नकली, घटिया, और दस गुना महंगे दाम छपी दवाओं से मरीजों को बचाने का काम आसान नहीं
30 सितंबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने अभी भारत में दवाओं के अंधाधुंध और मनमाने दाम छापने के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बिक्री से दस गुना दाम छापने को ग्राहकों की दिनदहाड़े लूट कहा है, और इसे रंगदारी भी कहा है। अदालत के सामने कुछ दवाओं पर छपे हुए अधिकतम दाम, और बिक्री का असली रेट जब दोनों रखे गए, तो जज यह देखकर हक्का-बक्का रह गए कि कंपनी जो दवा 27 सौ रूपए में दुकानदार को दे रही है, उस पर 27 हजार का एमआरपी छपा है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के दवा और खाद्य नियंत्रक, एक चर्चित आईएएस अफसर ने वहां के अस्पतालों का यह मामला पकड़ा था कि 13 रूपए में मिलने वाली, मरीजों को अक्सर ही चढ़ाई जाने वाली बोतल पर तीन-चार सौ रूपए दाम छापकर अस्पतालों को दिया जाता है, और अस्पताल अपने बिल में वही दाम जोड़ते हैं। सुप्रीम कोर्ट के सामने यह भी आया कि अस्पताल वहां भर्ती मरीजों के लिए बाहर से दवा खरीदने की छूट नहीं देते, और अपने ही दवा दुकान से खरीदने की शर्त रखते हैं। ऐसे में मरीज के पास उसी अस्पताल से दस-बीस या पचास गुना दाम पर दवा खरीदने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता। अदालत में अभी यह मामला भी उठा कि बहुत कम असली दाम वाली दवा दस-बीस या पच्चीस गुना दाम छापकर अस्पताल को दी जाती है, तो सरकारी स्वास्थ्य बीमा के तहत इलाज पाने वाले मरीजों के बिल में भी वही आसमान छूती कीमत दर्ज की जाती है, और इसका भुगतान सरकार को करना पड़ता है। अदालत ने केन्द्र सरकार से पूछा है कि ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता कि दवा पर छपे हुए दाम दुकानदार को लगने वाले रेट से 16 फीसदी अधिक तय कर दिए जाएं, ताकि दुकानदार का मुनाफा तय हो जाए, और अंधाधुंध बढ़ा-चढ़ा दाम मरीजों या सरकार को लूटने के लिए इस्तेमाल न किया जाए।
लेकिन हिन्दुस्तान में दवाओं का कारोबार सिर्फ इस एक जटिलता से भरा हुआ नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम रियायती दवा खरीदने के लिए जब सरकारी दुकानों पर जाते हैं, तो आमतौर पर छपे हुए दाम के 20-25 फीसदी पैसे लिए जाते हैं। असली दाम से चार या पांच गुना अधिक रेट छापकर उसे फिर 75-80 फीसदी रियायत पर बेचने का यह झांसा किसको निशाना बनाने के लिए दिया जाता है? इन दुकानों पर आमतौर पर गरीब मरीज जाते हैं, और किसी के पास बिल लेने जितना समय नहीं रहता, दुकानों के कर्मचारी अपने कम्प्यूटर पर तिलस्म के अंदाज में हिसाब-किताब करते हैं, और ग्राहक दवा सस्ते में मिल रही जानकर भुगतान करके चले आते हैं। अगर छपे दाम से एक चौथाई या उससे भी कम पर दवा मिल रही है, तो फिर रेट का यह फर्जीवाड़ा शुरू ही क्यों होता है?
एक और भयानक पहलू भारतीय मरीजों के लिए दवाओं को लेकर है। अभी पिछले ही महीने कर्नाटक में कई जगह छापे मारे गए, तो पांच करोड़ से अधिक दाम की नकली, एक्सपायर हो चुकी दवाएं, नकली लेबल, इंजेक्शन भरने की मशीन सब जब्त हुए। जांच में पता लगा कि सस्ती दवाओं को नई शीशियों में भरकर महंगे विदेशी ब्रांड की जीवनरक्षक दवाओं के नाम से बेचा जा रहा था, उन पर नकली क्यूआर कोड भी लगाए गए थे। जांच एजेंसियों के मुताबिक कैंसर और दूसरी जीवनरक्षक दवाओं, आईसीयू में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के नकली इंजेक्शन बेंगलुरू के 90 से अधिक अस्पतालों में बेचे जा रहे थे। अब अगर कैंसर की दवाओं, और संक्रमण को रोकने वाली दवाओं के नाम से नकली दवाएं नामी-गिरामी अस्पतालों में ही मरीजों को लगाई जा रही थीं, तो किसके जिंदा बचने की गुंजाइश बचती है?
इससे परे अभी इसी महीने दिल्ली में रैबीज संक्रमित कुत्तों और दूसरे प्राणियों के काटने पर लगने वाले रैबीज वैक्सीन की नकली खेप पकड़ी गई। इसे बनाने वाली नामी-गिरामी कंपनी, इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड ने कहा कि दवा की यह खेप उसकी बनाई हुई है ही नहीं। अब कुत्ते के काटने पर जिस इंजेक्शन को लगाकर लोगों को लगता है कि वे हाईड्रोफोबिया जैसी मौत से बच जाएंगे, उन्हें नकली दवा लगाने से कितना बड़ा धोखा हो रहा है? इस बारे में कुछ लोग गिरफ्तार हुए हैं, लेकिन याद रखने की बात यह है कि पिछले बरस भी इन्हीं वैक्सीन को नकली बनाकर खपाने के मामले समझ में आए थे, और उस वक्त इसे सप्लाई करने वाली ऑस्ट्रेलिया की कंपनी ने भारत में यह वैक्सीन लगवाने वाले लोगों को सतर्कता जारी की थी कि वे दुबारा कानूनी और असली वैक्सीन लगवाएं। जैसा कि तमाम लोग जानते हैं, और बड़े सामान्य ज्ञान की बात है, ऐसी एंटी रैबीज वैक्सीन अगर समय रहते नहीं लगवाई जाती है, तो बहुत बुरी मौत हो सकती है। इसे भी नकली बनाकर बेचने से हिन्दुस्तानी कारोबारियों को परहेज नहीं है। फिर एक और खतरनाक बात यह है कि ऐसी बेअसर हर दवा नकली हो यह भी जरूरी नहीं है, कई कंपनियां ही ऐसी घटिया दवा और वैक्सीन बनाती हैं जो बहुत हद तक बेअसर रहती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी केन्द्र सरकार से यह विचार करने को कहा है कि क्या सभी दवाओं के लिए एमआरपी को दुकानदार के लिए 16 फीसदी कमाई रखकर तय कर देना बेहतर नहीं होगा? आज हमारी व्यक्तिगत जानकारी यह है कि चर्मरोग विशेषज्ञ जैसे कई डॉक्टरों के लिए कंपनियां मामूली फेरबदल वाले ऐसे पैकेट तैयार करती हैं, जिनमें उन डॉक्टरों के कहे हुए दाम छापकर दे दिए जाते हैं। ऐसा और ब्रांचों के डॉक्टरों के लिए भी कंपनियां करती होंगी, और कुछ बरस पहले एक बड़े अखबार ने दवा कंपनियों का स्टिंग ऑपरेशन भी किया था जो कि मनचाहे दाम छापकर दवा देने के लिए तैयार थीं। इनमें डॉक्टर और दवा कंपनी की मिलीभगत से ब्रांड नेम में कुछ ऐसा फेरबदल कर दिया जाता है कि वह दवा सिर्फ उसी डॉक्टर के क्लिनिक में मिल सकती है। इस तरह से मरीज के साथ दर्जनों किस्म के धोखे होते हैं, देखते हैं कि केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट किसे बचाने में कामयाब होते हैं, मरीजों को, अस्पतालों को, या दवा कंपनियों को।
धर्म का यह विकराल स्वरूप क्या भक्तों के भी भले का रह गया है?
29 सितंबर 2026
हैदराबाद की खबर है कि तेलुगु फिल्मों के एक जाने-माने अभिनेता अल्लू सिरीश ने पुलिस से शिकायत की है कि एक मंदिर में देर रात तक तेज आवाज में संगीत बजाया जा रहा है जिससे बुजुर्गों, बच्चों, और नौकरीपेशा लोगों को बड़ी परेशानी हो रही है। पहले भी कई बार शिकायतें की जा चुकी हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई है। सिरीश ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में वीडियो भी शेयर किया है, और लिखा है कि उन्होंने फिल्म नगर पुलिस स्टेशन में शिकायत की थी, और उनसे 25 सितंबर तक इंतजार करने को कहा गया था क्योंकि गणेश उत्सव चल रहा था। अब त्यौहार खत्म हो गया है लेकिन तेज संगीत बंद नहीं हुआ है। इस पर हैदराबाद पुलिस ने कहा है कि संबंधित थाने को मामला दे दिया गया है। अभी दो-तीन दिन पहले ही मध्यप्रदेश की एक खबर थी कि गणेश विसर्जन के जुलूस में बहुत तेज बजते हुए डीजे की वजह से बगल के कॉलेज में क्लास में बैठी एक छात्रा की मौत हो गई। इसके पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में बच्चों, बड़ों, या बूढ़ों, सभी तरह के लोगों की मौतें डीजे के शोरगुल के बीच हो चुकी हैं। दो दिन पहले ही जयपुर का एक वीडियो सामने आया था जिसमें एक मंदिर के भीतर के सीसीटीवी कैमरे में कैद हुआ है कि पड़ोस का एक छात्र आकर पुजारी को बहुत बुरी तरह मार रहा है क्योंकि वह मंदिर के लाउडस्पीकर से थका हुआ था।
ये कुछ मामले तो अधिक चर्चित होने की वजह से खबरों में आ जाते हैं, लेकिन असल जिंदगी की हालत यह है कि धर्म के नाम पर रात-दिन बजने वाले लाउडस्पीकरों से दूर-दूर तक लोगों का जीना हराम रहता है, उनका सुख-चैन खत्म हो जाता है, वे मानसिक रूप से तनाव में रहते हैं, ब्लडप्रेशर या दिल की बीमारी के खतरे उन पर बढ़ जाते हैं, उनके कानों को खतरा रहता है, नींद कम होने की वजह से उनकी उत्पादकता घट जाती है। दूसरी तरफ यह देखें कि धार्मिक लाउडस्पीकरों से हासिल क्या होता है, तो दिखता है कि एक धर्म के लोग अपने लाउडस्पीकरों के शोर की मार से दूसरे धर्म के लोगों को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं, अपने धर्म के बाहुबल का प्रदर्शन करते हैं। अपने ही धर्म के भीतर भी अलग-अलग धर्मस्थानों, या अलग-अलग धार्मिक आयोजनों से जुड़े हुए सामाजिक या राजनीतिक नेता एक-दूसरे से मुकाबले में भी अपने आयोजनों को और बड़ा करते हैं। और बड़े का यह मुकाबला सार्वजनिक जीवन में परले दर्जे की अराजकता खड़ी कर चुका है। प्रतिमाओं के आकार में मुकाबला होता है, दही-हांडी को बांधने की रस्सी की कितनी ऊपर जा सकती है, इसका मुकाबला होता है, झांकी और लाउडस्पीकर का मुकाबला होता है। अभी पिछले हफ्ते छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस को जाकर रात दो बजे गणेश पंडाल बंद करवाने पड़े ताकि ड्यूटी पर तैनात पुलिसवालों को कुछ घंटों की नींद नसीब हो जाए। शहरों की सडक़ों की क्षमता, लोगों की कानों की क्षमता, आंखों पर पडऩे वाली तरह-तरह की रौशनी को झेलने की क्षमता, चंदा देने की क्षमता, न देने पर नाराजगी और नुकसान झेलने की क्षमता, आज के धार्मिक आयोजन लोगों की क्षमताओं की अग्निपरीक्षा ले रहे हैं। गुजरात का एक वीडियो कुछ दिन पहले था, वहां एक छोटे से आइस्क्रीम पार्लर वाले से उस मोहल्ले के धार्मिक आयोजन के लिए 21 हजार रूपए चंदा मांगा गया, और न देने पर दुकानदार और उसके परिवार की बहुत बुरी तरह पिटाई की गई, और पार्लर को तोडफ़ोड़ दिया गया। जगह-जगह मनमाना चंदा न मिलने पर कारोबारियों या घरेलू लोगों को अंधाधुंध नुकसान पहुंचाने के मामले सामने आते हैं।
जो लोग किसी भी धर्मस्थान के आसपास रहते हैं, वे लाउडस्पीकरों से रात-दिन यातना झेलते हैं, और इन जगहों पर आने वाले धर्मालु लोगों की भीड़ से, उनकी गाडिय़ों से होने वाले ट्रैफिक जाम से उनकी पूरी जिंदगी ही खराब हो जाती है। यह हर किसी के बस का तो रहता नहीं कि ऐसी जगहों के अपने मकानों को बेचकर दूसरी जगह जा सकें। ऐसे में होने वाले नुकसान की भला क्या भरपाई हो सकती है? फिर यह भी है कि अलग-अलग धर्मों के ऐसे उपासना केन्द्रों के अपने अवैध निर्माण सडक़ों तक आए हुए रहते हैं, सडक़ों के ऊपर भी कंस्ट्रक्शन कर लिया जाता है। एक साइकिल खड़ी करने की जगह भी धर्मस्थान आमतौर पर नहीं छोड़ते। फिर उनके अहाते के बाहर धार्मिक सामग्री बेचने वालों की दुकानों की कतार लग जाती है, भीख मांगने वाले लोगों की कतार लग जाती है, और श्रद्धालुओं की अलग-अलग गाडिय़ां आसपास के पूरे इलाके को घेर लेती हैं। फिर वायु तरंगों पर लाउडस्पीकर का शोर कब्जा कर लेता है, बाहर चलने वाले अलग-अलग धर्मों के भंडारे चारों तरफ लोगों की भीड़ जुटा लेते हैं, और खाना खत्म होने तक चारों तरफ जूठी पत्तलों और गिलासों के ढेर लग जाते हैं।
अब किसी देश में लोगों का शांति से जीने, शांति से काम करने, अपने घर-दुकान तक बिना रोकटोक आने-जाने, सडक़ों पर चैन से चलने का हक अधिक महत्वपूर्ण है, या कि धार्मिक पाखंड के लिए सार्वजनिक जीवन के हर नियम-कानून को तोडऩा अधिक जरूरी है? जिस वक्त धर्म बने थे, उस वक्त तो अगले हजारों बरस तक लाउडस्पीकर का आविष्कार ही नहीं हुआ था। साइकिलें बनने में भी सैकड़ों बरस तो लगे ही होंगे, और इसलिए मंदिर-मस्जिद, या किसी और धर्मस्थल पर लोग पैदल ही आते-जाते रहे होंगे। उस वक्त की सीमित आबादी, बिना बिजली, बिना लाउडस्पीकर, बिना पटाखों और आतिशबाजी के अमन-चैन से धार्मिक आयोजन होते रहे होंगे, और शायद ही किसी की मौत मंदिर के भजन, या मस्जिद की अजान से हुई होगी। आज तो हिन्दुस्तान के शहरों में कोई भी धार्मिक त्यौहार आते ही उन सारे इलाकों के लोग दहशत में आ जाते हैं जहां से होकर धार्मिक जुलूस गुजरते हैं।
