जमानत पर प्रदेश के बाहर रहने की शर्त क्या विधायक को सदन से रोक सकती है?

07 फरवरी 2026 

 

छत्तीसगढ़ में बस्तर के कोंटा विधानसभा क्षेत्र के पांच बार के आदिवासी विधायक कवासी लखमा लंबे अरसे से जेल में बंद थे, और अभी उन्हें इस शर्त पर जमानत मिली है कि वे ईडी की पूछताछ, या अदालती सुनवाई के लिए ही प्रदेश में आएंगे, अन्यथा वे प्रदेश के बाहर रहेंगे। वे पिछली भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार में आबकारी मंत्री थे, और हजारों करोड़ के शराब घोटाले का आरोप लगाते हुए ईडी अदालत में जो मुकदमा चला रही है उसी में कवासी लखमा भी गिरफ्तार हैं, और लंबी जेल के बाद अभी उन्हें जमानत मिली है। अब एक सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि वे विधानसभा के सत्र में आ सकेंगे या नहीं? अदालत ने जमानत देते हुए इस बारे में फैसला विधानसभा अध्यक्ष पर छोड़ा है, और कवासी लखमा ने डॉ.रमन सिंह से मिलकर पत्र दिया है कि उन्हें सत्र में मौजूद रहने की इजाजत दी जाए। वे जमानत पर छूटे हुए एक विचाराधीन कैदी हैं, लेकिन वे निर्वाचित विधायक भी हैं जिनका कार्यकाल भी करीब तीन साल बाकी है। ऐसे में एक सवाल यह उठ खड़ा होता है कि इस विधानसभा क्षेत्र, कोंटा की जनता का क्या हक है? क्या उसके मुद्दों को विधानसभा में उठाने के लिए उनके निर्वाचित विधायक को जेल से, या जमानत पर प्रदेश से बाहर रहते हुए विधानसभा आने की छूट मिलनी चाहिए? यह मामला सिर्फ छत्तीसगढ़ विधानसभा का नहीं है, देश में जगह-जगह कई विधानसभाओं में ऐसे मामले सामने आए हैं, और संसद के सामने भी कुछ मौकों पर यह दुविधा खड़ी हुई है। 

ऐसी नौबत में भारत में संवैधानिक और संसदीय प्रावधान क्या है, इसे कुछ समझ लेना बेहतर होगा। कानून की किताबों पर एक सरसरी नजर डालने से यह समझ पड़ता है कि भारत में विचाराधीन कैदी, सांसद या विधायक, को खुद होकर संसद में जाने, वोट डालने, या बोलने का कोई अतिरिक्त अधिकार नहीं है, यह न तो उनका मौलिक अधिकार है, और न ही उनका संसदीय विशेषाधिकार है। यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भी नहीं गिनाता कि उन्हें सदन में आकर बोलने का हक होना चाहिए। भारतीय कानूनी व्यवस्था इस बारे में साफ है कि कानूनी हिरासत में जो सांसद या विधायक हैं, उनके सदन में बोलने की स्वतंत्रता तब तक लागू नहीं होती, जब तक वे सदन में कानूनी रूप से मौजूद नहीं हैं। फिर हिरासत में, या विचाराधीन कैदी की हैसियत से कोई निर्वाचित व्यक्ति अगर बंद हैं, तो उन्हें सदन में जाने का अधिकार तभी होगा, जब संबंधित अदालत, या उनके मामले में सक्षम अधिकारी इसकी स्पष्ट इजाजत दें। किसी निर्वाचित व्यक्ति की पुलिस या दूसरी एजेंसी की हिरासत में अगर अफसर से ही जमानत का प्रावधान है, तो ऐसे लोग जमानत पर बाहर आने के बाद सदन की कार्रवाई में जा सकते हैं, और सदन को कानूनी रूप से स्वतंत्र सदस्य को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। अभी कवासी लखमा के बारे में एक पेंच यह फंसा हुआ है कि जमानत की शर्तों में प्रदेश के बाहर रहने को कहा गया है, लेकिन दूसरी तरफ विधानसभा में जाने की इजाजत देने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष पर छोड़ दिया गया है। ऐसा लगता है कि अगर स्पीकर इजाजत दे देंगे, तो कवासी लखमा विधानसभा के सत्र चलते राजधानी आ सकेंगे, और यहां उतने दिन रह सकेंगे। 

