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कॉमेडियन कुणाल कामरा के तंज, और सुप्रीम कोर्ट का रंज, जायज कौन है?

9 जनवरी 2023

 

देश के एक चर्चित और विवादास्पद कॉमेडियन कुणाल कामरा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की याचिकाओं की सुनवाई से मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ ने अपने को अलग कर लिया है। 2020 में जब सुप्रीम कोर्ट ने एक चर्चित और विवादास्पद टीवी एंकर अर्नब गोस्वामी को जमानत दी थी, तब कुणाल कामरा ने जस्टिस चन्द्रचूड़ और सुप्रीम कोर्ट की खिल्ली उड़ाते हुए कई ट्वीट की थीं। अभी जस्टिस चन्द्रचूड़ ने इसलिए अपने को अलग कर लिया क्योंकि अर्नब को जमानत देने वाली बेंच पर वे भी थे। आत्महत्या के लिए उकसाने के एक आरोप में अर्नब गोस्वामी को जिस आनन-फानन तरीके से सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मिली थी, उस पर कुणाल कामरा ने सुप्रीम कोर्ट को सुप्रीम जोक ऑफ द कंट्री कहा था। इसके अलावा कुणाल ने सुप्रीम कोर्ट की एक गढ़ी हुई तस्वीर पोस्ट की थी जिसमें अदालत की इमारत भगवा रंग की दिख रही है, और भाजपा का झंडा उस पर फहरा रहा है। इसके अलावा इस कॉमेडियन ने यह भी लिखा कि जस्टिस चन्द्रचूड़ उस एयरहोस्टेज की तरह हैं जो कि अर्नब को शैम्पेन परोस रहे हैं, और आम मुसाफिर इस इंतजार में हैं कि उन्हें प्लेन में चढऩे भी मिलेगा या नहीं। इस पर जब आपत्ति की गई थी तो कुणाल कामरा ने माफी मांगने से इंकार कर दिया था और कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का सम्मान उसके जैसे कॉमेडियन के ट्वीट से नहीं घटता, बल्कि इस संस्था के अपने कामों से घटता है।

जस्टिस चन्द्रचूड़ का अपने को अलग कर लेना तो ठीक है, लेकिन इससे अभी मुद्दे की बात धरी रह जाती है कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना क्या होती है? और अवमानना का यह कानून कितना जायज है? लोगों को याद होगा कि बरसों पहले एक भूतपूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण और उनके वकील बेटे प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के कई जजों पर भ्रष्टाचार का खुला आरोप लगाया था, और बाद में इसकी अवमानना-सुनवाई भी हुई थी। पिता-पुत्र अपनी बात पर अड़े थे, और उन्होंने किसी भी तरह की माफी मांगने से इंकार कर दिया था। जितना अभी याद पड़ता है उस मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कोई सजा सुनाने से परहेज किया, और वह मामला शायद अब तक ताक पर धरा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के कई जजों के बारे में उस वक्त भी ऐसी चर्चा रहती थी कि वे भ्रष्ट हैं, और चूंकि यह बयान देने वाले देश के दो दिग्गज वकील थे जो कि सार्वजनिक जीवन में भी पारदर्शिता के ऊंचे पैमानों को लेकर काम कर रहे थे, और जो अदालती जवाबदेही की मांग करते हुए लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे, इसलिए सुप्रीम कोर्ट उन्हें आम लोगों की तरह सजा नहीं दे पाया था। अब कुणाल कामरा के मामले से देश में यह भी तय होने जा रहा है कि व्यंग्य को लेकर भारतीय समाज में कितनी सहनशीलता हो सकती है, या नहीं हो सकती है?

दुनिया के अलग-अलग लोकतंत्रों में देश के प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति से लेकर वहां की संसद, अदालतें, वहां के धर्म, सभी को लेकर बर्दाश्त अलग-अलग तरह के रहते हैं। आज हिन्दुस्तान में जिस तरह आए दिन धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने की शिकायत पर बहुत से राज्यों में जुर्म दर्ज हो रहे हैं, उसकी कल्पना भी अमरीका जैसे देश में नहीं की जा सकती जहां धर्मों को लेकर लोगों के अधिकार असीमित हैं। हिन्दुस्तान में धार्मिक भावनाओं को लेकर नौबत ऐसी खतरनाक मानी जाती है कि इस्लाम से जुड़े कुछ लोगों को नाराज कर सकने वाली सलमान रुश्दी की किताब सेटेनिक वर्सेज को हिन्दुस्तान ने तब प्रतिबंधित कर दिया था जब दुनिया के किसी मुस्लिम देश ने भी ऐसा नहीं किया था। देश में अदालतें धर्मालु लोगों से भी अधिक संवेदनशील हैं, और छोटी से लेकर सबसे बड़ी अदालत तक अपने आपको अवमानना के कानून की फौलादी ढाल से घेरकर बैठती हैं। यह बहस भी बहुत समय से चल रही है कि क्या न्यायपालिका की अवमानना का यह कानून खत्म होना चाहिए? लेकिन हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में जिस तबके को अपने सही या गलत कामों के बचाव के लिए जो कानून हाथ लग जाता है, उसे कोई छोडऩा नहीं चाहते। इसीलिए बात-बात में संसद या विधानसभा की अवमानना की बात उठने लगती है, और सदनों में विशेषाधिकार भंग का प्रस्ताव आने लगता है।

अब इसी एक मामले को लें जिसमें रिपब्लिक टीवी के मालिक अर्नब गोस्वामी की अंतरिम जमानत के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। बहुत से लोगों का मानना है कि जिस रफ्तार से अर्नब गोस्वामी को जजों का वक्त पाने का मौका मिला था, वह असाधारण था, और सुप्रीम कोर्ट के सामने बहुत ही आम, दीनहीन या गरीब लोगों के मामले बरसों तक पड़े रहते हैं, लेकिन कुछ चुनिंदा ताकतवर लोगों के मामले बिजली की रफ्तार से अदालती आदेश पाते हैं। ऐसा सिर्फ कुणाल कामरा का ही नहीं मानना है, बल्कि बहुत से लोगों का मानना है। बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के बड़े-बड़े जज भी वकालत के कुछ सबसे बड़े नामों को सबसे पहले बहुत तेजी से सुनने को तैयार हो जाते हैं, और जिन लोगों में इतने बड़े वकीलों की फीस देने की ताकत रहती है, उन्हें जल्द सुनवाई की गारंटी सी हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट को देश में उसकी जो छवि बनी हुई है, उसे एकदम से अनदेखा भी नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में हर बात अदालत के कटघरे से साबित नहीं की जा सकती, और सुबूतों के बिना भी लोग अपनी भावनाएं तरह-तरह से सामने रखते हैं। जनता के बीच, सोशल मीडिया पर, या अखबारों में लिखकर भी लोग जजों और न्यायपालिका के बारे में अपनी बात रखते हैं। अभी-अभी देश के कानून मंत्री ने भी कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से सुप्रीम कोर्ट के तौर-तरीकों से असहमति भी जताई है, और आलोचना भी की है। इन सब बातों को देखते हुए यह लगता है कि अदालतें अपने आपको आलोचना से परे रखने के लिए अगर अवमानना के कानून के पीछे अपने को बचाकर रखेंगी, तो शायद वे अपना भी अधिक नुकसान करेंगी। हो सकता है कि बहुत से लोगों को कुणाल कामरा के कहे हुए शब्द, और उनकी मिसालें जजों के लिए, अदालतों के लिए अपमानजनक लगें, लेकिन यह भी सोचना चाहिए कि कुणाल कामरा के शब्दों से परे यही भावनाएं तो देश के और भी बहुत से लोगों की हैं। आलोचना कहां तक जायज है, और कहां उसे नाजायज या सजा के लायक मान लिया जाए, इसकी कोई सीमारेखा नहीं हो सकती, लोगों को अपने आपको व्यक्ति के रूप में, और एक संस्थान के रूप में लगातार तौलते रहना चाहिए कि उनकी आलोचना कितनी जायज है, और कितनी नाजायज। हम एक अखबार के रूप में लोकतंत्र में आलोचना को अधिक दूर तक आजादी देने के हिमायती हैं, हमारा मानना है कि लोकतंत्र को असहमति के प्रति अधिक लचीला होना चाहिए, अदालतों को भी। हो सकता है कि जजों की आलोचना करते हुए एक कॉमेडियन ने अपने पेशेवर अंदाज में कुछ अधिक चुभती हुई बात कही हो, लेकिन इस पर भी हमारी राय यही रहेगी कि सुप्रीम कोर्ट जजों को बर्दाश्त बढ़ाना चाहिए, और इन आलोचनाओं पर गौर भी करना चाहिए कि क्या कुछ लोगों को सचमुच ही कुछ तरकीबों से जल्द सुनवाई हासिल हो जाती है?

यही सुप्रीम कोर्ट है जिसने अभी हाल के बरसों में ही एक दूसरे मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ उनकी मातहत एक महिला कर्मचारी की यौन शोषण की शिकायत की ऐसी सुनवाई दर्ज की थी जिसमें रंजन गोगोई खुद ही बेंच के मुखिया बनकर बैठे थे। अब अगर आरोपी ही जजों का मुखिया बनकर अपने खिलाफ आरोपों पर इंसाफ करने बैठे तो अदालत की इज्जत तो कम होनी ही थी। देश के किसी छोटे से सरकारी दफ्तर में भी अगर ऐसी शिकायत आई होती, तो क्या आरोपी अफसर को इसकी सुनवाई में बैठने का मौका मिला होता? सुप्रीम कोर्ट और देश की बाकी अदालतों को अपनी आलोचना से इतना अधिक परहेज नहीं करना चाहिए। व्यंग्य की जुबान बोलने वाले लोगों की भावनाओं को भी समझना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

पश्चिम का कार्टून तो महज बहाना है, राष्ट्रवादी-हिंसा को कुछ तो खिलाना है

  16 अक्टूबर 2022

 

स्पेन के एक बड़े अखबार ने अभी भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी की एक रिपोर्ट छापी, और इसकी सजावट में उसने ग्राफ पेपर पर एक संपेरे को बनाया जिसके बीन की आवाज सुनकर मानो आर्थिक विकास सांप की तरह ऊपर उठते जा रहा है। इस रचनात्मक सजावटी चित्र पर भारत के बहुत से लोगों ने घोर आपत्ति की है, और सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ लिखा है कि भारतीय विकास को संपेरे के सांप की तरह दिखाना भारत का अपमान है, और इसका विरोध किया जाना चाहिए। दूसरी तरफ प्रीतीश नंदी जैसे एक समझदार और उदार भूतपूर्व पत्रकार ने ऐसी आलोचना की खिल्ली उड़ाते हुए लिखा है कि कोई किसी का तब तक अपमान नहीं कर सकते जब तक कि लोग खुद ही अपमानित होने पर उतारू न हों। उन्होंने लिखा कि संपेरा दुनिया में जादू का एक बड़ा पुराना प्रतीक है, और स्पेन का यह अखबार भारत के विकास को जादुई मान रहा है। प्रीतीश नंदी ने यह सलाह दी कि आहत होने वाले लोगों के हिन्दुस्तानी झुंड को और बड़ा न किया जाए क्योंकि यह वैसे भी बहुत बड़ा हो चुका है।

हैरानी की बात यह है कि हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े नेताओं ने, केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार के लोगों ने इस कार्टून या सजावटी चित्र का जमकर बुरा माना है। ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान के लोगों का एक बड़ा तबका किसी भी पश्चिमी बात का बुरा मानने के लिए एक पैर पर खड़े किसी बाबा की तरह उतारू रहता है, और वेलेंटाइन डे पर एक चुंबन से भी उसे भारत की सांस्कृतिक विरासत तबाह होते दिखने लगती है। अब हिन्दुस्तान का पश्चिमी दुनिया से पहला संपर्क होने के भी सैकड़ों बरस पहले हिन्दुस्तान के खजुराहो जैसे मंदिरों की दीवारों पर दर्जनों किस्म से संभोग की जो मूर्तियां बनाई गई थीं, और जो आज भी शानदार तरीके से बची हुई हैं, वे मानो इस देश की विरासत ही नहीं हैं। पश्चिम का एक चुंबन, इस देश के इतिहास को कंपकंपा देता है। जिस देश की दीवारें हस्तमैथुन से लिंग के टेढ़े हो जाने के इलाज का दावा करने वाले फर्जी डॉक्टरों के इश्तहारों से भरी हुई हैं, वह देश एक फिल्म में एक किरदार करने वाली अभिनेत्री स्वरा भास्कर की एक उंगली की कल्पना करके कांप जाता है। देश का लिंग हस्तमैथुन से टेढ़ा है, लेकिन ऐसे करोड़ों मर्दों वाला देश एक अभिनेत्री की न दिखने वाली उंगली से कांप उठता है!

हिन्दुस्तान की आबादी का एक हिस्सा बुरा माने बिना अगला खाना नहीं खा पाता। उसे हर बात बहुसंख्यक आबादी के धर्म पर हमला लगती है, इस बहुसंख्यक आबादी के भीतर वर्णव्यवस्था के तहत राज करने वाली ब्राम्हणवादी, सवर्ण सोच पर हमला लगती है। कुल मिलाकर देश की आबादी में मनुवादी व्यवस्था के तहत सबसे ऊपर स्थापित एक बहुत छोटे से तबके की आज की राजनीतिक-सहूलियत की सोच को ही पूरे देश के सभी धर्मों के, सभी जातियों के लोगों की आम सोच बनाने की हिंसक-जिद हिन्दुस्तान के आज के वर्तमान पर बुरी तरह हावी है। कुछ देर के लिए इस बात की कल्पना की जाए कि यह कार्टून या रेखांकन स्पेन के अखबार में छपने के बजाय हिन्दुस्तान के किसी हिन्दू (द हिन्दू नहीं) अखबार में छपा होता तो इसे री-ट्वीट करने के लिए इस सदी की सबसे सक्रिय ट्वीट-आर्मी जुट गई होती। उस वक्त यह राष्ट्रवादी राष्ट्रगौरव करार दिया जाता। लेकिन पश्चिम का हाथ लगते ही यह कार्टून ठीक उसी तरह अछूत हो गया है जिस तरह किसी शूद्र का हाथ लगते ही आज भी कुछ करोड़ लोगों की रसोई अशुद्ध हो जाती है।

हिन्दुस्तान से पश्चिम में जाकर काम करके, कामयाब होकर, वहां बसे हुए उन करोड़ों लोगों से भी हिन्दुस्तान के दकियानूसी लोगों को सबक लेना चाहिए कि पश्चिम में सब कुछ बुरा नहीं है। उस पश्चिम में कम से कम यह बर्दाश्त तो है कि दुनिया भर के अलग-अलग महाद्वीपों से वहां पहुंचने वाले अलग-अलग रंगों और चेहरे-मोहरे वाले लोगों को वहां बराबरी से बर्दाश्त करके आगे बढऩे का मौका दिया जाता है, और यही वजह है कि गोरों के देश में सबसे बड़ी कई अमरीकी कंपनियों के मुखिया हिन्दुस्तानी नस्ल के हैं। जब भारतवंशी ऋषि सुनक के ब्रिटिश प्रधानमंत्री बनने की एक मजबूत संभावना सामने थी, और ब्रिटेन की कंजरवेटिव पार्टी ने ऋषि सुनक को पूरा मौका दिया था, उस वक्त उनकी पार्टी के गोरे-संकीर्णतावादी लोगों ने भी यह बात नहीं कही थी कि कल का काला गुलाम आज अगर उनका प्रधानमंत्री बन जाएगा तो वे सिर मुंडा लेंगे, फर्श पर सोने लगेंगे, और चना खाकर गुजारा कर लेंगे। यह बर्दाश्त ही बहुत से देशों को उनकी संभावना के आसमान तक ले जाती है। अफ्रीका से दो पीढ़ी पहले गए हुए लोगों की औलाद बराक ओबामा की शक्ल में दो-दो बार अमरीका की राष्ट्रपति बनती है, ब्रिटिश प्रधानमंत्री की कुर्सी के करीब पहुंचती है, और पश्चिमी कारोबार पर राज भी करती है। ऐसे पश्चिम के एक कार्टून से जिन हिन्दुस्तानियों का आत्मविश्वास डोलने लगता है, जिनकी इज्जत संपेरे की इस बीन से जख्मी हो जाती है, क्या ऐसा समाज सचमुच ही उन संभावनाओं को छू सकता है, जिनका कि वह हकदार होना चाहिए था? दरअसल राष्ट्रवादी निष्ठा का प्रदर्शन इस कदर बददिमाग और बेदिमाग हो गया है कि वह राह चलते निशाना लगाने को निशाने ढूंढते चलता है। उसे वेलेंटाइन डे के बाद और क्रिसमस-न्यू ईयर के पहले और कुछ नहीं मिला, तो उसने यह कार्टून ढूंढ लिया। किसी चिडिय़ाघर में बंद जानवर की तरह दो वक्त खाना देने की जरूरत हर राष्ट्रवाद को रहती है। हालांकि हिंसक राष्ट्रवाद के सिलसिले में मासूम जानवरों की मिसाल देना उन जानवरों की बड़ी तौहीन है, फिर भी हम दो वक्त खाना देने की मिसाल के तौर पर उनका जिक्र कर रहे हैं। राष्ट्रवाद को अगर नफरत और हमले के लिए हर दिन कुछ न कुछ पेश न किया जाए, तो राष्ट्रवाद धीमी मौत मरने लगता है। इसलिए हिन्दुस्तान के पश्चिम-विरोध पर जिंदा रहने वाले राष्ट्रवादियों ने और कुछ नहीं मिला तो एक मासूम कार्टून को छांटकर धनुष-बाण, त्रिशूल और भालों के सामने पेश कर दिया है।

एक बात तय है कि ऐसी हरकतों से हिन्दुस्तान यह 21वीं सदी खत्म होने तक 19वीं सदी में जरूर पहुंच जाएगा जब यह देश पति खोने वाली महिलाओं को सती बनाकर फख्र हासिल करता था। जिस देश की समसामयिक समझ पाखंड लाद-लादकर इतनी दबा दी जाती है कि वह समझ के इस्तेमाल के मौकों पर भी सिर नहीं उठा पाती, उस देश का कोई भविष्य नहीं होता, कम से कम लोकतांत्रिक मूल्यों के पैमानों पर। और इन पैमानों पर आज की राष्ट्रवादी असहिष्णुता पूरी तरह खोटी साबित हो रही है। 

(Daily Chhattisgarh)

 