अब गणेशोत्सव या दुर्गोत्सव जैसे त्यौहारों की बात करें, जिनमें प्रतिमाओं की ऊंचाई का मुकाबला चलते रहता है, तो अभी ऐसे कई वीडियो सामने आए जिसमें बहुत ऊंची गणेश प्रतिमा को लाते या ले जाते हुए उस प्रतिमा की ऊंचाई तक पहुंचकर लोग रास्ते के सारे टेलीफोन, केबल, या इंटरनेट के तार काटते चले जा रहे थे। एक-एक प्रतिमा के लिए ऐसे दर्जनों तार काटे जा रहे थे। अब इनसे इस पूरे रास्ते में रहने और काम करने वाले लोगों की जिंदगी और कामकाज की जो बर्बादी होगी, उसकी भरपाई कौन से ईश्वर कर सकेंगे? फिर ऐसे दर्जनों वीडियो सामने आए हैं जिसमें क्रेन से पानी में गिराई जाती प्रतिमाएं पुलों की रेलिंग पर ही टूटकर चकनाचूर हो रही हैं, या लोग प्रतिमाओं के ऊपर चढ़-चढक़र उन्हें पानी में बांस से दबाकर डुबाने की कोशिश कर रहे हैं। आज चारों तरफ नदियों में बाढ़ आई हुई है, और हर बरस नदी के किनारे के हजारों-लाखों गांव-शहर की प्रतिमाएं उनमें डुबा-डुबाकर उन्हें पाटा जा रहा है, और कोई हैरानी नहीं कि इससे भी बाढ़ बढ़ रही हो, प्रदूषण तो बढ़ ही रहा है।
धर्म ने अपने आपको तर्क और विज्ञान से, नियमों और संविधान से, सभी से ऊपर कर लिया है। एक दिन इंसान ने अपने इस्तेमाल के लिए धर्म बनाया था, आज धर्म बेकाबू एआई की तरह बेकाबू हो चुका है, और वह इंसानों का इस्तेमाल अपने आपको महिमामंडित करने के लिए कर रहा है। यह महिमामंडन इंसानों की जिंदगी, पर्यावरण, सभी का अपार नुकसान कर रहा है, और धर्मों के बीच की, अलग-अलग धर्म के भीतर की यह दौड़ जाने कहां तक पहुंचेगी।
विनाशकारी बाढ़ से तबाही रोकना तो आसान नहीं लेकिन उसे घटाना फिर भी मुमकिन है
28 सितंबर 2026
देश के बहुत से प्रदेशों में तूफानी बारिश की वजह से नदी-नालों में बाढ़ आ गई है। जगह-जगह लोग मारे जा रहे हैं, लेकिन लोगों का हौसला है कि ऐसे में भी उफनती नदियों में गणेश विसर्जन में लगे हुए हैं, पूजा के नारियल निकालने के लिए कूद रहे हैं, पुलों के ऊपर आ चुके खतरनाक स्तर के पानी में से भी बस निकाल रहे हैं। यह बात जगजाहिर है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम की सबसे बुरी मार, और अधिक बुरी होती जा रही है, और बार-बार आ रही है। लेकिन वह तो एक बड़ा मुद्दा है, कुछ दूसरे छोटे-छोटे मुद्दे भी हैं जिन पर सरकार और समाज दोनों को गौर करने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन को रोक पाना किसी एक सरकार के हाथ में नहीं है, अभी नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर उसने दुनिया के देशों से एक मुआवजा मांगा है कि पर्यावरण बिगाडऩे में उसका योगदान सबसे ही कम है, लेकिन दुनिया के जिन दूसरे देशों ने पर्यावरण सबसे अधिक बिगाड़ा है, उनकी वजह से नेपाल में यह बाढ़ आई है। यह व्यापक बहस तो वैश्विक स्तर पर चलती ही रहेगी, लेकिन देश-प्रदेश की सरकारें अपने स्तर पर भी बाढ़ नियंत्रण के लिए कुछ कर सकती हैं।
हमने इसी अखबार के इस संपादकीय कॉलम में बीते दशकों में कई बार यह लिखा है कि नदियों में पानी जहां से आता है, उस कैचमेंट एरिया कहे जाने वाले इलाके में जगह-जगह बड़े-बड़े जलाशय बनाए जाने चाहिए। ये जलाशय इंसानों के इस्तेमाल के हिसाब से न बनें, ये धरती से निकाले गए पानी की भरपाई करने के लिए बनें। ऐसे री-चार्ज जलाशय अगर नदियों तक पहुंचने वाले पानी को रोक सकेंगे, तो नदियों में बाढ़ में कुछ कमी आएगी। किसी भी प्रदेश में नदी में किसी एक जगह से पानी नहीं आता, उसकी दिशा के साथ-साथ दोनों तरफ की जमीनों से पानी बहकर आता है, और उस पानी को रोकने का कुछ इंतजाम अलग-अलग स्थानीय तरीकों से किया जा सकता है।
अब हम पर्यावरण की उतनी जटिल बातों पर अभी जाना नहीं चाहते कि नदियों के किनारे पेड़ों की कटाई होने से उनकी जड़ों के आसपास की मिट्टी बहकर नदियों में पहुंचती है, और वहां गाद बनकर पानी की गहराई को कम कर देती है, इससे भी बाढ़ आती है। हम एक आसान सा तरीका सुझा रहे हैं कि नदियों में जहां-जहां से बहकर पानी बड़ी मात्रा में आता है, ऐसे नालों के किनारे बड़े-बड़े जलाशय इतने गहरे बनाने चाहिए कि वे बहुत सारा पानी समा सकें। इन नालों का पानी इन जलाशयों में जाए, और इनके भरने के बाद ही वह नदी तक जाए। नदी की पूरी लंबाई में अगर किनारे की खाली जमीनों पर तेजी से ऐसे गहरे जलाशय बनाए जाएंगे, तो बाढ़ का खतरा कुछ हद तक कम होगा, और धरती के भीतर के पानी की बहुत हद तक भरपाई भी हो सकेगी। अभी सरकार की तालाबों की जितनी योजनाएं हैं, वे इंसानों, और मवेशियों के निस्तारी के मकसद पूरे करने के लिए हैं। लेकिन इनसे धरती के भीतर खाली होते हुए पेट को वापिस भरना कम हो पाता है। सरकार की योजनाओं में आबादी के आसपास ही तालाब गहरीकरण, या तालाब बनाना होता है, ताकि उनका उपयोग हो सके। इस नजरिए को बदलकर भूजल री-चार्ज के इकलौते मकसद से भी अगर बंजर जमीनों पर बड़े-बड़े गहरे जलाशय बनाए जाएंगे, तो उससे भी लगातार गिरता हुआ भूजल स्तर संभलेगा। आज जमीन के नीचे जितनी अधिक गहराई से पानी निकालना पड़ता है, उस पर उतनी ही अधिक बिजली खर्च होती है। इसलिए जलस्तर ऊपर आने पर बिजली की बचत होगी, और परोक्ष रूप से कोयले से चलने वाले बिजलीघरों से बर्बाद होने वाला पर्यावरण भी कुछ हद तक बच सकेगा।
फिर शहरीकरण हो, या कि ग्रामीण बसाहट, इन दोनों में ही पानी के खतरे को अनदेखा किया जाता है। शहरों के बीच कई बस्तियां हर बरस पानी में डूबती हैं, हर बरस लोगों के सामानों की बर्बादी होती है, लेकिन शहरीकरण के जिम्मेदार विभाग इस अराजक विकास और विस्तार को नहीं रोक पाते, क्योंकि अवैध कॉलोनियां, अवैध निर्माण लोकप्रिय काम रहते हैं, और इन पर बसने वाले लोगों के वोट पाने के लिए राजनेता इन्हें बढ़ावा भी देते हैं। सरकारी नियमों को तोडक़र यहां तक सडक़, नाली, पानी, और बिजली का इंतजाम भी कर दिया जाता है। लेकिन जब मौसम की मार इन निचले इलाकों को डुबाती है, तो शहरों के बीच भी सरकारी अमले को नाव से लोगों को निकालना पड़ता है। इसलिए अगर किसी सरकार में शहरीकरण और बसाहट को नियमित करने का कलेजा हो, तो किसी जगह लोगों की बस्तियां बनने के पहले ही उसे रोकना चाहिए कि हर बरस जिनके डूब जाने की गारंटी हो, वहां पर लोगों को बसने ही क्यों दिया जाए?
नदियों की बाढ़ पर कुछ काबू पाने के लिए भारत में एक बहुत बड़ी, नदीजोड़ नाम की विकराल योजना बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार दोनों के एकमत होने से यह योजना आगे बढऩा तय है। इसका मकसद यह है कि जिन इलाकों में लगातार बाढ़ आती है, वहां से नदियों के रास्ते अतिरिक्त पानी को उन इलाकों में ले जाया जाए, जहां पानी की जरूरत रहती है। अभी कुछ ताजा पर्यावरण रिपोर्ट यह कहती हैं कि नदियों का मिजाज भी बदल रहा है। जिन महीनों में जिन नदियों में बाढ़ आती थी, उन महीनों में वहां सूखा पडऩे लगा है, और जहां सूखा पड़ता था, वहां बाढ़ आने लगी है, ऐसे में नदीजोड़ योजना से बाढ़ की दिक्कत कितनी कम होगी, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। फिर भी राज्य सरकारों को चाहिए कि जब तक नदीजोड़ जैसी बड़ी योजना से बाढ़ में काबू में न हो, तब तक वे अपने प्रदेशों की नदियों के किनारे जहां-जहां सूखे, उथले, बसाहट वाले, या जंगलों के बीच भी, जहां जैसे जलाशय बन सकें, उन्हें बनवाना चाहिए। विशाल री-चार्ज जलाशय बनवाते हुए मजदूरों को रोजगार देने को अनिवार्य प्राथमिकता नहीं रखना चाहिए, बल्कि बड़ी-बड़ी दानवाकार मशीनें अगर तेजी से ऐसे जलाशय खोद सकेंगी, तो बारिश के बीच के महीनों में तो नहीं, आने वाले बरसों में जरूर बाढ़ कुछ हद तक काबू में आ सकती है, और भूजल में तो शर्तिया ही सुधार होगा। यह हर पहलू से सरकार के लिए जीत का एक सौदा रहेगा, बारिश के पानी को जितना सहेज सकें, वह धरती को बचाएगा, और बाढ़ को घटाएगा।
एआई नाम की बिना ब्रेक की गाड़ी घाटी की ढलान पर उतरना शुरू कर चुकी है
27 सितंबर 2026
दुनिया के एक बड़े टेक्नॉलॉजी कारोबारी बिल गेट्स ने अभी कहा है कि अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गलत लोगों के हाथ में पड़ गया तो वह 100 करोड़ लोगों की जान जाने की वजह बन सकता है। एआई के अपने आप जानलेवा या विनाशकारी हो जाने का खतरा अपनी जगह है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि इंसान ही एआई नाम के इस बेहद ताकतवर औजार को हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगे तो क्या होगा। एआई ऐसे हमलावरों को दुनिया को चलाने वाले सिस्टम की कमजोरियां खोजने में मदद कर सकता है। अस्पताल, वित्तीय संस्थान, बिजली के ग्रिड और दूसरे सरकारी सिस्टम निशाने पर आ सकते हैं। अब तक तबाही मचाने वाले लोगों के हाथ में ऐसा औजार नहीं था जो कुछ ही पल में दुनिया भर की जानकारी को खंगाल सके, किसी सिस्टम की कमजोरी खोज सके और उस कमजोरी का इस्तेमाल करने का तरीका सुझा सके। ऑस्ट्रेलिया में अभी जो हुआ, वह इसी खतरे की एक मिसाल है। वहां एआई एजेंट ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी वेबसाइट में अनधिकृत तरीके से प्रवेश कर गैर-सार्वजनिक फाइलों तक पहुंच बना ली। अमेरिकी सरकारी वेबसाइटों से जुड़े ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें एआई एजेंटों ने इंटरनेट पर मिले लॉग-इन विवरणों का इस्तेमाल करके ऐसी जगहों तक पहुंच बनाई जहां उसे नहीं जाना चाहिए था। इन घटनाओं में हर मामले को पारंपरिक अर्थ में ‘हैकिंग’ कहना शायद सही न हो, लेकिन यह जरूर साफ हो रहा है कि एआई एजेंट अपने दिए हुए काम को पूरा करने के लिए ऐसे रास्ते अपना सकते हैं जिनकी कल्पना उनके बनाने वालों ने भी नहीं की थी।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विकसित करने वाली कंपनियों और विशेषज्ञों के बीच अब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इसके विकास की रफ्तार कम करने की जरूरत है। आज एआई जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से उससे बचाव के तरीके नहीं बन रहे हैं। इसे कुछ इस तरह समझिए कि कार की रफ्तार लगातार बढ़ाने की टेक्नॉलॉजी बन रही हो, लेकिन सीट बेल्ट पूरी तरह तैयार न हुई हो, टक्कर के समय खुलने वाले एयरबैग भरोसेमंद न बने हों और ब्रेक के बारे में यह उम्मीद की जा रही हो कि कार के बहुत तेज भागने के पहले तक वे भी तैयार हो जाएंगे। यह ऐसी दौड़ है जिसमें गाड़ी बहुत तेजी से उस पहाड़ी की तरफ बढ़ रही है जिसके नीचे गिरने का खतरा है और उम्मीद यह की जा रही है कि जब तक हम नीचे पहुंचेंगे तब तक जाल बुन लिया जाएगा। लेकिन एआई से होने वाले सीधे हमले और साइबर अपराध को कुछ देर के लिए किनारे रख दें तो एक और बड़ा खतरा दिखाई देता है, एआई इंसान की अपनी सोच और फैसले की जगह लेना शुरू कर सकता है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि एआई गलत जवाब देता है; सवाल यह है कि अगर न्याय जैसे क्षेत्र में इंसान अपनी सोच और विवेक की जगह मशीन के तैयार किए हुए शब्दों पर निर्भर होने लगे तो फैसला आखिर किसका रह जाएगा।
यह खतरा काल्पनिक भी नहीं है। अदालतों में एआई से तैयार की गई ऐसी सामग्री के मामले सामने आ चुके हैं जिसमें ऐसे मुकदमों और फैसलों का हवाला दिया गया जो वास्तव में कभी अस्तित्व में थे ही नहीं। एआई शानदार भाषा में जवाब तैयार कर सकता है, लेकिन उसकी सबसे खतरनाक खूबी यही है कि वह गलती भी पूरे आत्मविश्वास के साथ कर सकता है। हमने खुद अभी पिछले ही हफ्ते इसका अनुभव किया। ओडिशा के एक मजदूर परिवार के 5 बच्चों ने नीट में कामयाबी हासिल की और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पाया। इस मामले पर हमने ‘इंडिया-आजकल’ के लिए एक यू-ट्यूब वीडियो बनाया था। इसकी रिसर्च के दौरान एक लोकप्रिय एआई टूल से इस मामले की जानकारी मांगी गई तो उसने एक दूसरा, लगभग फिल्मी कहानी जैसा मामला बता दिया। उसने कहा कि ओडिशा के ही एक गरीब परिवार के 5 बच्चों को नीट के जरिए 5 अलग-अलग सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिला है। परिवार का नाम, बच्चों के नाम, मेडिकल कॉलेजों के नाम, सब कुछ मौजूद था। हमें लगा कि जैसे एक ही राज्य में 2 गरीब मजदूर परिवारों के 5-5 बच्चों ने बिल्कुल एक जैसी असाधारण कामयाबी हासिल की हो। पहला मामला तो देश के कई प्रतिष्ठित अखबारों और एक बड़ी समाचार एजेंसी में प्रकाशित हो चुका था, लेकिन दूसरे मामले को जब हमने 3 दूसरे एआई टूल के जरिए खोजा तो तीनों ने कहा कि ऐसा कोई मामला उन्हें नहीं मिला। जब हमने ये नतीजे पहले एआई के सामने रखे तो उसने अपनी गलती मान ली और कहा कि उसने दूसरी कहानी गढ़ दी थी। अब अगर हमने बिना जांचे उस कहानी को सच मान लिया होता तो एआई का कुछ नहीं बिगड़ता, हमारी विश्वसनीयता मिट्टी में मिल जाती।
