राज्यों को मंझधार में छोड़ गए मोदी अपने कई पुराने फैसलों की तरह...

  भारत की नरेंद्र मोदी सरकार के फैसलों में एक अजीब सी निरंतरता है। कुछ बरस हुए जब एकाएक नोटबंदी कर दी गई और देश एटीएम की कतारों पर लग गया, लोगों के घर में खाने नहीं बचा, इलाज को पैसे नहीं बचे, और विदेश में हंसते हुए नरेंद्र मोदी के शब्दों में, लोगों के घर में बेटी की शादी थी, लेकिन उनके पास बैंक में रखे अपने पैसों तक पहुँच  नहीं थी। यह सिलसिला महीनों तक चला और बहुत से अर्थशास्त्रियों का, और समाज के लोगों का यह मानना है कि हिंदुस्तान अब तक नोटबंदी के उस फैसले से हुए नुकसान से उबर नहीं पाया है। कुछ अरसा गुजरा और जीएसटी को देश की दूसरी आजादी की तरह, आधी रात को संसद में पेश किया गया और इसके बाद का आने वाला पूरा एक बरस, और बाजार के मुताबिक तो आज तक का वक्त, लगातार तकलीफों से भरा हुआ है। लोग जीएसटी की जटिलताओं से उबर नहीं पाए हैं और खुद सरकार ने बाद के महीनों में सैकड़ों संशोधन जीएसटी में किये हैं। इतनी बार जीएसटी को बदला गया कि व्यापारी और उनके टैक्स सलाहकार, उनके सीए, इन सबका जीना हराम हो गया। फिर वह भी काफी नहीं था। जब कोरोना के बाद देश में लॉकडाउन लगाया गया तो जिस तरह आनन-फानन पूरे देश में लॉकडाउन का वह फैसला लगा तो उससे लोग हक्का-बक्का रह गए। करोड़ों मजदूर हजार-हजार किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव तक पहुंचे, रास्तों में जाने कितने भूखे-प्यासे मर गए। सरकार के पास संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के लिए आंकड़े तक नहीं थे कि कितने लोग मरे, लेकिन उस यात्रा को हिंदुस्तानी भूल नहीं पाए। 

अब जब देश में कोरोना वायरस की लहर आसमान छूते हुए दिख रही है तो पूरी की पूरी मोदी सरकार, महज एक पार्टी संगठन की तरह बंगाल और दूसरे राज्यों के चुनाव में इस तरह समर्पित थी कि मानो इस वक्त का तकाजा महज चुनाव प्रचार था, महज किसी एक राज्य, या कुछ और राज्यों को जीतना था। अब जब पूरे देश में इस चुनाव प्रचार को लेकर इस चुनाव प्रचार के दौरान की सेहत की लापरवाही को लेकर आलोचना होने लगी, चारों तरफ से लोग इसके खिलाफ लिखने लगे तो प्रधानमंत्री ने कल दिन में कई घंटे लोगों से मीटिंग की, और मीटिंग का नतीजा यह निकला कि शाम होने तक टीकाकरण कार्यक्रम में एक भूकंप सरीखा बुनियादी बदलाव कर दिया गया जिसने फिर देश को हक्का-बक्का कर दिया। लोगों को याद रखना चाहिए कि नोटबंदी, जीएसटी, और लॉकडाउन के फैसलों की तरह, यह फैसला भी रहस्य से भरा हुआ है, इसके पीछे की कोई बातें सामने नहीं आई हैं कि किन तथ्यों के आधार पर, किन विश्लेषणों के आधार पर इतना बड़ा यह फैसला लिया गया है जो कि देश को एक बार फिर पिछले तीन फैसलों की तरह बुरी तरह झकझोर सकता है। एक और बात यह कि इस फैसले से देश की राज्य सरकारें ठीक उसी तरह बुरी तरह प्रभावित होने वाली हैं जिस तरह पिछले तीन फैसलों से हुई थीं, और जिनका बोझ कुल मिलाकर राज्यों के ऊपर डाल दिया गया था, कमोबेश उसी तरह की नौबत आज फिर राज्य सरकारों के सामने आ रही है, जब टीकाकरण कार्यक्रम में फेरबदल के नाम का यह अंधकार उनके सिर पर थोप दिया गया है जिसका कोई ओर-छोर नहीं दिख रहा है।

