संपादकीय
29 अगस्त 2012
सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पर आतंकी हमले के चेहरे, पाकिस्तान से भेजे गए अजमल कसाब की फांसी की सजा बरकरार रखी है। ऐसी ही उम्मीद भी थी कि हाईकोर्ट के फैसले को बदलने की कोई नई जमीन सुप्रीम कोर्ट में निकलकर नहीं आ जाएगी और आज यही फैसला होगा। अब देश में जोर-शोर से यह बात उठेगी कि कसाब को फांसी कब दी जाएगी? केंद्र सरकार या राष्ट्रपति के सामने कसाब की रहम की अगर कोई अपील आएगी, तो उस पर ये दोनों दफ्तर कितने वक्त में फैसला करेंगे, और कसाब को कब तक जेल में रखकर लोगों की बेचैनी बढ़ाई जाएगी। कसाब के पहले के भी कुछ लोग रहम की अपील के चलते बरसों से जेल में फांसी की कतार में खड़े हैं, उनमें से कुछ लोग कुछ निजी किस्म के जुर्म के लिए मिली मौत की सजा वाले हैं और कुछ लोग संसद पर हमले में सजा पाए अफजल गुरू किस्म के हैं। अफजल गुरू को फांसी देने के लिए भारतीय जनता पार्टी सहित बहुत से लोग सरकार को घेरते हैं कि मुस्लिम वोटों के फेर में सरकार इस फांसी पर अमल करने से बच रही है, और रहम की अपील के नाम पर केंद्र सरकार और राष्ट्रपति के बीच मामले को उलझाकर रखा गया है। आज ही जब यह खबर आई है, तो कुछ ही मिनटों के भीतर गुजरात की एक अदालत से यह खबर निकलकर आ रही है कि वहां के साम्प्रदायिक जनसंहार के अभियुक्त लोगों को अदालत ने बड़ी संख्या में मुजरिम करार दिया है, जिनमें से एक मोदी मंत्रिमंडल की महिला सदस्य भी रह चुकी है। ऐसे मामले में आगे-पीछे घूम-फिरकर हो सकता है कि रहम की अपील तक पहुंचें।
भारतीय लोकतंत्र में जब कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के अलग-अलग दायरे बांटे गए हैं, तब सुप्रीम कोर्ट से दी गई फांसी की सजा पर सरकार या राष्ट्रपति को दुबारा क्यों विचार करना चाहिए, और क्यों इन्हें उस सजा को पलटने का हक मिलना चाहिए? अदालतों के जज चुनाव लड़कर नहीं आते हैं और वे जनभावनाओं के प्रति जवाबदेह नहीं होते हैं। दूसरी तरफ सरकार चला रहे लोग वोटों की राजनीति के रास्ते से ही सत्ता तक पहुंचते हैं और उनके लिए गए फैसले, खासकर विवेक के इस असाधारण अधिकार वाले फैसले, हो सकता है कि वोटों का ख्याल करते हुए लिए जाएं। इसलिए हमारा यह मानना है कि देश के सभी नागरिकों के साथ, मजहब और जाति, क्षेत्र और विचारधारा, इन सब के आधार पर भेदभाव के खतरे रखने वाला यह अधिकार खत्म होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उसकी सुनाई सजा को माफ करने या बदलने का कोई हक किसी को नहीं होना चाहिए, क्योंकि न्याय की मांग यही है। अदालतों को निर्वाचन से अलग इसीलिए रखा जाता है कि वे किसी असर के तहत काम न करें। और सरकार या राष्ट्रपति, जो कि असर के इस्तेमाल से कुर्सी तक पहुंचते हैं, असर के इस्तेमाल से दुबारा कार्यकाल पाते हैं या पा सकते हैं, उनको अदालती फैसलों को पलटने का हक देना लोकतांत्रिक न्याय की भावना के ठीक खिलाफ है।
देश वैसे भी बहुत से जरूरी मुद्दों को अनदेखा करते चलने को बेबस है, क्योंकि गैरजरूरी मुद्दों का सैलाब सुनामी की तरह देश की सोच को अपनी लपेट में ले चुका है, लिए हुए चल रहा है। ऐसे में जिंदगी और मौत को लेकर राजनीति और भेदभाव, पक्षपात और अलोकतांत्रिक विवेकाधिकार भयानक हैं। देश को आज इस गैरजरूरी सरदर्द की जरूरत भी नहीं है। अधिकारों का यह सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले के बाद किसी सजा पर कोई विचार-विमर्श नहीं होना चाहिए।
इसके साथ-साथ हमारा यह भी मानना है कि किसी भी सरकार को, लोकतंत्र या अदालत को, मौत की सजा का हक नहीं होना चाहिए और दुनिया के बहुत से सभ्य देशों की तरह भारत को भी मौत की सजा खत्म करनी चाहिए। इस बात को हम देश में आज छाई हुई मौत और माफी की राजनीति से जोड़कर नहीं कह रहे, फांसी की सजा के आज के जितने भी हकदार हैं, उन सभी की सजा को खत्म करके, आगे मौत की सजा के प्रावधान को ही खत्म करके भारतीय लोकतंत्र को एक संवेदनशील लोकतंत्र बनने की तरफ बढऩा चाहिए। मौत की सजा बहुत ही क्रूर है, और दुनिया का इतिहास गवाह है कि बहुत से मामलों में ऐसी सजा पाकर जेल में मौत का इंतजार कर रहे लोग बेकसूर भी साबित हुए हैं। पिछले ही हफ्ते भारत के सुप्रीम कोर्ट ने, नीचे की अदालतों से फांसी की सजा पाकर ऊपर तक पहुंचे एक हत्यारे के मामले में यह पाया कि हत्या के दिन वह नाबालिग था और उसे यह सजा दी ही नहीं जा सकती थी, इस कानून के तहत उस पर यह मुकदमा ही नहीं चल सकता था। उसे नागपुर की जेल से रिहा करने का आदेश हुआ है। अब अगर यह बात फांसी दे देने के बाद साबित होती तो यह जिंदगी अदालत या सरकार, राष्ट्रपति या कानून निर्माता संसद, कौन वापिस लाकर दे सकते थे? दुनिया की सबसे काबिल जांच एजेंसी, स्कॉटलैंड यार्ड वाले ब्रिटेन में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें आधी सदी बाद जाकर अब किसी नई जांच तकनीक से यह साबित हुआ है कि उस वक्त जिसे मौत दे दी गई, वह दरअसल बेकसूर था। इसलिए लोकतंत्र को, इंसानों को मौत की ऐसी सजा देने के हक से अपने को दूर रखना चाहिए जिसे वे न तो पलट सकते, और न ही यह जिंदगी जिनकी दी हुई है।

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