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गंभीर बीमारियों के खतरे तो मंडरा ही रहे, पर टालना भी...

जून 2025

आज दुनिया में चारों तरफ जीवनशैली से उपजने वाली गैरसंक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ते चल रहा है। बहुत संपन्न देशों में तो खानपान, और अतिरिक्त आराम की वजह से मोटापा बढ़ते जा रहा है, लेकिन भारत जैसा देश भी बड़ा खतरा झेल रहा है। यहां खानपान और रहन-सहन की वजह से डायबिटीज, हाईब्ल्ड प्रेशर, दिल की बीमारियां, मोटापा, कैंसर, और कई तरह की मानसिक समस्याएं बढ़ रही हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक भारत में अब 60 फीसदी से अधिक मौतें गैरसंक्रामक बीमारियों से हो रही हैं, जिनमें से अधिकतर जीवनशैली की गड़बड़ी से हैं। देश में अभी 10 फीसदी से थोड़े से कम, 13 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज के खतरे में हंै। और इसकी बड़ी वजहों में से एक, खराब किस्म का खानपान, बैठे रहना, तम्बाकू और शराब जैसी चीजें हैं। 

अब हम खराब किस्म के खानपान को देखें तो इसमें शक्कर, नमक, और घी-तेल का सबसे बड़ा हाथ दिखता है। लोग परिवार के भीतर अपनी रईसी दिखाने को, किसी मेहमान के आने पर, या किसी के घर जाने पर चॉकलेट या मिठाई लेकर जाना अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की बात मानते हैं। खुशी का कोई भी मौका रहे, लोग मिठाई बांटने को एक परंपरा मानते हैं। इसके साथ-साथ घर आने वालों के लिए, या अपनी खुद की जुबान की वजह से लोग घरों में कोल्डड्रिंक रखने लगे हैं, या बाहर जाने पर पीने लगे हैं, जो कि शक्कर से लबालब रहते हैं। कोल्डड्रिंक में शक्कर, मिठाई, आइस्क्रीम, केक, पेस्ट्री, इन सबमें शक्कर, और अब तो मध्यम वर्ग या उससे ऊपर के बच्चों की तमाम पार्टियों में यही सब चीजें चलती हैं। लोग एक-दूसरे के घर आते-जाते बच्चों के लिए यही सब लाते ले जाते हैं, आने वालों को खिलाते हैं। आज बचपन से ही शक्कर का इतना अधिक खानपान हो रहा है कि उससे होने वाला नुकसान बहुत से लोगों को सीधे डायबिटीज तक पहुंचा रहा है। 

देश की संस्कृति में एक मामूली से फेरबदल की जरूरत है। शक्कर वाले सारे सामानों को घटाकर उनकी जगह फलों को बढ़ावा दिया जाए, तो शक्कर का यह खतरा एकदम से कम हो सकता है। दूसरी तरफ फलों से जो फायदा हो सकता है, वह चॉकलेट-बेकरी, या मिठाई जैसे किसी सामान से नहीं हो सकता। और इन दोनों में खर्च में भी बहुत बड़ा फर्क नहीं रहेगा। आज भी सौ-दो सौ रूपए से कम की कोई मिठाई नहीं आती, और इतने ही दाम में उससे चार-छह गुना वजन के फल ले जाए जा सकते हैं। 

यह सिलसिला कछ लोग अगर एक संकल्प की तरह शुरू करें, तो यह धीरे-धीरे जोर पकड़ सकता है। आज भी बहुत से लोग कई किस्म के धार्मिक, या खानपान के संकल्प लेते ही हैं। कई लोग धार्मिक कारणों से जमीन के नीचे उगी चीजों को नहीं खाते। कई लोग रात का अंधेरा होने के पहले खाना खा लेते हैं। कुछ लोग हफ्ते में किसी दिन नहीं खाते। ऐसे में लोग अगर यह तय कर लें कि वे मेहमानों को सिर्फ फल खिलाएंगे, और किसी के घर जाते हुए सिर्फ फल लेकर ही जाएंगे, तो यह चलन धीरे-धीरे बढ़ सकता है।

आज लोग जब अपने घर का फ्रिज खोलते हैं, और उसमें मिठाई रखती दिखती है, तो किसी का अपने पर काबू नहीं रह पाता। लोग इच्छा न रहते हुए भी आंखों के रास्ते दिमाग तक पहुंची हुई इच्छा पूरी करने के लिए मीठा खाने बैठ जाते हैं। और घर आए मेहमानों को भी जिद करके मीठा खिलाया जाता है, जो कि मध्यमवर्गीय और उसके ऊपर के आय वर्ग के लोगों की सेहत के लिए ठीक नहीं रहता। कमाई जितनी अधिक रहती है, वैसे परिवारों के लोगों की देह उतना ही कम खाने के लायक बच जाती है। सामाजिक व्यवहार में यह फेरबदल एकदम तुरंत जरूरी है कि त्यौहारों से लेकर, खुशियों के दूसरे मौकों तक मिठाई की जगह फलों को बढ़ावा दिया जाए, बहुत ही गरिष्ठ सब्जियों की जगह, या कम से कम उनके साथ-साथ सलाद को बढ़ावा दिया जाए। लोगों को मेजबानी, और खातिरदारी के साथ-साथ मेहमानों की सेहत को भी ठीक रखने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और अतिथि सत्कार के लिए बदनाम कुछ समाजों में तो जब तक मेहमान अघा न जाए, तब तक उसका मनुहार करते रहना ही न्यूनतम शिष्टाचार माना जाता है। इस सिलसिले को भी तोडऩा चाहिए। 

हम इसके पहले भी उपहार देने के मौकों पर गुलदस्तों की जगह किताबों की बात सुझाते आए हैं, और ऐसी किताबों में भी लोग सेहतमंद खानपान, कसरत, योग-ध्यान जैसे विषयों पर किताबें दूसरों को तोहफे में दे सकते हैं, ताकि उनका पूरा परिवार ही जागरूक होकर अपनी कुछ फिक्र कर सके। गुलदस्तों का क्या है, वे तो एक या दो दिन में मुरझाकर कचरे में चले जाते हैं, लेकिन फिटनेस और पोषण आहार से जुड़ी किताबें पूरे परिवार का भला कर सकती हैं। 

एक आखिरी बात सुझाने लायक यह लगती है कि अपने यार-दोस्तों से गप्प मारने के लिए किसी के घर या किसी रेस्त्रां में बैठकर चाय-भजिया खाने की जगह पैदल चलने, दौडऩे, खेलने जैसे किसी काम के बारे में भी सोचना चाहिए। यह कोई बहुत दुर्लभ खूबी नहीं है, आज भी सुबह-शाम सैर के लिए जो जानी-पहचानी जगहें हैं, उनमें दोस्तों के ऐसे जत्थे दिखते ही हैं, जो एक-दूसरे की देखादेखी, या एक-दूसरे के कहने से इकट्ठा होते हैं, और अपने बदन का ध्यान रखते हैं। कुछ ऐसा ही काम अड़ोस-पड़ोस के लोग, एक दफ्तर में काम करने वाले, या एक परिवार के लोग भी एक-दूसरे के लिए कर सकते हैं।

बहुत मामूली सी इन छोटी-छोटी बातों पर अमल करके लोग अपने आसपास के पूरे दायरे की सेहत बेहतर बना सकते हैं, सिर्फ चली आ रही परंपराओं को थोड़ा सा बदलने की जरूरत है। या तो बर्बादी बढ़ाते चलें, या जागरूकता फैलाते चलें। 

सोशल मीडिया पर बच्चों पर रोक, भारत में कोई चर्चा तक शुरू नहीं!