मोदी सरकार का यह फैसला हिंदुस्तानी लड़कियों का भविष्य बहुत बदल सकता है

 15 दिसंबर 2021

 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तय किया है कि भारत में शादी के लिए निर्धारित कानूनी उम्र, लड़कियों के लिए भी 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष कर दी जाए। अभी लडक़ों के लिए यह 21 बरस और लड़कियों के लिए 18 बरस है। अब शादी के कानून में संशोधन के लिए यह मामला संसद में जाएगा और संशोधन के बाद यह लागू हो जाएगा। इसके पीछे केंद्र सरकार की बनाई हुई एक कमेटी की सिफारिशें हैं जिसने यह कहा था कि कम उम्र में लड़कियों की शादी होने से वे कम उम्र में मां बनती हैं, और मां-बच्चे दोनों की सेहत पर उससे फर्क पड़ता है। इस कमेटी ने अपनी सिफारिशों में यह भी कहा था कि उसने देश भर में नौजवान पीढ़ी के लोगों से बात की है, जिनमें शहरी और ग्रामीण दोनों किस्म के लोग बराबरी से शामिल किए गए थे, और उस कमेटी का यह कहना था कि शादी की उम्र को लड़कियों के लिए भी 21 बरस कर देना चाहिए। दूसरी तरफ जब यह चर्चा छिड़ी थी उस वक्त कुछ लोगों ने यह कहकर इसका विरोध किया था कि देश के जिन समुदायों में कम उम्र में बच्चों की शादी का चलन है, वहां अभी भी 18 बरस से कम उम्र के बच्चों की शादी करने पर वे शादियां कानून में अवैध करार दी जाती हैं, और ऐसे में अगर लड़कियों की उम्र भी 21 वर्ष कर दी जाएगी तो अवैध या गैरकानूनी करार दी जाने वाली शादियां अधिक हो जाएंगी और लोगों को कानून तोडऩे वाला माना जाएगा जो कि अच्छी बात नहीं होगी। इस समुदाय का यह भी तर्क था कि भारत में तो आज भी एक चौथाई शादियां तय की गई उम्र से कम उम्र में ही होती हैं, और कानून से इसमें कोई गिरावट नहीं आ रही है, इसमें जो बहुत मामूली गिरावट आ रही है वह लड़कियों के लिए पढ़ाई-लिखाई के मौके बढऩे से और उनके कामकाज की संभावनाएं बढऩे से आ रही है।

यह मामला बड़ा ही जटिल है और सीधे-सीधे इस फैसले का समर्थन या इसका विरोध करना इस मुद्दे का अतिसरलीकरण होगा जो कि ठीक नहीं रहेगा। भारत में बाल विवाह एक समय तो गरीब और अमीर सभी तबकों के बीच चलता था लेकिन हाल के दशकों में यह गरीबों के बीच अधिक होता है। इसकी एक वजह होती है कि जहां मां-बाप दोनों मजदूर रहते हैं, दोनों काम करने बाहर जाते हैं, वहां मजदूर बस्ती में या किसी अकेले झोपड़े में किसी लडक़ी को छोडक़र जाना खतरे का मामला लगता है। भारत में जितनी बड़ी संख्या में बलात्कार दर्ज हो रहे हैं उन्हें देखते हुए मां-बाप दहशत में भी रहते हैं, इसलिए भी वे चाहते हैं कि कम उम्र में लडक़ी की शादी हो जाए ताकि बिना किसी विवाद के, बिना किसी हंगामे के, लडक़ी अपने ससुराल चली जाए और उसके बाद वह अपने पति और ससुराल की जिम्मेदारी रहे। इस सोच में कुछ बहुत गलत भी नहीं है क्योंकि यह गरीबी की बेबसी पर उपजी हुई सोच है जिसे इस बेबसी के खत्म होने तक बदलना मुमकिन नहीं है। दूसरी तरफ आज देश के एक बड़े हिस्से में लड़कियों की पढ़ाई के मौके बढ़ रहे हैं, वे स्कूलों में पढऩे के बाद कॉलेजों में अधिक संख्या में जा रही हैं, और कामकाज करने के लिए भी लड़कियां बड़ी संख्या में आगे आ रही हैं। ऐसे में 18 बरस की उम्र के बाद अगर कानूनी शादी करना मां-बाप के हाथ में रहता है तो लडक़ी की अधिक पढ़ाई के बिना, लडक़ी के कामकाज या रोजगार की संभावनाओं के बिना उसकी शादी कर दिए जाने की आशंका ही अधिक रहती है। यहां पर गरीब मां-बाप जैसी बेबसी तो नहीं रहती है, लेकिन संपन्न मां-बाप के लिए भी यह जरूरी नहीं रहता कि लडक़ी इतना पढ़े कि वह किसी कामकाज के लायक हो सके, और ऐसे बहुत से मामलों में जल्द शादियां हो जाती हैं। ऐसे मामलों में शादी की उम्र बढ़ जाने से लड़कियों के अधिक पढऩे की एक संभावना तो पैदा होगी ही, लड़कियों के 21 वर्ष के बाद शादी होने से, उसके बाद ही उनके मां बनने से, जच्चा-बच्चा दोनों की सेहत पर एक सकारात्मक असर पड़ेगा जो कि छोटी बात नहीं रहेगी। जैसा कि चिकित्सा वैज्ञानिकों और समाज शास्त्रियों का अध्ययन कहता है कि लड़कियों की शादी की उम्र 3 वर्ष बढ़ जाने से उनका कम उम्र में मां बनना बंद होगा और देश की शिशु मृत्यु दर, मातृ (जननी) मृत्यु दर भी घटेगी, बच्चों में कुपोषण भी घटेगा, क्योंकि कम उम्र की मां अपने बच्चे को बेहतर पोषण नहीं दे पाती है। इसलिए लडक़ी की पढ़ाई-लिखाई के हिसाब से, उसके कामकाज और रोजगार की संभावनाओं के हिसाब से, और उसके मां बनने के हिसाब से भी, आयु सीमा को बढ़ाया जाना एक अच्छा फैसला लगता है। भारत में क्योंकि समाज व्यवस्था ऐसी है कि स्कूल कॉलेज में सेक्स एजुकेशन से परहेज किया जाता है, और कम उम्र की लड़कियों को शादी के बाद की शारीरिक जिम्मेदारियों की इतनी समझ नहीं रहती, इसलिए भी 18 बरस के बजाय 21 बरस की उम्र बेहतर लग रही है।

लेकिन अब सवाल यह रहता है कि देश की आधी आबादी जितनी गरीब है और उस तबके में अगर किसी लडक़ी के मां-बाप दोनों ही मजदूर हैं या बाहर काम करते हैं तो वहां पर किस तरह लडक़ी का ख्याल रखा जा सकेगा? इस कड़वी सामाजिक हकीकत को अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा। बच्चियों की सामाजिक सुरक्षा पर अधिक ध्यान देने के साथ-साथ यह भी सोचना होगा कि शादी की उम्र को 3 बरस बढ़ाने के बाद गरीब बच्चियों के लिए 18 से 21 वर्ष की उम्र तक क्या-क्या पढऩे और सीखने के लायक संभावनाएं सरकार मुहैया करा सकती है? सरकार की जिम्मेदारी संसद में उम्र बढ़वाने के संविधान संशोधन तक नहीं है, इससे बढ़ी हुई उम्र का बेहतर इस्तेमाल कैसे हो सकता है यह भी देखना होगा, और इससे भारत में एक बहुत बड़ी कामयाबी भी हासिल हो सकती है। जच्चा-बच्चा की सेहत अपने-आपमें एक बड़ी कामयाबी रहती है और उसके अलावा अगर लडक़ी की पढ़ाई-लिखाई, उसके रोजगार, उसके शिक्षण-प्रशिक्षण में इन 3 वर्षों में कोई महत्वपूर्ण बात जोड़ी जा सकती है, तो उससे भारत की लड़कियां अधिक आत्मनिर्भर भी हो सकेंगी। आज भी देश में एक चौथाई शादियां 18 वर्ष से कम उम्र में हो रही हैं, उन्हें भी सरकार को ठीक से रोकना होगा और 3 बरस की यह बढ़ी हुई जिम्मेदारी मोटे तौर पर राज्य सरकारों पर आएगी कि 21 बरस के पहले लडक़ी की शादी ना हो सके।

अब हम नौजवान पीढ़ी के दिल-दिमाग की बात करें तो उनके लिए भी यह फैसला इसलिए बेहतर है कि पुराने वक्त में तो कम उम्र में शादियां हो जाती थीं, और लड़कियां एक गुलाम की तरह ससुराल चली जाती थीं, और शादियां किसी तरह से निभ जाती थीं। आज हालत यह है कि लड़कियां कुछ पढ़-लिखकर शादी करती हैं, लेकिन उनका रोजगार शुरू होने के पहले शादी हो जाती है, और शादी के बाद अगर उनकी कोई महत्वाकांक्षा कुचलने से बची रहती है तो शादियों में कभी-कभी दिक्कत भी आती है। इसलिए 18 बरस के बजाय 21 बरस की उम्र में शादी लड़कियों के लिए इसलिए बेहतर होगी कि वे तब तक मानसिक रूप से अधिक परिपच् हो चुकी रहेंगी, दुनिया को अधिक देख चुकी रहेंगी, और शादी में उनकी अपनी मर्जी भी कुछ हद तक काम कर पाएगी। 18 बरस की लडक़ी के मुकाबले 21 बरस की लडक़ी पर मां-बाप की मनमर्जी कुछ कम हद तक चलेगी, इससे समाज का परंपरागत ढांचा तो निराशा होगा, लेकिन इससे लड़कियों का भला होगा। कुल मिलाकर आखिर में कहने के लिए यही एक बात रह जाती है कि गरीब परिवारों में बेबसी में लड़कियों की जो शादी कम उम्र में की जाती है उस बारे में क्या होगा इसकी फिक्र करनी चाहिए, और देश की संसद और विधानसभाओं में इसकी फिक्र कम हो पाएगी क्योंकि वहां गरीब ही कम बच गए हैं, लगभग नहीं।

(Daily Chhattisgarh)

बेवकूफ कौन?


7 सितंबर 08
किसको बेवकूफ कहा जा सकता है और किसे नहीं इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी एक व्याख्या दी है। मध्यप्रदेश का एक मामला था जिसमें एक व्यक्ति ने अपने दादा ससुर की हत्या कर दी थी और बाद में इस आड़ में बचने की कोशिश की थी कि वह बेवकूफ है। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को कायम रखते हुए इस बात की परिभाषा की कि कौन बेवकूफ माना जा सकता है, किसे बेवकूफ कहा जा सकता और किसे नहीं। इसके बाद में अब कोई अपने-आपको शायद ही बेवकूफ साबित कर सकेगा।
अदालत ने कहा है कि किसी व्यक्ति को तब बेवकूफ माना जा सकता है जब वह बीस तक गिनती न गिन सके, जिसे हफ्ते के दिनों के नाम याद न हो या जिसे अपने मां-बाप का नाम याद न हो। अभी तक भारतीय कानून के मुताबिक ऐसे लोग जो कि सामान्य मानसिक स्थिति के नहीं हैं या  जिनको अपने अपराध की प्रकृति का अंदाज न लग सकता हो उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अभी सुप्रीम कोर्ट ने केवल चार ऐसे दर्जे माने हैं जिनमें आने वाले लोगों को मानसिक रूप से अस्वस्थ (अनसाऊंड) गिना जाएगा- बेवकूफ, बहुत बीमार, विक्षिप्त, और नशे में धुत्त। अदालत का मानना है कि वह व्यक्ति बेवकूफ है जिसे अपने जन्म का ठीक से याद नहीं है।
यह देश की सबसे बड़ी अदालत का एक और ऐसा फैसला है जिसमें अनपढ़, मानसिक रूप से अस्वस्थ और मूर्ख या बेवकूफ को एक साथ गिनकर अदालत में एक गलत सोच सामने रखी हो। ऐसा करके जजों ने एक गलती की है और इससे उनका शहरी आभिजात्य नजरिया सामने आता है। जो व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है वह बेवकूफ जैसी किसी गाली का हकदार नहीं हो सकता। उसे तो हमदर्दी की जरूरत है और उसे मूर्ख या ईडियट कहना तो उसे और अधिक बीमार करने का काम होगा।  इसी तरह किसी विक्षिप्त या धुत्त को किसी बहुत बीमार के साथ जोड़कर रखना भी ठीक नहीं है। एक बड़ी दिक्कत सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, व्याख्याओं के साथ या टिप्पणियों के साथ यह रहती है कि उन्हें जब तक संसद कानून बनाकर खारिज न करें वे अपने-आपमें कानून की तरह रहते हैं और तमाम निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शन का काम भी करते हैं।
मैं इस बात को बिल्कुल भी सही नहीं मानता कि किसी व्यक्ति को बीस तक गिनती गिनना आए तभी वह ठीक है वरना वह बेवकूफ है। इसी तरह हफ्ते के दिन सबको याद रहें यह भी जरूरी नहीं है। देश की एक बहुत बड़ी आबादी बहुत अनपढ़ लोगों की है और करोड़ों बच्चे स्कूल की उम्र में पहुंचने के बाद भी सड़कों पर भटकते हुए किसी तरह दो वक्त की रोटी पाते हैं उनको इन दोनों ही बातों से क्या लेना-देना और जहां तक मां-बाप के नाम मालूम होने का सवाल है तो बहुत से ऐसे लोग हैं जिनको अपने मां-बाप देखना ही नसीब नहीं होता या जो घर छोड़कर कम उम्र में निकल जाते हैं और रेलवे प्लेटफार्म या फुटपाथ पर जिंदगी गुजारते हैं उनसे भला यह उम्मीद भला कैसे की जा सकती है कि वे अपने मां-बाप का नाम जानें या याद रखें।
देश में शहरी और ग्रामीण इलाकों के सभी तरह के सांस्कृतिक मूल्यों में एक बहुत बड़ा फर्क है। जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को बहुत से लोग इसलिए नासमझ मानते हैं कि उन्होंने स्कूल या कॉलेज की औपचारिक शिक्षा नहीं पाई है। जबकि समझदारी का किसी भी तरह की शिक्षा से अनिवार्य रूप से कोई लेना-देना नहीं रहता। बहुत से अनपढ़ लोग पढ़े-लिखे लोगों के मुकाबले अधिक उदार, समझदार और बेहतर इंसान रहते हैं। उनके जीवन मूल्य दूसरे लोगों के मुकाबले बेहतर होते हैं। वे दूसरों का शोषण करने वाले नहीं रहते और न ही दूसरों के हिस्से का खाते हैं।
ऐसे में मूर्ख, बेवकूफ या ईडियट के लिए इस तरह का एक पैमाना सुप्रीम कोर्ट का बनाना बहुत ही नाजायज और गलत है। कानून और संविधान की व्याख्या करना जिनके हाथ में है उनको कुछ अधिक सावधानी से अपने शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए। आज जिसने इस देश की निक्कमी सरकारों की मेहरबानी से करने का मौका ही नहीं पाया है उसे क्या तो कोई साधारण व्यक्ति और क्या सुप्रीम कोर्ट, कोई किस हक से उसे बेवकूफ कह सकता है। मेरा तो यह मानना है कि इस देश में लोकतंत्र को हांकने के लिए तीन चक्कों की यह जो लोकतांत्रिक गाड़ी बनी है उस गाड़ी की असफलता से लोग आज ऐसे हैं कि वे बीस तक गिनती नहीं गिन सकते, हफ्ते के दिन जिन्हें नहीं मालूम है और जिनको मां-बाप के नाम नहीं मालूम हैं। आज ऐसे लोकतांत्रिक पहियों में से एक, उसके तले कुचलने वाले लोगों को बेवकूफ कह रहा है। अगर इस गाली का असली हकदार और वारिस तलाशना है तो लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने बीच जिम्मेदारी तय करनी चाहिए कि उनमें से कौन इसका विजेता है।
हम अनंत काल से यह देखते आ रहे हैं कि भारत में अनपढ़, बीमार, विचलित लोगों के बारे में एक परले दर्जे की हिकारत बोलचाल की भाषा में बनी रहती है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए और इन सबको एक साथ एक जगह रखने, गिनने और गाली के लायक समझने की सोच को मैं बहुत ही आपत्तिजनक मान रहा हूूं। सुप्रीम कोर्ट के सामने आने वाले हर मामलों की व्याख्या में उसे इस हद तक नहीं जाना चाहिए कि वह बहुत से दूसरे कमजोर और बेजुबान तबकों के हितों के खिलाफ चला जाए। यह सिलसिला खतरनाक है। इसलिए यह और अधिक खतरनाक है कि आज अदालत की मर्जी के खिलाफ कहीं पर खड़े होने के पहले वकील भी यह देखते हैं कि इससे अदालत और अधिक नाराज तो नहीं हो जाएगी। ठकुरसुहाती के अंदाज में बहुत से वकील बड़ी अदालतों के खिलाफ तब तक खड़े नहीं होते जब तक कि उनके बड़े हित ऐसे मामलों में न जुड़े हों। अब बीमार और विचलित और अनपढ़ भला क्या खाकर ऐसे बड़े वकील करेंगे जो कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के खिलाफ वहां जाकर तर्क करे। इन दिनों देश की न्यायापालिका जनहित याचिकाओं के लिए बहुत अधिक उदार भी नहीं है। वरना मेरी तरह के कुछ लोग जो लिखते हैं उन बातों को पढ़कर भी अदालतें अपने फैसलों या अपने से निचली अदालतों के फैसलों के बारे में फिर से सोच सकती थीं।
जिन लोगों को अदालत से खौफ न लगता हो ऐसे लोगों को चाहिए कि  वे अदालत के शहरी शिक्षित और कुलीन पूर्वाग्रह के बारे में चर्चा करने की कोशिश करें। जिस बात को लेकर मैंने आज यहां लिखा है वह लोगों को ऐसी महत्वपूर्ण बात शायद न लगे। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की गाली का एक हकदार लोग मुझे भी मान सकते हैं।

