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सकारात्मक खबरों के लिए मीडिया का मोहताज रहना जरूरी तो नहीं...

16 फरवरी 2025 

दुनिया में अच्छी खबरें भी कम नहीं रहती हैं, लेकिन उनमें से चर्चा में वे ही खबरें आती हैं जिनमें बहुत सी नाटकीयता होती है, किसी फिल्म किस्म की कहानी रहती है, या जो बिल्कुल ही अविश्वसनीय दर्जे की रहती हैं। रोजाना की जिंदगी की छोटी-छोटी बुरी खबरें भी सतह पर तैरते दिखती हैं, लेकिन अच्छी खबरों का बहुत अधिक अच्छा रहना जरूरी रहता है। ऐसी ही एक अच्छी कहानी अभी योरप और अमरीका के बीच सामने आई है।

नीदरलैंड्स में रह रही एद्री पैंडलटन का अपने साथी से रिश्ता टूटा था, और उसे इसके बाद अपने बूढ़े पालतू कुत्ते को लेकर अमरीका के कैलिफोर्निया अपने घर लौटना था। उसने बहुत सी एयरलाईंस को देखा, लेकिन वे कुत्तों को पार्सल की तरह ढोती थीं, और अपने बूढ़े कुत्ते को एद्री उस तरह ले जाना नहीं चाहती थी। ऐसे में उसने लोगों से सलाह और मदद के लिए एक वीडियो बनाकर टिकटॉक पर डाला। उसमें कुत्ते का जिक्र था, फ्लाईट का जिक्र था, तो टिकटॉक पर मौजूद एक जर्मन पायलट, निकलस ने उसे देखा, और उसका जवाब लिखा। कुत्ते को लेकर कैलिफोर्निया जाने की बात तो शुरू हुई लेकिन वह जल्द ही इन दोनों के बीच दोस्ती में बदल गई, ऑनलाईन वीडियोकॉल बात होने लगीं, दोस्ती मोहब्बत में बदल गई, और दोनों ने शादी कर ली। अब कैलिफोर्निया जाना रह गया, और दोनों स्विटजरलैंड में बस गए हैं।

इस किस्म की बहुत सी दिलचस्प और सकारात्मक कहानियां जो असल जिंदगी से निकलीं असली भी हैं, वे बीच-बीच में सामने आती हैं, लेकिन बुरी और नकारात्मक खबरों के सैलाब के बीच वे किनारे बह जाती हैं। अभी कुछ ही दिन पहले भारत में सकारात्मक खबरों की एक वेबसाइट, बेटरइंडिया में एक कहानी आई कि किस तरह केरल में अपने घर में काली मिर्च तोड़ते हुए एक बुजुर्ग कुएं में गिर गया। 64 बरस के रमेशन को बचाने के लिए 56 बरस की उसकी पत्नी पद्मा रस्से से 40 फीट गहरे कुएं में तुरंत उतरी, और 20 मिनट बाद फायरब्रिगेड के पहुंचने तक उसने पति को पानी में उठाकर रखा था कि वह डूब न जाए। बाद में जाल डालकर इन्हें निकाला गया।

लोगों को चाहिए कि अपने बच्चों, परिवार के लोगों, और आसपास के दायरे में जिंदगी के प्रति एक सकारात्मक आस्था पैदा करने वाली ऐसी सच्ची घटनाओं को आगे बढ़ाएं, उन पर चर्चा करें। स्कूलों को भी चाहिए कि वे बच्चों का उत्साह बढ़ाएं कि वे बड़ों से पूछकर या कहीं ढूंढकर सकारात्मक खबरों की कतरनें लेकर आएं, और फिर उनमें से चुनिंदा कतरनों को स्कूल में बाकी लोगों के पढऩे के लिए किसी नोटिस बोर्ड पर लगाया जाए। इन दिनों सोशल मीडिया की मेहरबानी से यह आसान हो गया है कि लोग अपनी पसंद की बातों को, तस्वीर या वीडियो को भी मुफ्त में बहुत से लोगों तक पहुंचा सकते हैं, और जिंदगी और दुनिया के प्रति जमी हुई निराशा दूर हो सकती है।

मीडिया के अपने मिजाज के मुताबिक नकारात्मक खबरें अधिक जगह पाती हैं, और अधिक चर्चा में रहती हैं। लेकिन मुख्यधारा के मीडिया से परे सकारात्मक खबरों के अपने पेज और ग्रुप बने हुए हैं, बनते और बढ़ते भी जा रहे हैं, जिन्हें बड़ी संख्या में लोग देखते हैं। हमें भी कुत्ते और पायलट वाली यह खबर बीबीसी के एक साप्ताहिक पॉडकास्ट, हैप्पीपॉड पर सुनने मिली, और फिर मामूली सी तलाश पर इंटरनेट पर इनकी और जानकारी भी मिल गई।

आज तमाम लोगों को यह दिक्कत रहती है कि उनके बच्चे इंटरनेट और सोशल मीडिया का क्या इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें खबर नहीं रहती। ऐसे में लोगों को चाहिए कि सकारात्मक खबरों की जांच-पड़ताल करने के बाद उनके सही निकलने पर उनके लिंक अपने आसपास के लोगों को बढ़ाएं ताकि उनका देखना-पढऩा, सोचना, और आसपास बात करना सब कुछ में सकारात्मकता बढ़े।

अभी मैंने दो दिन पहले ही हमारे यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल के लिए छत्तीसगढ़ के एक आदिवासी पद्मश्री काष्ठशिल्पी और समाजसेवी अजय मंडावी से बातचीत की। वे बस्तर के कांकेर के पास दो गांवों में वहां के स्कूली बच्चों के साथ एक नया अभियान चला रहे हैं। जिन स्कूली बच्चों के घर पर कोई पेड़ लगाने की जगह है, वहां पर वे ऐसे बच्चे छांटकर स्कूल शिक्षक-शिक्षिका के साथ उनके घर जाते हैं, वहां पौधा लगाते हैं, और उन बच्चों को दस रूपए महीने देते हैं कि उन्हें पौधे का रखरखाव करना है। वे तीन बरस तक बच्चों को यह पैसा देने वाले हैं ताकि पौधा मजबूत हो जाए।

इस बातचीत में अजय मंडावी ने बताया कि ऐसे 45 बच्चों में से एक बच्चा टीचर के पास दस रूपए लेकर आया, और कहा कि पैसा वापिस ले लो, मेरा पौधा मर गया है। अब पौधा जिस किसी वजह से मर गया हो, बहुत मामूली कपड़ों में उस गरीब आदिवासी स्कूली बच्चे को यह जिम्मेदारी सूझ रही थी कि वह पैसा लौटाए क्योंकि अब पौधा ही नहीं रह गया है। एक गरीब बच्चे की यह नैतिकता और ईमानदारी, और उसकी जिम्मेदारी की भावना हिलाकर रख देती है, और अगर इसी एक सच्ची घटना को बाकी बच्चों के सामने रखा जाए, तो हो सकता है कि उनमें से बहुत से बच्चे भी किसी दुविधा में फंसने पर एक सही नैतिक फैसला ले सकें जो कि उनके तात्कालिक फायदे से परे का होगा, और समाज के सामने एक अच्छी मिसाल भी रहेगा।

अजय मंडावी अपने जेब के पैसों से अब तक 45 बच्चों को पौधा-परवरिश भत्ता दे रहे हैं, और अपनी क्षमता रहने तक इसे आगे भी बढ़ाने वाले हैं। अब नेक नीयत से उनके शुरू किए गए इस काम का भी शायद यह असर पड़ा होगा कि उनसे 10 रूपए पाने वाला बच्चा भी पौधा मर जाने पर रकम लौटाने आ गया। लोगों को असल जिंदगी की सच्ची कहानियां देखकर दूसरों तक बढ़ाना चाहिए ताकि यह समझ पड़े कि दुनिया में सिर्फ बलात्कारी और हत्यारे ही नहीं भरे हुए हैं, सिर्फ चोर और बेईमान ही नहीं भरे हुए हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

एआई मुखिया को प्रलय पर भरोसा, दोनों बातें मिलकर कितनी खतरनाक?

9 फरवरी 2025 

दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की सबसे बड़ी चर्चा ओपनएआई नाम की कंपनी के बनाए हुए चैटजीपीटी से शुरू हुई, और लोगों को लगा कि यह एक चमत्कार सा हो गया है, और करिश्मे की तरह का यह एआई एप्लीकेशन पूरी दुनिया बदलकर रख देगा। उसने दुनिया बदलना शुरू भी कर दिया क्योंकि विश्वविद्यालयों से लेकर अलग-अलग मंचों तक कुछ भी तैयार करने के लिए चैटजीपीटी का इस्तेमाल होने लगा, और अमरीकी पूंजी बाजार ने सबसे अधिक रफ्तार से सबसे बड़ी रकम आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के विकास से जुड़ी कंपनियों पर लगाई। दूसरी तरफ लोगों को याद होगा कि दुनिया के कई जानकार लोगों ने यह खुली मांग की कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का अंधाधुंध विकास रोका जाए क्योंकि यह कब बेकाबू हो जाएगा, और इंसानों की पकड़ के बाहर हो जाएगा, यह भी तय नहीं है।

लेकिन इस बीच ओपनएआई कंपनी के मुखिया सैम एल्टमैन और उनसे जुड़ी कुछ दूसरी कंपनियां खूब चर्चा में रहीं, उन्हें ओपनएआई के मुखिया पद से कुछ महीनों के लिए हटा भी दिया गया, और उसके बाद उन्हें कंपनी में वापिस भी रख लिया गया। लेकिन वह सब एक अलग कहानी है जिसमें जाना आज का मकसद नहीं है। लेकिन हम आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के एक सबसे बड़े नाम की सोच के एक पहलू पर बात करना चाहते हैं। सैम ने कुछ बरस पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि उनका भरोसा है कि एक दिन प्रलय आएगा, और सब कुछ खत्म हो जाएगा। और ऐसे दिन के लिए वे अपने लिए बंदूकों से लेकर दवाओं, गैसमास्क, और पानी तक का इंतजाम करके चलते हैं। उन्होंने किसी इंटरव्यू में भी ये बातें कही थीं। साथ-साथ उन्होंने यह भी कहा था कि प्रलय या तबाही किसी एक जानलेवा सिंथेटिक वायरस से भी आ सकती है, या किसी बेकाबू आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से भी आ सकती है जो इंसानों को तबाह करने पर उतारू हो जाए। उन्होंने तबाही के ऐसे किसी दिन की आशंका में हथियारों, बैटरियों, और सोने के साथ-साथ रेडियोधर्मिता को रोकने की तैयारी में पोटेशियम आयोडाइड का इंतजाम करके भी रखा था।