06 अप्रैल 2025 

सुप्रीम कोर्ट ने अभी एक जनहित याचिका को सुनने से मना कर दिया जिसमें 13 बरस से कमउम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रोकने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि यह नीतिगत मामला है, और इसे संसद के सामने उठाना चाहिए, न कि अदालत के सामने। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता इन मामलों के लिए बनाए गए संबंधित प्राधिकरण में अगर अपनी बात रखें, तो प्राधिकरण 8 हफ्तों में इस पर विचार करे। याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रोक लगाने की मांग की गई थी कि वे उम्र की पड़ताल किए बिना किसी को वहां पर दाखिला न दें। अदालत का कहना एक हिसाब से ठीक हो सकता है कि समाज को देखते हुए देश में जो नीतियां बननी चाहिए, उन्हें बंद अदालतों में काम करने वाले जजों के बजाय जनता से चुनकर आए हुए सांसदों के बीच चर्चा के बाद बनना चाहिए। लेकिन अगर इस गरिष्ठ परिभाषा से परे अदालत सोचती, तो बेहतर होता, और इस पर कम से कम केन्द्र सरकार से उसका पक्ष तो लिया ही जा सकता था। हो सकता है कि केन्द्र सरकार अदालत को जो जानकारी देती, उस पर याचिकाकर्ता के वकील कुछ और सवाल उठा सकते। आज तो अदालत ने जिस तरह इस मामले को संसद की तरफ रवाना कर दिया है, उसका मतलब उसने सब कुछ सरकार पर छोड़ दिया है। जबकि आज दुनिया में बहुत से विकसित देशों में इस बारे में ठोस पहल हो रही है। 

ऑस्ट्रेलिया में पिछले बरस से ही एक कानून बनाया गया है जिसने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को इस बरस तक का समय दिया है कि वे 16 बरस से कमउम्र के बच्चों का वहां दाखिला रोकें। ऐसा ही कानून 15 बरस से छोटे बच्चों को बुरे असर से बचाने के लिए फ्रांस ने 2023 से बनाया हुआ है। और अमरीका में चूंकि अधिक अधिकार राज्यों को हैं, वहां कम से कम एक राज्य फ्लोरिडा में अभी पिछले ही महीने एक कानून बना है जिसमें 14 बरस से छोटे बच्चों को सोशल मीडिया पर रोका जा रहा है, यह एक अलग बात है कि वहां के हर कानून की तरह इसे भी अदालत में चुनौती दी गई है। योरप के जो देश सबसे उदार विचारों के माने जाते हैं, उनमें से एक नार्वे ने अभी यह योजना घोषित की है कि वह 13 बरस से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया इस्तेमाल का अभी लागू प्रतिबंध 15 बरस उम्र तक के बच्चों के लिए बढ़ा रहा है। इन सबसे परे एक और बात को समझने की जरूरत है कि पश्चिम का एक सबसे विकसित देश, ब्रिटेन स्कूली बच्चों से स्मार्टफोन वापिस लेने के लिए जनता के साथ मिलकर एक अभियान चला रहा है। सरकार खुद सीधे-सीधे इस पर रोक नहीं लगा रही, लेकिन मां-बाप इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं। वहां की प्रमुख विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी रोक लगाने के पक्ष में है, लेकिन वह सत्ता से बाहर हो गई है। फिर भी वहां यह सोच-विचार जोरों पर है। एक विपक्षी नेता ने वहां कहा है कि स्मार्टफोन, और सोशल मीडिया के अंधाधुंध इस्तेमाल से बच्चों को भी गर्दन और पीठ की ऐसी तकलीफें हो रही है जो कि अधेड़ लोगों को हुआ करती थी, इसके अलावा वे हिंसक पोर्नोग्राफी देखने के शिकार भी हो रहे हैं। 

भारत सरकार के सूचना तकनीक विभाग के सचिव ने इसी बरस जनवरी में यह साफ किया था कि ऑस्ट्रेलिया की तरह की कोई प्रतिबंध भारत में बच्चों के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस्तेमाल पर नहीं लगाया जाएगा। मोदी सरकार का मानना है कि बच्चों के मां-बाप की सहमति की जांच करके सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों को दाखिला दे सकती हैं। सरकार का मानना है कि ऑनलाईन ही बच्चे कई तरह की चीजें सीखते भी हैं, और उन पर पूरी तरह से रोक लगा देना ठीक नहीं होगा। भारत सरकार के इस सचिव ने यह भी कहा था कि अभी तक तो किसी ने प्रतिबंध का सुझाव नहीं दिया है, और न ही ऐसी कोई चर्चा ही हुई है। 

अब सोचने-समझने की बात यह है कि ऑनलाईन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म दो अलग-अलग चीजें हैं। हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तो ऑनलाईन हैं, लेकिन ऑनलाईन हर चीज सोशल मीडिया नहीं है। इसलिए अगर बच्चे ऑनलाईन कोई पढ़ाई करते हैं, या कोई क्रॉफ्ट सीखते हैं, तो वह सोशल मीडिया से अलग है, जहां पर वे जाने-अनजाने कई किस्म के लोगों के संपर्क में आते हैं, और कई तरह के शोषण के खतरों में पड़ जाते हैं। खुद आपस में भी बच्चे सोशल मीडिया पर एक-दूसरे के साथ बर्ताव करते हुए कई ऐसे फोटो-वीडियो का लेन-देन करते हैं जो कि बाद में खतरनाक हो सकते हैं। पश्चिम के देशों ने लगातार यह देखा है कि बच्चों को सेक्स-जाल में फंसाकर उनके फोटो-वीडियो हासिल करना, और फिर उन्हें ब्लैकमेल करके उनकी पाई-पाई चूस लेना एक बड़ा आम जुर्म हो गया है, और उसमें कुछ अफ्रीकी देशों के पेशेवर मुजरिम भी लगे हुए हैं, उनके शिकार कई बच्चे खुदकुशी कर चुके हैं। 

भारत में सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ देना ठीक नहीं है। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार बच्चों के मां-बाप की सहमति पर छोडऩे की जो सोच रखती है, वह इसलिए कमजोर है कि आज के किशोर-किशोरियों के मां-बाप एक अलग पीढ़ी के हैं, और उन्हें सोशल मीडिया की इजाजत देने के खतरे ठीक से मालूम भी नहीं है। इस देश में सरकारी निगरानी इतनी कमजोर है कि समाचार चैनलों के नाम पर रात-दिन उगले जा रहे जहर पर भी कोई रोक नहीं है, ऐसे में यह उम्मीद करना कि सरकार की कोई संस्था बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर नजर रख सकेगी, यह कुछ अधिक ही उम्मीद करना होगा। आज तो इन मामलों में दुनिया के सबसे जागरूक और जिम्मेदार देश भी अपने बच्चों को पेशेवर साइबर-मुजरिमों के जाल से बचा नहीं पा रहे हैं, ऐसे में भारतीय बच्चों को खुले में छोड़ देना बहुत समझदारी नहीं होगी। और आज देश में जगह-जगह सोशल मीडिया के रास्ते बने संबंधों के हिंसा और जुर्म तक पहुंचने के नाबालिगों के मामले बढ़ते चले जा रहे हैं। 

अभी दो महीने पहले ही भारत सरकार के आईटी सचिव ने यह कहा है कि अभी तक तो ऐसे किसी प्रतिबंध का सुझाव भी नहीं आया है, तो यह सही वक्त है कि ऐसे किसी संभावित या प्रस्तावित प्रतिबंध पर सार्वजनिक चर्चा शुरू की जाए, समाज के अलग-अलग तबकों के लोगों की राय ली जाए, बाल मनोविज्ञान के जानकार लोगों, और समाजशास्त्रियों से भी पूछा जाए। आज जब दुनिया के कई देशों को ऐसा प्रतिबंध लगाए बरसों हो चुके हैं, और भारत में इस मुद्दे पर कोई चर्चा भी नहीं हुई है, तो इसका एक मतलब तो यह भी है कि सांसदों की मौजूदा पीढ़ी आज की इस जमीनी हकीकत से ठीक से वाकिफ नहीं है, और इसके खतरों को नहीं जान-समझ रही।

लोकतंत्र में जनमत बनाने के लिए वक्त लगता है। रोक लगे या न लगे, यह एक अलग मुद्दा हो सकता है, लेकिन किस उम्र तक के बच्चों को सोशल मीडिया के कैसे इस्तेमाल की छूट हो, इस बारे में खुली रायशुमारी तो होनी ही चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

एक अकेला चना भी फोड़ सकता है दुनिया की भाड़..