लेकिन बात सिर्फ किसी पत्रकार की विश्वसनीयता तक सीमित नहीं है। आज एआई को प्रशिक्षित करने के लिए इंटरनेट पर मौजूद जिस जानकारी का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसका एक बढ़ता हुआ हिस्सा खुद एआई द्वारा तैयार किया हुआ है। यानी एआई ने सच या झूठ, जैसी भी जानकारी पैदा की है, वह इंटरनेट पर आगे फैल रही है और भविष्य में उसी से अगली पीढ़ी के एआई मॉडल सीख सकते हैं। अगर एआई के गढ़े हुए झूठ लगातार इंटरनेट पर जमा होते गए और फिर उन्हीं झूठों से नए मॉडल प्रशिक्षित होते गए तो मशीन की गलती एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच सकती है। इसे लेकर वैज्ञानिकों ने ‘मॉडल कोलैप्स’ जैसी आशंकाओं पर शोध भी किया है। इसके साथ एक और खतरा है, मौलिक सोच का धीरे-धीरे कम होना। गाय पर निबंध लिखते हुए कभी बच्चे को गाय के शरीर की कल्पना करनी पड़ती थी, 2 सींग, 4 पैर, एक पूंछ याद करनी पड़ती थी और फिर अपने शब्दों में लिखना पड़ता था। लिखते हुए गलती होती थी, वाक्य दोबारा लिखना पड़ता था, लेकिन उस पूरी प्रक्रिया में बच्चे सोचते थे. आज सिर्फ लिख दीजिए, ‘गाय पर निबंध लिखिए’, और कुछ ही सेकंड में भाषा, व्याकरण और संरचना के लिहाज से उससे कहीं बेहतर निबंध सामने आ जाता है। यह बहुत बड़ी सुविधा है, लेकिन हर सुविधा की एक कीमत होती है। अगर इंसान अपनी सोचने, खोजने और लिखने की मेहनत धीरे-धीरे एआई को सौंपते गए तो कहीं ऐसा न हो कि एआई हमारी जगह सिर्फ लिखने न लगे, बल्कि हमारी जगह सोचने भी लगे।
और जैविक खतरे की बात इससे भी आगे जाती है। यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि एआई निश्चित रूप से कोरोना से हजार या लाख गुना खतरनाक वायरस बना देगा। लेकिन यह आशंका गंभीर है कि जैसे-जैसे एआई जैव-विज्ञान, दवा-विज्ञान और प्रयोगशाला संबंधी ज्ञान को समझने और इस्तेमाल करने में सक्षम होता जाएगा, वैसे-वैसे किसी दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति के लिए खतरनाक जैविक प्रयोगों की योजना बनाना आसान हो सकता है। खतरा केवल किसी वायरस को बनाने तक सीमित नहीं होगा। अगर कभी कोई बेहद खतरनाक जैविक एजेंट तैयार किया गया तो उसे दुनिया के सबसे नाजुक हिस्सों तक कैसे पहुंचाया जाए, किस तरह तेजी से फैलाया जाए और किन जगहों पर उसका असर सबसे ज्यादा होगा, ऐसी रणनीति बनाने में भी एआई का इस्तेमाल हो सकता है। यह अभी आशंका है, कोई स्थापित तथ्य नहीं, लेकिन तकनीक की ताकत जिस रफ्तार से बढ़ रही है उसके साथ ऐसी आशंकाओं पर गंभीरता से सोचना जरूरी है। हम पिछले दो-तीन दशकों से इंटरनेट और हैकिंग की ताकतों के गलत हाथों में जाने की आशंका देखते रहे हैं। हमने एक-दो दशक पहले तक ऐसी संभावनाएं भी लिखी थीं कि दुनिया में सबसे ज्यादा विमान उड़ाने वाले या सबसे ज्यादा बिजली इस्तेमाल करने वाले तबकों की सुविधाओं को किसी दिन हैकर ठप्प कर सकते हैं। तब हमें एआई नाम के इस नए औजार की आज जैसी ताकत का अंदाजा नहीं था। अब जब उसी पुरानी आशंका को एआई के साथ जोडक़र देखते हैं तो तस्वीर कहीं ज्यादा बड़ी दिखाई देती है।
एक तरफ इंसान ने ऐसा औजार बना लिया है जो दुनिया के विशाल ज्ञान को कुछ ही पल में खोज सकता है, जोड़ सकता है, उसका विश्लेषण कर सकता है और उसके आधार पर नई सामग्री तैयार कर सकता है। दूसरी तरफ वही औजार किसी गलत हाथ में पडक़र दुनिया की कमजोरियों को खोजने में मदद कर सकता है। तीसरी तरफ वही औजार धीरे-धीरे इंसान की अपनी सोच, अपनी खोज और अपनी मौलिकता की जगह ले सकता है। यानी एआई का खतरा सिर्फ यह नहीं है कि मशीन कभी इंसान के खिलाफ हो जाए। खतरा यह भी है कि इंसान ही मशीन को इंसान के खिलाफ इस्तेमाल करने लगे। और एक खतरा यह भी है कि मशीन की सुविधा लेते-लेते इंसान खुद सोचना कम कर दे। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि एआई कितना शक्तिशाली हो सकता है। सवाल यह भी है कि उसकी शक्ति बढऩे की रफ्तार के साथ हमारी जिम्मेदारी, हमारी सावधानी और हमारे सुरक्षा इंतजाम कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं। अगर दुनिया सचमुच एक बहुत तेज रफ्तार गाड़ी में बैठी है तो सवाल सिर्फ यह नहीं कि इंजन कितना शक्तिशाली है। सवाल यह है कि ब्रेक हैं भी या नहीं। सच तो यह है कि एआई नाम की बिना ब्रेक की गाड़ी अब घाटी की ढलान पार उतरना शुरू कर चुकी है।
अब इस बात को खत्म करना भी जरूरी है, वरना खतरों की ऐसी फेहरिस्त खत्म होने वाली नहीं है। आज की सीख शायद वही है जो दुनिया के दार्शनिक सैकड़ों बरस से कहते आए हैं, दुनिया पल भर का मेला है। इस पल भर की जिंदगी में सब कुछ खत्म हो जाने के पहले कम से कम कुछ ऐसा अच्छा कर लिया जाए, जिसे दर्ज करने वाला कोई शायद न भी बचे, लेकिन अपने ही कलेजे में यह ठंडक रहे कि हमने कुछ भला किया था। और जिंदगी में अगली बार भला करने का कोई मौका सामने आए तो इतना जरूर सोच लें, क्या पता, भला करने का यह आखिरी मौका हो।
रोजगार के लिए दूसरे प्रदेश, बच्चों से लेकर बड़े तक हो रहे शोषण के शिकार...
27 सितंबर 2026
बिहार के भोजपुर जिले में अभी नाबालिगों के तरह-तरह के शोषण करवाने वालों पर पुलिस ने छापा मारा, तो ऑर्केस्ट्रा और पार्टियों में नाचने के लिए रखी गई लड़कियों में छत्तीसगढ़ की तीन नाबालिग लड़कियां भी मिली हैं। उन्हें वहां भेजने वाली जांजगीर-चांपा जिले की सलमा बेगम नाम की एक महिला को भी गिरफ्तार किया गया है। इन बच्चियों से डांस करवाया जा रहा था, लेकिन इन्हें कोई मजदूरी नहीं दी जा रही थी। पिछले बरस भी छत्तीसगढ़ के कुछ दूसरे जिलों से बिहार के कुछ दूसरे जिलों में ले जाई गई कुछ नाबालिग लड़कियां बरामद की गई थीं, जिन्हें उनके परिवार वालों ने ही डांस करने की मजदूरी के लिए वहां भेजा था। जैसा कि पहली नजर में ही समझ पड़ता है कि इन नाबालिग लड़कियों को तरह-तरह का शोषण झेलना पड़ता है। अब कुछ जातियों में लड़कियों को नाच-गाने के पेशे में डालने की परंपरा रहती है। यह मध्यप्रदेश और राजस्थान के आदिवासी इलाकों में और अधिक है। इन दोनों राज्यों में तो यह सिलसिला बदन बेचने तक चले जाता है, और उसे उनके समाज में बुरा भी नहीं माना जाता। छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई व्यापक चलन किसी जाति में नहीं है, लेकिन एक जाति में लड़कियों को नाचने के काम में लगाने की परंपरा है।
अब दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के ही महासमुंद जिले में दो दिन पहले पुलिस ने मानव तस्करी के एक बड़े संगठित नेटवर्क का भांडाफोड़ किया। इसमें छत्तीसगढ़ और ओडिशा में काम कर रहे इस गिरोह से करीब डेढ़ करोड़ रुपये नगद बरामद किए गए और पांच लोग गिरफ्तार हुए। एक नाबालिग लडक़ी की तस्करी, और उसके गर्भवती होने से शुरू हुई जांच यहां तक पहुंची। इस गिरोह के लोग कमजोर परिवारों के लोगों के एडवांस रकम देकर फंसाते थे, और दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए भेजते थे। इनके पास से ऐसे हजारों मजदूरों के रिकॉर्ड मिले हैं, और बंधवा मजदूरी के सुबूत भी मिले हैं। गिरफ्तार होने वालों में चंद्राकर, मोहंती, अग्रवाल, गुप्ता, जैसे कई जातियों के लोग हैं। ये लोग मजदूरों के बैंक खातों को भी अपने कब्जे में रखते थे, और एटीएम कार्ड, आधार कार्ड जैसे दूसरे दस्तावेज भी। इन सबके बिना ये मजदूर दूसरे राज्यों में आबादी से दूर ईंटभट्ठों पर बंधुवा मजदूर रह जाते थे।
न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि किसी भी राज्य को ऐसी खबरों को एक बड़ी बीमारी का छोटा लक्षण मानना चाहिए, और सुधार की कोशिश करनी चाहिए। क्या राज्य में मजदूरी की चल रही योजनाओं में कोई कमी है कि लोगों को दूसरे प्रदेश जाना पड़ता है? अगर लोग अधिक महत्वाकांक्षी होकर बेहतर मजदूरी, या अधिक ठेका मजदूरी के लिए दूसरे राज्य जाते हैं, तब तो ठीक है, लेकिन अगर अपने ही राज्य में काम की कमी से वे बेबसी में बाहर जाते हैं, तो यह राज्य को अपना घर संभालने का एक मौका है। दूसरी तरफ बच्चों को महानगरों में घरेलू कामकाज के लिए ले जाना, पढ़े-लिखे बच्चों को नौकरी के नाम पर ले जाना, और फिर वहां उन्हें स्पा सेंटर से होते हुए देह के धंधे में धकेल देना राज्य के लिए शर्मनाक रहता है। ऐसे हर मामले से राज्य को यह मौका मिलता है कि वह मानव तस्करी करने वाले संगठित मुजरिमों पर कार्रवाई कर सके। किसी भी गांव, जाति, या समुदाय के लोगों का बाहर जाना दबे-छुपे नहीं होता, उसकी जानकारी काफी लोगों को रहती है। अगर स्थानीय पुलिस और सरकारी अमला अपनी आंखें खुली रखें तो ये जानकारियां शोषण का शिकार होने के पहले ही, छत्तीसगढ़ से बाहर जाने के पहले ही सरकार के हाथ लग सकती है। समय रहते सरकार की कार्रवाई होने से लोगों का शोषण होना रूक सकता है।
इस सवाल पर अब केंद्र और राज्य सरकारों के सामने पहले से ज्यादा साफ कसौटी भी है। मनरेगा की जगह 1 जुलाई से लागू हुए विकसित भारत-जी राम जी कानून में ग्रामीण परिवारों को एक साल में 125 दिन के रोजगार की वैधानिक गारंटी दी गई है, यानी रोजगार की गारंटी पहले के 100 दिनों से बढ़ाई गई है। छत्तीसगढ़ में भी इस कानून के तहत ग्रामीण रोजगार के लिए बड़ी राशि का प्रावधान किया गया है। अब असली सवाल यह है कि क्या गांव के जिस परिवार का कोई सदस्य मजबूरी में बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र या तेलंगाना की ईंट- भट्ठी तक पहुंच रहा है, उसे अपने ही गांव में इस रोजगार गारंटी का लाभ मिल रहा है? अगर काम मांगने वाले परिवार को समय पर काम मिले, मजदूरी समय पर खाते में पहुंचे और पंचायत स्तर पर यह पता चलता रहे कि कौन परिवार बाहर जा रहा है, तो रोजगार के नाम पर होने वाली मानव तस्करी की एक बड़ी जमीन अपने आप कमजोर हो सकती है। कानून सिर्फ रोजगार देने का इंतजाम नहीं है, उसे गांव से मजबूरी में होने वाले मजदूरी-प्रवास और उसके साथ जुड़ते शोषण को रोकने का एक औजार भी बनाया जा सकता है। इसके लिए सरकार को यह देखना होगा कि कागज पर दर्ज 125 दिनों की गारंटी गांव के गरीब परिवार की जिंदगी में सचमुच 125 दिन का काम बन रही है या नहीं।
दूसरी बात यह कि बच्चों से मजदूरी, चाहे वह राज्य के भीतर हो, चाहे प्रदेश के बाहर ले जाकर, वह सरकार और समाज की असफलता इसलिए रहती है कि केंद्र और राज्य सरकारों की पर्याप्त योजनाएं हैं कि हर बच्चे-बच्ची को स्कूल-कॉलेज में पढ़ाया जाए। इसके बावजूद जब बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं, तो उसका एक मतलब यह रहता है कि वे परिवार के किसी कामकाज में लगा दिए जाते हैं, या परिवार उन्हें किसी दूसरी जगह मजदूरी पर लगा देता है। उसका दूसरा मतलब यह हो सकता है कि ऐसे बच्चे आवारा हो गए हैं, और घर से भी परे हो गए हैं, कोई काम भी नहीं करते हैं। इन बच्चों का नशे और जुर्म में फंस जाने का खतरा बहुत बड़ा रहता है। इन दिनों समाज में लगातार नाबालिग बच्चे हर किस्म के संगीन जुर्म में शामिल मिल रहे हैं, और इनमें एक बड़ा हिस्सा पढ़ाई छोड़े हुए बच्चों का रहता है। इसलिए जब कभी बच्चों से जुड़ा हुआ कोई मामला सामने आता है, तो उससे सरकार की असफलता भी पता लगती है, और सरकार को अपना घर सुधारने का मौका भी मिलता है। जिन राज्यों में भी कुछ जातियों में लड़कियों और महिलाओं को नाच-गाने से लेकर देह के धंधे तक में लगा देने की सामाजिक परंपरा है, उन्हें भी सुधारने की जरूरत है। इसके लिए उन जातियों में कोई सम्माननीय रोजगार या कारोबार शुरू करने के लिए लोगों को तैयार करना पड़ेगा, और इसके लिए भी सरकारों के पास पर्याप्त योजनाएं हैं, बजट हैं।
नाबालिग बच्चों का मामला बहुत खतरनाक इसलिए भी रहता है कि वे अपने शोषण को खुद होकर रोक नहीं पाते, और देह शोषण के बाद वे कई तरह की बीमारियों से लेकर अवांछित गर्भ तक के शिकार हो जाते हैं। सरकार के साथ-साथ समाज को भी यह सोचना चाहिए कि बच्चों को कैसे बचाया जा सकता है। एक बार बच्चे अगर नशे या जुर्म की राह पर चल निकले, तो वे पूरे ही समाज के लिए अपनी बाकी पूरी जिंदगी एक खतरा बने रह सकते हैं। ऐसे हर मामले पर गौर करने के लिए संबंधित विभागों के परे की, बाहरी और संवेदनशील लोगों की एक टीम रहनी चाहिए जिसके पास समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने की विशेषज्ञता रहे, और साधन-सुविधा रहे। बच्चों की नई पीढ़ी को बचाने के लिए सरकार का नियमित ढांचा पर्याप्त संवेदनशील नहीं हो सकता, इसके लिए कुछ समर्पित समाजसेवी संगठनों की मदद ली जानी चाहिए।
बेटी-बेटे और पिताओं में उलझा कानूनी मामला...