कल के मोदी सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम की जो जानकारी अब तक खबरों में सामने आई है उनके मुताबिक देश में टीका बनाने वाली अब तक की दो कंपनियों के उत्पादन का आधा हिस्सा केंद्र सरकार लेगी और उसे राज्यों को 45 बरस से ऊपर के लोगों को टीका लगाने के लिए देना जारी रखेगी। दूसरी तरफ अब 18 वर्ष से ऊपर के लोगों को टीका लगाने का फैसला केंद्र सरकार ने न केवल ले लिया है बल्कि इस उम्र के तमाम लोगों को अपनी मर्जी से यह टीका लगवाने की छूट दे दी है। इसके लिए देश की दोनों टीका कंपनियां अपना आधा उत्पादन राज्य सरकारों को, या खुले बाजार में अस्पतालों को, अपनी मर्जी के रेट पर बेच सकेंगी, और अस्पताल इन्हें एक मुनाफा लेकर लोगों को लगा  सकेंगे। इन शब्दों और शर्तों से जिन लोगों को ऐसा लग रहा है कि अब 18 बरस से ऊपर के 45 बरस तक के तमाम लोगों को टीके की सुरक्षा हासिल हो रही है, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि इस उम्र के लोग हिंदुस्तान में शायद 40-50 करोड़ से अधिक हैं। और देश में टीकों की मौजूदा उत्पादन क्षमता हर महीने 6-7 करोड़ तक सीमित है। ऐसे में जाहिर है कि जिस उम्र वर्ग के लिए टीके अब खोल दिए जा रहे हैं उनके लिए अगले 6 महीने भी देश में पर्याप्त टीके बनने वाले नहीं हैं। अब एक ऐसी चीज की कल्पना की जाए जो कि बाजार में मौजूद है, लेकिन जरूरत के लोग टीकों की उपलब्धता से 10 गुना, 20 गुना या 30 गुना अधिक हैं, तो उन टीकों को पहले कौन हासिल करेंगे? इन टीकों तक पैसों की पहुंच सबसे पहले रहेगी। और केंद्र सरकार ने राज्यों के ऊपर वैक्सीन कंपनियों से सौदा करने, रेट तय करने, और अपनी आबादी को उसे देने की पूरी ‘आजादी’ दे दी है और यह ‘आजादी’ फिर प्रधानमंत्री के एक फैसले से रातों-रात देश पर, देश की प्रदेश सरकारों पर डाल दी गई ‘आजादी’ है। यह समझने की जरूरत है कि एक पल पहले तक केंद्र सरकार ने महामारी कानून के तहत सारे प्रदेशों के सारे कोरोना-कार्यक्रम की लगाम अपने हाथ में रखी हुई थी, और एक पल में केंद्र सरकार ने 40 या 50 या 60 करोड़ लोगों का पूरा बोझ प्रदेश सरकारों पर डाल दिया है! यह सिलसिला एकदम भयानक है। राज्य सरकारों की क्षमता कितने टीके खरीदने की है, आम जनता की क्षमता अस्पतालों में टीके किस दाम पर खरीदने की है, इसका कोई अंदाज आज लोगों के पास नहीं है, लेकिन यह अंदाज जरूर है कि आज जिसके पास पैसा अधिक है उसके पास वैक्सीन खरीदने की ताकत रहेगी, और जिसके पास पैसा नहीं है उसे अगर उसकी राज्य सरकार वैक्सीन दिला सकेगी तो ही उसे मिल सकेगी। आज तक के सौ फीसदी केंद्र-नियंत्रित वैक्सीन उत्पादन और वैक्सीन वितरण कार्यक्रम को पूरी तरह से खुले बाजार का कार्यक्रम बनाकर राज्य सरकारों पर यह जिम्मा डाल दिया गया है कि वे खुद वैक्सीन कंपनियों से वैक्सीन खरीदें और तय करें कि उसे अपने लोगों को कैसे लगाना है। यह कोरोना की मौजूदा महामारी के बीच राज्यों को एक अभूतपूर्व और अकल्पनीय खतरे में और परेशानी में डालने का काम है, और यह सिलसिला मोदी सरकार के पिछले तीन ऐतिहासिक फैसलों की अगली कड़ी ही है जिसमें केंद्र ने राज्यों को न शामिल किया, न उनका साथ दिया, बल्कि अपने फैसले को पूरी तरह राज्यों पर थोप दिया। राज्य सरकारें यह भी तय नहीं कर सकतीं कि उन्हें किस आयु-वर्ग के लोगों को किस सिलसिले से टीके लगाने हैं। केंद्र ने शर्तें खुद तमाम तय कर दीं, और जिम्मा पूरा राज्यों पर डाल दिया। 

