संपादकीय
09 जनवरी 2017

शहरों में आए दिन सड़क किनारे धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रमों का प्रसाद बंटते दिखता है। अपनी आस्था दिखाने के लिए लोग राह चलते लोगों को खिलाते-पिलाते हैं, और लोग हैं कि कुछ आस्था की वजह से, और कुछ मुफ्त मिलने की वजह से ऐसे स्टॉल पर टूट पड़ते हैं। जगह-जगह ट्रैफिक जाम तो होता ही है, यह खाना-पीना खत्म होने के बाद आसपास दूर-दूर तक जूठन बिखरी दिखती है, खाली पत्तल-दोना, प्लास्टिक की गिलासें और तरह-तरह की गंदगी अगली सुबह तक पड़ी रहती है। आयोजकों को लगता है कि वे ईश्वर को खुश करने में कामयाब हो रहे हैं, गरीबों को खाना खिला रहे हैं, भूखों को पेट भर रहे हैं, और ऐसी सोच के चलते गंदगी फैलाने में उन्हें कोई आत्मग्लानि नहीं होती।
अब सवाल यह है कि आस्था का ऐसा प्रदर्शन किस काम का जो किसी ईश्वर और गुरू के नाम पर ऐसी गंदगी छोड़ जाए, कि आस्थाहीन लोग, या भरे पेट वाले लोग वहां से गंदगी को गालियां देते हुए गुजरें? दूसरी बात यह है कि ऐसे जो आयोजक यह समझते हैं कि वे भूखों को खाना खिला रहे हैं, तो वे शहरी गरीबों को तो खाना खिला रहे हैं, लेकिन वे भूखे नहीं होते। शहरों में तो सड़क से गुजरते हुए भिखारी भी भूखे नहीं होते, और शहर में कमाई की जो संभावना रहती है, उसकेचलते हुए ही भिखारी भी किसी वृद्धाश्रम में जाने के बजाय सड़कों पर ही रहना पसंद करते हैं। ऐसे शहरों में जब राह चलते लोगों को भूखा मानकर उन्हें खिलाया जाता है, तो वे मुफ्त का तो जरूर खा लेते हैं, लेकिन वे बेबस भूखे नहीं होते, शहरों में हर किसी को इतनी मजदूरी तो मिल ही जाती है कि उनका पेट भर जाता है।
ऐसे में आस्था का प्रदर्शन करने वालों को अपने ईश्वर या अपने गुरू के सम्मान के लिए कुछ बुनियादी बातों को तय करना चाहिए। पहली बात तो यह कि वे कोई गंदगी छोड़कर न जाएं, दूसरी बात यह कि वे रास्ता जाम न करें, और तीसरी बात यह कि वे इस बारे में भी सोचें कि क्या वे सचमुच गरीबों को खिला रहे हैं, या आम हिन्दुस्तानी अपनी आदत के मुताबिक राह चलते वहां पर कतारों में लग रहे हैं, या भीड़ बढ़ा रहे हैं? अगर सचमुच ही सबसे जरूरतमंद गरीब की मदद करनी है, तो इसके लिए लोगों को शहरों से दूर जाना पड़ेगा, और गांवों में जाकर बुजुर्गों को देखना पड़ेगा। हो सकता है कि शहरों में भी जरूरतमंद बुजुर्ग मिल जाएं, लेकिन हमारी सलाह में एक खतरा भी रहेगा कि ऐसे में आस्था का प्रदर्शन नहीं हो सकेगा।
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