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भतीजा बाहर, भतीजी की बारी, माया की बसपा, या कुनबे के भीतर लूडो का खेल?

13 सितंबर 2026

 

एक वक्त देश की एक बड़ी दलित पार्टी रही बसपा की मुखिया मायावती भारतीय राजनीति में अपनी पार्टी की सुप्रीमो कहलाती हैं। लोकतंत्र में जहां पर निर्वाचित अध्यक्ष होने चाहिए, वहां पर एक कुनबे की यह पार्टी मायावती से ही शुरू हुई और मायावती की अगली पीढ़ी पर ही यह दम तोड़ दे रही है। कहने के लिए मायावती के राजनीतिक गुरु रहे कांशीराम ने इस पार्टी को शुरू किया था, लेकिन जल्द ही उनकी राजनीति में उनकी चहेती मायावती आगे बढ़ते-बढ़ते इस पार्टी पर काबिज हो गईं। बीते कुछ दशक लोगों ने मायावती को कभी भाजपा, तो कभी समाजवादियों के साथ समझौते करके सत्ता पर बने रहते देखा, लेकिन बीते एक दशक, या कुछ अधिक से मायावती साल में जारी होने वाले दो-चार बयानों से परे घरघुस्सू नेता हो गई हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें चौखट से बाहर निकलते ही दरवाजे की एक तरफ ईडी और दरवाजे की दूसरी तरफ सीबीआई के भूत हवा दिखाते हैं। उनकी दहशत इस हद तक बढ़ी हुई है कि हाल के कई चुनावों में उन्होंने बसपा को खुद होकर हाशिए पर ले जाते-ले जाते फुटपाथ के किनारे की नाली में डाल दिया है। उनकी पूरी राजनीति अब केंद्र सरकार की मेहरबानी पर चल रही सांसों तक सीमित हो गई है। यह एक अलग बात है कि लंबे समय से दलित राजनीति की उत्तर भारत में अगुवा बनी हुई मायावती और उनकी बसपा कागजों पर भी जिंदा हैं और किसी दूसरी दलित पार्टी के लिए मैदान खाली नहीं कर रहे हैं। न खुद दलितों के लिए कुछ करना, न और किसी को दलित अगुवाई करने देना।

अब मायावती के एक दूसरे पहलू पर चर्चा जरूरी है। वैसे तो हमें खुद ही याद नहीं पड़ता कि मायावती पर इसके पहले कितने बरस पहले लिखने की नौबत आई थी, या एक दशक ही हो गया है। फिलहाल पिछले कुछ दिनों में उन्होंने अपने कुनबे को चर्चा में लाने की हरकतें इतनी तेज कर दी हैं कि अब उन पर लिखे बिना रहना कुछ मुश्किल हो रहा है। निहायत गैरजरूरी और अप्रासंगिक पारिवारिक हरकतों को वे देश की राजनीति की मुख्यधारा में एक बड़े घटनाक्रम की तरह पेश कर रही हैं और इसीलिए इस परले दर्जे की कुनबापरस्ती पर चर्चा जरूरी है। बीते बरसों में मायावती के भाई आनंद कुमार का नाम खबरों में तब-तब आया है और तभी आया है जब मायावती ने उसके बेटे आकाश आनंद को कभी संगठन में अपना वारिस बनाया और कभी इस विरासत से बेदखल करने की मुनादी की। अपने भतीजे को लेकर मायावती के विरासत के फैसले इतनी बार भीतर-बाहर हो चुके हैं कि उन्होंने रेल के भाप इंजन के पिस्टन को भी मात कर दिया है। अब उन्होंने ताजा मुनादी की है कि वे अपने दोनों भतीजों को राजनीतिक पदों से बाहर रखने का अंतिम फैसला ले चुकी हैं। इसके साथ ही मायावती ने इसी भाई की बेटी दीपिका आनंद के लिए पार्टी में भूमिका की गुंजाइश छोड़ी है। उन्होंने कहा कि दोनों भतीजों को कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी, जबकि जरूरत पडऩे पर भतीजी दीपिका अपने पिता आनंद कुमार की मदद कर सकती है। इसके कुछ दिन पहले ही अपने भतीजे के अलावा मायावती ने भतीजे के ससुर को भी पार्टी से भीतर-बाहर करने का एक सिलसिला चला रखा था और अब मायावती की सार्वजनिक चेतावनी के बाद भतीजा-ससुर ने अपने को बसपा की राजनीति से परे रखने की घोषणा की है।

दिलचस्प बात यह है कि मायावती खुद पूरी जिंदगी से मुलायम सिंह की कुनबापरस्ती, कांग्रेस की कुनबापरस्ती के ऊपर खुले हमले करती आई हैं और दूसरी तरफ अपने भाई आनंद कुमार को उन्होंने बसपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना रखा है, और भतीजे को वे विरासत पर लाती और वहां से हटाती रही हैं। अब उनका एक दावा यह भी हैरतअंगेज है कि उन्होंने बसपा को कुनबापरस्त नहीं बनने दिया और अपने भाई-बहन, रिश्तेदारों को सांसद-विधायक या मंत्री जैसे पदों से दूर रखा। भतीजे और उसके ससुर को लेकर सत्ता देने और छीनने की जिस तरह की सार्वजनिक घोषणाएं मायावती राष्ट्रीय सुरक्षा के फैसलों की तरह घोषित करती आई हैं, उससे वे मनोवैज्ञानिकों के लिए शोध का एक दिलचस्प विषय बनती हैं। लेकिन कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त...! आकाश आनंद का एक छोटा भाई ईशान आनंद, मायावती का सगा भतीजा ही है। उसे संगठन में 2 को छोड़ सभी राज्यों का अगुवा बना दिया गया और इस घोषणा में मायावती ने यह भी कहा कि वह अपनी रिपोर्ट अपने पिता आनंद कुमार को देगा। 7 सितंबर की इस घोषणा को पलटकर मायावती ने 12 सितंबर को यह नया संविधान रचा कि आनंद कुमार के दोनों बेटों को बसपा में कोई राजनीतिक पद नहीं मिलेगा। दोनों भतीजों को लात मारकर बाहर करने के बाद उनकी बहन दीपिका को जिम्मेदारी देने की घोषणा भी की। जिस मायावती को देश में दलित-विरोधी ताकतों से लडऩा था, वह मायावती अपनी घरेलू पार्टी के भीतर अपने ही मानसिक विरोधाभासों से लड़ते जिंदगी गुजार रही हैं।

भारत में पहले भी कहा जाता है कि बैठा बनिया (दुकानदार) क्या करे, इधर का डिब्बा-उधर करे। जैसे कोई किराना व्यापारी ग्राहकी न रहने पर दुकान के ही सामानों को इधर-उधर करता है, वैसा ही मायावती कोई चुनाव लडऩे, कोई राजनीति करने के बजाय कुनबे के भीतर उठा-पटक में लगी हैं। किसी सुबह बड़े भतीजे ने चाय खराब बनाई, तो पार्टी छोटे भतीजे को दे दी, और छोटे भतीजे ने नींबू-शहद में शहद ज्यादा मिला दिया तो पार्टी भतीजी को दे दी। फिर इस उठा-पटक में इन भतीजे-भतीजी का पिता, मायावती का भाई भी है, और एक समधी, भतीजा-ससुर भी है। उत्तर भारत की जुबान में अगर कहें तो यह गजबै पार्टी है। मायावती की पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी को देखें, तो उसके चार पैर, एक सूंड और एक पूंछ-ये सब आपस में ही एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। माया का हाथी कभी किसी पैर पर खड़ा हो रहा है, कभी किसी दूसरे पैर पर, कभी सूंड पर, तो अब दुम पर खड़ा करने की घोषणा की गई है। जिस भारत में दलित आबादी 16 फीसदी से अधिक है, उसकी उत्तर भारत की सबसे बड़ी पार्टी बसपा का यह बुरा हाल है। एक वक्त साइकिल पर घूम-घूमकर बसपा को खड़ा करने वाले कांशीराम ने अपनी चहेती को इस पार्टी का वारिस इसलिए तो नहीं बनाया था कि वह जांच एजेंसियों की दहशत में आकर पार्टी को घर के भीतर खेले जा रहे लूडो जैसा बना दे। घरेलू लूडो में भी खेल के नियम तो लागू होते हैं, लेकिन इस मायावी दुनिया में तो देश में दलितोद्धार के योद्धा इस आधार पर बनाए और मिटाए जाते हैं कि उस सुबह मायावती का मिजाज कैसा है।

हमारा यह मानना है कि जिस देश में तमिलनाडु जैसी परिपक्व दलित राजनीति होती आई है, जिस देश में बाबा साहेब अंबेडकर ने दलितों में नवजागरण का महाभियान कामयाब किया, उस देश में दलित राजनीति को एक कुनबे के भीतर खाने की मेज पर सीमित कर देना और एक सनकी की सनक के रहम-ओ-करम पर छोड़ देना, यह दलितों का बहुत बड़ा अपमान है। आज देश के कानून में दलितों के अपमान करने के खिलाफ जो कानून बने हैं, वे बड़े कमजोर हैं, वरना हमारा यह मानना है कि मजबूत दलित संरक्षण कानून के तहत मायावती के इन फैसलों को दलित समुदाय का अपमान मानते हुए मायावती पर कार्रवाई का प्रावधान रहना चाहिए था। एक महिला जिसने उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में एक से अधिक बार मुख्यमंत्री रहते हुए अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की फसल ही खड़ी कर दी थी, जिस महिला ने अपने जीते-जी अफगानिस्तान की बुद्ध प्रतिमाओं जैसी विशालकाय पाषाण प्रतिमाएं बनवा ली थीं, उस महिला ने आज दलितों की राजनीतिक चेतना को कुचलकर रख दिया है। हमारा मानना है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों से घिरी हुई मायावती दलित-चेतना की सबसे बड़ी दुश्मन बन गई हैं। और उत्तर भारत में, हिंदी प्रदेशों में इसका कोई विकल्प बनना जरूरी है। शायद भाजपा इस नौबत में छुपी संभावनाओं को समझ रही है, इसीलिए वह दलित-संत रयदास के गांव की मिट्टी कलश में लेकर सिर पर चढ़ाकर पूरे देश में गांव-गांव जा रही है।

(Daily Chhattisgarh)  

माँ को मिलती है अपने गर्भस्थ शिशु से रिटर्न गिफ्ट, ये रिश्ता क्या कहलाता है!

6 सितंबर 2026

 

दुनिया की अधिकतर संस्कृतियों में माँ के अपने बच्चों से ऐसे खास रिश्ते का जिक्र रहता है जैसा कि परिवार में किसी और का, पिता का भी अपने बच्चों से नहीं हो सकती। बच्चों के संदर्भ में अक्सर कहा जाता है कि माँ तो माँ ही होती है। अपनी आखिरी साँस तक वह अपने बच्चों के लिए लगी ही रहती है। जिन घरों में खाना पूरा नहीं पड़ता, वहां हर बच्चे के खा लेने के बाद ही अमूमन माँ कुछ खाती है। लेकिन अभी इस रिश्ते को लेकर भावनाओं से परे शरीर विज्ञान की भी एक दिलचस्प जानकारी सामने आई है, जो कि बताती है कि किस तरह यह रिश्ता वैज्ञानिक आधार पर भी बहुत खास रहता है, ऐसा खास जैसा कि बच्चों का उनके पिता से नहीं रह सकता।

अभी कल ही जन्माष्टमी निकली है। कृष्ण को जन्म देने वाली माँ, देवकी अलग थी, और पाल-पोसकर बड़ा करने वाली माँ यशोदा थी। आज भी लोकगीतों से लेकर धार्मिक कथाओं तक यशोदा को ही माँ माना जाता है। समाजशास्त्र इसे सामाजिक मातृत्व कहता है, जिसका महत्व खून के रिश्ते से कहीं अधिक होता है। कुछ और उदाहरण देखें, जब नवजात बच्चे रोते हैं, या माँ के सीने से लगते हैं, तो माँ के शरीर में ऑक्सीटोसिन, जिसे आम बोलचाल में ‘लव हार्मोन’ कहा जाता है, का स्राव बढ़ता है। यह हार्मोन न केवल दूध के बहाव को शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि माँ और बच्चे के बीच जुड़ाव तथा देखभाल से जुड़े व्यवहारों में भी इसकी भूमिका होती है। यह एक विशुद्ध बायोकेमिकल रिश्ता है। 

हाथियों और कुछ दूसरे सामाजिक स्तनधारियों में केवल जन्म देने वाली माँ ही बच्चे की देखभाल नहीं करती, बल्कि झुंड की अन्य मादाएं भी बच्चे की सुरक्षा, देखभाल और सामाजिक सीखने में भूमिका निभाती हैं। यानी मातृत्व का व्यवहार केवल जन्म देने वाली माँ तक सीमित नहीं रहता।

अब हम शरीर विज्ञान पर आ जाएं, तो गर्भावस्था के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि माँ और उसके गर्भस्थ बच्चे के बीच सिर्फ खून, ऑक्सीजन और पोषक तत्वों का ही आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि कुछ जीवित कोशिकाएं भी एक-दूसरे के शरीर में पहुंचती हैं। भ्रूण की कुछ कोशिकाएं माँ के शरीर में चली जाती हैं और गर्भावस्था खत्म होने के बाद भी वहां बनी रह सकती हैं। इन्हें fetal microchimeric cells कहा जाता है। इन कोशिकाओं को माँ के अलग-अलग ऊतकों में पाया गया है और कुछ में अलग-अलग तरह की कोशिकाओं में बदलने की क्षमता के संकेत भी मिले हैं। 

इसके बाद चूहों पर हुए अध्ययनों ने इस कहानी को और दिलचस्प बनाया। वैज्ञानिकों ने पाया कि माँ के शरीर में चोट होने पर भ्रूण से आई कुछ कोशिकाएं घायल हिस्से की ओर पहुंच सकती हैं। 2012 में चूहों पर हुए एक महत्वपूर्ण अध्ययन में माँ के हृदय को नुकसान पहुंचाया गया। इसके बाद भ्रूण से आई कुछ कोशिकाएं घायल हृदय के हिस्से में पहुंचीं और उनमें दिल की मांसपेशी तथा रक्तवाहिकाओं से जुड़ी कोशिकाओं जैसी विशेषताएं दिखाई दीं। इसका मतलब यह नहीं है कि इंसान के दिल के दौरे का इलाज बच्चे की कोशिकाएं कर देती हैं, लेकिन इससे यह संभावना जरूर सामने आई कि ये कोशिकाएं माँ के शरीर की मरम्मत की प्रक्रिया में भूमिका निभा सकती हैं। 

चिकित्सा विज्ञान ने इस पूरे सिलसिले को fetal microchimerism कहा है। आसान भाषा में कहें तो गर्भावस्था के दौरान माँ और बच्चे के बीच कुछ कोशिकाओं का आना-जाना होता है और बच्चे की कुछ कोशिकाएं माँ के शरीर में लंबे समय तक रह जाती हैं। यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि गर्भावस्था में होने वाली स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है। दिलचस्प बात यह है कि यह आदान-प्रदान सिर्फ बच्चे से माँ की ओर नहीं होता, माँ की कुछ कोशिकाएं भी बच्चे के शरीर में पहुंचती हैं।

अब थोड़ी और दिलचस्प बात करें। गर्भावस्था के दौरान प्लेसेंटा और गर्भनाल के जरिए माँ के शरीर से ऑक्सीजन और दूसरे पोषक तत्व गर्भस्थ शिशु तक पहुंचते ही हैं। लेकिन इसी दौरान कुछ जीवित कोशिकाएं भी माँ और बच्चे के बीच आ-जा सकती हैं। बच्चे की कुछ कोशिकाएं माँ के रक्त प्रवाह में आ जाती हैं। बच्चों का जन्म हो जाने के बाद भी इनमें से कुछ कोशिकाएं माँ के शरीर से पूरी तरह खत्म नहीं होतीं। वे माँ के रक्त, अस्थि-मज्जा और दूसरे ऊतकों में पाई गई हैं और बच्चे के जन्म के दशकों बाद तक उनका पता लगाया जा सकता है। 

इन कोशिकाओं की एक खासियत यह है कि उनमें अलग-अलग तरह की कोशिकाओं में बदलने की क्षमता के संकेत मिले हैं। इसी वजह से वैज्ञानिक इन्हें स्टेम-सेल जैसी क्षमता वाली कोशिकाओं के रूप में भी देख रहे हैं। अलग-अलग अध्ययनों में माँ के शरीर में पहुंची इन कोशिकाओं को अलग-अलग प्रकार के ऊतकों की कोशिकाओं जैसी विशेषताओं के साथ पाया गया है। लेकिन यह कहना अभी सही नहीं होगा कि ये कोशिकाएं माँ के शरीर को जिस तरह की कोशिका की जरूरत हो, उसी में बदल जाती हैं। इस बारे में वैज्ञानिक अभी शोध कर रहे हैं। 

अगर माँ के शरीर में कहीं चोट या सूजन होती है, तो कुछ प्रयोगों में पाया गया है कि भ्रूण से आई कोशिकाएं उस चोट वाली जगह की तरफ अधिक संख्या में पहुंच सकती हैं। त्वचा की चोट के मामले में भी ऐसी कोशिकाएं पुराने घाव के निशान में पाई गई हैं और उनमें त्वचा तथा दूसरी कोशिकाओं से जुड़ी विशेषताएं दिखाई दी हैं। इससे यह संभावना मजबूत हुई है कि ये कोशिकाएं माँ के शरीर की मरम्मत में किसी न किसी रूप में मदद कर सकती हैं। 