अब हम आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के दुनिया के इस सबसे बड़े नाम को देखें, और उसकी आशंकाओं को देखें तो समझ पड़ता है कि विज्ञान और टेक्नॉलॉजी की इतनी गहरी समझ रखने वाले व्यक्ति को भी ऐसी प्रलय की आशंका है जो किसी मानव निर्मित वायरस या बेकाबू आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से आ सकती है। हम ऐसे ही कुछ दूसरे लोगों के बारे में जब सोचते हैं, तो लगता है मानव प्रजाति और धरती को लेकर बहुत से लोगों का अलग-अलग सोचना रहता है, और ऐसा सोचने वाले लोग भी हैं कि इंसानों ने धरती को तबाह करके रखा है, और धरती की बाकी तमाम प्रजातियों के हक उन्होंने छीन लिए हैं, वे मौसम से लेकर जलवायु, पर्यावरण, और समूची धरती को तबाह कर रहे हैं। ऐसे लोगों में यह सोचने वाले लोग भी हो सकते हैं कि इंसानों को खत्म करना धरती के लिए एक अधिक लोकतांत्रिक बात होगी जिसमें बाकी प्रजातियों को इंसानों के न रहने पर उनके हक बेहतर तरीके से मिल सकेंगे। ऐसे लोग हो सकता है कि किसी सिंथेटिक वायरस तक पहुंच बना सकें जिससे कि कोरोना से भी कई गुना अधिक तबाही लाई जा सके, यह भी हो सकता है कि ऐसे लोग आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को इंसानों के काबू के बाहर कर सकें, जो कि कुछ उस किस्म का होगा कि किसी अंतरिक्षयान को अंतरिक्ष तक पहुंचाकर उसे किसी भी काबू से बाहर कर दिया जाए। कुछ लोग इसे एक दर्जा ऊपर ले जाकर एआई-आतंकी मॉडल बना सकते हैं, और किसी धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, या सामाजिक विचारधारा के मुताबिक किसी तबके के खिलाफ तबाही लाने का काम कर सकते हैं।

यह एक अलग किस्म का आतंक रहेगा जो कि किसी नस्ल को, किसी देश के या धर्म के लोगों को, या किसी पेशे के लोगों को खत्म करने के काम  लाया जा सकता है।

पल भर के लिए किसी अपराधकथा की तरह कल्पना कर देखें कि धरती पर पर्यावरण को सबसे अधिक बर्बाद करने वाले, जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार, अधिक खपत वाले अमरीकियों को नुकसान पहुंचाकर कोई अगर धरती पर खपत घटाने की कल्पना करे, तो अमरीकी जनजीवन को ध्वस्त करके, या अमरीकी अर्थव्यवस्था को चौपट करके, अमरीकियों के खरीदने की ताकत सीमित करके धरती को बचाने की कल्पना भी कोई कर सकते हैं। हम कोई हिंसक तरीके सुझाना नहीं चाहते, लेकिन अनगिनत फिल्मों और उपन्यासों में ऐसी बात कही जा चुकी है कि व्यापक सार्वजनिक तबाही कैसे लाई जा सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से निबंध लिखने और रिसर्च पेपर तैयार करने, कोई प्रजेटेंशन बनाने की ताकत तो लोगों ने देखी है, लेकिन यही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस किसी देश के सारे कम्प्यूटर सिस्टम को खत्म करके वहां की अर्थव्यवस्था और रोजाना की जिंदगी को घुटनों पर ला सकता है। जब आतंकियों का मकसद ऐसे किसी एआई से लैस हो जाए, तो वह सैकड़ों किस्म से तबाही ला सकता है।

आज दुनिया में धर्म के नाम पर बहुत से आतंकी संगठन खूनखराबा करते हैं, और ओसामा-बिन-लादेन जैसे आतंकी तो अमरीका की नाक की तरह तनी हुई इमारतों को मिट्टी में मिलाकर एक अभूतपूर्व मिसाल पेश करते हैं। यह समझना चाहिए कि आगे होने वाली नए किस्म की कई घटनाएं आने वाले उस वक्त अभूतपूर्व कहला सकती हैं। अब अगर पर्यावरण-आतंकी किसी देश के बिजलीघरों को, वहां के इंटरनेट को, वहां के सभी किस्म के कम्प्यूटर-रिकॉर्डों को खत्म करने का जरिया निकाल लें, तो वैसी तबाही से कोई देश आसानी से तो उबर नहीं सकता। कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि एक धर्म के लोग पूरी दुनिया में हिंसा कर रहे हैं, और इस धर्म के लोगों के आर्थिक हितों, उनकी रोजी-रोटी, और कमाई को खत्म करने की साजिश एआई से तैयार की जाए, तो वह भी हो सकती है।

मैं तो एक अपराधकथा लेखक की तरह, विज्ञान कथा लेखक की तरह कई किस्म की तबाही लाने वाली ऐसी कल्पनाएं आसानी से कर पा रहा हूं जो कि आतंकियों की कल्पनाओं में और अधिक आसानी से आती होंगी, आ सकती हैं। ऐसे में एआई से जुड़े किसी बड़े व्यक्ति का प्रलय पर भरोसा एक खतरनाक बात हो सकती है, अगर एआई के दिमाग में ही यह धारणा बैठ जाए कि प्रलय तो एक दिन आनी ही है, तो हो सकता है एआई उस प्रलय की गारंटी मानकर कई तरह के काम करने को तैयार हो जाए। एआई के बारे में आज भी लोगों का मानना है कि अगर वह आज भी इंसानी काबू से बाहर हो चुका हो, तो हैरान नहीं होना चाहिए। मुझे लगता है कि आने वाली दुनिया में आतंक का सबसे बड़ा हथियार एआई हो सकता है, किसी और के हाथों में भी, या एआई खुद हथियार की जगह हमलावर भी हो सकता है, एक आतंकी हमलावर, या अधिक बेहतर कहना होगा, सबसे बड़ा आतंकी हमलावर, और हो सकता है कि वह दुनिया का आखिरी आतंकी हमलावर भी साबित हो, क्योंकि लोग परमाणु हथियारों को तबाही का सबसे बड़ा सामान मानते हैं, जबकि बिना मिसाइलों पहुंचने वाले वायरस उनसे अधिक तबाही लाने वाला हथियार साबित हो सकते हैं। देखना यही है कि इंसान एआई का इस्तेमाल करेंगे, या फिर एआई खुद इंसानों का इस्तेमाल करेगा। ऐसा लगता है कि ऐसा दिन आने में विज्ञान कथा लेखकों की कल्पना से अधिक वक्त नहीं लगेगा। (Daily Chhattisgarh)

इश्तहारों से फंसाकर लाए गए विदेशी सैलानियों के सामने शर्मनाक नजारा..

08 दिसंबर 2024

छत्तीसगढ़ से लगे हुए मध्यप्रदेश के कान्हा नेशनल पार्क का जो नजारा कल निकलकर सामने आया है वह बताता है कि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के भीतर सभी तीन स्तंभों में सामंतवाद किस तरह जड़ों तक घुसा हुआ है। कान्हा दो जिलों में बंटा हुआ है, मंडला और बालाघाट। बालाघाट के एक कस्बे से कान्हा पहुंचे एक मजिस्ट्रेट ने वहां की निजी रिसॉर्ट में अपने 30-35 मेहमानों के लिए जन्मदिन की एक पार्टी मुफ्त में मांगी। जब यह नहीं हो पाया, रिसॉर्ट मालिकों ने मना कर दिया, तो बताया जाता है कि उन्होंने वन विभाग पर दबाव डाला कि उनके सारे मेहमानों को मुफ्त में जंगल सफारी कराई जाए। जंगल सफारी की तमाम गाडिय़ां पहले से बुक थीं, देश-विदेश से आए हुए पर्यटक वहां इंतजार में खड़े थे, और मजिस्ट्रेट की यह फरमाईश भी पूरी न हो पाई। बौखलाकर उन्होंने पर्यटकों को शेर दिखाने ले जाने वाली जिप्सी गाडिय़ों के कागजों की जांच शुरू कर दी। घंटों तक उन्होंने किसी गाड़ी को भीतर घुसने नहीं दिया। पर्यटक अपना कीमती वक्त खोते हुए पहले तो मजिस्ट्रेट के सामने गिड़गिड़ाते रहे, फिर उन्होंने विरोध चालू किया, और आखिर में जाकर नौबत इतनी बिगड़ी कि मजिस्ट्रेट को मौका छोडक़र भागना पड़ा। और ऐसे में विदेशी पर्यटक निराश होकर यह कहते सुने गए कि वे योरप से कान्हा के शेर देखने आए हैं, और अब उन्हें क्या मोदी को फोन करना होगा?

अब देश के सबसे प्रमुख नेशनल पार्क में से एक, कान्हा में अगर एक कस्बे का मजिस्ट्रेट नाजायज फरमाईशों को लेकर इस कदर का बवाल खड़ा कर सकता है, तो उससे बड़े दर्जे के देश के हजारों दूसरे जज-मजिस्ट्रेट क्या नहीं कर सकते? और फिर देश में सांसद और विधायक मिलाकर कई हजार हैं, बड़े नौकरशाह और दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग दसियों हजार हैं। इस देश में आम जनता के सार्वजनिक हकों पर खास लोगों के बुलडोजर ऐसे चलते हैं कि मानो वे आम न हों, आम की गुठलियां हों। यह सिलसिला बहुत भयानक है, शर्मनाक भी। किसी भी सभ्य लोकतंत्र में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर काबिज प्यादा दर्जे के लोग भी जब अपने आपको सार्वजनिक जगहों का मालिक समझने लगें, तो फिर यह बताता है कि संविधान के रास्ते लोकतंत्र तो आ गया है, लेकिन सभ्यता नहीं आई है। 

एक तरफ तो न सिर्फ मध्यप्रदेश, बल्कि देश के हर प्रदेश पर्यटकों को जुटाने के लिए दुनिया भर में इश्तहार करते हैं। और जब दुनिया के लोग प्रदेश घूमने आते हैं, तो प्रदेश के अपने लोग जिम्मेदार ओहदों पर बैठे हुए भी ऐसी गैरजिम्मेदारी का बवाल करते हैं। यह भयानक है। मुम्बई पुलिस का एक इश्तहार आता है जिसमें ट्रैफिक सिपाही बने हुए अक्षय कुमार सडक़ पर गलत तरफ से दाखिल हुई गाड़ी को रोकते हैं, और पूछते हैं कि सडक़ जिसके नाम पर है, क्या वे उसी के परिवार के हैं? क्या उन्हीं के बेटे हैं? क्या सडक़ उनके पिता की है? और जब लोगों को उनकी औकात याद दिलाई जाती है, तब वे शर्मिंदगी से भरते हैं। हम तो गली-गली सत्ता के भुनगों को भी सडक़ पर गाडिय़ां रोककर बोनट पर केक रखकर, तलवार से उसे काटते हुए, गोलियां चलाकर जश्न मनाते हुए जाने कितने ही प्रदेशों में देखते हैं। और अपने आसपास तो यह भी देखा है कि एक छोटी सी म्युनिसिपल का चुना हुआ ओहदेदार सडक़ किनारे दारू पीकर गाड़ी का लाउडस्पीकर बजाते हुए जन्मदिन मना रहा है, और उसे रोकने भेजी गई पुलिस को खुद पुलिस अफसर सस्पेंड कर देते हैं, क्योंकि बवाली सत्तारूढ़ पार्टी का निकल जाता है। 

