नेपाल के सबक, मौसम की सूचना साझा करने मजबूत वैश्विक ढांचा हो
31 अगस्त 2026
नेपाल में अभी आई बाढ़ को लेकर एक सवाल यह उठ रहा है कि क्या चीन ने मौसम के ऐसे किसी खतरे की जानकारी नेपाल को समय रहते दी थी? फिर एक सवाल यह भी उठता है कि क्या खुद चीन को ऐसी कोई जानकारी मिली थी कि चीन-नेपाल सरहद पर किसी झील के किनारे का इतना विशाल हिमखंड टूटकर गिर सकता है जिससे नीचे नेपाल में बाढ़ आ सकती है? अब जब नेपाल इतनी बुरी प्राकृतिक आपदा से गुजर रहा है, तो यह सवाल एक बार फिर उठ रहा है। नेपाल के कुछ अधिकारियों का कहना है कि तीन महीने पहले काठमांडू में दोनों देशों के विशेषज्ञों, और अधिकारियों की एक बैठक हुई थी जिसमें बाढ़, मौसम, और ग्लेशियर से संबंधित खतरों की निगरानी करने, और निपटने के लिए सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा हुई थी, लेकिन बैठक के बाद नेपाल को ग्लेशियरों के खतरों और जल स्तर के बारे में उतनी जानकारी नहीं मिली जितनी वे चाहते थे। इस बारे में चीन का कहना है कि हिमालय के क्षेत्र में खतरों की निगरानी करने में चीन और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
हम इसे चीन पर तोहमत लगाने के एक मौके की तरह नहीं देखते, क्योंकि धरती पर हर देश कम से कम अपने अड़ोस-पड़ोस के देशों से तो जुड़े हुए हैं ही, और जो अधिक ऊंचाई पर हैं उनसे इस तरह की बाढ़ की आपदा नीचे के देशों में आ सकती है, लेकिन भूकम्प तो किसी नीचे के देश से भी ऊपर के देश में जा सकता है। ज्वालामुखी का धुआं बिना देशों की ऊंचाई का ख्याल किए चारों तरफ फैल सकता है। समुद्री तूफान या सुनामी जैसी घटनाएं आसपास के कई देशों को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए मौसम से जुड़ी हुई प्राकृतिक आपदाएं देशों की सरहद में बंधी रहने वाली बात नहीं है। दूसरी तरफ हाल के बरसों में दुनिया की घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि जलवायु परिवर्तन की मार उन देशों पर अधिक पड़ रही है जो कि जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं। जिन देशों में खपत और प्रदूषण दोनों ही सबसे कम हैं, वे देश कहीं बाढ़ झेल रहे हैं, कहीं सूखा, और कहीं दोनों। इसलिए अब एक स्थाई असलियत बन चुके जलवायु परिवर्तन को लेकर भी देशों के बीच मौसम की जानकारी, चेतावनी, और मदद को बिना किसी दूसरे आधार के बढ़ाने की जरूरत है। भारत और पाकिस्तान जैसे देश, जिनके बीच आपस में फौजी तनातनी जारी है, या भारत और चीन के बीच, ईरान और उसके पड़ोसी देशों के बीच, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तरह-तरह की तनातनी चल रही है, लेकिन बेकाबू कुदरत से जुड़ी हुई जानकारियां पल भर में एक-दूसरे को देने की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का सम्मान सबको करना चाहिए। आज अंतरिक्ष में ऐसी ही व्यवस्था है, वहां स्पेस स्टेशन पर उन देशों के लोग भी एक साथ रहते हैं जिनके बीच धरती पर दुश्मनी है, या फौजी टकराव है। वैसा ही धरती पर मौसम से जुड़े हुए तमाम मुद्दों को लेकर करने की जरूरत है।
दुनिया में जिस तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्ल्यूएचओ है, उसी तरह विश्व मौसम विज्ञान संगठन, डब्ल्यूएमओ सूचना तंत्र भी है। इसमें मौसम, पानी, जलवायु, और दूसरे पर्यावरण अध्ययन की जानकारी एक-दूसरे से साझा करने की एक व्यवस्था है। अभी इस व्यवस्था के तहत एक-दूसरे से मिलने वाली सूचनाओं का पूरा-पूरा इस्तेमाल इसलिए नहीं हो पाता है कि शुरूआती चेतावनी मिलने पर भी खतरे में घिरे संबंधित देश में यह इंतजाम नहीं रहता कि वे खतरे की आशंका पाकर भी अपने लोगों को बचा सके। कई बार मौसम की जानकारी इतनी तकनीकी रहती है कि उसके जमीनी असर का अंदाज हर देश नहीं लगा सकते, और इसलिए सिर्फ आंकड़े कहीं पहुंच जाने पर वहां के स्थानीय वैज्ञानिक उनसे भविष्यवाणी नहीं कर सकते। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे एक वैश्विक संगठन की जरूरत है जिसमें अधिकतर सक्षम देशों के वैज्ञानिक और विशेषज्ञ रहें, हर देश के मौसम विज्ञान केन्द्र से मिलने वाली जानकारियां रहें, और एआई की मदद से उनका विश्लेषण किया जा सके। कुछ अड़ोसी-पड़ोसी देश ऐसी आपसी व्यवस्था रखते भी हैं, जैसे भारत और नेपाल के बीच बाढ़ प्रबंधन के लिए एक संयुक्त टीम, और बाढ़ की भविष्यवाणी करने वाली कमेटियां काम कर रही हैं। नेपाल, भूटान, और चीन के साथ द्विपक्षीय सूचना लेन-देन का इस्तेमाल किया भी जा रहा है। लेकिन अब एक आशंका यह है कि हिमालय के क्षेत्र में लगातार बढ़ते हुए तापमान की वजह से ऐसे और ग्लेशियर भी टूटकर गिर सकते हैं जिनसे इसी तरह की, या इससे और अधिक भयानक बाढ़ आ सकती है, तबाही आ सकती है। इसलिए जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ बढ़े हुए खतरों, और नए खड़े हुए खतरों को भी देखते हुए मौसम सूचना केन्द्रों से अधिक जानकारी की जरूरत है, उनके बेहतर विश्लेषण की भी जरूरत है, और एआई इसमें मददगार भी हो सकता है।
हमारे पास ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि चीन ने ग्लेशियर टूटने की जानकारी रहते हुए भी नेपाल को नहीं दी होगी। यह इलाका दोनों देशों की सरहद पर है, आबादी से दूर का पूरी तरह निर्जन इलाका है, और हो सकता है कि ऐसी हलचल चीनी नजरों में आए बिना भी पहाड़ों में हो गई हो। एक बार जब ग्लेशियर टूटकर झील में गिर गया, नदी में बाढ़ आ गई, तो उसके बाद तो सब कुछ मिनटों का ही खेल था। बाढ़ तो आते हुए दिखती है, तबाही के वीडियो दर्ज होते हैं। लेकिन जिस तरह जलवायु परिवर्तन से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सूखा पड़ रहा है, भारत में ही अभी कुछ बरस पहले गेहूं की फसल के दौरान जिस तरह लू से तबाही हुई थी, जिस तरह जलवायु परिवर्तन के चलते टिड्डी दल दुनिया में जगह-जगह हमले कर रहे हैं, और उपमहाद्वीप पार करके भी दूसरे इलाकों में चले जा रहे हैं, वह सब कुछ मौसम की मार के अलग-अलग चेहरे हैं। मौसम का अध्ययन, और चेतावनी का इंतजाम एक पहलू है, बचाव का इंतजाम दूसरा पहलू है, लेकिन ये दोनों ही मुसीबत आने के बाद के मामले हैं। मुसीबत की मार को कम करने के लिए जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को घटाना, उसे रोकना जरूरी है। चीन की ऐसी कोई नीयत नहीं हो सकती कि वह नेपाल को डूबकर मर जाने दे, आज मुसीबत में वह एक पड़ोसी की जिम्मेदारी से नेपाल के साथ खड़ा हुआ है। फिर भी ऐसी वैश्विक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिससे जानकारी का विश्लेषण हर संबंधित देश तक पहुंचाया जा सके। फिर मौसम की ऐसी बुरी मार को देखते हुए देशों को भी चाहिए कि वे अपना शहरी या दूसरे किस्म का विकास उन इलाकों में न करें जहां इस किस्म की प्राकृतिक मुसीबत आ सकती है। आज तो यह ग्लेशियर से पैदा बाढ़ दिख रही है, लेकिन नाजुक पहाड़ों पर बनने वाले बड़े-बड़े बांधों से भी कभी भी ऐसी मुसीबत आ सकती है, क्योंकि अगर वे बांध टूटेंगे, तो नीचे नदी के किनारे बसे हुए कोई शहर-कस्बे, गांव नहीं बच पाएंगे। इसलिए अब मौसम की अधिकतम बुरी मार के मौजूदा पैमानों को छोडक़र, और बहुत अधिक बुरी मार की सोचकर दुनिया को विकास की अपनी योजनाओं में आशंकाओं को एक बड़ा पैमाना बनाना पड़ेगा।
सोनिया के संस्मरणों से निकली बात मेरे संस्मरणों तक दूर तलक चली गई
30 अगस्त 2026

सोनिया गांधी के संस्मरणों की किताब लबालब खबरों में है। पेंगुइन नाम के एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक की भारतीय शाखा ने कहा जा रहा है कि इस किताब को छापने से मना कर दिया है क्योंकि सोनिया के लिखे हुए में संपादन या फेरबदल की मंजूरी नहीं दी गई थी। अभी इन दोनों पक्षों की तरफ से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है, प्रकाशक ने एक गोलमोल बयान जारी किया है जो कि कांग्रेस के कई नेताओं के आरोपों पर एक कारोबारी का स्पष्टीकरण है। पेंगुइन ने किताब प्रकाशन के कारोबार में जरूरी संपादन और लेखक और संपादक के बीच के कामकाज के तरीके को गिनाया है, जिसे समझे बिना भी लोग तरह-तरह की बातें कर सकते हैं। फिलहाल तो सोनिया गांधी की यह किताब अपने डिजिटल संस्करण में शायद दस दिन में ऑनलाईन बिक्री के लिए आ रही है, और यह तय है कि दुनिया के कई बड़े प्रकाशक उनकी किताब छापने के लिए एक पैर पर खड़े होंगे। ऐसे में हम सोनिया की किताब को लेकर और खबरों, उसके और अंशों का इंतजार करेंगे, लेकिन साथ-साथ नेताओं या सार्वजनिक जीवन के दूसरे लोगों के संस्मरणों, या उनकी आत्मकथा के बारे में थोड़ी सी चर्चा होनी चाहिए।
मैं जाने कितने ही दशक से इस बात की वकालत करते आ रहा हूं कि जिन लोगों ने सार्वजनिक जीवन में लोगों के बीच जगह बनाई या पाई है, उन्हें अपने संस्मरण जरूर ही लिखने चाहिए। यह बात समाज के प्रति उनकी जवाबदेही की भी रहती है, हालांकि यह बात हमेशा बहुत सहूलियत की नहीं रहती। चुनिंदा संस्मरण लिखना तो एक किस्म से आसान रहता है, लेकिन जब आत्मकथा लिखी जाती है तो उसके तो बहुत सारे पहलू बड़ी असुविधा के रहते हैं। आलमारी से निकलकर कंकाल मानो सामने नाचने लगते हैं। अपने ही कभी किए हुए, जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे कुकर्म मुंह चिढ़ाने लगते हैं कि हमारा जिक्र छोड़ तो नहीं दोगे? कई काली यादें आकर खड़ी हो जाती हैं कि मैं हूं न! ऐसे में आत्मकथा भला कोई कैसे लिखे? और फिर जब आप किसी भी पेशे में ऊपर, और ऊपर होते चले जाते हैं, जब आप शिखर पर पहुंच जाते हैं, तो मानो आपका गमछा ही हवा में उडऩे लगता है, कुछ भी अनदेखा नहीं रह जाता, और जिंदगी के इस लंबे सफर में जितने लोगों ने आपको पहले देखा हुआ है, वे सब आप पर कुछ न कुछ कहने के हकदार हो जाते हैं। इतनी बड़ी जवाबदेही के साथ लिखना अपने खुद के लिखे हुए पर सवाल उठाने सरीखा रहता है, जितने जवाब आप लिखने का सोचते हैं, कई बार उससे अधिक सवाल उठ जाते हैं।
लेकिन गांधी से लेकर हिटलर तक, और गोडसे से लेकर आज के किसी संन्यासी तक, हर किसी को यह हक रहता है कि वे अपनी बात लिखकर, या बोलकर जाएं। और फिर यह हक ही नहीं रहता, यह एक जिम्मेदारी भी रहती है। मैं बीते कुछ बरसों से मुझे मिलने वाली कविता या साहित्य की किताबों के लिए मना करते आ रहा हूं कि मैंने उन्हें आमतौर पर नहीं पढ़ पाता। दूसरी तरफ कोई दोस्त किताबों की अपनी भीड़ कम करते रहते हैं, तो मैं उनसे बेशर्मी से यह अनुरोध कर लेता हूं कि अगर वे किसी की आत्मकथा या जीवनी, संस्मरण या यात्रा-वृत्तांत किसी को देना चाहते हैं, तो मैं हूं न। अब और किसी किस्म की किताबों को अधिक पढऩे की न हसरत रह गई, न जरूरत रह गई। बस यही लगता है कि अपने खुद के संस्मरण लिखना हो जाए, तो जिम्मेदारी का एक कतरा पूरा हो जाएगा। इसीलिए कभी कोई मुझसे बात करना चाहते हैं, छापने के लिए या किसी शोधकार्य के लिए इंटरव्यू लेना चाहते हैं, तो मैं खुशी-खुशी वक्त निकाल लेता हूं कि अपने देखे-सुने, और अपने गुजरे-भोगे हुए का कुछ लेखा-जोखा तो छोड़ जाऊं।
सार्वजनिक जीवन में लोगों को शोहरत मिलती है, कुछ को दौलत भी मिलती है। ऐसे में समाज के प्रति उनकी जवाबदेही रहती है कि वे अपने देखे हुए की यादें छोड़ जाएं। जो चर्चित लोग लिख नहीं पाते, उनके लिए भी हमेशा से ही अदृश्य लेखकों की सुविधा रहते आई है जिनमें उनकी कही हुई बातों को सुनकर कोई लेखक लिखते हैं। यह लिखना भी अलग-अलग कई दर्जों का रहता है, कुछ लोग कही हुई बातों को ज्यों का त्यों लिखकर, या टाईप करके दे देते हैं, और वे टाइपिस्ट या स्टेनोग्राफर अधिक रहते हैं, वे घोस्ट राइटर के तबके में नहीं गिने जाते। दूसरी तरफ घोस्ट राइटर रहते हैं जो बुनियादी रूप से लेखक रहते हैं, और जो बातों को सुनकर अपने हिसाब से किताब पूरी कर देते हैं, यह उस प्रमुख व्यक्ति और घोस्ट राइटर के बीच का रहता है कि उसका नाम जाए, या न जाए। यह पूरी तरह से आपसी सहमति की बात रहती है।