- सुनील कुमार

हमदर्दी के फेर में चर्चा रंगा-बिल्ला की

24 अगस्त 07

कई दिनों बाद एक करीबी परिचित से मुलाकात हुई जो पिछले दिनों नौ दिन तक पूरी धार्मिक गंभीरता से एक योग शिविर में शामिल रहे इसलिए उनसे बात-मुलाकात काफी दिनों बाद हो पाई और वे इस शिविर के फायदों से लबालब भरे हुए थे। वे एक आस्थावान सज्जन व्यक्ति हैं और मैं एक आस्थाहीन हूं, इसलिए हमारी बातचीत कई बार केवल मेरी जानकारी बढऩे तक सीमित रह जाती है, मैं उनकी बातों का पूरा फायदा नहीं उठा पाता। लेकिन आस्था से परे की कुछ साधारण बातें इस बार मुझे उनसे ऐसी सुनने मिलीं कि जो तर्कों की कसौटी पर भी, मनोवैज्ञानिक आधार पर भी मुझे फायदे की लगीं।
इस योग शिविर में आए हुए एक व्यक्ति जो धार्मिक या आध्यात्मिक या यौगिक बातों को सिखा पाते हैं उन्होंने कुछ छोटी-छोटी नसीहतें वहां गए लोगों को दीं। इनमें से एक तो यह थी कि लोगों को पूरे समय सकारात्मक बातें सोचनी चाहिए। मिसाल यह कि कोई बीमार अगर पूरे समय अपनी बीमारी की बात ही सोचता रहे तो शायद उसकी बीमारी बढ़ती चलेगी। दूसरी तरफ अगर वह यह सोचता रहे कि उसकी बीमारी कम हो रही है तो वह ठीक होने की तरफ बढ़ते चलेगा। यह लोगों के आत्मबल, आत्मविश्वास पर आधारित एक स्वचिकित्सा भी हो सकती है और मनोविज्ञान तो ऐसे फायदे गिनाता ही है। दूसरी नसीहत इस शिविर से वे लेकर आए थे मन में लोगों के खिलाफ गांठ बांधकर न रखने की। उन्हें वहां पर कहा गया कि जिन लोगों के प्रति मन में नाराजगी या कटुता है उसे निकालने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि यह धीरे-धीरे इक_ïा होकर बड़ी गठरी बन जाती है और उसका बोझ पूरे समय उसी इंसान पर रहता है।
इस तरह की कुछ और बातें भी थीं जो कि उस संन्यासी या योगी के सीधे संपर्क में आए बिना भी शिविर से होकर लौटे इन सज्जन के मार्फत मैं सुन रहा था और समझ रहा था। लेकिन इसके साथ-साथ रोज की जिंदगी में होने वाली कुछ बातें भी मन में उमड़-घुमड़ रही थीं।
होता यह है कि किसी किस्म की नाराजगी या कडुवाहट को भुलाने की तमाम कोशिशें बार-बार नाकामयाब होने के करीब पहुंच जाती हैं जब आपसे मिलने वाले लोग अपनी हमदर्दी जाहिर करने के लिए अकसर इस कोशिश पर उतारू हो जाते हैं कि आपको आपका दर्द याद दिलाएं। आपने कोशिश करके अगर अपने दर्द को भुलाने में सफलता पा ली है तो भी लोग आकर पहले आपके उन सोए पड़े जख्मों को कुरेदते हैं और फिर दर्द पर्याप्त उठ जाने पर अपना लाया मरहम लगाकर आपके करीब आते हैं या आपसे घरोबा साबित करते हैं। मैं यह भी नहीं कहता कि इनमें से हर कोई किसी खास मकसद से ऐसा करता है। हो सकता है कि बहुत से लोग इसलिए ऐसी हमदर्दी को जरूरी समझते हैं कि ऐसा जाहिर न करना सामाजिक शिष्टïाचार के खिलाफ लगेगा। लेकिन आए दिन जब ऐसा शिष्टïाचार बरस-दर-बरस जारी ही रहता है तो मामला गड़बड़ाता है।
मेरे पास आने वाले या कहीं मुझसे मुलाकात के दौरान जब कुछ लोग मेरे कुछ ऐसे जख्मों को कुरेदकर या बिना कुरेदे उन पर अपनी डिब्बी का मरहम लगाने की कोशिश करते हैं, जिन जख्मों से मैं आजाद हो चुका हूं तो हाथ जोड़कर उन्हें मैं कहता हूं कि मैं इस बारे में किसी बात को न सुनना चाहता, न इस बारे में मेरे पास कहने को कुछ है और न ही मैं इस चर्चा में मजा पाता। ऐसा सुनकर कुछ लोग बहुत निराश होते हैं क्योंकि उनका मरहम इस्तेमाल नहीं हो पाया, कुछ लोग बात को तुरंत समझ जाते हैं कि इस बारे में अधिक चर्चा बातचीत को किसी किनारे नहीं ले जा पाएगी और कुछ लोग जो मेरे हिसाब से अधिक समझदार हैं वे अप्रिय चर्चाओं से बचे ही रहते हैं।
मेरा यह मानना है कि पटरी पर पड़ी अपने बीते दिनों की लाशों के करीब रोते बैठने से कोई भी इंसान किसी मंजिल पर नहीं पहुंचता। बीते दिन ही क्यों अपने घर के बुजुर्ग की मौत के बाद भी किसी की दुनिया नहीं रूकती और लोग तेरह दिन पूरे होते न होते इस गम से उबरकर आगे बढऩे की सोचने लगते हैं। व्यापारी तबके से कुछ और अधिक सीखने की जरूरत लगती है जिनमें मौत के बाद दूसरे दिन उठावना करके तीसरे दिन से काम-धंधा शुरू कर दिया जाता है। लेकिन जब कोई बरसों तक आपको आपके बीते दिनों की उस लाश की तस्वीर दिखा-दिखाकर दुखी करे ताकि आपके आंसू बहें और उसका रूमाल काम का साबित हो, तब इन लोगों को कुछ रूखी जुबान में भी समझाना पड़ता है।
मेरे एक करीबी जब बरसों बाद भी इस हरकत से बाज नहीं आए और मेरी रूखी बातें भी उनके उत्साह को सुखा नहीं पाईं तो फिर मैंने उनसे एक दिन कहा कि संजय और गीता चोपड़ा के मां-बाप से हमदर्दी जाहिर करने के लिए अगर इतने बरस बाद भी कोई जाकर रंगा-बिल्ला को कोसेगा और गालियां देगा तो उससे रंगा-बिल्ला का कुछ नहीं बिगड़ेगा, अगर कुछ बिड़ेगा तो वह स्वर्गीय संजय और गीता चोपड़ा के मां-बाप का दिन बिगड़ेगा और मन बिगड़ेगा। मैंने उसने साफ-साफ यह बात भी कही कि अगर कोई शाकाहारी व्यक्ति है तो उसकी मेहमाननवाजी करने के फेर में उसे महंगे-महंगे मांसाहारी पकवान परोसने से कोई फायदा नहीं होता। मेरी इस बात को उनको शुरू में ही समझ लेना था कि मैं शाकाहारी हूं, या रंगा-बिल्ला की यादों की गठरी को मैं ढोना नहीं चाहता।
इस बात को आज यहां लिखना इसलिए सूझा कि कड़वी यादों को लेकर जो नसीहत एक योग शिविर में यहां लोगों को दी गई, मैं उनसे वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रूप से सहमत रहते आया हूं। किसी किस्म के करिश्मे और आलौकिक शक्तियों पर मेरी कोई आस्था नहीं रही है लेकिन किसी के जख्मों के निशान को कुरेदकर फिर वहां के लिए मरहम बेचने के खिलाफ मैं हमेशा से रहते आया हूं। यह बात इसलिए लिखना ठीक और जरूरी लग रहा है कि मेरी तरह के बहुत से लोग होंगे जो अपने जख्मों को या तो भुला चुके होंगे या भुलाने की कोशिश में होंगे और हमदर्द होंगे कि उन्हें याद दिलाने पर उतारू हों। हर समझदार इंसान को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हमदर्दी कभी-कभी ऐसे लोगों पर भारी भी पड़ती है जो अपने दर्द से उबर चुके हैं।
भारत में जिस तरह लोग किसी से पहली मुलाकात में ही उसके पारिवारिक जीवन के बारे में पूछने पर उतारू हो जाते हैं, दूसरी मुलाकात में उसकी कमाई या तनख्वाह तक पहुंचते हैं, उसी तरह यहां के अधिकांश प्रदेशों या संस्कृतियों के लोग आनन-फानन दूसरों के अंदरूनी मामलों तक पहुंच जाते हैं। फिर जिस सिलसिले में यह बात चल रही है उसमें दुश्मन के दुश्मन के अपने-आपको आपका स्वाभाविक दोस्त मान लेते हैं। अगर आप मन में दुश्मनी न भी रखना चाहें तो भी ऐसा चाहने वाले लोग कम नहीं रहते जो चाहें कि आप अपने भूतपूर्व दुश्मन को वर्तमान दुश्मन और भावी दुश्मन बनाए रखें क्योंकि इसके बिना वे (दुश्मन के दुश्मन) कैसे आपके दोस्त हो पाएंगे? यह पूरा सिलसिला बहुत नुकसानदेह है और धर्म, आध्यात्म, योग, जिस किसी आधार पर भी कटुता को भुलाने की बात होती हो वह नसीहत सही है।
- सुनील कुमार

मेरे बाद मैं!

10 अगस्त 08

कई बरस पहले जब दुनिया में पहली भेड़, डॉली क्लोनिंग से पैदा हुई थी तब विज्ञान कथाएं सच होती लगी थीं। बिना नर और मादा के मेल के सिर्फ मादा के शरीर से ही एक सेल (कोशिका)लेकर क्लोनिंग की तकनीक से प्रयोगशाला में एक एम्ब्रियो तैयार कर लिया जाए और उससे उस मादा को गर्भवती कर दिया जाए तो होने वाला बच्चा पूरी तरह से उस कोशिका वाले इंसान की तरह होगा। इस तकनीक के बारे में पहले कई बार लिखा जा चुका है और दुनिया का विज्ञान और समाज इस बात को लेकर भयभीत भी थे कि अगर कोई तानाशाह क्लोनिंग से अपने ही किस्म की हजारों औलादें बनवा डालेगा तो पता लगेगा कि जॉर्ज बुश के हमशक्ल, लेकिन उम्र में उससे 25-50 बरस छोटे हजारों लोग घूम रहे हैं और घूम-घूमकर सद्दाम हुसैन की हजारों हमशक्ल औलादों को मारने की कोशिश कर रहे हैं। एक तानाशाह और एक महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक का मेल ऐसा कोई भी दिन दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर सकता है। इन दोनों की कोई नैतिकता नहीं होती, विज्ञान एक बेसमझ, बेसरोकार औजार ही बनाता है और तानाशाह का तो कोई सरोकार होता नहीं।
बहुत बरस पहले मैंने क्लोनिंग के खतरों की कल्पना करके लिखा था कि एक दिन ऐसा आ सकता है जब लोग सबसे महान और सबसे सफल लोगों की क्लोनिंग करके वैसी ही औलादें पैदा करने में जुट जाएं। मतलब यह कि आज जिस तरह कोई अरबपति अपनी बेटी की शादी में करोड़ों का दहेज देता है उस तरह कल कोई अरबपति कुछ करोड़ खर्च करके ऐश्वर्या राय के बदन का एक सेल शायद खरीद ले और उससे ऐसी संतान पैदा करवा ले जिसके लिए किसी दहेज को देने की जरूरत भी न पड़े। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो सबसे सफल खिलाडिय़ों की क्लोनिंग करवाकर यह उम्मीद कर सकते हैं कि ओलंपिक में गोल्ड मैडल पाने वाले उनके खिलाडिय़ों के क्लोन आगे भी अपने देशों के लिए गोल्ड मैडल की संभावना  बढ़ाते चलेंगे। कोई यह कल्पना भी कर सकता है कि न्यूटन और आइंस्टीन के क्लोन जब एक साथ एक प्रयोगशाला में काम करेंगे तो विज्ञान कई गुना अधिक रफ्तार से आगे बढ़ेगा। विज्ञान कथाएं जब सच होने लगती हैं तो कल्पना की उड़ान छोटी पडऩे लगती हैं। क्लोनिंग कुछ इसी तरह की नाटकीय और रोमांचक संभावनाओं वाली तकनीक है जिसके चलते हो सकता था कि गांधी और नेहरू के क्लोन अब तक कायम रहते, यह एक और बात है कि इनमें से हो सकता है कोई सांसद खरीदने में लगे रहता और कोई बिकने को शो-केस में खड़ा रहता।
इस मुद्दे पर आज लिखने को दिल इसलिए कर रहा है कि दुनिया में अभी पहली बार पालतू पशुओं की व्यावसायिक क्लोनिंग हुई है। इसके पहले तो वैज्ञानिक जरूरतों के लिए या सरकारी प्रयोग के लिए ऐसा हुआ था लेकिन अभी अमरीका में कैलिफोर्निया में बसीं एक किसान महिला ने अपने कुत्ते के पाँच क्लोन तैयार करवाए, इनकी लागत उसे 50 हजार डॉलर (लगभग 20 लाख रुपए) आई है। उसने यह काम दक्षिण कोरिया की एक प्रयोगशाला में करवाया और वहां उसने राजधानी सियोल में एक प्रेस कांफे्रंस में बहुत खुशी के साथ इसकी घोषणा की। उसका कहना है कि  पिट बुल टेरियर नस्ल के उसके कुत्ते, बूगर, के हमशक्ल क्लोन पाना उसके लिए इस दाम पर बहुत सस्ता है। कई बरस पहले वह बूगर को सड़क पर घूमते पाकर एक दूसरे कुत्ते के हमले से बचाकर लाई थी और इस दौरान उस दूसरे कुत्ते के हमले से वह अपना एक हाथ लगभग खो चुकी थी। इस हाथ के ऑपरेशन के बाद बूगर उसके लिए कई तरह के काम करने लगा जिनमें कपड़े निकालकर लाने से लेकर फ्रिज से बोतल निकाला, दरवाजे खोलना और जूते उतारने जैसे काम शामिल थे। उसका कहना है कि वह अपने इस दोस्त को वापिस चाहती थी और जब उसे कैंसर हुआ तो उसने बूगर की चमड़ी के कुछ सेल निकलवाकर सुरक्षित रख लिए थे और सियोल की राष्टï्रीय यूनिवर्सिटी की प्रयोगशाला में इन सेल्स से एम्ब्रियो बनाए जिन्हें अलग-अलग माता कुत्तों में डाला गया और 28 जुलाई को ये बच्चे हुए। कोरियन वैज्ञानिकों का कहना है कि वे इसके पहले कुत्तों के क्लोन बना चुके थे लेकिन वे रिसर्च और सरकारी उपयोग के लिए थे। जैसे कि सरकार के लिए खोजी कुत्ते तैयार करना। इस बार की इस निजी क्लोनिंग की फीस डेढ़ लाख डॉलर से घटाकर एक तिहाई इसलिए की गई क्योंकि जो कंपनी इस व्यवसाय को आगे बढ़ाना चाहती है उसने प्रचार पाने के लिए यह घाटा उठाया और अब वह पालतू पशुओं की क्लोनिंग की बुकिंग शुरू कर रही है।
कुदरत ने दुनिया को जितनी विविधता वाला बनाया है, क्लोनिंग की तकनीक सैद्घांतिक रूप से उस विविधता को पूरी तरह खत्म करने का खतरा लेकर आई है। इससे सबसे अच्छी नस्ल के पशु-पक्षी, सबसे सफल या होशियार इंसान, सबसे सुंदर, सबसे ऊंचे, सबसे गंठीले लोगों के क्लोन तैयार होने का खतरा बढ़ते चले जाएगा। फिर जो संपन्न और सफल लोग आत्ममुग्ध होंगे वे अपनी संतान के कम सफल या असफल होने का खतरा उठाने के बजाए अपने क्लोन बनवाना अधिक पसंद करेंगे, बच्चे के बच्चे और हमशक्ल होने के साथ-साथ वे क्लोन भी रहेंगे। यह तकनीक इतनी खतरनाक है कि आज दुनिया के तमाम देश मानव-क्लोनिंग के खिलाफ या तो कानून बना चुके हैं या उसके खिलाफ राय जाहिर कर चुके हैं। लेकिन अपनी वैज्ञानिक सफलता के लिए जो लोग रात-दिन लगे रहते हैं और अपनी जिंदगी भर की मेहनत जिन्हें मानव-क्लोनिंग में सफल होते दिखती है वे लोग चुप नहीं बैठेंगे। आज भी चिकित्सा के इस्तेमाल के लिए कुछ देशों में वैज्ञानिकों ने इंसानी कोशिका से एम्ब्रियो तक तो बना लिया है लेकिन उसके आगे कुछ बनाने की बात उन्होंने अभी नहीं मानी है। आज  भी दुनिया में इस तकनीक को लेकर जितने नैतिक सवाल उठ रहे हैं उतने सवाल तो कभी भी नहीं उठे थे। फिर जितने किस्म की रोमांचक या भयानक कल्पनाएं इस तकनीक को लेकर हो सकती हैं, उनका पूरा इस्तेमाल विज्ञान कथाओं या भविष्य कथाओं में नहीं हुआ है। भारत चूंकि आज इस तकनीक से दूर है इसलिए यहां पर इसके खतरे मंडराते नहीं दिख रहे हैं। लेकिन यहां के उद्योगपतियों और भ्रष्ट नेताओं में से बहुत से लोग ऐसी कुनबापरस्ती की ओर जा सकते हैं जिसमें उनका आत्ममोह भी पूरा होता है। इंदिरा गांधी के बारे में एक वक्त कहा जाता था कि इंदिराजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा। क्लोनिंग पर पहले कभी मैंने लिखते समय इसकी कल्पना करते हुए लिखा था कि अगर उस समय क्लोनिंग की तकनीक आ गई होती तो आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी की तरफ से यह नारा कुछ दूसरे किस्म का हो सकता था। तब शायद इसके बारे में कहा जाता- इंदिराजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मैं।
वे तो चली गईं और उनके बच्चे भी नहीं रहे लेकिन भारत की वंशवादी राजनीति कायम है। आज भी इस चापलूस लोकतंत्र में अगर पार्टी की कुछ बड़ी प्रतिमाओं का क्लोन बनवाने के लिए अरबों रुपए भी खर्च करने पड़े तो उस पार्टी के लोग उसे जुटा लेंगे।
क्या आज कोई-'मेरे बाद मैंÓ के खतरों की कल्पना भारत के धार्मिक, आध्यात्मिक, साम्प्रदायिक और राजनीतिक दायरों में कर सकता है?
मैं तो इस कल्पना से खासा मनोरंजन पाता हूं कि दो हमशक्ल अंबानी भाई जब एक-दूसरे से उलझे होते और दोनों एक ही अंबानी के क्लोन होने के कारण एक से फिंगरप्रिंट वाले भी होते तो क्या होता? जरा सोचकर देखें।

शेर-चीतल के मुर्गीखाने बन सकते हैं?

