की नौबत क्यों आई?
धर्म और राजनीति के घालमेल का एक और किस्सा मुझे याद है जिसका जिक्र मैं कभी-कभी, मतलब है कि हर कुछ महीने में कर देता हूं। धर्म से मेरा खास लगाव है, धर्म के पूरे किरदार को मैं अच्छी तरह समझता हूं, और इसलिए पाखंडी धर्म-प्रचार के मुकाबले जनता को आगाह करना अपनी जिम्मेदारी भी समझता हूं। अविभाजित मध्यप्रदेश की बड़ी पुरानी बात है। एक मठ के महंत ने अपनी अत्यंत ‘करीबी’ एक महिला के नौजवान बेटे को पीट देने वाले लोगों को खुद खड़े रहकर अपने लठैतों से मरवाया था। जब इस हत्या की बात उस वक्त के मुख्यमंत्री तक पहुंची, तो वे परेशान हुए कि उनके राज में एक मठाधीश को फांसी की नौबत आ गई, तो वह बड़ी शर्मनाक नौबत होगी। उन्होंने इस मठाधीश से कॉलेजों के लिए सैकड़ों एकड़ जमीनें दान करवाईं, और केस को रफा-दफा करवाया। उस सर्वोच्च वर्ण के मुख्यमंत्री का यह अपने किस्म का न्याय था कि इतना दान करवा देने से कत्ल की सजा देना हो गया। तो राजनीति, राजा, सत्ता, और धर्म का कुछ ऐसा ही घालमेल पूरी दुनिया के इतिहास में घुला-मिला है, भारत कोई अकेली मिसाल नहीं है।
दुनिया के इतिहास में जो बातें दर्ज हैं, और ये बातें मैं अपने शब्दों में नहीं लिख रहा हूं, इतिहास देखकर लिख रहा हूं, जब समाज कबीलाई था तब सरदार की शक्ति महज बाहुबल से नहीं चलती थी, उसे एक सर्टिफिकेट की कमी लगती थी कि वह सही है, ईश्वर का चुना हुआ है, प्रकृति की विशेष ताकत उसके साथ है। यहीं से ओझा, बैगा, या पुजारी जैसे लोग खड़े किए गए, जिनका काम था एक तथाकथित और काल्पनिक ईश्वर से अपने रिश्तों का झांसा देना, और कबीले के सरदार के फैसलों को ईश्वर का फरमान बताना। इतिहास लिखता है कि आस्था सत्ता का औजार बनी। धीरे-धीरे धर्म सत्ता का भागीदार होते गया, वह सरदार को जनता की नाराजगी के मुकाबले एक हिफाजत देता था, धर्म का डर, पाप की धारणा, और पुण्य से होने वाले फायदों का झांसा देता था, और इसके बदले राजा उसे राज्याश्रय देता था। ये दोनों जनता के शोषण के बुलडोजर के दो पहिए बन गए थे।
कुछ लोगों को लग सकता है कि यह बात कार्ल मार्क्स की लिखी हुई है, लेकिन मार्क्स जब पैदा भी नहीं हुआ था, तब भी बहुत से इतिहासकारों ने दुनिया में धर्म और राज्यसत्ता के गठजोड़ को दर्ज किया था। पुरोहित की मेहरबानी से राजा ईश्वर का प्रतिनिधि साबित कर दिया गया था। चीन में राजा के बारे में कहा जाता था कि वे स्वर्ग के आदेश से बने हैं, योरप में इसे ईश्वरीय अधिकार कहा जाता था, भारत में राजधर्म कहा जाता था, और लोकतंत्र के आने के पहले तक सारे के सारे तंत्र इसी गठजोड़ के थे।
शोषण को झेलना जनता की जिम्मेदारी मान ली गई थी, इसे उसके पिछले जन्मों के पाप से जोड़ दिया गया था, और असंतोष या विद्रोह को ऐसा पाप करार दे दिया गया था जिसका भुगतान अगले सात जनम तक करना पड़ेगा। धर्म ने, और यह बात सनातन या हिंदू धर्म की नहीं है, दुनिया के तकरीबन तमाम धर्मों में यही धारणा बढ़ाई गई कि इस जन्म में बगावत की बात सोचना भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी भुगतना पड़ेगा। धर्म लोगों को यह धैर्य सिखाता है कि आज उनकी जिंदगी में जितनी दिक्कतें हैं, उनका राजा से कोई लेना-देना नहीं है, यह सब उनके पिछले जन्मों के कुकर्मों का नतीजा है।अधिकतर धर्मों की प्रार्थनाओं और उनके ग्रंथों के लिखे हुए को देखें तो वे लोगों को हर तकलीफ के लिए ईश्वर की मर्जी का तर्क देने वाले हैं, उनके भाग्य में ही ऐसा लिखा हुआ था, यह समझाने वाले हैं, और पिछले जन्मों का फल गिनाने वाले धर्म तो मानो फलों का कोल्ड स्टोरेज ही हैं। हर तकलीफ के वक्त वे एक पेटी सेब निकालकर लोगों को दे देते हैं कि ये उनके पिछले जन्मों का फल है कि वे आज तकलीफ पा रहे हैं।
भारत जैसे लोकतंत्र में धर्म का इस्तेमाल अलग-अलग पार्टियां कम या अधिक दूर तक कर सकती हैं। पंजाब में अकाली दल तो पूरी तरह से धर्म आधारित पार्टी है, और अपने फैसलों के लिए वह सिख धर्म के सबसे बड़े धार्मिक संगठन के प्रति सीधी जवाबदेह भी रहती है, और उसकी सुनाई गई सजा को भी भुगतने के लिए तैयार रहती है। भारत में हजारों बरस से राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने की जो परंपरा चली आ रही थी, उसे बौद्ध धर्म ने बड़ी और कड़ी चुनौती दी थी, उसने न पुनर्जन्म माना, न भाग्य माना, और न राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना। वक्त के साथ बौद्ध धर्म की धार भोथरी होती चली गई, और जनता के जागरण में वह अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाया।
धर्म का जनकल्याणकारी रुख कितना हो सकता है, और कितना नहीं, यह देखना हो तो मुगल और अंग्रेज काल देखना होगा कि किस धर्म ने उस वक्त के शासकों के सामने दंडवत समर्पण किया, और किन धर्मों ने जनता के जागरण का काम किया। उस लंबे इतिहास में जाना आज मेरा मकसद नहीं है, और जिनकी दिलचस्पी अपने देश, धर्म, और राजतंत्र को जिम्मेदारी से जानने की हो, वे अलग-अलग जगहों से इस ताजा इतिहास को तलाश सकते हैं।
फिलहाल तो हालत यह है कि कांग्रेस का ताजा इतिहास भी धर्म से आजाद नहीं रहा। उसके अलग-अलग नेताओं ने अलग-अलग समय पर धर्म का इस्तेमाल किया, और खुद भी धर्म के काम आए। नेहरू के वक्त तक तो कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष बनी रही, लेकिन इंदिरा गांधी के राज में धर्मगुरुओं, ज्योतिषियों, गले में रूद्राक्ष, सिर पर देवरहा बाबा का पैर, ये तमाम तस्वीरें लोगों की याद में ताजा हैं। जिस तरह रूस के जार-राजाओं के पुरोहित हुआ करते थे, उसी मिसाल का इस्तेमाल इंदिरा गांधी के करीबी, तथाकथित योगगुरू धीरेंद्र ब्रह्मचारी के लिए किया जाता था। सफेद कपड़े के दाढ़ी वाले इस गुरू का बोलबाला इंदिरा की सत्ता में इतना था कि वह तरह-तरह के बड़े-बड़े सरकारी फायदे पाता था।
इंदिरा के बाद राजीव गांधी ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो वाला फैसला पलटा था, जिस तरह अयोध्या में राम मंदिर के ताले खुलवाए थे, वह सबकुछ देखने लायक था, और इतिहास में बहुत अच्छी तरह दर्ज है। नरसिंह राव के कार्यकाल का हाल यह था कि दिल्ली के एम्स के कार्डियो थोरेसिक सेंटर के डायरेक्टर डॉ. वेणुगोपाल हफ्ते में तीन दिन पुट्टपर्थी जाकर वहां सत्यसाईं बाबा के अस्पताल में दिल के मरीजों का ऑपरेशन करते थे, और यह इंतजाम प्रधानमंत्री के आदेश से किया गया था। कांग्रेस के तकरीबन सारे ही मंत्री-मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री अपने-अपने धर्म के चरणों पर आए दिन दिखते ही थे। अकेले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ऐसे थे जो कि वोटरों और चुनाव पर अधिक निर्भर नहीं करते थे, और उन्होंने धर्म को, अपने सिख धर्म को निजी आस्था तक सीमित रखा, और कभी उसकी सार्वजनिक नुमाइश नहीं की।
हाल के बरसों में तो लोगों ने देखा हुआ है कि बापू कहलाने वाले बलात्कारी आसाराम के चरणों पर किस-किस पार्टी के कौन-कौन से नेता नहीं पड़े रहते थे। मोदी और आडवाणी के साथ-साथ दिग्विजय सिंह की भी अनगिनत तस्वीरें आसाराम के चरणों पर चारों तरफ फैली हुई हैं, जिन्हें देखना हो इंटरनेट सर्च पर बस नाम ही काफी है।