 17  नवंबर 2024

चीन की कल की खबर है कि एक भूतपूर्व छात्र ने एक रोजगार प्रशिक्षण कॉलेज में चाकू से हमला करके 8 लोगों को मार डाला, और 17 को जख्मी कर दिया। पता लगा है कि वह इम्तिहान में फेल हो जाने, और डिग्री न मिलने की वजह से खफा था। मौके पर पकड़ लिए जाने के बाद 21 बरस के इस छात्र ने अपना जुर्म कुबूल भी कर लिया। अब दो ही दिन पहले की बात है कि चीन में ही तलाक से परेशान 65 बरस के एक बुजुर्ग ने एक सार्वजनिक जगह पर कसरत करते हुए लोगों पर अपनी कार चढ़ा दी जिसमें 35 लोग मारे गए, और 43 जख्मी हुए। बाद में उसने चाकू से खुद को भी नुकसान पहुंचाया, लेकिन उसे जिंदा गिरफ्तार करके इलाज करवाया जा रहा है। चीन से बहुत अलग अमरीका का हाल यह है कि वहां नागरिकों से अधिक संख्या में निजी हथियार लोगों के पास हैं, और हर बरस वहां सैकड़ों गोलीबारी होती हैं जिनमें बड़ी संख्या में लोग मारे जाते हैं। बहुत से मामलों में तो ऐसे हत्यारे किसी निजी कुंठा के शिकार रहते हैं, और जिन लोगों से उन्हें शिकायतें रहती हैं, जिस स्कूल या कॉलेज में उन्हें लगता है कि उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं हुआ था, वहां जाकर वे ढेर सारे लोगों को एक साथ मार डालते हैं। 

कई देशों के संघर्षों में हम देखते हैं कि कई हमलावर आत्मघाती जैकेट पहनकर चले जाते हैं, और भीड़ के बीच अपने को भी उड़ा देते हैं, और कई और लोगों को मारने की चाह में वे अपनी जिंदगी भी खत्म कर लेते हैं। इन घटनाओं से यह लगता है कि बहुत से आम लोग भी अगर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, तो वे बिना किसी संगठन की मदद के भी, अकेले ही बड़ा खून-खराबा कर सकते हैं। और ऐसा खून-खराबा कई बार सचमुच की किसी बेइंसाफी के खिलाफ रहता है, और कई बार वह अपने निजी तनाव की वजह से की गई हिंसा रहती है। 

दुनिया भर में जगह-जगह ऐसी लगभग-आत्मघाती घटनाएं यह बताती हैं कि समाज के भीतर किसी ज्यादती, बेइंसाफी, या हिंसा की वजह से पैदा तनाव कितना खतरनाक हो सकता है। जिन लोगों को किसी धर्म या जाति, देश या प्रदेश की आबादी की गिनती से उसके खतरनाक होने या न होने का हिसाब-किताब अच्छा लगता है, उन्हें यह समझना चाहिए कि सिर पर कफन बांधे हुए जो हमलावर काम करते हैं, वे अकेले ही किसी भीड़ को भी खत्म कर सकते हैं। आज अगर इजराइल को यह लगता है कि उसकी फौजी ताकत तमाम फिलीस्तीनी लोगों को खत्म कर देगी, तो यह उसकी खुशफहमी हो सकती है। गिनती के बचे हुए फिलीस्तीनी भी दुनिया के किसी भी कोने में किसी इजराइली-भीड़ पर भारी पड़ सकते हैं। इसलिए यह याद रखने की जरूरत है कि कोई हिंसक तबका हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं रह सकता, फिर चाहे वह कितना ही ताकतवर क्यों न हो। 

जो अमरीका अपने आपको दुनिया का बेताज बादशाह मानकर चलता है, उस अमरीका को चाहे एक छोटे अरसे के लिए, एक अकेले ओसामा-बिन-लादेन ने घुटनों पर ला दिया था, और उसकी सारी तैयारियां धरी रह गई थीं। जो देश अपने आपको दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत जानते हुए सुरक्षित होने के दंभ में जीता था, उसे ओसामा के विमानों ने चूर-चूर कर दिया था। इसी तरह अपने आपको सौ फीसदी सुरक्षित मानने वाले इजराइल को हमास के आतंकियों ने जमीन, पानी, और हवा, तीनों तरफ से मारा था, यह एक अलग बात है कि इजराइल की फौजी ताकत ने उसका सैकड़ों गुना अधिक हिसाब चुकता कर दिया। लेकिन हम आज यहां किसी मुल्क की फौजी की ताकत की बात नहीं कर रहे, हम ऐसे अकेले हमलावरों, या छोटे आतंकी संगठनों की बात कर रहे हैं जो कि सतह के नीचे छुपे रहकर भी एकदम से सामने आकर हमला कर सकते हैं, और अपने निशाने का बहुत बड़ा नुकसान कर सकते हैं। 

अमरीका और इजराइल दुनिया में जिस दर्जे की बेइंसाफी करने के लिए जाने जाते हैं, उससे वे ऐसे अनगिनत दुश्मन भी पैदा करते चल रहे हैं जिनकी जिंदगी का अकेला मकसद इन देशों का नुकसान पहुंचाना रहेगा। और एक वक्त के बाद किसी देश के नागरिकों को नुकसान पहुंचाना उस देश को नुकसान पहुंचाना मान लिया जाता है। यह नौबत किसी को भी नहीं भूलना चाहिए कि 11 सितंबर को अमरीका के न्यूयॉर्क में क्या हुआ था, 26 नवंबर को मुम्बई पर किस तरह हमला हुआ था, 13 दिसंबर को भारतीय संसद पर कैसे हमला हुआ था, और 7 अक्टूबर को इजराइल पर हमास का हमला कैसे हुआ था। इनमें से किसी भी हमले के पीछे किसी देश की फौज नहीं थी, लेकिन उस देश को नुकसान पहुंचाने की नीयत जरूर थी, और देश का कोई मूर्त रूप तो होता नहीं है, इसलिए उस देश के नागरिकों को निशाना बनाना ही एक जरिया मान लिया जाता है। 

अमरीका में जगह-जगह होने वाले सामूहिक शूट-आऊट देखें, या चीन के इन दो ताजा हमलों को देखें, एक बात साफ है कि किसी जायज वजह से, या निजी विचलन के कारण, जिस वजह से भी हो, अगर अकेले हमलावर भी नुकसान पहुंचाने को कमर कस लें, तो वे कुछ भी कर सकते हैं। आज किसी व्यक्ति को नाजायज तरीके से प्रताडि़त करने के पहले यह भी सोचना चाहिए कि अगर वे लोग आत्मघाती हद तक जाकर नुकसान पहुंचाने की सोचेंगे, तो क्या-क्या नहीं कर सकते? अधिकतर देशों में धार्मिक या दूसरे किस्म की सार्वजनिक भीड़ लगती ही है, और आत्मघाती लोग ऐसी भीड़ में दुनिया भर में जानलेवा हमले करते आए हैं। 