वैज्ञानिकों के सामने इसकी कम-से-कम दो संभावनाएं हैं। एक यह कि कुछ कोशिकाएं खुद उस अंग की कोशिकाओं जैसी बनने लगती हैं, जहां चोट लगी है। दूसरी यह कि वे ऐसे रासायनिक संकेत और मरहमी असर छोड़ती हैं, जो माँ की अपनी कोशिकाओं को मरम्मत का काम करने में मदद करते हैं। अभी यह पूरी तरह साफ नहीं है कि अलग-अलग परिस्थितियों में ये कोशिकाएं किस तरह काम करती हैं। यानी माँ जिस बच्चे को 9 महीने अपने गर्भ में पालती हैं, उस बच्चे की कुछ कोशिकाएं लंबे समय तक माँ के शरीर में बनी रह सकती हैं और चोट या सूजन की स्थिति में उसके शरीर की मरम्मत में भूमिका निभा सकती हैं। 

इस तरह माँ और उसके बच्चों के बीच का रिश्ता जन्म के बाद भी, दूध पीना छूट जाने के बाद भी, बचपन के लालन-पोषण खत्म हो जाने के बाद भी वैज्ञानिक स्तर पर बने रहता है। बीते एक दशक से अधिक वक्त से इन वैज्ञानिक तथ्यों पर विज्ञान में तो सोच-विचार अधिक हो रहा है, लेकिन आम लोगों की चर्चाओं में माँ-बच्चों के प्रेम की जटिलताओं को वैज्ञानिकता से परे ही मान लिया जाता है, और जटिल वैज्ञानिक तथ्यों की अधिक चर्चा नहीं होती।

माँ और उसके बच्चों के बीच के प्रेम को वैज्ञानिक भाषा में और समझें, तो जब माँ अपने बच्चे से बात करती है, तो बच्चा उसकी आवाज से परिचित होने और उसके प्रति प्रतिक्रिया करने की क्षमता रखता है। माँ की आवाज, उसका स्पर्श और उसके शरीर से निकटता बच्चे की भावनात्मक और शारीरिक स्थिरता में भूमिका निभाते हैं। खासकर माँ और बच्चे के सीधे त्वचा-स्पर्श के दौरान बच्चे की दिल की धड़कन, शरीर का तापमान और दूसरे शारीरिक संकेतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। 

अस्पतालों में जब बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं तो डॉक्टर उन्हें बिना कपड़ों के माँ के नंगे सीने से चिपकाकर रखने की सलाह देते हैं। इसे कंगारू माँ-बच्चे जैसी देखभाल, यानी कंगारू केयर कहा जाता है। इसमें बच्चे को माँ के सीने से सीधे त्वचा के संपर्क में रखा जाता है। यह सिर्फ माँ-बच्चे के भावनात्मक जुड़ाव के लिए ही नहीं, बल्कि समय से पहले या कम वजन के पैदा हुए बच्चों के शरीर का तापमान बनाए रखने, उन्हें स्थिर रखने और उनके जीवित रहने की संभावना बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन अब ऐसे बच्चों के लिए कंगारू माँ-बच्चे जैसी देखभाल को जन्म के तुरंत बाद शुरू करने की सलाह देता है। 

दिलचस्प वैज्ञानिक तथ्य यह है कि माँ का शरीर बच्चे को गर्म रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कुछ अध्ययनों में माँ के सीने के तापमान और बच्चे के शरीर के तापमान के बीच ऐसा संबंध देखा गया है, जिसमें माँ के शरीर की गर्मी बच्चे को अपना तापमान बनाए रखने में मदद करती है। यानी माँ का शरीर बच्चे के लिए एक तरह का प्राकृतिक तापमान नियंत्रक बन जाता है। हालांकि इसे यह कहना ठीक नहीं होगा कि माँ का शरीर किसी मशीन की तरह बच्चे का तापमान नापकर अपना तापमान बदलता है। 

यह बात भी लंबे समय से वैज्ञानिक रूप से दर्ज है कि जन्म से पहले के अंतिम तीन महीनों में बच्चा माँ की कोख में रहते हुए ही उसकी आवाज, उसके उतार-चढ़ाव और बोलने की शैली से परिचित होने लगता है। गर्भावस्था के आखिरी महीनों में भ्रूण बाहरी आवाजें सुन सकता है और अध्ययनों में माँ की आवाज के प्रति उसकी अलग प्रतिक्रिया भी दर्ज की गई है। यानी माँ की आवाज से बच्चे का परिचय जन्म के बाद शुरू नहीं होता, उसकी शुरुआत गर्भ में ही हो चुकी होती है।

कुछ समाजशास्त्रियों, और विचारकों का यह भी मानना है कि किसी भी समाज के मूल्य, भाषा, नैतिकता, और संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने में परिवार और बच्चे की देखभाल करने वाले लोगों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिन बच्चों को शुरूआती बरसों में माँ या किसी स्थिर और संवेदनशील लालन-पोषण से एक सुरक्षित और स्थिर भावनात्मक जुड़ाव मिलता है, उनमें आगे चलकर सामाजिक संबंधों और भावनाओं को संभालने की क्षमता बेहतर होने की संभावना अधिक देखी गई है।

आज के इस कॉलम को लिखने के लिए मैंने तरह-तरह के एआई से रिसर्च करके कई वैज्ञानिक तथ्य निकाले हैं, इसलिए आज इस बारे में मेरे अपने विचारों के लिए जगह नहीं बची है। वैज्ञानिक तथ्य ही इतना कुछ साबित कर रहे हैं कि विचारों की मेरी अटकलें उनके मुकाबले कहीं नहीं टिकतीं, इसलिए आज मुझे अपनी जुबान रोककर विज्ञान को जगह देना ही पड़ रहा है। जिन लोगों को मेरी खुद की सोची और लिखी गई बातों का इंतजार रहता है, उनके लिए इस हफ्ते इस कॉलम के लिए मेरे पास इससे बेहतर कुछ और नहीं हो सकता था, इस बार इसी से पेट भरें, और अपनी माँ का पहले से कुछ अधिक सम्मान करें। 

(इसे लिखने में AI जेमिनी से कुछ जानकारी ढूंढी गई, और कॉलम लिखने के बाद chatgpt से क्रॉसचेक करवाकर कुछ संशोधन किए गए)। 

(Daily Chhattisgarh)  

सोनिया के संस्मरणों से निकली बात मेरे संस्मरणों तक दूर तलक चली गई

 30 अगस्त 2026

सोनिया गांधी के संस्मरणों की किताब लबालब खबरों में है। पेंगुइन नाम के एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक की भारतीय शाखा ने कहा जा रहा है कि इस किताब को छापने से मना कर दिया है क्योंकि सोनिया के लिखे हुए में संपादन या फेरबदल की मंजूरी नहीं दी गई थी। अभी इन दोनों पक्षों की तरफ से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है, प्रकाशक ने एक गोलमोल बयान जारी किया है जो कि कांग्रेस के कई नेताओं के आरोपों पर एक कारोबारी का स्पष्टीकरण है। पेंगुइन ने किताब प्रकाशन के कारोबार में जरूरी संपादन और लेखक और संपादक के बीच के कामकाज के तरीके को गिनाया है, जिसे समझे बिना भी लोग तरह-तरह की बातें कर सकते हैं। फिलहाल तो सोनिया गांधी की यह किताब अपने डिजिटल संस्करण में शायद दस दिन में ऑनलाईन बिक्री के लिए आ रही है, और यह तय है कि दुनिया के कई बड़े प्रकाशक उनकी किताब छापने के लिए एक पैर पर खड़े होंगे। ऐसे में हम सोनिया की किताब को लेकर और खबरों, उसके और अंशों का इंतजार करेंगे, लेकिन साथ-साथ नेताओं या सार्वजनिक जीवन के दूसरे लोगों के संस्मरणों, या उनकी आत्मकथा के बारे में थोड़ी सी चर्चा होनी चाहिए। 

मैं जाने कितने ही दशक से इस बात की वकालत करते आ रहा हूं कि जिन लोगों ने सार्वजनिक जीवन में लोगों के बीच जगह बनाई या पाई है, उन्हें अपने संस्मरण जरूर ही लिखने चाहिए। यह बात समाज के प्रति उनकी जवाबदेही की भी रहती है, हालांकि यह बात हमेशा बहुत सहूलियत की नहीं रहती। चुनिंदा संस्मरण लिखना तो एक किस्म से आसान रहता है, लेकिन जब आत्मकथा लिखी जाती है तो उसके तो बहुत सारे पहलू बड़ी असुविधा के रहते हैं। आलमारी से निकलकर कंकाल मानो सामने नाचने लगते हैं। अपने ही कभी किए हुए, जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे कुकर्म मुंह चिढ़ाने लगते हैं कि हमारा जिक्र छोड़ तो नहीं दोगे? कई काली यादें आकर खड़ी हो जाती हैं कि मैं हूं न!  ऐसे में आत्मकथा भला कोई कैसे लिखे? और फिर जब आप किसी भी पेशे में ऊपर, और ऊपर होते चले जाते हैं, जब आप शिखर पर पहुंच जाते हैं, तो मानो आपका गमछा ही हवा में उडऩे लगता है, कुछ भी अनदेखा नहीं रह जाता, और जिंदगी के इस लंबे सफर में जितने लोगों ने आपको पहले देखा हुआ है, वे सब आप पर कुछ न कुछ कहने के हकदार हो जाते हैं। इतनी बड़ी जवाबदेही के साथ लिखना अपने खुद के लिखे हुए पर सवाल उठाने सरीखा रहता है, जितने जवाब आप लिखने का सोचते हैं, कई बार उससे अधिक सवाल उठ जाते हैं। 

लेकिन गांधी से लेकर हिटलर तक, और गोडसे से लेकर आज के किसी संन्यासी तक, हर किसी को यह हक रहता है कि वे अपनी बात लिखकर, या बोलकर जाएं। और फिर यह हक ही नहीं रहता, यह एक जिम्मेदारी भी रहती है। मैं बीते कुछ बरसों से मुझे मिलने वाली कविता या साहित्य की किताबों के लिए मना करते आ रहा हूं कि मैंने उन्हें आमतौर पर नहीं पढ़ पाता। दूसरी तरफ कोई दोस्त किताबों की अपनी भीड़ कम करते रहते हैं, तो मैं उनसे बेशर्मी से यह अनुरोध कर लेता हूं कि अगर वे किसी की आत्मकथा या जीवनी, संस्मरण या यात्रा-वृत्तांत किसी को देना चाहते हैं, तो मैं हूं न। अब और किसी किस्म की किताबों को अधिक पढऩे की न हसरत रह गई, न जरूरत रह गई। बस यही लगता है कि अपने खुद के संस्मरण लिखना हो जाए, तो जिम्मेदारी का एक कतरा पूरा हो जाएगा। इसीलिए कभी कोई मुझसे बात करना चाहते हैं, छापने के लिए या किसी शोधकार्य के लिए इंटरव्यू लेना चाहते हैं, तो मैं खुशी-खुशी वक्त निकाल लेता हूं कि अपने देखे-सुने, और अपने गुजरे-भोगे हुए का कुछ लेखा-जोखा तो छोड़ जाऊं। 

सार्वजनिक जीवन में लोगों को शोहरत मिलती है, कुछ को दौलत भी मिलती है। ऐसे में समाज के प्रति उनकी जवाबदेही रहती है कि वे अपने देखे हुए की यादें छोड़ जाएं। जो चर्चित लोग लिख नहीं पाते, उनके लिए भी हमेशा से ही अदृश्य लेखकों की सुविधा रहते आई है जिनमें उनकी कही हुई बातों को सुनकर कोई लेखक लिखते हैं। यह लिखना भी अलग-अलग कई दर्जों का रहता है, कुछ लोग कही हुई बातों को ज्यों का त्यों लिखकर, या टाईप करके दे देते हैं, और वे टाइपिस्ट या स्टेनोग्राफर अधिक रहते हैं, वे घोस्ट राइटर के तबके में नहीं गिने जाते। दूसरी तरफ घोस्ट राइटर रहते हैं जो बुनियादी रूप से लेखक रहते हैं, और जो बातों को सुनकर अपने हिसाब से किताब पूरी कर देते हैं, यह उस प्रमुख व्यक्ति और घोस्ट राइटर के बीच का रहता है कि उसका नाम जाए, या न जाए। यह पूरी तरह से आपसी सहमति की बात रहती है। 

जीवनी या संस्मरण की एक और किस्म रहती है जिसे अधिकृत जीवनी कहा जाता है। इसे लेखक लिखते तो अपने हिसाब से हैं, लेकिन जिस व्यक्ति की जीवनी है, उसके सक्रिय सहयोग से जानकारी जुटाई जाती है, और इसलिए किताब छपने के पहले उसे दिखाई जाती है, और वे उस किताब में लिखी बातों से सहमत रहते हैं। यह दर्जा स्टेनोग्राफर से ऊपर का रहता है, उसके भी ऊपर के घोस्ट राइटर के ऊपर का रहता है, और स्वतंत्र जीवनी लेखक के नीचे का रहता है। स्वतंत्र जीवनी लेखक वो होते हैं जो कि किसी की जीवनी उन्हें दिखाए बिना भी लिखते हैं, और इसके साथ यह खतरा भी जुड़ा रहता है कि जिसकी जीवनी है, वे ही उसकी कई बातों का खंडन-मुंडन कर दें। 

यह तो मैंने कुछ अधिक प्रचलित विधाएँ गिनाई हैं, और इसकी जरूरत इसलिए पड़ रही है कि सोनिया गांधी की यह किताब उनकी खुद की लिखी किताब की तरह ही सामने आ रही है, इसमें हो सकता है कि कोई टाइपिस्ट रहे हों जिन्होंने उनके डिक्टेशन को सुनकर टाईप कर दिया हो। यह भी हो सकता है कि उनके भरोसेमंद कोई प्रेत लेखक हों जिन्होंने उनकी बातें सुनकर फिर अपनी जुबान में उसे ढाला हो। जो भी हो, किसी की अधिकृत जीवनी सामने आए, आत्मकथा या संस्मरण सामने आएं, मुझे वह बहुत अच्छा इसलिए लगता है कि उसके साथ विश्वसनीयता का एक दर्जा जुड़ा रहता है। यह विश्वसनीयता तथ्यों की नहीं, बल्कि कथन की रहती है। किसने कहा है, यह साफ-साफ दिखता है, सच कहा है या नहीं कहा है, यह तय करना पाठकों का भी अधिकार रहता है, या फिर जिन लोगों का जिक्र ऐसी किताबों में रहता है, उनका भी रहता है। 

मैं एक लेखक की हैसियत से किसी भी तरह के लेखन को बुरा नहीं मानता। अपनी आत्मकथा लिखना तो अच्छी बात है ही, किसी और के लिए डिक्टेशन लेना भी बुरी बात नहीं है, उसे उसी तरह लिखकर, या टाईप करके दे देने से मुझे लेखक का दर्जा तो नहीं मिलता, लेकिन रूबरू सुनने का एक सुख और अनुभव जरूर मिलता है। अगर प्रेत लेखक की तरह किसी की आत्मकथा, या उसके संस्मरण लिखने का मौका मिलता है, तो या तो नाम मिलता है, या दाम मिलता है, और सबसे अच्छी नौबत रहती है कि दोनों ही मिल जाएं। किसी की पूरी जीवनी अपने दम पर लिखना खासा मुश्किल काम रहता है, उसके लिए बरसों की रिसर्च लगती है, और फिर भी विवाद का खतरा तो बने ही रहता है। इसलिए कुछ समझौता करके कुछ लोग एक अधिकृत जीवनी लिखते हैं, ताकि जिसकी जीवनी है, उससे तो विवाद कम से कम न रहे, बाकी तो कोई भी अच्छी किताब, या अच्छा लेखन पूरी तरह विवादमुक्त हो नहीं सकते। 

आज इस कॉलम को लिखते हुए मुझे मेहनत जरा भी इसलिए नहीं लग रही है कि मैं इन्हीं सब विधाओं को बीते कुछ बरसों से पढ़ रहा हूं, और इन दिनों एक बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति के छोड़े गए आत्मकथ्यात्मक नोट्स को एक आत्मकथा, या जीवनी में ढालने का काम भी कर रहा हूं। एक और दूसरे महत्वपूर्ण व्यक्ति के बहुत से इंटरव्यू करके अभी इस विचार-विमर्श के बीच हूं कि क्या इस पर मैं उनके लिए उन्हीं के नाम से प्रेत लेखन कर दूं? उन्होंने इस पहले विकल्प को खारिज कर दिया। अब हम दो दूसरे विकल्पों के बीच में फंसे हुए हैं कि यह उनकी अधिकृत जीवनी बने, या फिर मैं उनकी सहमति, और अनुमति के बिना भी अपनी मर्जी की और सामग्री तय करके पूरी तरह से एक स्वतंत्र जीवनी लिखूं। इन दो किताबों में वक्त जाने कितना लगेगा, लेकिन दोनों अलग-अलग किस्म से लिखी जानी हैं, और इन्हें पूरा करते हुए मैं कुछ अनुभवसंपन्न हो जाऊंगा, और कुछ आर्थिकसंपन्न हो रहा हूं, यह तो तय है ही। जिस काम को मैं मुफ्त में भी खुशी-खुशी करता, उस काम के लिए भुगतान पाना कितनी अच्छी बात है! अब सोनिया गांधी से किसी को भुगतान मिला है या नहीं, ये तो वे ही बता सकती हैं, या पाने, या न पाने वाले बता सकते हैं। पता नहीं यह बात कभी उजागर होगी या नहीं, लेकिन इतना तो तय है कि सोनिया की किताब से कई दूसरी बातें जरूर उजागर होंगी, और यही करना सार्वजनिक जीवन में मिले सम्मान से उऋण होना होता है। 

(Daily Chhattisgarh)  