अभी छत्तीसगढ़ में जो विवाद चल रहा है, उसमें बागेश्वर सरकार जैसा करिश्मा दिखाने वाला बड़बोला कथाकार भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ अनगिनत बातें बोलता दिखता है, और वह यह स्थापित करने में लगा हुआ है कि भारत संवैधानिक रूप से भी एक हिंदू राष्ट्र है। वह अपने तथाकथित प्रवचनों में जिस अंदाज में पत्रकारों को और दूसरे लोगों को धमकियां देता है, बात-बात में लोगों की ठठरी बंधवा देने (अर्थी पर बंधवा देने) की बात कहता है, वह हिंसक अहंकार सुनना भी उन लोगों को तो भारी पड़ता है जिनके मन में इंसानियत की कुछ बुनियादी खूबियां अभी भी बाकी हैं। ऐसे बाबाओं के आयोजन करवाने वाले किस तरह के भू-माफिया रहते हैं, यह उनके अखबारी इश्तहारों और सडक़ों पर लगने वाले होर्डिंग्स से आसानी से समझ में आ जाता है। इसके साथ ही उनका जमीनों का अवैध कारोबार करोड़ों से अरबों का हो जाता है, और उसका एक टुकड़ा वे ऐसे आयोजनों के लिए डाल देते हैं।
भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में संविधानेत्तर ताकतों का ऐसा बोलबाला चलते ही रहता है। कई पार्टियां इन्हें विधानसभाओं, लोकसभा और राज्यसभा में भी भेज देती हैं, तरह-तरह का राजकीय दर्जा दे देती हैं। भारत में 75 बरसों के तथाकथित लोकतंत्र के इस छोटे से दौर को छोड़ दें, तो राजा और धर्म का ऐसा रिश्ता तो हमेशा से रहते आया है, पिछली पौन सदी में यह कई जगह खुलकर सामने आया, कुछ जगहों पर पर्दे के पीछे से चला। खुद कांग्रेस पार्टी को समय-समय पर कोई शंकराचार्य बहुत सुहाते रहे, और राजनीतिक चेतना की बातें कहने पर कई शंकराचार्य सत्ता की आंखों की किरकिरी भी रहे। छोट-मोटे प्रवचनकर्ता और कथाकार, चमत्कारी और करिश्माई बाबाओं की बात तो छोड़ दें, राम मंदिर के भूमिपूजन पर तो शंकराचार्यों को भी नहीं बुलाया गया था, ऐसे शंकराचार्यों को भी जो कि खुलकर हिंदुत्व की वकालत करते हैं।
धर्म और राजनीति के गठजोड़ की यह कहानी बड़ी लंबी जा सकती है, लेकिन आज के लिए इतनी चर्चा काफी है। भूपेश बघेल अपनी लड़ाई खुद लडऩे में सक्षम हैं, दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है, और देश के सबसे बड़े हिस्से पर आज उसका राज है, पूरे देश पर तो है ही, इसलिए वह भी अपनी मर्जी के लोगों को बढ़ाने और बचाने की पर्याप्त ताकत रखती है। मेरा कोई इरादा इन दो के बीच चल रही लड़ाई में पिसने का नहीं है। मैंने तो धर्म और राजनीति के बीच के रिश्तों के बारे में कुछ शब्दों में अपनी बात रखी है, बाकी तो ये तो पब्लिक है, ये सब जानती है।
(आज का यह साप्ताहिक कॉलम ‘आजकल’ और संपादकीय दोनों मिलाजुला-संपादक)
भगवा से लेकर लाल रंग तक से छपे अखबार बच्चों के पढऩे लायक रहेंगे?
27 दिसंबर 2025
देश के एक सबसे प्रमुख हिंदी साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल के गुजरने पर अब उनकी कही बातें चारों तरफ गूंज रही हैं। एक खबर बताती है कि विनोदजी ने किस तरह अखबार पढऩे के महत्व को बताया था और बच्चों के लिए भी अखबार पढऩा जरूरी कहा था उनका कहना था कि अखबार पढऩे की आदत आगे चलकर सोचने को मजबूर करती है। उनका यह भी कहना था कि अखबार ज्ञान का बड़ा माध्यम है, और खबरों को पढऩा अगर दिलचस्प तरीके से सिखाया और बताया जाए तो बच्चे उसमें दिलचस्पी लेना शुरू कर देते हैं। यह भी दिलचस्प बात है कि उत्तरप्रदेश में योगी सरकार ने सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए दस मिनट अखबार पढऩा अनिवार्य कर दिया है। अब योगी तो घोर हिंदुत्ववादी भाजपाई मुख्यमंत्री हैं, लेकिन दूसरी तरफ वामपंथी शासन वाले केरल में जाने एक सदी से, या उसके भी पहले से अखबार पढऩे की कई अलग-अलग किस्म की परंपराएं हैं। एक वक्त सार्वजनिक जगहों पर कुछ छांटी गई दीवारों पर अखबार के पन्ने चिपका दिए जाते थे, और लोग वहां खड़े होकर खबरों को पढ़ते थे। जाहिर है कि ऐसे लोग आपस में खबरों पर बात भी करते रहे होंगे। हो सकता है कि देश के कुछ और प्रदेशों में भी ऐसा रहा हो, लेकिन केरल की एक खूबी यह भी थी कि जिस जगह पर बहुत से मजदूर बैठकर काम करते हैं, वहां पर एक मजदूर एक ऊंची कुर्सी पर बैठकर अखबार पढक़र उसमें से जरूरी और महत्वपूर्ण बातें बाकी मजदूरों को सुनाता है, और इस अखबार पढऩे वाले मजदूर को भी कारखानेदार को रोजी देनी पड़ती है। इस तरह बिना पढ़े हुए, काम करते हुए भी केरल के मजदूर देश और दुनिया से वाकिफ रहते आए हैं। शायद यह भी एक वजह है कि केरल में देश की सबसे बड़ी साक्षरता है, लैंगिक अनुपात देश में केरल में सबसे अधिक है, महिलाओं के कामकाजी होने का अनुपात भी केरल में देश के किसी भी दूसरे प्रदेश के मुकाबले अधिक है।
विनोद कुमार शुक्ल किसी वामपंथी, या दक्षिणपंथी सोच के हिमायती नहीं रहे, लेकिन उनकी अखबार पढऩे और पढ़वाने की सोच दक्षिणपंथी यूपी से लेकर वामपंथी केरल तक आज अमल में आ रही है, यह कैसी गजब की बात है। फिर बहुत से लोगों को यह भी शिकायत रहते आई है कि विनोद कुमारजी राजनीतिक, या जनसरोकार के मुद्दों पर कभी बोलते नहीं थे। यह संपादकीय लिख रहे संपादक ने 25 बरस पहले एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाते हुए विनोद कुमारजी को लोकतंत्र से जुड़े हुए जलते-सुलगते मुद्दों पर लंबा इंटरव्यू किया था, और इस वीडियो रिकॉर्डेड इंटरव्यू में उन्होंने आदिवासियों के हक से लेकर नक्सलियों तक, और मानवाधिकार से लेकर दूसरे राजनीतिक मुद्दों तक खुलकर टिप्पणी की थी। अब यह लगता है कि जो लोग विनोद कुमार शुक्ल को राजनीति और सरोकार के मुद्दों से अछूता मानते हैं, उन्होंने शायद कभी उनसे इन मुद्दों पर ठोस चर्चा की कोशिश नहीं की थी।
खैर, विनोद कुमार शुक्ल पर चर्चा आज का मकसद नहीं है, बल्कि मकसद यह है कि क्या स्कूल के बच्चों को अखबार पढ़वाना चाहिए? क्या अखबारों में आज हिंसा की जितनी खबरें रहती हैं, जितनी नकारात्मक खबरें रहती हैं, चारों तरफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी पन्नों पर छाए रहते हैं, क्या वह सबकुछ बच्चों के लिए स्कूल की उम्र में पढऩे लायक बातें हैं? यह सवाल कुछ मुश्किल इसलिए है क्योंकि घरों में अखबार आते हैं, और उन्हें कोई छुपाकर तो रखा नहीं जाता, वे बच्चों की नजरों में आते ही हैं, और बच्चे अगर दिलचस्पी लें, तो बहुत से बच्चों के घरों में अखबार पढऩे का माहौल हो सकता है, और वहां पर तो मां-बाप उनके मन में उठते सवालों के जवाब देने के लिए रहते भी हैं। स्कूलों में तो बच्चे तो बहुत से रहते हैं, सवाल बहुत से हो सकते हैं, और हो सकता है कि शिक्षक उनमें से किसी सवाल का तथ्यपूर्ण, वैज्ञानिक, और सही ऐतिहासिक जानकारी वाले जवाब दे, तो कुछ ही देर में वे पिट भी सकते हैं। इसलिए स्कूलों में अखबार पढ़वाने की सोच पर योगी सरकार ने क्या सोचकर अमल किया है, लेकिन कोई भी अच्छा अखबार कई किस्म के सवाल खड़े करता है, और आज का माहौल सवालों का तो है नहीं। अगर कंटीली झाडिय़ां सामने आएं, और सवालों की फसल सामने आए, तो अभी पहले तो सवाल ही काटे जाएंगे, कांटे तो फिर भी बर्दाश्त करने लायक माने जाएंगे।
अखबार, अगर सरोकार से भरे हुए, जिम्मेदार और अच्छे अखबार हैं, तो वे बच्चों के मन में बहुत तरह के जायज सवाल भी खड़े करेंगे। और इन सवालों के साथ जब बच्चे क्लासरूम में खड़े होंगे और टीचर से पूछेंगे, तो टीचर के लिए यह बड़ा सा धर्मसंकट, या अधर्मसंकट, रहेगा कि सच कहें और गिरफ्तारी झेलें, या झूठ बोलकर गुरू की जिम्मेदारी से मुंह चुराएं?