जीवनी या संस्मरण की एक और किस्म रहती है जिसे अधिकृत जीवनी कहा जाता है। इसे लेखक लिखते तो अपने हिसाब से हैं, लेकिन जिस व्यक्ति की जीवनी है, उसके सक्रिय सहयोग से जानकारी जुटाई जाती है, और इसलिए किताब छपने के पहले उसे दिखाई जाती है, और वे उस किताब में लिखी बातों से सहमत रहते हैं। यह दर्जा स्टेनोग्राफर से ऊपर का रहता है, उसके भी ऊपर के घोस्ट राइटर के ऊपर का रहता है, और स्वतंत्र जीवनी लेखक के नीचे का रहता है। स्वतंत्र जीवनी लेखक वो होते हैं जो कि किसी की जीवनी उन्हें दिखाए बिना भी लिखते हैं, और इसके साथ यह खतरा भी जुड़ा रहता है कि जिसकी जीवनी है, वे ही उसकी कई बातों का खंडन-मुंडन कर दें।
यह तो मैंने कुछ अधिक प्रचलित विधाएँ गिनाई हैं, और इसकी जरूरत इसलिए पड़ रही है कि सोनिया गांधी की यह किताब उनकी खुद की लिखी किताब की तरह ही सामने आ रही है, इसमें हो सकता है कि कोई टाइपिस्ट रहे हों जिन्होंने उनके डिक्टेशन को सुनकर टाईप कर दिया हो। यह भी हो सकता है कि उनके भरोसेमंद कोई प्रेत लेखक हों जिन्होंने उनकी बातें सुनकर फिर अपनी जुबान में उसे ढाला हो। जो भी हो, किसी की अधिकृत जीवनी सामने आए, आत्मकथा या संस्मरण सामने आएं, मुझे वह बहुत अच्छा इसलिए लगता है कि उसके साथ विश्वसनीयता का एक दर्जा जुड़ा रहता है। यह विश्वसनीयता तथ्यों की नहीं, बल्कि कथन की रहती है। किसने कहा है, यह साफ-साफ दिखता है, सच कहा है या नहीं कहा है, यह तय करना पाठकों का भी अधिकार रहता है, या फिर जिन लोगों का जिक्र ऐसी किताबों में रहता है, उनका भी रहता है।
मैं एक लेखक की हैसियत से किसी भी तरह के लेखन को बुरा नहीं मानता। अपनी आत्मकथा लिखना तो अच्छी बात है ही, किसी और के लिए डिक्टेशन लेना भी बुरी बात नहीं है, उसे उसी तरह लिखकर, या टाईप करके दे देने से मुझे लेखक का दर्जा तो नहीं मिलता, लेकिन रूबरू सुनने का एक सुख और अनुभव जरूर मिलता है। अगर प्रेत लेखक की तरह किसी की आत्मकथा, या उसके संस्मरण लिखने का मौका मिलता है, तो या तो नाम मिलता है, या दाम मिलता है, और सबसे अच्छी नौबत रहती है कि दोनों ही मिल जाएं। किसी की पूरी जीवनी अपने दम पर लिखना खासा मुश्किल काम रहता है, उसके लिए बरसों की रिसर्च लगती है, और फिर भी विवाद का खतरा तो बने ही रहता है। इसलिए कुछ समझौता करके कुछ लोग एक अधिकृत जीवनी लिखते हैं, ताकि जिसकी जीवनी है, उससे तो विवाद कम से कम न रहे, बाकी तो कोई भी अच्छी किताब, या अच्छा लेखन पूरी तरह विवादमुक्त हो नहीं सकते।
आज इस कॉलम को लिखते हुए मुझे मेहनत जरा भी इसलिए नहीं लग रही है कि मैं इन्हीं सब विधाओं को बीते कुछ बरसों से पढ़ रहा हूं, और इन दिनों एक बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति के छोड़े गए आत्मकथ्यात्मक नोट्स को एक आत्मकथा, या जीवनी में ढालने का काम भी कर रहा हूं। एक और दूसरे महत्वपूर्ण व्यक्ति के बहुत से इंटरव्यू करके अभी इस विचार-विमर्श के बीच हूं कि क्या इस पर मैं उनके लिए उन्हीं के नाम से प्रेत लेखन कर दूं? उन्होंने इस पहले विकल्प को खारिज कर दिया। अब हम दो दूसरे विकल्पों के बीच में फंसे हुए हैं कि यह उनकी अधिकृत जीवनी बने, या फिर मैं उनकी सहमति, और अनुमति के बिना भी अपनी मर्जी की और सामग्री तय करके पूरी तरह से एक स्वतंत्र जीवनी लिखूं। इन दो किताबों में वक्त जाने कितना लगेगा, लेकिन दोनों अलग-अलग किस्म से लिखी जानी हैं, और इन्हें पूरा करते हुए मैं कुछ अनुभवसंपन्न हो जाऊंगा, और कुछ आर्थिकसंपन्न हो रहा हूं, यह तो तय है ही। जिस काम को मैं मुफ्त में भी खुशी-खुशी करता, उस काम के लिए भुगतान पाना कितनी अच्छी बात है! अब सोनिया गांधी से किसी को भुगतान मिला है या नहीं, ये तो वे ही बता सकती हैं, या पाने, या न पाने वाले बता सकते हैं। पता नहीं यह बात कभी उजागर होगी या नहीं, लेकिन इतना तो तय है कि सोनिया की किताब से कई दूसरी बातें जरूर उजागर होंगी, और यही करना सार्वजनिक जीवन में मिले सम्मान से उऋण होना होता है।
सूचना और सामग्री की सुनामी के बीच बीते हुए दिनों की यादें
30 अगस्त 2026
मीडिया, सोशल मीडिया, और मैसेंजर सर्विसों के इस दौर में काम की बात तक पहुंच पाना थोड़ा सा मुश्किल रहता है। जिस तरह किसी राह पर चलते हुए अगर दाएं-बाएं कंटीली झाडिय़ां हैं, तो उनके बीच से गुजरते हुए कपड़े फंसने लगते हैं, कांटे हाथों को चुभने लगते हैं। पार पाना थोड़ा सा मुश्किल रहता है। उसी तरह आज हर किसी को पढऩे, देखने, और सुनने के लिए इतना कुछ हासिल है, और तकरीबन सब कुछ मुफ्त भी है, कि क्या देखा-सुना जाए, और क्या छोड़ा जाए, यह बड़ा मुश्किल चुनाव होता है। कुछ बातें जरूरत की रहती हैं, कुछ बातें मनोरंजक रहती है, कुछ बातें सतह पर सनसनीखेज दिखती हैं लेकिन बाद में बिना झाग वाली फुसफुसी निकलती हैं। कुछ बातें मादक या उत्तेजक रहती हैं, और वे कुछ वयस्क मनोरंजन देती हैं। कई बातें बड़े-बड़े मेडिकल दावों की शक्ल में रहती हैं कि किस चीज का पानी सात दिन तक पीने पर किस तरह डायबिटीज या कैंसर ठीक हो जाते हैं। कुछ बातें पूंजीनिवेश की दावों की शक्ल में रहती हैं कि अजीम प्रेमजी, या निर्मला सीतारमन ने अपनी पूंजी किन शेयरों, या क्रिप्टोकरेंसी में लगाई, अपनी दौलत कितने हजार गुना बढ़ाई, और अब वे किस तरह दूसरों को इसी तरह के पूंजीनिवेश की सलाह दे रहे हैं। ऐसा सैलाब सोशल मीडिया पर है, और मैसेंजरों से भी यह बरसते रहता है। लोगों के दिमाग की हालत एक सुनामी में समंदर किनारे फंसे हुए इंसानों सरीखी हो जाती है, जो किसे थामे, और किसे छोड़ें, यह उनकी समझ के बाहर रहता है। ठीक ऐसा ही आज नजरों और दिमाग के साथ होता है जिनके इर्द-गिर्द हर तरफ से वांछित, और अवांछित हर किस्म की पोस्ट और संदेश बरसते रहते हैं।
अभी 20-25 बरस पहले तक का ही तो दौर था जब लोगों को कुछ अखबार, और कुछ टीवी चैनलों में से एक-दो को छांटना रहता था, और मोबाइल पर कोई संदेश भी टाईप करना हो, तो एक-एक बटन पर तीन-तीन अक्षर रहते थे, और उसी बटन को तेजी से एक, दो, या तीन बार दबाकर उन अक्षरों में से किसी को छांटा जा सकता था। सुख के वे दिन चले गए, और अब तो लोग मनचाही तस्वीरें या वीडियो गढक़र, शब्दों का मतलब भी जाने बिना पोस्ट कर सकते हैं, और एक-एक पोस्ट दंगा करवाने के लिए काफी भी हो सकती है। खासकर धर्म, या गाय, या किसी धार्मिक किताब, या झंडे-डंडे को लेकर तुरंत ही बवाल खड़ा हो सकता है। और लोग हैं कि उन्हें बारूद या आरडीएक्स की तरह की विस्फोटक बातें लिखकर पोस्ट करते हुए जरा भी हिचक नहीं होती। दरअसल बड़े बुजुर्ग एक लाईन कहते थे, जैसा खाओ अन्न, वैसा होए मन। कुछ दूसरे लोग कहते थे कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी संगति से होती है। अलग-अलग किस्म की ऐसी कहावतों का निचोड़ यही रहता है कि लोग जिस तरह की बातों से घिरे रहते हैं, वैसे ही हो जाते हैं।
कभी-कभी हमें हैरानी भी होती है कि आज सूचना और सामग्री की सुनामी के बीच में समंदर से जितना कचरा आकर किनारे इकट्ठा हो जाता है, उसमें से खूबसूरत शंख, और सीप, काम की चीजें कोई कैसे देख पाते हैं! जब हर किस्म का सैलाब चारों तरफ से आकर दिल, दिमाग, कान, आंख, और कुल मिलाकर समझ पर थपेड़े मारते रहता है, तब कोई संभल कैसे पाते होंगे? आज सोशल मीडिया कंपनियों के एल्गोरिदम इस किस्म के हैं कि आप चार दिन जिस सामान के इश्तहार को देखें, तो अगले चौदह दिन इंटरनेट पर आपको वही सामान, या दूसरे ब्रांडों का वह सामान दिखते रहेगा। आप चार दिन कोई वयस्क रील देख लें, तो चौदह दिन तक आपको उसी किस्म की वयस्क रील दिखती रहेंगी, सोशल मीडिया का एल्गोरिदम यह समझ जाएगा कि आपको एक महिला के कपड़ों का नाप लेता हुआ दर्जी देखना बड़ा सुहाता है। इस तरह हम एक ऐसे जाल और पिंजरे के भीतर कैद हो जाते हैं कि हमें बस वही पूरी दुनिया लगने लगती है। जिस तरह रेशम का कीड़ा एक ककून के भीतर कैद रह जाता है, हम उसी तरह अपनी पसंद के एक घेरे के भीतर कैद रह जाते हैं, और सोशल मीडिया चारों तरफ से हमें उसी तरह की चीजों से घेरकर रखता है। उसका कारोबार ही यही है कि लोगों को अधिक से अधिक समय तक किसी भी तरह की तरकीब से अपने घेरे में घेरकर रखना। यही काम वह करता है।
ऐसे में लोग आज क्या करें? अखबार और टीवी चैनल जैसे कुछ या खासे पुराने हो चुके माध्यमों के मुकाबले आज के तरह-तरह के माध्यम लोगों पर हमला कर रहे हैं। ऐसे में हम सोचते हैं कि लोगों की पसंद कहां पर है? कुछ लोगों को लग सकता है कि सोशल मीडिया, और इंटरनेट पर वे अपनी पसंद की चीजों को देख सकते हैं, लेकिन वे यह नहीं देख पाते कि उनकी पसंद को भांपकर टेक्नॉलॉजी यह तय कर रही है कि वे आगे क्या देखेंगे। इसके मुकाबले छपे हुए अखबारों का वह वक्त कितना भला था जिसमें अखबार खबरों के पन्ने तय कर सकता था, पन्नों पर खबरों को ऊपर-नीचे तय कर सकता था, लेकिन अखबार यह तय नहीं कर सकता था कि पाठक किस क्रम में चीजों को पढ़ेंगे, पहले कौन से पन्ने देखेंगे, किस चीज पर कितना वक्त लगाएंगे। वह छपकर आता था, चौबीस घंटे में रद्दी में जाता था, लेकिन लोगों को पसंद का एक मौका देता था कि वे क्या पढ़ें, कितनी देर पढ़ें, और फिर पढक़र दूसरों से अगर चर्चा करनी है, तो दिमाग को कुछ बातों को याद भी रखना पड़ता था। आज तो हालत यह है कि जो खुद को पसंद हो, उसे अगर दूसरों को बढ़ाना हो, तो याद रखना तो दूर रहा, पूरा पढऩे या देखने की जरूरत भी नहीं पड़ती है। पल भर में उसका लिंक सैकड़ों-हजारों लोगों को भेजा जा सकता है। फिर उन हजारों लोगों के सिर पर भी जब यह पत्थर पड़ता है, तो कम से कम कुछ सेकेंड तो उन्हें इस पर लगाने ही पड़ते हैं। मतलब यह कि आपने बिना देखे सिर्फ हैडिंग पढक़र, या कवर-पोस्टर देखकर दूसरों को जो भेज दिया, वे लोग जरूरी नहीं हैं कि उसे बिना पढ़े जिंदा रह पाएं, वे उसे देखने में, सुनने में वक्त गवाएंगे, और हो सकेगा तो दूसरों तक आगे भी बढ़ाएंगे। अखबारों को पढ़ते हुए यह सुविधा नहीं रहती थी कि उसे काटकर उसकी कतरन सौ लोगों को भेज दी जाए। लोगों का वक्त, और उनकी जिंदगी बर्बाद करने की यह सहूलियत स्मार्टफोन की टेक्नॉलॉजी ने ही मुहैया कराई है। इसलिए लोगों को ठंडे दिल से यह सोचना चाहिए कि अखबार उनका क्या-क्या भला करता था। वह दिमाग पर यह जिम्मेदारी डालता था कि वे छपे हुए बहुत सारे पन्नों में से किस पन्ने पर छपी कौन सी खबर, कौन सा लेख, या कौन सा इश्तहार देखे। यह तय करना दिमाग पर कुछ जोर डालना होता था। जब टेलीविजन के बुलेटिन आने लगे, तो यह जिम्मेदारी खत्म हो गई। कोई एक चैनल जिस क्रम से खबरों को दिखाता है, लोगों को उसी सिलसिले से खबरें देखनी पड़ती हैं, और आगे-पीछे करने की अखबारी पसंद अब नहीं रह गई। दूसरी बात यह कि खबर को याद रखने की अब कोई जरूरत नहीं रह गई क्योंकि जब जहां आप हैं, पखाने में बैठे हुए भी आप अपनी पसंद के धार्मिक प्रवचन, राजनीतिक भाषण, नाच-गाने के वीडियो दूसरों को भेज सकते हैं, कुछ भी याद रखने की जरूरत नहीं है। दिमाग का इस्तेमाल कम से कम होते चल रहा है। एक वक्त टेलीविजन को ईडियट बॉक्स कहा जाता था, आज के स्मार्टफोन को उसके मुकाबले क्या कहा जाए? यह तो अपने ही दिल-दिमाग की डाल पर बैठे हुए अपने ही स्मार्टफोन से उस डाल को काटने सरीखी हरकत नहीं लगती कभी-कभी?
