संपादकीय
24 जून 2016
यूरोपीय समुदाय से अलग होने के मुद्दे पर ब्रिटेन में हुए जनमतसंग्रह के नतीजों को वहां के एक भारत-मित्र सांसद कीथ वाज ने एक सदमे की बात करार दिया है, और इसे वहां के संकीर्णतावादी लोगों के प्रभाव में मतदाताओं के बहुमत का दिया गया फैसला कहा है। उन्होंने इसे ब्रिटेन, और योरप के लिए एक भयानक दिन कहा है। और उन्होंने यह भी कहा कि वे हजार बरसों में भी ऐसा भरोसा नहीं कर सकते थे कि ब्रिटिश जनता ऐसा वोट देगी। उन्होंने कहा कि वे इस मतदान को तथ्यों पर गौर किए बिना भावनाओं के आधार पर ब्रिटिश जनता का फैसला मानते हैं। उन्होंने कहा कि यह ब्रिटेन के लिए तबाही लाने वाला फैसला है, और बाकी योरप के लिए भी, और बाकी दुनिया के लिए भी।
इस जनमत संग्रह के बारे में अधिकतर बातें खबरों में आई हैं, इसलिए हम उनके बारे में यहां अधिक नहीं लिख रहे हैं। लेकिन बहुत से दूसरे मुद्दों के साथ-साथ जिस एक बात ने ब्रिटेन को जनमतसंग्रह की तरफ धकेला, वह बात है खाड़ी के देशों और दूसरी जगहों से योरप और ब्रिटेन में बड़ी संख्या में पहुंचने वाले शरणार्थियों को लेकर ब्रिटेन की जनता के एक बड़े हिस्से की फिक्र। और यह फिक्र छोटी नहीं है, ब्रिटेन के बहुत से लोग यह सोचते हैं कि यूरोपीय समुदाय का हिस्सा बने रहने से ब्रिटेन को शरणार्थियों का जितना बोझ उठाना पड़ रहा है, और उठाना पड़ेगा, और जारी रखना पड़ेगा, उससे ब्रिटेन पर आर्थिक और सामाजिक बोझ इतना अधिक पड़ रहा है, और पड़ेगा, कि उससे देश चरमरा जाएगा। दूसरी तरफ यूरोपीय समुदाय में बने रहने के पक्षधर, सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री सहित और कई लोगों की सोच एक उदार सामाजिक व्यवस्था की रही, और ये लोग ब्रिटेन की अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही पर टिके रहना चाहते थे, घरेलू दिक्कतों के बढऩे की कीमत पर भी। इस जनमतसंग्रह के नतीजे के बाद यह खबर है कि प्रधानमंत्री डेविड केमरून ने इस्तीफा दे दिया है।
ब्रिटेन के किसी भी आम चुनाव की तरह इस मुद्दे पर जनमत संग्रह के लिए खूब जमकर प्रचार हुआ, और लोगों के बीच भावनाएं भी भड़काई गईं, और तथ्य भी रखे गए। हम इस नौबत की तुलना भारत की किसी मिसाल से किए बिना महज दो बातों का जिक्र यहां पर करना चाहते हैं। 1971 में बांग्लादेश बनने के वक्त वहां से दसियों लाख शरणार्थी भारत आए थे, और उनमें से शायद पूरे के पूरे कानूनी रूप से भारत में रह गए। इनसे परे असम जैसे राज्य में अवैध रूप से आकर बसे हुए दसियों लाख बांग्लादेशियों का मुद्दा लंबे समय से भारत की राजनीति में उठाया जाता रहा, और इस बार असम में भाजपा की पहली सरकार बनने के पीछे जो वजहें गिनाई जाती हैं, उनमें ऐसे अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा भी एक है, जिनकी वजह से असम के कुछ लोगों का यह मानना रहा है कि उससे राज्य का चरित्र ही बदल गया है, और स्थानीय लोगों