अगर अखबारों के नाम पर खराब अखबार पढ़ाना नीयत हो, तो उससे स्कूली बच्चे झूठे इतिहास के साथ-साथ झूठे वर्तमान को भी पढऩे के खतरे में आ जाएंगे। फिर यह भी रहेगा कि आज बाकी मीडिया की तरह कई अखबारों का एक बड़ा हिस्सा नफरती खबरों का रहता है, उनका बच्चों पर क्या असर होगा? अगर यह सोचें कि स्कूली बच्चों के पढऩे के लिए अलग से अखबार निकाले जाएं, तो वह एक अलग किस्म का खतरा रहेगा जहां उनकी समझ को सत्ता अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक पसंद से रंगने के लिए उसी रंग का अखबार निकालने लगेगी। केरल के अखबार लाल, और यूपी जैसे प्रदेशों के अखबार केसरिया स्याही से छपकर निकलने लगेंगे। इसलिए किसी भी तरह के अखबार की बात करें उसके साथ किसी न किसी किस्म के खतरे जुड़े रहेंगे।
विनोद कुमार शुक्ल किसी पंथी सोच से जुड़े हुए नहीं रहे, बल्कि कल ही विख्यात कवि-लेखक और विनोद कुमारजी के अत्यंत करीबी अशोक वाजपेयी ने अपने एक लेख में लिखा है कि इतिहास, जाति-स्मृति, और विचारधारा से लगभग दूर रहना विनोद कुमारजी की रणनीति या विवशता नहीं नैतिकता थी। अब सवाल यह भी उठता है कि किसी विचारधारा से दूर रहकर विनोद कुमारजी बच्चों के बीच कोई प्रोपेगैंडा तो करवाना नहीं चाहते रहे होंगे, और अगर कोई भी जिम्मेदार सरकार है, तो उन्हें बच्चों के स्कूलों का इस्तेमाल प्रोपेगैंडा के लिए करना भी नहीं चाहिए। ऐसे में स्कूल और अखबार, हमारा मतलब है आम और साधारण अखबार, ये साथ-साथ रखने पर कुछ गड़बड़ लगते हैं। हम बच्चों के अखबार पढऩे के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि एक वक्त तो हम अपने अखबार का एक पूरा पन्ना सामान्य ज्ञान की जानकारियों का हर दिन रखते थे, और वह बच्चों के साथ-साथ उनके मां-बाप के बीच भी बड़ा लोकप्रिय था। अभी भी सरकार से परे कोई निजी प्रकाशक बच्चों के लिए एक दैनिक अखबार अगर निकाले, और जिम्मेदार मां-बाप इस तर्क से सहमत हो जाएं कि बच्चों के लिए तैयार किया गया अखबार उनके लिए रोज खरीदा जाना चाहिए, तो हो सकता है कि वह एक कामयाब प्रकाशन भी हो जाए। सरकारों के लिए ऐसे किसी प्रकाशन की सोचना और उसमें दखल देना कुछ दिक्कत की बात रहेगी क्योंकि सत्तारुढ़ पार्टियों की अपनी राजनीतिक विचारधाराएं रहती हैं, अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतिबद्धताएं रहती हैं, और वे उससे मुक्त होकर कोई प्रकाशन कर नहीं सकतीं।
बच्चों के अखबार पढऩे की सोच बड़ी अच्छी है, लेकिन आज अखबार उतने अच्छे नहीं हैं। अखबारों में खबरों की हालत जब यह रहे कि अखबार को निचोड़ो तो लहू टपकने लगे, तो वैसा खून सना अखबार बच्चों के बीच कैसे रखा जाए? फिर भी मां-बाप या स्कूल, यह जरूर सोच सकते हैं कि क्या अलग-अलग खबरों को काट-काटकर उन चुनिंदा कतरनों से एक ऐसा अखबार तैयार किया जा सकता है जो कि बच्चों के पढऩे के लायक हो? या फिर इसे लेकर झंडे-डंडे लेकर स्कूल पहुंच जाने वाले और टीचर की पिटाई करने वाले लोगों का खतरा बना रहेगा?
एक-एक मर्द हजारों का बाप बनकर दुनिया को किस तरह बदल देगा?
