10 फरवरी 2026
कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है, इसे तृणमूल कांग्रेस छोडक़र 118 सांसदों ने समर्थन दिया है। यह विवाद यहां से शुरू हुआ कि ओम बिरला ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री के परंपरागत भाषण को रूकवा दिया। उन्होंने खुद होकर यह कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री के साथ सदन में विपक्ष के द्वारा कुछ अप्रिय किए जाने की पुख्ता जानकारी मिली थी, इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया था कि वे लोकसभा के सदन में न आएं। इस पर प्रधानमंत्री राज्यसभा गए थे, और यह एक बहुत ही अभूतपूर्व और असाधारण बात थी कि संसदीय परंपराओं को तोडक़र प्रधानमंत्री का भाषण लोकसभा में रोका गया। हमने इस बारे में अपने अखबार के यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर अभी तीन-चार दिन पहले ही यह मांग भी की थी कि संसद के भीतर विपक्ष पर इतना बड़ा आरोप लगाने वाले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपनी पुख्ता जानकारी को लेकर नार्को टेस्ट का सामना करना चाहिए, ताकि देश की जनता को आरोप-प्रत्यारोप से परे सच पता लग सके। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति के बयान से सच बहुत अधिक ऊपर होता है, और लोगों को बयान सुनने के बजाय सच जानने का हक रहता है। हमारा ख्याल है कि जब लोकसभा अध्यक्ष सदन में विपक्ष के ऊपर इतनी बड़ी तोहमत लगाते हैं, तो विपक्ष को इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। संसदीय व्यवस्था में हर अविश्वास प्रस्ताव का पास होना जरूरी नहीं रहता, लेकिन ऐसी हालत में जब लोकसभा अध्यक्ष पूरे विश्व के संसदीय इतिहास की सबसे बड़ी तोहमत लगाकर प्रधानमंत्री को सदन में आने से रोकते हैं, तो जिन लोगों पर प्रधानमंत्री से अप्रिय बर्ताव करने का आरोप लगाया गया है, उन्हें सुबूत भी मांगने चाहिए, और संसदीय व्यवस्था में उपलब्ध सबसे कड़ा विरोध भी करना चाहिए, जो कि अविश्वास प्रस्ताव होता है। इस अविश्वास प्रस्ताव में कांग्रेस, समाजवादी पाटी, राष्ट्रीय जनता दल, द्रविड़ गठबंधन की पार्टियां, व कुछ और सहयोगी दल शामिल हैं। लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की यह संवैधानिक प्रक्रिया हो सकता है कि बहुमत की ताकत से खारिज हो जाए, लेकिन इसकी प्रतीकात्मक अहमियत तो कम नहीं होती।
संसद के भीतर की कार्रवाई में देश की सबसे बड़ी अदालत भी सीधे दखल नहीं दे सकती, जब तक कि कोई नेता या राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट में यह साबित न कर सके कि एक सदस्य के रूप में उसके अधिकार कुचले जा रहे हैं, या एक नागरिक के रूप में उसके बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। हम कानून की इतनी बारीकियों को नहीं जानते, लेकिन इतनी समझ तो है कि विपक्ष उस पर लगाए गए इतने भयानक आरोप पर भी सीधे सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकता, और उसे सदन में ही अपनी बात साबित करनी होगी। इसमें भी कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि बहुमत के फैसले के पहले भी अपनी कही गई तर्कसंगत और न्यायसंगत बातों से विपक्ष अपने मुद्दे को अच्छी तरह साबित कर सकता है, फिर चाहे वह बहुमत के आगे हार जाए। संसदीय इतिहास में दर्ज बातें भी मायने रखती हैं।
लोकसभा में विपक्ष का यह आरोप है कि स्पीकर ने सदन की कार्रवाई में पक्षपात किया है, और विपक्षी आवाजों को दबाया है। विपक्ष का यह भी कहना है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने का मौका नहीं दिया गया। इसके अलावा ओम बिरला ने महिला विपक्षी सांसदों के व्यवहार पर टिप्पणी की, जिसे विपक्ष ने गलत और अपमानजनक कहा, और इसे बेबुनियाद और घृणास्पद बताया। विपक्ष का यह भी आरोप है कि कुछ सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित किया गया, और अध्यक्ष ने मनमानी से माइक बंद करवाए। विपक्ष का कहना है कि उसकी अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया, और सत्ता पक्ष के सांसदों को अतिरिक्त विशेषाधिकार दिया गया। हमने यह ढूंढने की कोशिश की है कि लोकसभा में अध्यक्ष के खिलाफ इसके पहले कब-कब लाया गया। तो 1954, 1966, और 1987 में अविश्वास प्रस्ताव लाए गए थे, और ये सभी खारिज हो गए थे। मतलब यह कि आजादी के बाद की पौन सदी में यह चौथा ही अविश्वास प्रस्ताव है। एक जानकारी यह भी है कि इसी पूरे दौर में प्रधानमंत्रियों के खिलाफ 27 से अधिक बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए, लेकिन अध्यक्ष के ओहदे को अतिरिक्त सम्मान का मानकर, बिना भेदभाव का होने की उम्मीद रखते हुए विवादों में नहीं घेरा गया। ओम बिरला ने अपने पूरे कार्यकाल में शब्दों और भावभंगिमा से, अपने व्यवहार और फैसलों से विपक्ष, खासकर कांग्रेस, और उसमें भी खासकर राहुल गांधी के लिए एक सख्त नापसंदगी जाहिर की है, और मोदी सरकार के सत्ता पक्ष के लिए उनकी भावभंगिमा मंत्रमुग्ध दिखती हैं। इसलिए पहली नजर में यह अविश्वास प्रस्ताव बेबुनियाद नहीं लगता है, बल्कि हमारा तो यह मानना है कि लोकसभा अध्यक्ष जब तक अपनी पुख्ता जानकारी सार्वजनिक रूप से स्थापित नहीं करते हैं, तब तक वे विपक्ष का एक ऐतिहासिक अपमान कर चुके हैं, और उन्हें अध्यक्ष की कुर्सी पर बने रहने का अंकगणित का हक तो है, कोई नैतिक हक नहीं है। खैर, आज नैतिकता की बात फिजूल है, और कुछ बहुत बड़े लोगों से तो नैतिकता की जरा भी उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे में अविश्वास प्रस्ताव पर अगर विपक्ष अपनी पूरी बात इतिहास में अच्छी तरह दर्ज करता है, तो कम से कम वे बातें तो भारत के संसदीय रिकॉर्ड में रहेंगी, और लोकतांत्रिक दुनिया के संसदीय अध्ययन में उनका इस्तेमाल भी होगा। जिन लोगों को अपनी खुद की कुर्सी और इज्जत की फिक्र नहीं रहती, उनके काम भी संसदीय इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होते हैं, भले लोगों के मुकाबले कुछ अधिक हद तक दर्ज होते हैं। उम्मीद है कि अविश्वास प्रस्ताव पर देश को अच्छी तर्कसंगत और न्यायसंगत बातें सुनने मिलेंगी, और यह नसीहत भी मिलेगी कि लोकतंत्र में बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों को क्या-क्या नहीं करना चाहिए, कैसा-कैसा बर्ताव नहीं करना चाहिए।
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