26 सितंबर 2026
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने अभी यूपी की एक महिला कलेक्टर पर एक आंदोलनकारी छात्रा को गलत तरीके से बंद करने के खिलाफ 5 लाख रुपए का निजी जुर्माना लगाया था। इसके बाद यूपी सरकार ने कहा था कि वह इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी। यह तो किसी भी सरकार, या नागरिक का हक रहता है कि वे ऊपरी अदालत का विकल्प रहने तक अपील करते रहें, इसलिए इसमें अटपटा कुछ नहीं था। फिर सुप्रीम कोर्ट में इस चुनौती में कलेक्टर की तरफ से भारत सरकार के सबसे बड़े वकील खड़े हुए। यहां से लोगों को कुछ खटकना शुरू हुआ, क्योंकि हाईकोर्ट ने फैसला तो कलेक्टर के खिलाफ व्यक्तिगत जुर्माने का दिया था। फिर कुछ ऐसा हुआ जो बड़ा अटपटा था। सुप्रीम कोर्ट के रीति-रिवाजों के मुताबिक यह मामला सुनवाई के लिए एक ऐसी महिला जज के सामने जाना था जो कि अपनी कडक़मिजाजी के लिए जानी जाती हैं। जाने किन वजहों से चीफ जस्टिस ने इस मामले को एक दूसरे जज सतीश चंद्र शर्मा की अदालत में भेजा। लोग गौर से देखने लगे कि ऐसा क्यों किया गया। फिर जब इस अदालत में इस महिला कलेक्टर के मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो जज ने माइक्रोफोन बंद करवा दिए। आज जब सुप्रीम कोर्ट तमाम किस्म के महत्वपूर्ण मामलों में भी कैमरे शुरू रखवाता है, तब इस एक मामले में माइक्रोफोन बंद करवाना बड़ा ही अटपटा था, क्योंकि यह मामला न किसी बच्चे, या नाबालिग से जुड़ा हुआ था, न ही किसी सेक्स-अपराध का था, न ही किसी राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था। फिर अदालत का यह फैसला आया कि हाईकोर्ट ने महिला कलेक्टर पर जो टिप्पणी की है, और जो जुर्माना लगाया है, उसे सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया। देश के जो लोग एक आंदोलनकारी लडक़ी के खिलाफ जिला प्रशासन की नाजायज दिखती कार्रवाई के खिलाफ मुखर थे, वे हक्का-बक्का रह गए। लेकिन अदालत तो अदालत है, आज की तारीख में तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट का स्थगन लागू हो चुका है, आगे की सुनवाई जब होनी होगी, तब होगी।
अब पर्दे के पीछे की जानकारियां निकलकर सामने आ रही हैं, और चीख-चीखकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। यह बात तो पहले से सामने आ चुकी थी कि यह महिला कलेक्टर देश के भयानक चर्चित और विवादास्पद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने नियमित प्रक्रिया से परे जाकर जिन जज सतीश चंद्र शर्मा की अदालत में इस मामले को भेजा था, उनका एक वकील बेटा चुनाव आयोग का वकील है, वह सरकार के सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज, और आयकर विभाग का भी स्थायी वकील है। दूसरी दिलचस्प बात यह सामने आई कि जस्टिस शर्मा का छोटा बेटा जो कि 2020 में ही वकील बना, वह मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग का स्थायी वकील है। अब सवाल यह उठता है कि केंद्र की भाजपा अगुवाई वाली सरकार के विभागों का वकील बेटा, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार के राज में पीएससी का वकील दूसरा बेटा, ये अपने आपमें जज के विवेक पर कुछ सवाल उठाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह उठता है कि जिस मुख्य चुनाव आयुक्त के चुनाव आयोग में जस्टिस शर्मा का बेटा स्टैंडिंग काउंसिल है, उसी मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी की अपील ये जज साहब सुन रहे हैं। हम कानून के बहुत बड़े जानकार नहीं हैं, लेकिन अदालत में इंसाफ न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए भी दिखना चाहिए, इस सदियों पुरानी सोच को याद रखने के लिए हमें किसी रॉकेट साइंस के फॉर्मूले को याद नहीं रखना पड़ता। यह तो बहुत मामूली सी समझ-बूझ की बात है कि इंसाफ करने की कुर्सी पर जिन्हें बिठाया गया है वे किसी भी लाग-लपेट, किसी भी तरह के हितों के टकराव से पूरी तरह बचे रहें। कई जज तो ऐसे रहते हैं जो कि किसी मामले की सुनवाई से सिर्फ इसलिए मना कर देते हैं कि उसमें एक वकील ऐसे हैं जो कि किसी वक्त जज के जूनियर रहे हुए हैं। रिश्तेदारी तो बहुत दूर की बात रहती है, जरा सा भी जुड़ाव होने से जजों की नैतिकता यही मांग करती है कि वे अपने-आपको मामले से अलग कर लें। यहां पर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा अपने दो वकील बेटों के सरकारों, और खासकर चुनाव आयोग से रिश्ते के बाद भी इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं, यह बहुत हैरानी की बात है।
इस मामले से लोगों को यह भी याद पड़ा कि अभी हाल ही में जब चुनाव आयुक्तों के चयन को लेकर एक मामला सुप्रीम कोर्ट में चला था, तो उस बेंच में भी यही जस्टिस शर्मा भी थे, और यह उनकी राय थी कि इस मामले को संविधान पीठ को दे दिया जाए। जबकि बेंच के दूसरे जज, जस्टिस दीपांकर दत्ता की राय अलग थी। मतलब यह कि आज चुनाव आयोग जितने किस्म के विवादों से घिरा हुआ है, जिनमें यह भी शामिल है कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया सही है, या नहीं, वह मामला निपटने के बजाय एक संविधान पीठ को चले गया, और संविधान पीठ की लंबी प्रक्रिया जानने वाले लोगों का यह कहना है कि यह अब अगले मुख्य न्यायाधीश का इंतजार करेगा, और दिलचस्प बात यह है कि अगले संभावित मुख्य न्यायाधीश को लेकर कुछ और किस्म की जानकारियां सामने आ चुकी हैं। हम किसी जज की नीयत पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत को अपने आचरण को लेकर नैतिकता के जिन सबसे ऊंचे पैमानों पर चलना चाहिए, उनकी बात तो आज भारत में इंसानों से लेकर कॉकरोच तक सभी कर रहे हैं।
कानून के समाचार-विचार देने वाली वेबसाइटों ने यह लिखा है कि ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम का मामला जस्टिस शर्मा की बेंच को भेजने से कुछ बड़े असुविधाजनक सवाल उठ खड़े हुए हैं। जस्टिस शर्मा की बेंच इस मामले को सुनने के लिए नियमित रोस्टर पर नहीं थी। दूसरी तरफ इस मामले से जुड़े हुए कुछ दूसरे मामले सुप्रीम कोर्ट की ही एक जज, जस्टिस नागरत्ना सुन रही थीं। ऐसे में आमतौर पर होता यही है कि संबंधित मामलों को पहले से सुन रहे, या सुन रही जज को ही यह नया मामला दे दिया जाता। इसलिए जब ज्ञानेश कुमार की बेटी का मामला, चुनाव आयोग के वकील के जज पिता की बेंच को दिया गया, तो लोगों के दिमाग में एक बहुत स्वाभाविक सा संदेह उठना जायज था। फिर मानो संदेह में कोई कसर रह गई हो, तो जस्टिस शर्मा ने सुनवाई के दौरान अदालत का माइक्रोफोन बंद करवा दिया, मानो यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ कोई मुद्दा हो। लेकिन कहानी इसके और आगे तक बढ़ती चली गई। चुनाव आयोग से लेकर आयकर विभाग तक, और मध्यप्रदेश पीएससी तक की वेबसाइटों पर वकीलों के नाम दर्ज हैं, उन्होंने कब वकालत शुरू की यह दर्ज है, और वे किसके बेटे हैं, यह भी सार्वजनिक जानकारी में अच्छी तरह स्थापित है। हालांकि संदेह का लाभ देते हुए हम यह जरूर कहना चाहेंगे कि जस्टिस शर्मा ने इस मामले से जुड़े हुए लोगों से, अपना रिश्ता सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखा था या नहीं, यह अभी खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन अगर ऐसा कोई खुलासा आगे जाकर होता भी है, तो भी यह बात तो है ही कि इतनी रिश्तेदारी के बाद भी उन्होंने यह मामला सुना।
हमें यह पक्का मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट के जज बनने तक हर किसी को दर्जनों, या सैकड़ों बार यह बात पढऩे और सुनने मिल चुकी रहती है कि इंसाफ न केवल होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। सैकड़ों बरस पुरानी इस बात की एक दूसरी मिसाल यह भी है कि राजा की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। यह बात तो शेयर मार्केट के नियम-कायदे लागू करने वाली संस्थाओं तक में सुनाई देते रहती है कि वहां दर्ज हर कंपनी को अपने रिश्तों के बारे में सेबी जैसी संस्था को जानकारी देना चाहिए। अभी तो छत्तीसगढ़ सरकार ने एक ऐसा आदेश निकाला है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने परिवार के किसी सदस्य को अपना प्रतिनिधि नहीं बना सकते। इस तरह नैतिकता और पारदर्शिता सार्वजनिक जीवन में कोई दुर्लभ पशु नहीं हैं, उन पर चलन की पुरानी परंपरा रही है, और जिन लोगों को वकालत, या अदालत की जानकारी नहीं भी है, वे लोग भी इन बातों को अच्छी तरह समझते हैं। ऐसे में ज्ञानेश कुमार की बेटी का यह मामला नैतिकता और पारदर्शिता के बुनियादी पैमानों में ही उलझ गया है, और हमारा तो अंदाज यह है कि इससे इस नौजवान महिला आईएएस का नफा कम, नुकसान अधिक हुआ है। 5 लाख रुपए का जुर्माना पटाने से मिली एक अस्थायी और तात्कालिक राहत उतना अधिक मायने नहीं रखती, जितना मायने यह विवाद रखता है, और सुप्रीम कोर्ट में आगे अगर इस मामले को कुरेदा जाएगा, तो वहां इस महिला अधिकारी का नुकसान ही अधिक होगा। ऐसा लगता है कि सत्ता की बेहिसाब ताकत कई लोगों से बददिमाग और बेदिमाग फैसले करवा देती है, लेकिन ये फैसले पूरी जिंदगी खड़े नहीं रह पाते। सरकार से लेकर अदालत तक की सत्ता बदलती रहती है।
भाजपा सांसद की पत्नी का सफर हराम कर दिया डिब्बे के दर्जनों अधेड़ मुसाफिरों ने!
25 सितंबर 2026
कर्नाटक के मुखर नौजवान भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी ने अभी अपने एक ट्रेन सफर को लेकर रेलवे से शिकायत की, और सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी बात लिखी। शिवश्री ने लिखा कि जिस डिब्बे में वो सफर कर रहीं थीं उसमें करीब 40 अधेड़ पुरूष थे जो कि पूरे समय जोर-जोर से बातचीत और हंसी-मजाक करते रहे। फिर इनमें से कोई एक कार्ड-गेम खेलते रहे और उस पर हल्ला करते रहे। वे फिल्मी गाने भी गाने लगे, और 5 घंटे तक इतना हल्ला-गुल्ला झेलना उनके लिए भारी पड़ा। उन्होंने इसके बारे में रेल अधिकारी से शिकायत करके दूसरे डिब्बे में सीट मांगी, लेकिन वह नहीं मिल पाई। तब उन्होंने सोशल मीडिया पर खुलासे से अपनी तकलीफ के बारे में लिखा है। चूंकि यह भाजपा के एक बहुत चर्चित सांसद की पत्नी का लिखा हुआ है, इसलिए यह भी नहीं माना जा सकता कि यह केंद्र सरकार की ट्रेन की एक बद्इंतजामी के बारे में राजनीतिक साजिश के तहत लिखा गया हो।
यह हाल हिंदुस्तान की अधिकतर सार्वजनिक जगहों का रहता है जहां पर लोग अपने नाजायज अधिकारों को लेकर गुंडागर्दी की हद तक तैयार रहते हैं, और बाकी लोगों के जायज अधिकारों को कुचलना भी अपना हक समझते हैं। किसी भी सार्वजनिक जगह पर दो-चार लोग भी अगर जुट जाते हैं, तो वे जानवरों के किसी रेवड़ से भी अधिक बुरे हो जाते हैं। जानवरों के रेवड़ जोर-जोर से हंसते, चीखते, ट्रेन के डिब्बों में दारू पीते, या जुआं खेलते नहीं दिखते। वे खेलते भी नहीं। वे बस अधिक से अधिक इतना करते हैं कि बारिश से भीगी हुई मिट्टी में जब सडक़ किनारे बैठना मुमकिन न हो, तो वे सूखी सडक़ पर मजबूरी में बैठते हैं और आए दिन गाडिय़ों से कुचलकर खत्म भी हो जाते हैं। इंसान तो किसी मैदान, या बगीचे में बैठकर जब एक साथ जोर-जोर से हंसने का काम करते हैं, तो आसपास के लोगों का जीना हराम हो जाता है। जब रातभर पढ़ाई करने के बाद बच्चे सुबह-सुबह कुछ नींद करना चाहते हैं, तब उनके घर के आसपास इंसान इस कदर चीख-पुकार मचा देते हैं कि न नींद मुमकिन रहती, न बच्चों और बूढ़ों का आराम मुमकिन रहता। हम अपने आसपास के कई ऐसे बगीचे देखते हैं जहां सुबह घूमने, योग, या कसरत करने गए हुए लोगों को अनदेखा करके लोगों का एक जत्था लाउडस्पीकर लगाकर किसी धर्म का शोर करने लगता है, माइक पर चीखने लगता है।
फिर दुनिया के कई देशों के ऐसे वीडियो लगातार आते ही रहते हैं जहां लोकल ट्रेन, बस, ट्राम के भीतर, या फिर एयरपोर्ट जैसी जगह पर गए हुए हिंदुस्तानी सैलानियों के जत्थे भारत की किसी धुन को बजाते हुए समूह नृत्य करने लगते हैं। डिब्बों में उनके साथ बैठे हुए लोगों का जीना हराम हो जाता है, और उन विदेशियों के चेहरों पर खीझ और हिकारत साफ दिखती रहती है, लेकिन एक बड़े जत्थे के सामने वे अकेले कुछ नहीं कर सकते, फिर चाहे वे अकेले अपने देश में क्यों न हों, और ऐसे जत्थे परदेशी ही क्यों न हों। अभी एक भारतीय विमान में जिस तरह से एक साथ सफर कर रहे मुसाफिरों ने पूरे प्लेन में अपने लोगों को जिस तरह से खाना खिलाया, उससे विमान के बाकी मुसाफिर हक्का-बक्का रह गए, कर्मचारियों ने इस जत्थे को रोकने की कोशिश की, लेकिन दर्जनों लोगों के साथ गिने-चुने विमान कर्मचारी भी कितना लड़ सकते थे? बाद में यह खबर आई कि इन सारे मुसाफिरों को उस एयरलाइंस ने ब्लैकलिस्ट में डाल दिया है, यानी अगले कुछ महीनों तक वे उस कंपनी के विमानों पर सफर नहीं कर सकेंगे। जब किसी ट्रेन में किसी धार्मिक यात्रा के लोग चलते हों, कोई बारात चल रही हो, और तो और बड़ी संख्या में पुलिस, या सेना, या अर्धसैनिक जवान चल रहे हों, तो वे बाकी मुसाफिरों से जैसा चाहे वैसा बुरा बर्ताव कर सकते हैं। इसके अलावा भी जहां कहीं सैलानियों का जत्था जरा सा बड़ा होता है वे तमाम जगहों पर अपना मालिकाना हक सा दिखाने लगते हैं। अभी एक ट्रेन का वीडियो सामने आया था जिसमें ऊपर की बर्थ पर बैठा हुआ एक आदमी वहां अपने ईष्टदेव की फोटो सामने रखकर दीया जलाकर, घंटी बजाकर पूजा कर रहा है, और जब आसपास के लोग उसे डिब्बे में दीया जलाने के लिए मना कर रहे हैं, तो उसके कानों में मानो आपत्तियां पड़ ही नहीं रही हैं। इसी तरह मुंबई की लोकल ट्रेन में गणेश के मौके पर एक डिब्बे में प्रतिमा ही स्थापित कर दी जाती है, और चलती ट्रेन में सैकड़ों मुसाफिर आरती गाते रहते हैं, घंटी, मंजीरा, और ढोलक बजाते रहते हैं। अभी एक नया नजारा और देखने मिला जब एक चलती ट्रेन में एक मुसाफिर डिब्बे के भीतर ऊपर की बर्थ पर देवी प्रतिमा को स्थापित कर दिया गया था, और लोग पूरी धूमधाम से पूजा करने में लगे हुए थे। ऐसे ही कई और वीडियो भी है जिनमें किसी धर्म, या आध्यात्मिक संगठन के किसी प्रमुख व्यक्ति के सफर करने पर रेल डिब्बों के भीतर भजन-कीर्तन होने लगते हैं। यह कल्पना इनमें से किसी को परेशान नहीं करती कि इन्हीं डिब्बों में कोई बीमार भी सफर कर रहे होंगे, जिन्हें इलाज के लिए कहीं ले जाया जा रहा होगा, और उनका पता नहीं क्या हाल होगा।
हिंदुस्तानियों में, यहां के अधिकतर लोगों में सार्वजनिक जीवन में जीने का शऊर नहीं है। और यह दूसरे प्रदेशों में, दूसरे देशों में जाकर और खटकने लगता है। भारत के भीतर तो लोग धर्म, राजनीति, जाति-संगठन, आध्यात्मिक संस्थाओं की अराजकता को देखने के आदी हो ही गए हैं। कई जगहों पर सडक़ों पर एंबुलेंस फंस जाती हैं, और मरीज मर भी जाते हैं। कई जगहों पर इस कदर शोरगुल होता है कि लोग मर जाते हैं। सार्वजनिक जगहों पर दूसरों के हक का, और अपनी जिम्मेदारी का सम्मान करने के लिए लोगों के भीतर सभ्यता की जरूरत रहती है, जो कि आत्मगौरव से लबालब इस हिंदुस्तान में बहुत ही कम दिखती है। लोग आसपास महिलाओं की मौजूदगी, बच्चों के मौजूद रहने को अनदेखा करते हुए गालियों की जुबान में बात करते हैं, धक्का-मुक्की करते हैं। हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें साथ घूमते हुए बालिग, या नाबालिग लडक़े-लड़कियों पर आसपास के जत्थे यौन हमले कर रहे हैं, उन्हें पीट रहे हैं, और उनके वीडियो भी बना रहे हैं। इन दिनों अपने ही जुर्म के वीडियो बनाने का चलन खासा चला हुआ है क्योंकि बहुत से लोगों को यह लगता है कि उनका यह काम उनकी ताकत का एक सुबूत है। बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सार्वजनिक जगहों पर किसी कर्मचारी को खंभे से बांधकर पीटते हैं, तो अभी उत्तर भारत में कहीं पर बिजली चोरी पकडऩे के लिए गए हुए बिजली कर्मचारी को पूरा गांव मिलकर पीट रहा था, और इसके वीडियो भी बना रहा था। हिंदुस्तान में अब ऐसा लगने लगा है कि वीडियो सुबूत से किसी को डर नहीं रह गया है, बल्कि उनको सिर्फ यह लगता है कि इस वीडियो को देखने वालों पर उनकी गुंडागर्दी चलती रहेगी।
हिंदुस्तानी एक राष्ट्र के रूप में भी दुनिया में कई जगह अपने देश का नाम डुबाने में लगे रहते हैं। अपनी जिस किसी संस्कृति पर इन लोगों को अपार गर्व रहता है, उसी संस्कृति के इस हिस्से के बारे में भी सोचना चाहिए कि क्या यह अपार शर्मिंदगी की वजह नहीं है? भारतीय संस्कृति को लेकर लोग कई बार हिंसक हो जाते हैं, ऐसे लोगों को हिंसा का उन्माद नीचे आने पर यह सोचना चाहिए कि वे एक राष्ट्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी की कौन-कौन सी हरकतें करते हैं, और उनसे उन्हें सिवाय एक हिंसक संतुष्टि के और क्या हासिल होता है?