26 दिसंबर 2025
अमरीका के सबसे चर्चित कारोबारी, और दुनिया के सबसे संपन्न व्यक्ति, एक्स और स्पेस-एक्स, टेस्ला जैसी कंपनियों के मालिक एलन मस्क दर्जन भर बच्चों के पिता हैं। उनका सबसे नया बच्चा शादी से परे के किसी संबंध से अभी सामने आया है। वे दुनिया में आबादी को खूब बढ़ाने के हिमायती हैं, और उनका कहना है कि आबादी का घटना मानव-प्रजाति के ऊपर सबसे बड़ा खतरा है। वे खुलकर कहते हैं कि अगर बुद्धिमान और सक्षम लोग बच्चे पैदा नहीं करेंगे, तो भविष्य असंतुलित होगा। इशारे-इशारे में वे कई बार यह बात कह चुके हैं कि समाज के शिक्षित और तकनीकी वर्ग में जन्मदर बहुत कम हो गई है, जबकि कम संसाधन वाले वर्गों में यह अधिक है। इस असंतुलन को वे दीर्घकालीन समस्या मानते हैं। उनकी इस सोच को गरीबविरोधी रईस सोच भी कहा जाता है। दूसरी तरफ एक अलग खबर है टेलीग्राम नाम के मोबाइल एप्लीकेशन के संस्थापक की है कि उसके दुनिया के 12 से अधिक देशों में सौ बच्चे हैं, और उनमें से जिनकी भी माँ आकर पावेल ड्यूरोव से डीएनए रिश्ता स्थापित कर सकेगी, उसे उनकी संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा। दरअसल, यह आदमी बीते कई बरसों से दुनिया में अच्छे और स्वस्थ शुक्राणु की कमी का तर्क देते हुए अपने देश रूस की एक प्रजनन शुक्राणु शाला के माध्यम से अपने स्पर्म मुफ्त में बांट रहा है। उसकी शर्त यही रहती है कि स्पर्म पाने वाली महिला 37 बरस से कम की रहनी चाहिए। पावेल ने इस उम्र सीमा की महिला के अपने शुक्राणु से गर्भधारण करने पर आईवीएफ तकनीक का पूरा खर्च उठाने का प्रस्ताव भी दिया है। अब यह बात जाहिर है कि यह रूसी कारोबारी 41 बरस की उम्र में दुनिया का एक सबसे सफल कारोबारी माना जाता है, और अगर ऐसे सेहतमंद आदमी के शुक्राणु से कोई महिला गर्भवती होती है, तो उसके बच्चे के स्वस्थ होने की संभावना भी अधिक रहती है। अब सोने में सुहागे की तरह अगर ऐसे बच्चे को 17 अरब डॉलर की इसकी सम्पत्ति में हिस्सा भी मिलेगा, तो ऐसा लगता है कि दुनिया की महिलाओं के बीच इसके लिए एक कतार भी लग सकती है। यह पूरी खबर कुछ अटपटी है, लेकिन दुनिया में संपन्न, ताकतवर, और सनकी लोगों के बीच ऐसी सोच और लोगों में भी हो सकती है।
अब हम ऐसी सोच के खतरे अगर देखें, तो दुनिया में अलग-अलग देशों में चिकित्सा वैज्ञानिक इस कोशिश में लगे हुए हैं कि शुक्राणु के स्तर पर ही कौन-कौन सी जांच करके गंभीर बीमारियों के खतरे वाले शुक्राणुओं का उपयोग कम किया जाए, या इसमें जेनेटिक चयन करके उनमें ऐसी बीमारियों के खतरे पहले से समझ लिया जाए, और उनका उपयोग न किया जाए। इससे परे अभी जेनेटिक एडिटिंग स्पर्म के स्तर पर शायद नहीं आई है। प्रयोगशालाओं में जिस तरह से अलग-अलग स्पर्म में से सबसे स्वस्थ, और बीमारीरहित स्पर्म छांटने का मुकाबला चल रहा है, उससे एक बात हो रही है कि इसका खर्च उठाने की क्षमता रखने वाले संपन्न वर्ग के होने वाले बच्चों में गंभीर बीमारियों वाले बच्चे कम हो सकते हैं। इसके बाद वे अपनी संपन्नता का फायदा उठाकर बाकी कई बीमारियों से भी बच सकते हैं, या उनक इलाज करवा सकते हैं। दूसरी तरफ दुनिया में जो विपन्न तबका है, उसके सामने शुक्राणु-चयन जैसी कोई सहूलियत नहीं है, न ही कोई जांच उनको हासिल है, और उनके होने वाले बच्चे अभावों में ही बड़े होते हैं। नतीजा यह होता है कि संपन्न और विपन्न के बीच आज जो महज आर्थिक फासला है, वह धीरे-धीरे बढ़ते हुए साधारण, और अधिक स्वस्थ डीएनए के बीच फासले सरीखा भी होते चले जाएगा।
फिर इस रूसी कारोबारी जैसी हसरत वाले और लोग भी अगर सामने आने लगेंगे, अपने स्पर्म से हजारों बच्चे पैदा करने लगेंगे, आत्ममुग्धता आसमान तक चली जाएगी, तो एक वक्त ऐसा आ सकता है कि दुनिया से जेनेटिक विविधता कुछ कम होने लगे। हम ऐसे दिन की कल्पना करें जब ऐसे एक-एक संपन्न, या बहुत अधिक प्रतिभाशाली, स्वस्थ, मशहूर खिलाड़ी, या चर्चित व्यक्ति अपने शुक्राणु बांटने को तैयार हो जाएं, और एक-एक से हजारों बच्चे होने लगें, तो दुनिया में विविधता और कम हो सकती है। इससे दुनिया में बेहतर समझे जाने वाले रूप-रंग, कद-काठी, सुंदर, स्वस्थ लोगों की एक नई जमात खड़ी हो सकती है, जिसके मुकाबले दूसरे लोग कुछ कमजोर भी लग सकते हैं। ऐसे दिन की कल्पना आज आसान नहीं है, लेकिन एआई जैसे औजार के इस्तेमाल से यह नौबत अधिक दूर तक जा सकती है, क्योंकि दुनिया के सिरफिरे या सनकी, या तानाशाही मिजाज वाले आत्ममुग्ध लोग यह सोच सकते हैं कि उन्हें दूसरे आम लोगों के मुकाबले अधिक बच्चे पैदा करने का हक है, और फिर कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से तो किसी एक व्यक्ति के शुक्राणुओं से उसके जीवनकाल में लाखों महिलाओं को गर्भवती किया जा सकता है। ऐसे में अगर पुरूष की हसरत के साथ अतिसंपन्नता जुड़ जाए, या उसका शुक्राणु लेने और गर्भवती होने का खर्च उठाने की ताकत महिलाओं में भी हो, तो भी दुनिया से डीएनए विविधता कम होने लगेगी, और उसके कुछ अलग खतरे रहेंगे।
दुनिया में पिछले दसियों हजार बरस में इंसान डीएनए की विविधता के दौर से गुजरते हुए अधिक मजबूत हुए हैं, और वे तरह-तरह की बीमारियों और महामारियों का सामना करने के लिए अधिक तैयार हैं। आज भी भारत के अंडमान निकोबार के कुछ बिल्कुल ही अछूते टापुओं के आदिवासियों पर यह खतरा मंडराता है कि उनका बाहर की दुनिया से कोई भी संपर्क नहीं रहा है, और किसी बाहरी व्यक्ति से मिलने पर उन्हें जो संक्रामक रोग हो सकते हैं, उससे निपटने की क्षमता उनकी नहीं है। इसलिए दुनिया में अलग-अलग नस्लों की मिलावट, और अलग-अलग तरह की जिंदगी के कई फायदे भी हैं, इससे इंसानों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी है, और वे सीमित रक्त समूह वाले समुदायों के मुकाबले अधिक मजबूत हुए हैं।
आज जिस मुद्दे पर हम चर्चा कर रहे हैं, वह एक काल्पनिक खतरा है। लेकिन उसकी एक बड़ी मिसाल तो एक खरबपति कारोबारी की खुद की मुनादी से साबित हुई है। हो सकता है कि ऐसे बहुत से सनकी तानाशाह या कारोबारी हों, जो कि आज भी दुनिया के बहुत से शुक्राणु केन्द्रों को भुगतान करके अपने शुक्राणु को अधिक फैला रहे हों। इंसान की दुनिया पर राज करने की चाह का यह भी एक तरीका तो हमेशा से रहा ही है कि अपनी आल-औलाद को अलग-अलग साम्राज्य पर काबिज किया जाए। यह पूरा सिलसिला आज एक कल्पना के लायक है कि दुनिया विविधता की ताकत से दूर इस किस्म की सीमित शुक्राणु वाली जगह बनकर कैसे-कैसे खतरे झेलेगी? आपकी पहुंच अगर एआई तक हो, तो आपको इस बारे में उससे पूछना चाहिए, और यह मानकर चलना चाहिए कि किसी धर्म, विचारधारा, राजनीति, या निजी व्यक्ति पूजा के चलते इस तरह की बात हो सकती है कि किसी गुरू की अनुयायी महिलाएं उसके शुक्राणु से माँ बनने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाएं।
