16 सितंबर 2026
दुनिया के दूसरे कई देशों की सख्ती के बाद अब भारत में भी सरकार ने दुनिया के सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कारोबारी मेटा पर दबाव डाला है ताकि उससे भारत के लोगों के सामने परोसे जा रहे बच्चों के सेक्स कंटेंट की अधिक जानकारी मिल सके। दुनिया के कई विकसित देशों ने बीते एक बरस में फेसबुक, इंस्टाग्राम, और वॉट्सऐप चलाने वाली कंपनी मेटा से मोटा जुर्माना वसूला है, कई देशों में, जिनमें मेटा का खुद का देश अमरीका भी शामिल है, बच्चों के माँ-बाप ने इस कंपनी के खिलाफ मुकदमे कर रखे हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे देश ने एक उम्रसीमा के नीचे के बच्चों को सोशल मीडिया पर मेंबरशिप देने के खिलाफ बहुत मोटा जुर्माना लगा रखा है। यूरोपियन यूनियन ने भी सोशल मीडिया कंपनियों पर कई तरह की सख्ती लगाई है। भारत में अभी बीते कुछ महीनों से ही जरा सी सुगबुगाहट चालू हुई है, वह भी शायद बीबीसी की इस खोजी रिपोर्ट के बाद हुई है कि मेटा के इंस्टाग्राम पर भारत के बच्चों की यौन सामग्री बेची जा रही है, और ऐसे कारोबारी इंस्टाग्राम पर इश्तहार दे रहे हैं। एक के बाद एक बीबीसी की ऐसी दो बड़ी, और पुख्ता खोजी रिपोर्ट के बाद भारत में भी लोग हक्का-बक्का हैं कि किस तरह यहां की सरकार यह सब बर्दाश्त कर रही है। यहां कानून में विदेशी कंपनियों को यह छूट दी गई है कि उनके उपभोक्ता अगर उनके प्लेटफॉर्म पर किसी तरह का जुर्म करते हैं, तो उसके लिए ये प्लेटफॉर्म जिम्मेदार नहीं माने जाएंगे। इसका फायदा उठाकर तमाम बहुराष्ट्रीय सोशल मीडिया कंपनियां मनमानी कर रही हैं। जब कई विकसित देश मेटा पर इस बात के लिए मुकदमा चला रहे हैं, कि वह बच्चों को अपने प्लेटफॉर्म की आदत डालने की तरकीबें अपने कम्प्यूटरों के एल्गोरिद्म पर इस्तेमाल कर रहे हैं, और ऐसे में खुदकुशी करने वाले कई बच्चों के माँ-बाप ने अदालत में भी मुकदमे किए हैं, भारत मोटे तौर पर ऐसी तमाम फिक्र से अब तक आजाद है।
हम इस मुद्दे पर पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि भारतीय बच्चों को ऐसी सोशल मीडिया कंपनियों की कारोबारी साजिशों से बचाना जरूरी है। इसके साथ-साथ भारतीय बच्चों को स्क्रीन की लत से बचाना भी जरूरी है। आज बहुत से माँ-बाप लापरवाह हैं जो कि बच्चों को टीवी का रिमोट देकर, उनके हाथ में मोबाइल फोन देकर उन्हें व्यस्त रखते हैं, और खुद भी अपने उपकरणों पर व्यस्त हो जाते हैं। बहुत से माँ-बाप ऐसे हैं जो मजबूरी में काम करने में लगे रहते हैं, और बच्चों को व्यस्त रखने के लिए उनके पास स्क्रीन ही अकेला तरीका है। नतीजा यह हो रहा है कि छोटे-छोटे बच्चे भी हर दिन आठ-दस घंटे तक फोन, कम्प्यूटर, या टीवी स्क्रीन पर लगे रहते हैं। हमने भारत सरकार को कई बार यह सुझाया है कि उसे फोन और टीवी जैसे उपकरण बनाने वाली कंपनियों से बात करके उस पर इस तरह के फीचर जुड़वाने चाहिए कि बच्चों की सामग्री किसी दिन में एक सीमित तक ही उस पर चल पाए। आज तो एआई की मेहरबानी से यह बहुत आसान हो गया है कि बच्चों की पसंद के चैनल, उस पर के कार्यक्रम, उनके चहेते वीडियो गेम की सीमा तय की जा सकती है कि एक दिन में वे कुल मिलाकर 30 मिनट, या 60 मिनट से अधिक न चलें। भारत में सरकार को अभी इस बात का