12 सितंबर 2016

सुप्रीम कोर्ट ने अभी आन्ध्र-तेलंगाना के एक मामले में फैसला दिया है कि वहां के जो शिक्षक मंत्रियों के निजी सचिव जैसे गैरशिक्षकीय कामों में लगे हुए हैं वे वहां से हटाकर तुरंत पढ़ाने के लिए वापिस भेज जाएं। और यह सोच कोई नई नहीं है, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में मौजूदा मुख्यसचिव ने कुछ समय पहले यह आदेश निकाला था कि जो शिक्षक दूसरे विभागों या पदों पर काम कर रहे हैं उन्हें तुरंत उनके मूल विभाग में भेजा जाए। लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं है।
हम अपने आसपास लगातार यह देखते हैं कि किस तरह शिक्षक अपनी मर्जी से भी कहीं किसी मंत्री के पीए हो जाते हैं, तो कहीं किसी और विभाग में काम करने लगते हैं। इसी तरह का हाल पुलिस का है जो कि अफसरों और मंत्रियों के बंगलों पर फोन उठाते का काम भी करती है, जो मंत्रियों के पीछे खड़े होकर उन्हें मिलने वाले कागज ढोती है, उनकी गर्दनों पर कुछ पलों के लिए शोभा बनने वाली फूल की मालाओं को थामने के लिए पीछे खड़ी रहती है, और बहुत से मामलों में बड़े अफसरों और मंत्रियों के बच्चों और कुत्तों को भी ढोती है। कुछ ऐसा ही हाल डॉक्टरों का भी होता है जो कि स्वास्थ्य विभाग में अफसरों की कुर्सियों पर बैठकर फाइलों की नब्ज देखते हैं, और मरीजों से कट जाते हैं।
अब दूसरी तरफ देखें तो हिन्दुस्तान में आज प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक तमाम ओहदों से यह बात उठती है कि स्किल डेवलपमेंट देश के लिए बहुत जरूरी है, और लोगों को तरह-तरह के हुनर सिखाकर उन्हें अलग-अलग कामों की उत्कृष्टता तक पहुंचाकर ही यह देश आगे बढ़ सकता है। केन्द्र सरकार ने इसके लिए बहुत बड़ा बजट रखा है और राज्यों में भी ऐसा माना जा रहा है कि कौशल उन्नयन नाम की इस योजना से देश का आर्थिक विकास होगा। इसके तहत लोगों को पकाना सिखाया जा रहा है, छापना सिखाया जा रहा है, कम्प्यूटर चलाना सिखाया जा रहा है, या गाड़ी चलाना सिखाया जा रहा है। एक तरफ तो अकुशल लोगों को हुनर सिखाकर उन्हें कुशल श्रमिक या कारीगर बनाने की कोशिश चल रही है, तो दूसरी तरफ भारी सीखे हुए लोग अपने हुनर से परे का काम कर रहे हैं।
शिक्षकों की बात करें तो पूरे देश में शिक्षक बनने के लिए बीएड जैसे डिग्री कोर्स करना जरूरी रहता है, और कुछ बरस के शिक्षण-प्रशिक्षण के बाद ही किसी को शिक्षक बनना नसीब होता है। ऐसा ही हाल किसी के पुलिस सिपाही बनने का रहता है, और दो-तीन बरस की ट्रेनिंग के बाद ही कोई सिपाही बन पाते हैं। डॉक्टर बनने के लिए तो और लंबा समय लगता है, और स्कूल के बाद सात-आठ बरस की पढ़ाई और ट्रेनिंग पाकर ही कोई डॉक्टर बनते हैं। और इसके बाद जब ऐसे लोगों को इनके पेशे और इनके हुनर की खूबियों से परे किसी बाबू या किसी अफसर की तरह फाइलों या फोन पर झोंक दिया जाता है, तो वह देश का खासा बड़ा नुकसान भी होता है।
लेकिन बहुत से मामलों में ऐसे लोग ही उन कुर्सियों पर जाना चाहते हैं जहां पर ताकत होती है, या ऊपरी कमाई होती है। इससे परे कुछ लोग यह भी चाहते हैं कि बड़े शहरों में बने रहें, ताकि दूर-दराज के किसी गांव-जंगल में न जाना पड़े। कुछ मामलों में लोग अपने रिश्तेदार मंत्री-सांसद के स्टाफ में चले जाते हैं, और कुछ मामलों में जात-बिरादरी का असर दिखता है। लेकिन जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कहा है, हमारा ख्याल है कि देश की तमाम राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थाओं को भी इस फैसले को समझते हुए तमाम हुनरमंद लोगों को गैरहुनर वाली कुर्सियों से हटाकर उनके मूल विभागों में वापिस भेजना चाहिए।
