संपादकीय
8 फरवरी 2017

राज्य सरकार खेतों में छोटे-छोटे फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की नीति बना रही है ताकि खेतों की उपज सड़कों पर न फेंकना पड़े। छत्तीसगढ़ पिछले कई बरसों से टमाटर की ऐसी बर्बाद होती हुई फसल देख रहा है, और अब इस बरस तो कई तरह की दूसरी सब्जियां भी सड़कों पर फेंकी गई हैं। पिछले दिनों राज्य शासन ने ऐसा इरादा जाहिर किया था कि फसलों को बचाने के लिए कोल्ड स्टोरेज बनाए जाएंगे, और तब हमने यह सलाह दी थी कि महंगी बिजली पर चलने वाले कोल्ड स्टोरेज सस्ती सब्जी को रखने में बड़े महंगे पड़ेंगे, और उसके बजाय सरकार को फूड प्रोसेसिंग इकाईयां लगानी चाहिए।
उस समय हमने यह लिखा था- एक ऐसा मोड़ है कि सरकार को बाजार के साथ मिलकर यह भी सोचना चाहिए कि इसे खर्चीले कोल्ड स्टोरेज बनाने हैं, या कि फल-सब्जियों और वनोपज की प्रोसेसिंग करने वाले छोटे-बड़े कारखाने? कोल्ड स्टोरेज में किसी सामान को रखना दो हिसाब से खर्चीला होता है, एक तो किसान को तुरंत दाम नहीं मिल पाते और उसके बैंक-कर्ज का ब्याज बढ़ते रहता है, और दूसरी बात यह कि उसे कोल्ड स्टोरेज में उपज रखने का भाड़ा देते रहना पड़ता है। नतीजा यह होता है कि एक वक्त के बाद इस भाड़े को मिलाकर लागत इतनी बढ़ जाती है कि किसान कहीं के नहीं रहते। अभी पिछले हफ्ते ही उत्तरप्रदेश में कुछ जगहों से खबरें आई हैं कि किराए से थके हुए किसानों या व्यापारियों ने कोल्ड स्टोरेज से आलू निकालकर सड़कों पर फेंक दिए और उनके सडऩे से भयानक बदबू फैली और बीमारी फैलने का खतरा खड़ा हो गया है। छत्तीसगढ़ में भी हो सकता है कि सब्जी का यही हाल होने लगे, और किसान आज तो सड़कों पर सब्जी फेंक रहे हैं, या कि मुफ्त में बांट रहे हैं, कल वे कोल्ड स्टोरेज के भी कर्जदार हो जाएंगे।
हमारी सीमित समझ यह कहती है कि दूध, फल-सब्जी, या वनोपज सरीखे सामानों की प्रोसेसिंग के छोटे-बड़े कारखाने अगर राज्य में लगाए जाते हैं, तो उससे स्थानीय रोजगार तुरंत खड़े होंगे, और उपज में इतना वेल्यूएडिशन हो जाएगा कि उससे किसान को दाम ठीक मिलेंगे, और कुछ कारोबारी भी उससे कमा सकेंगे। ऐसी औद्योगिक इकाईयों में लागत भी कम आएगी, और उससे आसपास के इलाकों में फल-सब्जी उगाने का काम एक कमाऊ कारोबार भी हो सकेगा। यह बात समझ लेने की जरूरत है कि ऐसी प्रोसेसिंग इकाईयों का मतलब यह नहीं होता है कि राज्य के भीतर बड़े ब्रांड विकसित हों, और उसके बिना ये इकाईयां किसी काम की न हों। होता यह है कि ऐसी इकाईयां एक कच्चा माल तैयार करती हैं, और इसे बाहर की बड़ी कंपनियां ले जाकर ग्राहक के लायक प्रोडक्ट बनाकर बेचती हैं।
राज्य के भीतर से कोयला निकालकर अगर दूसरे राज्य में ले जाकर बिजली बनाई जाती, तो छत्तीसगढ़ को अधिक कमाई नहीं होती। इस राज्य से लौह अयस्क बाहर ले जाकर बेचा जाता है, तो उससे राज्य को बहुत कम पैसा मिलता है। लेकिन जब कारखाने यहां लग जाते हैं, तो ऐसे वेल्यूएडिशन से कमाई एकदम से बढ़ जाती है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि राज्य के भीतर अलग-अलग इलाकों की पहचान करके ऐसे केन्द्र तैयार करें जहां पर आसानी से फल-सब्जी पहुंचाए जा सकें, और वहां से कच्चा माल भी आसानी से बाहर निकल सके। हमारा ख्याल है कि ऐसी योजनाओं के लिए केन्द्र सरकार का भी भरपूर अनुदान है, और इसे बिना देर किए करना जरूरी है ताकि प्रदेश के फल-सब्जी किसान इस काम को बंद करने की न सोचने लगें। कोल्ड स्टोरेज की सोच उन उपजों के लिए ठीक हो सकती है जिनका बाजार भाव इतना अधिक रहता है कि उन्हें किराया देकर भी रखना फायदे का साबित हो। हमको यह नहीं लगता कि टमाटर-गोभी जैसी सब्जियों को कोल्ड स्टोरेज में रखना मुनासिब होगा, यह किसान को एक और कर्ज में धकेलने का काम हो सकता है, इसके बजाय सरकार को कारखाने लगाना चाहिए।
अब यह एक अच्छी बात है कि सरकार सब्जियों के लिए, या दूसरे किस्म की उपज के लिए फूड प्रोसेसिंग प्लांट को बढ़ावा देने की नीति बना रही है। छत्तीसगढ़ में वनोपज से लेकर औषधीय और सुगंध के पौधों और जड़ी-बूटियों की भरमार है, और इन सबमें वेल्यूएडिशन की संभावनाओं को तलाशकर राज्य के लोगों को बहुत आगे ले जाया जा सकता है।
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