लेकिन आखिर में आज की दुनिया में छाए एक अनोखे खतरे की चर्चा जरूरी है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ने अच्छे और बुरे, हर किस्म के काम के लिए लोगों के हाथ अंधाधुंध ताकत दे दी है। दुनिया में मुजरिमों या आतंकियों के ऐसे समूह हो सकते हैं जिनके साथ कुछ साइबर-घुसपैठिए हों, और कुछ एआई एक्सपर्ट। इन दोनों की ताकत से लैस आतंकी दुनिया में इतनी बड़ी तबाही कर सकते हैं जिसकी कल्पना भी मुश्किल है। यह सोचकर देखें कि अगर किसी देश में अस्पतालों के सारे रिकॉर्ड खत्म हो जाएं, बैंकों के खाते मिट जाएं, ट्रेन और प्लेन का नियंत्रण करने वाले सिस्टम खत्म कर दिए जाएं, इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियों का काम चौपट कर दिया जाए, क्रेडिट और डेबिट कार्ड काम करना बंद कर दें, तो क्या होगा? जो लोग साइबर-घुसपैठ और एआई की अलग-अलग ताकत को जानते हैं, वे इस बात का अंदाज लगा सकते हैं कि एक और एक मिलकर ये तबाही का 11 कैसे बन सकते हैं। इसलिए आज दुनिया को सुरक्षित रखने के लिए कम से कम सामाजिक बेइंसाफी तो खत्म करनी चाहिए, क्योंकि इससे लोगों को दुनिया के किसी एक खास तबके या इलाके, सरकार या कारोबार को खत्म करने की जायज वजह भी मिलती है। शांति और सुरक्षा का रास्ता कभी भी सरकारी या कारोबारी हिंसा से होकर नहीं निकल सकता। 

(Daily Chhattisgarh)

...सभ्यता और लोकतंत्र तो चमड़ी जितने मोटे भी नहीं, खुरचते ही...

03  नवंबर 2024

इन दिनों पूरी दुनिया में कोई संदेश, फोटो या वीडियो भेजने, या किसी समूह में थोक में ब्रॉडकास्ट करने के लिए सबसे लोकप्रिय, वॉट्सऐप से खबर है कि उसने भारत में 85 लाख से अधिक अकाऊंट पर रोक लगाई है। इसके पहले भी 16 लाख अकाऊंट ब्लॉक किए गए थे। लेकिन यह संख्या अपने आपमें तब बहुत बड़ी लगना बंद हो जाती है जब दिखता है कि भारत में वॉट्सऐप इस्तेमाल करने वाले 60 करोड़ लोग हैं। इनमें से अगर डेढ़ फीसदी लोगों को हर किस्म की वजह मिलाकर ब्लॉक किया गया है, तो उतनी रफ्तार से शायद नए लोग उसका इस्तेमाल कर रहे होंगे। फिर हमारा यह भी मानना है कि इसके हर व्यक्ति की विनाशकारी क्षमता एक बराबर नहीं होती है, और कुछ पेशेवर नफरतजीवी, हिंसक, या धोखेबाज लोग अकेले ही सैकड़ों आम लोगों से अधिक बात फैलाते होंगे। इसलिए डेढ़-दो फीसदी अकाऊंट को ब्लॉक करने की बात का बहुत महत्व नहीं है। 

मेरे जैसे लोग जो कि नफरत से लगातार लडऩे की कोशिश करते रहते हैं, करीबी दोस्तों को भी उनकी झूठी पोस्ट, या सांप्रदायिक-नफरती पोस्ट के खिलाफ सावधान करते रहते हैं, उनकी क्षमता भी बड़ी सीमित है। सद्भावना या प्रेम की बात करने वाले लोगों के भीतर जितनी प्रेरणा रहती है, उससे सौ गुना प्रेरणा नफरतियों के मन में नफरत और हिंसा फैलाने के लिए भरी रहती है। मैं हर दिन दर्जनों वॉट्सऐप ग्रुप पर यह देखता हूं कि किस तरह कुछ शिक्षित और डिग्रीधारी लोग सुबह का पहला काम झूठ और नफरत फैलाने से शुरू करते हैं, और रात को शायद नींद में तकिए पर सिर लुढक़ जाने पर वे इसी काम में लगे रहते हैं। इन्होंने नफरत का लावा फैलाने में ज्वालामुखियों से मुकाबला करना तय किया हुआ है, और इसके लिए वे ओवरटाईम करते रहते हैं। 

नफरत की नफरतियों को आपस में जोडऩे की ताकत अपार है। फेविकोल के किसी मजबूत जोड़ के मुकाबले भी नफरत के साझा एजेंडा से जुड़े हुए लोग आपस में अधिक मजबूती से जुड़े रहते हैं, एक-दूसरे की प्रेरणा बने रहते हैं, और उन्हें अपने इस जुनून के नशे में अपनी अगली पीढ़ी का अंधकारमय किया जा रहा भविष्य भी नहीं दिखता है। और अपनी खुद की साख, अपना खुद का सम्मान भी उन्हें नहीं दिखता है। वे इतिहास में दर्ज तथ्यों से परे जाकर जिस बेधडक़ और बेझिझक तरीके से झूठ को फैलाते हैं, उनका दुस्साहस देखने लायक रहता है। फिर उनके नफरती गुरूभाईयों की भीड़ उनके उछाले हर झूठ, और हर हिंसक-नफरती पोस्ट को आगे बढ़ाने के लिए जिस प्रशंसाभाव के साथ तैयार खड़ी रहती है, उससे भी शायद उनका हौसला बढ़ता है। जो लोग किसी भी किस्म के सोशल मीडिया, या वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर पर मौजूद हैं, उन्हें यह दिखता ही रहता है कि नफरती-झूठ फैलाने में किसी को कोई परहेज नहीं रह गया है। 

हिन्दुस्तान का सुप्रीम कोर्ट हेट-स्पीच के खिलाफ अपने खुद के बार-बार दुहराए गए आदेशों पर अमल के मामले में इस हद तक बेपरवाह है कि अदालती हुक्म पर शायद ही नफरती-बयानों के खिलाफ कोई मामला दर्ज होता हो। कुछ राजनीतिक सभाओं में लगातार जहरीली बातों, और जहरीले बयानों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को मानो अपनी ही इज्जत बचाने के लिए ऐसा फैसला देना पड़ा था कि नफरती बयानों के खिलाफ किसी शिकायतकर्ता की जरूरत नहीं है, और जानकारी में ऐसे बयान आते ही इलाके के अफसरों को खुद होकर हेट-स्पीच का जुर्म दर्ज करना है, वरना इस अनदेखी को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना माना जाएगा। लेकिन अदालत का यह फैसला, और उसके बाद के बहुत से आदेश कचरे की टोकरी में पड़े हुए हैं, और खुद अदालत मानो इसे अनदेखा करने में सहूलियत और राहत महसूस करती है कि कोई उसे याद दिलाकर देश के नफरतियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर मजबूर न करे। 