के हक छिने जा रहे हैं। ऐसी एक दूसरी नौबत भारत में कानूनी रूप से बसाए गए तिब्बती शरणार्थियों की है जो कि चीन के कब्जे वाले तिब्बत को छोड़कर दलाई लामा के साथ भारत में राजनीतिक शरण लिए हुए हैं, और इनको भी भारत ने खुले दिल से जगह दी है, और सरकारी खर्च पर इनको बसाया है। भारत का रिकॉर्ड आसपास के देशों के शरणार्थियों को लेकर बड़ा शानदार रहा है, और उसने अपने दरवाजे लोगों के लिए बंद नहीं किए, और 1971 में तो सिनेमा टिकटों पर एक शरणार्थी टैक्स लगाकर इंदिरा सरकार ने खर्च जुटाया था। लेकिन आज ब्रिटेन में वैध-अवैध प्रवासियों और शरणार्थियों को लेकर स्थानीय नागरिकों की जिस तरह की फिक्र सामने आई है, वह योरप के भी बहुत से और देशों को प्रभावित कर सकती है जहां पर पहुंचे हुए शरणार्थियों को लेकर कई देशों में कई तबकों में बड़ी फिक्र है। योरप के कुछ कस्बे तो ऐसे भी हैं जहां पर स्थानीय आबादी से अधिक शरणार्थियों के बसा दिए जाने से वहां के मूल निवासी रातों-रात अल्पसंख्यक हो गए हैं, और सांस्कृतिक फर्क की वजह से वे फिक्रमंद भी हैं। ब्रिटेन में जनमतसंग्रह की यह ताजा जीत एक उदार लोकतंत्र की हार भी है क्योंकि लोकतंत्र कई तरह के नुकसान झेलते हुए भी अपनी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियां पूरी करता है। फिलहाल ब्रिटेन के यूरोपीय समुदाय से अलग होने से भारत के साथ ब्रिटिश कारोबार पर भी बड़ा असर पडऩे वाला है, इस आशंका में दुनिया के कई शेयर बाजार आज सुबह नींद से उठते ही औंधे मुंह गिर पड़े, और आने वाले दिन बताएंगे कि ब्रिटेन की जनता ब्रिटेन को फिर से अपनी बंद सरहदों वाला देश बनाकर बाकी दुनिया पर कैसा असर डालने जा रही है। इससे दुनिया के बाकी देशों में भी संकीर्णतावादी, राष्ट्रवादी ताकतों को बढ़ावा मिलना तय है।
इस जनमत संग्रह के बारे में अधिकतर बातें खबरों में आई हैं, इसलिए हम उनके बारे में यहां अधिक नहीं लिख रहे हैं। लेकिन बहुत से दूसरे मुद्दों के साथ-साथ जिस एक बात ने ब्रिटेन को जनमतसंग्रह की तरफ धकेला, वह बात है खाड़ी के देशों और दूसरी जगहों से योरप और ब्रिटेन में बड़ी संख्या में पहुंचने वाले शरणार्थियों को लेकर ब्रिटेन की जनता के एक बड़े हिस्से की फिक्र। और यह फिक्र छोटी नहीं है, ब्रिटेन के बहुत से लोग यह सोचते हैं कि यूरोपीय समुदाय का हिस्सा बने रहने से ब्रिटेन को शरणार्थियों का जितना बोझ उठाना पड़ रहा है, और उठाना पड़ेगा, और जारी रखना पड़ेगा, उससे ब्रिटेन पर आर्थिक और सामाजिक बोझ इतना अधिक पड़ रहा है, और पड़ेगा, कि उससे देश चरमरा जाएगा। दूसरी तरफ यूरोपीय समुदाय में बने रहने के पक्षधर, सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री सहित और कई लोगों की सोच एक उदार सामाजिक व्यवस्था की रही, और ये लोग ब्रिटेन की अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही पर टिके रहना चाहते थे, घरेलू दिक्कतों के बढऩे की कीमत पर भी। इस जनमतसंग्रह के नतीजे के बाद यह खबर है कि प्रधानमंत्री डेविड केमरून ने इस्तीफा दे दिया है।