सलामी गारद की समाप्ति, हमारे लिखने का इतिहास
25 दिसंबर 2025
छत्तीसगढ़ सरकार ने यह तय किया है कि मंत्रियों और बड़े अफसरों को औपचारिक रूप से दी जाने वाली सलामी, गार्ड ऑफ ऑनर को बंद कर दिया जाए। इसके पहले कई दूसरे राज्य यह फैसला लेकर उसे लागू कर चुके हैं क्योंकि कहीं पहुंचने वाले मंत्री या आला अफसर के इंतजार में दर्जन-दो दर्जन पुलिसवाले एक अलग किस्म की पोशाक में दिन-दिन भर इंतजार करते हैं ताकि आने वाले तथाकथित अतिमहत्वपूर्ण व्यक्ति को सलामी दी जा सके, ताकि उनके अहंकार शांत हो सके। 2019 में ओडिशा ने यह फैसला लागू कर दिया था, 2018 में राजस्थान ने, और 2015 में महाराष्ट्र ने सलामी की प्रथा खत्म कर दी थी। खैर, जब जागे तभी सबेरा। हम इस किस्म की सामंती प्रथाओं को खत्म करने के लिए दशकों से लिखते चले आ रहे हैं। प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने अपने लिए महामहिम शब्द का इस्तेमाल खत्म करवाया था, और बाद में उनके देखादेखी, शायद मजबूरी में मन मारकर, राज्यपालों को भी इस मोह को छोडऩा पड़ा था।
कम्प्यूटर की मेहरबानी से पिछले कुछ बरसों के हमारे संपादकीय एक जगह इकट्ठा हैं, और हमारे सामने 2014 का एक संपादकीय है जिसमें दागियों को मंत्री बनाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, और उसमें हमने लिखा है कि दागियों को सलाम करने वाली सरकारी सलामी गारद वाला लोकतंत्र कभी गौरवशाली नहीं हो सकता। 2012 में एक संपादकीय में हमने लिखा था कि राष्ट्रपति भवन से लेकर राजभवनों, और अदालतों तक सामंती प्रतीक खत्म करने चाहिए, और राज्यों के राजभवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक दरबार हॉल जैसे शब्द हटाने चाहिए। इसी के साथ हमने लिखा था कि राज्यपाल के कार्यक्रमों के शुरू और आखिर में राष्ट्रधुन बजाने के लिए पुलिस का एक पूरा बैंड ही उनके साथ सफर करता है, और पूरे वक्त यही एक काम करता है। गांधी के देश में ऐसी सामंती फिजूलखर्ची खत्म होनी चाहिए। इसी संपादकीय में हमने सलामी गारद के खिलाफ भी लिखा था। 2017 में हमने फिर दरबार हॉल, झंडा फहराने और उतारने की औपचारिकता, सलामी गारद, राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की घुड़सवार पलटन जैसी सामंती और अहंकारी फिजूलखर्ची के खिलाफ लिखा था। उसी साल एक और संपादकीय में हमने राज्यपाल के साथ चलने वाले पुलिस बैंड, और देश में सलामी गारद की प्रथा खत्म करने के बारे में लिखा था कि राजा के साथ गाने-बजाने वाले और चारणभाट की तरह के जो लोग चलते थे, वह राजशाही के दिनों में ही ठीक लगता था। 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ प्रवास के समय एक कलेक्टर के चिलचिलाती धूप में धूप का चश्मा लगाने पर मुख्य सचिव द्वारा दिए गए नोटिस के खिलाफ लिखा था कि इतनी धूप में चश्मा न लगाने, और बंद गले का कोट पहनने का यह रिवाज अंग्रेजों की छोड़ी गई गंदगी है, और हिन्दुस्तान को इसे सिर पर ढोना बंद करना चाहिए। हमने उसमें लिखा था कि जहां पुलिस की कमी से विचाराधीन कैदियों को अदालतों तक नहीं ले जाया जाता, बरसों तक बिना सुनवाई कैदी जेल में रहने को मजबूर रहते हैं, वहां सलामी के लिए पुलिस का इस्तेमाल पूरी तरह अलोकतांत्रिक और हिंसक है, ऐसे लोग किसी सलामी के हकदार भी नहीं हो सकते जो कि देश की गरीब जनता के पैसों से इस अंग्रेजी केक की जूठन को लोकतंत्र के फ्रिज में संभालकर रख रहे हैं। 2023 में हमने संपादकीय में लिखा था कि कुपोषण और गरीबी से लदे हुए इस देश में राजभवनों में पुलिस बैंड, और सलामी गारद जैसे सामंती इंतजाम खत्म होने चाहिए, और झंडा फहराने या उतारने के लिए भी सलामी गारद की तैनाती फिजूलखर्ची है। 2018 में हमने राजभवन के दरबार हॉल, राष्ट्रगान के लिए पुलिस बैंड, सलामी गारद, राजदंड, खौलती गर्मी में कोट जैसी अंग्रेजी जूठन और सामंती फिजूलखर्ची के खिलाफ लिखा था। 2015 में हमने सलामी गारद, राज्यपाल के लिए पुलिस बैंड, और ऐसे तथाकथित वीवीआईपी लोगों के लिए सडक़ों पर ट्रैफिक रोकने के खिलाफ लिखा था, और उस वक्त के छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने अपने लिए ट्रैफिक रोकने पर जनता से माफी भी मांगी थी। यह संपादकीय हमने महाराष्ट्र सरकार द्वारा सलामी प्रथा खत्म करने के मौके पर लिखा था। 2020 में हमने ऐसी ही सामंती प्रथाओं को लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की घोषणा पर लिखा था कि वे गार्ड ऑफ ऑनर खत्म करने वाले हैं। उन्होंने उनके खड़ी कर दी गई सलामी गारद को खत्म करने की घोषणा की थी, और हमने हेमंत सोरेन की तारीफ में यह लिखा था। उसमें हमने पुलिस बैंड के ऐसे दिखावटी और सजावटी इस्तेमाल के खिलाफ भी लिखा था कि राज्यपाल की ऐसी झूठी शान के लिए लाखों रूपए महीने खर्च किए जा रहे हैं, जो गर्व की नहीं, शर्म की बात है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने यह तय किया है कि मंत्रियों और बड़े अफसरों को औपचारिक रूप से दी जाने वाली सलामी, गार्ड ऑफ ऑनर को बंद कर दिया जाए। इसके पहले कई दूसरे राज्य यह फैसला लेकर उसे लागू कर चुके हैं क्योंकि कहीं पहुंचने वाले मंत्री या आला अफसर के इंतजार में दर्जन-दो दर्जन पुलिसवाले एक अलग किस्म की पोशाक में दिन-दिन भर इंतजार करते हैं ताकि आने वाले तथाकथित अतिमहत्वपूर्ण व्यक्ति को सलामी दी जा सके, ताकि उनके अहंकार शांत हो सके। 2019 में ओडिशा ने यह फैसला लागू कर दिया था, 2018 में राजस्थान ने, और 2015 में महाराष्ट्र ने सलामी की प्रथा खत्म कर दी थी। खैर, जब जागे तभी सबेरा। हम इस किस्म की सामंती प्रथाओं को खत्म करने के लिए दशकों से लिखते चले आ रहे हैं। प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने अपने लिए महामहिम शब्द का इस्तेमाल खत्म करवाया था, और बाद में उनके देखादेखी, शायद मजबूरी में मन मारकर, राज्यपालों को भी इस मोह को छोडऩा पड़ा था।