परमाणु छतरीतले एकजुट होते मुस्लिम देशों से खतरा कम नहीं

23 अगस्त 2026

दुनिया में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई ऐसी घटनाएं या बातें होती हैं जिन पर बारीकी से नजर रखना जरूरी रहता है। आज भी एक बीज रहती हैं, और आगे चलकर जाने किस दिन खाद-पानी पाकर, किसी खास मौसम में वे जमीन फोडक़र पौधे में तब्दील हो जाएं, और वक्त के साथ पेड़ बन जाएं। पाकिस्तान, सऊदी अरब, और तुर्की के बीच पिछले दिनों मक्का में जो फौजी समझौता हुआ, उसके मुताबिक इनमें से किसी एक देश पर हुए हमले को ये तीनों देश अपने पर हुआ हमला मानेंगे। लोगों को याद होगा कि योरप और अमरीका वाले नाटो की भी कुछ इसी तरह की संधि है कि उनमें से किसी एक पर हमले को सारे नाटो देश अपने पर हमला मानेंगे, और इसीलिए रूस इस बात पर अड़ा हुआ है कि यूक्रेन नाटो का सदस्य न बने। यूक्रेन पर रूस के हमले की बुनियादी वजह यही है कि वह अपनी सरहद से लगकर एक और नाटो देश नहीं चाहता, और यही वजह है कि बाकी नाटो देश एक गैरसदस्य यूक्रेन की इतनी फौजी मदद कर रहे हैं कि पांच बरस बाद भी वह रूस के मुकाबले टिका हुआ है। 

अब अगर तीन देशों के बीच यह मक्का समझौता हुआ है, तो इसके पीछे की कुछ बुनियादी बातों को समझना जरूरी है। और समझौते के कुछ हफ्ते बाद अब इस पर लिखना कुछ अधिक जरूरी इसलिए हो चला है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के करीबी सहयोगी हुमायू कबीर ने एक समाचार एजेंसी से कहा है कि मक्का समझौते के इन तीन देशों के साथ आर्थिक, या फौजी ढांचे में शामिल होने की संभावनाओं पर बांग्लादेश सकारात्मक रूख रखता है। इन तीन देशों के बीच समझौते की जगह पर भी गौर करना जरूरी है कि वह मक्का में हुआ है जो कि मुस्लिमों के लिए पूरी दुनिया में सबसे पवित्र धार्मिक जगह मानी जाती है। दूसरी बात यह कि ये मुस्लिम देश इजराइल के खिलाफ अलग-अलग समय पर अलग-अलग बातें कह चुके हैं। बांग्लादेश ने अभी-अभी भारत का प्रस्तावित और घोषित दौरा रद्द किया है, और सऊदी अरब के दौरे के बारे में कहा गया है। 

भारत ने फिलहाल इतना ही कहा है कि वह पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। दुनिया के बहुत से विश्लेषकों का यह मानना है कि यह फौजी समझौता सीधे-सीधे भारत के खिलाफ न होने पर भी पाकिस्तान को बहुत मजबूत बनाने वाला है क्योंकि इन तीनों देशों में से वही अकेला परमाणु हथियार संपन्न देश है, बल्कि वह दुनिया का अकेला परमाणु हथियार वाला मुस्लिम देश है। यह समझौता इजराइल की फिक्र को बढ़ाने वाला है, क्योंकि दुनिया के इस हिस्से में अब इजराइल के मुकाबले किसी और देश के पास परमाणु बम चाहे न हो, परमाणु ताकत वाले देश के साथ तुर्की, और सऊदी अरब का यह फौजी समझौता तो हुआ ही है। बांग्लादेश अगर आगे-पीछे इसमें और जुड़ जाता है, तो यह इस्लामिक नाटो बनने की दिशा में एक और कदम हो सकता है। 

यह पूरा सिलसिला दुनिया में एक ऐसे वक्त हो रहा है जब अमरीका मध्य-पूर्व के देशों में अपनी सुरक्षा गारंटी पर खरा नहीं उतर रहा है। ईरान के साथ जंग में अमरीका ऐसा बुरा फंसा है कि उसके हमलों के जवाब में ईरान अड़ोस-पड़ोस के उन तमाम देशों पर फौजी हमले कर रहा है जहां पर अमरीकी फौजी ठिकाने हैं, या जहां से अमरीकी फौजी विमान उड़ान भर रहे हैं, जहां से मिसाइलें छोड़ी जा रही हैं। लोगों को यह समझ आ गया है कि अमरीका ने इस पूरे इलाके के देशों से किसी सलाह-मशविरे के बिना सिर्फ इजराइल के झांसे में आकर, उसके उकसावे को मानकर ईरान पर एक ऐसा हमला कर दिया है जिसे खत्म कर पाना या छोड़ पाना उसके बस के बाहर है। नतीजा यह है कि ईरान के हमलों से जख्मी बाकी पेट्रोलियम-गैस से मोटी कमाई करने वाले देश ईरानी मिसाइलें झेल रहे हैं, और अमरीका झूठे-बावले दावे करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा है। जिस तरह योरप के देश, और पूरे का पूरा नाटो आज अमरीका के बिना अपनी पूरी ताकत खड़ी करने में लगा हुआ है, कुछ उसी तरह मध्य-पूर्व के देश अब अमरीका से परे अपने फौजी पांवों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में मक्का को मानने वाले तमाम मुस्लिम देशों के एक साथ आने की एक कागजी संभावना तो बनती ही है। 

आज यह सवाल भी उठ रहा है कि अमरीका और ईरान के बीच बातचीत के कई दौर पाकिस्तान ने मध्यस्थता करते हुए पूरे करवाए। इन दोनों ही देशों ने पाकिस्तान के योगदान को माना, यह एक अलग बात है कि पाकिस्तान में तय हुआ युद्धविराम कायम नहीं रह पाया, लेकिन इनमें से किसी देश ने पाकिस्तान पर कोई तोहमत नहीं लगाई है। इजराइल को एक देश के रूप में मान्यता भी न देने वाले पाकिस्तान को अमरीका ने अपने हाल के बरसों की सबसे नाजुक जंग में जिस तरह, और जिस हद तक इस्तेमाल किया, उसे भी पाकिस्तान का एक बढ़ा हुआ महत्व माना जा रहा है। भारत के साथ हमदर्दी रखने वाले अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का भी यह कहना है कि फिलीस्तीन पर इजराइली हमलों के पूरे दौर में पाकिस्तान खुलकर बोलता रहा, और भारत इजराइल के साथ खड़े रहा। इस वजह से भी मुस्लिम देशों के बीच पाकिस्तान की एक नई जगह बनी। इसी तरह तुर्की भी खुलकर इजराइल के खिलाफ आज भी खड़ा हुआ है, और उसने भी मुस्लिम दुनिया में एक फौजी ताकत की जगह बना ली है। सऊदी अरब की आर्थिक ताकत को तो सब लोग जानते ही हैं। ऐसे में यह गठबंधन परमाणु हथियार, दूसरे आधुनिक हथियारों वाले तुर्की, और सऊदी संपन्नता का एक ताकतवर गठजोड़ है। दुनिया के दूसरे भी कुछ मुस्लिम देशों में इजराइल की बढ़ती हुई विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ चाहे-अनचाहे नाराजगी बढ़ रही है। आज हालत यह है कि ब्रिटेन, कनाडा, और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोग इजराइल की बढ़ती बस्तियों के खिलाफ सार्वजनिक बयान जारी कर रहे हैं। ऐसे में मुस्लिम देशों को शर्म खाकर भी इजराइल के खिलाफ जुबानी जमा-खर्च तो करना ही होगा। फिर मक्का समझौते के तीन देशों के साथ जुडऩे से बाकी मुस्लिम देशों को भी परमाणु हथियारों की एक छतरी हासिल हो सकेगी। 

इससे इजराइल तो तुरंत अपने पर एक खतरा महसूस करेगा, लेकिन भारत को लेकर भी कुछ विश्लेषक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब भारत पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर जैसा हमला उसी आसानी के साथ कर सकेगा? क्या ऐसी कोई फौजी कार्रवाई करने से पहले उसे मक्का समझौते के बाकी दो देशों के साथ बात नहीं करनी होगी? और क्या उस बात का कोई असर उन दो देशों पर होगा जिन्होंने परमाणु हथियार संपन्न पाकिस्तान के साथ एक लिखित औपचारिक फौजी समझौता किया है? यह भी समझना होगा कि आज जिस तरह बांग्लादेश की एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में शरण ली हुई है, और बांग्लादेश उन्हें मौत की सजा सुनाकर वापिस भेजने की मांग कर रहा है, इससे भी भारत और बांग्लादेश के बीच अभी एक बड़ा तनाव बना हुआ है। 

मुस्लिम देशों के मक्का समझौते, मुस्लिम-विरोधी इजराइल से पूरी दुनिया की बढ़ती शिकायतें, अमरीका और इजराइल की बीते दशकों से किसी न किसी मुस्लिम देश पर हमले का रिकॉर्ड, इन सबको देखते हुए अगर चाहकर, या मजबूरी में मुस्लिम देश पाकिस्तान की परमाणु छतरीतले एकजुट हो रहे हैं, तो इस बात को गौर से देखा जाना जरूरी है।

(Daily Chhattisgarh)  

आपके 2 लाख, 62 हजार वंशजों की छाती पर बोझ रहेगी यह बोतल!

 16 अगस्त 2026

आज चारों तरफ सबसे आम कचरा जो दिखाई देता है वह पानी या कोल्डड्रिंक की प्लास्टिक बोतलें हैं। समंदर के किनारे लहरों से जो कचरा किनारे आकर लगता है उसे देखें, या शहरी नालों में पानी के ऊपर तैरते हुए कचरे को देखें, ऐसा लगता है कि कचरे की दौड़ में प्लास्टिक की खाली बोतलों का कोई भी मुकाबला नहीं है। और इंसान हैं कि वे बात-बात पर कोई न कोई बोतल खरीदते रहते हैं, कई बार तो महज इसलिए कि वे खरीद सकते हैं। वे चाहें तो अपने घर से पहले की पुरानी बोतलों में पानी लेकर निकल सकते हैं, लेकिन रास्ते में गाड़ी रोककर, या बैठक की मेज पर सजी हुई बोतल का इस्तेमाल शायद इसलिए बेहतर लगता है कि गंदे पानी के बीच जीती हुई इस दुनिया में वे कारखाने का बोतलबंद पानी खरीदने, या पाने के हकदार हैं। जिस वक्त जिन नालों में प्लास्टिक का कचरा पटा हुआ है, जिसकी वजह से शहरों में बाढ़ आ रही है, उसी वक्त उन्हीं नालों के भीतर घुसकर वहां पानी के किसी टपकते हुए पाइप से बाल्टियां भरकर गरीब अपने घर के लिए पानी ले जा रहे हैं। दिल्ली के नोएडा के ऐसे ही एक नाले में छोटी-छोटी बच्चियां धार्मिक नारों वाले कपड़े पहने हुए ऐसे पाइप पर खड़े होकर वहां से बाल्टी भर-भरके ऊपर घरवालों को दे रही थीं, और इसका वीडियो फैलने पर अफसरों ने टपकते पाइप को वेल्डिंग से बंद कर दिया। नाले के ऊपर से पीने का पानी पाने का एक रास्ता बंद हो गया। आज जो लोग बोतल का पानी पीते हैं, शायद कुछ तो उनकी प्यास बुझती है, और शायद अधिक हद तक उनका अहंकार शांत होता है कि डबरी, नदी की रेत से पानी पाकर पीने वाले लोगों की दुनिया में वे नई बोतल खोलकर आधी बोतल पानी पी सकते हैं, और आधा पानी फेंक भी सकते हैं, फिल्म जाने भी दो यारों, की तरह, केक आधा खाओ और आधा फेंको।

अब मैं प्लास्टिक की बोतल की जिंदगी सोचता हूं तो यह धरती पर साढ़े चार सौ बरस तक तो बनी ही रहेगी। उसके बाद शायद इसका प्लास्टिक खत्म होने लगेगा। सुबह-सुबह मैंने यह समझने की कोशिश की, कि अगर आज मैं एक बोतल का कचरा धरती पर छोडक़र जाता हूं, तो इन 450 बरसों में मेरी औसत रफ्तार से बढऩे वाली पीढिय़ों के कितने लोगों पर वह बोझ रहेगा। मुझे खुद अंदाज नहीं था कि चैटजीपीटी, और एक-दो दूसरे एआई औजार क्या आंकड़ा बता सकते हैं। एक पीढ़ी की औसत अवधि 25 साल अगर मान लूं, तो यह 18 पीढिय़ां बनती हैं जिन पर इस बोतल का प्लास्टिक प्रदूषण का बोझ रहेगा। अब अंकगणित के हिसाब से आज की भारत की जन्मदर को देखें, तो 18 पीढिय़ों के बाद मेरे जो वारिस होंगे, वे 2 लाख 62 हजार 144 होंगे। ये आंकड़े थोड़े कम अधिक हो सकते हैं। अब लोग अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए छोडक़र जाने को एक गुमटी की जगह के पट्टे से लेकर, एक ठेले से लेकर, एक महल और कारखाने तक अधिक से अधिक इंतजाम करके जाना चाहते हैं। लोगों में विरासत छोडऩे की इसी अमर आकांक्षा को देखते हुए ही मैं प्लास्टिक की बोतल की विरासत देख रहा हूं। आज मेरी छोड़ी हुई बोतल के 2 लाख 62 हजार से अधिक वारिस हो सकते हैं, उतने लोगों के कलेजे पर यह बोझ हो सकती है, उतने लोगों की रगों में इसके विघटित प्लास्टिक का प्रदूषण घुसा हो सकता है। यह विरासत छोडऩा कैसा रहेगा? 

चैटजीपीटी से सुबह मैंने इसका हिसाब लगाने कहा कि एक औसत हिन्दुस्तानी के साढ़े चार सौ बरस बाद कितने वंशज हो सकते हैं, तो उसने कहा कि यह गिनती लगाना जायज नहीं होगा, और इससे बेहतर होगा साढ़े चार सौ बरस लिखना। मुझे यह सफाई देनी पड़ी कि हिन्दुस्तान सदियों में नहीं जीता, अपने वारिसों में जीता है। साढ़े चार सदी बाद क्या होगा इससे किसी का कुछ लेना-देना नहीं है, अपने कुनबे में कितने लोग रहेंगे, इससे सबका बड़ा लेना-देना रहता है। इसलिए आज सबसे गैरजरूरी एक प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर मैं यह हिसाब लगा रहा हूं कि विघटित होता हुआ प्लास्टिक भी अब तरह-तरह से इंसानी बदन में घुसते जा रहा है, खून की नलियों में जमने लगा है, भ्रूण के भीतर भी मिलने लगा है, और इंसानों के दिमाग में भी। इसलिए आज जिस बोतल को आप पानी पीकर फेंक दे रहे हैं, उसे अपनी 18वीं पीढ़ी की खून की नलियों में जमते हुए भी सोचकर देखिएगा। 

आज सरकार के ऊंचे स्तर पर, या छोटे दफ्तरों में भी जहां-कहीं खर्च का बजट रहता है, या ऊपरी कमाई रहती है, वहां भी, खुले पानी का चलन बंद हो गया है। हर जगह एक घूंट पानी पीने के लिए लोग एक बोतल खोलते हैं, और तीन चौथाई बोतल जूठी छोड़ भी जाते हैं। पानी की बर्बादी तो एक मुद्दा है, धरती के बदन को छेदकर भीतर से निकाले गए पानी को बर्बाद करने के अलावा इस एक-एक घूंट के लिए लोग प्लास्टिक की एक-एक छोटी बोतल इस्तेमाल करके फेंक देते हैं। यह सिलसिला शहरीकरण, सत्ता के बेजा इस्तेमाल, और सरकारी फिजूलखर्ची के साथ बढ़ते ही चल रहा है। अब संपन्नता के सामाजिक दिखावे के लिए पानी को प्लास्टिक की बोतलों में ही पेश करना जरूरी हो गया है। 

मैंने एक-दो जगह बोतल का पानी पीने से मना किया, और लाने वाले कर्मचारी से कहा कि बोतल का पानी नहीं चाहिए, पानी ग्लास में ले आओ, तो उसने बोतल के ही पानी को ग्लास में निकालकर पेश कर दिया। बड़े बंगले के कर्मचारी को यह समझ ही नहीं पड़ा कि कोई मेहमान बोतल से परहेज कर सकता है, उसे लगा कि बोतल से पानी पीने से परहेज था, इसलिए उसने बोतल से ग्लास में उंडेलकर दे दिया। हर दिन धरती पर इस तरह का कचरा इस कदर बढ़ रहा है कि अब अलग-अलग शहरों में गार्बेज कैफे खुल रहे हैं जहां कचरा बीनने वाले लोग खाली बोतलें जमा करके कुछ खाने का कूपन पा सकते हैं। यह हो चुके प्लास्टिक कचरे का एक बेहतर इस्तेमाल तो हो सकता है, लेकिन यह धरती पर बोझ तो किसी न किसी शक्ल में बन ही चुका है। 

इस सिलसिले को तोडऩे का एक बड़ा आसान तरीका है। किसी भी देश-प्रदेश में सरकारों में, राजभवनों या लोकभवनों में, अदालतों, और बड़े दफ्तरों में मुखिया पानी की अपनी बोतल लेकर चलें। एक बार यह सिलसिला शुरू होगा, तो दफ्तरों के कर्मचारियों तक अपने-आप फैल जाएगा। लेकिन जब तक सरकारी बैठकों में, मंच पर, बड़े जगहों के मुलाकातियों के लिए प्लास्टिक की बोतलें रहेंगी, तब तक वे सहूलियत से अधिक सामाजिक प्रतिष्ठा, शान-शौकत, और अहंकार का प्रतीक बनी रहेंगी। पर्यावरण के प्रति सरोकार अगर जरा भी है, तो लोगों को अपने घर-दफ्तर का साफ पानी लेकर चलना चाहिए, जो कि किसी भी फैक्ट्री के लेबल लगे पानी से बेहतर होगा। फिर यह भी है कि आज खानपान के जितने सामान नकली पैकिंग में आ रहे हैं, बेस्वाद पानी को नकली पैकिंग में नहीं बेचा जा रहा होगा, ऐसा क्यों माना जाए? इसलिए बाजार पर भरोसा करने के बजाय अपने परिवार के साफ पानी पर भरोसा करना चाहिए। 

किसी देश-प्रदेश में बोतलबंद पानी का चलन विकास का पैमाना नहीं है, वह तो इस बात का पैमाना है कि वहां सरकार की तरफ से मुहैया कराए गए पानी पर लोगों का भरोसा कितना कम है, वहां नलों का आम पानी कितना गंदा है। योरप के बहुत से देशों में बाथरूम के नल तक पर यह लेबल लगे रहता है कि यह पानी पीने के लिए एकदम सुरक्षित है। इधर बोतल से कम किसी को कुछ सुरक्षित नहीं लगता! 