इसके लिए कानून के जानकारों की भी जरूरत नहीं लगती कि देश में कौन से बयान, और कौन सी हरकतें हेट-स्पीच के दायरे में आती हैं। जिन लोगों को लोकतंत्र की जरा भी समझ है, वे इस बात को सीधे-सीधे समझ सकते हैं कि नफरत और हिंसा के फतवे कौन से हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट को देश के संविधान, और अपनी खुद की इज्जत की जरा भी परवाह होती, तो वह देश की कितनी ही सरकारों को अब तक कटघरे में ला चुकी रहती कि वे अपने साम्राज्य में नफरत को किस हद तक जगह दे रही हैं, बर्दाश्त कर रही हैं, और सच कहा जाए तो बढ़ावा दे रही हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट अपने मौजूदा मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में मोतियाबिंद के बाद पहने जाने वाले पूरी तरह से काले चश्मे को बिना जरूरत लगाकर देश की मौजूदा हकीकत को देखने से पूरी तरह इंकार ही कर दे रहा है। उसने गांधी के तीन बंदरों की तरह बुरा देखना, बुरा सुनना, और बुरा बोलना सब बंद कर दिया है। संविधान में न्यायपालिका को अगर गांधी के इन तीन बंदरों की तरह ही रखना होता, तो वह न्यायपालिका शब्द की जगह बंदरपालिका शब्द का इस्तेमाल करता, लेकिन उसने कार्यपालिका और विधायिका से परे न्यायपालिका की जरूरत महसूस की थी, और बंदरों से अलग जजों की भी। अब तो ऐसा लगने लगा है कि ऊंची अदालतों के कई जज शायद यह मनाते होंगे कि उनके सामने कोई ऐसे केस न पहुंचे जिन पर फैसला सरकार को नापसंद होने का खतरा हो। 

ऐसे देश में डेढ़ करोड़ नफरती वॉट्सऐप अकाऊंट अगर बंद होते हैं, तो हर महीने इससे ज्यादा अकाऊंट नए नंबरों से शुरू हो सकते हैं, हो रहे हैं, और उन्हें रोकने-टोकने की रफ्तार दिखावे की रहेगी, उसका कोई असल असर नहीं पड़ेगा। देश में आज हिंसा और नफरत फैलाने वाले दसियों करोड़ लोगों को देखें, तो एक बात समझ आती है कि सैकड़ों बरस का सभ्यता का तथाकथित विकास, और पिछली पौन सदी का भारत का लोकतंत्र, ये दोनों ही लोगों में उनकी चमड़ी की मोटाई जितनी भी नहीं हैं, और मानो चमड़ी को जरा सा खुरच दिया जाए, तो उसके ठीक नहीं तक वह आदिम और हिंसक मिजाज लबालब है। देश में नफरत ने फैलना शुरू होते ही एक धर्म-संगीत की शक्ल अख्तियार कर ली है, और अब लोग तो मानो खुद होकर अपनी चमड़ी खुरचकर अपने असली मिजाज के साथ सडक़ों पर हैं।  

(Daily Chhattisgarh)

...तुम इतना जो झुकते जा रहे हो, क्या हसरत है जिसे दिखा रहे हो?

27 अक्टूबर 2024 

राजस्थान के एक जिले, बाड़मेर पहुंचे सत्तारूढ़ पार्टी के नेता सतीश पूनिया के स्वागत में खड़ी वहां की कलेक्टर टीना डाबी ने नेताजी के साथ जैसा शिष्टाचार निभाया, वह एकदम खबरों में आ गया है। इसका वीडियो देखकर लोगों ने हिसाब लगाया कि सात सेकेंड में किस तरह इस कलेक्टर ने  नेताजी के सामने पांच बार सिर झुकाया, और आठ बार हाथ जोड़े। सतीश पूनिया अभी किसी सरकारी ओहदे पर नहीं है, और उनके स्वागत में इस तरह की असाधारण विनम्रता सोशल मीडिया पर लोगों की आलोचना पा रही है। जिन लोगों को याद नहीं होगा उन्हें यह बता देना ठीक है कि टीना डाबी 2016 में आईएएस के इम्तिहान में पहली कोशिश में ही कुल 22 बरस की उम्र में देश में अव्वल आकर खबरों में आई थीं, और उसके बाद वे तब खबरों में आईं जब उन्होंने यूपीएससी में उनके ठीक बाद की जगह पाने वाले कश्मीर के एक मुस्लिम नौजवान से शादी की थी। तीसरी बार वे तब खबर में आईं जब उन्होंने इस मुस्लिम पति को तलाक दे दिया। इसके बाद शायद उन्होंने एक शादी और की, लेकिन वह हमारी दिलचस्पी का सामान नहीं है। अब बाड़मेर का कलेक्टर रहते हुए वे जिस अंदाज में वहां बड़े दबदबे से शहर सुधारने का अभियान चला रही है, वह वैसे भी खबरों में बना हुआ था। माईक लेकर दुकानदारों को चेतावनी देते हुए उनके वीडियो हवा में तैर ही रहे थे, और उनके बीच एक नेता के सामने ‘बिछ जाने’ का यह वीडियो लोगों की आलोचना झेल रहा है। 

हमने कई किस्म के अफसर देखे हैं। भारत में, जहां पर आईएएस बनना तकरीबन तमाम लोगों की हसरतों की पराकाष्ठा रहती है, वहां पर इस सोच को यह प्रचलित लाईन और मजबूत करती है कि देश में असली ताकत तीन ही लोगों के हाथ में रहती है, पीएम, सीएम, और डीएम (डीएम यानी आईएएस डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट/कलेक्टर)। हमने छत्तीसगढ़ के पहले सीएम अजीत जोगी को डीएम भी देखा हुआ है, और फिर सीएम भी देखा हुआ है, और सीएम बनते ही उन्होंने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अपने लिए जो बंगला छांटा था, वह अपने डीएम (कलेक्टर) रहते हुए इस्तेमाल किया हुआ बंगला ही था। मजे की बात यह है कि उस वक्त जो कलेक्टर थे, उन्हें मुख्यमंत्री सचिवालय में बुलाकर जब बताया गया कि उन्हें बंगला बदलना पड़ेगा क्योंकि अजीत जोगी उस बंगले में रहना चाहते हैं, तो उस कलेक्टर ने यह कहते हुए विरोध किया था कि यह बंगला तो कलेक्टर के लिए निर्धारित है। बंगले में रहते हुए दिमाग ऐसा हो गया था कि मुख्यमंत्री की पसंद को भी एक पल को चुनौती दे दी थी, लेकिन फिर उस वक्त मुख्यमंत्री के सचिव रहे अफसर बहुत व्यवहारिक थे, और उन्होंने कलेक्टर को उसकी सीमाएं समझा दी थीं, और बाद में अनमने ढंग से कलेक्टर ने बंगला खाली किया था, और जोगी अपनी कलेक्टरी की यादों में जीते हुए मुख्यमंत्री रहने तक उसी बंगले में रहे। 

अखबारनवीसी के इन बरसों में मेरा वास्ता सौ-पचास आईएएस अफसरों से पड़ा होगा, और उनमें से शायद ही कोई ऐसे रहे हों जो कि अपनी कलेक्टरी की यादों के साये में न जी रहे हों। हर किसी के पास कलेक्टरी के किस्से रहते हैं, और यह आसानी से समझ आ जाता है कि उनकी तब तक की नौकरी का सबसे गौरवशाली हिस्सा जिलों में कलेक्टर रहने का ही था। यह ओहदा बहुत से लोगों को बददिमाग बना देता है, और वे राह चलते लोगों को पीटने का काम भी करने लगते हैं, जो नापसंद हो, उसे बेदखल करना भी उन्हें आसान लगता है, और मातहतों पर भरी बैठकों में फाईल फेंकना, धमकी देना भी बहुत बड़ी बात नहीं रहती है। लेकिन दूसरी तरफ सत्ता की चापलूसी को भी इस कुर्सी के लिए बुरा नहीं माना जाता, और ऐसा समझा जाता है कि खुशामद से इस कुर्सी पर अपनी पकड़ मजबूत करना प्रशासन का एक आम और जायज तरीका है। कुल मिलाकर देखें तो पीएम, सीएम, के बाद की तीसरे नंबर की यह सबसे ताकतवर कुर्सी अपने नीचे के लोगों को कुचलने के लिए, और अपने से ऊपर के लोगों को खुश रखने के लिए जानी जाती है। अब इस पर बैठे हुए कुछ लोग अपने पांव जमीन पर रखने में कामयाब हो जाते हैं, और उनकी विनम्रता भी कई तरह की प्रचलित कहानियों का सामान बन जाती है।