3 जुलाई 08
दुनिया ने अभी चीन को हाथीदांत खरीदने की छूट दी है और इसे लेकर दुनिया के पर्यावरणवादी विरोध में उतर आए हैं। जेनेवा में संयुक्त राष्टï्रसंघ की एक बैठक में कुछ अफ्रीकी देशों ने इसका विरोध किया था लेकिन ब्रिटेन जैसे कुछ देशों ने चीन को हाथीदांत खरीदने की इजाजत दी। यह खरीदी अफ्रीका के चार देशों, दक्षिण अफ्रीका, बोत्सवाना, नामीबिया और जिम्बाब्वे से की जाएगी। अफ्रीका में हर बरस बीस हजार से अधिक हाथियों को गैरकानूनी तरीके से मार डाला जाता है। लेकिन वहां पर हाथियों की बड़ी आबादी होने के कारण हाथीदांत कंकालों से भी निकलता है और अगर उसे दुनिया में बेचने की छूट ही न रहे तो अफ्रीका की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। इसलिए संयुक्त राष्टï्र की एक कमेटी ऐसी परिस्थितियों की जांच करके कुछ देशों को यह छूट देती है कि वे अफ्रीका से हाथीदांत आयात कर सकें ताकि हाथीदांत पर कारीगरी से कलाकृतियां भी बन सके और अफ्रीकी अर्थव्यवस्था को मदद भी मिले।
इस धंधे के बारे में भारत में बहुत अधिक जानकारी तो नहीं है लेकिन एक बहस पूरी दुनिया में चलती ही रहती है कि वन्य प्राणियों को लेकर क्या एक ही नीति सभी देशों के लिए कारगर हो सकती है? अभी दुनिया के अलग-अलग देशों में कुछ-कुछ जानवरों का चुनिंदा शिकार कानूनी दर्जा पाए हुए है। जहां पर कुछ जानवरों की आबादी इतनी अधिक बढ़ जाती है कि वे इंसान के लिए खतरा बनने लगते हैं तो उन्हें एक सीमित संख्या में शिकार से मारा जाता है। दरअसल जंगली जानवरों को बचाने की एक जरूरत इसलिए भी पड़ती है कि जंगल कम होने के साथ-साथ कुछ नस्लें खत्म होने की कगार पर हैं और उनके साथ कुदरत का एक पहलू भी खत्म हो जाएगा। लेकिन अफ्रीका जैसे कई देश ऐसे हैं जहां पर जंगल बहुत अधिक हैं और जंगली जानवर भी। ऐसे में वहां जानवरों के सींग, चमड़े, और दांतों से बने हुए कई तरह के सामान बनाए और बेचे जाते हैं और इनको कानूनी मंजूरी भी मिली हुई है।
हम भारत के हिसाब से देखें तो यहां बहुत रफ्तार से जंगल कट रहे हैं, शहर फैल रहे हैं और कारखाने लगते जा रहे हैं। जंगलों के बीच पानी घटते जा रहा है और जानवरों का बहुत रफ्तार से शिकार चलते रहता है। ऐसे में अगर जंगली पशु-पक्षियों को बचाना है तो उसका एक रास्ता यह हो सकता है कि मुर्गीखानों या गौशालाओं की तरह इन जानवरों की भी नियंत्रित नस्लवृद्घि की जाए। इसके लिए मौजूदा वन्यप्राणी अधिनियम में फेरबदल करना पड़ेगा लेकिन आज जिस तरह हर काम-धंधे में निजीकरण बढ़ते जा रहा है तो बहुत सी अंतरराष्टï्रीय कंपनियां ऐसी निकल आएंगी जो अपने खुद के जंगल बनाकर इन पशु-पक्षियों की वंशवृद्घि में पूंजी निवेश करना चाहें। अब यह नीतिगत फैसला सरकार को करना होगा कि इन जानवरों को जैविक विविधता के लिए बचाना और बढ़ाना जरूरी है या फिर इन्हें अनियंत्रित जंगलों में बचने या मरने के लिए छोड़ देना बेहतर है।
इस पर हम एक दूसरी नजर से देखें तो पालतू घरेलू या शहरी जानवरों में और जंगली जानवरों में कुल एक बात का ही तो फर्क है कि जंगली जानवर संख्या में कम हैं और उनका मिजाज काबू के बाहर जंगलों में रहने का है। लेकिन अगर अवैध शिकार से या घटते जंगलों के कारण यह नस्ल खत्म होने का खतरा है तो क्या उसे नियंत्रित कारोबार की तरह बढ़ाना ठीक नहीं है?
जिस तरह मुर्गीखाने या सुअर पालन केंद्र चलते हैं उसी तरह दुनिया के अलग-अलग देशों में कहीं गाय-भैंस को काटने के लिए पाला जाता है तो कहीं पर शुतुरमुर्ग और दूसरे पशु-पक्षी, मछली, कीड़े-मकोड़े पाले और  काटे-खाए जाते हैं। मांसाहारी की नजर से देखें तो मुर्गी और शेर को खाने में फर्क क्या है? और जब इन शहरी पालतू पशु-पक्षियों और मछलियों को पालने, बढ़ाने, काटने और खाने में कोई रोक नहीं है तो जंगली जानवरों को पालना रोककर क्या हासिल होता है? अगर लोगों को मांसाहारी ही रहना है तो हो सकता है कि हिरन और शेर को भी पोल्ट्रीफॉर्म की तरह पालकर और बाजार में डिब्बाबंद गोश्त की तरह बेचा जा सके। इससे कम से कम एक बात की गारंटी हो जाएगी कि अंबानी या विजय माल्या या टाटा-बिड़ला के जंगलों में ये जानवर कभी खत्म नहीं होंगे क्योंकि इनकी वजह से उनका कारोबार चलेगा। जहां तक प्राकृतिक वातावरण में इन जानवरों के रहने का सवाल है तो उस वातावरण को इंसान जानवरों से बहुत रफ्तार से छीन रहा है और शिकारी इन जानवरों की खाल के लिए, आसपास के गांव वाले इनके गोश्त के लिए और अंधविश्वासी या आस्थावान इनके दांतों के लिए इनको मार ही रहे हैं। इसके पहले कि इनकी आबादी एकदम खत्म होने को हो और इनकी नस्लों के भीतर जैव विविधता खत्म होने को हो, क्या यह बेहतर नहीं होगा कि जंगली जानवरों को निजी जंगलों में पालने, उनकी वंशवृद्घि करने और उन्हें काटने-खाने, बेचने की इजाजत दे दी जाए। आज धरती पर गाय-भैंस, बकरी, कुत्ता, मुर्गी, बतख इन सबके खत्म होने का कोई खतरा नहीं है। ये सब लगातार बढ़ते चल रहे हैं और इनके भीतर की जैव विविधता भी काफी हद तक कायम है। लेकिन कौन सी जंगली मुर्गी, कौन सा वन भैंसा कब खत्म हो जाए और जंगल विभाग के भ्रष्टï अफसर कब तक फर्जी और नकली पदचिन्ह बनाकर उनकी गिनती बताते रहें यह अंदाज लगाना असंभव है।
मेरी यह बात हो सकता है कि वन्यप्राणी प्रेमियों को बड़ी नाजायज लगे। लेकिन यह बात तो मैंने सामने रखी इसीलिए है कि इस मामले के अधिक जानकार लोग अलग-अलग जगहों पर इस बारे में सोचें-विचारें। इससे इस बात की गारंटी हो जाएगी कि कारोबारी लोग विज्ञान की नई-नई तकनीके इस्तेमाल करके जानवरों की संख्या बढ़ा पाएंगे और नियंत्रित जंगलों में शायद एक दिन इनकी आबादी इतनी अधिक बढ़ जाएगी कि प्राकृतिक जंगलों में फिर से इन्हें छोड़ा जा सके। आज तो सरकारी नियंत्रण के चलते  जंगलों के भीतर जानवर खत्म होते जा रहे हैं और सरकार एक अधिक इंसानियत के नाम पर एक बड़ी हैवानियत का काम करते दिख रही है। निजीकरण अब इतना बुरा शब्द नहीं रह गया है कि उससे लोगों को परहेज हो। और जंगली जिंदगी को बचाना जब सरकार के लिए पूरी तरह उसके बूते के बाहर की बात हो गई है तो फिर उसे एक नई नजर से इस बारे में सोचना चाहिए।
हालांकि इस बारे में जब इतना लिख लेने के बाद मैंने छत्तीसगढ़ की एक वन्य जीवन जानकार प्रतिभा पाण्डेय से इस बारे में पूछा तो वे इस नियंत्रित ब्रीडिंग के बिल्कुल खिलाफ थीं और उन्होंने कहा कि थाईलैंड जैसी कुछ जगहों पर ऐसे प्रयोग किए गए जो सफल नहीं हुए और नियंत्रित परिस्थितियों में जंगली जानवर तरह-तरह की बीमारियां पा जाते हैं और जब वे बाहर जंगलों में जाते हैं तो वे वहां के खुले वातावरण के जानवरों को भी बीमार करके मार डालते हैं। उनकी यह भी आशंका थी कि लोग ऐसे नियंत्रित कारोबार में भी जंगलों से जानवरों को मारकर उनको खरीदने-बेचने का रास्ता निकाल लेंगे।
-सुनील कुमार

बॉबी जिंदल के बहाने, उनकी-अपनी चार बातें

27 जुलाई 08
अमरीका को उसकी अलोकतांत्रिक आक्रामकता और विस्तारवाद की उसकी नीति के लिए आए दिन कोसने के बावजूद उसकी कुछ खूबियों की चर्चा भी करने को जी चाहता है। ऐसी एक संभावना वहां खड़ी हो रही है राष्टï्रपति चुनाव को लेकर। परंपरागत रूप से राष्टï्रपति पद का प्रत्याशी अपनी पार्टी के साथ मिलकर अपने लिए उपराष्टï्रपति पद का उम्मीदवार छांटता है। और यह माना जाता है कि मतदाताओं और अमरीकी समाज के अलग-अलग तबकों की भावनाओं को ध्यान में रखकर यह जोड़ी बनाई जाती है। भारत के लोकतंत्र में भी पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्टï्रपति, जैसे कई पदों पर मनोनयन या चयन के पहले ऐसे पैमाने ध्यान में रखे जाते हैं। अमरीका में इन दिनों भारतीय मूल के एक नौजवान बॉबी जिंदल का नाम रिपब्लिकन पार्टी की उपराष्टï्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए चल रहा है।
बॉबी जिंदल भारत के पंजाब से अमरीका में जाकर बसे एक व्यापारी के बेटे हैं और अमरीकी संसद से होते हुए वे अब लुईसियाना राज्य के गवर्नर हैं। अमरीकी राज्य के गवर्नर का मतलब भारत के रबर स्टैम्प गवर्नर जैसा नहीं होता, वह राज्य की सरकार का मुखिया होता है और राज्य चलाता है। 37 बरस के बॉबी को अमरीका में तंगख्याल मानी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक ऐसा नौजवान चेहरा माना जा रहा है जिसे अगर आगे लाया गया तो उससे पार्टी की छवि बदल सकती है। आज अमरीका में इस पार्टी को गोरे बूढ़ों की पार्टी माना जाता है। एक गैर गोरा, एशियाई नस्ल का बिल्कुल नौजवान उम्मीदवार इस पार्टी के आज के राष्टï्रपति पद के प्रत्याशी जॉन मैककेन के लिए मददगार भी साबित हो सकता है। वह विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्टï्रपति पद प्रत्याशी अश्वेत बराक ओबामा से दस बरस छोटा भी है।
भारत की राजनीति को अगर देखें तो मरणासन्न लोग ताबूतनुमा सिंहासनों पर बैठकर भी राज करने को बेताब हैं और जो नई पीढ़ी नई सोच को लेकर, नए ज्ञान से लैस होकर काम करना चाहती है उसे कोई जगह देने को तैयार नहीं है। मुझे अपने बचपन से लेकर अभी तक दिया छाप पर अटल-अडवानी की जोड़ी राम-लक्ष्मण की तरह पेश की हुई याद है। उम्र की आधी सदी गुजर गई लेकिन जनसंघ के सबसे ऊपर के दो लोगों में से एक अडवानी अब तक धनुष लिए मैदान में डटे हैं और रामचंद्र भी वोट डालने संसद के गलियारे तक तो पहुंच ही गए थे। कांगे्रस में इंदिरा गांधी बेमौत नहीं मारी जातीं तो हो सकता है कि आज नब्बे बरस की उम्र में वे प्रधानमंत्री होतीं या जैसा कि कुछ लोगों का अंदाज था कि बेटे को प्रधानमंत्री बनाकर वे राष्ट्रपति बन जाएंगी। वामपंथी दलों में देखें तो सीपीएम में ज्योति बसु को पच्चीस बरस मुख्यमंत्री रहने के बाद भी छुट्टïी नहीं मिल रही थी और हरिकिशन सिंह सुरजीत के बारे में यह लगता था कि ऐतिहासिक भूल आधा दर्जन कर लेने के बाद ही वे बिदा होंगे।
अमरीका की आज की दानवाकार सफलता के बारे में सोचने की जरूरत है। जब यह बात लिखी जा रही है उसी वक्त छत्तीसगढ़ में कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति के नाम पर छंटाई चल रही है और इस बार भी यह मुद्दा बन रहा है कि किसी छत्तीगढिय़ा को ही इस पद पर बिठाया जाए। यह बात और भी बहुत से दफ्तरों के लिए नाम तय करते समय उठती है। और सरकार या राजनीति के पद ही नहीं अखबारों में संपादक तय करने के पहले भी काबिलीयत में इसे एक जरूरी हिस्सा माना जाता है कि संपादक पर्याप्त बूढ़ा हो चुका है या नहीं।
तो कोई यह देखे कि मुखिया उसी इलाके का है या नहीं, कोई यह देखे कि वह पर्याप्त बूढ़ा है या नहीं, तो फिर बाकी बातें धरी रह जाती हैं। भारत में एक तरफ तो अमरीका के मुकाबले इस बारे में बहुत विशाल उदारता है कि यहां विदेशी मूल का कोई व्यक्ति भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री हो सकता है। दूसरी तरफ अलिखित और अघोषित रिवाज यह चले आ रहा है कि अधेड़ होने के पहले राजनीति में किसी को तभी गंभीरता से लिया जाता है जब उसकी रगों में किसी चुनिंदा राजनीतिक परिवार का खून दौड़ रहा हो। क्या भारत में कोई यह कल्पना कर सकता है कि 37 बरस के एक नौजवान को उपराष्टï्रपति पद के चुनाव में उम्मीदवार बनाकर कोई पार्टी अपना खुद का भविष्य सुधारने का सोच सकती है? और खासकर ऐसा नौजवान जिसके कुनबे से कोई देश में किसी बहुत बड़े पद पर काबिज न रहा हो।
यह बात हम इसलिए कर रहे हैं कि अमरीका ने जिस तरह पूरी दुनिया से वहां पहुंची हर नस्ल के लोगों में से सबसे होनहार और सबसे हुनरमंद लोगों को जिस तरह अपने सिर पर बिठाया और फिर उनकी ताकत से अपने पूरे कद को ऊंचा उठाया, यह सोचने की बात है। हम इस बात पर अमल करने की नसीहत देने की हड़बड़ी नहीं कर रहे लेकिन इसे एक प्रयोग के रूप में तो देखा ही जाना चाहिए कि उसमें बाकी दुनिया के लिए क्या-क्या सबक हैं। अपने पास मौजूद लोगों में से किस-किससे देश के लिए क्या-क्या लिया जा सकता है, इसका ख्याल न करने वाला देश या प्रदेश या समाज कैसे आगे बढ़ सकता है? और यह केवल सरकार की बात नहीं है, किसी निजी दुकान में भी, किसी अखबार में भी जब तक अपने मौजूद लोगों में मौजूद संभावनाओं को नहीं देखा जाएगा तो उसका आगे बढऩा मुश्किल ही रहता है।
अमरीका जैसे दुनिया के सबसे ताकतवर देश में उपराष्टï्रपति पद का मतलब चार या आठ बरस बाद राष्टï्रपति पद का उम्मीदवार बनना भी होता है। वहां राष्टï्रपति दो बार से अधिक उस पद पर नहीं रह सकता। आज रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद प्रत्याशी को देखें तो जॉन मैककेन की उम्र (72 बरस) इतनी हो चुकी है कि उनसे जीत के बाद भी राष्टï्रपति के एक कार्यकाल से अधिक की उम्मीद कम ही लोग करेंगे। बॉबी जिंदल अगर उपराष्टï्रपति बनते हैं तो उस वक्त वे 41 या 42 बरस के होंगे और कोई ऐसी स्थिति बनती है कि वे राष्टï्रपति बनें तो 50 बरस के होने तक वे दो बार कार्यकाल पूरा करके रिटायर भी हो चुके होंगे।
भारत के राजनीतिक समाज को यह भी सोचना होगा कि अगर इस देश में लोकतंत्र का नेतृत्व हमेशा ही बूढ़ों से लदा हुआ रहेगा तो वह हमेशा ही भविष्य की सोच से 25-50 बरस पीछे भी चलता रहेगा। हर नई पीढ़ी के पास पुरानी पीढ़ी के अनुभव से सीखने का तो काफी कुछ होता है, उसके पास आने वाले दिनों को लेकर बूढ़ों के मुकाबले 25-50 बरस आगे तक की फिक्र और सोच भी रहती है। हिन्दुस्तान में एक दिक्कत यह लगती है कि अनुभव को ही भविष्य मान लेने का दुराग्रह करते बूढ़ी पीढ़ी आखिरी सांस तक सत्ता की आस में लगी रहती है, मानो नींव के पत्थर यह खुशफहमी पाल बैठे हैं कि वे ही छत भी रहेंगे और छत के ऊपर की टंकी भी।
हम एक ही पार्टी और एक ही कुनबे की बात करें तो यह बात साफ है कि कम्प्यूटर और कम्युनिकेशन को जो महत्व राजीव गांधी ने दिया था, और जिसकी वजह से देश में आज एक क्षेत्र में इतनी अधिक तरक्की हो सकी, वह महत्व इंदिरा गांधी नहीं दे सकती थीं। यह हर पीढ़ी के साथ जुड़ी हुई एक दिक्कत है।
लोगों को कुदरत से बहुत कुछ सीखने की जरूरत होती है। पतझड़ में पेड़ पत्तों को गिरा देता है ताकि नए पत्ते के निकलने की गुंजाइश बन सके। फूल तनों की तरह स्थाई नहीं होते और खुद झड़कर वे अपने बीज के आगे बढऩे का रास्ता खोलते हैं। अगर फूल अपनी ही खूबसूरती पर बदगुमां होकर झडऩे से ही इंकार कर देते तो कुदरत ही आगे नहीं बढ़ती। हिन्दुस्तान की लीडरशिप को राजनीति, समाज, व्यापार और बाकी दायरों में भी नई पीढ़ी के लिए जगह बनानी होगी, आज एक बड़ी दिक्कत यह है कि जब तक लोगों की अपनी सांस चलती रहती है तब तक वे नई पीढ़ी की जरूरत महसूस नहीं करते। भारत के लोग रिटायर होना भी सीखें तो शायद नई कोंपलों के साथ पेड़-पौधे अधिक विकसित हो सकेंगे। और आखिरी नसीहत यह कि किसी भी जगह बाहरी से परहेज करके स्थानीय प्रतिभाएं आगे नहीं बढ़ सकतीं।

-सुनील कुमार
(कवर पेज पर बॉबी जिंदल को महान क्रांतिकारी चे गुएरा की तरह दिखाते हुए टी-शर्ट पहनी एक युवती।)