नेपाल की अभी बाढ़ के बाद वहां के जमीनी हालात दिखाने के लिए किसी खुले इलाके के बीच कीचड़ का दलदल दिखाने के लिए भारत से गए हुए टीवी रिपोर्टरों में से एक-एक करके शायद एक ही जगह पर अपने पांव धंसाकर शहादत का दर्जा पा रहे हैं। माइक थामे हुए टीवी कैमरे के सामने एक महिला संवाददाता 6 इंच कीचड़ में खड़ी हुई लगातार चीख रही है कि बाढ़ से दलदल इतना हो गया है कि वह निकल नहीं पा रही है। उसका घुटना जींस के भीतर भी कीचड़ से डेढ़ फीट ऊपर दिख रहा है, लेकिन वह अपने को घुटनों तक धंसा हुआ कहती जा रही है। लुग्दी से बने कागज पर छपने वाले अखबारों के रिपोर्टर कैमरे और माइक से दूर रहते थे, कोई सुबूत नहीं रहते थे, फिर भी ऐसा और इतना झूठ नहीं बोलते थे जितना कि आज कैमरों के सामने बोलते हैं। इन सब बातों से लगता है कि सूचना और सामग्री की सुनामी से पहले छपे हुए अखबार एक मजबूत और भरोसेमंद पसंद रहते थे जिनमें संवादाताओं के सनसनीखेज, और झूठे नाटक की गुंजाइश भी नहीं रहती थी। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन...
भावनाओं से बेसहारा गाय का न पेट भरेगा, न साँस चलेगी...
29 अगस्त 2026
किसी भी देश-प्रदेश में सरकारी योजना का सबसे बेहतर अमल अमूमन राजधानी या उसके इर्द-गिर्द होने की संभावना रहती है क्योंकि शासन-प्रशासन की चुस्ती वहां अधिक रहती है। लेकिन अभी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के म्युनिसिपल की शहर से लगी हुई एक गौशाला की बदहाली का वीडियो जिन्होंने देखा होगा, उन्हें लगा होगा कि गायों की ऐसी मौत देने से बेहतर उन्हें कसाईघर भेज देना चाहिए। गायों का जब दूध देना बंद होता है, तो उसके बाद वे गौपालक के लिए उसी तरह अवांछित हो जाती हैं जिस तरह बिना शादी किसी नाबालिग बच्ची से जन्मने वाले बच्चे को अवांछित मानकर घूरे पर डाल दिया जाता है। सरकारी अहातों में गायों की हालत घूरे पर फेंके गए बच्चे से बेहतर नहीं है। बेघर गायों के लिए म्युनिसिपल की राजधानी की गौशाला में शायद ढाई सौ गायों को रखने की क्षमता थी, और उसमें छह सौ गायें इस तरह मिलीं कि वे हिलडुल भी नहीं सकती थीं। जिस तरह किसी ट्रक में उन्हें ठूंस-ठूंसकर खड़ा करके कसाईघर ले जाया जाता है, ठीक उसी तरह वे इस सरकारी गौशाला में थीं, और वहीं पर कई गायें इस बुरी तरह गंदगी में मरणासन्न पड़ी थीं कि उसे वीडियो में देखते भी नहीं बन रहा था। फिर यह भी पता लगा कि जिसे यह गौशाला चलाने का जिम्मा या ठेका दिया गया है, उसे 8 महीने से भुगतान नहीं हुआ है। गाय को जो लोग माँ मानते, कहते थकते नहीं हैं, उन्होंने इस हालत में गायों को रखा है। फिर राजधानी से दूर छत्तीसगढ़ में कुछ और जगहों पर गौशालाओं का ऐसा ही हाल मिला है, उस पर तो राजधानी जितनी फिक्र नहीं की जा सकती।
इससे परे एक दूसरी दिक्कत शहरों के भीतर, और हाईवे पर, सडक़ों पर जी रहे मवेशियों की है। जो पशु दुधारू नहीं रह जाते, उनसे उसी दिन गौपालक अपना रिश्ता तोड़ देते हैं। जिससे कुछ मिलना नहीं है, उसे चारा या सहारा क्यों देना? ऐसे सारे पशु सडक़ों पर रहते हैं, उनसे टकराकर कई गाडिय़ों वाले मरते हैं, कई बड़ी गाडिय़ां ऐसे पशुओं को कुचलते हुए निकल जाती हैं। इनमें से जो लोग गौभक्तों के हाथ लग जाते हैं, उनके लिए मौके पर ही इंसाफ और सजा दोनों का इंसान इस देश के अघोषित कानून में अच्छी तरह कर दिया गया है। बारिश की रात सडक़ों पर बैठे मवेशियों से टकराकर जख्मी होने वाले, या मर जाने वाले लोगों को भी मुजरिम मान लिया जाता है, लेकिन जानवरों को सडक़ों पर ऐसा छोड़ देने वाले बेफिक्र रहते हैं, कभी साल में ऐसे एक-दो लोगों पर हाईकोर्ट में दिखावे के लिए कोई जुर्माना लगा दिया जाता है। लेकिन इन जानवरों को रखने के लिए हर जगह इंतजाम करने का हुक्म सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक देते आए हैं, और वह इंतजाम जमीन पर इसी तरह का दिख रहा है कि वहां जानवरों को मरने के लिए ठूंस दिया गया है। जानवरों के बीच पशुमत संग्रह करवाया जाए, तो शायद वे ऐसी गौशालाओं में जाने के बजाय शहरी घूरों पर जीने, और हाईवे पर कुचल मरने के विकल्प तो अधिक पसंद करेंगे।
गाय को लेकर देश के एक तबके की भावनाएँ चाहे जो हों, उन सारी भावनाओं को मिलाकर भी देश की गायों को महीने में एक वक्त का खाना भी नहीं मिल सकता। सरकारी गौशालाओं का जो हाल रहता है, वह कोई नई बात नहीं है, छत्तीसगढ़ में दशकों से सरकारी अनुदान पर चलने वाली गौशालाओं के ट्रस्टी गायों को भयंकर यातना की हालत में रखते हुए मर जाने देने के दोषी पाए जा चुके हैं, लेकिन आज तक सरकार ने राज्य के पशुओं को लेकर कोई नीति नहीं बनाई है जिसमें दूध देना बंद कर चुकी गाय, या अनुपयोगी बाकी गौवंशीय पशुओं को रखने का इंतजाम हो। शहरों के किनारे के गांवों की एक और समस्या अभी सामने आई, म्युनिसिपलों के कर्मचारी शहरों से गायों को पकडक़र पास के गांवों में छोड़ देते हैं, और वहां पर ये गायें खेतों को चर जाती हैं। इसे लेकर किसान अभी छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में कलेक्ट्रेट पहुंच गए थे, ऐसे पशुओं के पूरे रेवड़ को लेकर। अभी भी जगह-जगह से गायों को रखने की बदहाली सामने आ रही है, और सरकार साफ-साफ न कुछ कहने की हालत में है, न करने की। कभी हाईकोर्ट को कुछ दिखाना होता है, कभी सुप्रीम कोर्ट को, और कभी स्वघोषित गौरक्षकों के तबके को।
गाय दूध देना बंद करने के बाद एक दशक तक गौभक्त समाज पर बोझ बनी रह सकती है। इस पूरे दशक की उसकी जिंदगी का क्या कोई इंतजाम है? या उससे दूध पा लेने वाले कारोबारी उसे सडक़ों पर छोड़ दें, वह घूरों पर जी ले, या हाईवे पर कुचलकर मारी जाए, या अदालत को दिखाने के लिए बनाए गए किसी सरकारी अहाते में भूखों मर जाए! भावनाओं के पैर नहीं होते, उन्हें हकीकत की कड़ी, पथरीली, और कंटीली जमीन नहीं चुभती। भावनाएँ लोगों से नारा लगवाती हैं, लाठियां चलवाती हैं, और भीड़त्या भी करवा देती है। लेकिन इन सारे कामों से किसी एक गाय का भी पेट नहीं भरता। आज अधिकतर प्रदेशों में गायों को कसाईघर जाने से रोकने के लिए जगह-जगह पुलिस और प्रशासन ने मुहिम छेड़ रखी है, और गौ-गुंडों को खुली छूट दे रखी है, कानून उनके हाथ में ही दे दिया है। लेकिन इससे भी गाय का एक वक्त का भी चारा नहीं बनता। इसलिए गाय को राज्यमाता, या राजमाता बनाने जैसी भावनात्मक बातें करने वाले लोगों को यह भी साफ करना चाहिए कि आज जिस तरह शहरों के करीब बनाए गए सरकारी अहातों में ठूंस-ठूंसकर रखी गईं राजमाताएं भूख से मर रही हैं, क्या वैसे में यह राजकीय दर्जा सरकारों के लिए, और गौभक्तों से लेकर गौ-गुंडों तक के लिए कुछ अधिक शर्मिंदगी का नहीं हो जाएगा?
आज गाय को लेकर जिस तरह के तनाव चारों तरफ फैले हुए हैं, क्या धीरे-धीरे गाय पालना खतरनाक काम नहीं लगने लगेगा? आज भी गाय के मुद्दे पर कदम-कदम पर जितना तनाव होता है, और दूध के कारोबार में भैंस अधिक उत्पादक भी रहती है, और भक्तों से मुक्त भी रहती है, ऐसे में गाय पालना हो सकता है कि घट भी चुका हो। एक पहेली का कोई जवाब इस पूरे सिलसिले में हमें नहीं मिलता है कि जब देश में गायों को लेकर अधिकतर राज्यों में बड़े कड़े कानून बन चुके हैं, तब गाय-भैंस वंश के बीफ का एक्सपोर्ट भारत से बढ़ते ही कैसे जा रहा है? यह भी समझ नहीं आता कि यह कारोबार करने वाली कंपनियों के हिन्दू मालिकों ने अपने कंपनियों के नाम मुस्लिम जैसे क्यों रखे हुए हैं? क्या गाय को दूध और कृषि अर्थव्यवस्था से परे सिर्फ पूजा के मकसद से पाला और रखा जा सकता है? क्या किसी भी प्रदेश की सरकार उत्पादक न रह जाने के बाद बाकी पूरी जिंदगी गायों को पालने का खर्च सरकारी खजाने से उठा सकती है? आज सरकारी गौशालाओं में एक गाय पर सरकार जितना खानपान का बजट देती है, उसी के आसपास का पैसा छत्तीसगढ़ की महिलाओं को महतारी वंदन योजना में हर महीने मिलता है। तो क्या गायों को पूरी जिंदगी सरकार इतने खर्च के साथ पाल सकती है, या फिर धीरे-धीरे गौपालन ही मालिकों से लेकर सरकार तक सबके ऊपर, सडक़ों से लेकर ट्रैफिक तक, और म्युनिसिपल तक सबके ऊपर इतना बड़ा बोझ बन जाएगा कि इस देश के तमाम गौरक्षक प्रदेशों में गाय पालना बंद ही हो जाएगा, और उन्हें केरल, गोवा, पश्चिम बंगाल, अरूणाचल जैसे कानूनी रूप से बीफ खाने वाले प्रदेशों में ही रखा जाएगा? जनता के खजाने से जिस योजना पर भी खर्च होता है, उसकी संभावना तौलना जरूरी रहता है। आज शायद गायों को लेकर भावना और उत्तेजना हवा में इसीलिए हैं कि सरकार पर हर गाय का बोझ अभी तक पडऩा शुरू नहीं हुआ है। लेकिन सैद्धांतिक और कानूनी रूप से तो हर बेसहारा गाय का इंतजाम सरकार को ही करना है। क्या इसके लिए सरकार के पास बजट है? और राज्य के इंसानों के कौन-कौन से हक की कटौती करके यह बजट निकल पाएगा?