मेरा ख्याल है कि भारत जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नौकरशाही कही जाने वाली बड़े अफसरों की इस जमात के नाम में ही कुछ बुनियादी दिक्कत है। जाने कहां से यह शब्द निकला जो अपने आपमें बहुत बड़ी विसंगति और विरोधाभास से भरा हुआ है। यह शब्द, नौकरशाह, नौकर को शाह बताता है, या शाह को नौकर, यह समझना बड़ा मुश्किल है। कलेक्टरी के दिनों में कई अफसर सचमुच ही विनम्र रहते हैं, जो कि राजा से लेकर प्रजा तक सबके बीच में विनम्रता जारी रखते हैं। लेकिन बहुत से अफसर ऐसे रहते हैं जो कि सारी की सारी विनम्रता राजाओं पर खर्चते हैं, और जनता के लिए उनके पास फिर बूट ही बच जाते हैं। टीना डाबी को लेकर पिछले दिनों से बाड़मेर की जो खबरें आ रही हैं, वे कुछ इसी किस्म की दिख रही हैं, बाजार में दुकानदारों को लाउडस्पीकर पर धमकाते हुए वे जिस तेवर के साथ राज करती हैं, सत्ता से परे के, लेकिन सत्तारूढ़ नेता के साथ उनका तेवर एकदम अलग दिखता है। अब मैंने तो इतने बरसों में पहली बार यह देखा है कि किसी अफसर के शुरू के कई विनम्र, और झुके हुए अभिवादन तो सत्तारूढ़ पार्टी के नेताजी मोबाइल पर अपनी व्यस्तता की वजह से देख भी नहीं पाते हैं, और फिर इस अफसर को वह झुकना जारी रखना पड़ता है, और मीडिया को उनके झुकने की गिनती गिननी पड़ती है कि वे कितने सेकेंड में कितनी बार इस अतिविनम्रता की नुमाइश कर रही थीं।

देश में ऐसे ही अफसरी सिलसिले को तोडऩे के लिए मैं दस-बीस बरस से एक सलाह दुहराते आया हूं। नौकरशाह, जिन्हें जनता के प्रति रहना तो नौकर सरीखा चाहिए, लेकिन जो जनता के प्रति शाह रहते हैं, और सत्तारूढ़ नेताओं के प्रति नौकर बने रहते हैं, उनके पदनाम को बदलना चाहिए। अब कलेक्टर जितना कलेक्ट करते हैं उससे अधिक तो सरकारी खजाने से जनता पर खर्च करते हैं। और अंग्रेजों के वक्त के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट वाली भूमिका भी अब खत्म हो गई है। ऐसे में कलेक्टर या डीएम का नाम बदलकर जिला जनसेवक रखना चाहिए, ताकि अपना पदनाम उन्हें बार-बार, पूरे वक्त यह याद दिला सके कि उनकी जिम्मेदारी क्या है। टीना डाबी, या ऐसे दूसरे कलेक्टर दिन भर में चार बार भी जनता के साथ विनम्र हो जाएं, वह अधिक जरूरी है बजाय सत्तारूढ़ पार्टी के एक नेता के सामने हाथ जोडऩे, और सिर झुकाने की कसरत दुहराने के। अफसरों का इस कदर झुकना नेता के प्रति सम्मान कम, और अपनी हसरत अधिक होने का सुबूत होता है।   

(Daily Chhattisgarh)

हमको मालूम है ईश्वर की हकीकत लेकिन, दिल के खुश रखने को...

15 सितंबर 2024

 उत्तरप्रदेश के अयोध्या में हिन्दुओं की धार्मिक मान्यता और भावना के मुताबिक जो रामजन्मभूमि है, वहां पर बने राम मंदिर में सफाईकर्मी 20 साल की दलित युवती से 9 लोगों ने गैंगरेप किया है, और तीन अलग-अलग मौकों पर इस कॉलेज छात्रा के साथ बलात्कार का सिलसिला चलते रहा। इस बारे में गिरफ्तार 5 लोगों में से 4 के नाम उन्हें साफ-साफ हिन्दू बताते हैं, इसलिए इस मामले में साम्प्रदायिक तनाव खड़ा करने की गुंजाइश नहीं दिख रही है। दूसरी तरफ कुछ समय पहले अजमेर के 1992 के एक सामूहिक बलात्कार और ब्लैकमेलिंग के सैकड़ों लड़कियों तक बिखरे सिलसिले में उम्रकैद हुई है, और उसमें तमाम बलात्कारी और ब्लैकमेलर मुस्लिम थे, कांग्रेस के पदाधिकारी थे, और अजमेर की विख्यात दरगाह के खादिम (सेवादार) परिवारों के ताकतवर लोग थे। 

इन दो घटनाओं से परे भी बहुत सी दूसरी घटनाएं हैं जिनमें धार्मिक जगहों से जुड़े हुए लोग थे। अब आसाराम जैसा बलात्कारी तो खुद ही अपने आपमें एक धार्मिक सम्प्रदाय था। लोगों को याद होगा कि 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ के पास एक मंदिर में 6 मर्दों और एक नाबालिग ने 8 बरस की मुस्लिम खानाबदोश बच्ची का अपहरण करके उससे सामूहिक बलात्कार किया, और उसका कत्ल कर दिया। इस मामले में 7 में से 6 लोग कुसूरवार करार दिए जा चुके हैं। उसे एक मंदिर में बंधक बनाकर चार दिन तक उससे बलात्कार किया गया जिसमें पुजारी भी शामिल था, और ग्राम प्रधान भी। बाद में सुबूत नष्ट करके लाखों रूपए रिश्वत लेने के मामले में दो पुलिसवाले भी गिरफ्तार हुए। और ये सारे के सारे हिन्दू थे, और हिन्दू समाज ने कठुआ में इन गिरफ्तारियों के खिलाफ धार्मिक झंडे और देश का तिरंगा झंडा लेकर बड़े-बड़े जुलूस निकाले थे, और इस बच्ची की तरफ से मुकदमा लडऩे वाली हिन्दू वकील को हर किस्म की धमकियां भी दी थीं। 

हम धर्म की आड़ में, धर्म के नाम पर, धर्म की जगह पर, या किसी एक धर्म से जुड़े हुए लोगों द्वारा किए गए बलात्कार के बारे में चर्चा करना नहीं चाहते। धर्म से जुड़े हुए इस तरह के जुर्म चौंकाते भी नहीं हैं। चौंकाती सिर्फ एक बात है कि धर्म जिस तरह के कल्याणकारी ईश्वर की धारणा को बेचते हैं, क्या वह धारणा थोड़ी सी हद तक भी सच है? अब अगर देखें तो जो दलित लडक़ी भगवान राम के जन्मस्थान के उनके मंदिर में रोज सफाई का काम करती है, उस पर तो राम की खास मेहरबानी रहनी चाहिए थी। लेकिन हुआ क्या? तकरीबन तमाम हिन्दुओं वाले बलात्कारी-गिरोह ने अछूत समझी जाने वाली दलित लडक़ी से बार-बार गैंगरेप किया। जब बात देह की आ गई, तो फिर कुछ छुआछूत भी नहीं रह गया। लेकिन रामजी कहां थे? क्यों उनके इर्द-गिर्द के लोगों ने एक गरीब और बेबस लडक़ी से ऐसा किया, और उन पर ईश्वर ने मार क्यों नहीं किया? बात कुछ अजीब है क्योंकि ईश्वर को सर्वत्र, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, क्या-क्या नहीं कहा जाता है? इसी तरह कठुआ के मंदिर में जब 8 बरस की गरीब मुस्लिम खानाबदोश बच्ची के साथ 8-8 मर्द बलात्कार कर-करके उसे मार डाल रहे थे, तो कण-कण में विद्यमान रहने वाले भगवान कहां थे? उस बच्ची के नंगे बदन के नीचे उसके लहू और मर्दों की मर्दानगी से भीगे हुए फर्श के हर कण में भी तो भगवान रहे होंगे, लेकिन उन्होंने उस बच्ची को बचाना क्यों जरूरी नहीं समझा? इसी तरह जब अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के खादिम परिवार के नौजवान बेकसूर छात्राओं को फंसाकर, उनसे बलात्कार करके उसकी तस्वीरें खींचकर उनको ब्लैकमेल कर रहे थे, खुदकुशी पर मजबूर कर रहे थे, उनकी जिंदगी जहन्नुम बना रहे थे, तब भी दरगाह की ताकत ने अपने ही खादिमों को क्यों नहीं रोका? 