अब कान्हा का यह हंगामा तो किसी पार्टी का भी नहीं है, एक मजिस्ट्रेट का है जिससे कि बड़े सीमित दायरे में रहने की उम्मीद की जाती है। नेशनल पार्क राज्य सरकार के कब्जे में, वहां भीतर जाने वाली गाडिय़ां सरकार के नियंत्रण की, और उनको रोकने के नाटक में, कागज जांचने के लिए देशी-विदेशी सैलानियों का दिन बर्बाद करना, यह किस किस्म का लोकतंत्र है? अगर यह जांच के नाम पर नौटंकी नहीं होती, तो इन गाडिय़ों के कागज तो संबंधित और जिम्मेदार विभाग के अफसर सैलानियों के समय पहले या बाद भी देख सकते थे। और किसी मजिस्ट्रेट को जाकर सैलानियों को हलाकान करके गाडिय़ों की ऐसी जांच का कोई जिम्मा दिया गया होगा, ऐसा तो लगता भी नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार, एमपी हाईकोर्ट, और सुप्रीम कोर्ट को देखना चाहिए कि न्याय व्यवस्था के नाम पर यह किस तरह का कलंक खड़ा हुआ है? हमने कुछ अदालतों के जजों को पहले भी गुंडागर्दी और ऐसी मनमानी करते देखा है, लेकिन फिर उन्हें हटाए जाते भी देखा है। 

हम किसी एक घटना पर ही आज की पूरी बात खत्म करना नहीं चाहते, और इसे भारतीय सत्ता में चली आ रहीं बीमारी का एक लक्षण ही मानते हैं। इसे नमूना मानकर इस बीमारी का नीचे तक इलाज करना चाहिए। कई बरस पहले दिल्ली के एक हाईकोर्ट जज ने रेलवे स्टेशन पर खफा होकर वहीं अदालत खोल दी थी। एक दूसरी घटना में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने खातिरदारी में कमी होने से रेलवे को बहुत बुरा नोटिस जारी किया था कि उनके प्रोटोकॉल में कमी की गई। इस पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ ने इस जज को लिखा था कि शिष्टाचार की सहूलियतों को इस तरह का मानकर नहीं चलना चाहिए कि जज समाज से परे कोई ताकत या सत्ता हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज को बताया था कि उन्हें रेल अधिकारियों पर अनुशासन की कार्रवाई करने का कोई हक नहीं है, और वे किसी रेल अधिकारी से जवाब-तलब नहीं कर सकते। उन्होंने  न्यायपालिका को अपने बारे में सोचने, और अपने भीतर से परामर्श पाने की जरूरत भी बताई थी। हाईकोर्ट जज की शिकायत थी कि ट्रेन पर उन्हें बार-बार कहने पर भी नाश्ता नहीं मिला, और जीआरपी के पुलिसवाले उनसे आकर नहीं मिले। जबकि रेलवे ने इस पर लिखित जवाब दिया था कि सुबह साढ़े 7 बजे ट्रेन में इस जज को उनकी मर्जी के मुताबिक बिना शक्कर की चाय, कटलेट, और ब्रेड बटर पेश किया गया था। और ट्रेन अगर लेट हुई थी, तो वह दिल्ली में यमुना का जलस्तर बढ़ जाने की वजह से हुई थी, जिस पर रेलवे का कोई बस नहीं था। 

इस तरह की मनमानी और बददिमागी का सुलूक बताता है कि लोगों की सत्ता पर पहुंचने के बाद लोकतंत्र और इंसानियत की समझ किस तरह कमजोर हो जाती है, उन्हें सभ्य समाज की इस सबसे बुनियादी समझ की जरूरत नहीं रह जाती। लोकतंत्र में वीआईपी और प्रोटोकॉल किस्म के शब्दों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र में एक इंसान दूसरे के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण कैसे हो सकते हैं? लोग अगर किसी ओहदे पर हैं, तो उस ओहदे का काम करने के लिए उन्हें जो सहूलियतें जरूरी हैं, उससे अधिक शिष्टाचार किसी को भी क्यों मिलना चाहिए? ऐसा अतिरिक्त सम्मान, अतिरिक्त शिष्टाचार गैरजरूरी, नाजायज, जनता पर बोझ, और बददिमाग बनाने वाला रहता है। इसे पूरी तरह खत्म करना चाहिए। मध्यप्रदेश की इस घटना पर एक बड़ी सरकारी या अदालती जांच होनी चाहिए, और इस बददिमागी को सिरे से खत्म करना चाहिए। जरूरत रहे तो ऐसे मजिस्ट्रेट के खिलाफ लोग हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी लगा सकते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

ये कहां...., आ गए हम...

 24 मार्च, 2024 

 

पिछले कुछ हफ्तों के सुप्रीम कोर्ट को देखें तो लगता है कि केन्द्र और कई राज्य सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में संविधान और कानून से लगातार टकरा रही हैं। राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार के जाने कितने ही फैसलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट को इन सरकारों को याद दिलाना पड़ रहा है कि वे कानून के खिलाफ काम कर रही हैं। ऐसा भी नहीं कि इन्हें अपने दायरे मालूम न हों, क्योंकि निर्वाचित नेता तो नासमझ और बदनीयत हो सकते हैं, लेकिन लगातार काम करने वाले नौकरशाह और बड़े-बड़े सरकारी वकील तो कानून को जानते हैं, और वे पहले से बता सकते हैं कि कौन से फैसले अदालती कटघरे में खड़े नहीं हो सकेंगे। इसके बावजूद अगर सरकारें ऐसे फैसले लेती हैं, ऐसे काम करती हैं, तो यह जाहिर है कि वे अदालत से इन कामों के रद्द या खारिज होने के पहले तक के वक्त का इस्तेमाल करती हैं। चुनावी बॉंड का मामला ऐसा ही रहा, और कई राज्यों की सरकारों के बहुत से फैसले ऐसे ही रहे जिनके बारे में अदालत से खारिज होना तय था, लेकिन उसके पहले तक उनका बेजा इस्तेमाल ही पूरा मकसद था।

अब ऐसा लगता है कि भारतीय लोकतंत्र में कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका नाम के जो तीन स्तंभ अलग-अलग बनाए गए थे, उनमें से कार्यपालिका किसी बिफरे हुए सांड की तरह नथुनों से फुंफकारते हुए, सींगों से हमला करते हुए जनहित को कुचल देने के लिए टूटी पड़ी है, और सुप्रीम कोर्ट है कि अपने काम के बाकी बोझ को किनारे रखकर इस सांड को सींगों से थामकर काबू में करने में लगा हुआ है। और तो और, चुनाव आयोग से लेकर राष्ट्रपति तक, राज्यपालों से लेकर विधानसभाध्यक्षों तक जो स्वतंत्र और स्वायत्त संस्थाएं होनी चाहिए, वे सारी की सारी सरकार के मातहत विभागों की तरह काम कर रही हैं। नौबत इतनी खराब हो गई है कि जनता को अब सिर्फ एक संस्था, अदालत की तरफ देखना पड़ रहा है, लेकिन यह लोकतंत्र इस नौबत के लिए बनाया नहीं गया था कि बाकी तमाम संस्थाएं गैरजिम्मेदारी करें, गलत करें, और सिर्फ अदालत उसे सुधारने का काम करे। 

देश और प्रदेशों को देखें तो यह साफ है कि सरकारें ऐसे बहुत से फैसले ले रही हैं जिनके बारे में हम उसी वक्त से यह लिखते आए हैं कि वे अदालती सवालों को नहीं झेल पाएंगे, लेकिन सरकारें हैं कि बेझिझक और बेधडक़ होकर ऐसा ही काम करती जा रही है। कहीं आतंक के कानून का ऐसा इस्तेमाल किसी खास तबके की गिरफ्तारी के लिए किया जा रहा है, तो कहीं केन्द्र और राज्य सरकारों की जांच एजेंसियों का काम सत्ता को नापसंद लोगों की गिरफ्तारी तक सीमित रह गया है। राज्यों में भी छांट-छांटकर राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ मामले-मुकदमे दर्ज करने का काम चल रहा है। और सरकारें इस बेशर्मी के साथ ऐसे काम कर रही हैं कि यह भी लगता है कि क्या सरकारों को सचमुच ही कोई अधिकार होना चाहिए? 

देश के कानून एकदम साफ हैं, और सरकारों को उनकी सीमाएं मालूम हैं, लेकिन सौ फीसदी गलत तरीके से काम करना जारी है, और सिर्फ निर्वाचित सरकारें नहीं, राज्यपाल और विधानसभाध्यक्ष भी ऐसे खराब और घटिया फैसले ले रहे हैं, कि उन्हें मालूम है कि अदालत उन्हें पलट देगी। लेकिन इसमें कुछ हफ्तों या महीनों का समय लगेगा, और उस वक्त का इस्तेमाल तोडफ़ोड़ करने, सत्ता पलटाने, दलबदल करवाने में किया जाता है। अदालती फैसलों से सरकारें कुछ भी नहीं सीख रही हैं, वे इस बात पर पूरी तरह अड़ी हुई हैं कि उन्हें अदालतों से टकराव लेना है, और मनमानी करनी है। सरकारें तो सरकारें, स्टेट बैंक जैसे सार्वजनिक संस्थान भी सुप्रीम कोर्ट के सामने बेशर्मी से हुक्मउदूली कर रहे हैं, और इसके चेयरमैन तक को अदालत का कोई डर नहीं है। 

चुनावी बॉंड से लेकर पीएम केयर्स तक बहुत से ऐसे फंड हैं जिन्हें सरकार जनता की नजरों से दूर रखने पर अड़ी हुई है। छत्तीसगढ़ में तो सरकार ने एक जाति सर्वे करवाया, और उस रिपोर्ट को दो-दो राज्यपाल मानते रह गए, लेकिन किसी को दिया नहीं गया। जनता के पैसों और उन पैसों से किए गए काम का हिसाब भी देना नेता और पार्टियां नहीं चाहते। लोकतंत्र में जनता एकदम ही खारिज कर दी गई है, और जनहित, जनभावना, जनसरोकार जैसे शब्द मानो 21वीं सदी के भारत के इस तथाकथित अमृतकाल के शब्दकोश से निकाल ही दिए गए हैं। ये तमाम बातें लोगों के मन में सवाल खड़े करती, लेकिन ये मन धर्म और जाति की भावनाओं में घिरे हुए हैं, और उनकी बाकी समझ धीमी पड़ चुकी हैं। 

जिस रफ्तार से दलबदल चल रहे हैं, और लोग थोक में दलबदल करके सदस्यता खोने से भी बच जा रहे हैं, इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अभी चार दिन पहले ही बड़ी हैरानी जाहिर की थी, देखना है कि अदालती जुबानी जमाखर्च किसी फैसले की शक्ल में पहुंच पाएगा या नहीं। इन दिनों देश में जो कुछ अच्छा होते दिख रहा है, वह सुप्रीम कोर्ट की मेहरबानी से चल रहा है, क्योंकि कई हाईकोर्ट तो पत्थरयुग और गुफाकाल के अंदाज में काम कर रहे हैं। 

भारतीय लोकतंत्र को कुछ थमकर इस पर सोचने की जरूरत है जो कि एक फिल्म के गाने में पूछा गया था- ये कहां...., आ गए हम... 