ऐसा अगर हो जाता है, तो देश में प्रशिक्षित और शिक्षित लोगों की उत्पादकता सही हो सकेगी। इसके लिए यह भी जरूरी है कि राज्य सरकारें एक नीतिगत आदेश जारी करें कि ऐसी किसी जगह पर किसी चिकित्सक, शिक्षक या पुलिस को तैनात नहीं किया जाएगा जहां पर उनके हुनर की जरूरत न हो। आज किसी मंत्री के बंगले पर फोन उठाने को अगर एक सिपाही तैनात है, तो यह जनता पर इस हिसाब से भी बोझ है कि दस हजार रूपए महीने के काम के लिए एक ऐसा सिपाही लगाया गया है जिसकी सरकार को लागत शायद तीस-चालीस हजार रूपए महीने तक आती है।
लोकतंत्र में जिम्मेदार सरकार वह होती है जो कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के शब्दों से बचकर निकलने की कोशिश न करे, और उसकी भावना को भी समझते हुए उसे लागू करे। भारत में यह एक बड़ी दिक्कत है कि नेता, अफसर, सरकार, या दूसरे ताकतवर तबके अदालत की आंखों में धूल झोंकने के लिए पेशेवर झूठे गवाहों की तरह केस तैयार करते हैं, और यह मानकर चलते हैं कि उनका कार्यकाल बने रहने तक सुप्रीम कोर्ट से उनकी इस झांसेबाजी पर कोई फैसला आ ही नहीं पाएगा। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि सूचना का अधिकार और जनहित याचिका मिलकर एक इतना बड़ा विस्फोटक हथियार जनसंगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को दे चुके हैं कि वे आए दिन देश-प्रदेश की बड़ी अदालतों में कोई न कोई फैसला सरकारों के खिलाफ पा ही जाते हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला आज चाहे केवल शिक्षकों के मामले में आया है, चाहे वह केवल आन्ध्र-तेलंगाना के लिए आया है, लेकिन उसकी भावना को पूरे देश पर लागू होती है, और वह फिर छत्तीसगढ़ रहे, या कि मध्यप्रदेश, इनमें कहीं भी कोई जनसंगठन इस फैसले को लेकर राज्य के हाईकोर्ट में जा ही सकते हैं।
एक दूसरी बात इस सिलसिले में यह है कि स्कूल प्रशासन से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालय प्रशासन तक, शिक्षा-प्रशासन एक अलग किस्म का हुनर है, और इसके लिए राज्य सरकारों को एक अलग काडर बनाना चाहिए, और उसके लिए एक अलग ट्रेनिंग का भी इंतजाम करना चाहिए। जब किसी शिक्षक या प्राध्यापक को शैक्षणिक संस्था के भीतर भी प्राचार्य बनाया जाता है, तो वह जिम्मेदारी शैक्षणिक जिम्मेदारी से परे प्रशासनिक कामकाज की होती है, और उसके लिए वरिष्ठतम शिक्षक में समझबूझ होना मुश्किल भी होता है। कुछ ऐसा ही हाल सरकारी अस्पतालों में होता है जहां सबसे सीनियर डॉक्टर को डीन या सुपरिटेंडेंट बना दिया जाता है, और उनकी प्रशासनिक समझ सीमित रहती है। इसलिए ऐसी संस्थाओं में मुखिया बनने के लिए अलग से एक ट्रेनिंग का इंतजाम भी रहना चाहिए, और इसमें दिलचस्पी रखने वाले शिक्षक या चिकित्सक इसे पाकर फिर मुखिया की जिम्मेदारी के लिए बेहतर तैयार हो सकें।
फिलहाल जरूरत यह है कि शिक्षक, चिकित्सक, और पुलिस को अपने-अपने काम के लिए वापिस भेजा जाए, और मंत्री-अफसर अपने घर-दफ्तर के लिए, विभाग अपनी प्रशासनिक कुर्सियों के लिए दूसरे लोगों का इंतजाम करें।
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