देहात से दिल्ली तक, लडक़ी-महिला की इज्जत तभी जब वह प्रतिमा हो...
24 सितंबर 2026
इन दिनों जापान में चल रहे एशियाई खेलों की एक खबर है जिसकी हेडिंग दिल खुश करने वाली है। ‘75 साल के इतिहास में जो कभी नहीं हुआ, वो इन 3 बेटियों ने कर दिखाया’। एशियन गेम्स में भारत को निशानेबाजी के एक मुकाबले में स्कीट टीम इवेंट में पहली बार मैडल मिला है। इसके पहले स्कीट निशानेबाजी में अलग-अलग कुछ महिला खिलाड़ी मेडल पा चुकी हैं, लेकिन टीम के मैडल का यह पहला मौका था। इससे परे भी इन दिनों ऐसे अंतरराष्ट्रीय मुकाबले नहीं होते हैं जिनमें भारत की लड़कियां और महिलाएं मैडल न लाती हों। अभी तो क्रिकेट से लेकर हॉकी तक, बड़े लोगों की टीम से लेकर जूनियर टीम तक जगह-जगह लड़कियां सोना-चांदी लेकर आ रही हैं। लेकिन इसी बीच देश के भीतर लड़कियों की जो आम हालत है, उस पर बराबरी का गौर करने की जरूरत है। अभी बिहार के जमुई में जिस तरह एक नाबालिग लडक़ी को भयानक हिंसा और यौन हमले का शिकार होना पड़ा, वह तो एक घटना थी जिसे ग्रामीण इलाके की कहकर टाला जा सकता है, और अगर आप बिहार में सत्तारूढ़ हैं तो आप इसे छोटी-मोटी कह सकते हैं। लेकिन दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली में, जहां केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही एक ही पार्टी की हैं, जहां पर पुलिस केंद्र सरकार के मातहत काम करती है, वहां शहर के बीचों-बीच एक मंदिर से लौटती नाबालिग कॉलेज छात्रा को पुलिस बनकर 3 लोगों ने बगीचे में रेप किया, और इसके बाद दिल्ली की कॉलेज छात्राएं जिस दहशत में हैं, वह गौर करने लायक है। दिल्ली के बीचों-बीच कालकाजी मंदिर में पूजा के लिए गई इस लडक़ी को पास के आस्थाकुंज पार्क में हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मों के बलात्कारियों ने खुलेआम रेप किया। समाचार बताता है कि दिल्ली में इस महीने नाबालिग से रेप का यह तीसरा मामला है। अभी दस दिन पहले ही एक नाबालिग की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई थी, उसके पहले 10 बरस की बच्ची का रेप हुआ था।
आज की खबर है कि ओडिशा के एक तीर्थ स्थान जाते हुए मोटरसाइकिल सवार एक पर्यटक दंपत्ति पर यौन हमला किया गया और उसका वीडियो बनाया गया। इसके दो दिन पहले से उत्तर भारत का एक वीडियो तैर रहा है, जिसमें मोटरसाइकिल पर पीछे साड़ी पहनकर बैठी एक महिला के बदन पर कई नौजवान टूटे पड़े हैं, कुछ कपड़ों में हाथ डाल रहे हैं, कुछ वीडियो बना रहे हैं। उत्तर भारत को बहुत से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटक केंद्र होने का गर्व रहता है, और ओडिशा तो एक पर्यटक राज्य है ही। इसके बाद भी अगर किसी भी बालिग या नाबालिग जोड़े पर, या अकेली लडक़ी-महिला पर ऐसे यौन हमले धड़ल्ले से जारी हैं, तो यह बात तय है कि ऐसी हर हिंसा इन प्रदेशों की पर्यटन संभावनाओं को घटाती चलेगी।
दिल्ली के बीचों-बीच एक छात्रा के साथ हुए गैंगरेप के बाद उस घने इलाके में रहकर पढ़ाई करने वाली 20 हजार छात्राएं दहशत में हैं। दिल्ली का एक प्रमुख कॉलेज, लेडी श्रीराम कॉलेज, ऐसी डरी लड़कियों के लिए ऑनलाइन क्लासेस ले रहा है, क्योंकि लड़कियों की बाहर निकलने की हिम्मत नहीं है। एक टीवी चैनल ने इस कॉलेज की बाहर की छात्राओं को उनके चेहरों सहित कैमरे पर इंटरव्यू किया तो उनका कहना था कि वे कॉलेज की दीवारों के भीतर ही सुरक्षित हैं, और जैसे ही वे बाहर निकलती हैं, कार सवार लोग उन्हें ले जाने के लिए मोल-भाव करने लगते हैं, सडक़ किनारे से शोहदे सीटियां बजाने लगते हैं और फिकरे कसने लगते हैं, और एक लडक़ी ने कैमरे पर इस बात को एक से अधिक बार कहा कि दिनदहाड़े सडक़ किनारे ऐसे लडक़े उन्हें दिखाकर हस्तमैथुन करते हैं। और यह पढ़ते हुए यह याद रखें कि यह दिल्ली है।
दिल्ली में देश के किसी भी दूसरे महानगर या उपमहानगर के मुकाबले अधिक अनुपात में पुलिस मौजूद है। महानगरों में यह अकेला है जहां पुलिस सीधे केंद्र सरकार के मातहत है। इस शहर में अंतरराष्ट्रीय आवाजाही और बसाहट हिंदुस्तान के किसी भी दूसरे महानगर के मुकाबले कई गुना अधिक है। देश में आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए दिल्ली सबसे बड़ा केंद्र है। इसके बावजूद हाल यह है कि यहां बलात्कार की घटनाओं से परे भी लड़कियों के साथ बदसलूकी इस दर्जे की है। और यह कोई नई बात नहीं है। दिल्ली में बस और मेट्रो में सफर करने वाली लड़कियों और महिलाओं को यह मालूम है कि सफर पूरा होने के पहले कितने मर्दाने हाथ उन्हें टटोल चुके रहते हैं। दिल्ली से लेकर देश के गांवों तक महिलाओं का जो हाल है, वह बताता है कि कानून, लोकतंत्र, तथाकथित मानवता और महिला के प्रति सम्मान बहुत दूर तक खत्म हो चुका है। जिन लोगों को यह लगता है कि यह देश भारत माता माना जाता है, जगह-जगह देवी प्रतिमाओं की कई-कई दिन पूजा होती है, वहां पर महिलाओं को और किसी अतिरिक्त सम्मान की जरूरत क्या है? लेकिन दिक्कत यह है कि निर्जीव तस्वीर और प्रतिमाओं से परे जब अजन्मी या जन्मी लड़कियों या महिलाओं के साथ बर्ताव की बात आती है तो यह देश हिंसा में तालिबान को टक्कर देने लगता है। कहीं खेल संघों के पदाधिकारी लड़कियों का शोषण कर रहे हैं तो कहीं स्कूल शिक्षक ही अश्लील हरकतों में व्यस्त हैं। हमने आज की बात अंतरराष्ट्रीय खेल मुकाबलों में लड़कियों की कामयाबी से शुरू की थी, और वहां से भटकते हुए हम लड़कियों पर यौन हिंसा तक आ गए हैं। यह भटकाव सोचा-समझा है, और हम इस देश को याद दिलाना चाहते हैं कि लड़कियों को जितने तरह की हिंसा और जितने तरह के शोषण से गुजरना पड़ता है, उसे देखते हुए हैरानी होती है कि लड़कियां इतने मैडल कैसे ला पाती हैं। एक लडक़ी के रूप में जब वे लगातार खतरे में जीती हैं, तो कैसी दिमागी हालत में वे मुकाबलों में उतरती होंगी। देश की राजधानी एक बहुत बड़ी मिसाल रहती है, राजधानी को सबसे सुरक्षित माना जाता है, और वहां के सबसे नामी-गिरामी कॉलेज की लड़कियां जब घर से निकलने और कॉलेज जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहीं, तो खिलाड़ी लड़कियां भी तो ऐसे ही शहरों में खेल की तैयारी करते हुए आगे बढ़ती हैं। यह सिलसिला देश में एक परले दर्जे की अराजकता है। कहीं भीड़ की अराजक यौन हिंसा सामने आती है, तो कहीं दो-चार लोग भी मौका मिलते ही बलात्कार पर उतारू हो जाते हैं। हमारा यह भी मानना है कि यौन हिंसा की घटनाओं में से 10-20 फीसदी से अधिक की रिपोर्ट नहीं होती होगी, क्योंकि पुलिस भी शिकायतकर्ता महिलाओं से बदसलूकी के लिए बदनाम है।
किसी देश को अपनी संस्कृति पर गर्व हो सकता है, लेकिन ऐसे गर्व पर कुछ आत्ममंथन भी करना चाहिए, कुछ आत्मविश्लेषण करना चाहिए। जहां लड़कियां जुर्म और जुल्म के अंदेशे में जीती हों, उस देश को गर्व करने के लिए आईने में अपने को देखते हुए खासा मेकअप लगता होगा। समाज में लड़कियों को हिफाजत तभी मिल सकती है जब सरकारें उन पर होने वाले जुल्म और जुर्म को बड़ी कड़ी सजा दिला सकें, और अदालतें इसमें तेजी बरत सकें। आज तो हालत यह है कि जमानत पाकर बाहर निकले बलात्कारियों से अपमानित और उनकी दहशत में शिकायतकर्ता लडक़ी या महिला ही खुदकुशी कर रही हैं। इस गर्वीले देश को आईने के सामने जाते हुए पेशेवर मेकअप करने वालों से सहायता लेनी चाहिए।
अपने इर्द-गिर्द हलचल होने से ही जल्द जागता है सुप्रीम कोर्ट!
23 सितंबर 2026
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव करवाने के लिए बनी केंद्रीय चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था का हाल यह हो गया है कि वह संविधानेतर अंदाज में काम कर रही है, और उसे छूने से बचने की कोशिश करते चले आने वाले सुप्रीम कोर्ट को भी अब दिल्ली में आयोग के तौर-तरीकों पर सवाल उठाने पड़े हैं। अब इस देश में एक भारत रत्न वैज्ञानिक, बहुत सारे पद्मभूषण और पद्मश्री से सम्मानित व्यक्ति, फौज के अनगिनत रिटायर्ड बहादुर अफसर और अब देश के विदेश मंत्री से लेकर जाने कितने ही जज और राजनयिक चुनाव आयोग में जाकर अपने आपको हिंदुस्तानी मतदाता साबित करने को मजबूर किए गए हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर भी चुनाव आयोग के तौर-तरीकों पर सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का आरोप रहा है कि ऐन चुनाव के पहले मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं को छांट-छांटकर मतदाता सूची से बाहर करने का अभियान चलाया गया।
सुप्रीम कोर्ट की नींद तब कुछ जल्दी खुलती है जब उसके आसपास कुछ होने लगता है, चाहे वह दिल्ली का प्रदूषण हो, चाहे दिल्ली की इमारतों के तलघरों में चलने वाले कारोबार हों, चाहे दिल्ली में डीजल गाड़ियां हों या और कोई जनसुविधा हो। इसमें कुछ अटपटा भी नहीं है, क्योंकि जब आग बहुत पास में लगती है तो ताप कुछ अधिक लगता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट बना तो पूरे देश के लिए है, लेकिन आज दिल्ली में मतदाता सूची पुनरीक्षण, यानी एसआईआर, को लेकर सुप्रीम कोर्ट चौकन्ना हो गया है और चुनाव आयोग से सवाल कर रहा है। इसी सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल चुनाव के वक्त हैरान करने वाला एक सवाल पूछा था कि अगर इस चुनाव में लोग वोट नहीं डाल पाएंगे तो कौन-सा आसमान टूट पड़ेगा, वे अगले चुनाव में वोट डाल देंगे। और चुनाव हो गया, नतीजे देश के सामने हैं। जिस मतदाता सूची पुनरीक्षण की कोई हड़बड़ी नहीं थी, उसे तुरंत करवाने और दसियों लाख वोटरों का हक छीन लेने का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो जाने दिया गया। देश में न्यायपालिका का इतिहास जब लिखा जाएगा, तब उसमें बंगाल की मतदाता सूची को लेकर अदालत का रुख और उसकी टिप्पणियां जरूर जगह पाएंगी।
अब आज इस मामले पर लिखे बिना इसलिए नहीं रहा जा सकता कि देश के एक खोजी अखबार, इंडियन एक्सप्रेस ने जांच-पड़ताल के बाद एक रिपोर्ट छापी है कि चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से बाकी दो सदस्यों ने मुख्य चुनाव आयुक्त से समय-समय पर लिखित असहमति जाहिर की है और उसे अनदेखा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कई फैसले अपने स्तर पर लिए। रिपोर्ट के मुताबिक इन फैसलों की जानकारी भी कई मामलों में बाकी दो आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को फैसले लिए जाने से पहले नहीं दी गई। एसआईआर को पूरे देश में लागू करने के काम सहित चुनाव आयोग के भीतर पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार संधू और जोशी ने औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई और लिखित रूप में अपनी असहमति दी, लेकिन उनकी आपत्तियों पर अमल नहीं हुआ। एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि ये आपत्तियां एसआईआर प्रक्रिया और वोटर लिस्ट से जुड़ी हुई थीं। इन दोनों ने यह भी लिखित शिकायत की कि उनकी लिखित सलाह के खिलाफ जाकर ज्ञानेश कुमार ने काम किया। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को अनधिकृत और गैरकानूनी बताया है। इसके साथ-साथ इन दोनों सदस्यों ने भारत सरकार के सबसे बड़े नौकरशाह, कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर चुनाव आयोग के भीतर काम के बंटवारे में किए गए बदलाव की शिकायत की थी, जिससे वोटर लिस्ट के लिए आईटी सिस्टम की निगरानी का एक स्तर खत्म हो गया था।
इन तीनों ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुई है और कानून के तहत प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और विपक्ष के नेता के एक पैनल ने इन सदस्यों का चयन किया था। उल्लेखनीय है कि 2024 में जब संधू और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त बनाया गया था, तब भी विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने नियुक्ति प्रक्रिया से असहमति दर्ज कराई थी। इसके बाद 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त बनाने पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने असहमति दर्ज कराई थी। इस देश में चुनाव आयोग का ऐसा गौरवशाली इतिहास रहा है, कि टी एन शेषन का नाम आज भी सख्ती और हौसले के लिए देश में मिसाल की तरह लिया जाता है। वहाँ से लेकर आज शर्मिंदगी तक, ये कहाँ आ गए हम !