कम्प्यूटर की मेहरबानी से पिछले कुछ बरसों के हमारे संपादकीय एक जगह इकट्ठा हैं, और हमारे सामने 2014 का एक संपादकीय है जिसमें दागियों को मंत्री बनाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, और उसमें हमने लिखा है कि दागियों को सलाम करने वाली सरकारी सलामी गारद वाला लोकतंत्र कभी गौरवशाली नहीं हो सकता। 2012 में एक संपादकीय में हमने लिखा था कि राष्ट्रपति भवन से लेकर राजभवनों, और अदालतों तक सामंती प्रतीक खत्म करने चाहिए, और राज्यों के राजभवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक दरबार हॉल जैसे शब्द हटाने चाहिए। इसी के साथ हमने लिखा था कि राज्यपाल के कार्यक्रमों के शुरू और आखिर में राष्ट्रधुन बजाने के लिए पुलिस का एक पूरा बैंड ही उनके साथ सफर करता है, और पूरे वक्त यही एक काम करता है। गांधी के देश में ऐसी सामंती फिजूलखर्ची खत्म होनी चाहिए। इसी संपादकीय में हमने सलामी गारद के खिलाफ भी लिखा था। 2017 में हमने फिर दरबार हॉल, झंडा फहराने और उतारने की औपचारिकता, सलामी गारद, राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की घुड़सवार पलटन जैसी सामंती और अहंकारी फिजूलखर्ची के खिलाफ लिखा था। उसी साल एक और संपादकीय में हमने राज्यपाल के साथ चलने वाले पुलिस बैंड, और देश में सलामी गारद की प्रथा खत्म करने के बारे में लिखा था कि राजा के साथ गाने-बजाने वाले और चारणभाट की तरह के जो लोग चलते थे, वह राजशाही के दिनों में ही ठीक लगता था। 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ प्रवास के समय एक कलेक्टर के चिलचिलाती धूप में धूप का चश्मा लगाने पर मुख्य सचिव द्वारा दिए गए नोटिस के खिलाफ लिखा था कि इतनी धूप में चश्मा न लगाने, और बंद गले का कोट पहनने का यह रिवाज अंग्रेजों की छोड़ी गई गंदगी है, और हिन्दुस्तान को इसे सिर पर ढोना बंद करना चाहिए। हमने उसमें लिखा था कि जहां पुलिस की कमी से विचाराधीन कैदियों को अदालतों तक नहीं ले जाया जाता, बरसों तक बिना सुनवाई कैदी जेल में रहने को मजबूर रहते हैं, वहां सलामी के लिए पुलिस का इस्तेमाल पूरी तरह अलोकतांत्रिक और हिंसक है, ऐसे लोग किसी सलामी के हकदार भी नहीं हो सकते जो कि देश की गरीब जनता के पैसों से इस अंग्रेजी केक की जूठन को लोकतंत्र के फ्रिज में संभालकर रख रहे हैं। 2023 में हमने संपादकीय में लिखा था कि कुपोषण और गरीबी से लदे हुए इस देश में राजभवनों में पुलिस बैंड, और सलामी गारद जैसे सामंती इंतजाम खत्म होने चाहिए, और झंडा फहराने या उतारने के लिए भी सलामी गारद की तैनाती फिजूलखर्ची है। 2018 में हमने राजभवन के दरबार हॉल, राष्ट्रगान के लिए पुलिस बैंड, सलामी गारद, राजदंड, खौलती गर्मी में कोट जैसी अंग्रेजी जूठन और सामंती फिजूलखर्ची के खिलाफ लिखा था। 2015 में हमने सलामी गारद, राज्यपाल के लिए पुलिस बैंड, और ऐसे तथाकथित वीवीआईपी लोगों के लिए सडक़ों पर ट्रैफिक रोकने के खिलाफ लिखा था, और उस वक्त के छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने अपने लिए ट्रैफिक रोकने पर जनता से माफी भी मांगी थी। यह संपादकीय हमने महाराष्ट्र सरकार द्वारा सलामी प्रथा खत्म करने के मौके पर लिखा था। 2020 में हमने ऐसी ही सामंती प्रथाओं को लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की घोषणा पर लिखा था कि वे गार्ड ऑफ ऑनर खत्म करने वाले हैं। उन्होंने उनके खड़ी कर दी गई सलामी गारद को खत्म करने की घोषणा की थी, और हमने हेमंत सोरेन की तारीफ में यह लिखा था। उसमें हमने पुलिस बैंड के ऐसे दिखावटी और सजावटी इस्तेमाल के खिलाफ भी लिखा था कि राज्यपाल की ऐसी झूठी शान के लिए लाखों रूपए महीने खर्च किए जा रहे हैं, जो गर्व की नहीं, शर्म की बात है।
इसके पहले के कुछ दशकों में इस अखबार के संपादक ने जगह-जगह इस बात को जोर-शोर से लिखा था कि अंग्रेजी की छोड़ी गई गंदगी के टोकरे को सिर पर उठाकर चलने को जो भारतीय अपनी शान मानते हैं, उन्हें शर्म आनी चाहिए। महज एक कुर्सी पर कुछ वक्त तक रहने से कोई व्यक्ति जनता के पैसों की बर्बादी की कीमत पर सलामी के हकदार कैसे हो सकते हैं? सरकारी अमले का ऐसा बेजा इस्तेमाल उन कर्मचारियों के मनोबल को भी तोड़ता है, और जनता के पैसों की तो अंधाधुंध आपराधिक बर्बादी करता ही है। हमने अखबार में लिखने के अलावा निजी मुलाकातों में भी कई मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों को यह बात सुझाई थी, लेकिन सादगी की थोड़ी-बहुत शुरूआत भी प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन से की थी, उनके पहले एपीजे अब्दुल कलाम ने अपने निजी तौर-तरीकों में सादगी बरती थी, लेकिन आडंबर की प्रथाओं को खत्म करने की तरफ उनका ध्यान नहीं गया था।
किसी लोकतंत्र में सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं पर सवार लोगों को लालबत्ती, मोटरगाडिय़ों के काफिले जैसे निरर्थक लालच छोडऩे चाहिए। इन बातों से किसी की इज्जत नहीं बढ़ती, और ये बातें किसी कुर्सी पर काबिज रहने तक ही चलती हैं। जो सचमुच ही इज्जत के लायक रहते हैं, वे आडंबरों के मोहताज नहीं रहते। जो लोग सादगी का जीवन जीने वाले महान लोगों को अपने नेता मानते हैं, उन्हें तो कम से कम सादगी और किफायत पर अमल करना चाहिए। इस तरह के खर्च लोकतंत्र पर कलंक हैं, और सरकारों को चाहिए कि ऐसी तमाम प्रथाओं को खत्म करे।
इसके पहले के कुछ दशकों में इस अखबार के संपादक ने जगह-जगह इस बात को जोर-शोर से लिखा था कि अंग्रेजी की छोड़ी गई गंदगी के टोकरे को सिर पर उठाकर चलने को जो भारतीय अपनी शान मानते हैं, उन्हें शर्म आनी चाहिए। महज एक कुर्सी पर कुछ वक्त तक रहने से कोई व्यक्ति जनता के पैसों की बर्बादी की कीमत पर सलामी के हकदार कैसे हो सकते हैं? सरकारी अमले का ऐसा बेजा इस्तेमाल उन कर्मचारियों के मनोबल को भी तोड़ता है, और जनता के पैसों की तो अंधाधुंध आपराधिक बर्बादी करता ही है। हमने अखबार में लिखने के अलावा निजी मुलाकातों में भी कई मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों को यह बात सुझाई थी, लेकिन सादगी की थोड़ी-बहुत शुरूआत भी प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन से की थी, उनके पहले एपीजे अब्दुल कलाम ने अपने निजी तौर-तरीकों में सादगी बरती थी, लेकिन आडंबर की प्रथाओं को खत्म करने की तरफ उनका ध्यान नहीं गया था।
किसी लोकतंत्र में सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं पर सवार लोगों को लालबत्ती, मोटरगाडिय़ों के काफिले जैसे निरर्थक लालच छोडऩे चाहिए। इन बातों से किसी की इज्जत नहीं बढ़ती, और ये बातें किसी कुर्सी पर काबिज रहने तक ही चलती हैं। जो सचमुच ही इज्जत के लायक रहते हैं, वे आडंबरों के मोहताज नहीं रहते। जो लोग सादगी का जीवन जीने वाले महान लोगों को अपने नेता मानते हैं, उन्हें तो कम से कम सादगी और किफायत पर अमल करना चाहिए। इस तरह के खर्च लोकतंत्र पर कलंक हैं, और सरकारों को चाहिए कि ऐसी तमाम प्रथाओं को खत्म करे।
ट्रम्प के हाथों कमजोर होता अमरीका बाकी दुनिया के लिए बेहतर
24 दिसंबर 2025
अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के पहले कार्यकाल से ही नैतिकता और ईमानदारी से उन्होंने एक सुरक्षित दूरी बनाकर रखी थी। कोई भी ऐसे सिद्धांत रिश्वत लेने, उसके एवज में नाजायज सरकारी फायदे देने, और मोटा भुगतान करने वालों को तरह-तरह की कुर्सियां देने, जुर्म से माफी देने में आड़े न आ जाएं, इसका ट्रम्प ने पूरा ध्यान रखा था। इसके अलावा भारत की कुनबापरस्ती की सबसे बुरी मिसालों को भी कुचलते हुए ट्रम्प ने अनैतिक कुनबापरस्ती का जो टॉवर खड़ा किया, वह ऊंचाई में न्यूयॉर्क के ट्रम्प टॉवर से भी ऊंचा था। अपने इस दूसरे कार्यकाल में एक बरस पूरा होने के पहले ही, कार्यकाल के पहले दिन से ही ट्रम्प ने जिस अंदाज में राष्ट्रपति भवन को जैसी खुली सौदेबाजी का अड्डा बना लिया है, उसके सामने दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों की मिसालें भी खासी ईमानदार लगने लगी हैं। अभी खबर है कि ट्रम्प को अरबों डॉलर देकर उसके एवज में अमरीका की कई कंपनियों ने मोटा फायदा कमाया, कई लोगों ने अपने परिवार के जुर्म के लिए राष्ट्रपति के विशेषाधिकार से माफी पा ली, कई लोगों के खिलाफ चल रहे केस खत्म कर दिए गए। बेशर्मी का हाल यह है कि राष्ट्रपति भवन में एक बड़े हिस्से को तोडक़र ट्रम्प एक जलसाघर बना रहा है, और इसके लिए निजी कंपनियों और कारोबारियों से पैसा लिया गया है। ट्रम्प इसे गर्व की बात बता रहा है कि कोई देश उसे दुनिया का एक सबसे महंगा हवाई जहाज तोहफे में दे रहा है, और कोई राष्ट्रपति भवन में होने वाले नाजायज निर्माण के लिए चंदा।
जो लोग अमरीका को एक अच्छा लोकतंत्र मानते थे, उन सब लोगों को समय-समय पर अमरीकी राष्ट्रपति निराश करते रहे। नाजायज काम करने वाला ट्रम्प पहला और अकेला नहीं है, इसके पहले भी राष्ट्रपति की माफी की अपार ताकत के इस्तेमाल के लिए भ्रष्टाचार सामने आते रहा है। अमरीकी संविधान के मुताबिक इस विशेषाधिकार के खिलाफ न संसद कुछ कर सकती, और न ही अदालतें दखल दे सकतीं। पता नहीं संविधान बनाने वाले लोगों को क्या यह खुशफहमी थी कि अमरीकी राष्ट्रपति नैतिक और सज्जन लोग होंगे? अगर उन्हें ऐसी कोई गलतफहमी थी, तो आज ट्रम्प यह साबित कर रहा है कि राष्ट्रपति को चंदा देकर ओहदा पाना, या माफी पाना अमरीकी इतिहास में आज सबसे अधिक संगठित है, और सबसे अधिक बेशर्म भी है। ट्रम्प ने अपने गोल्फ रिजॉट्र्स में दुनिया भर के रईसों और उनके दलालों का स्वागत करना आज भी जारी रखा है। दूसरी सरकारों से किसी तरह का फायदा उठाने पर अमरीकी कानून में रोक है, लेकिन ट्रम्प धड़ल्ले से यह करते आया है।
भारत तो कुनबापरस्ती के लिए बदनाम देश है। लेकिन ट्रम्प ने अपनी बेटी इवांका, और दामाद जेरेड कुशनर को अमरीका की विदेश नीति में भारी-भरकम जिम्मेदारी दे रखी है, और जिन देशों के साथ इन लोगों की कंपनियों का कारोबार है, उन देशों के साथ अमरीका के रिश्तों में भी ट्रम्प के कुनबे की सीधी औपचारिक दखल है। ट्रम्प का दामाद अभी रूस में यूक्रेन के साथ युद्धविराम की संभावना पर बात करने के लिए अमरीकी सरकार की तरफ से जाकर बैठकों में शामिल रहा, कभी वह मध्य-पूर्व में जाकर इजराइल और फिलीस्तीन के बारे में कई देशों की सरकारों के साथ बैठकों में शामिल होता है। यह एकदम ही अभूतपूर्व और असाधारण नौबत है, जब राष्ट्रपति और उनका कुनबा हर किस्म के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में भी लगे हुए हैं, और ऐसे देशों के साथ जंग जैसे मुद्दों पर सरकारी बैठकों में भी शामिल हैं। राष्ट्रपति कारोबार में हैं, और उनका कारोबारी परिवार राष्ट्र की नीतियों और संबंधों को तय करने में शामिल है। अमरीकी विश्लेषकों का मानना है कि वहां का संविधान बनाते हुए राष्ट्रपति की इस दर्जे की बेशर्मी की कल्पना नहीं की गई होगी। अब अमरीका में यह बहस चल रही है कि क्या लोकतंत्र सिर्फ नियमों से चलता है, या फिर उसके लिए चरित्र भी जरूरी है।
डॉनल्ड ट्रम्प ने यह मिसाल भी पेश की है कि अपने राजनीतिक विरोधियों, और अपने से असहमत लोगों से बदला किस तरह से निकाला जाता है। उनके खिलाफ जितने तरह के मुकदमे अमरीका में बरसों से चल रहे हैं, उन मामलों की जांच करने वाले, संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के खिलाफ भी ट्रम्प ने ढेरों मुकदमे दर्ज करवा दिए हैं, और संवैधानिक संस्थाओं को वह गैरकानूनी और नाजायज कार्रवाई के लिए खुलकर सार्वजनिक बयानों में भडक़ाता और उकसाता है। अपने कार्यकाल के इस पहले ही साल में उसने लोकतंत्र, संविधान, नैतिकता, और सार्वजनिक जीवन के सामान्य शिष्टाचार, इन सबको जिस तरह कुचलकर रख दिया है, उससे लगता है कि अमरीका ने पिछली एक सदी में दुनिया पर जितने बम बरसाए थे, उससे अधिक बम आज अमरीकी घरेलू लोकतंत्र पर बरस रहे हैं। ट्रम्प जिस तरह की मनमानी कर रहा है, जितना भ्रष्टाचार कर रहा है, जितनी तानाशाही कर रहा है, उतनी किसी बहुत बेशर्म अफ्रीकी तानाशाह ने भी नहीं दिखाई थी, और न ही किसी अरबी तेल साम्राज्य के तानाशाह ने।
इस पूरे सिलसिले से अमरीकी लोकतांत्रिक प्रणाली की यह बुनियादी कमजोरी और खामी भी खुलकर सामने आई है कि उसका संविधान किसी बेशर्म और अनैतिक राष्ट्रपति को तानाशाह बनने का पूरा मौका देता है। यह जरूर है कि ऐसा करने वाला ट्रम्प पहला व्यक्ति है, लेकिन वह आखिरी भी हो, ऐसा तो कहीं संविधान में लिखा नहीं है। एक परले दर्जे का भ्रष्ट, सनकी, बेदिमाग और बददिमाग कमीना इंसान दुनिया के सबसे ताकतवर देश की दशकों की दोस्तियों को पल भर में खत्म कर दे रहा है, और दशकों की दुश्मनी को गले लगा ले रहा है। इसने अमरीका की अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही, और उसके सामाजिक सरोकार को कूड़े की टोकरी में डाल दिया है, और गरीब देशों में पिछले एक बरस में ही टीके और इलाज के बिना करोड़ों जिंदगियां खतरे में पड़ गई हैं, क्योंकि अमरीका ने अंतरराष्ट्रीय मदद से हाथ खींच लिया है। ट्रम्प ने पर्यावरण बचाने की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को ग्रीन-झांसा करार देते हुए अमरीकी योगदान को खत्म कर दिया है, और उसके देखादेखी अब दुनिया के दूसरे कई संपन्न और विकसित देश भी जिम्मेदारी से पीछे हट गए हैं।
अमरीका बाकी दुनिया के लिए चाहे दुनिया का सबसे ताकतवर देश बना हुआ है, लेकिन अमरीका के भीतर वहां के लोकतंत्र का खोखलापन ट्रम्प के इस कार्यकाल से जिस तरह और जिस हद तक उजागर हुआ है, वह बेमिसाल है, उसने साबित किया है कि पूरी दुनिया में अमरीका ने अपने फौजी हमलों में जिन दसियों लाख बेकसूरों को मारा है, उनकी आह में कुछ तो असर है ही। अमरीका आज एक पूरी तरह कमजोर और असफल लोकतंत्र साबित हुआ है, और ऐसी मनमानी करने वाले देश के साथ यह अच्छा ही सुलूक है, एक कमजोर अमरीका से एक मजबूत दुनिया की संभावना पैदा हो सकती है, और उसके महत्व को कम नहीं आंकना चाहिए। मुम्बई में अंडरवल्र्ड के सबसे बड़े सरगना, दाऊद इब्राहिम के कमजोर होने से मुम्बई का भला ही हुआ होगा। एक कमजोर अमरीका का मतलब दुनिया में इंसाफ बढऩा भी होगा।
बुढ़ापा खराब करने के नीतीशियापन की बातें...