चूंकि संपन्नता की नजरों में सरोकार की कोई जगह नहीं रहती, इसलिए हम विरासत की भाषा में आज की इस बड़ी मामूली सी बात को रख रहे हैं। याद रखिएगा कि आपकी 18वीं पीढ़ी के 2 लाख 62 हजार लोगों तक तो आपकी छोड़ी बोतल का प्रदूषण जाएगा ही, उसके तुरंत बाद खत्म हो जाएगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। उस वक्त हो सकता है कि आपके वंशजों के बदन में इतना प्लास्टिक पहुंच चुका हो कि उनकी मामूली सर्जरी भी प्लास्टिक सर्जरी कहलाने लगेगी, मतलब प्लास्टिक की सर्जरी! अपनी अगली पीढिय़ों पर मेहरबानी रखिए, बोतलबंद पानी से दूर रहिए, अपने मेहमानों को दूर रखिए, और अपने साथ, अपने हाथ बोतल, मतलब पानी की, घर से लेकर चलिए।

(Daily Chhattisgarh)  

निचली अदालतों के जज सुप्रीम कोर्ट के फैसले पढऩे की जहमत उठाएं...

09 अगस्त 2026

भारत की छोटी से छोटी अदालत के जज या मजिस्ट्रेट से यह उम्मीद की जाती है कि वे न केवल संविधान की मूल भावना को समझें, बल्कि कानून की प्रक्रिया को भी जानें, और जरूरत पडऩे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों, और उनमें स्थापित मान्यताओं को भी समझें। खासकर उस वक्त जब छोटी अदालतें बड़े संवैधानिक मुद्दों का जिक्र अपने फैसलों में करने लगें। संवैधानिक मुद्दों का जिक्र बिना संवैधानिक शब्दों और भावनाओं की समझ के करना जायज नहीं हो सकता। इसी तरह अदालत चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हों, अगर उसके छुए गए मुद्दों और पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट पहले अपने फैसलों से कानून की सोच स्थापित कर चुका है, तो निचली अदालतों के आदेश या फैसले कम से कम उसके खिलाफ तो नहीं होने चाहिए। फिर भी लोकतंत्र में हमें लगता है कि अदालत की व्यवस्था और प्रक्रिया के भीतर भी अगर कोई मजिस्ट्रेट या जज अपने से बड़ी अदालत से असहमति दिखाना चाहते हैं, तो उसे उन्हें असहमति के रूप में दर्ज करने का एक लोकतांत्रित अधिकार तो शायद हो सकता है, लेकिन उनके आदेश और फैसले अपने से ऊंची अदालत के अपने पर भी लागू फैसलों के खिलाफ नहीं जा सकते। 

अभी मुम्बई में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें पुलिस ने प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंसेज (टिस) के दो छात्रों की अग्रिम जमानत याचिका मुम्बई के एक सत्र न्यायालय ने खारिज कर दी। मुम्बई पुलिस ने टिस परिसर में एक कार्यक्रम के दौरान उमर खालिद और शरजील इमाम नाम के चर्चित और बरसों से बिना सुनवाई जेल में बंद आंदोलनकारियों की रिहाई के लिए नारे लगाए। इन्हें अग्रिम जमानत देने से मना करते हुए एडीजे वी.बी.बोहरा ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों में खालिद और इमाम को जमानत देने से इंकार कर दिया था, इसलिए उनकी रिहाई के लिए नारे लगाना गलत था, और छात्रों से देश के कानून का सम्मान करने की उम्मीद की जाती है। पुलिस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि टिस में दस-बारह छात्रों ने मोमबत्तियां जलाकर मानवाधिकार कार्यकर्ता स्व.जी.एन.साईबाबा की कविताएं पढ़ीं, और उमर खालिद, शरजील इमाम की रिहाई के नारे लगाकर साईबाबा को श्रद्धांजलि दी। 

अदालत ने अपने आदेश में यह जिक्र किया है कि साईबाबा को अदालत ने आतंकी मामले में बरी कर दिया था, इसलिए सिर्फ उन्हें श्रद्धांजलि देने को अवैध नहीं माना जाता। लेकिन जिन दो लोगों को अग्रिम जमानत से मना किया गया है, उनके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर कुछ माओवादियों की प्रकाशित पुस्तकों को डाउनलोड करना मिला है। और कुछ जानकारी उपकरण से हटा दी गई थी। जज ने कहा कि यह आपराधिक अपराध नहीं है, लेकिन यह उनके आचरण पर संदेह पैदा करता है, और कथित अपराध में उनके शामिल होने का संकेत देता है। जज ने लिखा कि किताब डाउनलोड करने और नारे लगाने के पीछे उनके इरादे का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है। एक दूसरी अर्जी पर जज ने कहा कि उसके मोबाइल फोन में मिली वॉट्सऐप चैट से भी पता लगता है कि उन्होंने विभिन्न स्थानों पर भाग लिया था। इसके अलावा उनके द्वारा कुछ जानकारी हटा दी गई थी। जज ने खुद ही कहा कि माओवादी संगठन की पुस्तकों को सिर्फ डाउनलोड करना अपराध नहीं है, लेकिन उनके इरादे और उनके संबंधों का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है। 

एक सत्र अदालत का यह फैसला बहुत बुरी तरह हैरान और निराश करता है। किसी विचाराधीन कैदी की रिहाई के लिए नारे लगाना लोकतंत्र में कब से अपराध होने लगा? अगर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत नहीं दी है, तो सुप्रीम कोर्ट से असहमत होना कोई जुर्म तो नहीं है! हम तो अपने अखबार में यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर कई बार अदालतों से असहमत होते हैं, लोकतंत्र में संसद या अदालत से सहमत होने की कोई बंदिश भी नहीं है। हम तो ट्रम्प जैसे लुच्चों के मामलों में भारत सरकार के रूख से भी असहमत रहते हैं, लेकिन वह भी कोई जुर्म नहीं है, लोकतंत्र ऐसी ही विविधता का नाम है। ऐसे में सेशन कोर्ट के इस आदेश से कई संवैधानिक खतरे खड़े होते हैं, और हमारा ख्याल है कि मुम्बई हाईकोर्ट में जाने पर जमानत न देने का यह फैसला खड़ा नहीं हो पाएगा। 

सुप्रीम कोर्ट पहले कई मामलों में यह कह चुका है कि जब तक अदालत दोष सिद्ध न कर दे, हर व्यक्ति निर्दोष माने जाएंगे। ऐसे में जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की रिहाई की मांग करना किसी मुजरिम को रिहा करने की मांग नहीं है। और हमारा तो तर्क यह है कि किसी मुजरिम को भी रिहा करने की मांग जुर्म इसलिए नहीं है कि देश में सबसे चर्चित बलात्कारियों की रिहाई की मांग रात-दिन सार्वजनिक रूप से नामी-गिरामी लोग करते ही रहते हैं। पुलिस ने ऐसी मांग करने वाले किसी व्यक्ति को सजायाफ्ता की रिहाई की मांग के जुर्म में तो नहीं पकड़ा है। इंदिरा की हत्या के बाद दो लोगों ने खालिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए थे, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सिर्फ नारे लगाए गए, जिनसे कि कोई हिंसा नहीं हुई, जिनसे कोई भीड़ नहीं भडक़ी, जिनसे कोई सार्वजनिक अशांति नहीं हुई, तो वह जुर्म नहीं है। ऐसे में उमर और शरजील की रिहाई का नारा कैसे जुर्म हो गया? 

इस जज ने हैरान करने की हद तक तर्कहीन बात कही है। वे खुद जिक्र करते हैं कि नक्सल साहित्य डाउनलोड करना जुर्म नहीं है, लेकिन इसके पीछे के इरादे को लेकर पूछताछ करने के लिए पुलिस हिरासत जरूरी है। जब कोई काम जुर्म नहीं है, तो उसके पीछे के इरादे की पूछताछ का हक पुलिस को कैसे मिल सकता है? और कोई जज कैसे पुलिस के ऐसे किसी कथित अधिकार को लोगों की आजादी के अधिकार के ऊपर मान सकता है? यह एक मुद्दा ही हाईकोर्ट में इस आदेश को खारिज करवाने के लायक है। 

सेशन कोर्ट ने हैरान करने की हद तक दो बातें लिखी हैं। एक तो यह कि इन छात्रों से गिरफ्तार उपकरणों में कुछ डिलीट किया गया है। हर कोई अपने कम्प्यूटर या मोबाइल फोन पर बहुत सी चीजें डाउनलोड करते हैं, बहुत सी चीजें डिलीट करते हैं। यह स्वाभाविक काम कैसे किसी जुर्म का शक करने का आधार हो सकता है? दूसरी बात यह कि किसी प्रतिबंधित संगठन की विचारधारा की किताब डाउनलोड करना कोई जुर्म नहीं है, यह बात सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सारे मामलों में साफ की हुई है। इसके बावजूद यह सेशन कोर्ट उसे मुद्दा बना रहा है, और उसे संदेह का एक आधार बता रहा है। ऐसे में तो सुप्रीम कोर्ट और संसद की लाइब्रेरी में भी ऐसा साहित्य हो सकता है, तो क्या वहां के रजिस्ट्रार या महासचिव से भी उनके इरादे पर पूछताछ की जाए? दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में प्रतिबंधित संगठनों के साहित्य को पढऩे पर कोई रोक नहीं रहती है, तानाशाही जरूर किताबों से डरती है। लेकिन इस अदालत ने एक बात और भयानक लिखी है जिसमें उसने कहा है कि ये छात्र की वॉट्सऐप चैट से यह पता लगता है कि उसने कई इलाकों में फील्डवर्क किया है। अदालत का यह जिक्र हैरान करता है क्योंकि देश के एक विख्यात समाजशास्त्रीय अध्ययन केन्द्र के छात्र अगर फील्डवर्क नहीं करेंगे, तो उनकी पढ़ाई कैसे पूरी होगी? शिक्षा के बुनियादी तत्वों को जुर्म से जोड़ देने का यह अदालती निष्कर्ष बहुत ही भयानक है।

मुम्बई के एक सेशन कोर्ट का यह आदेश हैरान करता है कि अगर विश्वविद्यालयों के मासूम छात्र-छात्राओं को भी अपने अहिंसक, लोकतांत्रिक, और पूरी तरह से गैरअराजक विचारों की भी छूट नहीं है, तो फिर देश को एक विचारहीन लोकतंत्र काफी होगा! आज जब इन तमाम मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट के अनगिनत फैसले न सिर्फ अदालतों की लाइब्रेरियों में किताबों की शक्ल में मौजूद हैं, बल्कि इनसे जुड़ी हुई खबरें रात-दिन इसके हिस्सों को बताती हैं। किसी छोटी अदालत के जज को भी अगर बड़े संवैधानिक मुद्दों को छूना है, तो उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे भारतीय न्याय प्रक्रिया में उनसे जुड़ी हुए सर्वोच्च फैसलों को तो कम से कम समझ लें। इस आदेश को तो आगे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की आँच से गुजरना होगा, लेकिन क्या आगे खड़ी उस संभावना को देखकर संतुष्ट रहा जा सकता है, जब निचली अदालत इस हद तक अलोकतांत्रिक रूख वाली हो? देश की न्याय व्यवस्था में यह काफी नहीं है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक फैसले के पलटने की संभावना बाकी है। बहुत से ऐसे लोग होंगे जिनके बस में ऊंची अदालतों तक जाने की ताकत नहीं होगी, वक्त नहीं होगा, और ऐसा करते हुए जिनकी पढ़ाई-लिखाई, या जेलों में बंद उमर और शरजील की तरह जवानी के कई बरस खराब हो सकते हैं। भारतीय न्याय व्यवस्था आदर्श होने से कोसों दूर है, यहां अभी-अभी उम्रकैद की सजा काट रहे किसी को 22 बरस बाद, तो किसी को 33 बरस बाद बेकसूर बरी किया गया है। छात्रों को फर्जी मामलों में, सत्ता से असहमत विचारधारा के आधार पर पुलिस और अदालती प्रक्रिया के माध्यम से प्रताडि़त करना पूरी तरह नाजायज और अलोकतांत्रिक है। किसी के साथ एफआईआर, जांच, मुकदमे, और निचली अदालत में लगातार बेइंसाफी के बाद उसे भरोसा दिलाना कि उनके लिए अभी तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के रास्ते खुले हैं, एक बहुत ही फर्जी किस्म का तथाकथित लोकतांत्रिक भरोसा है। 

आज पूरे देश में छात्रों की पीढ़ी से सरकारें जिस तरह हिली हुई हैं, बड़े-बड़े संगठन अपनी रणनीति दुबारा तय कर रहे हैं, वह सब देखते हुए सरकारों को फर्जी केस बनाना बंद करना चाहिए। कॉकरोच नाम का एक शब्द जिस तरह एक विस्फोट के साथ एक फुटपाथी-क्रांति में बदल गया, उससे भी सरकारों को समझ लेना चाहिए कि फर्जी केस फजीहत भी बन सकते हैं, सरकारों की खुद की फजीहत। फिलहाल तो हमें इंतजार रहेगा कि बाम्बे हाईकोर्ट सेशन कोर्ट के इस आदेश के उन पहलुओं पर क्या कहता है, जिन्हें हम आज अलोकतांत्रिक लिख रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)  

ऑनलाईन फाइलों तक जनता को पहुंच देना सरकार की जिम्मेदारी

02 अगस्त 2026

भारत में इन दिनों डिजिटल तकनीक की मेहरबानी से कई तरह के काम ऑनलाईन होते चले गए हैं। सरकार के भी, संसद या विधानसभाओं के भी, और अदालतों के भी। लोग अब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कई किस्म की कार्रवाई ऑनलाईन देख सकते हैं, वादी-प्रतिवादी यह भी देख सकते हैं कि उससे फीस लेने वाले वकील ने अदालत में कितनी मेहनत से बहस की, या नहीं की। जनता संसद और विधानसभा की कार्रवाई का कुछ हिस्सा देखकर यह जान सकती है कि उसके निर्वाचित नेता वहां पर कितनी मेहनत कर रहे हैं, या सदन में बैठते ही नहीं हैं। लेकिन सरकार में छोटी-छोटी सी जानकारी को हासिल करने के लिए लोगों को सूचना के अधिकार के तहत महीनों तक धक्के खाने पड़ते हैं क्योंकि सरकारी अमला अपने कब्जे की कोई भी जानकारी बाहर निकलने नहीं देना चाहता, क्योंकि जानकारी बाहर निकली, तो कई तरह के राज बाहर निकल जाएंगे, और राज-काज के धंधे में किसी को राजदार बनाना घाटे का सौदा होता है। 

हिन्दुस्तान में यूपीए सरकार के समय से सूचना का अधिकार लागू हुआ है, इसके लिए कई सामाजिक आंदोलनकारियों ने बड़ी मेहनत की थी, जिनमें यूपीए मुखिया सोनिया गांधी के आसपास के लोग भी शामिल थे, और उसी वक्त सूचना के अधिकार को लेकर एक कड़ा कानून बना था, जो कि संसद से इसलिए आसानी से और तेजी से पास हो गया था कि लोगों को उसका खतरा समझ नहीं आया था। अब जब सूचना का अधिकार सरकारी ढांचे में सूचना का हथियार माना जाने लगा है, तो सरकारी लोगों का रूख जनता के इस बड़े औजार के लिए एकदम बदल गया है। आरटीआई कानून बेजा इस्तेमाल होता है, यह कह-कहकर सरकार के लोगों ने इसे बदनाम करने की बड़ी कोशिशें कीं, लेकिन इसी आरटीआई से निकली जानकारी से देश-प्रदेश के कई सबसे बड़े भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ भी हुआ। 

हमने पिछले बरसों में लगातार इस बात को लिखा कि आरटीआई को राईट टू इंफर्मेशन के बजाय रिस्पॉसिबिलिटी टू इंफॉर्म किया जाना जरूरी है, ताकि जनता इसके लिए अर्जी लगाकर, एक रकम जमा कर अपने हक की जानकारी मांगने धक्के न खाती रहे। अब जब भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों में शासन-प्रशासन का बहुत सारा काम ऑनलाईन हो रहा है, एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के बीच, या एक ही दफ्तर के भीतर भी, फाइलें ऑनलाईन आती-जाती हैं, तो क्या जनता को इन फाइलों तक पहुंच देना ठीक होगा? कम्प्यूटरों की व्यवस्था में यह इंतजाम बड़ा आसान रहता है कि किसी को लिखने की छूट देना, किसी को सिर्फ पढऩे की छूट देना, और किसी को डाउनलोड करके प्रिंट करने की भी। क्या सरकार का जो-जो कामकाज सूचना के अधिकार के तहत जनता की पहुंच के भीतर का रखा गया है, क्या  सरकार खुद होकर भी उस तक ऑनलाईन पहुंच की छूट जनता को दे सकती है? उस फाइल तक, उस कागज तक जाना, उसकी प्रतिलिपि पाना जब जनता का हक है, और जब वह कागज सरकार के अपने भीतरी, घरेलू कामकाज के लिए ऑनलाईन है, तब उसे जनता की पहुंच में ला देने में कौन सी गोपनीयता खत्म हो जाएगी? 

