संपादकीय
4 अक्टूबर 2016
भारत और पाकिस्तान के बीच जंग के हालात के बिना भी किसी क्रिकेट मैच को लेकर भी इतना तनाव हो जाता है कि दोनों देशों में कई लोगों को गद्दार कहा जाने लगता है, और देशभक्ति के नए पैमाने तय होने लगते हैं। एक-दूसरे के बारे में कहा जाने लगता है कि वे दुश्मन देश का साथ दे रहे हैं, या अपनी फौज का हौसला पस्त कर रहे हैं। और यह जरूरी नहीं है कि ऐसा नेताओं के बीच ही होता हो, ऐसा इन दिनों सोशल मीडिया की मेहरबानी से आम लोगों के बीच भी होने लगता है, और हो रहा है।
दरअसल दुनिया की सभ्यता का इतिहास बताता है कि राष्ट्रवाद, क्षेत्रवाद, धर्म या जाति के आंदोलन बिना किसी दुश्मन के धारणा के नहीं चलते। जब भारत या किसी भी दूसरे देश में राष्ट्रवाद की एक सोच को भड़काया जाता है, तो वह देश प्रेम की सोच से अलग रहती है। उसके लिए दूसरे देशों से नफरत जरूरी हो जाती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि धर्मान्धता किसी दूसरे धर्म से नफरत, और साथ-साथ विज्ञान से भी नफरत के आधार पर ही चलती है। जब जातिवाद पनपता है, तो वह किसी दूसरी जाति के खिलाफ ही पनपता है। जब क्षेत्रवाद आक्रामक होता है, तो वह अपने क्षेत्र को आगे बढ़ाने पर नहीं टिका होता, वह किसी दूसरे क्षेत्र का विरोध करने पर टिका होता है। इसलिए जब किसी देश में युद्धोमाद को बढ़ावा दिया जाता है, तो वह पड़ोसी देश के साथ तमाम किस्म के रिश्ते खत्म करने पर आमादा हो जाता है। आज भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ इसी तरह की हिंसक-बेवकूफियां चल रही हैं।
पाकिस्तान में चूंकि लोकतंत्र कमजोर है, वहां पर परमाणु युद्ध की बात करने वाले लोग कुछ अधिक हैं। दूसरी तरफ हिंदुस्तान में भी सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोग हैं जो कि अमरीका में प्रोफेसर रह चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान की 10 करोड़ आबादी को खत्म करने के लिए वे हिंदुस्तान के 10 करोड़ लोगों को भी परमाणु युद्ध में खत्म कर देेने को बुरा नहीं मान रहे है। देशभर में ऐसे लोग फैले हुए हैं, जो पड़ोस के देश से कला, साहित्य, खेल, फिल्म, कारोबार, सभी तरह के रिश्ते तोड़ लेना चाहते हैं। और यह दीवानगी सरहद से दूर अधिक रहती है, सरहद के लोग तो आज अपना घर-बार, अपनी फसल, अपने जानवर छोड़कर दूर भेजे जा रहे हैं, और इस नुकसान की भरपाई कोई नहीं करने वाला है। खासकर जो लोग सोशल मीडिया पर रात-दिन युद्धोन्माद की बातें कर रहे हैं, उनका कुछ भी दांव पर नहीं लगा हुआ है। आज जो लोग चीन के सामानों के बहिष्कार की बात कर रहे हैं, उसके संदेश चारों तरफ फैला रहे हैं, वे यह बात भूल गए हैं कि गुजरात में सरदार पटेल की जो दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बन रही है, उसका कुछ हिस्सा चीन से बनकर आ रहा है। उसके लिए भारत ने देशभर के गांव-गांव से लोहा तो इकट्ठा किया गया था, लेकिन उसका इस्तेमाल हो रहा है कि नहीं यह तो पता नहीं, चीन से प्रतिमा का हिस्सा आना सार्वजनिक रूप से मान लिया गया है।