(Daily Chhattisgarh)

रोहन बोपन्ना के बहाने जिंदगी के बाकी दायरे..

28 जनवरी, 2024 

 

भारत के टेनिस खिलाड़ी रोहन बोपन्ना लॉन टेनिस ओपन एरा के इतिहास के सबसे उम्रदराज ग्रैंड स्लैम चैंपियन हो गए हैं। उनकी खुशी देखते ही बन रही थी। वे दो दशक से इस खिताब की कोशिश में लगे हुए थे, और किसी भी खेल के मैदान पर इतना लंबा जीवन असाधारण होता है। वे तकरीबन 44 बरस के हो रहे हैं, और यह उम्र अधिकतर खिलाडिय़ों के लिए खेल से बाहर होने की होती है। यह मेंस डबल टूर्नामेंट उनके लिए बाद में खिताब लेकर आया, और वे इसके पहले 2017 में मिक्स्ड डबल्स का ग्रैंड स्लैम खिताब जीत चुके थे। आधी सफेद हो रही दाढ़ी के साथ जब वे ऑस्ट्रेलियन ओपन की यह ट्रॉफी लेकर अपने जोड़ीदार मैथ्यू एब्डेन के साथ खड़े हुए, तो वे संघर्ष और सब्र की एक बड़ी मिसाल दिख रहे थे। 

मुझे खेलों की अधिक समझ नहीं है, और मैं ऐसे खिताबों को भी अधिक नहीं समझता, लेकिन मैं ऐसे संघर्ष को समझता हूं जो कि रोहन बोपन्ना ने इस खिताब के पहले दिखाया है। टेनिस की खबरों के आंकड़े बताते हैं कि 19 अलग-अलग जोड़ीदारों के साथ इतने बरसों में मैच खेलते हुए रोहन ने 61 कोशिशों के बाद यह खिताब पाया है। अब जब उन्होंने यह खिताब जीता है, तो वे इसे जीतने वाले सबसे उम्रदराज, सबसे अधिक कोशिशों वाले खिलाड़ी बने हैं। 

अब खेलों से परे की बात करें तो जिंदगी के बाकी दायरों में भी यह बात लागू होती है कि आप अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए कितनी मेहनत करते हैं, इरादा कितना पक्का रखते हैं, और कितने अलग-अलग रास्ते ढूंढते हैं। इसे इंसानों से परे भी समझने के लिए चींटियों को देखा जा सकता है, जो किसी चीज को ढोते हुए सामूहिक मेहनत करती हैं, तरह-तरह के मुश्किल रास्तों से होकर गुजरती हैं, मंजिल तक पहुंचने के लिए कल्पनाशील होकर रास्ते निकालती हैं, और कामयाब होती हैं। दुनिया का सबसे बड़ा खेल मुकाबला आसान नहीं होता है, दुनिया की तमाम आबादी में से निकलकर आए चुनिंदा और शानदार खिलाड़ी वहां तक पहुंचते हैं, और उनके बीच मुकाबला सबसे ही मुश्किल होता है। अपने आपमें अच्छा खिलाड़ी होना काफी नहीं होता, बल्कि उस मुकाबले के हर मैच में दूसरे खिलाडिय़ों से बेहतर होना भी जरूरी होता है। 

हम इस मिसाल पर आज इसलिए भी लिख रहे हैं कि लोग अपनी आसान जिंदगी में छोटी-छोटी मुश्किलों के आने पर भी हौसला छोडऩे लगते हैं। कहीं किसी कोचिंग संस्थान में इम्तिहान की तैयारी कर रहे बच्चे खुदकुशी कर लेते हैं, तो कहीं प्रेमसंबंधों या शादीशुदा जिंदगी में तनाव और नाकामयाबी मिलने पर लोग जान दे देते हैं। कुछ लोग बीमारी से तंग आकर खत्म हो जाते हैं, तो कुछ लोग आर्थिक तंगी का सामना नहीं कर पाते। इस एक आखिरी बात के लिए अमिताभ बच्चन की मिसाल देखनी चाहिए कि कुछ दशक पहले वे दसियों करोड़ के कर्जतले आ गए थे, और आज 80 बरस से अधिक की उम्र में वे हजारों करोड़ का ब्रांड बन चुके हैं। उनकी जिंदगी में जाने कितनी बार ऐसे हादसे हुए कि अस्पताल में उनके बचने की उम्मीद भी कम रह गई थी, लेकिन वे निकलकर आकर आसमान चीरकर शोहरत के अंतरिक्ष तक पहुंच गए। उनकी जिंदगी में शुरूआती बरसों में काम के लिए संघर्ष भी कम नहीं रहा, वे अपने वक्त के नायकों की बंधी-बंधाई छवि से भी बिल्कुल अलग थे, और उनकी भावनात्मक जिंदगी भी कहा जाता है कि कई किस्म के उतार-चढ़ाव से गुजरी है। लेकिन किसी भी पल जिंदगी के किसी भी मोर्चे पर उन्हें हिम्मत छोड़ते नहीं देखा गया, और यही वजह है कि आज वे हिन्दुस्तान की मनोरंजन की दुनिया में, इश्तहारों और मॉडलिंग में, ब्रांड प्रमोशन में बेताज बादशाह हैं। 

बीच-बीच में केरल की कुछ खबरें आती हैं कि किस तरह वहां 80 या 85 बरस की किसी बुजुर्ग महिला ने 5वीं का इम्तिहान पास किया, और कहीं से ऐसी खबर आती है कि कुदाली-फावड़ा लेकर किसी एक आदमी ने पहाड़ के आर-पार अकेले ही एक सडक़ बना दी। कुछ ऐसी खबरें भी आती हैं कि कहीं किसी पति-पत्नी ने मिलकर 25-30 बरस में एक बंजर पहाड़ को पूरे का पूरा हरियाली से भर दिया, और हौसले की कई ऐसी खबरें हैं कि किस तरह कोई नेत्रहीन एवरेस्ट पर पहुंच चुके हैं, और किस तरह दोनों नकली पैरों के साथ कुछ दूसरे लोग एवरेस्ट जीत चुके हैं। फौलादी नकली अंग लगे हुए ऐसे लोग सर्द-बर्फीली हवाओं के बीच कई बार अपने कटे हुए अंगों को और जख्मी कर लेते हैं, लौटकर ऑपरेशन के बाद उनके अधूरे अंग और कुछ इंच छोटे हो जाते हैं, लेकिन वे हौसला नहीं छोड़ते। शायद ऐसे ही लोगों को देख-देखकर चींटियां कोशिश करना सीखती हैं। 

जिंदगी में हमेशा अच्छा ही होता रहे यह जरूरी नहीं रहता, अगर खुद की जिंदगी में सब कुछ अच्छा है, तो भी आसपास के लोगों की जिंदगी में कुछ न कुछ गड़बड़ हो सकता है। और ऐसे में लोगों को चाहिए कि संघर्ष, हौसले, जीत की कहानियां जहां से मिल सकें, वहां से लेकर आसपास लोगों तक पहुंचाएं ताकि लोग अपनी निराशा में डूब रहे हों, तो भी वे उससे उबर सकें। इस बात की अहमियत को समझना चाहिए कि आज अगर आप किसी और के काम आते हैं, तो कल आपके डूब रहे हौसले को उबारने के लिए कुछ दूसरे भी काम आ सकते हैं। दुनिया एक-दूसरे के सहारे से तैर सकती है, और एक-दूसरे से मिली बोझिल निराशा से डूब भी सकती है।

रोहन बोपन्ना की इस खबर से आज मुझे ही न सिर्फ लिखने के लिए एक विषय मिला है, बल्कि अपनी असल जिंदगी की कोशिशों से न थकने की एक मिसाल भी मिली है। लोगों को जिस मंजिल को पाने की हसरत हो, उसके लिए खूब तैयारी करनी चाहिए, जमकर कोशिश करनी चाहिए, और फिर उसकी उम्मीद छोडऩी नहीं चाहिए। साथ-साथ यह भी समझना जरूरी है कि जिंदगी में जो पाने की संभावना बिल्कुल भी न हो, खुद की तैयारी वहां तक न पहुंचा सके, उनके लिए अंतहीन कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। रोहन बोपन्ना की मिसाल तर्क और समझ से परे किसी अंधविश्वास के लिए नहीं है, बल्कि एक असल संभावना के लिए है, जिसे तौल लेना हर समझदार इंसान के लिए बेहतर बात होती है। 

(Daily Chhattisgarh)

क्या यह संस्कृत मदरसा नहीं?

7 जनवरी, 2024 

 

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से बड़ी दिलचस्प खबर आई है, वहां भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अभी धोती-कुर्ते में क्रिकेट मैच खेला गया, जिसकी कमेंटरी संस्कृत में की गई। तमाम टीमें अलग-अलग धार्मिक नामों वाली थीं, और आयोजकों का कहना था कि संस्कृत देवताओं की भाषा है, और इसी से दुनिया की सभी भाषाएं पैदा हुई हैं। यह टूर्नामेंट संस्कृति बचाओ मंच की तरफ से हो रहा है, और ये टीमें वैदिक विश्वविद्यालय के छात्रों की हैं जो कर्मकाण्ड की शिक्षा प्राप्त करते हैं। टूर्नामेंट जीतने वाली टीम को आयोजन समिति रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या भेजने वाली है। 

बड़ा ही दिलचस्प मामला है जिसमें भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए, और संस्कृत भाषा के महत्व को स्थापित करने के लिए यह क्रिकेट मैच करवाया जा रहा है। इसके पीछे की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं के साथ-साथ यह समझना थोड़ा सा मुश्किल है कि भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अंग्रेजों का खेल क्यों खेला जा रहा है। इसके बजाय चौसर, या तीरंदाजी, कुश्ती, या मल्लखंभ जैसे कोई मुकाबले करवाकर हिन्दुस्तानी संस्कृति को बेहतर तरीके से बचाया जा सकता था, और ऐसे खेलों की संस्कृत में कमेंटरी भी की जा सकती थी। 

यह एक बड़ा अजीब सा घालमेल है जिसमें संस्कृति को धर्म से जोड़ दिया गया है, धर्म को एक भाषा से, और उस भाषा को देवताओं की भाषा बना दिया गया है, और दुनिया की तमाम भाषाओं के इसी संस्कृत से निकलने का दावा करते हुए उसी गर्व में डूबे रहने को काफी मान लिया गया है। यह सच्चे या झूठे इतिहास की छाया में चैन से सोकर वर्तमान को पार कर लेने की एक ऐसी कोशिश है, जो इस पीढ़ी को भविष्य में नहीं पहुंचा सकती। इंसानी बदन की उम्र तो हर पल भविष्य की तरफ बढ़ ही जाती है, लेकिन जब उसकी सोच आगे बढऩे से इंकार कर देती है, और अपने इतिहास की अपनी खुद की गढ़ी हुई कल्पना को आरामदेह मान लेती है, तो फिर बदन बूढ़ा हो जाता है, और दिल-दिमाग कई सदी पहले पहुंचे हुए रहते हैं। 

हालत यह हो जाती है कि तथाकथित सांस्कृतिक इतिहास के गौरवगान में डूबे हुए लोगों को यह विरोधाभास भी समझ नहीं आता कि वे अपनी संस्कृति बचाने के लिए अंग्रेजों के खेल, क्रिकेट की पीठ पर सवार होकर चल रहे हैं, जो कि इस गुलाम देश में अंग्रेजों की दासता के इतिहास का एक प्रतीक भी है। हमलावर और विदेशी शासकों की छोड़ी हुई विरासत पर सवार होकर किस तरह कोई घरेलू संस्कृति जिंदा रह सकती है? 