रोजगार न मिला तो भगवान की प्रतिमाएं कीं चूर-चूर, यह सोच समझने की जरूरत
28 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के बीच घनी बस्ती में दो दिन पहले एक बड़ा तनाव खड़ा हो गया जब शिव और हनुमान के मंदिर में प्रतिमाओं को तोडफ़ोड़ दिया गया। पथरीली प्रतिमाओं को तोडऩा आसान भी नहीं था, लेकिन सीसीटीवी फुटेज की जांच से पुलिस को मुजरिम का पता लग गया, वह उसी इलाके का एक अधेड़, हेमंत अग्रवाल था, जो भगवान से इस बात से खफा था कि वह उसे रोजगार में साथ नहीं दे रहा है, और वह बेरोजगार बना हुआ है। यह व्यक्ति मंदिर के पास ही अपनी माँ के साथ रहता है, और अपनी बेरोजगारी से हताश होकर उसने ईश्वर से हिसाब चुकता करना तय किया। यह तो गनीमत कि यह मामला धर्मान्धता या साम्प्रदायिकता तक नहीं पहुंच पाया, और सीसीटीवी कैमरों की मेहरबानी से पुलिस ने आनन-फानन आरोपी को पकड़ा, और उसके घर से छेनी और हथौड़ी बरामद भी कर लिए।
अब एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि 42 साल का एक आदमी शहर के बीच रहते हुए बेरोजगार बना हुआ है, और इसके लिए वह ईश्वर को जिम्मेदार ठहरा रहा है। उसके हाथ-पैर कम से कम इतने तो चल ही रहे हैं कि वह बजरंग बली की प्रतिमा और शिवलिंग को छेनी-हथौड़ी से तोड़ रहा है। छेनी-हथौड़ी से पत्थर तोडक़र बहुत से मजदूर जिंदगी भर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। सडक़ों के किनारे हर शहर में साल में कुछ हफ्ते ऐसे सिलबट्टे बेचने वाले परिवार बैठकर पत्थर तोड़ते, दागते, उस पर निशान लगाते बैठे रहते हैं, और हर कुछ हफ्तों में वे शहर बदल लेते हैं। यह काम करते हुए आदमी भी दिखते हैं, और औरतें भी। राजस्थान या गुजरात तरफ के दिखने वाले ऐसे जोड़े सडक़ किनारे धौंकनी लगाकर लोहे को तपता लाल करके, घन के वार से आकार देते दिखते हैं, और अमूमन घन चलाने का काम घाघरा पहनी महिला ही करती है। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की एक विख्यात कविता है जिसकी शुरूआत ही इन शब्दों से होती है- वह तोड़ती पत्थर, देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर.., चढ़ रही थी धूप, गर्मियों के दिन, दिवा का तमतमाता रूप, उठी झुलसाती हुई लू, रुई ज्यों जलती हुई भू, गर्द जिनगीं छा गईं, प्राय: हुई दुपहर, वह तोड़ती पत्थर।
नौकरी न मिलने, रोजगार न चलने, इम्तिहान में कामयाब न होने जैसी बातों को लेकर धर्म लोगों को भाग्यवादी बना देता है। लोग पिछले जन्म और अगले जन्म की धार्मिक सोच की कैद में आ जाते हैं कि पिछले जन्म के कुकर्मों का नतीजा है कि इस जन्म में तकलीफ मिल रही है। धर्म के प्रवचनकर्ता यह भी सिखा देते हैं कि अधिक कामना, लालसा, वासना नहीं रखनी चाहिए, और इससे स्वर्ग के रास्ते खुलते हैं। मतलब यह कि मरने के बाद स्वर्ग का लालच दिखाकर जीते जी किसी भी सुख से दूर रखने की कोशिश होती है। वजह यह है कि अगर लोगों के मन में वैराग्य और संन्यास भाव पैदा नहीं किया जा सकेगा, तो लोग अपने हक की लड़ाई लडऩे लगेंगे, सत्ता से उसे अपना जायज हक न मिलने की बात उठाने लगेंगे, मतलब यह कि वे इंसानों से तिलचट्टे भी बनने लगेंगे। धर्म नाम का औजार लोगों को भाग्यवादी इंसान बनाने में ओवरटाइम करते रहता है, और इसीलिए जिसके हाथ में हथौड़ी-छेनी की ताकत है, वह भी कोई काम तलाशने के बजाय ईश्वर को जिम्मेदार मानकर उसकी प्रतिमाओं को चूर-चूर कर रहा है।
दक्षिण के एक महान समाजसुधारक पेरियार का तर्क था कि यदि समाज अन्याय को ईश्वर की इच्छा कहकर स्वीकार कर ले, तो शोषण कभी समाप्त नहीं होगा। भगत सिंह ने अपने प्रसिद्ध लेख, मैं नास्तिक क्यों हूँ, में लिखा था कि मनुष्य को अपनी समस्याओं का समाधान अपने साहस, बुद्धि, और संघर्ष से खोजना चाहिए, किसी दैवीय हस्तक्षेप की प्रतीक्षा में नहीं रहना चाहिए। राहुल सांकृत्यायन ने बार-बार यह लिखा है कि मनुष्य को अपनी दुर्दशा का कारण भाग्य या पिछले जन्म में नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक, और आर्थिक परिस्थितियों में खोजने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी लिखा था कि अंधविश्वास मनुष्य को कर्मशीलता से दूर ले जाता है। कार्ल माक्र्स ने धर्म को जनता के लिए अफीम की तरह करार दिया था, और कहा था कि धर्म मनुष्य को वास्तविक कारणों से लडऩे के बजाय सांत्वना देकर शांत भी कर सकता है। कहने के लिए किसी-किसी धर्म में कर्म के लिए भी कुछ कहा गया है, गीता में कर्म पर जोर दिया गया है, बुद्ध ने कहा है कि दुख के कारणों को समझो, और उनका समाधान खुद ढूंढो, सिक्ख परंपरा ने मेहनत, और सेवा पर जोर दिया है, लेकिन धर्म के जो प्रचलित रूप आज चलन में हैं, उनमें धर्म का प्रचार और गुणगान करने वाले लोग यही सिखाते हैं कि बेलपत्र पर शहद लगाकर किसी खास धर्म की प्रतिमा पर चढ़ाने से ऐसा करने वाले के बच्चों को बिना पढ़े भी इम्तिहान में पास करने से कोई नहीं रोक सकते। धर्म के भीतर समझदारी की थोड़ी-बहुत गूढ़ बातें अगर हैं भी, तो उन्हें कपड़े में लपेटकर उपासना स्थलों की ताक पर धर दिया जाता है, और चलन में सबसे मूढ़ बातों को फैलाया जाता है जो कि लोगों को अंधविश्वासी और भाग्यवादी बना सकें। जिन्हें धर्म का गुणगान करना रहता है वे धर्मग्रंथों से कुछ चुनिंदा गूढ़ बातों को निकालकर पेश कर देते हैं, जो कि चलन में जमीन पर नहीं रहतीं। दूसरी तरफ ऐसी मूढ़ बातें जिनसे ईश्वर के एजेंटों की अपनी दुकानदारी चलती है, उन बातों को ही फैलाया जाता है, और उनसे लोगों को ऐसी दिमागी हालत में लाया जाता है कि वे सामाजिक, और आर्थिक शोषण के खिलाफ, सामाजिक अन्याय के खिलाफ लडऩे की सोच भी न सकें। अब भला आज उनके साथ जो इंसाफ पिछले जन्म के उनके कर्मों की वजह से हो रहा है, उसके खिलाफ वे इस जन्म में किससे लड़़ सकते हैं? इस तरह धर्म अपने उस बुनियादी मकसद को पूरा करने में बड़ा कामयाब रहता है जिसके लिए कबीलों के वक्त से वहां के सरदारों ने बैगा-गुनिया बनाए थे, बाद में समाज व्यवस्था विकसित होने के साथ-साथ वे अलग-अलग धर्मों के पुजारियों, और धर्मगुरुओं के चोगों में तरक्की पाते गए, और अपने वक्त के राजा, और कारोबारियों को उनके मकसद में मदद करते रहे। यह भूलना नहीं चाहिए कि मानव सभ्यता के इतिहास में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बसे हुए, एक-दूसरे से कोई भी संपर्क न रखने वाले समुदायों में भी राजा को ईश्वर का प्रतीक मानने का काम होते रहा। प्राचीन मिस्र में राजा को ईश्वर का दूत ही नहीं, बल्कि देवता माना जाता था, और उसकी आज्ञा का उल्लंघन धार्मिक अपराध। राज्य और धर्म घुले-मिले थे। कुछ पुरानी संस्कृतियों, जैसे मेसोपोटामिया में राजाओं को देवताओं द्वारा नियुक्त शासक माना जाता था। चीन में राजा को स्वर्ग का प्रतिनिधि माना जाता था। मध्यकालीन योरप में माना जाता था कि राजा सीधे ईश्वर द्वारा नियुक्त है, और उसके विरुद्ध विद्रोह ईश्वर के विरुद्ध माना जा सकता था। कई इस्लामी साम्राज्यों में खलीफा या सुल्तान को अल्लाह का प्रतिनिधि, या धरती पर अल्लाह की छाया कहा जाता था। हिन्दू धर्म के अलग-अलग हिस्सों में राजा को अलग-अलग देवताओं के अंशों से बना हुआ बताया जाता था। जापानी सम्राट को सूर्यदेवी का वंशज माना जाता है। इस तरह धर्म ने सिर्फ मनुष्य और ईश्वर का रिश्ता तय नहीं किया, उसने राजा और प्रजा के संबंध भी तय कर दिए जिसके तहत बेरोजगार होने, या असफल होने पर ईश्वर को जिम्मेदार मानकर उसे निशाना बनाने की दिमागी हालत आती है। दुनिया के इतिहास में आधुनिक लोकतंत्र राजा की दैवीय सत्ता की सोच से ऊपर उठकर जनता द्वारा निर्वाचित शासन व्यवस्था में तब्दील हुआ। लेकिन धर्मों के मूढ़ हिस्सों ने जनता को राजा को चुनते हुए भी अपनी बदहाली के लिए राजा को जिम्मेदार ठहराने की सोच से वंचित रखा, धर्म की गूढ़ बातों वाले ग्रंथों से परे, धर्म की मूढ़ बातों के व्यापक असर के बारे में बात की जानी चाहिए।
कोई जूलियस सीजर और रामकथा की किताबें भेजे देश के इन बड़े जजों को
27 अगस्त 2026
सुप्रीम कोर्ट के एक जज, जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के काम के तरीकों पर पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए हैं, और ऐसे मामले गिनाए हैं जिनमें बड़े-बड़े नफे-नुकसान वाले केस दूसरे जजों से जस्टिस शर्मा ने खुद अपनी बेंच पर ले लिए, और फिर ताकतवर लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए अदालत का बेजा इस्तेमाल किया। जस्टिस मेहता ने इस महीने 2, 10, और 17 तारीख को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को ये पत्र लिखे हैं, जिनमें बहुत सारे मुद्दे गिनाए गए हैं। बड़े-बड़े जमीन-जायदाद के ऐसे केस के नाम दिए गए हैं जो कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश ने अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करते हुए अपनी अदालत में बुला लिए। अभी कुछ दिन पहले ही एक और हाईकोर्ट, पंजाब एवं हरियाणा, के बारे में इसी तरह की खबर आई थी कि वहां भी कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने दूसरे जजों की बेंच से राजनीतिक प्रभाव वाले चुनिंदा मामलों को अपनी कोर्ट में बुला लिया, और फिर ऐसे फैसले दिए जिससे पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार पर बहुत बड़ा बोझ पड़ा, और वह बोझ कोई भी सरकार उठा नहीं सकती। एक के बाद एक, दो ऐसे जजों की खबरें इस हाईकोर्ट से ऐसी आई थीं जिन्हें लगातार ऐसे विवादास्पद मामलों से जोडक़र देखा जा रहा था।
अभी दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज, जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला खबरों में बना ही हुआ है, जिनके बंगले से बोरियां भर-भरकर अधजले नोट बरामद हुए थे। वहां आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों, और पुलिसकर्मियों को ये बोरियां मिलीं, इनके वीडियो भी सामने आए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की एक जांच कमेटी बनाई, जिसमें यह पाया कि बंगले के स्टोर रूम में सचमुच में बड़ी मात्रा में नोट रखे हुए थे। कमेटी ने यह भी पाया कि आग बुझने और दमकलकर्मियों के जाने के बाद सुबह-सुबह वहां से जली हुई नगदी हटाई गई। इस कमेटी की रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई, और आगे की संवैधानिक कार्रवाई करने की सिफारिश की गई। इस मामले से कई और किस्म के संदेह भी जुड़े हुए थे, लेकिन कोई सुबूत न रहने से यह स्थापित नहीं हो सका कि यह पैसा किसने, किसको, किस वजह से दिया था, यह किस भुगतान का था। फिर भी किसी हाईकोर्ट जज का इतनी बड़ी नगदी से सीधा रिश्ता शायद पहली बार ही सामने आया।
इस सिलसिले में थोड़ी सी हैरानी इस बात को लेकर हो रही है, कि पिछले कुछ हफ्तों से सुप्रीम कोर्ट का ही एक जज मुख्य न्यायाधीश को ऐसे गंभीर आरोपों वाली चिट्ठी लिख रहा है, और अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में राजस्थान हाईकोर्ट का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अनियमित तरीके से काम करते हुए, पक्षपात और भाई-भतीजावाद दिखाते हुए काम कर रहा है, और इस पर सुप्रीम कोर्ट कुछ करते भी नहीं दिख रहा है। किसी भी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश किसी मामले के लिए बेंच तय कर सकते हैं, और बेंच का फैसला ही कई मामलों में केस का फैसला भी मान लिया जाता है। खासकर जब कीमती जमीन-जायदाद से जुड़े हुए, आर्थिक नफा-नुकसान के मामलों की बेंच बदली जाती है, तो लोगों का शक जायज ही रहता है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने यह कहा है कि उन्होंने जस्टिस शर्मा से स्पष्टीकरण मांगा है। भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट का ही एक जज किसी राज्य के हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ बार-बार लिखित शिकायत कर रहा है, और उस पर देश का मुख्य न्यायाधीश कई हफ्ते बाद भी स्पष्टीकरण का ही इंतजार कर रहा है! ऐसे में लोगों को कुछ और जजों के विवाद भी याद पड़ते हैं कि किस तरह उनके बीते बरसों में उन पर जमीन-जायदाद की खरीद-बिक्री में आर्थिक अनियमितता के आरोप लगे थे।
किसी भी लोकतंत्र या दूसरी शासन व्यवस्था में एक लाईन अक्सर कही जाती है कि सीजर की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। अब इसका संदर्भ यह है कि ईसा के 62 बरस पहले रोमन शासक जूलियस सीजर की पत्नी घर पर एक धार्मिक समारोह करवा रही थी, जो कि केवल महिलाओं के लिए था। वहां पर एक नौजवान महिला बनकर भीतर घुस गया, और माना गया कि वह शासक की पत्नी से मिलने पहुंचा था। इसे लेकर पूरे रोम में बड़ा राजनीतिक, और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया। सीजर को यह विश्वास नहीं था कि उसकी पत्नी ने कोई अपराध किया है, उसने अदालत में भी यही बात कही, लेकिन फिर भी उन्होंने पत्नी को तलाक दे दिया। जब उनसे पूछा गया कि वे बीवी को बेकसूर मानते थे, तो फिर तलाक क्यों दिया, तो उन्होंने कहा कि राजा की पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह संदेह की छाया भी अपने पर पडऩे दे। वहीं से यह लाईन निकली कि राजा की पत्नी को संदेह से भी ऊपर रहना चाहिए। इसे सार्वजनिक जीवन में ईमानदार रहने से ऊपर बढक़र ईमानदार दिखने की भी सोच के रूप में दुनिया भर में माना गया। फिर भारत, और दुनिया भर की अदालतों में भी इससे मिलती-जुलती एक सोच आगे बढ़ी कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, होते हुए भी साफ-साफ दिखना चाहिए।
भारतीय संस्कृति में इसकी एक बड़ी मिसाल रामकथा में आती है जहां अयोध्या के एक निवासी की एक बात को सुनकर वनवास से लौटे राम अपनी पत्नी सीता को घर से निकाल देते हैं। उनका पैमाना भी यही रहता है कि राजा की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। यह फैसला भयानक रूप से गलत था, लेकिन ऐसे ही कड़वे फैसलों की वजह से राम, मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाए थे। ऐसे भारत में सबसे बड़ी अदालतों के जजों को न सिर्फ ईमानदार रहना चाहिए, बल्कि साथ-साथ ईमानदार दिखना भी चाहिए, और संदेह से ऊपर तो रहना ही चाहिए। जहां किसी जज से यह उम्मीद की जाती है कि वे किसी पक्षकार, या किसी वकील, या केस के इतिहास से अपना दूर का रिश्ता रहने पर भी उसे सुनने से इंकार कर दे, वहां पर इतने आरोपों के साथ कोई जज अगर अनियमित तरीके से काम कर रहे हैं, तो न्यायपालिका पर किसका भरोसा रह जाएगा? ऐसा भी नहीं कि आज हर किसी का न्यायपालिका पर बहुत बड़ा भरोसा है। देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का जितना पतन हुआ है, उसकी वजह से नौजवान पीढ़ी, और बच्चों तक में देश की व्यवस्था को लेकर बेचैनी और संदेह दोनों भरे हुए हैं। किसी जज को खुद भी ऐसी शर्मनाक नौबत से बचना चाहिए, और जब सुप्रीम कोर्ट के एक जज यह लिखकर दे रहे हैं कि राजस्थान हाईकोर्ट के कुछ जजों ने उनसे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ऐसी शिकायतें की हैं, तो बिना देर किए संदेह के घेरे वाले जज को अपने आपको ऐसे पसंदीदा मामलों की सुनवाई से तो अलग कर ही लेना चाहिए। भारत की न्यायपालिका में यह तो जरूरी रहता भी नहीं है कि किसी मामले की सुनवाई कोई एक खास जज करे। ऐसे जज को खुद होकर अपने को आर्थिक वजन वाले मामलों से तो अलग कर ही लेना चाहिए। हमने जिन दो पुरानी कहानियों का जिक्र ऊपर किया है, उन दोनों की किताबें जस्टिस शर्मा को उपहार में भेजनी चाहिए, क्योंकि ऐसा लगता है कि उन्होंने ये दोनों कहानियां पढ़ी नहीं हैं।
विदेशी फर्जीवाड़े से डॉक्टर बने लोग कैसा इलाज करेंगे?