महत्व समझ नहीं आ रहा है कि बच्चों को स्क्रीन में डूबते चले जाने से कैसे बचाया जाए। आज ही सुबह किसी एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर यह रिपोर्ट थी कि छोटे बच्चे जो कि किताबें पढ़ते हैं, वे किस तरह मानसिक रूप से अधिक विकसित होते हैं, और आगे जाकर उनको मानसिक और बुढ़ापे की दूसरे किस्म की बीमारियां होने का खतरा घट जाता है। इस नई शोध के पहले से भी मनोवैज्ञानिक इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि बच्चों की कल्पनाओं में जब वे खुद रंग भरते हैं, तो उनके दिमाग का विकास होता है। लेकिन जब कल्पनाओं की जगह पर आकार, रंग, और विविध हलचल वाले वीडियो कब्जा कर लेते हैं, तो बच्चों की कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता धरी रह जाती है, और उनका मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता। भारत में सरकार को तमाम किस्म के स्क्रीन वाले उपकरण बनाने वाली कंपनियों पर ऐसे चाइल्ड-लॉक लगाने के लिए कहना चाहिए जो कि माँ-बाप के हाथ में उन उपकरणों का नियंत्रण दे सकें। भारत सरकार को चाहिए कि उपकरणों में ऐसा इंतजाम न करने पर उन पर एक पेनाल्टी लगाई जाए, और किसी भी कारोबारी के लिए पेट पर लात पडऩा ही सबसे अधिक मायने रखता है।
बीबीसी की रिपोर्ट सचमुच भयानक है कि मेटा के प्लेटफॉर्म जानते-बूझते, समय पर खबर मिल जाने पर भी ऐसे लोगों के इश्तहार चला रहे हैं, जो कि भारत के बच्चों के नग्न और अश्लील फोटो-वीडियो ऑनलाईन बेच रहे हैं। हमारा तो ख्याल यह है कि जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे जुर्म से कमाई पा रहे हैं, तो उन पर अरबों का जुर्माना भी लगाना चाहिए। उनके पास अपने प्लेटफॉर्म पर इश्तहार पर नजर रखने की हर तकनीक मौजूद है। फेसबुक खासकर सबसे अधिक बदनाम है कि उस पर आने वाले विज्ञापनों में से बड़ी संख्या धोखा देने वालों की रहती है, और धोखा खाने के बाद लोग जब ऐसे पेज पर जाकर कमेंट बॉक्स में यह लिखते भी हैं कि यह विज्ञापन फ्रॉड है, तब भी मेटा उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं करता। महीनों तक धोखाधड़ी के ऐसे विज्ञापन चलते रहते हैं। सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में सरकार का वार तभी झेलना पड़ता है, जब सरकार को नापसंद कोई राजनीतिक बात पोस्ट की जाती है। इसके अलावा किसी और बात के लिए सरकार आक्रामक नहीं रहती, चौकन्ना भी नहीं रहती।
देश में एक-दो प्रदेशों की सरकारों ने जरूर यह कोशिश की है कि सोशल मीडिया पर पहुंचने वाले बच्चों की एक न्यूनतम उम्रसीमा तय करवाई जाए। लेकिन भारत की संघीय व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर रोक-टोक लगाने का मुख्य अधिकार तो केन्द्र सरकार के पास ही है, राज्य सरकार भी हो सकता है अपने स्तर पर कुछ कर पाए। लेकिन केन्द्र को राज्यों के साथ बात करके सोशल मीडिया सुधार की पहल करनी चाहिए, आज इन्हीं प्लेटफॉम्र्स पर बच्चों को लत डाली जा रही है, वहां उन्हें कई गलत चीजों का आदी बनाया जा रहा है, और जो कंपनियां अपने खुद के देश में अरबों-खरबों का जुर्माना दे रही हैं, वे भी भारत में यहां के बच्चों के सेक्स वीडियो बेचने के बाद मजा कर रही है, यह नौबत बिल्कुल भी नहीं चलने देना चाहिए।