मध्यप्रदेश के इस वैदिक विश्वविद्यालय में जिस तरह के भी कर्मकाण्ड पढ़ाए जा रहे हैं, उन पर रोजी-रोटी चलने के लिए यह भी जरूरी है कि हिन्दू धर्म को मानने वाले हमेशा ही धर्मालु बने रहें, और कर्मकाण्डों पर उनका भरोसा कायम रहे। इसी उम्मीद में छात्रों की यह नौजवान पीढ़ी धर्म या संस्कृति के कर्मकाण्डों की यह पढ़ाई कर रही है कि उसे हमेशा ही जजमान हासिल रहेंगे। एक हुनर के रूप में तो यह पढ़ाई ठीक हो सकती है कि पूजा-पाठ करवाकर, या हवन-पूजन करवाकर ये लोग अपनी जिंदगी गुजार सकते हैं, लेकिन ऐसी पढ़ाई इस बात को अनदेखा करती है कि यह लोगों को धर्मालुओं पर परजीवी की तरह पलने के लिए तैयार कर रही है। जिन लोगों को भी ऐसा भविष्य सुहाता है, वे बेरोजगार रहने के बजाय पंडिताई करके दान-दक्षिणा से जिंदगी गुजारने का काम कर सकते हैं। और ऐसी ही पीढ़ी तैयार करने के लिए ये आयोजक संस्कृत कमेंटरी वाला क्रिकेट टूर्नामेंट करवा रहे हैं। 

अगर ऐसे संस्थानों का सर्वे किया जाए तो कर्मकाण्ड का कोर्स कर रहे लोगों में से शायद ही कोई किसी नेता या अफसर, या किसी दौलतमंद के बच्चे निकलेंगे। ऐसे तबके अपने बच्चों को तो बेहतर पढ़ाई के लिए भेज देते हैं ताकि वे जिंदगी में अधिक कामयाब हो सकें, दूसरी तरफ वे धर्म और जाति के आधार पर छांटे गए गरीब बच्चों के लिए ऐसी कोर्स चलाते हैं जिनमें वे हमेशा ही धर्म पर पलने वाले बनकर रह जाएं। यह कुछ-कुछ उसी किस्म का है जिस तरह गरीब मुस्लिमों के लिए मदरसों में धर्म की पढ़ाई होती है। संपन्न मुस्लिम अपने बच्चों को पश्चिमी दुनिया में भेजते हैं, और गरीब मुस्लिमों के बच्चों के लिए मदरसे चलते हैं। यह भी देखा जाना चाहिए कि दुनिया के बाकी धर्मों में कमउम्र से ही धर्मशिक्षा देने का इंतजाम किस आय वर्ग के बच्चों के लिए किया जाता है।

पहले तो हिन्दी से प्रेम के नाम पर अंग्रेजी से परहेज ने कई पीढिय़ां बर्बाद कर दी हैं, और उनकी संभावनाएं सीमित कर दी हैं। भाषा को देशप्रेम से जोड़ दिया गया, उसे मातृभाषा और राष्ट्रभाषा का दर्जा दे दिया गया, और ऐसी भावनाओं के चलते दुनिया की विज्ञान और टेक्नॉलॉजी की भाषा का बहिष्कार भी किया गया। हिन्दुस्तान में बहुत से अंग्रेजी हटाओ आंदोलन देखे हैं, जिनका नुकसान हिन्दीभाषी इलाकों की कई पीढिय़ां झेल रही हैं। दूसरी तरफ दक्षिण के जिन राज्यों ने, या अहिन्दीभाषी दूसरे राज्यों में जिस तरह अंग्रेजी को भी अपनाया, उसी का नतीजा है कि उनकी आबादी दुनिया भर में पहुंची, और हिन्दी से परे भी रोजगार कमाने के लायक तैयार हुई। आज हिन्दी से भी और एक दर्जा जटिल और अलोकप्रिय संस्कृत को बढ़ावा देने के नाम पर जिस तरह गरीब बच्चों को उसमें झोंका जा रहा है, वह उन असहाय बच्चों के साथ बेइंसाफी है। 

एक तरफ तो देश के कुछ भाजपा शासन वाले राज्यों में मदरसों की पढ़ाई को कम या खत्म करने की बात होती है, दूसरी तरफ धर्म और संस्कृत भाषा के साथ कर्मकाण्डों की पढ़ाई क्या एक संस्कृत मदरसा नहीं बना रही है?

(Daily Chhattisgarh) 

बाजार की साजिश ने इंसानों को बना दिया वफादार ग्राहक

31 दिसंबर 2023 

 

इन दिनों सार्वजनिक जगहों पर बहुत से लोग इत्र की दुकान की तरह महकते हुए दिखते हैं। नौजवानों में मामूली आर्थिक हैसियत के बहुत से लडक़े-लड़कियां भी कुछ न कुछ सुगंध लगाए दिखते हैं। पसीने और बदन की बदबू को दबाने के नाम पर बहुत सी कंपनियां अपने डियो (डियोडोरेंट) की ऐसी आक्रामक मार्केटिंग करती हैं, और अनगिनत फिल्मी सितारे, या खिलाड़ी ऐसे स्प्रे के बाद ही अपने आत्मविश्वास के जागने का दावा करते हैं। ऐसी मॉडलिंग और ब्रांड प्रमोशन के बाद यह जाहिर है कि लोग अपने बदन की स्वाभाविक गंध को बदबू मान लेते होंगे, और किसी स्प्रे के सहारे के बिना वे अपने आपको आत्मविश्वास की बैसाखी के बिना चलने वाले महसूस करते होंगे।

दरअसल बाजार लोगों में हीनभावना और बेचैनी भरकर अपना कारोबार करता है। फैशन और मेकअप का बहुत बड़ा कारोबार अमरीकी सितारों से लेकर अमरीकी छरहरी गुडिय़ा, बार्बी डॉल के बदन के आकार के असर से चलता है। अभी अधिक वक्त नहीं हुआ जब दुनिया के सिगरेट और शराब के सबसे बड़े ब्रांड चर्चित चेहरों के कंधों पर सवार होकर ग्राहकों को लुभाने निकलते थे। हिन्दुस्तान में भी सिगरेट का एक बड़ा ब्रांड देश भर के जोड़ों को एक मुकाबले में बुलाता था, जिनमें सबसे अच्छा जोड़ा दिखने वाले पति-पत्नी को सिगरेट की मॉडलिंग के लिए छांटा जाता था। इस तरह नए कानून बनने के पहले तक बाजार लगातार बुरी आदतों को बढ़ाने के लिए भी हर किस्म के हथियारों वाले हमले इस्तेमाल करता था। आज भी हिन्दुस्तान में सिगरेट और शराब के इश्तहारों पर रोक रहने पर भी, उन्हीं नामों के दूसरे सामान बनाकर, उसी ब्रांड से बाजार में बेचने की धोखाधड़ी धड़ल्ले से चलती है, और कारोबार के दबाव में रहने वाली सरकारें इसे अनदेखा भी करते रहती हैं।

बाजार की तकनीक कुछ-कुछ राजनीतिक दलों सरीखी रहती है जो कि लोगों के मन में किसी तरह की दहशत, किसी तरह की नफरत, किसी तरह की धर्मान्धता, कट्टरता भरते हैं, फिर किसी काल्पनिक दुश्मन की गढ़ी गई तस्वीर दिखाकर खतरे बताते हैं, और वोटरों को यह सोचने को मजबूर करते हैं कि फलां नेता या राजनीतिक दल को वोट दिए बिना हिफाजत नहीं है। 

बाजार ऐसा ही करता है। लोगों को उनके बदन के आकार से हीनभावना का शिकार बना देता है, उन्हें अपने रंग को लेकर इतना बेचैन कर देता है कि माइकल जैक्सन जैसे लोग दर्जनों बार की प्लास्टिक सर्जरी से अपना रंग बदलवाते रहे, नाक को धार लगवाते रहे, और बेचैनी में ही मर भी गए। हिन्दुस्तान में भी फेयरनेस क्रीम का कारोबार आसमान चीरकर आगे बढ़ते रॉकेट की तरह बढ़ते रहा, और वह पूरी तरह से हीनभावना पर जिंदा बाजार था, जिसे देश के सबसे चर्चित, शाहरूख खान सरीखे फिल्म अभिनेता बढ़ावा देते रहे। 

देश के सबसे बड़े फिल्मी सितारे, सबसे बड़े क्रिकेट खिलाड़ी जब गैरजरूरी चीजों को बेचकर खुद अरबपति होते हैं, और वैसे ब्रांड के मालिकों को खरबपति बनाते चलते हैं, तो उस हमले के सामने साधारण सोच के जिंदा रह पाने की गुंजाइश नहीं रहती। देश के तीन-तीन, चार-चार सबसे बड़े सितारे जब कोई गुटखा बेचते हैं, तो नौजवानों को कैसे उसके इस्तेमाल से बचाया जा सकता है? जब देश की कुछ सबसे सुंदर चर्चित लड़कियां और महिलाएं हर कुछ महीनों में बदले जा रहे फैशन का बाजार खड़ा करने के लिए न सिर्फ इश्तहारों में, बल्कि मीडिया की दूसरी मासूम दिखती, लेकिन खरीदी गई जगहों पर भी छाई रहती हैं, तो देश की लड़कियां और महिलाएं उनके बिना अपने आपको समाज और अपने दायरे की दौड़ से बाहर पाती हैं। 

बाजार के हमले का सामना कर पाना आसान नहीं है, क्योंकि इन हमलों और इसके हथियारों को, इनकी फौजी रणनीति को दुनिया के कुछ सबसे शातिर दिमाग तय करते हैं। ये दिमाग माताओं के दिमाग में यह भरने में कामयाब हो जाते हैं कि बच्चों को अगर जिराफ की तरह ऊंचा बनाना है, उनके बदन और दिमाग को तेजी से बढ़ाना है, तो उन्हें दूध में कौन सा पाउडर घोलकर पिलाना होगा। हालत यह है कि बच्चों के खानपान को लेकर उनकी माताओं के दिमाग में इतना कुछ भर दिया गया है कि वे बच्चों के डॉक्टरों का जीना हराम किए रहती हैं। 