26 अगस्त 2026
भारत के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में जिन्हें दाखिला नहीं मिलता है, और जिन्हें डॉक्टरी पढऩे की हसरत रहती है, ऐसे लोगों के लिए दूसरे देशों के मेडिकल कॉलेजों के स्वागतद्वार खुले रहते हैं। रूस, यूक्रेन, चीन, बांग्लादेश के साथ-साथ किर्गिस्तान, फिलीपींस, और उजबेकिस्तान जैसे कई देशों से एमबीबीएस की डिग्री दिलाने वाली एजेंसियां भारत में उसी तरह सक्रिय हैं, जिस तरह इन दिनों साइबर फ्रॉड करने वाली एजेंसियां कॉल सेंटर चला रही हैं। एक प्रमुख अखबार, दैनिक भास्कर की एक खोजी रिपोर्ट में आज ही यह स्टिंग ऑपरेशन छपा है कि ये एजेंसियां इन देशों में मेडिकल दाखिला करवाने के साथ-साथ कॉलेज जाने से भी छूट दिलवा रही हैं कि वे घर बैठे पढ़ाई करें, और सिर्फ इम्तिहान देने के लिए उन देशों में चले जाएं। इस सबकी लागत भारत में एमबीबीएस पढ़ाई के मुकाबले खासी कम भी है। एक तो दूसरे देशों से एमबीबीएस या उसके बराबर की डिग्री लेकर आने वाले भारतीय लोगों को भारत में एफएमजीई नाम का एक इम्तिहान पास करना पड़ता है, तभी वे यहां डॉक्टरी कर सकते हैं। साल में दो बार होने वाली इस इम्तिहान में 12 फीसदी से लेकर 25 फीसदी तक ही लोग पास हो पाते हैं, और वे ही लोग भारत में मरीज देख सकते हैं, सरकारी या निजी अस्पताल में डॉक्टर की नौकरी कर सकते हैं। बाहर से पढक़र आने वाली बहुत से लोग तीन-चार बार भी ऐसी इम्तिहान देकर खींचतानकर पास होते हैं, और हो सकता है कि इनमें भी नीट की तरह की धांधली चलती हो।
देश भर में कई प्रदेशों में चिकित्सा शिक्षकों की इतनी कमी है कि नेशनल मेडिकल कमीशन के दौरे के समय घर बैठे हुए, रिटायर हो चुके, कभी न पढ़ाने वाले किसी भी तरह के चिकित्सक को शिक्षक बताकर मान्यता ले ली जाती है, या बढ़वा ली जाती है। इस फर्जीवाड़े से असल मेडिकल पढ़ाई का कोई लेना-देना नहीं रहता, क्योंकि जिस तरह कुछ दूसरे देशों में फर्जी हाजिरी दिलाकर छात्रों को मेडिकल पढ़ाई न करने की छूट दिलवा दी जाती है, ठीक उसी तरह भारत के बहुत से मेडिकल कॉलेजों में ऐसी फर्जी नियुक्ति दिखाकर उन्हें शिक्षक बता दिया जाता है, और यह तो जाहिर है कि वह पढ़ाई होती ही नहीं है। ऐसे में उत्तर भारत, या हिन्दी भारत के प्रदेशों में आबादी के अनुपात में मेडिकल सीटें कम होने का तर्क देकर एनएमसी दक्षिण भारत में सीटें बढ़ाने से मना कर चुका है, जहां पर कि मेडिकल सीटें बढ़ाने का ढांचा मौजूद है। यह रूख हैरान करता है कि इस देश में दुनिया के कमजोर किस्म के देशों से फर्जीवाड़े से डिग्री खरीद लेना एनएमसी को मंजूर है, लेकिन अपने ही देश के भीतर दक्षिण भारत को अधिक मेडिकल सीटें मंजूर करना उसे मंजूर नहीं है। ऐसे उग्र क्षेत्रवादी नजरिए की वजह से अभावग्रस्त उत्तर भारत का और नुकसान हो रहा है, क्योंकि अगर दक्षिण में सीटें बढ़तीं, तो उनमें से उत्तर के छात्र-छात्राओं को भी जगह मिली रहती, और हो सकता है कि उनमें से कई नौजवान डॉक्टर बनकर लौटकर अपने इलाकों में आते। अब पूरी तरह फर्जीवाड़े से विदेशी डिग्री पाना ही बहुत से बच्चों के लिए अकेला जरिया रह गया है। राष्ट्रीय स्तर पर बने हुए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से देश के एकता के ढांचे को नुकसान होते दिख रहा है। इससे उत्तर-दक्षिण के बीच खाई भी गहरी, और चौड़ी हो रही है, और देश की चिकित्सा शिक्षा क्षमता का बेहतर इस्तेमाल नहीं हो रहा।
अब अगर हम चिकित्सा शिक्षा से कुछ देर के लिए हटकर लोगों के इलाज पर आएं, तो उसमें भी इस रूख का नुकसान हो रहा है। दक्षिण भारत से तैयार होने वाले किसी भी इलाके के छात्र-छात्राओं का फायदा पूरे देश की स्वास्थ्य सेवाओं को किसी न किसी तरह मिल सकता था। लेकिन विदेशों में मोटा पैसा खर्च करके डॉक्टर बनकर लौटने वाले लोगों में से शायद ही कोई देश के ग्रामीण इलाकों में जाने वाले होंगे। नतीजा यह है कि सरकारी हो या निजी अस्पताल हो, भारत के अस्पताल मरीजों से उसी तरह भरे हुए दिखते हैं, जिस तरह अदालतें मुकदमों से भरी हुई रहती हैं, सडक़ें जानवरों से भरी हुई रहती हैं, और गैस एजेंसियां सिलेंडर की कतार में लगे लोगों से भरी रहती हैं। इस सिलसिले को खत्म करने के लिए उन प्रदेशों को और निजी संस्थाओं को बढ़ावा देना होगा, जो कि अच्छी या बेहतर चिकित्सा शिक्षा दे सकते हैं। सरकार एक तरफ तो अपनी हर संपत्ति का निजीकरण करती जा रही है, निजी चिकित्सा शिक्षा आज भी देश में मान्यता प्राप्त है। लेकिन ऐसे में भी सरकार के नियमों का आल-जाल अगर निजी चिकित्सा शिक्षा को आगे बढऩे से रोक रहा है, तो उसे तोडऩा जरूरी है। सरकारें हर चीज को नियंत्रित करने के मामले में इतनी बावली न रहें कि वे कंट्रोल-फ्रीक कहलाने लगें। आज देश में चिकित्सा शिक्षा पर काबू एक बहुत ही भ्रष्ट व्यवस्था है, और बीते बरसों में कितने ही लोगों को इस सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है। इससे जाहिर है कि सिर्फ नियंत्रण की नीयत से काम ईमानदार नहीं हो जाता, सरकार को इसके लिए कोई अलग तरीका निकालना पड़ेगा। दूसरी बात यह कि अलग-अलग राज्यों की क्षमता अगर नहीं है, अगर वे चिकित्सा शिक्षा, और चिकित्सा का ढांचा ही विकसित नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें बराबरी पर आने देने का मौका देने के नाम पर सक्षम राज्यों को पीछे धकेलकर रखना बहुत नाजायज बात है, और यह एक राष्ट्रीय क्षति भी है।
देश में आज भी अधिक फीस देकर निजी कॉलेजों में डॉक्टरी पढऩा एक जायज व्यवस्था है। देश को डॉक्टरों की जरूरत है, फिर चाहे वे किसी भी कॉलेज से पढक़र निकले हों। ऐसे में सरकार तो जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज बनाने के एक सपने को पूरा करने का दिखावा करते दिखती है। इससे जमीनी हकीकत में कोई सुधार नहीं होना है। निजी मेडिकल कॉलेज आज भी मौजूद हैं, और वहां से भी डॉक्टर बनकर निकलने वाले लोग आने वाले बरसों में चिकित्सा शिक्षक, या चिकित्सा कॉलेज के अस्पताल के डॉक्टर बन सकते हैं। इसके लिए एक दूरदर्शी सोच और योजना दोनों की जरूरत है, यह शुरूआत तो केन्द्र सरकार के स्तर पर ही हो सकती है, और उस पर अमल राज्य सरकारें कर सकती हैं। फिर यह भी है कि केन्द्र से परे कई राज्य अपने स्तर पर राष्ट्रीय पैमानों से अधिक भी काम कर सकते हैं, केन्द्र को उनके काम में अड़ंगा लगाना बंद करना होगा। डॉक्टरी की पढ़ाई सिर्फ एक पढ़ाई नहीं है, बल्कि देश की जनता के इलाज के हक को पूरा करने का जरिया भी है। राज्य सरकारें छोटी-छोटी जगहों तक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खोल तो रही हैं, लेकिन हर जगह डॉक्टर नहीं मिल पा रहे हैं, इसके लिए काफी सोच-विचार किया जाना चाहिए।
ले मशालें चल पड़े हैं, बच्चे गांव-गांव के!
25 अगस्त 2026
मध्यप्रदेश की खबर है कि वहां स्कूली छात्राएं परेशानियों को लेकर कलेक्टर से मिलने 62 किलोमीटर पैदल सफर पर निकल गई थीं। अफसरों ने 18 किलोमीटर पर उन्हें रोका, और समझाने की कोशिश की, लेकिन वे स्कूल की बुनियादी समस्याओं को लेकर अड़ी हुई थीं। आखिरकार कलेक्टर जयंती सिंह जिला मुख्यालय बड़वानी से रवाना हुईं, और इन लड़कियों तक पहुंचकर उनकी बातें सुनीं, और समस्याएं सुलझाने के लिए एक कमेटी बनाई। स्कूल की पोशाक में निकली ये लड़कियां सरकारी एकलव्य आदर्श विद्यालय की थीं। अब यह सोचने की बात है कि जिसे सरकार अपने नामी-गिरामी बैनर वाला स्कूल बताती है, उस एकलव्य आदर्श स्कूल में यह नौबत आ रही है। बारिश, पानी के बीच लड़कियां अगर 18 किलोमीटर पैदल जा चुकी थीं, और 62 किलोमीटर जाने का पक्का इरादा रखती थीं, तो यह बिना किसी वजह के तो हो रही पदयात्रा नहीं थी। हम इन दिनों स्कूलों के बारे में कुछ अधिक ही लिख रहे हैं क्योंकि देश में बालिग आबादी के बीच न सही, बच्चों के बीच तो एक नई जनचेतना दिखाई पड़ रही है, और किसी भी लोकतंत्र के जागरूक होने का यह एक बड़ा संकेत है। होना तो यह चाहिए था कि बालिग वोटर तबका अपनी और बच्चों की दिक्कतों को लेकर उठ खड़ा होता, लेकिन जागरूकता जिस पीढ़ी से भी शुरू हो रही है, अच्छी बात इसलिए है कि उसके दूसरी पीढिय़ों तक पहुंचने की एक संभावना तो रहती है।
अब एक बिल्कुल ही दूसरी खबर पर आ जाएं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने अभी महाराष्ट्र के धुले जिले में एक हाईस्कूल के कार्यक्रम में इस प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की बिगड़ती स्थिति, और मराठी माध्यम के बंद हो रहे स्कूलों पर गहरी चिंता जताई है। समाचारों में मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने कहा कि सरकार धार्मिक आयोजनों, और इंट्रा स्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर होने वाले खर्च का मामूली हिस्सा भी शिक्षा पर लगाती तो राज्य भर में सौ-सवा सौ मराठी स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था। उन्होंने कहा कि वे खुद 10वीं तक म्युनिसिपल और जिला परिषद की मराठी स्कूलों में पढ़े हैं, राज्य में स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन शिक्षा का बजट घटते जा रहा है। उन्होंने कहा कि नासिक त्र्यंम्बकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए सरकार 32-34 हजार करोड़ रूपए देती है, और कॉरीडोर प्रोजेक्टस के लिए 11 हजार करोड़ रूपए। यदि इस भारी-भरकम रकम का 0.1 फीसदी हिस्सा, कुल 32 करोड़ रूपए भी स्कूलों के लिए दे दिए जाते, तो ये सौ-सवा सौ मराठी स्कूलें बंद नहीं होतीं। उल्लेखनीय है कि हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने ही यह कहा था कि कुंभ और कॉरीडोर परियोजना पर इतना खर्च हो रहा है। जस्टिस वराले ने हाल की एक घटना पर दुख जाहिर किया कि एक आश्रम शाला में पर्याप्त सुविधाएं नहीं थीं, तीन छात्राओं को फर्श पर सोना पड़ा, और सांप के काट लेने से उनकी मौत हो गई। उन्होंने कहा कि सिर्फ बड़े प्रोजेक्ट ही नहीं, प्राथमिक शिक्षा, और बुनियादी सुविधाओं पर भी गंभीर ध्यान देने की जरूरत है।
आज हम कॉकरोच आंदोलन की वजह से शुरू हुई स्कूल-चेतना की चर्चा कर रहे हैं, कॉकरोचों की नहीं। हम इस मुद्दे पर कुछ दिनों के भीतर दूसरी और तीसरी बार लिखने को भी इस कॉलम की जगह और अपने शब्दों की बर्बादी नहीं मानते क्योंकि इस देश के बच्चों की एक पूरी पीढ़ी के भविष्य से जुड़े हुए मुद्दे पर चर्चा कितनी भी बार की जा सकती है, खासकर इसलिए कि उसमें सुधार के कोई आसार नहीं दिखते हैं। हमने तो बीते कई दशकों में स्कूलों की हालत को कभी इस तरह जनचर्चा में नहीं पाया था, और इसलिए आज बच्चों की जागरूकता एक राहत देती है कि उनके वोटर माँ-बाप अगर उन्हें सरकारी स्कूल में दाखिल कराकर भूल गए हैं, तो वे कम से कम खुद अपने बुनियादी हक के लिए लडऩा जानते हैं। आज नौबत यह है कि कॉलेज और स्कूल के बच्चों की पीढिय़ों से बात करने के लिए, उनकी दिक्कतों को समझने के लिए सरकारों, और राजनीतिक दलों में गलाकाट मुकाबला चल रहा है। अच्छा है, चाहे जिसकी कोशिश से हो, स्कूलों की हालत तो सुधरनी चाहिए। आज जो पार्टियां विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलनों से डरी-सहमी रहती हैं, और औपचारिक रूप से भारत सरकार के बड़े-बड़े मंत्री कहते हैं कि छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए, उनकी हड़बड़ाहट स्वाभाविक है कि अब तो बच्चे जुलूस लेकर उनकी दहलीज तक पहुंच रहे हैं।