युद्ध की सोच भी खराब होती है, हिंसक होती है, और लोगों के दिल दिमाग को जहर से भर देती है। युद्ध का नुकसान सिर्फ सरहद पर नहीं होता, यह आम लोगों को भी हिंसक बना देता है। इसलिए इस देश में तमाम जिम्मेदार तबकों को आम लोगों के बीच युद्धोन्माद घटाने की कोशिश करनी चाहिए।
दरअसल दुनिया की सभ्यता का इतिहास बताता है कि राष्ट्रवाद, क्षेत्रवाद, धर्म या जाति के आंदोलन बिना किसी दुश्मन के धारणा के नहीं चलते। जब भारत या किसी भी दूसरे देश में राष्ट्रवाद की एक सोच को भड़काया जाता है, तो वह देश प्रेम की सोच से अलग रहती है। उसके लिए दूसरे देशों से नफरत जरूरी हो जाती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि धर्मान्धता किसी दूसरे धर्म से नफरत, और साथ-साथ विज्ञान से भी नफरत के आधार पर ही चलती है। जब जातिवाद पनपता है, तो वह किसी दूसरी जाति के खिलाफ ही पनपता है। जब क्षेत्रवाद आक्रामक होता है, तो वह अपने क्षेत्र को आगे बढ़ाने पर नहीं टिका होता, वह किसी दूसरे क्षेत्र का विरोध करने पर टिका होता है। इसलिए जब किसी देश में युद्धोमाद को बढ़ावा दिया जाता है, तो वह पड़ोसी देश के साथ तमाम किस्म के रिश्ते खत्म करने पर आमादा हो जाता है। आज भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ इसी तरह की हिंसक-बेवकूफियां चल रही हैं।
पाकिस्तान में चूंकि लोकतंत्र कमजोर है, वहां पर परमाणु युद्ध की बात करने वाले लोग कुछ अधिक हैं। दूसरी तरफ हिंदुस्तान में भी सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोग हैं जो कि अमरीका में प्रोफेसर रह चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान की 10 करोड़ आबादी को खत्म करने के लिए वे हिंदुस्तान के 10 करोड़ लोगों को भी परमाणु युद्ध में खत्म कर देेने को बुरा नहीं मान रहे है। देशभर में ऐसे लोग फैले हुए हैं, जो पड़ोस के देश से कला, साहित्य, खेल, फिल्म, कारोबार, सभी तरह के रिश्ते तोड़ लेना चाहते हैं। और यह दीवानगी सरहद से दूर अधिक रहती है, सरहद के लोग तो आज अपना घर-बार, अपनी फसल, अपने जानवर छोड़कर दूर भेजे जा रहे हैं, और इस नुकसान की भरपाई कोई नहीं करने वाला है। खासकर जो लोग सोशल मीडिया पर रात-दिन युद्धोन्माद की बातें कर रहे हैं, उनका कुछ भी दांव पर नहीं लगा हुआ है। आज जो लोग चीन के सामानों के बहिष्कार की बात कर रहे हैं, उसके संदेश चारों तरफ फैला रहे हैं, वे यह बात भूल गए हैं कि गुजरात में सरदार पटेल की जो दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बन रही है, उसका कुछ हिस्सा चीन से बनकर आ रहा है। उसके लिए भारत ने देशभर के गांव-गांव से लोहा तो इकट्ठा किया गया था, लेकिन उसका इस्तेमाल हो रहा है कि नहीं यह तो पता नहीं, चीन से प्रतिमा का हिस्सा आना सार्वजनिक रूप से मान लिया गया है।
युद्ध की सोच भी खराब होती है, हिंसक होती है, और लोगों के दिल दिमाग को जहर से भर देती है। युद्ध का नुकसान सिर्फ सरहद पर नहीं होता, यह आम लोगों को भी हिंसक बना देता है। इसलिए इस देश में तमाम जिम्मेदार तबकों को आम लोगों के बीच युद्धोन्माद घटाने की कोशिश करनी चाहिए।

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