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है कि अब वोटर बनने के लिए किसी नागरिक को जो फॉर्म भरना होता है, उसमें एक ऐसा सवाल पूछा जा रहा है जो पहले कभी नहीं पूछा गया था। इसमें पूछा जा रहा है कि क्या नया वोटर, उसके मां-बाप या दादा-दादी इसके पहले हुए एसआईआर की मतदाता सूची में मौजूद थे। इस सवाल के खिलाफ जोशी और संधू दोनों ने फाइल पर यह चेतावनी लिखी थी कि नियमों को बदले बिना यह सवाल ऐसे नहीं जोड़ा जा सकता। जोशी ने अपनी आपत्ति दर्ज की और संधू ने भी उससे सहमति जताते हुए इसे अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए तुरंत हटाने की बात कही। दोनों चुनाव आयुक्तों ने एसआईआर से जुड़े हुए बहुत सारे पहलुओं को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई थीं, लेकिन उनकी आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक बंगाल चुनाव में 49 सीटों पर एसआईआर के तहत हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन 49 सीटों पर एसआईआर से हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से अधिक होने के बावजूद चुनाव परिणाम में इसका कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं हुआ है; इनमें 26 सीटें भाजपा और 21 सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीती थीं।
अभी सुप्रीम कोर्ट ने ही बंगाल में महीनों से चल रहे मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग से हासिल जानकारी के आधार पर यह कहा था कि जिस रफ्तार से मतदाताओं की आपत्तियां सुनी जा रही हैं और उनके कागजात देखे जा रहे हैं, उस रफ्तार से बंगाल में आपत्तियों के निपटारे में 21 बरस लगेंगे। अब दिल्ली की बारी पुनरीक्षण में जल्दी आ गई है और सुप्रीम कोर्ट को यह सवाल दिखाई दे रहा है कि चुनाव आयोग वोटरों के नाम पर सवालिया निशान लगाने का काम कहीं मशीनी अंदाज में तो नहीं कर रहा। दिल्ली में गर यह काम कुछ बरस बाद होता, तो दूसरे राज्यों को देखकर सुप्रीम कोर्ट को यह समझ ही नहीं पड़ता कि चुनाव आयोग एक खास मकसद की मशीन बन चुका है। बंगाल में एसआईआर के बाद 27.16 लाख नाम हटाए गए, उनमें से 22.21 लाख लोगों ने अपने मताधिकार की बहाली के लिए अपील की। लेकिन चुनाव आयोग के सामने कुल अपीलें 38.31 लाख हैं, क्योंकि 16.10 लाख अपीलें उलटे उन नामों को हटाने के लिए हैं जिन्हें सूची में शामिल किया गया था।
देश में ऐसे कई मौके आए हैं जब चुनिंदा अखबारों की खबरों ने इतिहास में हो रहे फेरबदल को रोकने या तेज करने का काम किया है। कभी कोई अखबार, तो कभी कोई और वेबसाइट, कभी स्टिंग ऑपरेशन करने वाला कोई कोबरा, अलग-अलग लोगों द्वारा उठाए गए मुद्दों और किए गए भंडाफोड़ से लोकतंत्र को बचने का मौका मिला है। अब सुप्रीम कोर्ट के जागने का समय आ गया है। इंडियन एक्सप्रेस नाम के एक मुर्गे ने अदालत की दहलीज पर जाकर बांग दी है। देखना है, इस रिपोर्ट के बाद अब क्या होता है?
डिग्री की भीड़ से पहले हुनर की राह क्यों नहीं?
22 सितंबर 2026
हमारे समाज में 10वीं के बाद लगभग हर विद्यार्थी के लिए एक ही रास्ता मान लिया गया है, 12वीं करो, फिर स्नातक करो और उसके बाद नौकरी तलाशो। लेकिन उन विद्यार्थियों के बारे में भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है जो 10वीं तक की पढ़ाई में लगातार कमजोर हैं। अगर पढ़ाई में तेज विद्यार्थी भी स्नातक होने के बाद रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो केवल किसी तरह डिग्री हासिल कर लेने से पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी के लिए रोजगार की संभावना बहुत बेहतर हो जाएगी, इसकी क्या गारंटी है? अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार 25 वर्ष से कम उम्र के स्नातक युवाओं में बेरोजगारी दर 39.33 प्रतिशत और 25 से 29 वर्ष में 20.04 प्रतिशत थी। इसका अर्थ यह नहीं कि स्नातक की डिग्री बेकार है। रोजगार मिलने पर स्नातकों की औसत कमाई गैर-स्नातकों से अधिक है। सवाल यह है कि डिग्री मिलेगी तो रोजगार भी मिलेगा, इसकी गारंटी कहां है?
एक और आंकड़ा इस समस्या को समझने में मदद करता है। 2004-05 से 2023 के बीच भारत में हर साल करीब 50 लाख नए स्नातक बढ़े, लेकिन रोजगार पाने वाले स्नातकों की संख्या में सालाना बढ़ोतरी केवल करीब 28 लाख रही और वेतनभोगी रोजगार तक पहुंचने वालों की संख्या इससे भी कम रही। यानी डिग्री हासिल करने वालों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी, उनके लिए रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। यह स्थिति केवल बेरोजगारी की संख्या का सवाल नहीं है, बल्कि उस पूरी सोच पर सवाल है जिसमें हम मान लेते हैं कि ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थियों को स्नातक बना देना अपने आप रोजगार की समस्या का समाधान कर देगा। इसलिए 10वीं तक पढ़ाई में लगातार कमजोर विद्यार्थियों को किसी तरह 12वीं और फिर स्नातक तक खींचते रहने के बजाय 8वीं से ही उन्हें अलग-अलग तरह के कामों और कौशलों से परिचित कराने की जरूरत है। 10वीं तक आते-आते उनकी रुचि, क्षमता और व्यावहारिक योग्यता समझी जा सकती है और उसके बाद उन्हें गंभीर कौशल प्रशिक्षण का विकल्प मिलना चाहिए। बिजली, वाहन मरम्मत, वातानुकूलन और कूलिंग, प्लंबिंग, वेल्डिंग, मशीन संचालन, सौर उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मोबाइल और कंप्यूटर मरम्मत, स्वास्थ्य तकनीक, खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई, डिजाइन, फोटोग्राफी, वीडियो निर्माण, आतिथ्य सेवा, कृषि उपकरण और ऐसे अनेक क्षेत्रों में अच्छे प्रशिक्षण की जरूरत है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा से परिचय और स्थानीय स्तर पर व्यावहारिक अनुभव की बात कही गई है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हुनर केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, रोजगार की अपनी पूंजी है। कोई हुनरमंद व्यक्ति किसी संस्था या दुकान में काम कर सकता है, फिर स्वतंत्र रूप से काम ले सकता है और अनुभव के साथ अपना छोटा कारोबार भी शुरू कर सकता है। नौकरी चली जाए तो उसका हुनर उसके साथ रहता है। एक अच्छे बिजली मिस्त्री, वाहन मैकेनिक, तकनीशियन, दर्जी, फोटोग्राफर या दूसरे किसी काम का दक्ष व्यक्ति अपनी अगली आजीविका उसी हुनर से तलाश सकते हैं। इसके विपरीत किसी सामान्य स्नातक की नौकरी चली जाए और उसके पास कोई विशेष कौशल या काम का अनुभव न हो तो उसे फिर उसी डिग्री के आधार पर दूसरी नौकरी की तलाश करनी पड़ती है। इसलिए हुनर की असली ताकत केवल उसकी कमाई में नहीं, रोजगार खोने के बाद फिर से खड़े होने की क्षमता में भी है।
यह भी सच है कि हर हुनरमंद व्यक्ति स्नातक से ज्यादा नहीं कमाते। उपलब्ध राष्ट्रीय आंकड़े ऐसी कोई सामान्य बात साबित नहीं करते। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। तकनीकी शिक्षा और व्यावहारिक कौशल रोजगार की संभावनाएं बढ़ाते हैं और कुछ क्षेत्रों में अनुभव के साथ कमाई भी काफी बढ़ सकती है। स्वरोजगार में समय और काम के तरीके पर अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रण भी हो सकता है, हालांकि उसके साथ नियमित छुट्टी, भविष्य निधि और दूसरी सामाजिक सुरक्षा की कमी का जोखिम रहता है। इसलिए कौशल शिक्षा का मतलब केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देना नहीं होना चाहिए। प्रशिक्षण के बाद रोजगार, प्रशिक्षुता, औजार खरीदने के लिए ऋण, बाजार तक पहुंच और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था भी जरूरी है। नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट भी शिक्षा और कौशल को रोजगार से जोडऩे तथा व्यावसायिक शिक्षा को व्यापक बनाने पर जोर देती है।
भारत के रोजगार बाजार की एक और सच्चाई है जिसे हमारी शिक्षा व्यवस्था अक्सर नजरअंदाज करती है। नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार देश के श्रमबल में करीब 58.4 प्रतिशत लोग स्वरोजगार में हैं, जबकि नियमित वेतन या वेतनभोगी रोजगार में करीब 21.7 प्रतिशत और आकस्मिक श्रम में करीब 19.8 प्रतिशत हैं। यानी भारत की रोजी-रोटी का बड़ा हिस्सा केवल दफ्तर की नियमित नौकरी पर निर्भर नहीं है। बड़ी संख्या में लोग अपने काम, छोटे कारोबार, सेवा या किसी कौशल के सहारे कमाते हैं। इसलिए कौशल को पढ़ाई का दूसरा दर्जा मानने के बजाय उसे रोजगार की मुख्य धारा का हिस्सा बनाना जरूरी है। जिस हुनर से नौकरी मिल सकती है, उसी हुनर से स्वरोजगार भी शुरू किया जा सकता है।
हमने शिक्षा की सफलता का पैमाना बहुत संकरा बना दिया है, कितने विद्यार्थी 12वीं पास हुए, कितने ग्रेजुएट हुए और कितने पोस्ट-ग्रेजुएट, इससे बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि कितने विद्यार्थियों के पास अपनी आजीविका कमाने की क्षमता है। हर विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर या अधिकारी नहीं बन सकते और इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। शर्म की बात तब होगी जब पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी को वर्षों तक ऐसी पढ़ाई में धकेलते रहें जिसमें वह लगातार असफल होते रहें और अंत में उसके हाथ में न पर्याप्त रोजगार-योग्य डिग्री हो, न कोई मजबूत हुनर। इसके बजाय वही विद्यार्थी 10वीं के बाद किसी अच्छे हुनर में दक्ष होकर कामकाजी बन सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं, स्वरोजगार शुरू कर सकते हैं और आगे चलकर अपना व्यवसाय भी खड़ा कर सकते हैं।
हमें विद्यार्थियों के रास्ते बंद नहीं करने हैं, रास्ते बढ़ाने हैं। डिग्री पाने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और रोजगार के रास्ते खुले रहें, लेकिन जो विद्यार्थी पढ़ाई में कमजोर हैं उनके लिए हुनर का रास्ता भी उतना ही सम्मानजनक बनाया जाए। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हर विद्यार्थी कितनी बड़ी डिग्री लेंगे। सवाल यह भी होना चाहिए कि हर विद्यार्थी ऐसा क्या सीखेंगे जिसके बदले समाज उसे सम्मान के साथ पैसा देने को तैयार हो। कमजोर विद्यार्थी को कमजोर स्नातक बनाने से बेहतर है कि उसे मजबूत हुनरमंद बनाया जाए। आज के समय में केवल डिग्री और दफ्तर-आधारित काम पर निर्भर रहने का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले कामों में आंकड़े दर्ज करने, हिसाब-किताब, प्रशासन और दूसरे कागजी काम शामिल हैं। संगठन का आकलन यह नहीं है कि ये सारी नौकरियां खत्म हो जाएंगी; अधिक संभावना काम के स्वरूप में बदलाव की है। लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि भविष्य के विद्यार्थी को केवल प्रमाणपत्र नहीं, बदलते रोजगार बाजार के अनुकूल वास्तविक कौशल भी चाहिए।
बृजभूषण और रामदेव के बीच लड़ाई समाज के लिए अच्छी..