देश भर के कई राज्यों से आने वाली खबरों को देखकर मन में एक सवाल उठता है। पढ़ाई, इलाज, नाली-पानी, सडक़, और आम हिफाजत तो किसी भी सरकार के लिए सबसे पहली जिम्मेदारी रहनी चाहिए। लेकिन आज जाने कितने प्रदेशों से इनमें से हर मोर्चे पर दिक्कतें और नाकामयाबी की खबरें हैं। सडक़ों में पूरी ट्रक या बस समा जा रही है, कहीं अस्पताल सिर्फ कागज पर है, कहीं स्कूलें जमीन पर हैं ही नहीं, अस्पतालों में बदहाली ही बदहाली है, और शहर घंटे भर की बारिश में तालाब हो जाते हैं। दूसरी तरफ देश भर में हर प्रदेश की सरकारें इन बुनियादी जिम्मेदारियों से परे की अपनी पसंदीदा योजनाओं पर ध्यान केन्द्रित करके चलती हैं क्योंकि उन योजनाओं से सरकारों का नाम जुड़ा रहता है, पहचान जुड़ी रहती है। ये योजनाएं चुनाव में गिनाने लायक रहती हैं। अब स्कूल भवन ठीकठाक हैं, साफ-सुथरे हैं, अस्पतालों में दवा है, सडक़ों पर कचरा नहीं है, ये बातें तो कोई वजनदार चुनावी नारा बन नहीं पातीं। इसलिए नारे से कम इस्तेमाल वाली चीजों पर अधिक ध्यान देना किसी को जायज नहीं लगता है। किसी शहर में करोड़ों की लागत से स्वागत द्वार बनाए जाते हैं, फिर चाहे उन्हीं शहरों में बारिश के पानी से बस्तियां डूब जाएं, सडक़ें डूब जाएं, बच्चे डूबकर मर जाएं। राज्यों को बड़े-बड़े ऐतिहासिक फौलादी ढांचों को सैकड़ों करोड़ की लागत से खड़ा करना सुहाता है क्योंकि उसके साथ शिलालेख पर नाम जुड़ जाते हैं, लेकिन ऐसे ढांचों वाले प्रदेशों में स्कूल आते-जाते नदी पार करते बच्चे बहकर मर जाते हैं, और किसी के चेहरे पर शिकन नहीं पड़ती। जिस तरह स्कूलों की पढ़ाई अब महत्वहीन हो गई है, और आगे के मुकाबला-इम्तिहानों की तैयारी के लिए कोचिंग ही महत्वपूर्ण रह गई है, कुछ उसी तरह सरकारों में भी हो गया है, उनके लिए अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को पूरा करना जरूरी नहीं रह गया, चुनावी नारों में फिट बैठने वाली नई मौलिक या अनोखी, आकर्षक, और लुभावनी योजनाओं पर पूरा ध्यान चले जा रहा है। जहां आज देश भर में बच्चों को स्कूलों की एकदम बुनियादी जरूरतों के लिए आंदोलन करने पड़ रहे हैं, वहां सैकड़ों फीट ऊंची धार्मिक या ऐतिहासिक प्रतिमाओं को बनाना सरकारों को अपनी उपलब्धि लग रही है। यह सिलसिला भटकी हुई प्राथमिकताओं का है, और सुप्रीम कोर्ट भी दुनिया-जहान की बहस करने के बाद भी इस सिलसिले को रोकने या काबू करने के बारे में कुछ तय नहीं कर पा रहा। ऐसा लगता है कि वोटरों की जमात राजनीतिक दलों, और सरकारोंं की बांह नहीं मरोड़ पाई, अब स्कूली बच्चे अपने हक के लिए संघर्ष करके, आंदोलन करके एक मिसाल पेश करने जा रहे हैं, जिससे बड़े भी अपने हक के लिए लडऩा सीख सकें। यह भारतीय लोकतंत्र में एक बिल्कुल ही नए किस्म की राजनीतिक चेतना है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। आज नेता, और अफसर बच्चों को देखकर हड़बड़ाए हुए हैं। बीते कुछ महीने इनके सपनों में तिलचट्टे आकर इन्हें डरा रहे थे, अब छोटे-छोटे बच्चे आकर इनकी नींद हराम कर रहे होंगे।
स्कूल भवन, पुल-पुलिया एकदम से आसान नहीं, सरकारें कोई विकल्प सोचें
24 अगस्त 2026
आज एक ही अखबार में ऊपर-नीचे छपी दो खबरें दिल दहलाने के लिए काफी हैं। मध्यप्रदेश की खबर है कि उफनती हुई नदी को पार करके स्कूल पहुंचने के लिए शिक्षक ट्रकों के बड़े से ट्यूब पर सवार होकर आना-जाना कर रहे हैं। अगर समय पर न पहुंच पाएं, तो ई-हाजिरी नहीं लग पाएगी। बहुत सी दूसरी जगहों पर शिक्षक बिना किसी लाईफ बेल्ट के खतरनाक नावों में नदी पार करते हैं, और छत्तीसगढ़ के बस्तर से भी ऐसी खबरें आती हैं। इससे कुछ अधिक खतरनाक खबर बिलासपुर जिले से आई है जहां स्कूल से घर लौटते तीन छोटे-छोटे भाई-बहन एक नदी का एनीकट पार करते हुए पानी में बह गए, और तलाश में उनकी लाशें मिल जाने के बाद उनकी अंतिम संस्कार हुआ। सात-आठ बरस के ये भाई-बहन नदी पर बने ढांचे को कूद-कूदकर पार कर रहे थे कि अचानक आई एक लहर में वे बह गए।
देश भर में स्कूलों की हालत को लेकर कॉकरोचों ने एक नई जागरूकता खड़ी की है। राजस्थान, और यूपी ने औपचारिक आदेश निकालकर किसी भी बाहरी व्यक्ति का स्कूल दाखिला बंद कर दिया है, कहीं-कहीं तो ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ रिपोर्ट भी लिखाई जा रही है जो कि स्कूलों की बदहाली को उजागर करने के लिए वहां जाकर देख रहे हैं, या वीडियो बना रहे हैं। पांच-दस लोगों के जेल चले जाने से इस मुद्दे के झाग नहीं बैठ जाएंगे, बल्कि वे उफनते ही रहेंगे, मानसूनी बारिश में उफनती हुई नदी की तरह। जिस आंदोलन से सरकारों को सबक लेना था, उस आंदोलन को कुचलने से बच्चों के माँ-बाप, और खुद बच्चे तो चुप नहीं बैठ जाएंगे। मध्यप्रदेश का ही बताया जा रहा एक वीडियो आया है जिसमें किसी सार्वजनिक जगह पर प्रदर्शन कर रही छोटी-छोटी बच्चियों को महिला पुलिस उठाकर ले जा रही है, और बच्चियां इतनी छोटी हैं कि एक छोटी सी महिला सिपाही भी अकेले ही बच्ची को गोद में उठाकर गाड़ी में पहुंचा रही है। अब अगर किशोरावस्था में पहुंचने के पहले बच्चे आंदोलन में पहुंचने लगे, तो देश में संभावित आंदोलनकारियों की गिनती एकदम से दुगुनी हो सकती है।
खैर, आंदोलन तो जिस तरह, जिस तरफ, जिस हद तक बढऩे हैं, वे बढ़ेंगे। लेकिन आज एक दूसरी बात लग रही है कि अगर देश के बहुत से प्रदेशों में स्कूलों की ऐसी बदहाली है, कुछ जगहों की तो यह खबर है कि वे स्कूल मौजूद ही नहीं हैं, और सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं, कुछ जगहों पर आसपास के गांव के आदिवासी गिरती हुई स्कूली इमारत से अपने बच्चों को बचाने के लिए बाहर खुली जगह में बांस का शेड बना रहे हैं, ताकि उनके बच्चे किसी छततले न दबें, और पढ़ सकें। कहीं-कहीं पर बांस से कोई पुल बनाया जा रहा है। यह बात जाहिर है कि जलवायु परिवर्तन के चलते हुए अब बहुत तेज बारिश कभी भी आ सकती है, और कुछ घंटों के भीतर ही नदियां ऐसी उफन सकती हैं कि स्कूल गए हुए बच्चे लौट न सकें। इसलिए सरकारों को बिना शर्मिंदगी महसूस किए सबसे पहले हकीकत को जानकर, और मानकर बारिश में पढ़ाई का वैकल्पिक इंतजाम करना चाहिए। हम इस नौबत को बहुत ही खतरनाक मानते हैं कि नदी-नाले पार करके बह जाने का खतरा उठाकर शिक्षक-शिक्षिकाएं, और बच्चे स्कूल तक पहुंचें। पूरी तरह से भीगे हुए लोग किस तरह पढ़ और पढ़ा सकते हैं? और क्या यह उनकी सेहत के लिए ठीक भी है?
अब भारत की एक दिक्कत यह है कि इसके बहुत बड़े हिस्से में कुछ महीने भयानक गर्मी के रहते हैं, और इन महीनों में बच्चों की स्कूलों को बंद ही कर देना पड़ता है। कुछ महीने बेतहाशा बारिश के हो गए हैं। और ठंडे प्रदेशों में सबसे अधिक सर्द कुछ महीने बर्फीले होते हैं, उनकी अपनी अलग दिक्कत होती है। ऐसे में क्या पूरे देश के लिए एक स्कूली कैलेंडर मुमकिन हो सकता है? आज राष्ट्रीय स्तर पर जितने स्कूली इम्तिहान होते हैं, और स्कूली परीक्षाओं के बाद जितने आगे के दाखिला इम्तिहान होते हैं, क्या वे पूरे देश के लिए एक साथ सचमुच किए जा सकते हैं, या फिर पढ़ाई के महीनों में, और इम्तिहान के महीनों में फेरबदल भी होना चाहिए? नीट इम्तिहान के तनाव को देखते हुए हाल ही में यह चर्चा भी हुई थी कि इसे साल में एक बार करने के बजाय दो बार करना चाहिए, ताकि बच्चों पर दबाव कम पड़े, और एक बार में बहुत अधिक संख्या इम्तिहान में न बैठने पर उसमें भ्रष्टाचार भी शायद घट सके। ऐसी सिफारिश एक कमेटी ने सरकार को की है, लेकिन हम इसमें भ्रष्टाचार की कमी की संभावना नहीं देखते क्योंकि लोग कितने भी कम हों, पर्चा खरीदने वाले लोग लाखों में तो लगते भी नहीं हैं, कुछ हजार लोगों को बेचने से भी पेपर आउट करने वालों का धंधा चल जाता है।
भारत में सरकारों को यह सोचना चाहिए कि जब न स्कूली इमारतों का ढांचा ठीक है, न ही आने-जाने के लिए पुल-पुलिया का कोई ठीक इंतजाम हैं, तो बारिश के दिनों में भीगे हुए दिन भर बिठाकर, जान पर खेलकर ऐसी पढ़ाई करवाना ठीक नहीं है। खबरों में तो मौत, या हादसों के ही आंकड़े आते हैं, खबरों में भीगने से बीमार होने वाले बच्चों या शिक्षकों के आंकड़े तो आते नहीं हैं। फिर अभी एमपी के समाचार में सिर्फ चड्डी पहनकर ट्यूब पर बैठकर नदी पार करना पुरूष शिक्षकों के लिए तो मुमकिन है, शिक्षिकाएं तो इस तरह से नहीं आ-जा सकतीं, और लड़कियों के लिए भी भीगे कपड़ों में दिन भर बैठना एक अलग किस्म की शर्मिंदगी हो सकती है, होती ही होगी। इसलिए सरकारों को खुले दिमाग से, बिना झिझक यह तय करना चाहिए कि बारिश के ऐसे दिनों में, हफ्तों, और महीनों में क्या किया जाए? और लाख रूपए का यही सवाल गर्मियों में अंधाधुंध अधिक गर्म होने वाले हफ्तों पर भी लागू होता है कि उन दिनों स्कूलें नहीं लग सकतीं, उतनी धूप में आना-जाना नहीं हो सकता, तो वैकल्पिक पढ़ाई क्या हो सकती है? देश की राजधानी दिल्ली, और उसके आसपास के सैकड़ों किलोमीटर के इलाकों में ठंड में प्रदूषण जिस तरह हवा को जहरीला कर देता है, उसमें भी वहां दिक्कत होती है, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबको। हर राज्य को अपने स्तर पर मौसम की सबसे बुरी मार के हफ्तों में स्कूली पढ़ाई का विकल्प ढूंढना ही होगा। क्या इसके लिए ऐसे वक्त घर रहकर पढऩे का कोई जरिया निकल सकता है?
भारत स्कूलों की बदहाली देख रहा है, खासकर उत्तर भारत के प्रदेशों, हिन्दी प्रदेशों में बहुत बुरा हाल है। तिलचट्टों को रोक देने से सच्चाई छुपने नहीं जा रही। अब तो स्कूली बच्चे खुद भी सडक़ों पर आने लगे हैं, और गोद में उठाकर पुलिस लॉरी तक ले जाने लायक छोटी बच्चियां भी जब सडक़ पर आंदोलन कर रही हैं, तो किसी स्कूल को अपनी बदहाली दर्ज कराने मोबाइल कैमरे लिए हुए तिलचट्टों की अधिक जरूरत भी नहीं है। सरकारें इस सच को मानें कि उनकी स्कूलें किस खराब हाल में हैं। समस्या को माने बिना समाधान शुरू नहीं हो सकता। इसके बाद सरकारें यह समझ लें कि स्कूली पीढ़ी अब आंदोलन करना जान चुकी है, वह अब मानो यह कह रही है- छोटा बच्चा जान के हमको न बहलाना रे...