हम अपने आसपास की बातों से कुछ दूर जाएं, और देखें कि किस तरह रोमन कैथोलिक ईसाईयों के धार्मिक मुख्यालय वेटिकन से जुड़े पादरी दुनिया भर में हजारों बच्चों का यौन-शोषण करते रहे, और पोप ने उनके खिलाफ कुछ नहीं किया। यह यौन-शोषण कानून के हवाले भी नहीं किया गया। धर्म की आड़ में यह सिलसिला चलते रहा, और ईसा मसीह के तो हाथ-पैर सलीब पर ठुके हुए थे, इसलिए हो सकता है कि वे उन बच्चों को बचाने के लिए न आ पाए हों। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस यीशु मसीह के आने के नारे चर्चों की दीवारों पर चारों तरफ लिखे जाते हैं कि वह आ रहा है, वह आता क्यों नहीं है? जब पादरी छोटे-छोटे बच्चों से बलात्कार करते रहते हैं, तब भी ऐसे पादरियों के गले में बड़े से क्रॉस पर टंगा हुआ ईसा मसीह उन पादरियों के सीनों को छेद क्यों नहीं देता? 

हमारा सवाल बलात्कारियों से बिल्कुल नहीं है, क्योंकि वे मानव प्रजाति के मर्द हैं, जंगली जानवर तो हैं नहीं, इसलिए बलात्कार करना तो उनका मिजाज ही है, और पहला मौका मिलते ही वे बलात्कार तो करेंगे ही। हमारा सवाल ईश्वर की बनाई गई उस धारणा से है, उसे गढऩे वाले लोगों से है जो उसे कण-कण में व्याप्त बताते हैं। इस धारणा के हिसाब से बलात्कारी के बदन का हर कण भी ईश्वर से भरा होना चाहिए, और बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला का भी। फिर जब दोनों तरफ ईश्वर है, कण-कण में है, तो फिर वह इस जुल्म को रोकता क्यों नहीं है? और चूंकि वह हर जगह है, सबकुछ देखता-सुनता है, तो फिर वह ऐसे जुल्म होने क्यों देता है? और अगर वह इन्हें रोकने की ताकत नहीं रखता, तो उसे सर्वशक्तिमान, जनकल्याणकारी क्यों माना जाए? हमारा सवाल ऐसे काल्पनिक ईश्वर से है कि अगर उसकी कोई ताकत है, और वह आसमानी बिजली की तरह कुछ फेंककर भी लोगों को भस्म कर सकता है, तो किसी बच्ची या बच्चे के देह को बदनीयत से छूने वाले धार्मिक लोगों को तो उसे सबसे पहले भस्म करना चाहिए। लेकिन क्या किसी ने किसी बच्ची के बदन पर एक चुटकी राख देखी है जो कि गायब हो चुके बलात्कारी की रही हो? 

इंसानों के बलात्कारी मिजाज पर कोई हैरानी नहीं है लेकिन लोगों के ऐसे अंधविश्वास पर हैरानी जरूर होती है जो कि ईश्वर की ऐसी धारणा पर भरोसा करते हुए अपनी आंखों से बलात्कार देखते रहते हैं, और उसके बाद भी आसाराम या बाबा राम-रहीम, या पादरियों, या मौलवियों पर भरोसा भी करते रहते हैं। अपने भक्तों के ऐसे अंधविश्वास को भी जो ईश्वर खत्म नहीं कर सकता, उसकी ताकत का अंदाज लगा लेना चाहिए, और किसी को भी यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह किसी को बलात्कार से बचा सकेगा। वह तो अपने खुद के घर, पूजा-उपासना स्थल पर भी बेकसूर बच्चे-बच्चियों को नहीं बचा पाता, उससे सवाल पूछकर देखिए, अधिक गुंजाइश यही है कि उसका कोई जवाब नहीं मिलेगा। 

(Daily Chhattisgarh)

हिंसा का लहू जिन जुबानों पर लगता है, वे फिर हिंसा करते हैं

01 सितंबर 2024

 दो अलग-अलग खबरें बहुत विचलित करती हैं। एक खबर चर्चा में अधिक चुकी है, खबरों से परे पुलिस की प्रारंभिक जांच में सुबूत अच्छी तरह दर्ज हो चुके हैं, और कुछ लोग हिरासत में भी लिए जा चुके हैं। इसी से बात शुरू करते हैं। महाराष्ट्र में एक ट्रेन में 72 बरस का एक मुस्लिम बुजुर्ग अपनी बेटी के घर जा रहा था, और साथ बैठे दूसरे मुसाफिरों ने उसकी इस शक में पिटाई की कि वह गोमांस ले जा रहा है। पुलिस की जांच में मिला कि वह भैंस का मांस लेकर सफर कर रहा था जो कि महाराष्ट्र में गैरकानूनी नहीं है। इस पिटाई का वीडियो जब सामने आया तो लोग हक्का-बक्का रह गए। एक दर्जन लोग गालियां बकते हुए एक बूढ़े पर हमला कर रहे थे, उसे पीट रहे थे, और बाकी मुसाफिर इसका वीडियो बना रहे थे। जाहिर है कि देश में आज जो जहरीली हवा फैली हुई है, उसके असर में किसी मुस्लिम पर हमला देश के बाकी गैरमुस्लिम नागरिकों का हक सा मान लिया गया है। लोगों को याद होगा कि देश में जगह-जगह कुछ मुस्लिमों को मार भी डाला गया, क्योंकि उन पर यह शक था कि वे गोमांस ले जा रहे हैं, या गायों को ले जा रहे हैं। ऐसी ही भैंसों से लदी हुई एक ट्रक को कुछ हफ्ते पहले छत्तीसगढ़ में शायद 63 किलोमीटर तक पीछा करके, उसे पंक्चर करके, उसमें तोडफ़ोड़ करके उसके लोगों को पीटा गया, और या तो उन्हें पुल से फेंककर मार डाला गया, या फिर पुल से कूदने को मजबूर किया गया जैसी कि कहानी पुलिस ने बहुत अनमने और अनचाहे ढंग से मान ली है। 

एक दूसरी घटना को भी देखना जरूरी है। यह घटना लखनऊ में कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों उद्घाटन हो चुकी बहुचर्चित वंदे भारत ट्रेन की है जिसमें एक महिला और उसके भाई को ट्रेन के एक डिब्बे से होकर खाना लेने जाते हुए डिब्बे के भाजपाई लोगों ने रोका, और वहां से आगे जाने पर आपत्ति की। खाना लेकर लौटते में फिर इन लोगों को रोका गया, और अपने आपको भाजपा के कार्यकर्ता बताते हुए, डिब्बे को भाजपा का बताते हुए उनके साथ धक्का-मुक्की की गई। जिनके साथ यह बदसलूकी हुई, वे लोग सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर थे, जिन्हें इस ट्रेन के उद्घाटन में बुलाया गया था, और उनके साथ ऐसा बर्ताव किया गया। 