ब्रिटेन के किसी भी आम चुनाव की तरह इस मुद्दे पर जनमत संग्रह के लिए खूब जमकर प्रचार हुआ, और लोगों के बीच भावनाएं भी भड़काई गईं, और तथ्य भी रखे गए। हम इस नौबत की तुलना भारत की किसी मिसाल से किए बिना महज दो बातों का जिक्र यहां पर करना चाहते हैं। 1971 में बांग्लादेश बनने के वक्त वहां से दसियों लाख शरणार्थी भारत आए थे, और उनमें से शायद पूरे के पूरे कानूनी रूप से भारत में रह गए। इनसे परे असम जैसे राज्य में अवैध रूप से आकर बसे हुए दसियों लाख बांग्लादेशियों का मुद्दा लंबे समय से भारत की राजनीति में उठाया जाता रहा, और इस बार असम में भाजपा की पहली सरकार बनने के पीछे जो वजहें गिनाई जाती हैं, उनमें ऐसे अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा भी एक है, जिनकी वजह से असम के कुछ लोगों का यह मानना रहा है कि उससे राज्य का चरित्र ही बदल गया है, और स्थानीय लोगों के हक छिने जा रहे हैं। ऐसी एक दूसरी नौबत भारत में कानूनी रूप से बसाए गए तिब्बती शरणार्थियों की है जो कि चीन के कब्जे वाले तिब्बत को छोड़कर दलाई लामा के साथ भारत में राजनीतिक शरण लिए हुए हैं, और इनको भी भारत ने खुले दिल से जगह दी है, और सरकारी खर्च पर इनको बसाया है। भारत का रिकॉर्ड आसपास के देशों के शरणार्थियों को लेकर बड़ा शानदार रहा है, और उसने अपने दरवाजे लोगों के लिए बंद नहीं किए, और 1971 में तो सिनेमा टिकटों पर एक शरणार्थी टैक्स लगाकर इंदिरा सरकार ने खर्च जुटाया था। लेकिन आज ब्रिटेन में वैध-अवैध प्रवासियों और शरणार्थियों को लेकर स्थानीय नागरिकों की जिस तरह की फिक्र सामने आई है, वह योरप के भी बहुत से और देशों को प्रभावित कर सकती है जहां पर पहुंचे हुए शरणार्थियों को लेकर कई देशों में कई तबकों में बड़ी फिक्र है। योरप के कुछ कस्बे तो ऐसे भी हैं जहां पर स्थानीय आबादी से अधिक शरणार्थियों के बसा दिए जाने से वहां के मूल निवासी रातों-रात अल्पसंख्यक हो गए हैं, और सांस्कृतिक फर्क की वजह से वे फिक्रमंद भी हैं। ब्रिटेन में जनमतसंग्रह की यह ताजा जीत एक उदार लोकतंत्र की हार भी है क्योंकि लोकतंत्र कई तरह के नुकसान झेलते हुए भी अपनी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियां पूरी करता है। फिलहाल ब्रिटेन के यूरोपीय समुदाय से अलग होने से भारत के साथ ब्रिटिश कारोबार पर भी बड़ा असर पडऩे वाला है, इस आशंका में दुनिया के कई शेयर बाजार आज सुबह नींद से उठते ही औंधे मुंह गिर पड़े, और आने वाले दिन बताएंगे कि ब्रिटेन की जनता ब्रिटेन को फिर से अपनी बंद सरहदों वाला देश बनाकर बाकी दुनिया पर कैसा असर डालने जा रही है। इससे दुनिया के बाकी देशों में भी संकीर्णतावादी, राष्ट्रवादी ताकतों को बढ़ावा मिलना तय है।

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