परमाणु छतरीतले एकजुट होते मुस्लिम देशों से खतरा कम नहीं
23 अगस्त 2026

दुनिया में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई ऐसी घटनाएं या बातें होती हैं जिन पर बारीकी से नजर रखना जरूरी रहता है। आज भी एक बीज रहती हैं, और आगे चलकर जाने किस दिन खाद-पानी पाकर, किसी खास मौसम में वे जमीन फोडक़र पौधे में तब्दील हो जाएं, और वक्त के साथ पेड़ बन जाएं। पाकिस्तान, सऊदी अरब, और तुर्की के बीच पिछले दिनों मक्का में जो फौजी समझौता हुआ, उसके मुताबिक इनमें से किसी एक देश पर हुए हमले को ये तीनों देश अपने पर हुआ हमला मानेंगे। लोगों को याद होगा कि योरप और अमरीका वाले नाटो की भी कुछ इसी तरह की संधि है कि उनमें से किसी एक पर हमले को सारे नाटो देश अपने पर हमला मानेंगे, और इसीलिए रूस इस बात पर अड़ा हुआ है कि यूक्रेन नाटो का सदस्य न बने। यूक्रेन पर रूस के हमले की बुनियादी वजह यही है कि वह अपनी सरहद से लगकर एक और नाटो देश नहीं चाहता, और यही वजह है कि बाकी नाटो देश एक गैरसदस्य यूक्रेन की इतनी फौजी मदद कर रहे हैं कि पांच बरस बाद भी वह रूस के मुकाबले टिका हुआ है।
अब अगर तीन देशों के बीच यह मक्का समझौता हुआ है, तो इसके पीछे की कुछ बुनियादी बातों को समझना जरूरी है। और समझौते के कुछ हफ्ते बाद अब इस पर लिखना कुछ अधिक जरूरी इसलिए हो चला है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के करीबी सहयोगी हुमायू कबीर ने एक समाचार एजेंसी से कहा है कि मक्का समझौते के इन तीन देशों के साथ आर्थिक, या फौजी ढांचे में शामिल होने की संभावनाओं पर बांग्लादेश सकारात्मक रूख रखता है। इन तीन देशों के बीच समझौते की जगह पर भी गौर करना जरूरी है कि वह मक्का में हुआ है जो कि मुस्लिमों के लिए पूरी दुनिया में सबसे पवित्र धार्मिक जगह मानी जाती है। दूसरी बात यह कि ये मुस्लिम देश इजराइल के खिलाफ अलग-अलग समय पर अलग-अलग बातें कह चुके हैं। बांग्लादेश ने अभी-अभी भारत का प्रस्तावित और घोषित दौरा रद्द किया है, और सऊदी अरब के दौरे के बारे में कहा गया है।
भारत ने फिलहाल इतना ही कहा है कि वह पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। दुनिया के बहुत से विश्लेषकों का यह मानना है कि यह फौजी समझौता सीधे-सीधे भारत के खिलाफ न होने पर भी पाकिस्तान को बहुत मजबूत बनाने वाला है क्योंकि इन तीनों देशों में से वही अकेला परमाणु हथियार संपन्न देश है, बल्कि वह दुनिया का अकेला परमाणु हथियार वाला मुस्लिम देश है। यह समझौता इजराइल की फिक्र को बढ़ाने वाला है, क्योंकि दुनिया के इस हिस्से में अब इजराइल के मुकाबले किसी और देश के पास परमाणु बम चाहे न हो, परमाणु ताकत वाले देश के साथ तुर्की, और सऊदी अरब का यह फौजी समझौता तो हुआ ही है। बांग्लादेश अगर आगे-पीछे इसमें और जुड़ जाता है, तो यह इस्लामिक नाटो बनने की दिशा में एक और कदम हो सकता है।
यह पूरा सिलसिला दुनिया में एक ऐसे वक्त हो रहा है जब अमरीका मध्य-पूर्व के देशों में अपनी सुरक्षा गारंटी पर खरा नहीं उतर रहा है। ईरान के साथ जंग में अमरीका ऐसा बुरा फंसा है कि उसके हमलों के जवाब में ईरान अड़ोस-पड़ोस के उन तमाम देशों पर फौजी हमले कर रहा है जहां पर अमरीकी फौजी ठिकाने हैं, या जहां से अमरीकी फौजी विमान उड़ान भर रहे हैं, जहां से मिसाइलें छोड़ी जा रही हैं। लोगों को यह समझ आ गया है कि अमरीका ने इस पूरे इलाके के देशों से किसी सलाह-मशविरे के बिना सिर्फ इजराइल के झांसे में आकर, उसके उकसावे को मानकर ईरान पर एक ऐसा हमला कर दिया है जिसे खत्म कर पाना या छोड़ पाना उसके बस के बाहर है। नतीजा यह है कि ईरान के हमलों से जख्मी बाकी पेट्रोलियम-गैस से मोटी कमाई करने वाले देश ईरानी मिसाइलें झेल रहे हैं, और अमरीका झूठे-बावले दावे करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा है। जिस तरह योरप के देश, और पूरे का पूरा नाटो आज अमरीका के बिना अपनी पूरी ताकत खड़ी करने में लगा हुआ है, कुछ उसी तरह मध्य-पूर्व के देश अब अमरीका से परे अपने फौजी पांवों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में मक्का को मानने वाले तमाम मुस्लिम देशों के एक साथ आने की एक कागजी संभावना तो बनती ही है।
आज यह सवाल भी उठ रहा है कि अमरीका और ईरान के बीच बातचीत के कई दौर पाकिस्तान ने मध्यस्थता करते हुए पूरे करवाए। इन दोनों ही देशों ने पाकिस्तान के योगदान को माना, यह एक अलग बात है कि पाकिस्तान में तय हुआ युद्धविराम कायम नहीं रह पाया, लेकिन इनमें से किसी देश ने पाकिस्तान पर कोई तोहमत नहीं लगाई है। इजराइल को एक देश के रूप में मान्यता भी न देने वाले पाकिस्तान को अमरीका ने अपने हाल के बरसों की सबसे नाजुक जंग में जिस तरह, और जिस हद तक इस्तेमाल किया, उसे भी पाकिस्तान का एक बढ़ा हुआ महत्व माना जा रहा है। भारत के साथ हमदर्दी रखने वाले अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का भी यह कहना है कि फिलीस्तीन पर इजराइली हमलों के पूरे दौर में पाकिस्तान खुलकर बोलता रहा, और भारत इजराइल के साथ खड़े रहा। इस वजह से भी मुस्लिम देशों के बीच पाकिस्तान की एक नई जगह बनी। इसी तरह तुर्की भी खुलकर इजराइल के खिलाफ आज भी खड़ा हुआ है, और उसने भी मुस्लिम दुनिया में एक फौजी ताकत की जगह बना ली है। सऊदी अरब की आर्थिक ताकत को तो सब लोग जानते ही हैं। ऐसे में यह गठबंधन परमाणु हथियार, दूसरे आधुनिक हथियारों वाले तुर्की, और सऊदी संपन्नता का एक ताकतवर गठजोड़ है। दुनिया के दूसरे भी कुछ मुस्लिम देशों में इजराइल की बढ़ती हुई विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ चाहे-अनचाहे नाराजगी बढ़ रही है। आज हालत यह है कि ब्रिटेन, कनाडा, और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोग इजराइल की बढ़ती बस्तियों के खिलाफ सार्वजनिक बयान जारी कर रहे हैं। ऐसे में मुस्लिम देशों को शर्म खाकर भी इजराइल के खिलाफ जुबानी जमा-खर्च तो करना ही होगा। फिर मक्का समझौते के तीन देशों के साथ जुडऩे से बाकी मुस्लिम देशों को भी परमाणु हथियारों की एक छतरी हासिल हो सकेगी।
इससे इजराइल तो तुरंत अपने पर एक खतरा महसूस करेगा, लेकिन भारत को लेकर भी कुछ विश्लेषक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब भारत पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर जैसा हमला उसी आसानी के साथ कर सकेगा? क्या ऐसी कोई फौजी कार्रवाई करने से पहले उसे मक्का समझौते के बाकी दो देशों के साथ बात नहीं करनी होगी? और क्या उस बात का कोई असर उन दो देशों पर होगा जिन्होंने परमाणु हथियार संपन्न पाकिस्तान के साथ एक लिखित औपचारिक फौजी समझौता किया है? यह भी समझना होगा कि आज जिस तरह बांग्लादेश की एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में शरण ली हुई है, और बांग्लादेश उन्हें मौत की सजा सुनाकर वापिस भेजने की मांग कर रहा है, इससे भी भारत और बांग्लादेश के बीच अभी एक बड़ा तनाव बना हुआ है।
मुस्लिम देशों के मक्का समझौते, मुस्लिम-विरोधी इजराइल से पूरी दुनिया की बढ़ती शिकायतें, अमरीका और इजराइल की बीते दशकों से किसी न किसी मुस्लिम देश पर हमले का रिकॉर्ड, इन सबको देखते हुए अगर चाहकर, या मजबूरी में मुस्लिम देश पाकिस्तान की परमाणु छतरीतले एकजुट हो रहे हैं, तो इस बात को गौर से देखा जाना जरूरी है।
भारत की जिंदगी में बिखरी कतरा-कतरा अंधेरी बातें...
23 अगस्त 2026
अभी एक शहर के बाहरी हिस्से में एक खाली खदान में भरे हुए पानी में डूबकर एक नौजवान की मौत हो गई। आपस में कुछ नौजवान वहां भरे हुए पानी को तैरकर पार करने का मुकाबला कर रहे थे, बीच में दम टूट गया, और एक नौजवान डूब गया। अब यह साधारण खदान जितनी गहराई नहीं थी, चार सौ फीट गहरे पानी में नीचे तक जाकर ढूंढना स्थानीय बचावकर्मियों के लिए मुमकिन नहीं था। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने नौसेना के अफसरों से बात करके गोताखोरों का इंतजाम किया था, लेकिन इसके पहले कि वे यहां के लिए रवाना हो सकें, कोई 80 घंटे बाद लाश तैरकर सतह पर आ गई। इस तरह छत्तीसगढ़ में नौसेना के गोताखोरों की पहली तलाश शुरू होने के पहले ही रूक गई। लेकिन इन चार दिनों शहर में जो बेचैनी रही, बचावकर्मियों पर जो दबाव रहा, वह बहुत था। ऐसी खतरनाक जगह पर लंबी तैराकी का मुकाबला बिना किसी बचाव के करने वाले लोगों ने अपनी जिंदगी तो गंवाई ही, सरकार पर भी एक असाधारण बोझ लाद दिया। एक दूसरी घटना में एक आदमी अपने दो बच्चों को लेकर कहीं नदी-तालाब के किनारे गया, बच्चे पानी में डूबते रहे, और किनारे बैठा बाप मोबाइल पर जुटे रहा, बच्चों की जिंदगी चली गई। रील बनाते हुए जिंदगियां देने वाले तो बहुत सारे लोग हैं, और हाईकोर्ट के हुक्म के बावजूद सडक़ों पर स्टंट करने वाले लोगों की भी कमी नहीं है। यह तो बात हुई जनता की, लेकिन जब हम सरकार या अदालत पर पडऩे वाले बोझ की बात करते हैं, तो सरकारों के बहुत सारे फैसले भी ऐसे रहते हैं जिनके बारे में सरकार को यह कानूनी समझ रहती है कि यह अदालती अग्निपरीक्षा को नहीं झेल पाएंगे, लेकिन वे ऐसे फैसले लेती हैं। ये फैसले सरकारी अमले के बारे में भी रहते हैं, जनता के बारे में भी रहते हैं। खुद अदालतों के भीतर अगर देखें, तो छोटी अदालतें ऐसे नाजायज फैसले भी देती हैं जो कि पहली नजर में ही गलत लगते हैं, और जिन पर ऊपर की अदालतों का और अधिक वक्त बर्बाद होता है। साम्प्रदायिक और राजनीतिक नेता कई तरह के भडक़ाऊ बयान देते हैं, जिनके बारे में उन्हें अंदाज रहता है कि इस पर या तो पुलिस रिपोर्ट होगी, या मुकदमे चलेंगे, या फिर कानून व्यवस्था की दिक्कत खड़ी होगी, और सरकारी अमला उसमें झोंकना पड़ेगा।
हम भारत जैसे देश में सरकार और अदालत की उत्पादकता का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही गैरजरूरी मुद्दों में बर्बाद होते देखते हैं, जिन्हें वक्त रहते सुलझाया जा सकता था, या गलत फैसलों से बचा जा सकता था, बिना विवाद बढ़ाए काम हो सकता था। ऐसे फैसले निजी जिंदगी के भी रहते हैं, और सरकारी या अदालती भी। अब चाकू या पिस्तौल दिखाते हुए एक वीडियो बनाकर पोस्ट कर देने का मतलब यह रहता है कि उसकी तलाश करते हुए पुलिस सोशल मीडिया कंपनियों तक जाए, फिर पहचान निकालकर उनके घर जाकर पकड़े, उन्हें अदालत में पेश करे, जेल भेजे, और यही करते रह जाए। क्या आज टेक्नॉलॉजी और दूसरी वजहों से जिस रफ्तार से जुर्म बढ़ रहे हैं, उस अनुपात में अगर पुलिस और अदालत की क्षमता बढ़ाई जाएगी, तो उसका खर्च आएगा कहां से? जेलें कैदियों से उफन रही हैं, सडक़ें उन जानवरों से उफन रही हैं जिन्हें उनके मालिकों ने दूध की आखिरी बूंद तक निचोडक़र सडक़ों पर छोड़ दिया है। लोग इन जानवरों से टकराते हैं, अपनी जिंदगी देते हैं, और अगर खुद बच जाते हैं, तो जानवरों को जख्मी करने की तोहमत झेलते हुए जेल भी जाते हैं, भीड़ की मार भी खाते हैं, और कभी-कभी भीड़ के हाथों मारे भी जाते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या सरकार और अदालत का ढांचा, आम लोगों के लिए बनी हुई सडक़ें इसीलिए है कि लापरवाह और गैरजिम्मेदार लोग, मुजरिम किस्म के लोग उनका बेजा इस्तेमाल करें? यह सब होता तो जनता के ही टैक्स के पैसों से है।
सरकारों की बात करें तो वे भी देश के संविधान के शब्दों और उसकी भावना के खिलाफ जाकर कई तरह के फैसले लेती हैं। फिर देश मेें चुनाव आयोग जैसी जो दूसरी संवैधानिक संस्थाएं बनाई गई हैं, वे भी बड़े पैमाने पर बदअमनी फैलाने का काम कर रही हैं। बंगाल में जिस तरह चुनाव के चलते हुए दसियों लाख मतदाताओं को वोटर लिस्ट से बाहर किया गया, सुप्रीम कोर्ट ने उसकी न्यायिक सुनवाई करने के लिए चुनाव आयोग से कहा। अभी भी इस लिस्ट में दसियों लाख लोग, शायद 30 लाख से अधिक, अर्जियां लेकर खड़े हुए हैं, और जिस रफ्तार से उनकी जांच की जा रही है, उससे खुद सुप्रीम कोर्ट का अंदाज है कि सारी अर्जियां निपटाने में 21 साल लग जाएंगे। इसका मतलब यह है कि यह चुनाव तो निकल ही गया, इसके बाद के और चार चुनाव निकल जाएंगे, तब तक आज की अर्जियां ही नहीं निपट पाएंगी, लोगों का वोट देने का अधिकार जाता रहेगा। यह तो गनीमत कि देश में सुप्रीम कोर्ट से ऊपर कोई और कोर्ट नहीं है, वरना यह फैसला किसी सुपर सुप्रीम कोर्ट में पल भर में खारिज हो गया रहता, कि अगर इस चुनाव में लोग वोट नहीं दे पा रहे हैं तो क्या हुआ, अगले चुनाव में दे देंगे। कोई सुप्रीम कोर्ट के जजों से यह बात कहकर देखते कि उनका इस जन्म में सुप्रीम कोर्ट के लिए सलेक्शन नहीं हो पाया तो क्या हुआ, अगले जन्म में हो जाएगा, तो पता लगता। हमारे कहने का मतलब यह है कि गनीमत कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को संसद के अलावा कहीं और चुनौती नहीं दी जा सकती है, वरना ढेर सारे फैसलों को खारिज करने के तर्क तो हमारे जैसे को ही सूझते रहते हैं। आज की इस चर्चा में हम कॉकरोच-प्रसंग पर कुछ लिखना नहीं चाहते क्योंकि उस अवांछित प्रसंग पर बहुत बार बहुत कुछ लिख चुके हैं।
भारतीय लोकतंत्र में लोगों के नफरती और जहरीले बयानों से लेकर तरह-तरह के लोगों के किए जा रहे तरह-तरह के जुर्म तक इतना कुछ ऐसा हो रहा है कि उससे पुलिस, अदालत, सरकार, और समाज सबका जीना हराम है। यह सिलसिला कैसे कम होगा? कैसे लोगों में सामाजिक सरोकार आ सकता है, सामूहिक चेतना आ सकती है, कानून के प्रति सम्मान आ सकता है, कैसे सरकारों से बददिमागी कम हो सकती है, कैसे पूरे भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर फैला हुआ भ्रष्टाचार घट सकता है, कैसे महिलाओं का सम्मान पत्थर-मिट्टी की देवी प्रतिमाओं के बराबर हो सकता है, कैसे बच्चों के साथ बर्ताव तथाकथित इंसानी हो सकता है, कैसे लोग अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी मंजूर कर सकते हैं? कैसे ये तमाम चीजें भारतीय जीवन में लौट सकती हैं, या पहली बार आ सकती हैं? यह न सिर्फ हथियारबंद अराजकता है, बल्कि तथाकथित मानवीय मूल्यों की अराजकता भी है, जो कि वैचारिक से लेकर शारीरिक हिंसा तक भारतीय जनजीवन पर हावी हो चुकी है। कानून के प्रति हिकारत, समाज के प्रति गैरजिम्मेदारी, दूसरों के अधिकारों की हेठी, क्या नहीं है हिन्दुस्तान में? किस तरह सार्वजनिक जगहों पर और जनजीवन मेंं कभी दुरुस्त न होने वाला नुकसान होते चल रहा है, क्या कोई इस बारे में सुधार करने की बात सोच भी रहे हैं? यह एक बहुत लंबी-गहरी अंधेरी सुरंग की तरह है, जिसमें अगर किसी को आखिर में उम्मीद की किरण अगर दिखती भी है, तो वह असली होने के बजाय घुप्प अंधेरे में दिखती मृगतृष्णा ही है।
पेपर बेचने वाले प्रोफेसर के लिए मौजूदा सजा कम, कानून में संशोधन जरूरी..