अधिक इंसानों का अधिक भला

20 जुलाई 08
खेल के बारे में मेरी जानकारी नहीं के बराबर रहती है। न कभी कुछ खेला और न अधिक कुछ देखा। ऐसे में इस हफ्ते खेल पर लिखना कुछ दुस्साहस का काम है। लेकिन खेल जिस तरफ बढ़ रहे हैं, जिस तरह बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए यह लगता है कि क्या यह इस धरती के खेल हैं या खिलाडिय़ों के बीच के खेल हैं। मामला कुछ इस तरह का है जैसा कि कुछ बहुत ही जटिल, कठिन, क्लिष्टï या अमूर्त किस्म का लिखने वाले नामी-गिरामी लेखकों के बारे में कहा जाता है कि वे कवियों के कवि हैं या लेखकों के लेखक हैं। मतलब यह कि वे आम लोगों के पढऩे के लायक नहीं रहते। इसी तरह इन दिनों खेल ऐसे होते चले जा रहे हैं कि उन्हें केवल पेशेवर खिलाड़ी खेल सकते हैं और बाकी लोग उन्हें केवल देख सकते हैं।
जिस तरह समाज में साक्षर और निरक्षर के बीच एक गहरी खाई रहती है, जिस तरह कम्प्यूटर सहित और कम्प्यूटर रहित समाज के बीच कभी न पटने वाला जो फासला रहता है उसी तरह शौकिया खिलाडिय़ों और पेशेवर खिलाडिय़ों के बीच एक चौड़ी खाई दिखाई पड़ती है। खेल मानो खिलाडिय़ों के लिए रह गए हैं या फिर रह गए हैं खेल संघों की राजनीति करने वालों के लिए, या फिर टेलीविजन कंपनियों के लिए, या फिर इश्तहार देने वालों के लिए। इन सभी की प्राथमिकताओं को देखें तो उनमें कहीं भी आम खिलाडिय़ों की जगह नहीं है। किसी को भी खेल में आगे बढ़ाना इनकी सोच से बाहर है और जब कोई आसमान पर पहुंच जाता है तब उसे चमकाकर सितारा बनाने के लिए बहुत से बड़े लोग लग जाते हैं।
कुल मिलाकर बात यह कि गरीब देश, गरीब प्रदेश, गरीब स्कूल या कॉलेज, गरीब परिवार के बच्चों के लिए किसी खेल में आगे बढऩा खासा मुश्किल रहता है। गिनाने के लिए इरफान पठान जैसे कुछ उदाहरण जरूर मिल जाएंगे जिनमें गरीबी से उठकर कोई खिलाड़ी आसमान तक पहुंचा। लेकिन ऐसी मिसालें कम ही मिलेंगीं, अधिक मामले ऐसे मिलेंगे जिनमें दुनिया की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को इन खेलों तक पहुंचने का मौका उसी तरह नहीं मिलता जिस तरह गांव की किसी गरीब खूबसूरत लड़की को किसी सौंदर्य स्पर्धा में जाने का मौका नहीं मिलता। लेकिन इसके बाद भी जो लड़कियां सौंदर्य स्पर्धा तक पहुंच पाती हैं उन्हीं में से लड़की अपने देश या दुनिया की सबसे सुंदर लड़की करार दे दी जाती है।
खेलों के बारे में यह बात बड़ी अजीब लगती है कि आज भारी तकनीक और बहुत महंगी ट्रेनिंग से ही कोई अंतरराष्टï्रीय मुकाबले तक पहुंच सकता है। यह खर्च और यह सहूलियत कितने लोगों को मिल पाती है? खासकर भारत जैसे देश में, जहां प्रदेश से लेकर देश तक खेल संघों में बैठे हुए मगरमच्छ मछलियों के हक का सारा दाना खा लेते हैं।
फिर एक बड़ी अजीब सी बात यह है कि अब किसी खेल में ऊंचाई पर पहुंचने वाले खिलाड़ी के पास चौबीसों घंटे बारहों महीने लगातार खेलने या तैयारी करने का ही विकल्प बचता है। मतलब यह कि खेल अब इंसानों के लिए नहीं, खिलाडिय़ों के लिए रह गए हैं और उन खिलाडिय़ों के लिए खेलने के अलावा और कोई काम नहीं रहना चाहिए। यह कमोबेश उस तरह की हालत लगती है जिसमें अगर कोई इंसान चौबीसों घंटे और पूरी जिंदगी अगर केवल खेल में न लगा सके तो खेल के आसमान पर उसकी कोई जगह नहीं है। अगर खेल से परे सोचें तो कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि पढ़ाई के आसमान पर भी चौबीसों घंटे पढ़ाई में लगाने वाले से परे किसी के लिए कोई जगह नहीं है। यही बात हमारे जैसे अखबारनवीसी के धंधे में लगे लोगों के लिए कही जा सकती है कि चौबीसों घंटे अगर यही काम न सूझें तो इस धंधे में आगे बढऩे की गुंजाइश कम है। लेकिन खेल तो एक ऐसा काम है जिसके साथ खेल भावना के जुड़े होने की बात कही जाती है। वैसी बात तो किसी और काम के लिए नहीं कही जाती। जैसे कि डॉक्टरी के अलावा किसी और पेशे को एक पवित्र पेशा नहीं कहा जाता। किसी पत्रकार से कोई यह उम्मीद नहीं करता कि वह खेल भावना से काम करेगा। और पत्रकार भावना तो कुछ होती ही नहीं। कुल मिलाकर मतलब यह कि अपने किस्म का एक अकेला दायरा जो खेलों का था वह अब पेशेवर होते-होते इतना अधिक पेशेवर हो गया है कि बाकी इंसान दूर से देखकर ताली ही बजा सकते हैं।
इस बहुत ही महीन दिक्कत के बारे में लिखने की एक वजह यह है कि भारत जैसे सौ करोड़ के देश से निकलकर जब लोग ओलंपिक में जाते हैं और बोरियों में भरकर निराशा, हताशा और असफलता वापिस लाते हैं तो यह बात लगती है कि सितारों से नीचे जहां और भी है, और उसकी कोई कदर हिन्दुस्तान में नहीं है। देश का सारा फोकस गिने-चुने खेलों के गिने-चुने दायरों में थोड़े से खिलाडिय़ों पर बना हुआ है। आसमान के स्तर पर पहुंच चुके इन सितारा खिलाडिय़ों से खेल संघों और बाकी तमाम दुकानदारों को उसी तरह का फायदा हो रहा है जिस तरह का फायदा किसी अच्छे भले चलते कारखाने से कारखानेदार को होता है या किसी बेशकीमती खदान से खुदाई करने वाले को होता है। इसलिए नीचे के तमाम दायरों से अपने-आप निकलकर जो भी आ जाए उनमें से बेहतर लोगों को छांटकर उन पर पूरी मेहनत करने और उनसे पूरी कमाई करने का माहौल ही रह गया है। लेकिन इस कारखाने या खदान की कमाई से स्कूल-कॉलेज के स्तर पर खर्च करके नए होनहारों को ढूंढा जाए, उन्हें बढ़ाया जाए ऐसा भारत जैसे देश में नहीं दिखता।
क्रिकेट जैसे खेल में सैकड़ों-हजारों करोड़ की चर्चाओं के बीच जिस तरह के राजसी ठाठ-बाट तमाम पदाधिकारियों को भोगते देखा जाता है वह इस मैदानविहीन, बॉल और बल्लाविहीन, जूता और ड्रेसविहीन देश में बहुत ही अश्लील और हिंसक अपराध लगता है। लेकिन आज इस देश में मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री के पद के दावेदार भी क्रिकेट की दुकान के गल्ले पर बैठने के लिए मारामारी करते दिखते हैं। लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में भी कहीं ओलंपिक की तैयारी में लगे साइकिल चालक के लिए कोई कंपनी करोड़ों रुपए की साइकिल बना रही है तो कोई दूसरी कंपनी किसी खिलाड़ी के लिए कपड़े तैयार करने में दुनिया के बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर लगा रही है। ऐसे में पूरी बाजार व्यवस्था की दिलचस्पी गिने-चुने सितारा खिलाडिय़ों के एकाधिकार में उसी तरह की रहती है जिस तरह मुंबई के फिल्म जगत में संघर्ष कर रहीं हजारों लड़कियों के बीच पूरा उद्योग दर्जनभर से भी कम लड़कियों को आसमान पर जगह देना चाहता है।
यह पूरा सिलसिला ऐसा अमानवीय हो गया है कि अब खेल आम इंसानों की जिंदगी से बाहर निकल गए हैं और खेल खेलना अब पूरे वक्त का एक धंधा होकर रह गया है। मगरमच्छों से भरे तालाबों में नई मछलियों के लिए जगह कम ही खेलों में, कम ही जगह निकल सकती है। ऐसे में अभी जब फ्रांस में साइकिल का एक लंबा मुकाबला चल रहा है तब कुछ लोगों ने पेशेवर खेलों से परे बिना मुकाबले वाला एक माहौल बनाने की राय सामने रखी है जिसमें साधारण जूते-कपड़ों और साधारण साइकिल के साथ ही लोग मेहनत कर सकें, बिना किसी महंगी ट्रेनिंग के और बिना अपना दूसरा काम-धंधा बंद किए हुए। शायद सितारों की चकाचौंध के बिना, बिना मुकाबलों और इश्तहारबाजी वाले ऐसे खेल शायद इंसानों का अधिक भला कर पाएं, अधिक इंसानों का अधिक भला।

सच बताने वालों के झूठ का सच

13 जुलाई
दस एक दिन पहले एक खबर देश-विदेश के बड़े-बड़े अखबारों में बड़ी प्रमुखता से छपी कि गोवा में हिटलर की नाजी सेना का एक ऐसा फरार अफसर पकड़ाया जो 50 बरस पहले हजारों यहूदियों को मारने का जिम्मेदार था। इस फरार युद्घ अपराधी को तलाशने में इजराइल के यहूदियों का एक संगठन शामिल था और इसे गोवा-कर्नाटक सीमा से गिरफ्तार करके जर्मनी ले जाया गया है। कई बड़े अखबारों के इंटरनेट संस्करण पर यह खबर देखकर हमने भी 'छत्तीसगढ़Ó के संपादकीय में इसका जिक्र किया कि गलत काम करने वाला 50 बरस की फरारी के बाद भी पकड़ा जाता है इसलिए लोगों को भला इंसान बने रहना चाहिए।
अब यह बात सामने आई कि गोवा में सालभर पहले शुरू हुए एक इंटरनेट ब्लॉग में मीडिया की बेईमानी, उसकी मूर्खता और उसकी लापरवाही को उजागर करने के लिए यह झूठी खबर एक जर्मन पे्रस नोट की तरह देश-विदेश के सभी प्रमुख अखबारों को भेजी गई और उन अखबारों ने उस खबर में किस-किस तरह की नमक-मिर्च लगाकर उसे छापा, कैसे अपनी कल्पनाशीलता से इस खबर को कुछ का कुछ बना दिया। यह ब्लॉग मोटेतौर पर गोवा के अखबारों को लेकर बेईमानी उजागर करता है। उसमें इसे चलाने वालों के बारे में ऐसा अंदाज लगता है कि ये वहीं के कुछ सुधारवादी पत्रकार हैं या ऐसे लोग हैं जो पत्रकारिता में बेहतरी चाहते हैं। इनके नाम ब्लॉग में नहीं लिखे हैं लेकिन इन्होंने गोवा और गोवा के बाहर के बहुत से अखबारों के पेशेवर दीवालियापन का भांडाफोड़ किया है।
यह साबित करने के लिए कि अखबार किस कदर लापरवाह हैं पेनप्रिक्सडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम नामक इस ब्लॉग ने जर्मनी का एक ईमेल एड्रेस गढ़ा और उससे भारत के बड़े अखबारों को, गोवा के अखबारों को प्रेस नोट भेजा। यहां पर उन तमाम अखबारों के अलग-अलग नाम देकर उनकी नमक-मिर्च या उनकी लापरवाही का जिक्र ठीक नहीं है, और यहां यह लिखना भी ठीक होगा कि कुछ किस्म की लापरवाही कभी-कभी हमसे भी होती है, लेकिन नमक-मिर्च लगाना और झूठी बातें जोड़ देना तो एक भयानक स्थिति है। गोवा के इन ब्लॉगर्स ने द्वितीय विश्वयुद्घ के वक्त के नाजी युद्घ अपराधी की छवि गढऩे के लिए इंटरनेट से एक बूढ़े जर्मन की तस्वीर भी छांट ली जो 88 बरस का दिखे और फिर एक कहानी गढ़ी कि किस तरह हिटलर का यह अफसर आकर गोवा में बसा हुआ था और जब उसने गोवा के अखबारों में अपना एक पुराना पियानो बेचने का इश्तहार निकलवाया तो उसे यहूदी संगठन चौकन्ना हुआ। इस पे्रस नोट के हिसाब से इस किस्म का पियानो का मॉडल हिटलर के वक्त जर्मनी के एक संग्रहालय से गायब हुआ था और उसके अब बिक्री के लिए सामने आने का मतलब हिटलर के किसी अफसर से रिश्ता हो सकता था। इंटरनेट पर गोवा के अखबार में इश्तहार देखकर नाजी युद्घ अपराधी तलाशने वाला यहूदी संगठन सक्रिय हुआ और ढूंढते हुए पता लगा कि यह जर्मन हिटलर की सेना में कर्नल रहा हुआ है और एक किसी यहूदी कैंप का इंचार्ज था जिसमें शायद 12 हजार लोगों को मारा गया था।
यह पे्रस नोट पाने के बाद भारत के बड़े-बड़े अखबारों ने कर्नाटक और गोवा की पुलिस, जर्मन दूतावास, और केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसियों से संपर्क किया, जिनमें से किसी ने भी इस खबर की पुष्टिï नहीं की। कुछ अखबारों ने तो उन तमाम देशों के नाम अपने मन से जोड़ दिए जहां से होते हुए यह जर्मन गोवा तक पहुंचा था। गोवा के एक अखबार ने पूरी खबर को छापने के बाद इस काल्पनिक जर्मन प्रेस नोट भेजने वाले से ईमेल से पत्र व्यवहार भी किया कि उन्होंने पूरी खबर छापी है और आगे की क्या जानकारी है।
देश के एक प्रमुख अखबार 'हिन्दूÓ ने वहां के एक वरिष्ठï पत्रकार ने कुछ दिनों बाद इस पूरे फर्जी मामले के बारे में और गोवा के इस ब्लॉग के बारे में लिखा। मीडिया के काम करने के लापरवाह, सनसनीखेज, और बदनीयत से भरे तरीके कोई नए नहीं हैं। मीडिया के बहुत बड़े हिस्से की सुर्खियों को देखकर ही उसके अपने रूख का अंदाज लगाया जा सकता है। भाषा को थोड़ा सा देखा जाए तो समझ आ जाता है कि अखबार या टीवी की अपनी हसरत क्या है। चुनावों की रिपोर्टिंग तो छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के मीडिया में जिस कीमत पर होती है उसका अंदाज लगाने के लिए समझदार रिपोर्टर मोर्चे पर निकलने के पहले मालिक, मैनेजर, या अगर मायने रखने वाला हो तो संपादक, से पूछ लेता है कि किस पार्टी या प्रत्याशी को कितनी अधिक लीड दिलवानी है।
एक बात यह लगती है कि पूरी दुनिया के बारे में लिखने वाले मीडिया के बारे में एक तो बहुत कम लिखा जाता है, दूसरा मीडिया की ऐसी पत्रिकाओं में लिखा जाता है जिन्हें साधारण पाठक कभी नहीं पढ़ता। हम कभी-कभार टीवी-समाचार चैनलों की बहुत अधिक ज्यादती होने पर उनके बारे में लिखते हैं और अपने खुद के दायरे के मीडिया के बारे में मोटी-मोटी बातें अपने संपादकीय या कालम में लिखते हैं। लेकिन हिचकते-झिझकते हुए लिखना एक अलग बात होती है। अपने धंधे के लोगों के बारे में, या मीडिया के बारे में लिखना कभी ऐसा भी लगता है कि बाजार के मुकाबले को इस तरह चुकाया जा रहा है।
ऐसे में मीडिया पर नजर रखने के लिए अगर एक स्वतंत्र संगठन ऐसा बने जो इंटरनेट के मुफ्त माध्यम का इस्तेमाल करके मीडिया की व्याख्या करे तो शायद मीडिया का कुछ भला हो और अंतत: लोकतंत्र का भी। गोवा में जिस तरह की यह शुरूआत हुई है वैसी शुरूआत छत्तीसगढ़ के भी कुछ पत्रकार, या मीडिया की समझ रखने वाले लोग कर सकते हैं। हो सकता है कि काफी हद तक वे अपनी पहचान भी छुपाए रख सकें। भारत के साइबर कानून अभी बहुत मजबूत नहीं हैं इसलिए गुमनामी में भी बहुत सा काम रखा जा सकता है।
और केवल मीडिया की बात क्यों करें, राजनीति, उद्योग-व्यापार, सामाजिक संगठन, सरकार, नेता-अफसर-ठेकेदार जैसे बहुत से तबके हैं जिनके बारे में कई बातें मीडिया अपनी विज्ञापनों की कमाई के कारण नहीं लिख पाता, या नहीं लिखता, या विज्ञापनों से परे भी कमाई का कोई रास्ता निकाल लेता है। ऐसी तमाम बातें कोई ऐसा व्यक्ति बेहतर तरीके से उजागर कर सकता है जिसे बहुत किस्म के दबावों की फिक्र न हो। जो लोग इंटरनेट पर बैठते हैं वे इस ब्लॉग द्धह्लह्लश्च://222.श्चद्गठ्ठश्चह्म्द्बष्द्मह्य.ड्ढद्यशद्दह्यश्चशह्ल.ष्शद्व/ को देखकर अंदाज लगा सकते हैं कि ऐसी कोई कोशिश देश के दूसरे हिस्सों में भी वहां के पत्रकारों, मीडिया मैनेजरों और मालिकों को सावधान कर सकती है। आज तो मीडिया का लिखा या कहा बिना किसी चुनौती के बाजार में खप जाता है और जब तक इसके खिलाफ कोई बात उठे मीडिया कोई नई गलती या लापरवाही करने में जुट जाता है। नीचे मैं 'हिन्दूÓ में सिद्घार्थ वरदराजन का लिखा लेख भी दे रहा हूं जो गोवा की इस खबर-मजाक और भारत के मीडिया के हाल पर अधिक विस्तार से जानकारी देता है।

बेहतर और बदतर के बीच

6 जुलाई 08
टेक्नालॉजी को देखें तो सामानों का आकार छोटा होते जा रहा है। पहले एक बड़े गोदाम से अधिक क्षमता का कम्प्यूटर अब जेब में आ जाता है। मोटर सायकिलें पहले से आधे वजन की हो गई हैं। टेलीविजन की मोटाईं पहले से बीसवां हिस्सा रह गई है ओर उसकी क्वालिटी पहले से हजार गुना बेहतर हो गई है। बिजली के बल्ब पहले के मुकाबले पचीसवां हिस्सा भी बिजली नहीं खाते और रौशनी सौ गुना देते हैं। कुल मिलाकर देखें तो तीस से साठ बरस के लोगों के मुकाबिले अब पांचवीं से कम से बच्चे अधिक तेज हो गए हैं। यह साबित करने में बड़े-बड़े लोगों को पसीना आ जाता है कि वे पांचवीं के बच्चों के मुकाबिले थोड़ा-बहुत तो जानते हैं।
टे्रनें तेज हो रही हैं, टेलीफोन छोटे और बेहतर हो रहे हैं, कॉल्स सस्ती हो रही हैं, खेतों की उपज बढ़ रही है, मुर्गीखानों में अंडे बढ़ रहे हैं, फूलों का आकार बढ़ रहा है और उनके रंग बेहतर किए जा रहे हैं। लेकिन यह सब तो विज्ञान और टेक्नालॉजी की बात है। इंसान अपने-आपको क्या बेहतरी की इस रफ्तार के मुकाबिले कुछ बेहतर भी बना रहा है?
लोगों के बीच फर्क बहुत है, बहुत से लोग अपने को बेहतर बना रहे हैं लेकिन बहुत से ऐसे हैं जिन्होंने बेहतरी का जिम्मा पूरे का पूरा सिर्फ मशीनों पर छोड़ दिया है। मशीनें कुछ लोगों के हाथों में हथियारों की तरह हो गई हैं और उनका इस्तेमाल करने वे और लोगों को गुलाम बनाकर कबीलाई सरदार की तरह राज कर रहे हैं। वे जंगली अंदाज में अपनी ताकत बढ़ाकर दूसरों के बल पर अपनी जिंदगी बेहतर बना रहे हैं, खुद को बेहतर बनाकर नहीं।
लेकिन ऐसी जंगली ताकत से परे बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें केवल अपने बूते जीना रहता है, जो परजीवी नहीं हैं, लेकिन ऐसे लोग भी अपने-आपको बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। यह बेहतरी जिंदगी के मूल्यों से लेकर हुनर तक और हुनर से सुधार तक, कई किस्म की हो सकती है। यह अमरीकियों की तरह बेहतर कम्प्यूटर प्रोग्राम भी हो सकता है या चीनियों की तरह सामान को सस्ती बनाने का हुनर। यह जापानियों की तरह उपभोक्ता उपकरणों को बेहतर बनाना भी हो सकता है या पंजाबियों की तरह दुनिया भर में लाकर काम करने का हुनर।
लोगों के बीच उत्कृष्टïता बढ़ाने का मतलब सिर्फ बाजारू मुकाबिले में अधिक कामयाब होना नहीं है, उत्कृष्टïता तो इंसानियत में भी हो सकती है, जहां मदर टेरेसा दुनिया के दूसरे कोने से आकर भातर के अनाथ बच्चों को जिंदगी देने का काम करती है या छत्तीसगढ़ की मितानिन जिस तरह नवजात शिशुओं और मौत के बीच ढाल बनकर खड़ी हो जाती है।
लोगों को बदले वक्त के मुताबिक सोचना होगा कि अपने बोलने, सोचने, काम करने और विचलित होने में वे कैसी किफायत वाली कटौती कर सकते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि हर हफ्ते दस के करीब लेख या  संपादकीय या कॉलम लिखते-लिखते कहीं मैं अपने सीमित हुनर के साथ ज्यादती तो नहीं कर रहा हूँ? लेकिन जब इस नौबत से अपने को बचाने के लिए मैं फिजूल की गपबाजी में बैठना भी बंद करता हूँ। जब अपने पढऩे, टीवी देखने, रेडियो सुनने, और लोगों से मिलने को लेकर चौकन्ना हो जाता हूँ, तो लगता है कि उन दिनों को सोचना कुछ बेहतर होता है। जिस दिन भी किसी अनचाही बहस में घंटे-दो घंटे खराब होते हैं, तो सोचना-विचारना तक बिगडऩे लगता है। उसका सीधा असर बहुत सतही या औसत किस्म के लिखने की शक्ल में सामने आता है।
रोज की जिंदगी में छोटी-छोटी फिजूलखर्ची को काटकर जब तक किफायत नहीं करती जाएगी, बेहतरी आएगी कहां से? आज ही मैं एक दोस्त से बातचीत में कह रहा था कि कुदरत ने इंसानी जिस्म को ऐसा बनाया है कि जब शरीर के जिस हिस्से को अनुभव करना हो, तभी दिमाग वहां से आते संकेतों को दर्ज करता है। रात में सोते हुए कानों में आवाज तो पड़ती ही है लेकिन दिमाग उनको लगभग पूरी तरह नकार देता है। कोई जोर की आवाज हो, तो ही सुनाई पड़ती है, तभी नींद खुलती है। बदन से स्पर्श, गंध, आवाज दिखाने, और चखने के सारे संकेत अगर सारे समय दिमाग में दर्ज होंगे, तो दिमाग काम का कोई काम कर ही नहीं सकेगा।
इसलिए जरूरत यह रहती है कि हम तमाम वार्ता में से गैरजरूरी हिस्सों का संपादन करते चलें और वक्त को कुद खाली रखें। खाली वक्त के आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन से भी कई किस्म के सुधार होते हैं। आज जिस जिंदगी को सामाजिक दायरा माना जाता है, वह दायरा अधिकांश मामलों में उत्पादकता विरोधी, उत्कृष्टïता विरोधी होते चल रहा है। सामाजिक प्राणी होने की अपनी परिभाषा पर खरा उतरने के लिए इंसान अमूमन ऐसे सामाजिक होते चल रहा है कि उससे समाज की वक्त बरबादी ही हो रही है।
पिछले कुछ महीनों में मैंने कुछ अधिक चुप रहने कुछ कम मिलने, कुछ अनसुना करने, कुछ अनदेखा करने और कुछ मामलों में मन की बात मन में रखने के फायदे देखें हैं। इनसे समझ आया कि बहुत से लोग मौन व्रत लेकर, ध्यान करके, एकांतवास करके किस तरह अपने आपको बेहतर समझ पाते हैं।
अखबार के धंधे में तो पूरी जिंदगी ही संपादन करते गुजर गई, लेकिन, बोलने-सुनने-मिलने पर संपादन करने का फायदा मैंने अभी-अभी इतने जाहिर तरीके से देखा। मैं यह तो नहीं कहता कि इससे मेरी जिंदगी में सब कुछ बेहतर हो गया, लेकिन यह जरूर कह सकता हूँ कि कई बातें बदतर होने से बच गईं।
-सुनील कुमार