23 दिसंबर 2025
बुढ़ापा खराब कैसे किया जाए इसमें किसी को पीएचडी करनी हो, तो वे नीतीश कुमार को गाइड बना सकते हैं। अपने खुद के बुढ़ापे में जिस तरह की हरकत उन्होंने एक मुस्लिम महिला डॉक्टर का हिजाब खींचकर की है, वह हरकत अब भी जारी है। अभी जब मीडिया ने उनसे यह सवाल किया कि क्या वे उस महिला से माफी मांगेगे तो वे एक गजल की लाइन की तरह मुस्कुराकर चल दिए। किसी बच्चे को भी यह सिखाया जाता है कि अगर गलती हो जाए तो उस पर अफसोस जाहिर करते हुए माफी मांग लेना चाहिए। उर्दू तो जुबान ही ऐसी है जिसमें बात शुरू करने के पहले ही, मुआफ कीजिएगा कह दिया जाता है। अंग्रेजी में बोलचाल में जिस शब्द का दिनभर में सबसे अधिक इस्तेमाल होता है, वह सॉरी है। लेकिन हिंदी के मिजाज में, खासकर बोलचाल में न तो धन्यवाद है, और न ही सॉरी है। फिर राजनीति में आने के बाद तो लोग शिष्टाचार के गिने-चुने शब्द भी भूल जाते हैं, और बद्जुबानी करने को अपना हक मान लेते हैं। जिस नीतीश को उनके समर्थक सुशासन बाबू कहते थकते नहीं हैं, उनका हाल यह है कि सरकारी कार्यक्रम के मंच से एक मुस्लिम महिला डॉक्टर को नियुक्तिपत्र देते हुए वे लोगों के सामने ही उसके चेहरे से हिजाब खींच लेते हैं, और आम हिंदुस्तानी मर्दानगी की शान बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री का सारा आभामंडल इस पर एक हैवानी हँसी हँसने लगता है। ऐसी सार्वजनिक घटना का चारों तरफ धिक्कार होने के बाद भी यह बेहया आदमी मीडिया के सवालों पर मुस्कुराकर चले जा रहा है। उसने यह खबर अब तक सौ जगह पढ़ ली होगी कि उसकी अश्लील हिंसा की शिकार महिला ने यह तय किया है कि इस बर्ताव के बाद वह अब इस नौकरी को करेगी ही नहीं। एक महिला, एक अल्पसंख्यक महिला, सरकारी नौकरी में आने जा रही एक महिला की जिंदगी को इस तरह और इस हद तक बर्बाद करने के बाद भी जिस सुशासन बाबू के मुंह पर मुस्कुराहट अभी बाकी है, वह बेशर्मी, और बुढ़ापा बर्बाद करने पर औरों को पीएचडी करवा ही सकता है।
अब नीतीश से उबरें और आम बात करें, तो आम हिंदुस्तानी लोगों में अपने अधिकारों के लिए जिस दर्जे का स्वाभिमान रहता है, और दूसरों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को लेकर जिस दर्जे की हिकारत रहती है, वह देखने लायक रहती है। सार्वजनिक जगहों पर लोग अधिक से अधिक बद्तमीजी की नुमाइश इस तरह करते हैं कि अपने मां-बाप की सिखाई बातों की ट्रॉफी सामने रख रहे हों। लोग दूसरों के प्रति इतना खराब व्यवहार करते हैं कि उनकी अपनी मां-बहनों को हिचकियां आने लगती हैं क्योंकि बद्तमीजी के शिकार लोग जुबान से न सही, मन से तो गालियां देने ही लगते हैं। एक बुढ़ऊ एक मुस्लिम महिला का हिजाब खींचते हुए यह भी नहीं सोचता कि उसके दिल से निकली हुआ आह वह कैसे झेलेगा? कबीर तो कह गए हैं कि मरे चाम की आह से लौह भस्म हो जाए, यहां तो जिंदा मुस्लिम महिला का चाम है, उसकी आह को एक अदना सा मिस्टर पलटू कितना झेलेगा? लेकिन अभी ऊपर के पैरा में ही हमने तय किया था कि हमको बात इस आदमी से परे करना है।
हिंदुस्तानियों को व्यवहार सिखाने की खास जरूरत इसलिए नहीं पड़ती कि इस देश का माहौल बद्तमीजी का आदी है, और जब ये बद्तमीज किसी सभ्य देश जाते हैं, तो पलभर में सभ्यता और शालीनता की खाल ओढ़ लेते हैं। उन्हें मालूम है कि दूसरे देशों में बद्तमीजी का नतीजा जूते खाना होगा, और धकियाकर उस देश से निकाल दिया जाना होगा, और ट्रंप का देश हो तो फिर हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़कर मालवाहक विमान में चढ़ाकर देश में कैदी की तरह उतरना होगा, इसलिए बाहर जाते ही लोग हर 50 कदम पर थूकना, और हर मोड़ पर मूतना बंद कर देते हैं। यही सुशासन बाबू किसी मुस्लिम देश में गए हुए होते, तो अब तक इस हरकत सरकार की तरफ से कानूनी रूप से सर तन से जुदा हो चुका रहता। इस बात को नीतीश से जोड़कर न देखा जाए, बल्कि हिंदुस्तानियों की बद्तमीजी की आम आदत, और संस्कृति से जोड़कर देखा जाए, जिससे मुक्त होने पर लोगों को हीनभावना होने लगती है कि वे कहीं पश्चिमी संस्कृति के बुरे प्रभाव का तो शिकार नहीं हो रहे हैं?
हिंदुस्तान के लोगों को अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी कुछ अंग्रेजों, या दूसरे यूरोपीय लोगों के मातहत कई चीजें सीखने की जरूरत है। सार्वजनिक जगहों पर बर्ताव कैसा किया जाए, कैसे अपनी जिम्मेदारियों का बोझ उठाया जाए, कैसे दूसरों के अधिकारों का सम्मान किया जाए, कैसे महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों, कमजोर और बीमारों का ख्याल रखा जाए, ऐसी बहुत सी बातें हिंदुस्तानियों को सीखने की जरूरत है। इस देश में विश्वगुरू बन चुके जो लोग हैं, उन्हें यह सलाह खटक सकती है कि उन्हें भी दुनिया में किसी और से कुछ सीखने की जरूरत है। फिर भी उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि इस देश से करोड़ों विश्वगुरुओं को दुनिया के दूसरे देशों में जाकर रोजी-रोटी कमानी पड़ रही है, और उसके मुकाबले उन देशों से हिंदुस्तान में महज ताजमहल और कुतुब मीनार जैसे स्मारक देखने के लिए लोग आते हैं, यहां रोजी-रोटी कमाने नहीं। इसलिए रोजी-रोटी के लिए जिन देशों में जाना पड़ सकता है, उन देशों की तमीज-तहजीब की जानकारी ले लेने, और उसे मजबूरी में अपना भी लेने को सीख लेनना चाहिए। इससे हमारी बुनियादी नीतीशियापन की भावना पर चोट आ सकती है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय संभावनाओं को देखते हुए पश्चिम की कुछ चीजों को जहर का घूंट पीते हुए भी सीख लेना चाहिए, जिसमें एक तो यह है कि जरा सी भी चूक होते ही मुंह से चार बार सॉरी निकलना चाहिए। लेकिन फिर भी जिन लोगों को बुढ़ापा आ जाने पर भी उसे खराब करने का जरिया न मिला हो, तरीका न सूझा हो, उन्हें इस मौके को छोड़ना नहीं चाहिए, सोशल मीडिया पर चारों तरफ तैर रहे बिहारी बुढ़ऊ के वीडियो देखने चाहिए, और अपना बुढ़ापा खराब करने की हसरत पूरी करने की एक आसान राह पा लेना चाहिए।
हम आज यहां पर नीतीश के जिक्र से बात सिर्फ शुरू करना चाहते थे, लेकिन उनका वीडियो है, उनकी जानलेवा और दिलकश-बेशरम मुस्कुराहट है कि बार-बार आंखों के सामने वही सब घूमने लगता है, और आंखें दिमाग पर असर डालती हैं, और आज की बातचीत घूम-फिरकर फिर बिहार के सुशासन पर आती रही। लेकिन इसे सिर्फ नीतीश पर केंद्रित न मानें, इसे देश के बाकी विश्वगुरुओं पर भी लागू मानें, और बुढ़ापा बिगाड़ने की एक और, सबसे ताजा, मौलिक, सबसे असरदार, और बंपर साइज की प्रो-मैक्स या अल्ट्रा तरकीब सीखें।