भारतीय कानूनी व्यवस्था में अदालत से जमानत या पैरोल पर छोडऩे के बहुत ही विस्तृत विवेकाधिकार जज या मजिस्ट्रेट पर छोड़े गए हैं। वे ही यह तय कर सकते हैं कि कोई विचाराधीन, या सजायाफ्ता कैदी किसी सदन की कार्रवाई के लिए बाहर जाए, या न जाए। यह समझ लेना भी जरूरी है कि अगर सजा दो बरस से अधिक की रहती है, तो सदन की सदस्यता वैसे ही खत्म हो जाती है। लेकिन जब तक मुकदमा चलता है, तब तक विचाराधीन कैदी चुनाव भी लड़ सकते हैं, और संसद या विधानसभा की कार्रवाई में जाने के लिए अदालत से छूट भी मांग सकते हैं। कोई संसदीय विशेषाधिकार ऐसा नहीं है जो सांसदों या विधायकों को हिरासत, कैद, या विचाराधीन कैदी की हैसियत से कैद से बाहर आने का हक देता हो। यह पूरी तरह से अदालत का फैसला रहता है। अब कवासी लखमा के मामले में यह बात गेंद को विधानसभा अध्यक्ष के पाले में डाल देती है कि उन्हें अदालत के हिसाब से तो जमानत की अवधि प्रदेश के बाहर गुजारनी है, लेकिन सदन में आने के बारे में अदालत ने यह फैसला विधानसभा पर छोड़ दिया है। 

हमारा ऐसा मानना है कि जब तक किसी सांसद या विधायक की सदस्यता खत्म नहीं होती है, तब तक उसे सदन की कार्रवाई से नहीं रोका जाना चाहिए, चाहे उनकी अर्जी अदालत देखे, या सदन के अध्यक्ष उस पर फैसला लें। भारत में सांसद या विधायक पांच बरस के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं, और कम से कम लोकसभा सदस्य, और विधायक तो अपने क्षेत्र के अकेले निर्वाचित जनप्रतिनिधि रहते हैं, और किसी निर्वाचन क्षेत्र की जनता को प्रतिनिधित्व से नहीं रोका जा सकता। यह किसी सांसद या विधायक की बात नहीं है, यह जनता के हक की बात है, जिसने कोई गुनाह नहीं किया है। भारत की निर्वाचन व्यवस्था में किसी निर्वाचित सांसद या विधायक की सदस्यता दो साल से कम की सजा पर खत्म नहीं होती, सदस्यता खत्म होने पर छह महीने के भीतर दुबारा निर्वाचन की व्यवस्था है, और जनता को अपना अगला प्रतिनिधि पाने के लिए उतना इंतजार करना पड़ सकता है। लेकिन चाहे किसी भी दर्जे की कैद क्यों न हों, चाहे निर्वाचित जनप्रतिनिधि को जेल से पुलिस की गिरफ्त में ही क्यों न लाना पड़े, उन्हें सदन की कार्रवाई में आने देना चाहिए। अदालतों के पास जमानत देने के लिए विवेकाधिकार तो जरूर हैं, लेकिन इस विवेकाधिकार को किसी क्षेत्र की जनता के प्रतिनिधित्व के हक के ऊपर छूट नहीं मिलनी चाहिए। कुल मिलाकर कम शब्दों में कहें, तो हमारा यह मानना है कि जमानत पर छूटे, और प्रदेश के बाहर रहने के लिए अदालत से हुक्म पाए हुए कवासी लखमा को विधानसभा की कार्रवाई में हिस्सा लेने की छूट मिलनी चाहिए, फिर इसके बाद सत्र खत्म होने पर वे अदालत के हुक्म के मुताबिक प्रदेश के बाहर रहें। अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग किस्म की मिसालें कायम होती हैं, छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष को जनता के हक को सबसे ऊपर मानना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)           

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