देखे सुने सब कुछ को लिखने की हड़बड़ ईमानदारी

29 जून 2008
लेखक और पत्रकार समय-समय पर इस बात को अपना हक मान लेते हैं कि किसी निजी बातचीत को वे अपने समझे जनहित के हिसाब से या अपनी किताब के अधिक बिकने की संभावना पैदा करने के लिए लिख डालें। कुछ लेखक-पत्रकार ऐसे रहते हैं जो अपने देखें दायरे और अपने से हुई किसी की बातचीत का बहुत खुलासे से ब्यौरा देते हैं और उनकी भाषा और लिखने के अंदाज के कारण उनका वह हिस्सा बहुत लोकप्रिय भी हो जाता है। ऐसे दिग्गज लेखकों के लिखने की ऐसी आंखों देखी शैली उनके नाम के साथ जुड़ भी जाती है। पिछले दिनों एक पत्रकार की लिखी एक किताब की चर्चा निकली तो उसे पलट या पढ़ चुके एक पेशेवर पाठक ने  मुझसे कहा कि इस किताब की शैली फलां बड़े, नोबल पुरस्कार विजेता लेखक के अंदाज में है लेकिन उसकी उत्कृष्टïता को कहीं छू भी नहीं गई है।
मैंने इस किताब को उधार लेकर इसके कुछ हिस्से पढ़े। इसलिए कि उन हिस्सों में मेरे परिचित कुछ लोगों के बारे में काफी विस्तार से लिखा गया था।किताब की बाकी जानकारियां तो मोटेतौर पर मेरी अलग-अलग जगहों पर पढ़ी हुई थी और उन्हीं तथ्यों को एक लेखक के बहुत स्पष्टï पूर्वाग्रह के साथ दुबारा पढऩे जितनी दिलचस्पी मुझे नहीं थी। लेकिन मैं अपने परिचित कुछ लोगों का चित्रण उस किताब में देखना चाहता था।
पढ़ते-पढ़ते एक निराशा हुई कि कोई जाना-माना पेशेवर लेखक किस तरह अप्रासंगिक और संदर्भहीन बातों को उन लोगों के खिलाफ लिख सकता है जिन लोगों ने उसे मांगने पर समय दिया और सामान्य शिष्टïाचार का सत्कार भी किया। महत्वहीन बातों पर पन्ने खराब होना मेरे लिए उतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं था जितना यह खतरनाक बात थी कि किसी लेखक या पत्रकार से बात करने का मतलब अपने खिलाफ उसे लिखने का एक मौका देना है और यह खतरा उठाना है कि कोई व्यक्ति किस तरह आपके शिष्टïाचार का बेजा इस्तेमाल कर सकता है।
मुझे लिखने के पेशे को लेकर यह लगता है कि लेखक या पत्रकार को बहुत सतही और तात्कालिक उपलब्धि के लिए लोगों का भरोसा नहीं तोडऩा चाहिए। इसलिए कि वह लेखक या पत्रकार तो शायद उस नेता या अफसर या अपने हमपेशा से दुबारा न मिले और उसे तो एक अघोषित विश्वास को तोडऩे का नुकसान न झेलना पड़े, लेकिन जब उसके पेशे का कोई दूसरा कलमकार वहां पहुंचेगा तो क्या उसे वैसा सामान्य शिष्टïाचार मिल सकेगा? और शिष्टïाचार से परे, क्या उसे वैसी जानकारी कोई घायल व्यक्ति देना चाहेगा? अपने नफे के लिए, अगर यह सचमुच कोई नफा है तो, पूरे पेशे को नुकसान में डालना किस तरह की ईमानदारी है? आज अगर कोई पत्रकार किसी की बताई ऐसी बात को कहीं लिख मारता है जो उसने आपसी समझ के भरोसे में कही थी तो क्या अगली बार ऐसी किसी आपसी समझ के लिए भी कोई व्यक्ति किसी दूसरे पत्रकार को ईमानदारी से कोई बात कहेगा?
ऐसा काम करने वाले लेखकों और पत्रकारों, खासकर पत्रकारों, के बीच मैंने यह खतरनाक सोच देखी है कि किसी सूचना के साथ वे सामाजिक हित, जनहित या पेशे के लिए ईमानदारी का निष्कर्ष आनन-फानन निकालकर उसे पन्नों पर परोस देने को बेसब्र रहते हैं। जबकि लेखन या पत्रकारिता जैसे पेशे को नुकसान पहुंचाने वाली बातें व्यापक जनहित में नहीं हो सकतीं। इन दोनों कामों से लोकतंत्र का इतिहास भी जुड़ा हुआ है और भविष्य में भी जुड़ा रहेगा। दो-चार कलमें तो आती-जाती रहेंगी लेकिन ये अगर किडनी कांड की तरह डॉक्टरी के पेशे को बदनाम करेंगी तो उससे पूरे पेशे की साख खराब होगी और बिना साख वाला लिखने-छपने का धंधा लोकतंत्र के लिए घातक होगा।
साहित्य के पाठकों को याद होगा कि तीनेक साल पहले एक लेखक-पत्रकार ने अपनी एक इलाके की यात्रा को ऐसे अंदाज में खुलासे से लिखा था मानो वह सेक्स पर्यटन के लिए कुख्यात किसी देश से लौटकर वहां के अनजान लोगों के साथ अपने देह संबंध के बारे में लिख रहे हों। अपने दायरे के शहर, समय और परिचित लोगों के बारे में खुलकर लिखते हुए जब कोई उन्हें इस कदर नंगा करने पर उतारू हो जाए तो शिष्टïाचार की बात तो अलग रही, इंसान का इंसान पर से ही विश्वास उठ जाता है। न ऐसे लेखक आगे प्रतिष्ठïा पा सकते और न ही इन लेखकों से घायल लोग किसी दूसरे लेखक को अपना वक्त देते और न ही अपनी देह।
सामान्य पाठकों को मेरी इस बात में एक बड़ी खामी लग सकती है। अखबारों में देशभर में प्रचलित और लोकप्रिय अंगे्रजी के एक स्तंभकार खुशवंत सिंह का लिखा चटखारे लेकर पढ़ा जाता है। जितने खुलासे से वे अपने जीवन के नारी पात्रों की शिनाख्त के साथ लिखते हैं उससे उन्होंने विश्वासहीन संबंधों पर आधारित संस्मरण लेखक की एक नई शैली शुरू की है। लोग यह कह सकते हैं कि मेरी तमाम बातें बहुत दकियानूसी और पुराने ख्याल की हैं, क्योंकि खुशवंत सिंह जैसे लोग तो मेनका गांधी के बारे में सेक्स शब्दावली में लिखकर भी चर्चित और सफल हैं और अखबार उन्हें छापने पर उतारू रहते हैं। लेकिन मेरा यह मानना है कि कोई भी गंभीर व्यक्ति कोई ईमानदार राज ऐसे लेखक के साथ कभी नहीं बांटेगा, क्योंकि ऐसा लेखक कब किसके कपड़े उघाड़ दे क्या पता?
यह तो बात हुई खुशवंत सिंह जैसे बूढ़े और तीन पीढ़ी पहले के इंसान की। लेकिन आज तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टेक्नालॉजी ने लोगों के मन में किसी भी आपसी बातचीत के लिए सम्मान पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब खुफिया कैमरा या माइक्रोफोन, या मोबाइल फोन की रिकॉर्डिंग सुविधा ने स्टिंग ऑपरेशनों का सिलसिला चलाकर आपसी समझ या 'ऑफ द रिकॉर्डÓ जैसी पेशेवर बारीकियों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। इसीलिए आज बहुत से दफ्तरों में, नेताओं-अफसरों के घरों में फोन लेकर घुसना भी बंद करवा दिया गया है। लेकिन इससे भी उन लेखकों के आंख-कान और दिमाग पर रोक तो नहीं लग सकती जो किसी से उन्हें मिले समय का बेवजह का बेजा इस्तेमाल उन्हीं लोगों के खिलाफ करते हुए अपने पेशे का नुकसान भी नहीं समझते।


- सुनील कुमार

देखे सुने सब कुछ को लिखने की हड़बड़ ईमानदारी

29 जून 08

लेखक और पत्रकार समय-समय पर इस बात को अपना हक मान लेते हैं कि किसी निजी बातचीत को वे अपने समझे जनहित के हिसाब से या अपनी किताब के अधिक बिकने की संभावना पैदा करने के लिए लिख डालें। कुछ लेखक-पत्रकार ऐसे रहते हैं जो अपने देखें दायरे और अपने से हुई किसी की बातचीत का बहुत खुलासे से ब्यौरा देते हैं और उनकी भाषा और लिखने के अंदाज के कारण उनका वह हिस्सा बहुत लोकप्रिय भी हो जाता है। ऐसे दिग्गज लेखकों के लिखने की ऐसी आंखों देखी शैली उनके नाम के साथ जुड़ भी जाती है। पिछले दिनों एक पत्रकार की लिखी एक किताब की चर्चा निकली तो उसे पलट या पढ़ चुके एक पेशेवर पाठक ने  मुझसे कहा कि इस किताब की शैली फलां बड़े, नोबल पुरस्कार विजेता लेखक के अंदाज में है लेकिन उसकी उत्कृष्टïता को कहीं छू भी नहीं गई है।
मैंने इस किताब को उधार लेकर इसके कुछ हिस्से पढ़े। इसलिए कि उन हिस्सों में मेरे परिचित कुछ लोगों के बारे में काफी विस्तार से लिखा गया था।किताब की बाकी जानकारियां तो मोटेतौर पर मेरी अलग-अलग जगहों पर पढ़ी हुई थी और उन्हीं तथ्यों को एक लेखक के बहुत स्पष्टï पूर्वाग्रह के साथ दुबारा पढऩे जितनी दिलचस्पी मुझे नहीं थी। लेकिन मैं अपने परिचित कुछ लोगों का चित्रण उस किताब में देखना चाहता था।
पढ़ते-पढ़ते एक निराशा हुई कि कोई जाना-माना पेशेवर लेखक किस तरह अप्रासंगिक और संदर्भहीन बातों को उन लोगों के खिलाफ लिख सकता है जिन लोगों ने उसे मांगने पर समय दिया और सामान्य शिष्टïाचार का सत्कार भी किया। महत्वहीन बातों पर पन्ने खराब होना मेरे लिए उतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं था जितना यह खतरनाक बात थी कि किसी लेखक या पत्रकार से बात करने का मतलब अपने खिलाफ उसे लिखने का एक मौका देना है और यह खतरा उठाना है कि कोई व्यक्ति किस तरह आपके शिष्टïाचार का बेजा इस्तेमाल कर सकता है।
मुझे लिखने के पेशे को लेकर यह लगता है कि लेखक या पत्रकार को बहुत सतही और तात्कालिक उपलब्धि के लिए लोगों का भरोसा नहीं तोडऩा चाहिए। इसलिए कि वह लेखक या पत्रकार तो शायद उस नेता या अफसर या अपने हमपेशा से दुबारा न मिले और उसे तो एक अघोषित विश्वास को तोडऩे का नुकसान न झेलना पड़े, लेकिन जब उसके पेशे का कोई दूसरा कलमकार वहां पहुंचेगा तो क्या उसे वैसा सामान्य शिष्टïाचार मिल सकेगा? और शिष्टïाचार से परे, क्या उसे वैसी जानकारी कोई घायल व्यक्ति देना चाहेगा? अपने नफे के लिए, अगर यह सचमुच कोई नफा है तो, पूरे पेशे को नुकसान में डालना किस तरह की ईमानदारी है? आज अगर कोई पत्रकार किसी की बताई ऐसी बात को कहीं लिख मारता है जो उसने आपसी समझ के भरोसे में कही थी तो क्या अगली बार ऐसी किसी आपसी समझ के लिए भी कोई व्यक्ति किसी दूसरे पत्रकार को ईमानदारी से कोई बात कहेगा?
ऐसा काम करने वाले लेखकों और पत्रकारों, खासकर पत्रकारों, के बीच मैंने यह खतरनाक सोच देखी है कि किसी सूचना के साथ वे सामाजिक हित, जनहित या पेशे के लिए ईमानदारी का निष्कर्ष आनन-फानन निकालकर उसे पन्नों पर परोस देने को बेसब्र रहते हैं। जबकि लेखन या पत्रकारिता जैसे पेशे को नुकसान पहुंचाने वाली बातें व्यापक जनहित में नहीं हो सकतीं। इन दोनों कामों से लोकतंत्र का इतिहास भी जुड़ा हुआ है और भविष्य भी जुड़ा रहेगा। दो-चार कलमें तो आती-जाती रहेंगी लेकिन ये अगर किडनी कांड की तरह डॉक्टरी के पेशे को बदनाम करेंगी तो उससे पूरे पेशे की साख खराब होगी और बिना साख वाला लिखने-छपने का धंधा लोकतंत्र के लिए घातक होगा।
साहित्य के पाठकों को याद होगा कि तीनेक साल पहले एक लेखक-पत्रकार ने अपनी एक इलाके की यात्रा को ऐसे अंदाज में खुलासे से लिखा था मानो वह सेक्स पर्यटन के लिए कुख्यात किसी देश से लौटकर वहां के अनजान लोगों के साथ अपने देह संबंध के बारे में लिख रहे हों। अपने दायरे के शहर, समय और परिचित लोगों के बारे में खुलकर लिखते हुए जब कोई उन्हें इस कदर नंगा करने पर उतारू हो जाए तो शिष्टïाचार की बात तो अलग रही, इंसान का इंसान पर से ही विश्वास उठ जाता है। न ऐसे लेखक आगे प्रतिष्ठïा पा सकते और न ही इन लेखकों से घायल लोग किसी दूसरे लेखक को अपना वक्त देते और न ही अपनी देह।
सामान्य पाठकों को मेरी इस बात में एक बड़ी खामी लग सकती है। अखबारों में देशभर में प्रचलित और लोकप्रिय अंगे्रजी के एक स्तंभकार खुशवंत सिंह का लिखा चटखारे लेकर पढ़ा जाता है। जितने खुलासे से वे अपने जीवन के नारी पात्रों की शिनाख्त के साथ लिखते हैं उससे उन्होंने विश्वासहीन संबंधों पर आधारित संस्मरण लेखक की एक नई शैली शुरू की है। लोग यह कह सकते हैं कि मेरी तमाम बातें बहुत दकियानूसी और पुराने ख्याल की हैं, क्योंकि खुशवंत सिंह जैसे लोग तो मेनका गांधी के बारे में सेक्स शब्दावली में लिखकर भी चर्चित और सफल हैं और अखबार उन्हें छापने पर उतारू रहते हैं। लेकिन मेरा यह मानना है कि कोई भी गंभीर व्यक्ति कोई ईमानदार राज ऐसे लेखक के साथ कभी नहीं बांटेगा, क्योंकि ऐसा लेखक कब किसके कपड़े उघाड़ दे क्या पता?
यह तो बात हुई खुशवंत सिंह जैसे बूढ़े और तीन पीढ़ी पहले के इंसान की। लेकिन आज तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टेक्नालॉजी ने लोगों के मन में किसी भी आपसी बातचीत के लिए सम्मान पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब खुफिया कैमरा या माइक्रोफोन, या मोबाइल फोन की रिकॉर्डिंग सुविधा ने स्टिंग ऑपरेशनों का सिलसिला चलाकर आपसी समझ या 'ऑफ द रिकॉर्डÓ जैसी पेशेवर बारीकियों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। इसीलिए आज बहुत से दफ्तरों में, नेताओं-अफसरों के घरों में फोन लेकर घुसना भी बंद करवा दिया गया है। लेकिन इससे भी उन लेखकों के आंख-कान और दिमाग पर रोक तो नहीं लग सकती जो किसी से उन्हें मिले समय का बेवजह का बेजा इस्तेमाल उन्हीं लोगों के खिलाफ करते हुए अपने पेशे का नुकसान भी नहीं समझते।