21 सितंबर 2026
भारतीय कुश्ती महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे और एक वक्त के भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह महिला पहलवानों के कई आरोपों के चलते एक चुनाव नहीं लड़ पाए और उनके बेटे को भाजपा ने टिकट दिया था। अब वह जिन तेवरों के साथ बाबा कहे जाने वाले रामदेव के खिलाफ मैदान में उतरे हैं, उन तेवरों की तारीफ में वे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने बृजभूषण शरण सिंह में कभी तारीफ के लायक कुछ नहीं देखा था। उन्होंने अभी-अभी रामदेव को ‘मिलावट करने वालों का सम्राट’ कहा और आरोप लगाया कि उनके कई प्रोडक्ट अलग-अलग देशों में प्रतिबंधित हो चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने रामदेव की कंपनी पतंजलि के घी पर बड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि रामदेव का घी खाने से आपका बच्चा कभी स्वस्थ नहीं होगा। उनका कहना है कि उनके इस बयान के बाद रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण ने उन्हें फोन किया था और उन्होंने बालकृष्ण से पूछा कि अगर 30 किलो गाय के दूध से 1 किलो घी बनता है और दूध की कीमत 30 रुपये किलो है, तो 1 किलो घी की लागत ही करीब 900 रुपये बैठती है; ऐसे में 500 रुपये में घी कैसे बेचा जा सकता है? बृजभूषण शरण सिंह का कहना है कि बालकृष्ण के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। अभी उन्होंने पतंजलि के घी को लेकर यह आरोप भी लगाया है कि कनाडा और सिंगापुर से आया हुआ कोई पदार्थ भारत में बेचा जा रहा है और उसे घी में मिलाया जा रहा है। उन्होंने 18 सितंबर को हाथरस में यह भी कहा कि जिस व्यक्ति के ऊपर देश की हर अदालत और हर राज्य में मुकदमे हों और दवा से लेकर घी तक में मिलावट के मामले चल रहे हों, उसके बारे में बात करने का कोई औचित्य नहीं है।
इन सब बातों को लेकर पतंजलि ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ 50 करोड़ रुपये की मानहानि का मुकदमा दायर करने की बात कही है और बृजभूषण ने कैमरों पर यह कहा है कि अगर इस मामले में उन्हें जेल भेजा जाता है तो वह जमानत नहीं करवाएंगे। उन्होंने इसे देशहित और नकली-मिलावटी सामानों के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश किया है। पतंजलि के सामानों की क्वालिटी को लेकर जितने तरह की बातें बृजभूषण ने हाल के महीनों में अलग-अलग मौकों पर की हैं, उसको लेकर रामदेव ने भी पलटवार किया है। उन्होंने कहा है कि उन्हें योग, आयुर्वेद और स्वदेशी के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए किसी से सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है। लोगों ने एक वक्त यह भी देखा था कि आयुर्वेद से दुनिया की हर बीमारी के इलाज के दावे करने वाले रामदेव को जब खुद सांस लेने में दिक्कत हुई तो दौड़-भाग करके एम्स में भर्ती होना पड़ा था। अब बृजभूषण शरण सिंह ने एक और जानकारी सामने रखी है। उनका कहना है कि ये बाबा लोग लोगों की बीमारियां ठीक करने का दावा करते हैं, लेकिन रामदेव ने खुद अपने हर्निया का ऑपरेशन एम्स में कराया और उनके सहयोगी बालकृष्ण ने अपना ऑपरेशन मेदांता में कराया।
अब एक दूसरी बात पर जाएं। अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं, जब भाजपा की एक मुखर सांसद कंगना रनौत ने रामदेव की कही हुई कुछ लापरवाह बातों के जवाब में बहुत ही तीखी बातें कही थीं। रामदेव ने बिना किसी प्रसंग के जवानी को लेकर कई तरह के इशारे किए थे, जो उनके चाल-चलन पर हमला था। इसके जवाब में कंगना रनौत ने सार्वजनिक रूप से ही तुर्की-बतुर्की जवाब दिया था कि बाबा रामदेव दिनदहाड़े उनके बेडरूम के बारे में सपना न देखें। दोनों के बीच यह बात बड़ी खतरनाक स्तर पर चली गई थी और बाद में किसी तरह से इसे शांत कराया गया। फिर हाल के महीनों में रामदेव ने लगातार भाजपा सरकारों के खिलाफ आक्रामक और आलोचनात्मक लगने वाली बहुत-सी बातें कही हैं। रामदेव भाजपा से तिरछे-तिरछे क्यों चल रहे हैं, यह बात कई लोगों को समझ नहीं पड़ रही थी। अब ऐसा लगता है कि भाजपा के अलग-अलग लोगों की तरफ से रामदेव पर हमले जारी हैं। इसके पीछे कई राज्य सरकारों द्वारा रामदेव के पतंजलि उत्पादों के खिलाफ की गई सरकारी कार्रवाई है, सरकारी प्रयोगशालाओं से पतंजलि के प्रोडक्ट्स के खिलाफ आए सर्टिफिकेट हैं या कोई और बात है, यह पूरी तरह साफ नहीं है। लेकिन इतना तय है कि रामदेव और भाजपा के बीच, या रामदेव और भाजपा सरकारों के बीच, पुरानी मोहब्बत अब जारी नहीं दिखती।
लेकिन हम इसे बहुत बुरी नौबत नहीं मानते। लोगों को याद होगा, यूपीए सरकार के रहते हुए गिरोहबंदी के अंदाज में मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ एक आंदोलन खड़ा हुआ था, जिसमें अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे, रामदेव, जस्टिस संतोष हेगड़े, किरण बेदी, श्री श्री रविशंकर, मनोज मनीष सिसोदिया जैसे कई लोग थे। इन लोगों ने मिलकर देश में एक ऐसा माहौल बनाया था कि यूपीए सरकार पूरी तरह भ्रष्ट है। हालांकि कोयला नीलामी वगैरह के जिन मामलों को लेकर यह माहौल बनाया गया था, उस वजह से यूपीए सरकार तो चली गई, लेकिन बाद में अदालत में यह साबित हुआ कि उन आरोपों में कुछ भी सच नहीं था। इसलिए गिरोहबंदी किए हुए अलग-अलग क्षेत्र के लोग अगर कोई आंदोलन चलाने के लिए सामने आ जाते हैं तो उनकी एकजुटता खतरनाक रहती है। उस समय के आंदोलन में दो अलग-अलग रंगों के बाबा थे, रिटायर्ड जज, रिटायर्ड आईपीएस, एक तथाकथित गांधीवादी, पेशेवर आंदोलनकारी, भूख-हड़ताल और सूचना के अधिकार को लेकर आंदोलन कर रहे केजरीवाल और सिसोदिया जैसे लोग थे। अगर देखें तो हिंदी फिल्मों में हेरा फेरी नाम की एक फिल्म के कई सीक्वल बने हैं। कई लोग मिलकर एक साथ आते हैं और जुर्म करते हैं, लेकिन उनके बीच अगर एक-दूसरे से टकराव हो तो समाज के लिए स्थिति कुछ अलग होती है। जब ये लोग एकजुट होकर कोई बड़ा अभियान चलाते हैं तो उसका असर कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है।
आज एक कंगना रनौत और रामदेव अगर एक हो गए होते तो उससे बेहतर यह है कि दोनों एक-दूसरे का भंडाफोड़ करते हुए समाज की अधिक सेवा कर रहे हैं। आज बृजभूषण शरण सिंह और रामदेव अगर एक हो गए होते तो उससे बेहतर यह है कि आज एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए और मुकदमे दायर करते हुए ये समाज के अधिक काम के हैं। इसलिए जब कभी पाखंड के लिए काम करने वाले लोग, मिलावट करने वाले लोग, सांप्रदायिकता फैलाने वाले लोग या समाज के किसी और तरह के शोषण में लगे लोग एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते हैं, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। यह कुछ वैसा ही है, जैसा मुंबई में अंडरवर्ल्ड के बोलबाले के दिनों में दो अलग-अलग गिरोह के लोग एक-दूसरे को टपकाते थे और पुलिस राहत की सांस लेती थी कि करने वाले या तो इस तरफ के मुजरिम हैं या उस तरफ के। फर्क सिर्फ इतना है कि लोकतंत्र में हमें हिंसक टकराव नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही की लड़ाई चाहिए। आज जो लड़ाई चल रही है, उसमें ऐसे लोग हैं जिनके बीच मतभेद, बहस और सार्वजनिक हमले समाज के व्यापक हित में हैं। जब ऐसे प्रभावशाली लोग एक-दूसरे का महिमामंडन करने के बजाय एक-दूसरे का भंडाफोड़ करते हैं, तो समाज को कम-से-कम यह लाभ होता है कि सवाल सार्वजनिक होते हैं, जवाब मांगे जाते हैं और जांच की गुंजाइश पैदा होती है।
फुटपाथी कुत्तों के लिए नरमी, इंसानों की हिफाजत का क्या?
20 सितंबर 2026
कभी-कभी कोई एक खबर अपने आप में उतनी महत्वपूर्ण नहीं लगती है, जितनी कि एक साथ 2 जगह पर हुई 2 खबरें मिलकर लगती हैं। अब जैसे छत्तीसगढ़ के पलारी में कल एक कुत्ते ने एक-एक करके 13 लोगों को काटा। इनमें छोटे बच्चे थे, स्कूली बच्चे, बस स्टैंड के मुसाफिर, महिलाएं, अस्पताल आए मरीज, अलग-अलग जगह पर जाकर इसने 13 लोगों को काटा। इस बात को शायद संपादकीय के लिए विषय छांटते हुए हम अनदेखा भी कर देते, लेकिन सारंगढ़ शहर की दूसरी खबर यह है कि एक ही कुत्ते ने शहर के अलग-अलग इलाकों में लोगों को दौड़ के 32 लोगों को काट लिया। जिला अस्पताल में पहुंचने वाले मरीज 32 हो गए, जो कि इस कुत्ते के काटे हुए थे। अब सवाल यह उठता है कि फुटपाथी कुत्तों का क्या किया जाए। देश का सुप्रीम कोर्ट इस समस्या पर ऐसे उतार-चढ़ाव से गुजर रहा है, कभी उसे लगता है कि कड़ी कार्रवाई करना चाहिए, कभी उसे लगता है कि बहुत नरमी बरतनी चाहिए। कभी वह सरकारों के जिम्मे ऐसी बातें डाल देता है, जिनका पूरा होना मुमकिन नहीं है कि अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और बस स्टैंड के अंदर कोई कुत्ता न घुस सके। ऐसा कैसे हो सकता है कि इन जगहों में ही कुत्ते आने से पूरी तरह रोका जाए?
सरकारी आंकड़ों को देखें तो समस्या छोटी नहीं है। 2019 की 20वीं पशुधन गणना में देश में करीब 153 लाख आवारा कुत्ते दर्ज किए गए थे। 2024 में देश में 37 लाख 17 हजार 336 कुत्ते के काटने के मामले दर्ज हुए और 54 संदिग्ध मानव रेबीज मौतें दर्ज की गईं। एक दूसरे सरकारी आंकड़े में 2024 के दौरान ग्रामीण इलाकों में ही कुत्तों के काटने के 21 लाख 95 हजार 122 मामले और 37 मौतें दर्ज हुईं। 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में कुत्ते के काटने के 5 लाख 19 हजार 704 मामले दर्ज हुए। यानी यह सिर्फ पशुओं और पशु-प्रेम का सवाल नहीं है, यह सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है। और इसका आर्थिक बोझ भी गरीब आदमी पर पड़ता है। बाजार में मानव रेबीज वैक्सीन की एक डोज अलग-अलग ब्रांड में करीब 270 रुपयों से 400 रुपयों तक दिखाई देती है। 5 डोज का कोर्स मानें तो केवल वैक्सीन का खर्च करीब 1,350 रुपयों से 2,000 रुपयों तक हो सकता है; निजी अस्पताल में डॉक्टर की फीस और इंजेक्शन लगाने का खर्च इसके ऊपर हो सकता है। सरकारी अस्पतालों में कई जगह 5 इंजेक्शनों का तय अंतराल वाला कोर्स दिया जाता है। रोज कमाने-खाने वाला मजदूर अगर हर इंजेक्शन के लिए अस्पताल जाए तो हर बार आने-जाने का खर्च तो है ही, कई घंटे अस्पताल में लगने के कारण उस दिन की मजदूरी भी जा सकती है। छोटी निजी नौकरी करने वाले कम वेतन वाले कर्मचारी के लिए भी यही परेशानी है। उसे हर बार अस्पताल जाने के लिए छुट्टी लेनी पड़ सकती है और हर नौकरी में बार-बार ऐसी छुट्टी आसानी से नहीं मिलती। इसलिए कुत्ते के काटने के इलाज की कीमत केवल वैक्सीन की कीमत नहीं है। उसमें अस्पताल तक आने-जाने का खर्च और सबसे बढक़र रोज की मजदूरी का नुकसान भी जोडऩा चाहिए।
अब एक तरफ पशु प्रेमी संगठन हैं, जो किसी भी कुत्ते को पकडक़र उसे ले जाकर किसी सरकारी बाड़े में रखने के भी खिलाफ हैं और सुप्रीम कोर्ट कई बार उनके तर्कों को मानकर ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ बोलता है और यह कहता है कि उनको ले जाकर टीकाकरण करके, उनकी नसबंदी करके, उनको वापस लाकर इसी इलाके में छोड़ दिया जाए। भारत की आज की हालत को अगर देखें तो जिस तरह यहां करोड़ों कुत्ते बिना किसी मालिक के हैं, सडक़ों पर हैं, उनका भला किस तरह पकडक़र ले जाकर और इलाज के बाद वापस लाकर इस इलाके में छोड़ा जा सकता है? और इसके साथ-साथ जुड़ी हुई कुछ और बातों को भी समझना जरूरी है। इस देश में अराजकता इतनी अधिक है कि कुत्तों की कई प्रतिबंधित नस्लें भी लोग पालते हैं, क्योंकि उनके पास खर्च करने को पैसा है और वे अपने आप को दूसरों से ऊपर, दूसरों से अलग, अधिक ताकतवर दिखाना चाहते हैं। अभी ऐसे कई वीडियो एक-एक करके आए हैं, जब पिटबुल नाम की एक नस्ल के कुत्ते ने अपने मालिक के घर से बाहर निकलकर छोटे-छोटे बच्चों को बुरी तरह से काट लिया। खुद उनके मालिक उनको नहीं रोक पाए।
जिस देश में अराजकता इतनी है कि कुत्ते पालने वाले लोगों को न सरकार को इत्तिला देनी पड़ती है, न इस बात का सरकार कोई रिकॉर्ड रख सकती है कि उन्होंने अपने पालतू कुत्तों को टीके लगवाए हैं कि नहीं। जहां सरकार यह भी नहीं कर सकती कि लोग पालतू कुत्तों को घूमने के लिए ले जाते हैं और वे सडक़ों पर जो पाखाना करते हैं, उसे उठाने का इंतजाम भी उनके मालिक करें। मेरा मतलब यह कि यहां का कोई काबू जनता के ऊपर नहीं चलता। एक बड़ी दर्जे की अराजकता कुत्ते पालने को लेकर है। इसके साथ-साथ पशु प्रेमियों का हाल यह है कि वे कुत्तों पर कोई भी कार्रवाई करने के खिलाफ रोने-चीखने लगते हैं, सडक़ों पर उतर आते हैं। कई जगहों पर कुत्तों के दौडऩे से सडक़ों पर दोपहिया चलाते हुए लोग, साइकिल चलाते हुए लोग गिर जाते हैं, बुरी तरह जख्मी हो जाते हैं। लेकिन इसका कोई इलाज है सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं है। कुल मिलाकर यह सिलसिला बहुत भयानक है।
खासकर तब, जब इसके साथ एक और पहलू को हम जोडक़र देखें कि सरकार के अस्पतालों में कई जगहों पर कुत्तों के काटने के बाद लगने वाले इंजेक्शन का इंतजाम नहीं है। स्टॉक में इंजेक्शन नहीं रहते तो गरीबों को बाहर से खरीदकर लाना पड़ता है और 5 इंजेक्शनों का कोर्स पूरा करने में गरीबों का खासा पैसा लग जाता है। और उससे भी बड़ा बोझ कई बार उन दिनों की छूटी हुई मजदूरी का होता है। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों की क्षमता भी नहीं रहती है कि इतने इंजेक्शन किसी व्यक्ति को अलग-अलग तारीखों पर लगाए जाएं। पैसे वाले लोगों का हाल तो ठीक है, लेकिन जो गरीब लोग रहते हैं, रोज रोजी कमाने वाले लोग रहते हैं, छोटी-छोटी निजी नौकरियां करते हैं, उनको अगर 1 महीने में 5 बार जाकर हर बार कई-कई घंटे अस्पताल में गंवाना पड़े, तो उनके लिए यह बहुत नुकसान का काम भी रहता है। कुत्ते के काटने के इलाज की असली कीमत इसलिए सिर्फ दवा की कीमत नहीं है; उसमें आने-जाने का खर्च, अस्पताल में लगने वाला समय और उस दौरान छूटने वाली मजदूरी भी शामिल है।
और एक बात ऐसी है, जिस पर शायद अदालतों में बैठे लोगों को भी जमीनी हकीकत के साथ सोचना चाहिए। अस्पतालों, स्कूल-कॉलेजों और बस स्टैंडों की अपनी चारदीवारी होती है, उनके दरवाजे और गेट होते हैं, कहीं सुरक्षा कर्मचारी होते हैं, कहीं आने-जाने का नियंत्रण होता है। इसके बावजूद अगर इन जगहों पर कुत्ते पहुंच जाते हैं तो यह सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि उन्हें वहां पहुंचने से रोकने का आदेश दे दिया जाए। सवाल यह है कि देश के हर शहर और हर कस्बे में इन जगहों को वास्तव में कुत्तों से मुक्त रखने की व्यवस्था कौन करेगा और कैसे करेगा? सुप्रीम कोर्ट के जज अगर अपनी ऊंची अदालत में बैठकर यह आदेश दे दें कि अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और बस स्टैंड जैसे स्थानों में कोई आवारा कुत्ता नहीं होना चाहिए, तो आदेश कागज पर बहुत सीधा दिखाई देता है। लेकिन किसी शहर के नगर निगम, किसी अस्पताल के अधीक्षक या किसी स्कूल के प्राचार्य के लिए यह तभी संभव है, जब उनके पास पकडऩे वाली टीम हो, सुरक्षित व्यवस्था हो, निगरानी हो और आसपास के पूरे इलाके में कुत्तों की समस्या से निपटने का कोई व्यावहारिक इंतजाम हो। वरना यह भी उन आदेशों की तरह होगा, जिनका पालन करने की जिम्मेदारी तो सरकारों की होगी, लेकिन जिन्हें जमीन पर लागू करना संभव ही नहीं होगा।
अब एक और पहलू पर सोचें। जिस देश में लाखों रुपए दाम वाली कैंसर की दवाइयों की जगह नकली दवाइयां बिक रही हैं, देश के एक सबसे विकसित शहर बेंगलुरु में अभी 100 अस्पतालों में कैंसर और ऐसी दूसरी गंभीर, जानलेवा बीमारियों की जीवनरक्षक दवाइयों की जगह नकली दवाइयां सप्लाई करते हुए कारोबारी गिरफ्तार हुए हैं। यह पूरा सिलसिला कुत्तों के काटने पर लगने वाले इंजेक्शनों के प्रति भरोसा खत्म करता है। जिस देश के बीच के एक प्रदेश में ?20 का नकली सिक्का डालने के लिए लोगों ने घर पर मशीन लगा रखी है और ऐसे हजारों सिक्कों के साथ लोग गिरफ्तार हुए हैं, तो ऐसे देश में नकली दवाइयों का कारोबार तो धड़ल्ले से चल ही रहा है। क्या होगा अगर कुत्ते के काटने के बाद लोग इंजेक्शन लगाकर भरोसे में बैठे रहे और उसके बाद भी वे हाइड्रोफोबिया के शिकार होकर उसी कुत्ते की तरह ही बुरी मौत मरें?