अभी दो दिन पहले ही भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुली चिट्ठी लिखकर सलाह दी थी कि कोरोना से जूझने में केंद्र सरकार को क्या-क्या करना चाहिए ,और उस चिट्ठी का एक बहुत ही सतही किस्म का राजनीतिक जवाब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की तरफ से दिया गया है जो कि बहुत बदमजा भी है। एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री ने पूरी गंभीरता से एक चिट्ठी लिखी, कुछ बिन मांगे ईमानदार सुझाव दिए, और जैसा कि दुनिया में बिन मांगे सुझावों के साथ होता है, मनमोहन सिंह जैसे सज्जन और गंभीर व्यक्ति को भी हिकारत से भरा हुआ जवाब मिला। लेकिन उससे परे, आज देश के सामने यह टीकाकरण कार्यक्रम जिस आक्रामकता के साथ बाजार के हवाले किया हुआ दिखता है, वह भयानक है। जिस देश में केंद्र सरकार एक फ्रिज, या एयरकंडीशनर, कार या मोटरसाइकिल के लिए भी देशभर के सरकारी खरीदी के रेट तय करते आई है उसके बीच यह बात बहुत ही अजीब और भयानक लगती है कि जीवनरक्षक वैक्सीन के रेट तय करने से केंद्र सरकार ने हाथ खींच लिया, उसे मुहैया कराने से हाथ खींच लिया, और यह वैक्सीन निर्माताओं के कारोबारी कार्टेल पर छोड़ दिया कि वह खुले बाजार के साथ-साथ राज्य सरकारों के साथ मोलभाव करे। कहां तो एक तरफ केंद्र सरकार देश के सरकारी खरीदी के हर सामान का रेट तय करके उसका एक वेबसाइट बनाकर राज्य सरकारों के सामने रखती है कि वे उस रेट पर खरीदी कर सकते हैं। और आज केंद्र सरकार ने इस पूरी सबसे जीवनरक्षक खरीदी से पल्ला झाडक़र उसे राज्यों पर थोप दिया है। ढाई दर्जन राज्यों को दो वैक्सीन कारोबारियों के हवाले कर दिया है कि इन्हें जिस रेट पर बेचना है बेचो, उससे केंद्र सरकार का कोई लेना देना नहीं है। यह पूरे अधिकारों का, और बिना किसी जिम्मेदारी का यह सिलसिला भारत के संघीय ढांचे का सम्मान नहीं है, बल्कि यह तो हिंदुस्तान के इतिहास के सबसे बड़े खतरे के वक्त राज्यों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से केंद्र सरकार का मुकर जाना है।

(Daily chhatisgarh)

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