लोगों के मन में बेचैनी भरकर, उन्हें हीनभावना में डुबाकर, उन्हें बेहतरी के सपने दिखाकर इतना कुछ किया जाता है कि लोग बाजार की रणनीति के हिसाब से ही सोचने लगते हैं, और इंसान के बजाय ग्राहक बनकर वे अपने को अधिक महफूज महसूस करते हैं। जो सामान न हेलमेट हैं, न बुलेटप्रूफ जैकेट हैं, वे भी लोगों को हिफाजत का अहसास कराने लगते हैं। कुछ खास ब्रांड के टूथपेस्ट लोगों को यह बतलाने लगते हैं कि उनकी सांस से निकली हुई सनसनीखेज ताजगी किस तरह आसपास से गुजरती लड़कियों और महिलाओं को भी उनकी तरफ खींच देगी। लोगों के सेहतमंद खाने-पीने की एक मामूली सी समझ किनारे धरी रह जाती है, और वे ढेर-ढेर शक्कर वाले कोल्ड ड्रिंक, या एनर्जी ड्रिंक के बिना, किसी प्रोटीन ड्रिंक के बिना अपने को अधूरा पाते हैं। 

जिस तरह अखबार और टीवी चैनल, या यूट्यूब और फेसबुक के रास्ते लोगों तक पहुंचने वाली सोच उन्हें बदल दे रही है, उसी तरह हमलावर मार्केटिंग से लोगों का खानपान, रहन-सहन, सब कुछ बदल जा रहा है। लोग हजारों बरस से सामाजिक प्राणी थे, लेकिन अब बाजार की रणनीति लोगों के अलग-अलग समाज बांट दे रही हैं, और लोग ग्राहकों की अलग-अलग किस्मों के समुदाय बनते जा रहे हैं। अधिकतर लोगों को यह समझ भी नहीं पड़ रहा है कि वे किस तरह बाजार के हाथों एक कठपुतली की तरह काम कर रहे हैं, और वे अपनी जरूरत से बिल्कुल ही परे जाकर ग्राहक बनते जा रहे हैं। लोगों के पास आज किसी मोबाइल या कार का एक मॉडल अपनी पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं हो पाता है कि कुछ और क्षमताओं वाले नए मॉडल लोगों के भीतर बेचैनी भरने लगते हैं। आज लोगों को अपने दोस्तों और परिवार के दायरे में यह सोचना चाहिए कि क्या उन्हें सचमुच और अधिक की जरूरत है, और नए की जरूरत है, या मौजूदा काफी है? बाजार शायद लोगों को इतना तर्कसंगत रहने नहीं देगा, और लोग एक वफादार ग्राहक की तरह अपने ब्रांड से बंधे रह जाते हैं, काल्पनिक जरूरतों को जरूरी सच मानकर उन्हें हासिल करने में जुट जाते हैं। पता नहीं बाजार की यह साजिश इंसानों को गुलाम ग्राहकों से परे भी कुछ रहने देगी या नहीं। 

(Daily Chhattisgarh)

अंगदान, तमिलनाडु की बढिय़ा पहल, श्रीलंका से भी सीखने की जरूरत...

24 सितंबर 2023

 

सनातन धर्म पर टिप्पणी को लेकर विवादों में घिरे तमिलनाडु से एक अच्छी खबर है जिससे पूरा हिन्दुस्तान कुछ सीख सकता है। वहां पर सरकार ने तय किया है कि अंगदान करने वालों को अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ होगा। वहां के मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु को अंग प्रत्यारोपण के लिए सर्वश्रेष्ठ राज्य का सम्मान मिला है। उन्होंने आंकड़े भी गिनाए कि किस तरह हजारों लोगों को अंगदान और अंग प्रत्यारोपण से बचाया गया है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई दक्षिण भारत में इस तरह के ऑपरेशनों के लिए एक बड़ा केन्द्र है। दूसरी तरफ एक तकलीफदेह बात यह भी है कि इसी चेन्नई का यह इतिहास रहा है कि वहां पर किडनी बेचने वाले लोगों की एक पूरी बस्ती रही है जिसके हर घर में किडनी बेचने वाले बदन पर चीरा लगे हुए लोग रहते थे। अब कानून कुछ कड़ा हो गया है, और शरीर के अंग खरीदना-बेचना, उन्हें लगाना उतना आसान नहीं रह गया है, और इस कारोबार में लगे हुए बहुत से डॉक्टरों और दलालों को अलग-अलग वक्त पर गिरफ्तार भी किया गया है। 

लेकिन तमिलनाडु सरकार के इस फैसले को हम इस मायने में महत्वपूर्ण मान रहे हैं कि वह समाज के लोगों को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ताकत का एक बहुत ही इज्जतदार इस्तेमाल कर रही है। इससे एक तो धर्म और जाति से परे लोगों के अंग लेने-देने से समाज में एकता आएगी, बहुत सी जिंदगियां बचेंगी, और राज्य के कारोबारी हित में यह भी है कि अस्पतालों को ऐसा कारोबार मिलेगा। इसमें से कोई भी बात अनदेखी करने लायक नहीं है। अगर देश के धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए चर्चित लोग आम जनता के बीच यह अपील करेंगे कि वे चिकित्सा-विज्ञान के लिए अपनी जिंदगी खत्म होने के वक्त अंगदान करें तो उसका कुछ असर हो सकता है। उनसे परे कुछ फिल्मी सितारे, कुछ क्रिकेट सितारे भी ऐसा कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरीखे नेता भी ऐसी अपील कर सकते हैं जिनके भक्त पांच सौ रूपए लीटर में भी पेट्रोल खरीदने के लिए तैयार खड़े हैं। वे अगर दिल से ऐसी अपील करेंगे, तो हो सकता है कि देश में मानव अंगों की जरूरत वाले मरीजों का काम एक दिन में ही पूरा हो जाए, देश में उनको मानने और चाहने वाले दसियों करोड़ लोग होने का दावा लोग करते हैं। और यह बात सिर्फ मोदी पर लागू नहीं होती है, दूसरी पार्टियों के लोग भी अपने-अपने समर्थकों, और अपने-अपने प्रभावक्षेत्र में ऐसा काम कर सकते हैं। 

आज जब लोग जिंदा रहने के लिए पूरी तरह से चिकित्सा-विज्ञान पर निर्भर करते हैं, जब आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान गालियां बकने वाला रामदेव भी खुद की जान बचाने के लिए आधुनिक चिकित्सा के पास ही जाता है, तब यह बात समझने की जरूरत है कि मरीजों का ब्रेन-डेड हो जाने के बाद भी उनके अंगदान न करके, अंतिम संस्कार के लिए इंतजार करके, और फिर जलाकर या दफन करके किसी का भला नहीं किया जाता। चिकित्सा-विज्ञान इस बात को बिना शक के साफ कर देता है कि कब किसी मरीज के दुबारा पूरी तरह जिंदा होने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है, और कब उसके अंग दूसरों को लगा दिए जाने चाहिए। अभी-अभी छत्तीसगढ़ के रायपुर के एम्स की एक नर्स ने गुजरते हुए अपने अंगदान कर दिए थे जो कि आधा दर्जन अलग-अलग मरीजों को लगे। दुनिया में बहुत सी जगहों पर लोग अपने दिल के टुकड़े, अपने बच्चों के गुजर जाने के तकलीफदेह मौकों पर उनके अंग दान कर देते हैं, और उनके बच्चे आधा दर्जन तक मरीजों में 25-50 बरस, जाने कब तक जिंदा रहते हैं। आप जिन्हें सबसे ज्यादा चाहते हैं, उनके न रहने पर भी उनके इस तरह से रहने का करिश्मा चिकित्सा-विज्ञान करता है, जो कि ईश्वर भी नहीं करता। इसलिए लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए। और तमिलनाडु सरकार की इस बात को अहमियत इसलिए देनी चाहिए कि वह सरकार को मिले हुए अधिकार का इस तरह सामाजिक उपयोग कर रही है। 

आज देश में शायद कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं जिन्होंने अंग प्रत्यारोपण के लिए नियम-कायदे बनाने का काम भी पूरा नहीं किया है। नतीजा यह है ऐसे प्रदेशों में अंग प्रत्यारोपण हो नहीं सकता। वहां परिवार के लोग भी घर के मरीजों को दान नहीं दे सकते, या उसकी कानूनी जरूरत पूरी करना आसान नहीं रह गया है। ऐसे देश और ऐसे प्रदेशों को पड़ोस के श्रीलंका से सबक लेना चाहिए जहां पर बौद्ध धर्म की नसीहतों के चलते लोगों में मृत शरीर के लिए मोह कम रह गया है, लोग खूब अंगदान करते हैं, और नतीजा यह है कि लोग श्रीलंका के समुद्र तटों को घूमने के नाम पर वहां जाते हैं, और किडनी बदलवाकर आते हैं। एक वक्त की खबर हमें याद है कि श्रीलंका में इतने नेत्रदान होते थे कि वहां से देश के बाहर कई देशों के मरीजों की जरूरत भी पूरी होती थी। वहां 1958 में एक चिकित्सा छात्र देशबंधु डॉ. हडसन सिल्वा ने नेत्रदान (कॉर्निया दान) का अभियान छेड़ा था, और पत्नी के साथ मिलकर उन्होंने 1964 तक दुनिया के दूसरे देशों को कॉर्निया भेजना शुरू कर दिया था। अब तक वे 57 देशों में 60 हजार कॉर्निया भेज चुके हैं, और 9 लाख से अधिक लोगों ने उनकी संस्था के माध्यम से मृत्यु के बाद नेत्रदान का घोषणा पत्र भरा है। हर बरस उनकी संस्था तीन हजार के करीब नेत्रदान पाती है, जिसमें से दो हजार से अधिक विदेशों को भेज दिए जाते हैं। वहां से सबसे अधिक नेत्र पाने वाला देश पाकिस्तान है क्योंकि इस्लाम की मान्यताओं के मुताबिक बदन को पूरा का पूरा दफनाया जाना चाहिए। ऐसी धार्मिक मान्यता के चलते भी इस धर्म को मानने वाले लोग अंगदान नहीं करते हैं। श्रीलंका में बौद्ध मान्यताओं के चलते शरीर का कोई महत्व नहीं रहता, और वहां पर आंखों की जरूरत वाले किसी भी मरीज की कोई कतार नहीं रह गई है। श्रीलंका का आई बैंक, और मानव-टीश्यू बैंक दुनिया का ऐसा सबसे बड़ा बैंक है। बौद्ध धर्म की दान की सोच इसकी कामयाबी में मदद करती है, और देश के कई जाने-माने लोगों ने, जैसे वहां के गुजरे हुए राष्ट्रपति जे.आर.जयवर्धने ने अपनी आंखें मरने पर दान की थी, जो कि दो जापानी लोगों को लगाई गई थीं। 