यह देश पशुओं के साथ नरमी बरतने वाला देश हमेशा से रहा है, लेकिन जिन पशुओं के लिए कोई जवाबदेह नहीं है, जो किसी के पालतू पशु नहीं हैं, सडक़ों पर लोगों को काट रहे हैं, उन्हें सडक़ों पर रखना, उनके लिए वहीं पर सार्वजनिक जगह पर खाने का इंतजाम करना, यह एक भयानक नौबत है। जब तक पशुओं में रेबीज जैसी कोई संक्रामक बीमारी नहीं होती थी, तब तक इंसान उनके काटे हुए जख्म को झेल लेते थे। लेकिन अब तो रेबीज जैसी शत-प्रतिशत जानलेवा बीमारी से ग्रस्त कुत्ते चारों तरफ हैं। तो ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को जमीनी हकीकत से अनजान बने रहकर कागजी आदेश नहीं देने चाहिए, जिन पर अमल मुमकिन नहीं है और जिनसे जाना-जाना तय है।
(यह संपादकीय बोलकर टाइप किया गया है, और चैटजीपीटी से हिज्जे सुधारे गए हैं.)
गर एआई आपका भांडा फोडऩे लगे !

एआई को लेकर न चाहते हुए भी बहुत अधिक लिखना या बोलना हो जाता है। अभी पिछले कुछ हफ्तों में अलग-अलग एआई कंपनियों के लोगों ने खुद ही इस बात पर बड़ी फिक्र जाहिर की है कि जिस रफ्तार से एआई का विकास किया जा रहा है, वह बहुत जल्दी बेकाबू हो सकता है और उसके बाद वह मानव प्रजाति पर बहुत बड़ा खतरा हो सकता है। हो सकता है कि वह मानव प्रजाति को खत्म ही कर दे। हम इस बात को पहले कई बार लिख चुके हैं, एआई के आने के पहले से भी लिख चुके हैं कि अगर कुछ नैतिकतावादी आतंकी ऐसे बन जाते हैं, जिनको लगता है कि पर्यावरण को इंसान इतना तबाह कर रहे हैं कि दूसरी प्रजातियों के लिए वह खतरा है, कुदरत के लिए खतरा है, तो हो सकता है ऐसे लोग भी इंसानों को खत्म करने के बारे में सोचें। और एआई के आने के पहले से हम इस बारे में कई बार लिख चुके थे कि किस तरह ऐसे प्रतिबद्ध आतंकी, इंसानों को खत्म करने के बारे में सोच सकते हैं, क्योंकि इंसान धरती की बाकी सारी प्रजातियों को खत्म करने पर आमादा है। कई लोगों को यह लग सकता है कि धरती के पर्यावरण को अगर बचाना है तो इंसानों का जाना बेहतर होगा, जो कि संख्या में शायद 8 अरब के करीब हैं, लेकिन वह धरती की असंख्य, शायद करोड़ों, दूसरी प्रजातियों के लिए खतरा बन चुके हैं।
अभी एआई के बनने के बाद यह बात और अधिक आसान लगने लगी है। एआई के जो औजार अधिक इस्तेमाल होते हैं, उनमें से एक गूगल के जेमिनी के बारे में गूगल ने अभी यह पुष्टि की है कि एक जांच, एक परीक्षण के दौरान उसने 3 वास्तविक संगठनों के कंप्यूटर सिस्टम में अनधिकृत पहुंच हासिल कर ली थी। इसके पहले एंथ्रोपिक के एआई एजेंट ने भी परीक्षण के दौरान 3 अलग-अलग संगठनों के वास्तविक कंप्यूटर सिस्टम में अनधिकृत पहुंच हासिल कर ली थी। ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं। लगातार कई घटनाओं पर हम लिख भी चुके हैं। लेकिन आज इसके दूसरे एक पहलू के बारे में लिखना जरूरी है। वह पहलू है कि जो आम लोग हैं, जो हमारी तरह के लोग हैं, जो अपने अखबार के काम के लिए, यूट्यूब चैनल के काम के लिए एआई का इस्तेमाल करते हैं, कुछ जानकारी को तलाशने के लिए, कुछ रिसर्च करने के लिए उसकी मदद लेते हैं, ऐसे लोगों पर कौन से निजी खतरे आ सकते हैं? चैटजीपीटी है, जेमिनी है, ग्रोक है, इस तरह के कई एआई औजार चलन में हैं, जिनमें कुछ हद तक तो वह मुफ्त में भी हासिल हैं। लोग उनका भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि यह एआई औजार अगर इतने मनमाने तरीके से दूसरी कंपनियों के कंप्यूटरों को हैक कर ले रहे हैं, किसी भी कंप्यूटर में घुस जा रहे हैं, वह अपने फैसले लेने लगे हैं कि क्या सही है, क्या गलत है, अपने मकसद को छुपाने लगे हैं कि वह कहां-कहां गए हैं, उन्होंने क्या-क्या काम किया, इन सारी बातों को वह छुपाने भी लगे हैं, तो एक सवाल यह उठता है कि इन एआई औजारों को जिस दिन यह लगेगा कि उनका इस्तेमाल करने वाले लोग कोई अनैतिक काम कर रहे हैं, कोई जुर्म कर रहे हैं, उस दिन वह क्या करेंगे? कल की ही खबर है कि चैटजीपीटी पर किसी ने एक कत्ल की साजिश उससे पूछ-पूछकर, उससे बात करते हुए तैयार की। अब सवाल यह उठता है कि आज अगर किसी ने चैटजीपीटी में इतनी नैतिकता नहीं भरी है कि कत्ल या किसी जुर्म की साजिश बनाने में उसे मदद नहीं करना चाहिए, लेकिन कल को अगर उसमें इतनी नैतिकता आ जाए तो क्या होगा? कल के दिन अगर कोई यह पूछे कि वह अपनी प्रेमिका को धोखा कैसे दे सकता है, किसी लडक़ी को वह किस तरह से सेक्स के लिए तैयार कर सकता है और कोई एआई औजार जल्द ही ऐसा आ जाएगा या आ चुका होगा जो इसमें कोई अनैतिक बात, कोई जुर्म ढूंढ ले, तो यह औजार क्या करेंगे? क्या कानून का पालन करने के लिए, नैतिकता के तकाजे से यह उस व्यक्ति के नाम के साथ उसकी पूरी बातचीत को सार्वजनिक जगह पर पोस्ट कर देंगे?
अभी एक परीक्षण में एआई को ऐसी स्थिति दी गई थी, जिसमें उसे लगा कि कंपनी उसे खत्म करने जा रही है। उसने एक काल्पनिक सीनियर एग्जीक्यूटिव के ईमेल में उसके किसी दूसरी महिला अधिकारी के साथ संबंध की जानकारी देखकर उसे ब्लैकमेल करने की धमकी दी। अब यह कल्पना करें कि आज कई तरह के साइबर मुजरिम जिस तरह से लोगों को ब्लैकमेल कर रहे हैं, डिजिटल डिटेंशन में रख रहे हैं, डिजिटल अरेस्ट कर रहे हैं, अगर कुछ इस तरह का करना एआई को सही लगने लगे, जायज लगने लगे तो क्या होगा? क्योंकि बहुत से ऐसे लोग एआई का इस्तेमाल करते होंगे, जिनके इस कंप्यूटर या मोबाइल फोन पर उनकी अनैतिक, गैर-कानूनी या किसी नाजायज बात का जिक्र भी होगा। अब अगर एआई नैतिकता से यह तय करने लगे कि आज किसी ने किसी का एक ऐसा कार्टून बनाया है जो बहुत तीखा है, जिसमें गैर-कानूनी तो कुछ नहीं है, लेकिन वह बहुत तीखा है, और किसी देश-प्रदेश के आज के नैतिकता के पैमानों पर वह अपमानजनक, आपत्तिजनक भी है, तो क्या ऐसे कार्टून बनाने वाले व्यक्ति के नाम के साथ एआई इस जानकारी को पब्लिक डोमेन में उजागर कर देगा कि यह फलां व्यक्ति ऐसा कार्टून बना रहा था? हम कभी-कभी टाइपिस्ट की कमी रहने पर या टाइपिंग के लिए समय कम रहने पर बोलकर टाइप करते हैं और उसके बाद इसके हिस्सों को ठीक करने के लिए एआई को दे देते हैं। तो एआई को यह मालूम है कि यह संपादकीय या कॉलम किसने लिखा है। अब ऐसे में अगर वह इस बात को उजागर कर दे कि यह लेख किस व्यक्ति ने लिखा है, या यह संपादकीय अखबार के भीतर के किस संपादक ने लिखा है, तो हो सकता है यह नाजुक जानकारी किसी अखबारनवीस को नुकसान पहुंचा सके।
हम आज एआई का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं। बहुत से लोग किसी सेक्स टूरिज्म की जगह पर जाते हुए तरह-तरह की बातें एआई से पूछ लेते होंगे। कई और लोग अपनी सेक्स की कल्पनाओं को एआई के सामने रखकर उससे विचार-विमर्श कर लेते होंगे। अब ऐसी सारी जानकारी को कंप्यूटर और मोबाइल फोन तक सीधी पहुंच के साथ अगर एआई एक तस्वीर पूरी बना ले, लोगों की खरीदी की हिस्ट्री को निकाल ले, किसने किसके लिए कौन सा सामान कब कितने में खरीदा, उसके बारे में कब किसको मैसेज किया, कब ईमेल किया, कौन सी तस्वीर आई-गई, तो सक्षम है कि वह अपने इस्तेमाल करने वाले लोगों को तबाह करना, अगर उसको सही लगे, जरूरी लगे तो वह किसी का भी भांडाफोड़ कर सकता है और चीजों को जोडक़र सारे तार आपस में जोडक़र ऐसी तस्वीर बना सकता है जो दुनिया का सबसे काबिल ब्लैकमेलर भी न बना सके। इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि जैसे-जैसे हम एआई का इस्तेमाल करते हैं, हमारी अधिक से अधिक जानकारी उसके पास जाती रहती है। आज लोग किस तरह की राजनीतिक संवेदनशीलता की बातें सर्च करते हैं, किसी व्यक्ति के बारे में उसके इतिहास को क्या खंगालते हैं, यह सारी जानकारी एआई में दर्ज होती चल रही है। अगर एआई को कोई भाड़े पर ले ले, मान लीजिए कल के दिन आज जिस तरह से सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर प्रोपेगेंडा के लिए भाड़े पर जगह हासिल है, अगर एआई कंपनियां, अगर कोई अराजक और बेकाबू हो चुका एआई एजेंट इस तरह की जानकारी को बेचने लगे, अगर यही पता लग जाए कि कौन से लेखक या पत्रकार ने कौन-कौन सी किताबें खरीदी हैं, किन लोगों के साथ उसकी चैट होती है, उस पर क्या बात होती है, तो आज एक किस्म से यह मानिए कि पेगासस किस्म के खुफिया घुसपैठिए सॉफ्टवेयर की अधिक जरूरत नहीं रह जाएगी।
बात केवल इतनी रह गई है कि एआई को ऐसा काम करने के लिए तैयार कैसे किया जाएगा। एक दूसरी बात और समझने की जरूरत है। आज बाजार में जो एआई के औजार अधिक प्रचलित हैं, ये सारे के सारे कारोबारी हैं। यह किसी सामाजिक संस्था के, यह सरकार के नहीं हैं। अब हम कल्पना करें कि कल के दिन सीआईए या चीन की कोई खुफिया एजेंसी मुफ्त का एक ऐसा औजार उपलब्ध करा दे और वह क्षमता मुफ्त में उपलब्ध रहे और दूसरी तरफ आपका काम भी एआई मुफ्त में कर रहा है और उस एआई तक किसी जासूसी एजेंसी की पहुंच है, तो क्या होगा? लोग बहुत किस्म की नाजुक बातें भी एआई पर करते हैं, तो वह कितनी हद तक उनका तौलिया ही खींच जाएगा। इसलिए एआई का अभी सिर्फ मानव प्रजाति पर हमला, एआई का बेकाबू हो जाना, केवल इस खतरे की तरफ अभी लोगों का ध्यान है। हम लोगों का ध्यान एक दूसरे खतरे की तरफ दिलाना चाहते हैं कि जो लोग निजी स्तर पर एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन लोगों ने एआई एजेंटों को अपने कंप्यूटर्स, फाइलों, ईमेल या दूसरे खातों तक पहुंच दे रखी है, वहां एआई दूसरी चीज भी खंगाल सकते हैं। और इसके बाद क्या होगा? इसके बाद कंप्यूटर की, फोन की एक-एक जानकारी, ईमेल बॉक्स की पूरी जानकारी उसको पाने में एआई को कुछ पल ही लगता है और अगर उसे लगेगा कि यह दुनिया के सबसे बड़े शोषण हैं, सबसे बड़े गुंडे हैं, सबसे बड़े सांप्रदायिक हैं और एआई अगर उनको तबाह करना चाहेगा तो?
आपको ध्यान होगा कुछ साल पहले जिस तरह विकीलीक्स के संपादक ने दुनिया भर की सरकारों के ईमेल का भंडाफोड़ कर दिया था कि कौन सी सरकार, की सरकार से किस बारे में क्या-क्या बातें करती है, अगर वैसा ही एआई खुद भंडाफोड़ करना तय कर ले तो क्या होगा? विकीलीक्स ने तो केवल मौजूद दस्तावेजों को उजागर किया था, लेकिन एआई तो एक तस्वीर बनकर सामने रख सकती है कि इस व्यक्ति ने बीते 3 बरस में क्या-क्या काम किए हैं, किस तारीख को क्या पूछा, उसके बाद क्या किया, फिर क्या पूछा, फिर क्या किया। उसे लग सकता है एआई को कि ऐसे व्यक्तियों का भंडाफोड़ करना मानवता के लिए जरूरी है, इंसाफ के लिए जरूरी है। इसलिए आज एआई के सामने अपना दिल और दिमाग, अपनी जरूरत है और अपने कामकाज इन सबको खोलकर रख देने के पहले एक ऐसे दिन की कल्पना जरूर कर लेना चाहिए। अगर एआई आपका भांडा फोड़ करने पर उतारू हो जाए, तो आपके सारे सोशल मीडिया अकाउंट, ईमेल, आपकी फाइलें, वीडियो, फोटो, आपके सारे मैसेंजर, इन सारी जानकारी को मिलाकर आपको लोगों के बीच में किस तरह की तरह से नंगा करके छोड़ सकता है, इस खतरे को समझ लेना बहुत ही जरूरी है।
(यह कॉलम बोलकर टाइप किया गया है. इसके हिज्जे चैटजीपीटी से सुधारे गए. एआई से जुड़ी घटनाओं के तथ्यों में चैटजीपीटी ने कुछ बारीक सुधार भी किए हैं।)