इस बारे में दुनिया के कुछ दूसरे देशों की मिसाल ढूंढी गई, तो पता लगा कि लोकतांत्रिक देशों में पिछली आधी सदी में जगह-जगह यह सोच बढ़ी है कि सरकार नागरिकों से जानकारी छिपाने के बजाय अधिकतर जानकारी खुद सार्वजनिक करे। आज विश्व बैंक और कई लोकतांत्रिक देशों के प्रशासन-विशेषज्ञ इसे आधुनिक शासन की एक जरूरी बुनियाद मानते हैं। इस बारे में मामूली रिसर्च से पता लगा कि दुनिया में सरकारी पारदर्शिता की सबसे पुरानी परंपरा स्वीडन की है जहां 1766 में ही सरकारी दस्तावेजों तक नागरिकों की पहुंच का सिद्धांत मंजूर किया गया था, और बाद में इसे संविधान में जोड़ा गया। इसका मूल सिद्धांत यह है कि जब तक सरकार कोई कानून बनाकर किसी विशेष कारण से किसी किस्म के दस्तावेज को गोपनीय रखना जरूरी साबित न करे, तब तक हर सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक रहना चाहिए। इसके बगल के फिनलैंड में पारदर्शिता का एक नया मॉडल बनाया गया, जहां लोगों को आवेदन देने की नौबत ही न आए, इसलिए सरकार के अधिकतर दफ्तर अपने अधिकतर दस्तावेज खुद ही ऑनलाईन डाल देते हैं, जिसे देखना हो देख लें। इस बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि यह सूचना के अधिकार से भी आगे की व्यवस्था है, क्योंकि इससे सरकार पर व्यक्तिगत आवेदनों का बोझ घट जाता है। पूर्वी योरप के एक और देश एस्टोनिया में जनता अधिकतर सरकारी कामकाज ऑनलाईन देख पाती है, और इससे सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही भी बढ़ती है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की सिफारिशों में बार-बार यह कहा गया है कि सरकार जानकारी मांगने का इंतजार न करे, जो जानकारी सार्वजनिक हो सकती है, उसे खुद प्रकाशित करे। 

हमारा यह भी मानना है कि अब प्रकाशन का मतलब कागज पर कुछ छापने जैसा खर्चीला नहीं रहता, अब तकरीबन बिना किसी लागत और खर्च के सरकार अपनी सारी जानकारी ऑनलाईन कर सकती है। अब केन्द्र सरकार के एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके अधिक से अधिक राज्य ई-फाइलिंग प्रणाली पर काम कर रहे हैं। किसी जिले का कलेक्टर किसी फाइल को ऑनलाईन राजधानी में सचिव को भेज सकते हैं, सचिव उस पर अपने विभाग से ऑनलाईन जानकारी और राय ले सकते हैं, वे फाइल को वापिस नीचे या ऊपर भेज सकते हैं, और उसे मंत्री या मुख्यमंत्री तक की मंजूरी कुछ मिनटों में मिल सकती है। ऐसी तकनीकी सहूलियत के लिए पूरी की पूरी फाइल, उसके हर पन्ने को ऑनलाईन भेजा जाता है। अब जब यह पूरी जानकारी ऑनलाईन है, और जनता के सूचना के अधिकार के तहत उसे यह जानकारी कागज पर हासिल करने का हक है, तो इस हक को सीधे-सीधे फाइल पढऩे, और उसके पन्नों को डाउनलोड करके प्रिंट करने का हक क्यों नहीं दे दिया जाता? 

सरकारी गोपनीयता के हिमायती लोगों का कहना है कि जिस तरह अभी भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग के चुनिंदा टुकड़े पोस्ट करने या फैलाने पर रोक लगाई है, वैसी नौबत सरकारी फाइलों के साथ भी आ सकती है कि लोग उसके चुनिंदा पन्ने को फैलाकर सरकार, किसी अफसर, या किसी कंपनी को बदनाम करें। यह तर्क फिजूल का इसलिए लगता है कि यही काम कोई भी नागरिक सूचना के अधिकार के तहत इन्हीं सारे कागजों को हासिल करके प्रतिलिपियों के गट्ठे में से चुनिंदा पन्ने निकालकर भी कर सकते हैं। हजार पेज के जवाब में से वे पसंद के दो पैरा निकालकर एक नजरिया गढ़ सकते हैं। फिर ऑनलाईन तेजी से ऐसी पहुंच हो जाने से क्या फर्क हो जाएगा? 

फाइलों को ऑनलाईन करने के विरोधियों का यह तर्क है कि हर पल, हर फाइल तक लोगों की पहुंच रहने से उन फाइलों पर टिप्पणियां करने वाले, फैसले लेने वाले अफसरों पर एक मानसिक दबाव रहेगा, और वे खुलकर अपनी राय फाइलों पर नहीं लिख सकेंगे। इस पर, बहस के लिए, हमारा तर्क यह है कि जब ऐसी टिप्पणियों वाले पन्ने, और ऐसे फैसले सूचना के अधिकार में जनता हासिल कर ही सकती है, तो इसे ऑनलाईन मुहैया कराने का हक कौन सा अतिरिक्त खतरा खड़ा करेगा? बस यही तो है कि लोग महीनों तक धक्के खाने से बचेंगे, आरटीआई की अपीलों के सालों तक चलने वाले दौर से बचेंगे, और संविधान की भावना के अनुरूप जानकारी जल्दी पा जाएंगे, इससे अगर कोई भांडाफोड़ होना है, तो वह जल्दी हो जाएगा, कोई नया भांडा तो नहीं फूटेगा।

लोकतंत्र जानकारी मांगने का अधिकार नहीं होना चाहिए, लोकतंत्र जानकारी देने की जिम्मेदारी होना चाहिए। अभी तक यह तो हो सकता था कि सरकारी ढांचे के हर पन्ने को ऑनलाईन डालने जितनी क्षमता सरकारी अमले की नहीं है। लेकिन अब ई-फाइलिंग अनिवार्य होते चलने से चूंकि सारी फाइल ऑनलाईन है ही, इसलिए उसमें से जो फाइलें आरटीआई के तहत जनता की पहुंच के भीतर की हैं, उन्हें खोल दिया जाए। क्यों आज लोगों को सरकारी दफ्तर पहुंचकर पोस्टल ऑर्डर के साथ अर्जी लगाने पर मजबूर किया जाए, फिर महीनों तक घुमाने के बाद उन्हें अपील करने कहा जाए, और फिर अपील खारिज होने पर और ऊपर तक अपील करने कहा जाए, और फिर राज्य सूचना आयोग से अपील खारिज होने पर राष्ट्रीय सूचना आयोग भेजा जाए। देश में आरटीआई की परिभाषा में तकरीबन तमाम चीजें एकदम साफ हैं कि उन्हें जनता की पहुंच में रखा गया है, या किसी गोपनीयता या राष्ट्रीय सुरक्षा की वजह से जनता से परे रखा गया है। हम तो महज जनता की पहुंच की बातों को बिना आरटीआई प्रक्रिया के जनता की ऑनलाईन पहुंच में कर देने की बात कह रहे हैं। हिन्दुस्तान को डिजिटल करने की सोच भी सैद्धांतिक रूप से तो यही सुझाती है कि सूचना का अधिकार इस तकनीक के साथ जोड़ दिया जाए, और राजा और प्रजा, दोनों ही गैरजरूरी मशक्कत से बचाया जाए। क्या पारदर्शिता सचमुच ही इतनी डरावनी होती है कि जनता किसी फाइल को देखती रहे, तो अफसर या मंत्री उस पर सही टिप्पणी करने से डरें? इस संदर्भ में प्रेमचंद की लिखी एक विख्यात लाईन याद आती है- बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न करोगे? 

ईमान की बात को पारदर्शिता करके फिर इस वाक्य को पढक़र देखें।

(Daily Chhattisgarh)  

हर नाजुक मौका इस देश में उजागर कर देता है बड़े-बड़े दांत-नाखून...

26 जुलाई 2026

बाकी दुनिया में बीते बरसों में क्या फर्क पड़ा है, उसका तो ठीक-ठीक अंदाज नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तान में पिछले 10-15 बरस में जब भी कोई बड़ी बात होती है, बहुत से लोगों के कई किस्म के मेडिकल टेस्ट अपने आप हो जाते हैं, और उसकी रिपोर्ट सोशल मीडिया पर आने लगती है। यह दिखने लगता है कि किन लोगों की सोच क्या है, वह किस हद तक हिंसक और आतंकी हो सकती है, किस हद तक अश्लील हो सकती है, और इन लोगों का किसी भी तर्क या इंसाफ से नाता कितना टूट चुका है, दूरी कितनी बढ़ चुकी है। हम इसे मेडिकल रिपोर्ट इसलिए कह रहे हैं कि ये अपनी मानसिक हालत, और मुजरिम सोच के सुबूत खुद ही सोशल मीडिया पर बिखेरते चलते हैं, और किसी भी जिम्मेदार, लोकतांत्रिक सरकार के लिए यह बात आसान हो सकती है कि वह अपने ऐसे नागरिकों का दिमागी, और कानूनी इलाज कर सके। अब ऐसी डॉक्टरी शायद लोकप्रिय नहीं होती, इसलिए सरकार इससे बचती है। और इस वजह से यह मानसिक रोग, और मुजरिम मानसिकता दोनों बढ़ते चलते हैं। 

फिलहाल इस पर लिखने की इसलिए सूझी कि जंतर-मंतर पर अभी-अभी निपटे तिलचट्टों, और उनके साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का जो आंदोलन निपटा है, उसने भी लाखों हिन्दुस्तानियों के छुपे हुए बड़े दांतों, और बड़े-कड़े नाखूनों को उजागर कर दिया है। एक तरफ सरकार अपने पूरे अस्तित्व की एक सबसे बड़ी चुनौती झेलते हुए उससे निपटने के लिए आधी रात में भी दीये का तेल जला रही थी, दूसरी तरफ आंदोलनकारियों से नफरत करने वाले लोग नागरिक की ओढ़ी हुई खाल से बाहर आकर अपनी नफरत और अपनी हिंसा दिखा रहे थे। 

जंतर-मंतर पर आज की जुबान में चर्चित बिल्कुल ताजा पीढ़ी, जेन-जी के लोग तो राजनीतिक कटाक्ष से लेकर गंदी गालियों तक के पोस्टर लिए खड़े थे। ये उनमें से कुछ की आम जुबान में थे, और कुछ के मन की भड़ास से निकला हुआ यह कटाक्ष था। वयस्क मनोरंजन और अश्लील भाषा के हिसाब से देखें तो इस आंदोलन में इस पीढ़ी की रचनात्मक कल्पनाशीलता भी खुलकर दिख रही थी, जो कि असंसदीय तो थी, लेकिन वह आहत संवेदनाओं से उपजी हुई भी थी। जब सत्ता के करीबी इन आंदोलनकारियों को गद्दार, और टुकड़े-टुकड़े गैंग करार दे रहे थे, तो यह पीढ़ी भी अपनी जुबान में उसका जवाब दे रही थी, और दो अलग-अलग किस्म की गंदगियों या गालियों के बीच फर्क करना हमारे बस का है नहीं। 

इस आंदोलन के नारों और पोस्टरों से इस पीढ़ी की बेफिक्र और अराजक आजाद जुबान शायद पहली ही बार इस देश के लोगों के सामने इस हद तक आई है, लेकिन इनके जवाब में जो प्रतिक्रियाएं आई हैं, वे इनसे अधिक खतरनाक हैं। इस आंदोलन में शरीक होने पहुंचे 18-20 बरस के दो लडक़ों को रोककर, एक कार में पीछे की सीट पर ताकतवर-मालिकाना अंदाज में पसरा हुआ, एक धर्म की पूरी खाल ओढ़ा हुआ, उस धर्म का सारा श्रृंगार किया हुआ, एक आदमी इन लडक़ों को रोककर उनसे सबसे गंदी मुमकिन जुबान में जितनी गालियां दे रहा है, उन्हें बार-बार टटोल रहा है कि वे किसी दूसरे धर्म के तो नहीं हैं, और उन्हें मार-मारकर कैमरे पर यह कहलवा रहा है कि वे जंतर-मंतर के इन देशद्रोहियों के आंदोलन में दुबारा नहीं आएंगे। यह हिंसक हमलावर बेधडक़ अपना चेहरा उजागर करता है, और अपने धर्म की पूरी साज-सज्जा के साथ बेकसूर लडक़ों को माँ-बहन की गालियां भी बकता है। वह खुद ही इसका वीडियो बनवाता है, और इन लडक़ों को मजबूर करता है कि वे झुककर कार की खिडक़ी से अपना चेहरा दिखाएं, और कहें कि वे यहां दुबारा नहीं आएंगे। एक पूरी तरह गैरधार्मिक, लोकतांत्रिक, और शांतिपूर्ण आंदोलन के खिलाफ दिल्ली में एक धर्म का नाम लेकर बड़े-बड़े आव्हान करने वाला एक पूरी तरह साम्प्रदायिक नेता लाख लोगों का जुलूस लेकर जंतर-मंतर पहुंचने की मुनादी करता है, और इस आंदोलन को अपने धर्म के खिलाफ करार देता है। इसके पहले कि जुलूस पहुंच पाए, मजबूर सरकार को आंदोलनकारियों की सारी मांगें माननी पड़ीं, और यह धार्मिक खाल वाला नेता दूसरी घोषणा करता है कि उनके पहुंचने की घोषणा से ही तिलचट्टे डरकर भाग गए। 

जंतर-मंतर तो एक नमूना है। हर आंदोलन या हर धार्मिक-भावनात्मक मुद्दा इस देश में पैथोलॉजी लैब का काम करता है, और लोगों के दिल-दिमाग में भरी हुई नफरत, हिंसा, और अश्लीलता को उजागर करता है। सोशल मीडिया पर लोग खुद होकर अपनी ऐसी दिमागी-बीमारी की रिपोर्ट खुद दस्तखत करके पोस्ट करते हैं, वह इस बार भी हुआ, बड़े उत्साह के साथ हुआ, बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोगों ने अपने दिमागी मर्ज की रिपोर्ट पोस्ट की, क्योंकि उन्हें अंदाज नहीं था कि सरकार इतनी जल्दी झुक जाएगी, और आंदोलनकारियों की हर बात मान ली जाएगी। 

इस आंदोलन के दौर ने यह भी साबित किया कि हिन्दुस्तान को किसी नेता से अधिक जरूरत मनोचिकित्सक की है। यहां के लोग होमोफोबिक, ट्रांसफोबिक, इस्लामोफोबिक, आजादीफोबिक, नौजवानफोबिक, वयस्कफोबिक किस्म के हैं। अब आंदोलन खत्म होने के बाद भी लोगों का यह लिख-लिखकर भेजना जारी है कि इस आंदोलन में ट्रांस और समलैंगिक लोग शामिल थे, पोस्टरों पर गालियां लिख रहे थे, लडक़े साड़ी पहनकर नाच रहे थे, क्या भारत के लोग इससे सहमत हो सकते हैं? इस किस्म की शायद लाखों पोस्ट सोशल मीडिया पर आ चुकी है, कुछ दर्जन ऐसे बड़े लंबे-लंबे संदेश हमें भी वॉट्सऐप पर मिले हैं, लेकिन धर्म की खाल ओढ़े हुए इंसानों की हिंसक और अश्लील बातें, उनकी हिंसा, उनकी धमकियां इनमें से किसी को परेशान नहीं करतीं। किसी की धार्मिक भावनाएं इस बात से आहत नहीं होतीं कि उन्हीं के ईश्वर की कोई तस्वीर लगाकर, जय-जयकार करने वाले लोग उस तस्वीर के ठीक नीचे दूसरों का नाम लिखकर उन्हें माँ-बहन की गालियां देते हैं, उनकी बहन-बेटियों को बलात्कार की धमकियां देते हैं। 

मैं तो सोशल मीडिया पर हर दिन 8-10 घंटे रहता ही हूं, अपने धर्म के झंडे-डंडे सहित सोशल मीडिया पर मौजूद लोगों की हिंसा-अश्लीलता से उस धर्म के लोगों को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन उन्हें जंतर-मंतर पर नौजवान आंदोलनकारियों के वयस्क भाषा के कटाक्ष से बड़ी दिक्कत है जो कि हिंसक नहीं है, जो कि धमकी नहीं है, जो कि किसी ईश्वर का नाम लेकर नहीं है, जो कि किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। पूरी तरह से अधार्मिक रहा यह आंदोलन, धर्म और जाति के किसी भी नारे से मुक्त भी रहा, और इसके बावजूद उसे एक धर्म का विरोधी करार देते हुए लाख लोगों को वहां ले जाकर तिलचट्टों को मार डालने की खुली धमकी से किसी कोई परेशानी नहीं होती! 

भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों से, जायज या नाजायज सरकारी या राजनीतिक फैसलों से इतना तो हो रहा है कि लोग अपने गले में अपने ऐसे डीएनए का माला पहनकर भी खड़े हो जाते हैं जो बताता है कि वे पाषाण युग के हैं, और उसके बाद की सभ्यता के किसी भी विकास से वे पूरी तरह अछूते, और पूरी तरह कुंवारे हैं, उनका चरित्र एकदम शुद्ध है, और उनकी सोच अभी चक्के के आविष्कार के युग में भी नहीं पहुंची है। मैं तो एकदम खालिस नास्तिक हूं, फिर भी इस देश में धर्म के चोले, प्रतीक, और उसकी साज-सज्जा से लैस नफरती जब दूसरे धर्म के लोगों का साथ देने का आरोप लगाते हुए अपने ही धर्म के लोगों को भी माँ-बहन की गालियां बकते हैं, उन्हें पीटते हैं, तो मैं हैरान होता हूं कि कण-कण में व्याप्त उनका ईश्वर यह देखकर क्या सोच रहा होगा? आप भी सोचकर देखिए कि क्या इससे आपकी धार्मिक, या नास्तिक, किसी भी किस्म की भावना आहत होती है, या आपकी मानवीय भावनाएं अब पत्थरों के बीच दबकर जीवाश्म (फॉसिल) हो चुकी हैं?

(Daily Chhattisgarh)  

लाखों बरस उम्र का दिमाग, अब कुछ बरसों में तीनतरफा सुनामी का शिकार

  19 जुलाई 2026

दुनिया को अलग-अलग कई पहलुओं से देखा जा सकता है। अब विज्ञान के नजरिए से देखें तो कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक हवा में मौजूद पीएम-2.5 और पीएम-10 जैसे हवा में तैरते प्रदूषण के कण न केवल सांस के रास्ते बदन में घुसते हैं, बल्कि दिमाग तक पहुंचकर पार्किंसंस जैसे गंभीर स्नायुरोग का खतरा भी बढ़ा सकते हैं। इस वैज्ञानिक रिसर्च में पाया गया है कि किस आकार के प्रदूषण-कण कितने बढऩे से पार्किंसंस का खतरा कितना बढ़ता है। दिमाग और शरीर के नियंत्रण को बहुत बुरी तरह प्रभावित करने वाली पार्किसंस के मरीज बढ़ते चल रहे हैं, बुढ़ापे के साथ बढऩे वाली इस बीमारी की बढ़ोत्तरी की एक वजह यह भी हो सकती है कि इंसानों की औसत उम्र बढ़ रही है, और दुनिया की आबादी में बूढ़ों का अनुपात। लेकिन अगर प्रदूषण की वजह से इस बीमारी का खतरा बढऩा इस वैज्ञानिक शोध में स्थापित हुआ है, तो इसका मतलब यह होगा कि इसके मरीज संख्या में भी बढ़ेंगे, और कम बुढ़ापे से शुरू होकर लंबे बुढ़ापे तक यह बीमारी प्रभावित करेगी। हम इस पर एक लंबी रिपोर्ट अपने अखबार में दे रहे हैं, इसलिए यहां पर इतनी चर्चा काफी है। 

अब एक दूसरी चर्चा की जाए। एक ब्रिटिश अमरीकी अध्ययन से यह पता लगा है कि एआई के अधिक इस्तेमाल से दिमाग के कमजोर होने का एक खतरा खड़ा हो रहा है। मानव शरीर का विकास यह बताता है कि जब शरीर के किसी हिस्से का इस्तेमाल घटने लगता है, तो कुछ सौ या हजार पीढिय़ों के बाद उन हिस्सों का विकास ही कम होने लगता है। लेकिन एआई के इस्तेमाल से बुद्धि के मंद होने का सिलसिला बिना अगली पीढिय़ों को देखे, इसी पीढ़ी में दिख रहा है, उन्हीं लोगों में दिख रहा है कि लाखों-बरसों के इतिहास में इंसानी दिमाग ने जिस जटिल तरीके से विकास पाया है, अब एआई का इस्तेमाल अचानक उस विकास के कुछ या काफी हिस्सों को गैरजरूरी साबित कर रहा है। इंसान का दिमाग वैसे तो बहुत लचीला है, लेकिन वह इतना लचीला भी नहीं है कि एक-दो बरस के भीतर उसे एकदम से गैरजरूरी साबित कर दिया जाए, और वह हीनभावना में न आए। अब तक दिमाग की खुदकुशी जैसी कोई बात तो सामने नहीं आई है, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि इंसानी दिमाग के कुछ सबसे जटिल कामकाज को अगर एआई औजारों को दे दिया जाता है, तो एकदम से बेकार और बेरोजगार सरीखे हो गए दिमाग से और क्या उम्मीद की जा सकती है? पिछले बरस अमरीका के विख्यात विश्वविद्यालय, एमआईटी के एक शोध का नतीजा था कि जो छात्र लेख लिखने के लिए जनरेटिव एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनकी आलोचनात्मक सोच की क्षमता घट रही है। एक और शोध ने यह पाया था कि एआई दिमाग के साथ जो कर रहा है उसे संज्ञानात्मक बोझ हटाना, या संज्ञानात्मक समर्पण करना कहा जा सकता है, एक ऐसी स्थिति जिसमें दिमाग काम करना कम, या बंद कर देता है। 

अब इन दो अलग-अलग बातों को देखें, तो दिमाग पर पडऩे वाला एक असर तो शारीरिक है जो कि प्रदूषण से पैदा हो रहा है। लेकिन दूसरा असर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसी सहूलियत को इस्तेमाल करने से हो रहा है। एक तीसरा पहलू हमें और दिखता है, सोशल मीडिया के दिल-दिमाग पर असर का। आज अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प यह दावा कर रहे हैं कि पिछले चुनाव में चीन ने घुसपैठ करके, या खरीदकर दसियों लाख अमरीकी वोटरों की जानकारी चुरा ली थी, और चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की थी। लोगों को याद होगा कि टिक-टॉक जैसे नौजवान पीढ़ी के बीच एक सबसे लोकप्रिय मोबाइल एप्लीकेशन को भारत ने बरसों पहले बंद कर दिया, और अमरीका ने ट्रम्प की अगुवाई में इसके मालिकाना ढांचे को बदलने का काम किया है। दुनिया के कई देशों की आशंका है कि टिक-टॉक में लोग अपने जो वीडियो डालते हैं, या जो जानकारी देते हैं, उसका विश्लेषण करके चीन में बैठे इस एप्लीकेशन के सर्वर कई की जानकारियां निकाल सकते हैं, और फिर चुनिंदा लोगों, या तबकों को प्रभावित करने के लिए टिक-टॉक के एल्गोरिदम में ऐसा फेरबदल कर सकते हैं कि उन लोगों को कुछ चुनिंदा किस्म की सामग्री अधिक दिखे, या कुछ किस्म की सामग्री न दिखे। 

अब इन तीन अलग-अलग मामलों की चर्चा करने के बाद हम तीनों को जोडक़र जब देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि प्रदूषण से प्रभावित दिमाग जब एआई के इस्तेमाल से मंद भी होने लगेगा, और उसके बाद दुनिया भर के एआई-सोशल मीडिया आधारित कारोबार, और सरकार लोगों के दिमाग पर कब्जा करने की कोशिश करेंगे, तो थकी हुई मंदबुद्धि को ब्रेनवॉश करना अधिक आसान होगा। यह निष्कर्ष किसी एक शोध का नहीं है, बल्कि अलग-अलग शोध के नतीजों को जोडक़र मैं खुद यह सोच रहा हूं कि जब दिमाग की मोमबत्ती को दोनों सिरों से जला दिया गया है, तो उसका दुगुनी रफ्तार से खत्म होना भी तय हो गया है। इसके साथ-साथ अब तो सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने ब्रेनवॉशिंग के लिए इस मोमबत्ती को बीच से भी जलाना शुरू कर दिया है। यह सिलसिला एक मोमबत्ती को पिघले मोम, और जलकर बने प्रदूषण में बड़ी तेजी से बदल देगा। ऐसा ही कुछ दिमाग के साथ भी हो रहा है। 

प्रदूषण के नैनो प्लास्टिक कण बदन के खून में आकर दिमाग तक पहुंचने वाले खून में जाकर वहां थक्के जमा दे रहे हैं। बदन के भीतर गर्भस्थ भ्रूण के बदन के भीतर भी नैनो प्लास्टिक के कण मिल रहे हैं, इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि प्लास्टिक प्रदूषण कितने गहरे पैठ चुका है। अब बाकी प्रदूषण स्नायुतंत्र को प्रभावित करके लोगों को पार्किसंस जैसी बीमारी वक्त के पहले, औसत से अधिक, और अधिक लंबे वक्त तक दे रहा है। इंसान खुद एआई के इस्तेमाल से दिमाग के कई तरह के कामकाज को बेरोजगार कर रहे हैं। और कल तक के अक्लमंद से आज मंदअक्ल हो चुके इंसानों के दिमाग पर सोशल मीडिया, और दूसरे एप्लीकेशनों वाले कारोबार और सरकार का अलग-अलग, और मिलाजुला भी, हमला हो रहा है। क्या इतनी विकराल और विपरीत स्थितियों से जूझते हुए इंसान का दिमाग इनसे उबर जाएगा, या इनके सामने जवाब दे देगा? ये सब कुछ कठिन सवाल है क्योंकि लाखों बरस के विकासक्रम वाले इंसानी दिमाग पर मानो यह तीन-चारतरफा सुनामी आई हुई है। 

क्या भारत के अंडमान, या दुनिया के अमेजान के जंगलों जैसे दूसरे अछूते समुदाय अगले दशकों में कुछ अधिक शोध का सामान बनेंगे, क्योंकि वे प्रदूषण और एआई, और सोशल मीडिया एल्गोरिद्म सबसे परे हैं, और प्रदूषित दिमागों के मुकाबले ऐसे अछूते दिमाग कैसे अलग होंगे, क्या इसका कोई तुलनात्मक अध्ययन मुमकिन हो सकेगा? फिर हमारी ये कल्पनाएं भी उसी सरहद के भीतर हैं, जिस सरहद के पार एआई इंसानों से बेकाबू होकर अपनी मर्जी से काम करने लगेगा, उस दिन इंसानी दिमाग पर वह कैसा हमला करेगा, उस पर कैसा कब्जा करेगा, यह सोचना अभी हमारे लिए भी मुमकिन नहीं है। फिलहाल प्रदूषण, एआई के अतिउपयोग, और सोशल मीडिया के चंगुल, इन सबसे जितना-जितना बच सकें, उतना बच देखें। आगे-आगे देखें, होता है क्या।

(Daily Chhattisgarh)  

धर्म और जाति ही नहीं होते संस्कार, कई और बातें भी मायने रखती हैं...

 12 जुलाई 2026

हर दिन अखबान गंभीर मुद्दों पर लिखना, लिखते-लिखते निराश होकर खुद ही विचलित हो जाना, और इसके साथ-साथ यही पूरा काम यूट्यूब चैनल के लिए करना थका देता है। कभी-कभी लगता है कि किसी गैरगंभीर मुद्दे पर भी चर्चा कर ली जाए। जब कभी ऐसे किसी मुद्दे की तलाश होती है, तो खबरों और राजनीति से परे जो बातें सूझती हैं, वे भी आखिर में जाकर गंभीर ही साबित होती हैं। कई लोगों को लग सकता है कि जिंदगी के किसी बहुत ही महत्वहीन लगते, लेकिन असल में महत्वपूर्ण पहलू पर लिखना गंभीर लिखना कहलाएगा, या हल्का-फुल्का? आज का विषय कुछ वैसा ही है। 

मैं अपने आसपास के बहुत से परिवारों को देखते हुए इस फिक्र में पड़ जाता हूं कि परिवारों के बड़े लोगों की जुबान अपने ही बच्चों के सामने इस तरह की गैरजिम्मेदार रहती है कि अगली पीढ़़ी के गैरजिम्मेदार बनने की गारंटी सी हो जाती है। लोग न सिर्फ अपने बच्चों के सामने, बल्कि अपने बच्चों से भी बात करते हुए जिस तरह पागल शब्द का इस्तेमाल करते हैं, जिस तरह उन्हें झिडक़ते हैं कि पागलपन की बात मत करो, पागल जैसी हरकत मत करो, उससे पागल शब्द को लेकर बच्चों की संवेदनाएं खत्म हो जाती हैं। भाषा के मुताबिक मानसिक रूप से विक्षिप्त, विचलित, या बीमार लोगों को भाषा के जिम्मेदार होने के पहले तक पागल कह दिया जाता था। मानसिक चिकित्सालयों को पागलखाना लिखना अभी हाल के दशकों तक जारी था। बाद में भाषा धीरे-धीरे जिम्मेदार बनी, और मानसिक रोगी से भी कम आपत्तिजनक शब्द मानसिक विचलित जैसे इस्तेमाल होने लगे, लेकिन लोग हैं कि आज भी घर-परिवार में खुलकर पागल, पागलपन जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं। ऐसे परिवार भूले-भटके ही देखने मिलेंगे जो कि इन शब्दों को आपत्तिजनक समझते होंगे। 

भाषा की ऐसी और बहुत सी खामियां हैं जो कि आम भारतीय समाज में भरपूर फैली हुई हैं। परिवारों के बीच धर्म या जाति को लेकर हिकारत उजागर करने में लोगों को कुछ बुरा नहीं लगता। लोग यह नहीं देखते कि उनकी अगली पीढ़ी को देने के लिए उनके पास दौलत बचे या न बचे, नफरत तो वे पहले ही दे चुके हैं। किसी धर्म के लोगों के खिलाफ, धार्मिक प्रतीकों के खिलाफ, किसी जाति के लोगों की काल्पनिक खामियों और कमजोरियों को लेकर की जाने वाली चर्चा परिवारों में आम रहती है, लोगों को जरा भी परहेज नहीं रहता। बल्कि कई परिवारों को देखकर तो यह लगता है कि वे पारिवारिक संस्कार देने की तरह अपने ऐसे नफरती-पूर्वाग्रहों को अगली पीढ़ी को देकर जाना चाहते हैं। 

लेकिन जब बात सामाजिक सरोकार के खिलाफ रहती है, राजनीतिक रूप से गलत रहती है, नफरती रहती है, तो फिर बढ़ती हुई संपन्नता के साथ-साथ विपन्न तबकों के लिए भी कंगले, फटीचर, फटेहाल, दाने-दाने को मोहताज किस्म की भाषा इस्तेमाल होने लगती है। अभी कुछ अरसा पहले तक हिन्दी फिल्मों में अतिसंपन्न पिता अपनी बेटी के अतिविपन्न प्रेमी के मुंह पर ब्लैंक चेक मारते आए हैं कि जो चाहे रकम भर लो, और मेरी बेटी का पीछा छोड़ दो। आज भी जो लोग बड़ी गाडिय़ों पर सवार होकर चलते हैं, वे सडक़ों पर पैदल या पैडल के लिए, किसी छोटी गाड़ी वाले के लिए वही फिल्मी हिकारत रखते हैं, और सडक़ों पर होने वाले झगड़ों में कभी छोटी गाड़ी वाले बड़ी गाड़ी वाले को नहीं मारते, आमतौर पर बड़ी गाड़ी वाले का अहंकार ही छोटी गाड़ी वाले के खिलाफ हिंसक और हत्यारा बन जाता है। गरीबी एक गाली की तरह इस्तेमाल होती है, और एक सोच बढ़ाते चलती है। जो लोग अपने बच्चों के सामने गरीबों के खिलाफ हिकारत की बातें करते हैं, वे लोग अपने बच्चों को अपने से कमसंपन्नता, या अधिक विपन्नता के खिलाफ हिंसक भी बनाते चलते हैं। 

परिवारों में बड़े लोग बिना कुछ कहे हुए भी कई बातें बढ़ाते चलते हैं, जब वे अपने बच्चों को घरेलू कामगारों के साथ बदसलूकी करने देते हैं। लोगों को लगता है कि घरेलू कर्मचारी से हिकारत से ही बात की जानी चाहिए, और उन्हें यह समझ भी नहीं पड़ता कि उनके बच्चे कब बात की बात में बदतमीज होते चले जा रहे हैं। उन्हें यह भी समझ नहीं पड़ता कि दुनिया के बहुत से देशों में इस किस्म का बर्ताव उनके बच्चों के लिए सामाजिक और कानूनी दिक्कत ला सकता है, जहां पर मालिक और नौकर जैसी शब्दावली इस्तेमाल नहीं होती, और बुनियादी अधिकारों को लेकर दोनों के बीच कोई फर्क भी नहीं रहता। अपने घर के बच्चों को उम्र में बड़े घरेलू कामगारों के साथ इज्जत से पेश आना, हर उम्र के लोगों के साथ नरमी से पेश आना, ऐसी कई बुनियादी बातें रहती हैं जिन्हें विरासत में देकर जाना जरूरी रहता है, लेकिन कम ही लोग इसकी फिक्र करते हैं। संपन्न परिवारों के बहुत से बच्चे अपने बाप-दादा की उम्र के लोगों से तू-तड़ाक से बात करते हैं, और उनके परिवारों को इसमें कुछ भी अटपटा नहीं लगता। 

भारत में खासकर हिन्दी भाषा का परिवारों में इस्तेमाल देखते हुए तकलीफ होती है कि किस तरह लोग लोकोक्तियों की सदी भर पुरानी भाषा को आज के बदले हुए सामाजिक न्याय के संदर्भ में भी इस्तेमाल करते हैं। किसी विकलांग को अंधड़ा, लंगड़ा, गूंगा, बहरा, और भी तरह-तरह की शारीरिक दिक्कतों का गालियों की तरह इस्तेमाल! किसी अकेली महिला को लेकर, उसके चाल-चलन को लेकर लोग अपने परिवार में, अपने बच्चों के सामने ही ऐसी गैरजिम्मेदारी की बातें करते हैं कि वे बच्चे बड़े होकर उन्हीं पूर्वाग्रहों के साथ लड़कियों और महिलाओं को हिकारत से देखने लगते हैं। यह सिलसिला खत्म नहीं होता, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ते चलता है। 

आज की यह बात कुछ लोगों को बहुत मामूली, या पूरी तरह गैरजरूरी लग सकती है, लेकिन छोटी-छोटी बातों से ही इंसानों का व्यक्तित्व तय होता है, उनकी सोच बनती है, वे बेहतर इंसान बनते हैं, और वे दुनिया की नजरों में या तो चढ़ते हैं, या गिरते हैं। अपने-अपने परिवार में यह सोचकर देखना चाहिए कि वे अपने से बड़ी पीढ़ी, अपनी पीढ़ी, और अपनी अगली पीढ़ी को कैसी भाषा दे रहे हैं, कैसे संस्कार दे रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)  

बेवफाई और हिंसा घटाने, एआई के साथ मिलकर मैंने बनाया मैच-मेकिंग मॉडल..