मुद्दे के म को कुचलते बाकी चार म

22 जून
मंच पर या नीचे, किसी भी तरफ बैठकर किसी कार्यक्रम की तकलीफ को भुगतना कभी-कभी अपनी पसंद से परे की बात हो जाती है। कुछ स्थितियां ऐसी बनती हैं कि वहां जाना ही पड़ता है। हर महीने औसतन एक बार ऐसे तकलीफ से गुजरते हुए मैं यह सोचते चलता हूं कि देश का कितना समय फि जूल की बातों में खर्च होता है।
पहले तो किसी कार्यक्रम में पहुंचना अपने-आप में घंटे-आधे घंटे की बात होती है। फिर लगभग इतना ही वक्त कार्यक्रम शुरू होने के इंतजार में बर्बाद होता है। इसके बाद फूलों पर अत्याचार का दौर चलता है और लोग एक-दूसरे का लंबा स्वागत करते चलते हैं। इसके बाद बारी आती है एक-दूसरे के बारे में झूठ बोलने की। एक-दूसरे में नामौजूद खूबियों को गढ़कर उनका ऐसा लंबा-चौड़ा बखान होता है कि झूठ से मन अघाकर उबकाई खाने लगता है। लगता है कि कौन किसको बेवकूफ बना रहा है? मंच के लोग, सामने बैठे लोग और उन दोनों तबकों के बीच माला-गुलदस्ता लेकर आते-जाते लोग, हर कोई तो असलियत को जानता है। और जब तमाम लोग सच को जानते हैं तो ऐसे भूले हुए सच की याद भी मंच, माइक और माला के बीच खड़े किए जाते झूठ से एक बार फिर आ जाती है। अगर ऐसा झूठ खड़ा न किया जाए तो इंसानी मिजाज लोगों के सच को भूलने की कोशिश भी करते रहता है। क्योंकि बहुत सच के साथ जीना आसान नहीं होता इसलिए हम सब एक-दूसरे के सच को अनदेखा करने में भी लगे रहते हैं। एक-दूसरे का पूरे का पूरा सच पूरे एहसास के साथ महसूस करने लगे तो फिर केवल अनजान के साथ ही रहना हो पाएगा। लेकिन मंच से या बराबरी की जमीन वाली किसी बैठक में जो झूठ कहा जाता है वह फिर ऐसे एहसास को ताजा करता है और वैसी जगह पर बैठना मेरे लिए भारी पडऩे लगता है।
चूंकि कुछ लोगों को जिंदा रहना होता है, कुछ लोगों को जिंदा करना होता है और कुछ लोगों को आगे अपनी स्मृतियां जिंदा रखने की गारंटी करनी होती है इसलिए कार्यक्रम तो होते ही रहेंगे। लेकिन मैं सोचता हूं कि किसी राज्य के मुख्यमंत्री या देश के प्रधानमंत्री अगर यह शर्त रख दें कि उनके कार्यक्रम में फूलों से सिर्फ एक स्वागत हो और संबोधन में कोई भी व्यक्ति किसी का भी नाम या पदनाम न गिनाए तो ऐसे कार्यक्रमों का समय शायद आधा ही रह जाएगा। ऐसी मूर्खतापूर्ण परंपरा कब और कैसे शुरू हुई मैं यह सोचते ही रह जाता हूं। जब पूरी तरह से अर्थहीन औपचारिकता मंच पर चलती रहे और वहां बैठे लोग मूर्खों की तरह किसी सार्थक बात के शुरू होने का इंतजार करें तो यह देश की उत्पादकता का नुकसान है।
मंच, माला, माइक और महत्व के नाम पर एक ऐसा फरेब मुझे चारों तरफ दिखता है जिसमें म से शुरू होने वाला एक और शब्द, मुद्दा, खो ही गया है। ऊपर के चारों म के पैरों तले यह पाँचवां, अकेला जरूरी म, बुरी तरह कुचला जाता है। मुद्दे का म ऐसा हो जाता है मानो किसी गरीब बच्चे के मेरिट में आने पर स्कूल के शिक्षक, प्राचार्य, अध्यक्ष-सचिव मिलकर उसके साथ तस्वीर खिंचवाएं और उसमें बच्चे का चेहरा ही गायब हो जाए। ऐसी स्थिति अगर मंच पर हो तो उसमें पता लगे कि माइक पर ऊपर के चारों महानुभाव एक-दूसरे की प्रशंसा करते रह जाएं, एक-दूसरे को माला पहनाते रह जाएं और बच्चे की कोई चर्चा ही न हो।
जिस तरह कुछ लोग अपने जिंदा रहने या अपनी स्मृतियों को जिंदा रखने के लिए इन चार म का इस्तेमाल करते हैं उसी तरह से कुछ ऐसे पेशेवर दर्शक, श्रोता और मेहमान हो गए हैं जो बिना भाड़ा पाए किसी भी कार्यक्रम में दांत निपोरते चले जाते हैं और कार्यक्रम की 'शोभा बढ़ातेÓ हैं। कुल जमा इस तरह के पेशेवर लोगों या ऐसे पेशेवर निरर्थक अंदाज के कार्यक्रमों में देश का इतना बड़ा समय बर्बाद हो रहा है कि कार्यक्रमों के नाम पर उबकाई अधिक आती है।
कुछ आयोजकों से बेतकल्लुफी के चलते मैंने यह भी कहा कि कार्यक्रम के कुल जमा समय का कम से कम आधा हिस्सा तो सार्थक बातों का रखा जाए, लेकिन उन्होंने पूरी कोशिश करके बताया कि इस बार तो सब कुछ तय हो चुका है, अगली बार इसकी कोशिश करेंगे। आज की व्यस्त जिंदगी में लोगों के पास शास्त्रीय संगीत के आलाप की तरह की लंबी शुरूआत का समय हो तो सकता है लेकिन उसका आलाप जैसा मधुर होना भी जरूरी है। कानों और आंखों में कंकड़ की तरह खटकने वाले झूठ, फरेब और मक्कार विशेषणों का आलाप कोई कैसे झेल सकता है यह मेरी समझ से परे है। ऐसे में भड़ास निकलती है वहां गिनाए जा रहे विशेषणों को झूठा साबित करने वाले तथ्यों और तर्कों को पड़ोस के साथ बांटने में। लेकिन ऐसा करते हुए मन में यह आत्मग्लानि भी रहती है कि श्मशान में आकर मुर्दें के बारे में अप्रिय चर्चा करना अच्छी बात नहीं है।
मुझे लगता है कि एक किसी मंच पर, या बैठक में इस बात पर खुली चर्चा होनी चाहिए कि एक सुधारवादी आंदोलन की तरह मंच सुधारो अभियान कैसे चलाया जा सकता है? कैसे ऋण मुक्ति अभियान की तरह झूठ मुक्ति अभियान चल सकता है? कैसे व्यसन मुक्त समाज की तरह विशेषण मुक्त समाज बनाने की मुहिम चलाई जा सकती है। और कैसे मासूम, बेजुबान फूलों पर अत्याचार खत्म किया जा सकता है? मुझे इस बात का पूरा भरोसा है कि मंचों के आर-पार या बैठकों में बहुत से ऐसे लोग आते-जाते हैं जिनके पास बर्बाद करने को इतना वक्त नहीं होता, और न ही झूठ को बर्दाश्त करने की क्षमता होती। ऐसे लोग ही इस बात की पहल करें कि किसी काबिल संपादक की मदद से इन कार्यक्रमों का संपादन कैसे किया जाए और फिर फिजूल को काट-छांटकर बचे कार्यक्रम की शैली को बढ़ावा देने का अभियान चलाया जाए। ऐसे एक सुधारवादी अभियान के बिना देश का समय बर्बाद होना रूकते नहीं दिखता।
कुछ और
कल तक ऊपर का लिखा हुआ लिखकर यह तसल्ली हो गई थी कि हर हफ्ते मेरी वजह से यह पत्रिका लेट होती है क्योंकि मैं भाग-दौड़ के बीच इन दो-तीन पन्नों को लिखने का समय नहीं निकाल पाता, और इस बार यह काम समय पर हो गया। लेकिन आज फिर कुछ खबरों को पढ़कर इसमें कुछ जोडऩे का दिल किया। यह आगे की बात हो सकता है कि पूरी तरह पीछे की बात से जुड़ी हुई न हो।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से इन सात-आठ बरसों में लगातार प्रदेश के इतिहास के कुछ महान लोगों की स्मृतियों को लेकर एक कीर्तन सा चल रहा है। स्मृतियां इतनी संपन्न और सुविधाजनक बनाई जा सकती हैं कि वे जनमान्यताओं से लेकर इतिहास के चुनिंदा तथ्यों तक, कई पसंदीदा बातों पर टिकी हो सकती हैं। आज जब ताजा-ताजा दिवंगत हुए इंसान के लिए स्मृतियों और श्रद्घांजलि के रूप में सर्वविदित असत्य की सुनामी लहरें बहा दी जाती हैं तो फिर इतिहास को लेकर कड़वी बात कोई कैसे कर सकता है। इसलिए रामजन्मभूमि से लेकर रामसेतु तक ईसा मसीह से लेकर घोटुल तक और जिन्ना से लेकर गांधी तक हर किसी के इतिहास को मनमाफिक ढाला जा सकता है। इतिहास जब छांटकर उठाया जाता है तो वह सवाल खड़े नहीं करता, जैसा कि वर्तमान हमेशा ही करता है और भविष्य तो सिर्फ सवाल ही रहता है।
यादों की शहनाईयों की धुन और उनका राग इस कदर लोगों को बांध लेते हैं कि लोग असुविधाजनक वर्तमान को अनदेखा करके, वर्तमान की मांग को अनसुना करके स्मृति-कीर्तन में लगे रह सकते हैं और आने वाले कल के लिए वे इतिहास का उसी तरह से गुणगान करते रह सकते हैं जिस तरह नींव के पत्थरों के बाद दीवारें खड़ी किए बिना कोई सिर्फ छत ढालने की बात करता रहे।
मैं कुछ और साफ-साफ बात करूं तो छत्तीसगढ़ के इतिहास के साहित्यकारों और पत्रकारों की जिंदगी और काम को लेकर उसी तरह का पे्रम यहां पिछले बरसों में चल रहा है जिस तरह का खेलपे्रम खेल के टेलीविजन पर प्रसारण को देखकर जाहिर किया जा सकता है। लेकिन घर के टीवी के सामने बैठे खेल दर्शकों से खेल का जितना भला हो सकता है शायद उतना ही भला छत्तीसगढ़ के स्मृति कीर्तन से यहां के वर्तमान और भविष्य का हो रहा है। आज का वर्तमान सौ-सौ सवाल लेकर खड़ा है। ये तमाम सवाल अगर सौ बरस पहले के किसी महान पत्रकार या साहित्यकार के सामने होते तो क्या वे भी केवल कालिदास-कीर्तन या तुलसीदास-कीर्तन करके खुद महान हो सकते थे, या उनका साहित्य या उनकी पत्रकारिता महान हो सकती थी?
कुछ अधिक कड़वी जुबान में कहूं तो छत्तीसगढ़ राज्य के अस्तित्व के पहले इन सात-आठ बरसों में स्मृतियां आज की जरूरतों पर, आज की जिम्मेदारियों पर, और भविष्य की चुनौतियों पर कुछ उसी तरह हावी हो गई हैं जिस तरह किसी गरीब के घर पर मृत्यु-भोज की सामाजिक जिम्मेदारी भारी पड़ती है। घर के बच्चों के सालभर के खाने-पीने का सब कुछ एक दिन के सामाजिक डांड में निकल जाता है। किसी तस्वीर से आज की हालत का मुकाबला करें तो राखी के दिन जेलों में पहुंचीं ब्रम्हकुमारियों या लॉयन्स क्लब की महिलाओं की याद आती है जो कैदियों को पहले समारोह पूर्वक राखी बांधते हुए तस्वीरें खींचवाती हैं और दूर-दूर से आईं उन कैदियों की सगी बहनें जेल के अहाते में पेड़ के नीचे अपनी बारी की राह देखती रहती हैं। आज वर्तमान के मुद्दे इसी तरह समारोहों के सभागृह वाले अहाते के पेड़ों तले बैठे रहते हैं और अपने-आपको बुद्घिजीवी, रचनाकार, सरोकार का पैरोकार, समाज का मार्गदर्शक, नीति-निर्धारक, संवेदनशील कहने वाला तबका मंच पर यादों की उस बारात में मस्त रहता है जिसका आज की कड़वी हकीकत से उसी तरह कुछ लेना-देना नहीं है जिस तरह बारातियों का सड़क की बाकी दिक्कतों से कोई लेना-देना नहीं रहता।
यह सोचने की जरूरत है कि इतिहास की ठंडी, सुविधाजनक छाया में बैठकर कब तक आज के समाज का तथाकथित जिम्मेदार तबका वर्तमान को अपना बैनर तानने से रोके रहेगा? क्या यही रूख इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं है कि आज जनता के बीच साहित्यकार, कलाकार, नाटककार और बुद्घिजीवियों के लिए कोई खास सम्मान नहीं रह गया और इन तबकों के कुछ दर्जन या कुछ सौ लोग हर शहर में एक घेरा बनाकर एक-दूसरे की पीठ खुजाते दिखते हैं। क्या भविष्य के इतिहास में किसी युग को इसलिए याद किया जा सकता है कि उस युग ने अपने पिछले युग को महिमामंडित करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी? मूर्ति-पूजा उस दिन महत्वहीन, और शायद गैरजरूरी हो जाती है जिस दिन कुपोषण के शिकार बच्चों की बस्ती में शिवलिंग पर दूध के घड़े पलटे जाते हैं।
कुल जमा मतलब यह कि छत्तीसगढ़ के आज के बहुत कड़वे, बहुत असुविधाजनक मुद्दों को अनदेखा करने वाले इतिहास-कीर्तन से क्या कोई सभागृह खाली बचेगा जिसमें आज के साहित्य, पत्रकारिता, रचनात्मकता, सामाजिक आंदोलन, सामाजिक विसंगतियों, शोषण, भष्टï्राचार, राजनीतिक षडयंत्र, असमानता की यातना भोगने वाले लोग अपनी भी एक छोटी बैठक कर सकें और उस बैठक के लिए कीर्तनियों में से कुछ लोग आ सकें।


-सुनील कुमार
 

कितने बरस का फासला बचा है

15 जून 08
कुछ महीने पहले मिजोरम जाकर आने का एक फायदा यह रहा कि वहां से बहुत से लोग बीच-बीच में संपर्क करने लगे। वहां काम कर रहे एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक पत्रकार की अभी कुछ और लोगों के साथ एक दूसरे उत्तर-पूर्वी राज्य के सांसद से मुलाकात हुई। इस बातचीत के बारे में काफी खुलासे से मुझे यहां बैठे पता लगा।
उत्तर-पूर्व के एक सांसद का कांगे्रस का अनुभव सुनने लायक है। काफी समय पहले उन्होंने जब लोकसभा चुनाव लडऩा तय किया तो कांगे्रस पार्टी छांटी। इस पार्टी की टिकट मांगी तो इसे तय करने के लिए जो पर्यवेक्षक आए उन्होंने लगातार दो चुनाव में टिकट के लिए 25-25 लाख रुपए मांगे। ऐसा न होने पर उन्हें टिकट नहीं मिली। तीसरे चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लोगों ने उनसे संपर्क किया और अपनी पार्टी से चुनाव लडऩे के लिए कहा। चुनाव के लिए पर्याप्त खर्च भी पार्टी ने दिया और उन्हें सांसद बनवाया। पहली बार में वे भाजपा की टिकट पर नहीं जीत पाए तो चुनाव नतीजे आने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें फोन करके दिलासा दिलाया और सक्रिय रहने को कहा। नतीजा यह रहा कि अगली बार वे चुनाव फिर लड़े और भाजपा की टिकट पर सांसद बने।
कांगे्रस पार्टी की टिकट के लिए भुगतान लेने का यह नया मामला नहीं है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में विधानसभा चुनाव की टिकटें जिस तरह से दी जाती हैं उनको लेकर पार्टी के भीतर यह खुलकर चर्चा रहती है कि किसने किसको कितना भुगतान किया है। पार्टी या नेता जो भी टिकट के लिए वसूली करता हो, यह बात हर कोई जानता है कि मेडिकल और इंजीनियरिंग की पेमेंट सीट की तरह कुछ संपन्न इलाकों की कांगे्रस की टिकटें बिकती हैं।
लेकिन कांगे्रस को हम कुछ अधिक करीब से देख रहे हैं और उसमें यह खरीद-बिक्री कुछ अधिक है इसलिए राज्यसभा के चुनाव के समय भी किसी बड़े कारोबारी को टिकट मिलने के साथ ही यह चर्चा भी हो जाती है कि उसने पार्टी को या पदाधिकारियों को कितना भुगतान किया है। लेकिन दूसरी पार्टियों में भी जगह-जगह धनपशुओं से इस तरह की उगाही आम बात है। पिछले दिनों कर्नाटक के चुनाव में एक विधानसभा सीट पर दो लोहा खदान मालिकों ने 100-100 करोड़ रुपए खर्च किए ऐसी खबरें लगातार टीवी और अखबारों में रहीं। इसके अलावा दोनों-तीनों पार्टियों को लोहा खदान मालिकों से मिली लंबी-चौड़ी रकम से कर्नाटक का चुनाव लड़ा गया। जाहिर है कि जनता के हक का यह लोहा जब मिट्टïी के दाम से भी कम पर, लगभग मुफ्त उद्योगपतियों को दिया जाता है तो उसके एवज में पार्टियां भी अरबपति होती हैं। ऐसा भी होता है कि सत्ता या संगठन में बैठे हुए फैसले लेने वाले लोग खुद भी अरबपति हो जाते हैं।
आठ बरस पहले जब छत्तीसगढ़ नया राज्य बनने को था तो यह आशंका थी कि शराब व्यापारी सरकार बनवाएंगे या बनने से रोकेंगे। ऐसी जनधारणा थी कि दूर के ग्रामीण इलाकों से आने वाले आदिवासी विधायकों के साथ  कोई न कोई शराब-प्रतिनिधि चिपक गया है और विधायकों को प्रभावित करने का पूरा इंतजाम हो गया है। लेकिन इन आठ बरसों में ही हमने छत्तीसगढ़ में शराब के धंधे की ताकत को तीसरे, चौथे या पाँचवें नंबर पर जाते हुए देख लिया। अब यहां खदान उद्योग की ताकत इतनी बढ़ गई है कि एक-एक लोहा, कोयला या सीमेंट, बॉक्साइट खदान से लोगों का सैकड़ों से हजारों करोड़ तक का सीधा नफा दिख रहा है। जिन सत्तासीन लोगों से उद्योगपति और व्यापारी, दलाल और नेता इस कदर के फायदे पाते हैं, जाहिर है कि उसी हद तक वे अगली सरकार में दिलचस्पी रखेंगे। ऐसे में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा होता है।
दिल्ली में पिछले दिनों मेरे एक मित्र और सांसद संदीप दीक्षित से बात हो रही थी। वे राजनीति में अपनी मां शीला दीक्षित की तरह साफ-सुथरे माने जाते हैं और जनधारणा है कि उन्होंने अभी तक भ्रष्टïाचार शुरू नहीं किया है। उनसे बातचीत में जब सांसदों को मिलने वाली सहूलियतों की लंबी फेहरिस्त को लेकर मैं उनकी खिंचाई कर रहा था और कह रहा था कि कहीं से मुझे भी टिकट दिला दो तो लोकसभा का चुनाव लड़कर ये सारे ऐश-आराम पा लूं। उन्होंने अपना दुखड़ा बताया कि चुनाव इस कदर महंगा हो गया है कि किसी ईमानदार के लिए बिना कालेधन के इसे लडऩा लगभग असंभव हो गया है और यही वजह है कि  कुछ लोग जो चुनाव जीत भी सकते हैं वे भी लोकसभा के बजाय राज्यसभा में जाना पसंद करते हैं।
यह बात सुनकर मुझे एक दूसरी घटना याद आई जिसमें एक आपसी बातचीत में एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पिछला लोकसभा चुनाव उन्हें 16 करोड़ का पड़ा था और अगला चुनाव वे लड़ भी पाएंगे या नहीं उन्हें नहीं पता। इसी के साथ वह खबर याद पड़ी जिसमें कुछ हफ्ते पहले भाजपा की परेशानी का जिक्र था कि उसके तमाम दिग्गज और सितारा नेता एक-एक करके राज्यसभा में पहुंच गए हैं और अगले लोकसभा चुनाव में उसे ऐसे जीतने वाले नेताओं की कमी पडऩे वाली है।
शायद थोड़े से ईमानदार या इंतजाम करने में थोड़े से कमजोर नेता लोकसभा जाने के लिए पहले तो टिकट के लिए करोड़ों, फिर अपने कार्यकर्ताओं के लिए करोड़ों और फिर मतदाताओं के लिए करोड़ों जुटाने के बजाय पार्टी को खुश करके राज्यसभा में जाना पसंद करते होंगे ताकि  एक बार हाईकमान के पैर पकडऩा ठीक है, रोज-रोज कब तक कार्यकर्ताओं, मतदाताओं और धंधेबाजों को खुश करते रहें। कब तक संसद में सवाल पूछने के लिए रुपए लेते रहें और कब तक बड़ी-बड़ी कंपनियों के मामले लेकर सत्ता में दलाली करने के लिए घूमें?
इन्हीं सारी चर्चाओं के बीच भारतीय लोकतंत्र के लिए फिक्रमंद एक दोस्त से बात हो रही थी तो उनका कहना था कि लोकतंत्र केवल उन टुकड़ों में जिंदा है जिनका कोई खरीददार अभी तक नहीं मिला है या जिनको बेचने की गुंजाइश अभी तक लोगों को नहीं मिली है। जिस अंदाज में इस लोकतंत्र की संवैधानिक संस्थाएं, उनकी कुर्सियां, उनके अधिकार और उनकी ताकत बिक और नीलाम हो रही है उसे देखना हो तो सत्ता के गलियारों में दलालों को देखना होगा।
बहुत बरस बाद मैंने अभी एक फिल्म 'सरकार राजÓ देखी। यह फिल्म शायद इसी मुद्दे पर इन्हीं लोगों को लेकर बनी एक पहली फिल्म 'सरकारÓ का दूसरा हिस्सा थी। फिल्म में जाहिर तौर पर महाराष्टï्र के एक वक्त के बेताज बादशाह बाल ठाकरे के चरित्र और परिवार से मिलती-जुलती कहानी है। और बाल ठाकरे के निजी दोस्त अमिताभ बच्चन और उनके परिवार ने इस फिल्म में काम किया है। इसमें सत्ता को चलाने वाले लोग किस किस्म के माफिया होते हैं इस बात को बहुत ही खौफनाक तरीके से पेश किया गया है। और किसी प्रदेश को प्रभावित करने वाले बड़े-बड़े, दसियों हजार करोड़ के फैसले किस तरह हत्याओं के साथ पूरे होते हैं या करवाए जाते हैं इसकी एक भयानक तस्वीर इस फिल्म में है।
इसे देखने के बाद से मैं लगातार सोच रहा हूं कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से सत्ता को कुछ अधिक करीब से देखने का जो मौका मिला, या जो नौबत आई उसमें और 'सरकार राजÓ में अभी कितने बरस का फासला बचा है।
-सुनील कुमार