हिन्दुस्तान में रक्तदान, नेत्रदान, और अंगदान को बढ़ावा देने की जरूरत है, और केन्द्र और राज्य सरकारें इसे सामाजिक आंदोलन के रूप में अगर बढ़ाएं, तो दुनिया के इस सबसे अधिक आबादी वाले देश में लोगों को जरूरत पडऩे पर हर अंग मिल सकता है, और इससे भारत में एक अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा-कारोबार भी बढ़ सकता है। जब लोग अंगदान करेंगे, तो देश की जरूरतें पूरी होने के बाद उन्हें विदेशियों को भी लगाया जा सकेगा, और उससे भी भारतीय चिकित्सा-विज्ञान को तजुर्बा भी मिलेगा, और कारोबार भी। वरना एक इंसान के गुजरने के बाद उसके शरीर को या तो जलाने में लकडिय़ां बर्बाद होती हैं, या दफन करने पर जमीन घिरती है। दोनों ही बातें पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं, और देहदान या अंगदान से धरती पर यह बोझ भी घट सकता है। इस बारे में सामाजिक स्तर पर अधिक मेहनत की जरूरत है। 

(Daily Chhattisgarh)

सनातन और मनुस्मृति पर खुलकर चर्चा की जरूरत

 17 सितंबर 2023

 

अभी चूंकि तमिलनाडु से सनातन धर्म को लेकर एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ है, इसलिए सनातन धर्म को लेकर बहुत सी अलग-अलग बातें उठ रही हैं। आज 17 सितंबर को ही तमिलनाडु के एक सबसे बड़े समाज सुधारक रामास्वामी पेरियार का जन्मदिन पड़ता है, और इस मौके पर लिखने वालों ने उन्हें जाति व्यवस्था के खिलाफ देश का एक सबसे बड़ा क्रांतिकारी करार दिया है। हालांकि पेरियार की कुछ बातें लोकतंत्र के साथ मेल नहीं भी खाती हैं, और दलितों के लिए एक अलग राष्ट्र की उनकी मांग को अतिवादी भी लिखा गया है, लेकिन जाति, धर्म, और नस्ल के भेदभाव और उनके आधार पर शोषण को उन्होंने करीब से देखा था, भुगता था, और इसीलिए वे सामाजिक संघर्ष की उस ऊंचाई तक ले जा पाए थे। उन्होंने हिन्दू धर्म के पाखंड के खिलाफ इसे छोड़ा, और एक नास्तिक की तरह धर्म, जाति, लिंग, प्रजाति और भाषा इन सबके भेदभाव के खिलाफ एक लड़ाई छेड़ी, जो कि उनके जाने के दशकों बाद भी आज भी जारी है। तमिलनाडु में दलितों और महिलाओं की हालत सुधारने में उनसे बड़ा योगदान किसी का नहीं रहा। 

उनकी सोच पर चलने वाली आज की डीएमके सरकार के लोगों ने जिस तरह सनातन धर्म को बीमारी के बराबर बताते हुए उसके उन्मूलन की बात कही है, उस धर्म को उसकी हिंसक बुराइयों के साथ समझने की जरूरत है। जब इस पर बहस हम देखते हैं, तो एक धार्मिक कट्टरता के साथ सनातन पर टिके रहने की जिद वाले बहुत से सवर्ण हिन्दू दिखते हैं, लेकिन इनमें दलित-आदिवासी हिन्दू बिल्कुल भी नहीं दिखते। जाहिर है कि हिन्दुओं के बीच सनातनी व्यवस्था से निकली हुई जो मनुवादी जाति व्यवस्था है, वह हिन्दू समाज को एक तबके की तरह नहीं रखती है, और यह जाति व्यवस्था एक वजह है कि हिन्दू कहे जाने वाले अलग-अलग जातियों के तबके सनातन शब्द और मनुवादी व्यवस्था को एक नजरिए से नहीं देख सकते। जूते का तल्ला, और उसके तले कुचले जाने वाला नंगा पैर, इन दोनों का नजरिया जूते के बारे में एक सरीखा नहीं हो सकता है। इसलिए जूते के ऊपर के बदन पर सिर चढ़ा जातीय अहंकार एक अलग सोच रखता है, और जूते के तल्ले के नीचे रखे जाने वाले दलित एक अलग सोच रखते हैं। 

ऐसे में कुछ लोगों ने याद दिलाया है कि इसी बरस बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने एक नया शोध कार्य शुरू किया है जिसका नाम है- आधुनिक भारतीय समाज में मनुस्मृति को लागू करने की प्रासंगिकता/प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी)। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के धर्मशास्त्र-मीमांसा विभाग ने इसी साल फरवरी में एक इश्तहार जारी करके ऐसी रिसर्च के लिए लोगों से अर्जियां बुलवाई थीं। और इसे लेकर लोगों के मन में हैरानी भी हुई थी कि डॉ.बी.आर. अंबेडकर द्वारा मनुस्मृति जलाने के करीब सौ बरस बाद अब उसे लागू करने की संभावनाओं पर शोध करवाया जा रहा है! लोगों को याद होगा कि हिन्दुस्तान के सनातनी लोगों के बीच हिन्दू धर्म के भीतर सवर्णों की पसंद की जो मनुवादी जाति व्यवस्था है, उसके तहत शूद्रों को पूरी जिंदगी सवर्णों की सेवा करनी है, अनपढ़ रहना है। इसके साथ-साथ यह मनुस्मृति महिलाओं के खिलाफ भयानक हिंसा की वकालत करती है। 

हिन्दुस्तान आज एक लोकतंत्र हो चुका है, उसके चाहे जिस किसी धार्मिक या सामाजिक ग्रंथ में अलोकतांत्रिक बातें लिखी गई हैं, उन्हें अब इतिहास का एक दस्तावेज मानकर लाइब्रेरी में रख देना चाहिए ताकि इस देश, धर्म, और समाज की हिंसा के इतिहास को आने वाली पीढिय़ां भी जान सकें, और ऐसी हिंसा के मुआवजे के रूप में लागू की गई आरक्षण की व्यवस्था को भी समझ सकें। लेकिन इतिहास के पन्ने से परे ऐसी हिंसा का कोई भविष्य न आज है, और न ही आने वाले कल में हैं। और तो और, अब तो आरएसएस के मौजूदा मुखिया मोहन भागवत ने भी खुलकर यह कहा है कि दो हजार बरस जिनके साथ बेइंसाफी हुई है, उन्हें अगर दो सौ बरस आरक्षण मिल जाए, तो उसमें बुराई क्या है, लोगों को उन्हें ऐसा हक देने में आपत्ति क्यों होनी चाहिए? 

अब जिन लोगों को सनातन शब्द की हिफाजत करना जरूरी लग रहा है, उन्हें सनातन या हिन्दू शब्द के साथ जुड़ी हुई बाकी व्यवस्थाओं की संवैधानिकता को भी देखना चाहिए कि आज उनमें से क्या-क्या कानूनी है। लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि किस तरह मुस्लिम समाज की चली आ रही  धार्मिक व्यवस्थाओं को देश की मौजूदा मोदी सरकार ने बदला है, और उसे मंजूर भी कर लिया गया है। संवैधानिक लोकतंत्र एक बड़ी साफ-साफ व्यवस्था है जिसमें कानून से टकराव होने पर जातीय या धार्मिक व्यवस्था को किनारे होना पड़ेगा। कल तक शूद्रों के साथ जो बर्ताव किया जाता था, आज वह जारी भले हो, लेकिन अगर वह अदालत में साबित किया जा सकता है, तो फिर शूद्रों पर हिंसा करने वालों को कड़ी सजा मिलना ही मिलना है। इसलिए देश में संविधान लागू होने के बाद सनातन हो, हिन्दू हो, मुस्लिम हो, या कोई और धार्मिक व्यवस्था, सामाजिक रिवाज, इनको कानून के मुताबिक ही चलना होगा। आज किसी महिला के तथाकथित चाहने पर भी उसे सती नहीं बनाया जा सकता, वरना वहां मौजूद तमाम भीड़ के लिए जेल की कैद तय है। लोग अपने पुराने रीति-रिवाज का हवाला देकर बच्चों के बाल विवाह नहीं करवा सकते, वरना उसमें गिरफ्तारी तय है। 

ऐसे में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय या बीएचयू का यह शोधकार्य भयानक है, और यह मानो उसी किस्म का है कि कोई विश्वविद्यालय शोध करवाए कि भारतीय समाज में सतीप्रथा की क्या संभावनाएं हैं। मनुस्मृति एक इतिहास के पन्ने से परे अगर आज लागू करने की बात होती है, तो वह एक जुर्म रहेगी। इसे एक विश्वविद्यालय इस तरह बढ़ावा दे, यह उस विश्वविद्यालय के लिए शर्मिंदगी की बात है, और इस कलंक के कागज पर संबंधित विभाग के मुखिया प्रो.शंकर कुमार मिश्रा के दस्तखत हैं। अगर इस विश्वविद्यालय में सामाजिक न्याय की सोच होती, तो वहां से इस तरह के शोध के लिए अर्जियां न बुलवाई गई होतीं। 

अब जो लोग आजादी की पौन सदी पूरी होने पर भारी जोर-शोर से इसे हिन्दू धर्म से निकले एक शब्द, अमृत नाम से आजादी का अमृत महोत्सव करार दे रहे हैं, वे लोग मनुस्मृति को एक बार फिर महिमामंडित करके उस आजादी को खत्म करने का काम भी कर रहे हैं। शूद्रों को गुलामी की जंजीरों से बांधे हुए रखने की जो वकालत मनुस्मृति करती है, उसके महिमामंडन के साथ किसी आजादी का अमृत महोत्सव नहीं मनाया जा सकता। अगर इन दोनों को साथ-साथ चलना है तो यह भारत की आजादी के खिलाफ मनुवादी सवर्णों की हिंसक आजादी की जीत होगी। सिर्फ नारों से लोकतंत्र और संविधान को स्थापित नहीं किया जा सकता। इतिहास के अन्याय को मानने, और उसे खारिज किए बिना किसी संवैधानिक व्यवस्था की बात नहीं हो सकती। इसलिए तमिलनाडु में अभी उठ खड़े हुए एक विवाद को इस बरस की शुरूआत में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इस शोधकार्य से जोडक़र देखने की जरूरत है और चूंकि देश भर में सनातन धर्म या हिन्दू धर्म पर एक हमला साबित करने की कोशिश हो रही है, इसलिए इन विवादों के हर पहलुओं पर खुलकर सामाजिक चर्चा होनी चाहिए। इसी चर्चा से लोगों के छुपे हुए दांत और छुपे हुए नाखून सामने आ पाएंगे, और उनकी शिनाख्त हो सकेगी। 

(Daily Chhattisgarh)

छोटे से बच्चे की अंधेरी दुनिया की बड़ी सी उजली कहानी...