28 जून 2026

किसी नए काम की सोच, कल्पना, और तैयारी एक नए उत्साह से भर देती हैं। मारूति के एक पुराने इश्तहार की तरह पेट्रोल खत्म ही नहीं होता है। अभी दो दिन पहले पड़ोस के एक जिले की दो खबरंप आईं कि किस तरह एक नाबालिग लडक़े ने अपनी कुछ घंटे पहले बालिग हुई प्रेमिका को इसलिए मार डाला कि वह बालिग होते ही शादी की जिद कर रही थी। मारते-मारते भी उसने एक बार और सेक्स तो कर ही लिया था, जो कि बहुत सारे लडक़ों और आदमियों का खास मकसद होता है। उसके बाद फिर मार डालने से दोनों काम एक साथ हो लिए, मजा भी पा लिया, और छुटकारा भी पा लिया। थोड़ी सी अक्ल होती तो कैद पा लेने की भी कल्पना कर ली होती। इसी जिले में एक बाप-चाचा ने लडक़ी को एक दलित से शादी करने के एवज में मार डाला। इन दो खबरों से, और इस तरह की हर दिन आने वाली दूसरे प्रदेशों की दर्जनों खबरों से बार-बार यह सोचने को मजबूर हो रहा था कि क्या शादी के पहले कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता कि बाद में न नीले ड्रम में बंद करना पड़े, न ही पहाड़ी से धकेलना पड़े? 

ऐसा सोचते-सोचते लगा कि शादी के पहले लडक़े-लडक़ी, और उनके परिवारों की सारी उम्मीदों और उनके तौर-तरीकों पर खुलकर अगर एक बात हो जाती, तो हो सकता है कि कई रिश्ते बनने से ही रह जाते, और बाद में खून फैलने से बच जाता। ऐसा लगा कि कुछ बुनियादी सवालों पर दोनों पक्षों की बात पहले हो जानी चाहिए, लडक़े-लड़कियों की आपस में अलग बातचीत, और दोनों परिवारों के साथ बैठकर फिर अलग से बातचीत। इससे वे मामले तो सामने आ जाते जो बाद में एक बड़े टकराव का मुद्दा बन सकते हैं। सवालों की एक ऐसी लंबी फेहरिस्त मैं सोच रहा था जिसे लोगों को सुझा सकूं, और जो हिंसा की आशंका और उसके खतरे को कम कर सके। यह सोचते-सोचते मैंने चैटजीपीटी के सामने यह बात रखी कि मैं ऐसा एक कॉलम लिखना चाहता हूं, और इसके लिए मुझे कुछ ऐसे सवाल सुझाइए जिसकी लिस्ट मैं छाप सकूं। मैंने अपने मन की बातें इस एआई को बताईं, और कहा कि सौ से अधिक सवाल बताएं जिन्हें दोनों पक्षों से पूछा जा सके। मैंने यह भी कहा कि कुछ सवाल सिर्फ लडक़े से पूछने लायक हो सकते हैं, और कुछ सिर्फ लडक़ी से पूछने के लायक क्योंकि भारतीय समाज व्यवस्था में इन दोनों की कई किस्म की भूमिकाएं अलग-अलग हैं, उनसे उम्मीदें अलग-अलग रहती हैं। 

इस पर करीब दो घंटे तक चैटजीपीटी से बात होती रही। मेरे सुझाए हुए अलग-अलग पहलुओं पर उसने करीब 110 सवालों की पहली लिस्ट दी, जिसमें पुराने प्रेमसंबंधों के बारे में भी सवाल थे। हमने यह तय किया था कि ये सवाल दोनों से अलग-अलग किए जाएंगे, और बाद में जवाबों को मिलाकर देखा जाएगा कि ये दोनों एक जोड़ा बनने लायक हैं या नहीं। एआई समझदार तो होता है, उसने तुरंत यह मान लिया कि भारत में कुंडली मिलाने से अधिक जरूरी जिंदगी को लेकर नजरिए का मिलान है। उसने कहा कि इन 110 में से 25-30 सवाल ऐसे हैं जिनमें गहरा मतभेद होने पर भविष्य में गंभीर संकट आ सकता है, विवाहेत्तर संबंध हो सकते हैं, अलगाव हो सकता है, या बात हिंसा तक जा सकती है। 

फिर हमने आगे बात बढ़ाई, और चर्चा की कि ये सवाल इन दोनों का एक-दूसरे से पूछना इसलिए ठीक नहीं होगा कि पहले के जवाब सुनकर दूसरे के जवाब प्रभावित होने का खतरा रहेगा। इसलिए इन दोनों से अलग-अलग कोई और पूछे, तो ही ठीक रहेगा, और इस सवाल-जवाब के दौरान परिवार के कोई लोग मौजूद भी न रहें। हमने यह सोचा कि परिवार से परे के किसी गंभीर, परिपक्व, शुभचिंतक को यह जिम्मा दिया जा सकता है। अगला आधा-पौन घंटा हमने सवालों को और बढ़ाने, उनका क्रम तय करने पर लगाया। चैटजीपीटी ने बड़े नाजुक पहलुओं के सवाल शुरू में रख दिए थे, और मेरे सुझाने पर उसने तुरंत ही सुधार मान लिया, और हल्के सवालों से शुरूआत करके सबसे आखिर में सबसे गंभीर सवाल रखे। फिर हमने यह तय किया कि इन सवालों में से हर किसी पर एक जैसे नंबर रखना ठीक नहीं है। कई सवाल ऐसे रहेंगे जो दूसरे सवालों के मुकाबले अधिक नाजुक और अधिक महत्वपूर्ण रहेंगे। लेकिन एक सवाल काफी देर तक हम दोनों के बीच बने रहा कि ये इंटरव्यू कौन करें? चूंकि पिछली प्रेम या सेक्स लाईफ को लेकर भी सवाल थे, बच्चों को लेकर क्या सोच है, शादीशुदा सेक्स लाईफ को लेकर दोनों की क्या उम्मीदें हैं, ऐसे भी सवाल थे, इसलिए यह खतरनाक लग रहा था कि इनके जवाबों को बाद में कोई मजे की अफवाह में इस्तेमाल न करे। बहुत देर तक सवालों, उनके अलग-अलग वजन पर चर्चा करने के बाद जब मुझे इस पूरे सिलसिले का खतरा समझ आया, तो मैंने चैटजीपीटी से कहा कि डॉक्टर और मनोचिकित्सक तो सैद्धांतिक शपथ से बंधे रहते हैं, वकीलों को भी अपने मुवक्किल की गोपनीयता बनाए रखने की शर्त रहती है, लेकिन जो लोग इस तरह के सवाल संभावित जोड़े से करेंगे, उन पर तो नैतिकता का कोई बोझ भी नहीं रहेगा। इसलिए गोपनीयता बनाए रखने की कोई उम्मीद इनसे नहीं की जा सकती। हमारी बातचीत में सवाल बढक़र दो सौ पार कर चुके थे, और इनमें कई ऐसे सवाल थे जिनके ईमानदार जवाब उस लडक़े या लडक़ी को बदनाम करने का सामान जुटाकर दे सकते थे। 

यहां पर आकर मैंने हथियार डाल दिए, चैटजीपीटी से कहा कि मैं इंसानों पर इतनी नाजुक बातचीत का भरोसा नहीं कर सकता। इसके लिए क्या एआई कोई मदद कर सकता है? क्या एआई सवाल पूछे, उसी को जवाब दे दिया जाए, और वह जोड़े की सोच का मिलान करके अपनी राय दे दे? चैटजीपीटी इसके लिए तैयार तो हुआ, लेकिन सवाल-जवाब के कुछ ऐसे पहलू उसने गिनाए जिनमें मशीन से परे इंसानी सामाजिक समझ से भी काम लेने की जरूरत पड़ेगी। लेकिन हमने इंसानों से पूरी तरह परे रखने के भी खतरे सोचे, तो एआई का कहना था कि इंटरनेट पर जो भी जवाब दिया जाएगा, वह कहीं न कहीं तो दर्ज होगा ही, और बाद में वैसी जानकारी जवाब देने वालों के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है। इस पर हमने एक ऐसी तरकीब निकाली, हम कहना नाजायज होगा, चैटजीपीटी ने ही यह तरकीब सुझाई कि एक ऑफलाईन प्रोग्राम ऐसा बनाया जा सकता है जिसमें बिना इंटरनेट और वाईफाई से जुड़े हुए किसी कम्प्यूटर पर पहले से डले हुए एक प्रोग्राम में दोनों पक्ष अलग-अलग अपने जवाब दाखिल कर दें, और उसी कम्प्यूटर पर वह प्रोग्राम मिलान करके नतीजा दे दे, और इस विश्लेषण को तैयार करते ही दोनों पक्षों के भरे हुए सारे जवाब अपने-आप मिट जाएं, उनका कोई भी रिकॉर्ड न रह जाए। 

अब सवाल यह उठा कि एक बार पूरे जवाब आ जाने के बाद जिंदगी के जिन पहलुओं पर दोनों पक्षों के बीच गहरी असहमति है, क्या इन दोनों को अलग-अलग उन पहलुओं पर दुबारा विचार करने का मौका देना चाहिए कि क्या वे उन्हें लेकर कुछ लचीले हो सकते हैं, या उन मुद्दों पर वे बिल्कुल भी समझौता नहीं कर पाएंगे? इसके लिए फिर यह रास्ता निकालना पड़ा कि यह कम्प्यूटर प्रोग्राम ही गंभीर और वजनदार असहमति के मुद्दों को अलग करके उन्हें फिर से दोनों पक्षों को अलग-अलग बता सकेगा कि क्या वे इन पर दुबारा गौर करना चाहेंगे? 

इस तरह मेरे जैसे एक इंसान ने दो लोगों के बीच रिश्तों की संभावना तौलने की जो बात एआई के साथ शुरू की, वह बढ़ते-बढ़ते यहां तक आई कि मुझे इंसानों को उससे अलग कर देना पड़ा, क्योंकि इंसान मुझे खतरनाक लग रहे थे, एआई ने इस सिलसिले को इंटरनेट से अलग कर दिया क्योंकि उसे इंटरनेट पर भरी गई कोई भी जानकारी गोपनीयता के लिहाज से खतरनाक लग रही थी, और हम लोग बाहरी दुनिया से कटे हुए किसी एक कम्प्यूटर पर आकर टिके कि उसमें डला हुआ प्रोग्राम, दोनों पक्षों को एक-दूसरे के जवाब बताए बिना, उनके बीच की सहमति और असहमति की शिनाख्त कर सकेगा, उन्हें टटोल भी सकेगा कि वे कितनी असहमति के साथ जीने के लिए तैयार होंगे। फिलहाल ऐसे किसी जोड़े की मैचमेकिंग का जिम्मा मेरे सामने नहीं है, लेकिन चैटजीपीटी के साथ मिलकर मैंने सवालों की ऐसी लंबी लिस्ट, दो सौ से अधिक, तैयार की है, उनके वजन तैयार किए हैं, दो लोगों के जवाबों को जोडक़र कैसे देखा जाए, यह तय किया है। अब सरकार और समाज को चाहिए कि वे ऐसी कोई तरकीब लोगों को मुहैया कराए जो कि लोगों की निजता और गोपनीयता बनाए रखकर भी उनकी पसंद की तुलना कर सके। हिंसा और बेवफाई की खबरों को पढ़-पढक़र थके हुए दिमाग ने एक एआई के साथ यहां तक की योजना बनाई है, जो कि बिना किसी लागत के, मामूली कम्प्यूटर-जानकार भी पूरी कर सकते हैं। यह बात हर कुछ दिनों में मेरे भीतर उबलने वाली किसी नई कल्पना में से एक है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं रहता, और अगर मैं नशा करता होता, तो यह चंडूखाने की गप्प कहलाती, बिना नशे अभी जो कह रहा हूं वह सच्ची और खरी बातचीत है। आज यह कॉलम वैसे भी लंबा हो गया है, इसलिए इसमें दो सौ सवालों को और जोडऩा मुमकिन नहीं है। वह कहानी, फिर कभी।

(Daily Chhattisgarh)  

सेक्स के लिए दर्जनों लोगों को अपनी पत्नी पेश करने वाले, और दूसरे लोग

21 जून 2026

योरप के एक बड़े विकसित देश स्वीडन की खबर ऐसी दिल दहलाने वाली है कि मनोवैज्ञानिक भी इस मामले को पढक़र दहल जाएं। यहां एक  आदमी ने अपनी पत्नी को तरह-तरह की हिंसा की धमकियां देते हुए मजबूर किया कि वह अलग-अलग मर्दों से सेक्स करे, और उनसे उगाही भी करे। 61 साल के इस आदमी को करीब साढ़े चार साल की कैद सुनाई गई है, और उसने जिन 120 मर्दों के साथ सेक्स के लिए अपनी बीवी को धमका-धमकाकर मजबूर किया था, उनमें से 28 लोगों को अदालत ने कुसूरवार ठहराया है। अदालत ने पाया कि इस आदमी ने अपनी पत्नी का बेरहमी से शोषण किया, और उसने पत्नी को हिंसा की धमकियां दे-देकर जान-पहचान के लोगों और पड़ोसियों से भी सेक्स करने और वसूली करने, जगह-जगह कैमरे लगाकर इसकी रिकॉर्डिंग करने, और उसे ऑनलाईन प्रसारित करने के लिए भी मजबूर किया। अदालत ने इस जोड़े के नाम उजागर नहीं किए हैं। 

इस मामले से कुछ बरस पहले फ्रांस में सामने आए एक दूसरे मामले की याद ताजा होती है। उसमें भी डोमिनिक पेलिको नाम के यह आदमी अपनी पत्नी गिजेल पेलिको को करीब एक दशक तक नशीली दवाएं देकर बेहोश  करते रहा, और लोगों को ऑनलाईन छांटकर, ढूंढकर, उनसे संपर्क करके उन्हें बुलाते रहा, और अपनी पत्नी की बेहोशी की हालत उन लोगों से अपनी पत्नी से सेक्स करवाया, और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी यह शादीशुदा आदमी बेटियों वाला भी था, और उसके नाती-नातिन भी थे। जब पुलिस ने अश्लील फिल्मों के मामले में इस आदमी पर छापा मारा, और उसके डिजिटल उपकरणों से हजारों फिल्में मिलीं, तो पुलिस से पता लगने पर पत्नी को भी भरोसा नहीं हुआ कि उसके साथ इतने बरसों से ऐसा हो रहा है। 

अब मनोवैज्ञानिक इन दोनों मामलों का तरह-तरह से अध्ययन कर रहे हैं क्योंकि इंसानी सोच के कई पहलू इनमें सामने आए हैं, जो कि एक जटिल नौबत है, और विश्लेषण आसान नहीं है। ये दोनों ही मामले लंबी शादीशुदा जिंदगी के बाद के हैं, इन दोनों में कई किस्म के फर्क भी हैं, लेकिन कई किस्म की बातें एक सरीखी भी हैं। फर्क यह है कि फ्रांस के मामले में पति ने दस बरस तक पत्नी को नशा दे-देकर सुलाया, और उसकी बेहोशी की हालत में ही पहले से छांटकर रखे गए मर्दों को बुलाकर उनसे सेक्स करवाया। इनमें से कुछ मर्दों ने अदालत को यह भी कहा कि उन्हें पति ने यह कहकर बुलाया था कि पत्नी की इच्छा है कि वह बेहोश होने का नाटक करे, और वैसी हालत में कोई अनजान व्यक्ति उससे सेक्स करे। लेकिन स्वीडन की इस ताजा घटना में पति ने पत्नी को बेहोश करने की जहमत नहीं उठाई, हिंसा की धमकी दे-देकर, उंगलियां काट देने की बात कहकर, पूरे घर में जगह-जगह कैमरे लगाकर उसे एक मानसिक कैद में रखा था, और उसे अलग-अलग लोगों से सेक्स करने पर मजबूर करता था। 

इन दोनों ही मामलों में मनोवैज्ञानिकों का प्रारंभिक निष्कर्ष यह है कि ये इन पतियों की किसी यौन इच्छा का नतीजा नहीं है। उनका कहना है कि दोनों ही मामले पत्नी के शरीर पर, उसकी जिंदगी पर एक परले दर्जे का मालिकाना हक रखने की भावना के हैं, जिनमें पति को यह संतुष्टि मिलती है कि वे अपनी पत्नी की जिंदगी से, और उसकी देह से कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी करवा सकते हैं। दूसरे व्यक्ति पर पूर्ण अधिकार स्थापित करने की इच्छा। मनोविज्ञान में इसे ‘कोएर्सिव कंट्रोल’ यानी दमनकारी नियंत्रण कहते हैं। यह काबू शारीरिक हिंसा से भी अधिक खतरनाक होता है, और इसमें मुजरिम पीडि़त की स्वतंत्रता को धीरे-धीरे कम करता है, फिर निगरानी और धमकी का इस्तेमाल होता है, और आखिर में ऐसे हिंसक नियंत्रण के शिकार लगातार भय और असुरक्षा में जीने लगते हैं, और पूरी तरह समर्पण कर देते हैं। यह बात स्वीडन वाले मामले पर लागू होती है, लेकिन फ्रांस का मामला बेहोशी में करवाए गए बलात्कारों का था, और उस मामले में पति की इस हिंसा, और जुर्म की शिकार महिला ने अदालत में अपनी पहचान उजागर करने का फैसला खुद लिया। 