असहमत

8 जून 08

खबर कुछ भयानक है। सुप्रीम कोर्ट ने जब इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक वकील की तस्वीर देखी जो कोर्ट के आदेश पर हथकडिय़ों से बांधकर रखा गया था तो कोर्ट हक्का-बक्का रह गया। अदालत की अवमानना के मामले में वहां के दो जजों ने इस वकील को गिरफ्तार करने के आदेश दिए थे और ऐसा कहा जा रहा है कि अदालत ने ही उसे हथकडिय़ों से बांधकर रखने को कहा था और उसी तरह उसे अदालत में पेश करने को कहा था। हालांकि उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए सरकारी वकील ने कहा कि जजों ने हथकड़ी लगाने का आदेश नहीं दिया था। उसने यह भी कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जजों की भूमिका की जांच के लिए एक न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं।
मृत वकील के मामले को यहां उठाने वाले एक दूसरे वकील अलतमस रेन ने कहा कि एडव्होकेट श्रीकांत अवस्थी इस अपमान से सदमे में थे कि उन्हें हर रोज अदालत में हथकडिय़ों में पेश किया जा रहा था। इसके बाद वे बीमार हो गए और वे कुछ भी खाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि जब जेल और पुलिस अधिकारियों ने जजों को बताया कि वकील ने खाना बंद कर दिया है तो इन जजों में से एक ने बहुत ही अहंकारी ढंग से कहा - 'क्या आप लोगों को मालूम नहीं है कि ऐसे व्यक्ति को कैसे खिलाया जाता है?Ó
अलतमस रेन ने सुप्रीम कोर्ट को आगे बताया कि जब अधिकारियों ने हाई कोर्ट जजों को दुबारा बताया कि वकील अब भी कुछ भी नहीं खा रहा है तो एक जज, जस्टिस चौहान, ने कहा- 'उसे मर जाने दोÓ।
इसके बाद श्रीकांत अवस्थी को इलाहाबाद के एक अस्पताल में भर्ती किया गया जहां पलंग से बेडिय़ों से बांधकर रखा गया।
अलतमस रेन ने सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाया कि 1988 में तीस हजार कोर्ट के एक वकील के प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश और नियम तैयार करवाए थे कि जब तक कोई व्यक्ति खूंखार अपराधी न हो या उसका व्यवहार हिंसक न हो या वह कानून तोड़ न रहा हो, उसे हथकड़ी न लगाई जाए।
यह पूरा मामला हाई कोर्ट के जजों के उस अहंकार और तानाशाही का है जो धीरे-धीरे देश की बहुत सी अदालतों के बहुत से जजों में आमतौर पर देखने मिलते हैं। भारत की न्याय व्यवस्था में यह एक बहुत अलोकतांत्रिक बात है कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में एक बार जज बन जाने के बाद उस व्यक्ति को हटाने के लिए महाभियोग के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता। इससे जजों की मनमानी भी चलते रहती है और उस पर कोई कार्रवाई भी आमतौर पर बड़ी अदालत नहीं कर पाती।
हमारा यह स्पष्टï मानना है कि किसी भी अदालत में जज द्वारा कहे जाने वाले एक-एक शब्द को दर्ज करना चाहिए। अदालतों में पहुंचने वाले लोगों का यह अनुभव है कि आमतौर पर जज वहां मौजूद लोगों के लिए बहुत ही अहंकारी और अपमानजनक व्यवहार रखते हैं। वे ऐसी बहुत सी बातें कहते हैं जिन्हें आदेश में नहीं लिखा जाता और अगर कोई व्यक्ति किसी जज के व्यवहार के खिलाफ ऊपर जाना भी चाहे तो चूंकि जुबानी बातों का कोई रिकॉर्ड अदालत नहीं रखती इसलिए ऊपरी अदालत में जाकर इंसाफ पाना नामुमकिन होता है। जब संसद और विधानसभा में कहे गए एक-एक शब्द को दर्ज किया जाता है तब अदालतों को अपनी कही बातों की रिकॉर्डिंग में कोई दिक्कत क्यों होनी चाहिए? अधिक अच्छा तो यह होगा कि जिस तरह संसद की कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग होती है और उसका प्रसारण होता है उसी तरह बड़ी अदालतों की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग तो होनी ही चाहिए और उसकी कॉपी हासिल करना आसान बनाना चाहिए। ऐसे में अदालती कार्रवाई के दौरान जजों की मनमानी, उनकी पसंद-नापसंद और उनका पूर्वाग्रह दर्ज हो सकेगा।
यह मामला तो चूंकि एक हाई कोर्ट वकील का था और जिस कू्रर अंदाज में अपमान करके उसे मारा गया, उसकी तस्वीरें मौजूद हैं इसलिए सुप्रीम कोर्ट के हक्का-बक्का रहने और सदमे में आने की नौबत आई। लेकिन ऐसे कितने लोग हैं जिनकी ताकत या जिनकी पहुंच हाई कोर्ट के एक वकील जितनी हो? देश में आबादी का एक फीसदी हिस्सा भी इतनी ताकत नहीं रखता। जब अदालत के पेशे से जुड़े एक व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है और उसकी ऐसी मौत हो सकती है तो बाकी लोग क्या उम्मीद कर सकते हैं?
देश में न्यायिक सुधार और अदालतों की पारदर्शिता को लेकर जो आंदोलन चल रहा है वह लगातार अवमानना के कानून को खत्म करने की बात करता है। इस आंदोलन के परे भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो अवमानना के कानून को अलोकतांत्रिक मानते हैं। अदालतों ने अपने-आपको अवमानना के एक निहायत ही गैरजरूरी घेरे में छुपा रखा है। लोकतंत्र में इस तरह के विशेषाधिकार ठीक नहीं है। लेकिन खराब स्थिति यह है कि  सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा मुख्यन्यायाधीश भी इस अलोकतांत्रिक सुरक्षा कवच के पक्ष में हैं। यह मामला एक बार फिर हमें एक बहस के लिए पर्याप्त लगता है जो जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट जजों के खिलाफ दायर की गई है उस पर फैसले से देश की न्यायापालिका का व्यवहार तय होगा। अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के जजों को बचाते दिखेगा तो इस बात को जनता समझ भी लेगी। अदालतों की मनमानी को खत्म करके एक पारदर्शी व्यवस्था लागू करनी चाहिए।

इनको अपील का क्या हक? और जरूरत भी क्या...

1 जून 08
लिफाफे पर लिखावट से लगा था कि यह नक्सलियों का भेजा बयान होगा और वही निकला। हालांकि छत्तीसगढ़ के बस्तर में सक्रिय नक्सलियों को सरकार और पत्रकार ही नक्सली कहते हैं, वे खुद अपने-आपको माओवादी लिखते हैं। आज न जो माओ रह गया और न जिस माओ की जमीन पर इस किस्म का माओवाद रह गया, उन नामों को लेकर यहां पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) चल रही है। इसके बहुचर्चित प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने इस ताजा बयान में चेरपाल में हुई दो हत्याओं का जिक्र करते हुए छत्तीसगढ़ के मजदूर किसानों, पत्रकारों, कवि-लेखकों और तमाम जनवादी बुद्घिजीवियों से अपील की है कि वे इस हत्याकांड की घोर निंदा करें और सरकार से मांग करें कि ऐसे हत्याकांड बंद करें, सलवा जुडूम बंद करें और तथाकथित राहत शिविरों में बंद तमाम आदिवासियों को वापस गांव भेजें।
पाठकों को याद होगा कि 22 मई की रात सीआरपीएफ के जवानों ने बस्तर के बीजापुर जिले के चेरपाल में राहत शिविर में सो रहे लोगों को उठाकर, बाहर निकालकर उन पर बेवजह गोलियां चलाईं और इससे 25 साल की आदिवासी महिला श्यामबाई और ढाई साल के बच्चे की वहीं पर मौत हो गई। दो दूसरे लोग इसमें घायल हुए जिसमें से एक बच्चा भी है।
इस घटना का समाचार खुलासे से छपा है और सीआरपीएफ जवान पर बिना किसी उकसावे के, बिना वजह हत्या कर देने का जुर्म भी कायम किया गया है।
नक्सलियों के प्रवक्ता ने मेरी तरह के बहुत से लोगों से, जिनमें छत्तीसगढ़ की लगभग पूरी आबादी आ जाती है, उनसे अपील की है कि हम सब इस हत्याकांड की निंदा करें और सरकार से मांग करें कि ऐसे हत्याकांड बंद करें। दूसरी तरफ इसी बयान में उसेंडी ने लिखा है कि छत्तीसगढ़ सरकार को सर्वोच्च अदालत की फटकार की कोई फिक्र नहीं है। और रमन सरकार लाशों पर विकास यात्रा का आयोजन कर रही है।
नक्सलियों ने लोगों से एक अपील करने की अपील की है इसलिए उनसे यह पूछने को दिल करता है कि उनकी पूरी सशस्त्र लड़ाई में अपील की जगह कहां है? उनको तो जिन मुद्दों को लेकर सरकार से अपील करनी थी या जिन मुद्दों को लेकर जनप्रतिनिधि बनने के लिए जनता से वोटों की अपील करनी थी उन मुद्दों पर तो उन्होंने थोक में हत्याएं करने का तरीका अपनाया हुआ है। उनको किसी से अपील करने का, और आगे अपील बढ़ाने की अपील का क्या हक है? जिनका भरोसा जंगलों में अलोकतांत्रिक अदालतें लगाकर लोगों को कुसूरवार ठहराकर काट डालने का है। उनकी शब्दावली में अपील शब्द कहां से आ गया? लड़ाई तो एक ही किस्म के हथियार से हो सकती है या तो जमीनों के नीचे बारूदी सुरंगें लगाकर एक-एक धमाके में दर्जनों लोगों को एक मुश्त मारा जा सकता है या फिर लोकतांत्रिक अपील की जा सकती है। अब अगर अपील भी नक्सली ही करेंगे तो लोकतांत्रिक जनता क्या करेगी?
हमने ऊपर जिस लड़ाई का जिक्र किया है वह लड़ाई भी लड़ाई न होकर लोकतंत्र पर एक हमला है। लड़ाई तो किसी दुश्मन से हो सकती है या किसी बुराई से। आज इस देश में शासन के लिए जो लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद सबसे बेहतर है उस व्यवस्था पर लगातार हमला कोई लड़ाई नहीं है, वह शांत जनता के हक पर हमला है। आज नक्सली बस्तर की जिस शोषित और पीडि़त जनता के हक को लेकर लडऩे की बात कहते हैं क्या उसे उसके हक इस लड़ाई के सौ बरस तक जारी रहने पर भी मिल पाएंगे? क्या सिर्फ खूनखराबे में लगे नक्सलियों के लाए कोई ऐसी जागरूकता इन आदिवासियों में आ सकती है जिससे वे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने हक बेहतर तरीके से पा सकें। छत्तीसगढ़ बनने के बाद से इस लड़ाई को अधिक करीब से देखने का मौका मिला, इसलिए भी कि ये हमले तेज हुए और इसलिए भी कि सरकार रायपुर में रहकर इनसे निबटने के लिए तैयारी करते दिखी। भोपाल में बैठी सरकार की प्राथमिकता में तो नक्सली हिंसा को खत्म करना था भी नहीं।
नक्सलियों की बातों को लगातार सुनकर विस्तार से पढ़कर और उसे पाठकों के सामने रखकर जो विचार-विमर्श हमने पिछले एक बरस में छेड़ा उसके अंत में खुद हमें जो एहसास हुआ है वह यह है कि नक्सली दोनों हाथों में लड्डïू चाहते हैं। एक तरफ वे लोकतंत्र की पूरी इमारत को गिराना उसी तरह चाहते हैं जिस तरह तालिबानों ने अफगानिस्तान में बुद्घ की प्रतिमाएं गिराईं। दूसरी तरफ वे लोकतंत्र के तमाम औजारों का इस्तेमाल अपने बचाव और वैचारिक युद्घ में करना चाहते हैं। मुझे इस बात पर हैरानी होती है कि गुड्सा उसेंडी छत्तीसगढ़ सरकार को यह उलाहना देते हैं कि उसे सर्वोच्च अदालत की फटकार की कोई फिक्र नहीं है और केंद्रीय जांच दल के आने और जाने से भी उसके जुल्मी अभियान पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। इन्हीं तमाम संस्थाओं के खिलाफ तो नक्सली पूरे हमले कर रहे हैं। जिनका पूरा काम थोक में हत्याओं के बिना न चलता हो उन्हें अदालत के जिक्र का क्या हक है? उनके पास तो बंदूकों के बल पर जंगल में अपनी खुद की अदालतें हैं, जहां वे ही जांच अधिकारी भी हैं, वे ही गवाह और जज भी हैं और वे ही जल्लाद भी हैं।
सलवा जुडूम जैसे आंदोलन से किस तरह बस्तर के बेकसूर आदिवासियों पर अमानवीय जुल्म हो रहा है इस मुद्दे को उठाने का हक देश के लोकतांत्रिक लोगों को तो है लेकिन नक्सलियों को इस बात की परवाह क्यों होनी चाहिए कि किसी के साथ अलोकतांत्रिक और अमानवीय जुल्म हो रहा है। वे खुद भी तो केवल यही काम कर रहे हैं। सलवा जुडूम के आंदोलनकारियों या बस्तर के चर्चित एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) जो हिंसा करते हैं उसकी तो एक-एक घटना पर दर्जनों बयान गैर हथियारबंद लोगों से आ जाते हैं लेकिन इन बयानों में नक्सलियों के बयान की कोई जगह कैसे हो सकती है? एक हत्यारा किसी दूसरे हत्यारे पर ऊंगली किस तरह उठा सकता है? और इस देश में चाहे किसी भी किस्म की विचारधारा हो, चाहे किसी भी किस्म का लक्ष्य हो, उसका झंडा उठाए लोगों को क्या हक है कि वे हत्या करें?
नक्सलियों ने बस्तर में अपनी हलचल की शुरूआत में आदिवासियों के शोषण और उन पर अत्याचार के मुद्दे सामने रखें और सरकार-जनता का ध्यान खींचा लेकिन जब इन मुद्दों पर पर्याप्त स्याही मिल चुकी थी तब वहां की हिंसा ने वहां पर शोषण और अत्याचार को सिर्फ बढ़ाने का काम किया है। बस्तर के शोषण को सामने रखने में नक्सलियों की भूमिका हत्याएं शुरू होने के पहले ही खत्म हो चुकी थी। लोकतंत्र में ऐसा कोई मुद्दा नहीं हो सकता जिसे लेकर लड़ाई लड़ते हुए लोकतंत्र को ही खत्म करने पर कोई उतारू हो जाए। इस बात को अगर हम एक तस्वीर के रूप में सझमने की कोशिश करें तो यह उसी किस्म की होगी जैसे किसी गर्भ में पलता हुआ बच्चा उस मां को ही पूरा खा जाए। जिन नक्सलियों को यह लोकतंत्र बर्दाश्त कर रहा है, जिन पर देश की पूरी बंदूकें कहर बनकर टूट नहीं रही हैं वे नक्सली एक-एक बार में दर्जनों हत्याएं करते हुए लोकतंत्र से सवाल भी पूछ रहे हैं!
इस विसंगति को ठीक से समझना होगा। बस्तर में नक्सली हिंसा को देख-देखकर मैंने अपने लिखे में इसके लिए किसी भी तरह के 'वादÓ का इस्तेमाल बंद कर दिया है। जहां एक इंसान दूसरे इंसान को अपने विवेक से मार डालता है वहां वाद जैसे किसी हल्के शब्द के इस्तेमाल की जरूरत भी क्या है? मैंने नक्सलियों को अपने तर्क और अपनी बातें सामने रखने का पर्याप्त मौका दिया। उनकी बातों को आगे भी बढ़ाया और दूसरे कई पक्षों को उस बहस से जोड़ा भी। लेकिन एक तरफ जहां नेपाल में वहां के माओवादी चुनाव की मूलधारा में आकर आज देश के शासन तक पहुंचे हैं और अब वे इस स्थिति में हैं कि जनकल्याण की अपनी सोच को लागू कर सकें। वहीं दूसरी तरफ बस्तर के जिन नक्सलियों को मैं करीब से देख रहा हूं वे इस लोकतंत्र को ही ढहा देने में लगे हैं। और इस राह को वे बेकसूर लोगों की लाशों से गड्ढïे पाट-पाटकर बना रहे हैं। मेरे मन का सवाल आज यही है कि ऐसे लोगों को लोकतांत्रिक समाज से किसी भी तरह की अपील करने का क्या हक है? उन्होंने अपने-आपको यह हक तो दे ही रखा है कि वे खुद जब चाहें जिसके लहू से चाहें जैसे चाहें वैसे नारे लिख सकें। उन्हें अपील की जरूरत भी क्यों हो रही है?

-सुनील कुमार