हर कुछ दिनों में ट्रेन की कोई कोई ऐसी घटना रही है जिसमें हिंसा हो रही है, हेटस्पीच या हेटहरकत सामने रही है। एक वक्त था जब हिन्दुस्तानी ट्रेनें देश में धर्मनिरपेक्षता की एक बड़ी जगह रहती थीं। रेलवे प्लेटफॉर्म से लेकर ट्रेन के डिब्बे के भीतर तक सभी धर्मों और जातियों के लोग सफर करते थे, और लोगों का दूसरों के प्रति बर्दाश्त भी ऐसे माहौल में बढ़ते चलता था। लेकिन आज सडक़ें हो या ट्रेन, ये बहुसंख्यक वर्ग की हिंसा की जगहें हो गई हैं, और दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, इनके हक दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह हो गए हैं। 

अभी कुछ दिन पहले ही ट्रेन के एक डिब्बे का वीडियो आया था जिसमें डिब्बे का रेल अधिकारी चीख-चीखकर मुस्लिम नमाजियों को कॉरीडोर में प्लास्टिक की चादर बिछाकर नमाज पढऩे से रोक रहा था, उनके बारे में भारी गुस्से से आपत्तिजनक जुबान में बातें कह रहा था, और उसने रास्ते पर नमाज पढऩे से लोगों को रोककर ही दम लिया। इस डिब्बे का जो वीडियो दिख रहा था उसमें अधिकतर मुस्लिम मुसाफिर दिख रहे थे, और नमाज तो कुछ मिनटों की होती है, लेकिन एक अकेले रेल अफसर ने इसे रोकने के लिए क्या-क्या नहीं कहा। दूसरी तरफ हमें याद पड़ता है कि जाने दस-बीस बरस कितने पहले से मुम्बई की लोकल ट्रेन में गणेश स्थापना की जाती है, कुछ सीटों पर गणेश प्रतिमा बिठाई जाती है, उसे मंदिर की तरह सजाया जाता है, वहां पर कीर्तन चलता है, और यह दस दिन लगातार चलता है। उसी देश की एक दूसरी ट्रेन में कुछ मिनटों के लिए भी नमाज की तैयारी को ही रोक दिया जाता है। 

हम अभी पूरे देश की हर घटना को इससे जोडक़र देखना नहीं चाहते, क्योंकि वह रायता बहुत अधिक फैलाना हो जाएगा, लेकिन इतनी चर्चा तो करनी ही पड़ेगी, कि रेल हो या रोड़ हो, ये किस हद तक धर्मान्ध और साम्प्रदायिक बन चुकी जगहें हैं! अपने धर्म के लिए धर्मान्ध, और दूसरे धर्मों के लिए साम्प्रदायिक। 

अभी कल की ही खबर थी कि छत्तीसगढ़ से लगे हुए महाराष्ट्र के हिस्से में गोंदिया में कृष्ण जन्माष्टमी पर निकले दही हांडी जुलूस में डीजे का शोर इतना अधिक था कि रास्ते के एक घर में एक आदमी की तबियत बिगड़ गई, बुरी तरह घबराहट होने लगी, धडक़न तेज हो गई, और परिवार के लोगों ने हाथ जोडक़र लाउडस्पीकर बंद करने की अपील की, लेकिन बेहोश पड़े आदमी के बगल से गुजरता दही हांडी का जुलूस वैसा ही शोर करते रहा। घर के अकेले कमाने वाले, अखबार के एजेंट, सुमित पांडे की मौत हो गई। लोगों का कहना है कि दही हांडी के डीजे का शोर इतना अधिक था कि आसपास की इमारतें कांप रही थीं। 

लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में, जहां पर कि हाईकोर्ट भी है, और वह हाईकोर्ट लगातार राज्य सरकार के पीछे लगा है कि सडक़ों पर अंधाधुंध लाउडस्पीकरों का शोर खत्म किया जाए, वहां पर किसी प्रतिमा विसर्जन के लाउडस्पीकरों के शोर से एक बच्चे की मौत हो गई थी। अभी छत्तीसगढ़ के तमाम शहरों में हर किस्म के त्यौहारों पर, प्रतिमा स्थापना से लेकर प्रतिमा विसर्जन तक, इतने भयानक ध्वनि प्रदूषण वाले जुलूस सडक़ों पर निकलते हैं कि उनका खास मकसद भक्ति नहीं रहता, हिंसा दिखता है। सडक़ की ट्रैफिक के साथ हिंसा, सडक़ किनारे के लोगों के साथ हिंसा। 

हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में, जहां बसे हुए मुख्य सचिव और डीजीपी हाईकोर्ट में हलफनामे देते ही रहते हैं, वहां पर आए दिन धार्मिक जुलूसों का इतना भयानक शोर देखते हैं कि उनके बगल से किसी तरह रेंगते हुए गाड़ी निकलने पर पूरी की पूरी गाड़ी हिलती रहती है, ऐसा लगता है कि कार के कांच टूट जाएंगे। इसके साथ-साथ अराजक धर्मान्धता सडक़ पर हिंसा का तांडव करते चलती है, और पुलिस इन पर कार्रवाई करने के बजाय इनकी सुरक्षा करते चलती है। 

यह पूरा सिलसिला देश में बढ़ती हुई ऐसी धर्मान्धता, और साम्प्रदायिकता का नतीजा है, जो कि पूरी तरह बेकाबू है। जिन रेलगाडिय़ों को सबसे सुरक्षित माना जाता था, उन रेलगाडिय़ों से अब मुसाफिरों को पीट-पीटकर फेंक दिया जाता है, और जाहिर है कि ऐसी हिंसा पर कोई कारगर कार्रवाई नहीं होती, तभी मुजरिमों का इतना हौसला बनता है। यह तो चारों तरफ बिखरे हुए मोबाइल-कैमरों की मेहरबानी है कि हिंसा के सुबूत जुट ही जाते हैं, वरना कोई गिरफ्तारी भी नहीं हो पाती। लेकिन हमारा ऐसा अंदाज है कि आज देश जिस हद तक धर्मान्ध हो चुका है, साम्प्रदायिक हिंसा के मुजरिम पुलिस, जेल, और अदालत तक तरह-तरह का सम्मान ही पाते होंगे। 

किसी देश या समाज में, या प्रदेश में ऐसी अराजक हिंसा को बढ़ावा देना तो आसान है, लेकिन इससे छुटकारा पाना कुछ वैसा ही मुश्किल होगा जैसा कि एक कहानी में अपने बनाए गए शेर में प्राण फूंकने के बाद उससे उतरना मुश्किल होता है, शेर खा जाता है। मुंह में खून लगने पर महज जानवर ही मानवभक्षी नहीं होते, इंसान भी एक बार हिंसा की ताकत का लहू चख लेते हैं, तो उन्हें फिर उस हिंसा का स्वाद बार-बार खींचता है, और अगली हिंसा करवाता है। किसी धर्म के ऐसे हिंसक लोग हर बार दूसरे धर्म के साथ ही हिंसा नहीं करते, जब ऐसे हिन्दू, हिन्दू बहुल आबादी में ऐसा भयानक शोर करते निकलते हैं, या किसी धार्मिक आयोजन में बेकाबू लाउडस्पीकर बजाते हैं, तो वे मोटेतौर पर हिन्दुओं का ही सुख-चैन छीनते हैं। सरकारों में ऐसी गुंडागर्दी के खिलाफ कार्रवाई के लिए बहुत बड़े हौसले की जरूरत नहीं है, जरूरत महज इतनी है कि निर्वाचित सत्तारूढ़ नेता अफसरों को कानून के हिसाब से काम करने दें।

(Daily Chhattisgarh)