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण यह कहते हैं कि इन दोनों ही मामलों में एक बात एक सरीखी है कि इस हिंसा और जुर्म की शिकार दोनों महिलाओं को इंसान की तरह मानना बंद कर दिया गया था। उनके पतियों ने उन्हें एक सामान की तरह देखना और इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, और बरसों तक, पकड़े जाने तक जारी रखा। मनोविज्ञान के कुछ दूसरे मामलों के विश्लेषण बताते हैं कि गुलामी के दौर से लेकर युद्ध अपराधों तक, हर जगह मुजरिम पहले अपने शिकार को इंसान मानना बंद कर देते हैं, और फिर सामान की तरह या साधन की तरह उनका इस्तेमाल करते हैं। 

इन दोनों ही मामलों का एक और पहलू दोनों ही देशों की अदालतों को परेशान करते रहा। वह यह कि इनके पति तो अपनी हिंसक सोच के चलते हुए इन्हें सामान की तरह इस्तेमाल करते रहे, लेकिन पतियों की जुटाए हुए दूसरे मर्द भी किसी दूसरे की पत्नी को उसी अमानवीय तरीके से इस्तेमाल करते रहे। इस सोच को समाज इंसानियत की इज्जत बचाने के लिए चाहे हैवानियत कह ले, चाहे कुछ और कह ले। सच तो यह है कि एक बेहोश या बेबस कैदी के साथ सेक्स के मौके को किसी ने नहीं छोड़ा। किसी को यह नैतिक रूप से गलत नहीं लगा, किसी की चेतना ने उसकी उत्तेजना को कम नहीं किया। पतियों की उत्तेजना पत्नियों पर पूरे काबू करने, और उनका सामान सरीखा इस्तेमाल करने से बढ़ रही थी, और पत्नियों के बेहोश या बेबस हाल में उनके साथ सेक्स करने वालों की उत्तेजना पर कोई नैतिक रोड़ा नहीं था। 

लोगों को याद होगा कि भारत के जम्मू में कठुआ नाम की जगह पर एक मंदिर के पुजारी को आठ बरस की एक खानाबदोश मुस्लिम लडक़ी हाथ लग गई, तो उसने खुद भी उससे बलात्कार किया, और अपने भतीजे सहित आधा दर्जन और लोगों से भी उससे बलात्कार करवाया। अदालत में यह साबित हुआ कि बच्ची का अपहरण किया गया, उसके साथ रेप हुआ, और उसका कत्ल कर दिया गया। आठ बरस की गरीब बच्ची के साथ बलात्कार, और हत्या करने वाले पुजारी सहित तीन लोगों को उम्रकैद हुई, और सुबूत मिटाने, और साजिश में भाग लेने के लिए तीन लोगों को पांच-पांच साल की कैद हुई जिसमें दो पुलिसवाले थे। मतलब यह कि किसी की नैतिकता देह-सुख में आड़े नहीं आती। हिन्दू पुजारी को मुस्लिम बच्ची से बलात्कार करते हुए जात-धरम का परहेज नहीं था, ईश्वर का नाम लेकर रोजी-रोटी कमाने वाले को इतनी कमउम्र बच्ची से सिलसिलेवार बलात्कार करवाने से परहेज नहीं था, और बाद में कत्ल करने से भी। देह-सुख तो पता नहीं आठ बरस की बच्ची से इन मर्दों को कितना मिला होगा, एक दूसरे इंसानी बदन पर इस हद तक अपना नियंत्रण करने की हवस शायद इसमें अधिक रही होगी, और यह भी कि ऐसे बदन को वे दूसरों में भी बांट सकते हैं। 

योरप जैसे विकसित इलाके के उच्च शिक्षित और संपन्न, बड़े लोकतांत्रिक समाजों में भी ये घटनाएं हुईं, और भारत जैसे सांप्रदायिकता से गुजरते देश में भी। लोगों को याद रखना चाहिए कि कठुआ के बलात्कारियों को बचाने के लिए जम्मू में राष्ट्रीय ध्वज के साथ रैलियां निकली थीं, और इस बच्ची की तरफ से मुकदमा लडऩे वाली एक हिन्दू महिला वकील का सामाजिक बहिष्कार सा हो गया था। आंदोलनकारियों का मुद्दा यह था कि एक खानाबदोश गरीब, बेचेहरा-बेनाम जैसी महत्वहीन लडक़ी से बलात्कार और उसकी हत्या जैसे महत्वहीन मामले में हिन्दू समाज के आधा दर्जन लोगों को फांसी के तख्ते तक क्यों ले जाया जाए? शायद उस वक्त आंदोलन में कोई हिन्दू मंत्री भी शामिल थे। 

लोगों को अपने आसपास के पड़ोसियों और परिवारों के इस तरह के जटिल, और हिंसक हालात की तरफ से आंखें खुली रखनी चाहिए। अगर लगे कि कोई जुर्म हो रहा है, तो पुलिस को खबर करनी चाहिए। फ्रांस और स्वीडन इन दोनों ही जगहों पर इन मामलों में जैसी हलचल चली होगी, किसी न किसी की नजरों में वह पहले आ जानी चाहिए थी, मामले के पुलिस तक पहुंचने के। लेकिन जिस तरह किसी भी तरह के मुफ्त या आसानी से हासिल सेक्स के लिए मर्द बिना किसी नैतिक बोझ के आनन-फानन तैयार हो जाते हैं, उसी तरह आसपास के लोग सामूहिक, सामुदायिक, या सामाजिक बचाव की जिम्मेदारी से मुक्त रहते हैं, फिर चाहे वह पड़ोस में किसी बंधुआ बाल मजदूर का मामला ही क्यों न हो। अभी चार दिन पहले ही मध्यप्रदेश में पति द्वारा गले में जंजीर-ताला डालकर बांधकर रखी गई एक महिला किसी तरह छूटकर थाने पहुंची थी। ऐसा तो हो नहीं सकता था कि परिवार या पड़ोस में किसी ने यह कैद पहले देखी न हो। 

(Daily Chhattisgarh)  

2 और 6 लाख के देश विश्वकप फुटबॉल में, भारत दर्शकदीर्घा में

  14 जून 2026

आज कुछ अलग हो जाए। वैसे तो अयोध्या में राम के पैसों में लूट और गबन करने वालों पर लिखने का सही मौका है, लेकिन धर्म के नाम पर जमा पैसों का बेजा इस्तेमाल तो अनंतकाल से होते आया है, इसलिए उस बारे में फिर कभी। अभी तो जो विश्व फुटबॉल चल रहा है, कुछ उसके बारे में हो जाए। फुटबॉल की खबरों को देखते हुए यह लगने लगा कि जिस देश के बंगाल में, केरल और गोवा में, और उत्तर-पूर्वी राज्यों में फुटबॉल खेलने का इतिहास डेढ़ सौ साल से भी पुराना है, उस देश की टीम फुटबॉल वल्र्ड कप में कहां है? भारत में इस बात की अधिक चर्चा एक राष्ट्रीय शर्मिंदगी ला सकती है, इसलिए विश्वगुरूता के दावों के बीच इस शर्मिंदगी को पीछे धकेल दिया जाता है, दरी के नीचे छुपा दिया जाता है, या मेहमानों के आने पर घर के पीछे आंगन में बिठा दिया जाता है कि फुटबॉल की फीफा रैंकिंग में भारत सौ से 130 के बीच कहीं घिसटते रहता है। हालत यह है कि हिन्दुस्तान के रायपुर जैसे शहर जितनी 38 लाख की आबादी वाला क्रोएशिया विश्वकप फाइनल खेल सकता है, उससे भी कम आबादी का उरुग्वे विश्व चैंपियन बन सकता है, और आईसलैंड जैसा सिर्फ 4 लाख आबादी वाला देश विश्वकप में जगह बना सकता है, तब 143 करोड़ आबादी वाला भारत दुनिया के सौ देशों के बाद कहीं टिकता है! और यही भारत आज क्रिकेट में दुनिया का अव्वल देश है! 

मेरी खेल की जानकारी बड़ी सीमित है, बचपन से अभी तक किसी खेल का खिलाड़ी नहीं रहा, और पचपन पार कर लेने के बाद भी किसी खेल का दर्शक भी नहीं रहा। लेकिन खेल से परे की कुछ सामाजिक बातें आज सुबह से यह तुलना करने के लिए मजबूर कर रही थीं कि भारत जैसे गरीब देश में फुटबॉल जैसा गरीब खेल क्यों पनप नहीं पाया, और रईसों से जिस खेल की शुरूआत हुई थी, वह क्रिकेट कैसे आगे बढ़ते चले गया? दोनों ही खेल भारत में शायद अंग्रेजों के वक्त आए। अंग्रेज सैनिकों ने 19वीं सदी के बीच में भारत में फुटबॉल शुरू किया, और 1872 में कलकत्ता में पहला फुटबॉल क्लब बना। लेकिन इसके पहले अंग्रेज 1721 में गुजरात में क्रिकेट शुरू कर चुके थे, और 1848 में जब फुटबॉल पर भारत में पहली किक लग रही थी, तब मुम्बई में पहला क्रिकेट क्लब बना। शुरूआती फर्क को छोड़ दें, तो ये दोनों ही खेल भारत में 25-50 बरस के फासले से शुरू हुए, और एक ही किस्म की सरकार के रहते हुए पनपे। पूरी दुनिया के फुटबॉल पर एक नजर डालें, तो बड़ी दिलचस्प बात दिखती है कि क्रिकेट खेलने वाले देशों में जो फुटबॉल में भी सबसे आगे में से एक है, वह इंग्लैंड की टीम है। कुछ मजेदार बात है कि अंग्रेज भारत से जाते हुए क्रिकेट तो छोड़ गए, जिसमें आज हिन्दुस्तानी आसमान का सितारा बन गए हैं, और वे फुटबॉल ले गए, जिसमें वे खासे आगे हैं! 

खैर, भारत में इन दोनों खेलों की बात करें, तो 1950 में एक बार कुछ हालात के चलते हुए भारत विश्व फुटबॉल में क्वालीफाई कर पाया था, लेकिन टीम यहां से खेलने नहीं जा पाई थी। जिस ब्राजील में मैच था, उस ब्राजील तक टीम को ले जाने की ताकत भी उस समय नहीं थी। बल्कि प्रचलित कहानी कहती है कि भारत 1950 के विश्वकप में इसलिए नहीं गया था कि उसके पास जूते नहीं थे। जूतों के अलावा भी कुछ और बातें थीं, भारतीय फुटबॉल फेडरेशन के पास टीम को वहां तक भेजने का खर्च नहीं था। फिर फेडरेशन के लोगों को यह लगा कि दो साल बाद का हेलसिंकी ओलंपिक अधिक जरूरी होगा। वे यह भी नहीं सोच पाए थे कि यह विश्वकप, जो कि 1950 में चौथी बार ही खेला गया था, वह एक दिन ओलंपिक से अधिक बड़ा टूर्नामेंट हो जाएगा। दूसरी तरफ हॉकी की टीम 1928 में एमरस्टरडम, 1932 में लॉस एंजिलिस, और 1936 में बर्लिन ओलंपिक गई, जो कि ब्राजील पहुंचने जितना ही मुश्किल था। और इसके पहले एक बार भारतीय टीम 1948 में लंदन ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ एक मैच खेल चुकी थी, जिसमें कई भारतीय खिलाड़ी नंगे पैर थे। इस देश से लंदन जाने वाले गांधी को वहां नंगा फकीर कहा जाता था, और उसी लंदन में खेलती भारतीय टीम नंगे पैर थी, जबकि फुटबॉल के बूट के तल्ले दूसरों के पैर कुचल सकते हैं, और फ्रांस की टीम उस वक्त के बेहतरीन जूतों में थी। क्रिकेट की टीम 1932, 36, 46 इन सभी बरसों में विदेश खेलने के लिए जाती रही। 

फुटबॉल की वह गरीबी अब तक जारी है। 

लेकिन जब मैं इन दोनों खेलों की अपनी सामान्य समझ को देखता हूं, तो लगता है कि क्रिकेट के लिए तो कम से कम कुछ सामान लगते हैं, चाहे वह गली में ही क्यों न खेला जा रहा हो। कम से कम आधा दर्जन खिलाड़ी तो लगते ही हैं, उनके बिना तो दूर गई गेंद वापिस भी नहीं लाई जा सकती। दूसरी तरफ फुटबॉल है जिसे संकरी गली में दो बच्चे भी खेल सकते हैं, और एक अकेले फुटबॉल के अलावा कोई सामान नहीं लगता। जब दुनिया में चार लाख आबादी का देश भी विश्व फुटबॉल में अपनी टीम भेज लेता है, तब 140 करोड़ आबादी का यह देश फुटबॉल की लिस्ट में कहीं भी नहीं है, शायद सौ से 140 के बीच उसे कहीं किक पड़ रही है। 

मैंने अपने लिए पूरी तरह अनजान खेल के इस मुद्दे पर जब लिखना तय किया, तो अलग-अलग कुछ एआई के सामने अपने सवाल रखे, उनसे बहस की, और उनके तथ्यों को एक-दूसरे में डालकर दुबारा जांच भी लिया। मेरी एक बात से एआई भी थोड़ी दूर तक सहमत थे कि फुटबॉल क्रिकेट के मुकाबले अधिक गरीबों के बीच अधिक लोकप्रिय है। मैं तो पांच-पांच दिन चलने वाले क्रिकेट की ऐसी पुरानी तस्वीरें देखते आया हूं जिनमें सफेद पतलून और पूरी बांहों के सफेद शर्ट पहनकर रईस और कुलीन घरानों के दिखने वाले संपन्न लोग क्रिकेट खेलते थे, और फुटबॉल तो अपने मिजाज के मुताबिक गरीब ही अधिक खेलते आए हैं। मैं एक गैरखिलाड़ी होने के बावजूद इतना समझ रहा था कि क्रिकेट आरामतलबी से खेले जाने वाला खेल रहा, और एआई ने मुझे बताया कि फुटबॉल या हॉकी में क्रिकेट के मुकाबले दो गुना या और अधिक ऊर्जा खर्च होती है! लेकिन क्रिकेट के साथ जिस तरह कई नवाब जुड़े रहे, फिल्मी सितारों की दीवानगी क्रिकेट को लेकर रही, और उस वजह से क्रिकेट खेलने वालों को बड़ी शोहरत मिलती रही, पैसा भी मिलते रहा। शायद इसलिए भी फुटबॉल गरीबों का खेल बने रह गया, उसके टूर्नामेंट भारत मेें क्रिकेट की तरह अलग-अलग कई स्तरों पर नहीं हुए, और फिर पांच दिन के टेस्ट से तीन दिन के टेस्ट, और फिर वनडे क्रिकेट, अब आखिर में जाकर 50 ओवरों का खेल, या ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट। फुटबॉल या किसी और खेल में ऐसा बाजारूकरण संभव नहीं है। उसके तो मैच ही घंटे-दो घंटे के रहते हैं, और उनमें और कोई छोटा मॉडल बनाना मुमकिन नहीं है। 

लेकिन स्वघोषित विश्वगुरू को यह सोचना चाहिए कि दुनिया के बहुत छोटे-छोटे से देश, अफ्रीका के बहुत छोटे-छोटे से गरीब देश जब फुटबॉल के कारखानों की तरह कामयाब हैं, तब कश्मीर से कन्याकुमारी तक, और गुजरात से अरूणाचल तक फैले हुए इस देश में जो करोड़ों मैदान हैं, वे भारत को सबसे ऊपर की सौ टीमों में भी क्यों नहीं ला पाते? यह तो सबसे आसान खेल है, इसके लिए न तो क्रिकेट की तरह की पिच लगती है, न ही गेंद किसी खास किस्म की लगती है, विकेटकीपर जैसे जिरहबख्तर की जरूरत भी फुटबॉल में नहीं लगती। गरीब आबादी के बीच आसानी से खेला जा सकने वाला यह खेल, बंगाल में इतनी मजबूत जड़ों के बावजूद देश को ऊपर क्यों नहीं ले जा पाया? क्या बाजार व्यवस्था, सट्टाबाजार, बीसीसीआई जैसा अपने आपमें एक स्वतंत्र देश, क्या इन सबने और खेलों की संभावनाओं को कम कर दिया है? 

मुझे खेलों की समझ एकदम सीमित है, लेकिन दुनिया के हर मुद्दे पर मेरी जिज्ञासा असीमित है, यहां पर मैंने गिने-चुने तथ्यों के साथ अपने मन के, मुझे खुद हैरान करने वाले सवाल आपके सामने रखे हैं। सोचिएगा। अभी तक मेरी बातों ने हिन्दुस्तानियों को हीनभावना में न डाला हो, तो 2026 के विश्वकप में खेलने वाली टीमों के बारे में बता दूं कि क्यूरासाओ की आबादी कुल डेढ़-दो लाख के है, और केप वर्दे की आबादी 6 लाख है, और इन दोनों की टीमें विश्वकप में खेल रही हैं।

(Daily Chhattisgarh)