22 अगस्त 2026
देश भर में जगह-जगह इम्तिहानों के पर्चे लीक होने को लेकर साल-दो साल से बवाल चल रहा है। मेडिकल दाखिले के लिए होने वाली नीट इम्तिहान के पेपर लीक की वजह से तो विश्व इतिहास में पहली बार पर्चों को दुबारा इम्तिहान में एयरफोर्स के विमानों से भेजा गया। देश भर में एक असाधारण ऐतिहासिक आंदोलन पर्चे आउट होने के खिलाफ चला, और एक बहुत कड़ा कानून इसके लिए 2024 में बनाया गया था जिसमें तीन से पांच साल तक की जेल, और 10 लाख रूपए तक के जुर्माने का इंतजाम किया गया, और अगर मैनेजमेंट की भागीदारी साबित होती है तो 3 से 10 साल की कैद, और एक करोड़ रूपए तक जुर्माना लगाया गया था। इस कानून को गैरजमानती, और गैरसमझौता योग्य बनाया गया था। अब 2026 में पिछले ही महीने इसमें एक संशोधन पेश किया गया है जो कि लोकसभा में विचाराधीन है जिसमें पर्चों से जुड़े मैनेजमेंट पर पांच करोड़ रूपए तक जुर्माने, और आठ साल तक प्रतिबंध के कड़े प्रावधान किए गए हैं। व्यक्तियों को व्यक्तिगत अपराध के लिए 5 से 10 साल की कैद, और 50 लाख तक जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। इसके बाद भी अभी जब छत्तीसगढ़ में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय का एक पर्चा लीक होकर धड़ल्ले से चारों तरफ फैला, तो यह समझ आया कि कागजों पर कड़ी सजा किसी को जुर्म से नहीं रोक पाती है। लोगों का भारतीय न्याय प्रक्रिया की कमजोरी पर इतना पुख्ता भरोसा है कि वे बड़े से बड़ा जुर्म करके बच जाने की उम्मीद रखते हैं।
अभी पुलिस ने छत्तीसगढ़ के इस मामले में दुर्ग जिले के भारती एग्रीकल्चर कॉलेज नाम के निजी कॉलेज के एक प्रोफेसर सहित आधा दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया है। विश्वविद्यालय ने इस इम्तिहान के लिए प्रदेश के 28 सरकारी, और 4 निजी कॉलेजों को छांटा था, और वहां पर पर्चे समय से पहले पहुंचाए जाते थे। अभी जिस प्रोफेसर योगेश सोनकेसरिया को गिरफ्तार किया गया है वह अपने कॉलेज से रायपुर के कृषि विश्वविद्यालय तक कॉपियां लाने ले जाने, प्रश्नपत्र लाने का काम करता था। उसने इसमें से एक लिफाफे के कोने में बारीक छेद करके भीतर एक छोटा कैमरा डालकर प्रश्नपत्र की फोटे खींची थीं, और फिर 11 हजार रूपए में बेच दी थी। खरीदने वाले छात्र ने इसे कुछ और लोगों को दिया। अब सवाल यह उठता है कि 2019 से जो एक कॉलेज में प्राध्यापक है, वह 11 हजार रूपए के लिए एक इम्तिहान को चौपट करने का काम कर रहा है, और अपने ही कॉलेज के छात्रों को पर्चा बेच रहा है।
आज हिन्दुस्तान में नौजवान आबादी का एक बड़ा हिस्सा बेरोजगार है। लेकिन जिन लोगों को रोजगार मिला हुआ है, उनमें से कई शिक्षक शराब पिए हुए स्कूलों में पड़े रहते हैं, बहुत से लोग नौकरी की परवाह किए बिना रिश्वत लेने में लगे रहते हैं, और एक कॉलेज प्राध्यापक इस तरह की आपराधिक साजिश करके एक मामूली सी रकम के लिए इतना बड़ा खतरा मोल ले रहा है। यह 11 हजार रूपए की रकम एक कॉलेज प्राध्यापक की तनख्वाह के मुकाबले कुछ भी नहीं होगी। देश में कड़ा कानून बनने की चर्चा और लोगों में न सही, स्कूल-कॉलेज के लोगों में तो हुई ही होगी। आज जंतर-मंतर से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, संसद से लेकर सडक़ तक पर्चे आउट होने को लेकर जनता की अभूतपूर्व नाराजगी सामने आ ही रही है, बड़े-बड़े आंदोलन चल रहे हैं। ऐसे में भी लोगों को पर्चे आउट करके बेचने का उत्साह बना हुआ है। यह तो यह हरकत पकड़ में आ गई। मान लें कि नहीं आई होती, तो पर्चे खरीदने वाले छात्र दूसरे ईमानदार छात्रों के मुकाबले कई तरह के फायदे पा सकते थे, पाते ही। इसलिए इम्तिहानों में, नौकरी के साक्षात्कार में बेईमानी सिर्फ खुद के फायदे की बात नहीं होती, वह दूसरों के हक छीनने की बात भी होती है। कड़े कानून की जरूरत भी इसीलिए थी कि समान अवसरों से वंचित रह जाने वाले तबके इस तरह के जुर्म से इतने विचलित होते हैं कि खुदकुशी भी कर लेते हैं। जिस नीट इम्तिहान को लेकर देश हिल गया, उसके दुबारा होने से पहली बार के कामयाब बच्चों में से 20 से अधिक बच्चों ने खुदकुशी कर ली थी। एक प्रदेश के एक विश्वविद्यालय के ऐसे एक इम्तिहान के एक पर्चे से शायद कुछ सौ, या कुछ हजार लोग ही जुड़े होंगे, लेकिन जब किसी संस्थान के इंतजाम की विश्वसनीयता खत्म होती है, तो मुकाबला करने वाले सभी बच्चों, और नौजवानों का विश्वास भी खत्म होता है। लोगों में एक निराशा छा जाती है कि उनकी मेहनत से क्या फायदा, क्योंकि उनके मुकाबले कमजोर लोग तो पर्चे खरीदकर, या किसी और तरीके से लिस्ट में ऊपर आ जाएंगे।
कानून में पांच-दस बरस की कैद के बाद ऐसे लोगों का पढऩा, और पढ़ाना खत्म ही हो जाएगा, लेकिन इन लोगों को सजा मिलने से परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता जल्दी नहीं लौट पाएगी। यही छत्तीसगढ़ है जहां बीते बरसों में राज्य लोकसेवा आयोग बेरोजगारों के हक की सरकारी कुर्सियों को पैसेवालों, और नेता-अफसरों के रिश्तेदारों को देते आया है, आज पीएससी के चेयरमैन सहित बहुत से लोग जेलों में पड़े हैं, जिनमें करोड़पति-अरबपति उद्योगपतियों के परिवारों के लोग भी हैं जिन्होंने 50-50 लाख में एक-एक कुर्सी खरीदी थी। आज देश में इम्तिहानों की बेईमानी, दाखिले, और नौकरी के मुकाबलों में बेईमानी एक बहुत बड़ा मुद्दा है। देश के सारे बेरोजगार, चाहे वे प्रतिभा के आधार पर चयन सूची में आने के लायक न हों, वे भी निराश हो जाते हैं कि सलेक्शन में बेईमानी चल रही है। यह सिलसिला टूटना चाहिए। जहां बाकी लोगों के हक छीनकर कुछ लोगों के बीच पढ़ाई या नौकरी की कुर्सी बेची जाती है, वहां पर इन लोगों को और कड़ी सजा मिलनी चाहिए, और लोकसभा में जो संशोधन अभी है, उसे भी कानून बनाया जाना चाहिए। इस बीच यह उम्मीद तो जायज ही होगी कि इम्तिहान और इंटरव्यू लेने वाले सभी संस्थान अपने इंतजाम और पुख्ता करते चलें, क्योंकि पेपर आउट करने का बड़ी कमाई का धंधा तो मुजरिम चलाते ही रहेंगे, और उसे रोकने की तरकीबें भी जारी रखनी होगी।
एथेनॉल का बावलापन क्या डॉलर और पेट्रोल के टक्कर में शक्कर की भी सेंचुरी बनाएगा?
21 अगस्त 2026
भारत के बाजारों में शक्कर का दाम एकाएक आसमान छूने लगा है। कमी इतनी हो गई है कि केन्द्र सरकार ने शक्कर आयात पर शुल्क शून्य कर दिया है। मतलब यह कि टैक्स का नुकसान झेलते हुए, विदेशी मुद्रा खर्च करते हुए अब भारत के लोगों के मुंह में कड़वी शक्कर घुलेगी, दूसरी तरफ भारत में शक्कर कारखानों को गन्ना कम नसीब है क्योंकि गन्ना एथेनॉल फैक्ट्रियों में जा रहा है, और वहां से पेट्रोलियम में मिलावट के लिए। सरकार का तर्क है कि भारी-भरकम पेट्रोलियम आयात खर्च घटाने के लिए, विदेशी मुद्रा बचाने के लिए यह मिलावट की जा रही है, लेकिन अब पेट्रोलियम में यह बच रही है तो शक्कर में जा रही है। इसके साथ-साथ कुछ जानकार लोगों ने यह भी लिखा है कि एथेनॉल मिले हुए पेट्रोल से गाडिय़ों का माइलेज 10-15 फीसदी तक गिर रहा है, इसका मतलब है कि उनके पेट्रोल की खपत 10-15 फीसदी बढ़ जाएगी। अब उतने ही लोगों के उतने ही किलोमीटर पर 10-15 फीसदी अतिरिक्त पेट्रोल आयात करना पड़ेगा, तो फिर हासिल हुआ क्या? निल बटे सन्नाटा?
पेट्रोल में एथेनॉल मिलावट का अधिक विरोध इसलिए कारगर नहीं हो रहा क्योंकि इस बाजार पर सरकार का एकाधिकार है। अधिकतर पेट्रोलियम कंपनियां सरकार की अपनी हैं, और ग्राहक के पास न कोई पसंद है, न कोई विकल्प। अभी दो दिन पहले ही प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि ग्राहकों को ई-20 पेट्रोल के साथ-साथ ई-10 पेट्रोल भी मुहैया कराया जाना चाहिए ताकि पुरानी गाडिय़ों वाले लोग अपनी पसंद का ईंधन चुन सकें। दरअसल यह तकनीकी तथ्य सामने आया है कि पुरानी गाडिय़ां एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के लायक बनी हुई नहीं हैं। केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने बहुत ही गोलमाल शब्दों में मजबूरी में ही संसद में यह माना है कि पुरानी गाडिय़ों के कुछ पुर्जे इससे खराब हो सकते हैं। लोगों का कहना है कि यह ‘कुछ’ शब्द सही ब्यौरा नहीं है, और कई पुर्जे खराब हो सकते हैं, उनके बदलने की लागत सरकार के रखे गए अंदाज से काफी अधिक हो सकती है, ऐसी गाडिय़ां खराब होने के वक्त कहीं भी दगा दे सकती हैं। भारत की ऑटोमोबाइल कंपनियां एक गजब की रहस्यमय चुप्पी साधे बैठी हैं, और अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों ने इन कंपनियों को चिट्ठी लिखने पर भी कोई जवाब न मिलने की बात सार्वजनिक रूप से कही है। देश के सबसे बड़े ऑटोमोबाइल संगठन एसआईएएम ने पेट्रोलियम मंत्रालय को एक चिट्ठी लिखी, और ई-20 पेट्रोल से होने वाले नुकसान की शिकायतें बढऩे की बात कही, लेकिन कुछ रहस्यमय कारणों से कुछ घंटों के भीतर ही यह चिट्ठी वापिस ले ली, और कहा कि अभी आंकड़ों की कुछ और पुष्टि करनी है।
अब हिन्दुस्तान में त्यौहार के महीने शुरू हो चुके हैं, और अगले कई महीने लोगों के घर-बाजार में शक्कर की अधिक खपत रहेगी। अभी ही शक्कर दुगुने दाम पर पहुंच रही है, और आज बाजार का एक अंदाज यह है कि यह सौ रूपए किलो भी हो सकती है, यानी वह पेट्रोल और डॉलर दोनों को कड़ा मुकाबला दे सकती है। यह बड़ी गजब की नौबत है। सरकार ने अभी कुछ हफ्ते पहले यह मंजूर किया था कि इस मिलावट से गाडिय़ों को कुछ नुकसान पहुंच सकता है, लेकिन सरकार ने यह भी कहा था कि एथेनॉल से जुड़े हुए ढांचे को खड़ा करने में देश का सवा लाख करोड़ रूपए खर्च हो चुका है, इसलिए वापिस लौटना महंगा पड़ेगा। हमने उस वक्त भी लिखा था कि देश की सारी पेट्रोल-गाडिय़ों की मौजूदा कीमत इस सवा लाख करोड़ से बहुत अधिक है, और उनको नुकसान पहुंचाने की कीमत पर ऐसा फैसला नहीं लेना चाहिए।
आज त्यौहार के वक्त लोगों की गाडिय़ां गन्ना रस से बने एथेनॉल वाले पेट्रोल से डायबिटिक हो रही हैं, बाजारों से शक्कर गायब हो रही है, महंगी हो रही है, गन्ना उगाने वाले खेत भयानक पानी पीते हैं, इसलिए धरती के पेट से पानी गायब हो रहा है, अब शक्कर आयात करने की नौबत आ गई है, इसलिए जीरो ड्यूटी करने से सरकार को सीधा नुकसान भी हो रहा है, और विदेशी मुद्रा भी जा रही है। गाडिय़ों को नुकसान हो रहा है, सेकेंडहैंड गाडिय़ों का बाजार ठप्प सरीखा हो रहा है, वहां दाम गिर गए हैं, ग्राहक बिदक गए हैं। अर्थशास्त्रियों को यह समझ नहीं पड़ रहा है कि पेट्रोल का 20 फीसदी आयात घटाने के लिए सरकार किस-किस तरह के नुकसान झेल रही है। यह भी खबर है कि राज्य सरकारें चावल के अपने विशाल अतिरिक्त भंडार से औने-पौने दाम पर एथेनॉल निर्माण के लिए चावल दे रही है जिससे अंधाधुंध अनुदान पर खरीदा गया चावल भारी नुकसान पर एथेनॉल बनाने में जा रहा है। किसको घाटा हो रहा है, किसको मुनाफा हो रहा है, यह कुछ भी साफ नहीं है। इतना जरूर है कि जनता का विश्वास सरकार पर से कमजोर हो गया है, और एथेनॉल के सेल्समैन की तरह जनता के सामने खलनायक बने हुए नितिन गडकरी अपनी दशकों की कमाई हुई लोकप्रियता को महीनों में खो बैठे हैं।
इस पूरे मामले से जुड़े हुए सारे आंकड़ों का विश्लेषण हमारी साधारण समझ से ऊपर की बात है। लेकिन क्या आयात में 20 फीसदी की कमी करना सचमुच इतने किस्म के नुकसान के लायक है? क्या जनता का भरोसा खो देने के लायक है? क्या एथेनॉल निर्माण के लिए एक बार बन चुके ढांचे की लागत की विकरालता इतनी विशाल है कि सरकार अपना फैसला बदल न पाए, ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिनके जवाब हमारे पास नहीं हैं, लेकिन जनता के मन में ये सवालों की शक्ल में खड़े हुए हैं, जब-जब लोगों को पेट्रोल पंप की शक्ल देखनी पड़ती है, उन्हें नितिन गडकरी की शक्ल भी दिमाग में घूम जाती है, चाहे वे पेट्रोलियम मंत्री न हों। अब तक पेट्रोल पंपों पर जो नाराजगी रहती थी, वह तो दो-चार दिनों में, या हफ्ते में एक बार रहती थी, लेकिन अब दिन में चार-छह बार चाय की हर प्याली के साथ लोगों के मन में यह टीस उठती रहेगी कि उनकी चाय एथेनॉल की वजह से कड़वी है।
सरकार के अपने हित में यह है कि एकदम पारदर्शी तरीके से, लोगों को समझ आए ऐसी भाषा में इस पूरी अर्थव्यवस्था को समझाए, और जनता के सामने अपने फैसलों को न्यायोचित साबित करे। हम तो देश की जनता, और सरकार दोनों के शुभचिंतक की हैसियत से यह पारदर्शिता सुझा रहे हैं। जनता के इतने बड़े तबके, तकरीबन सौ फीसदी जनता के मन में स्थाई संदेह, और स्थाई आक्रोश लोकतंत्र में किसी भी सत्ता के लिए अच्छी बात तो रहती नहीं है।