10 सितंबर 2023

 

मजहबी आतंक और गृहयुद्ध से गुजरते हुए एक अरब देश यमन फौजी-आतंकी जंग में मलबा भी बना हुआ है, और पहले से गरीब चले आ रहा यह देश अब कुपोषण और भुखमरी के चलते दम तोड़ रहा है। यहां के लोग जिंदा रहने को तरस रहे हैं, और पिछले कई बरसों में कुपोषण के शिकार बच्चों की दुनिया की सबसे भयानक तस्वीरें यमन से ही आई हैं। सरकार और आतंकियों के बीच बुरा टकराव चल रहा है, और इंसानों तक अंतरराष्ट्रीय राहत भी नहीं पहुंच पा रही है। यमन दुनिया के एक सबसे कम विकसित देशों में से है, और संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक यहां की तीन चौथाई आबादी को तुरंत ही मानवीय मदद की जरूरत है। इसे दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा भूखा देश करार दिया गया है, और ऐसे देश से कोई खुश करने वाली खबर आ सकती है, यह सोचना भी थोड़ा मुश्किल है। 

बीबीसी हर हफ्ते एक हैप्पी पॉड ब्रॉडकास्ट करता है जिसमें दुनिया भर की अच्छी खबरें रहती हैं। आज सुबह ऐसी ही एक अच्छी खबर यमन से निकलकर आई थी जहां पर एक स्कूली छात्र ने अपनी स्कूल की शक्ल बदलने का काम किया है। अहमद नाम के 11 बरस के इस बच्चे पर बीबीसी ने दो बरस पहले भी एक रिपोर्ट की थी, और अब फिर वह रिपोर्टर सरकारी इजाजतों को जुटाते-जुटाते किसी तरह इस बच्चे तक पहुंची जो कि टीचर के न रहने पर अपनी क्लास को पढ़ाता भी है। उसे हर चीज में खूब दिलचस्पी है, वह खूब होशियार है, वह हर चीज याद रखता है, और एक छोटी सी दिक्कत भी है कि वह पूरी तरह से अंधा है। उसका स्कूल फौजी लड़ाई से मलबा बना हुआ दिखता है, और वैसे मलबे के बीच ही इस गरीब देश के बच्चे पढ़ रहे हैं, और अहमद उन्हें पढ़ा रहा है। 

बीबीसी ने पहली बार जब उस पर रिपोर्ट तैयार की, वह 9 बरस का था, और आज 11 बरस का होने के बाद भी वह उसी उत्साह से हर काम में जुटा हुआ है, उसकी बड़ी हसरतें भी हैं, वह खुद टीचर, ड्राइवर, डॉक्टर, इंजीनियर, और पायलट भी बनना चाहता है, और बड़ा होकर एक खूबसूरत लडक़ी से शादी भी करना चाहता है। लेकिन इन सबसे ऊपर वह अपने स्कूल में ब्लैकबोर्ड चाहता है, दीवारें और खिड़कियां चाहता है। पिछली रिपोर्ट देखने के बाद दुनिया के लोगों ने इस स्कूल की मदद करने के लिए हाथ बढ़ाया, और अब दो बरस बाद दान से स्कूल में एक नया बिल्डिंग-ब्लॉक बन गया है जिसमें अहमद के साथ घूमते हुए बीबीसी रिपोर्टर ने उसकी बाकी हसरतें सुनीं। उससे पूछा गया कि क्या वह अपनी तमाम हसरतें पूरी करने की उम्मीद रखता है, तो उसने हॅंसते हुए कहा- बिल्कुल, मैं इनमें से सब कुछ करूंगा, और मैं शहर की एक खूबसूरत लडक़ी से शादी करूंगा, और वह मेरे लिए बिस्किट बनाएगी। उसका कहना है कि गांव की लड़कियां अच्छे बिस्किट बनाना नहीं जानती हैं।

जब अहमद से पूछा गया कि उसने आखिरी बार कब लड़ाई के धमाके सुने थे तो वह हॅंसते हुए कहता है बीती रात-बीती रात। जन्म से अंधे अहमद का घर हथियारबंद टकराव के मोर्चे के एकदम करीब है। उसका कहना है कि गोलियों की आवाज से उन सबको डर लगता है। जब लड़ाई शुरू होती है तो अहमद को तो कुछ दिखता भी नहीं रहता है। 

बहुत से लोगों को अपनी मौजूदा जिंदगी दुनिया में बड़ी खराब लगती है। लेकिन जब अशांत देशों की विपरीत परिस्थितियों में कुदरत की ऐसी मार का शिकार ऐसा बच्चा पूरे उत्साह से अपने आसपास के सब कुछ को सुधारने में लगा दिखता है, तो लगता है कि दुनिया को हौसला उसी से सीखना चाहिए। स्कूल के मलबे के बीच साथी बच्चों को पढ़ाते हुए अहमद ने जिस तरह दुनिया का ध्यान खींचा, और अपनी स्कूल को एक नई इमारत ही दिलवा दी, वह दुनिया के तमाम लोगों इससे बहुत कुछ सीखने मिल सकता है। 

दुनिया भर के बच्चों और बड़ों को दुनिया के खतरे में पड़े हुए देशों, वहां की खराब हालत के बारे में भी बताने की जरूरत है ताकि वे अपनी तकलीफों को ही सब कुछ न समझें, और एक विश्व-जिम्मेदारी निभाने के बारे में भी सोचें। आज दुनिया के बहुत से देश अतिसंपन्नता के ऐसे शिकार हैं कि वहां अंधाधुंध प्रदूषण हो रहा है, सामानों की जरूरत से कई गुना खपत हो रही है, और धरती के साधन इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे लोगों को भी दुनिया के जरूरतमंद देशों और लोगों के बारे में कुछ अधिक बताने की जरूरत है, और उनके बीच यह जिम्मेदारी पैदा करने की जरूरत है कि दुनिया के संपन्न और विपन्न लोगों के बीच फासला इतना बड़ा नहीं होना चाहिए। 

ऐसे हैप्पी पॉड पर बीबीसी हर हफ्ते बहुत सी सकारात्मक खबरें सामने रखता है, और उनसे बहुत कुछ सीखने की, खुशी पाने की गुंजाइश रहती है। भूख और कुपोषण के बीच, विस्फोटों से मलबा बन चुकी स्कूल में एक छोटा बच्चा किस तरह हौसले के साथ खुश रहता है, खुशियां बिखेरता है, अपनी जिम्मेदारी से बहुत आगे बढक़र काम करता है, यह सब कुछ देखने लायक है। 

 (Daily Chhattisgarh)

हिटलर से अरब-खरब गुना बुरा तानाशाह खड़ा न करें..

25  जून 2023

 

ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर रोज कई किस्म की चर्चाएँ सामने आ रही हैं, और मैं भी इसी पन्ने पर कुछ बार इस बारे में लिख चुका हूं। अब कुछ लोगों का ऐसा अंदाज है कि ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस मानव बुद्धि के मुकाबले इतना आगे निकल जाएगा कि दुनिया के दूसरे ग्रहों पर अगर कोई प्राणी हैं, और अगर वे धरती के लोगों से संपर्क करेंगे, तो वे धरती पर हो सकता है कि सबसे पहले ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से संपर्क करें, बजाय इंसानों के। यह बात कुछ अटपटी लग सकती है, लेकिन कृत्रिम बुद्धि आज भी बहुत से मामलों में मानवीय बुद्धि को पार कर चुकी है, और एक ऐसी आशंका है कि जल्द ही आज चल रही रिसर्च ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को इंसानी समझ से आगे ले जा सकती है। ऐसे में हो सकता है कि कृत्रिम बुद्धि और दूसरे ग्रहों के प्राणी एक-दूसरे से संपर्क करने में, एक-दूसरों के संदेश समझने में इंसानों के मुकाबले अधिक काबिल साबित हों। 

आज दुनिया के बहुत से वैज्ञानिक, शोधकर्ता, और ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के कारोबारी यह सार्वजनिक मांग कर चुके हैं कि कृत्रिम बुद्धि पर आगे शोधकार्य रोक देना चाहिए, क्योंकि नया विकास इसकी ताकत को तो अंधाधुंध बढ़ा दे रहा है, लेकिन इससे पैदा होने वाले खतरों का अंदाज लगाने की भी ताकत इंसानी समझ में पूरी तरह नहीं है। ऐसा माना जा रहा है कि कृत्रिम बुद्धि का ऐसा ही विकास अगर जारी रहा तो वह बहुत जल्द इंसानों पर काबू पाने की हालत में आ जाएगी, और चूंकि वह इंसानों की तरह की सभ्यता और संस्कृति की नीति और समझ के बोझ से लदी हुई नहीं होगी, वह इंसानी सभ्यता को, और इंसानियत कही जाने वाली बात को पल भर में खत्म भी कर सकती है, और अपनी समझ के फैसलों को सही मानते हुए दुनिया को खत्म कर सकती है। 

इस बात को इस तरह से समझने की जरूरत है कि वैज्ञानिकों ने उस बम को तो बना लिया था जिसे अमरीका के नेताओं ने जापान के हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराया था, लेकिन वैज्ञानिक-समझ बम की क्षमता तक सीमित थी, उससे होने वाली तबाही और दुनिया में हथियारों की दौड़ न तो उनकी समझ की बात थी, और न ही उनका एजेंडा थी। इसलिए जब विज्ञान और टेक्नालॉजी बिना नैतिकता के, बिना मानवीयता के काम करते हैं, तो वे तबाही के किसी भी किस्म के सामान बना सकते हैं। यह हाल तब है जब वैज्ञानिक और शोधकर्ता अपनी विशेषज्ञता के दायरे में अपनी कामयाबी के नशे में डूबे हुए भी कहीं न कहीं इंसानियत पर टिके रहते हैं। लेकिन ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ऐसे किसी भी नैतिक दबाव से पूरी तरह आजाद हो सकता है। 

एक छोटी सी कल्पना अगर सामने रखें, कि ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को अगर यह सूझ जाएगा कि इंसान धरती के पर्यावरण को, धरती को बर्बाद कर रहे हैं, और धरती के करोड़ों अलग-अलग प्राणियों की नस्लों को, पेड़-पौधों की किस्मों को खत्म कर रहे हैं, उनका हक छीन रहे हैं, इंसान धरती को दे कुछ भी नहीं रहे हैं, और उसे हमेशा के लिए बर्बाद कर दे रहे हैं, तो हो सकता है कि ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यह तय कर ले कि धरती से ऐसे इंसानों का खत्म हो जाना इस ग्रह के लिए बेहतर होगा, और इसमें कुछ गिने-चुने इंसानों को बचाकर एक बार फिर मानवीय नस्ल बढ़ाई जा सकेगी। ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यह भी तय कर सकेगा कि आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक पैमानों पर किन नस्लों के लोग सबसे अच्छे होंगे, उनमें कौन से लोग बेहतर होंगे, ऐसे कुछ हजार, लाख या कुछ करोड़ लोगों को छोडक़र ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यह भी तय कर सकता है कि बाकी तमाम लोगों को किस तरह खत्म किया जाए। आज भी जो लोग ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मौजूदा क्षमता को देखते हुए उसकी विध्वंसकारी ताकत का अंदाज लगा रहे हैं, उनका मानना है कि यह अपनी मर्जी से दुनिया में किसी भी दर्जे की तबाही ला सकता है, कितने भी लोगों को खत्म कर सकता है। यही वजह है कि एआई के रिसर्च और कारोबार में लगे हुए सैकड़ों और हजारों लोग इसके खिलाफ अभी खड़े हुए हैं कि इसे और आगे न बढ़ाया जाए। 

लोगों को एक कहानी याद होगी कि किस तरह किसी गुरू के चार शिष्य हाड़-मांस जोडक़र एक शेर खड़ा करते हैं, और फिर अपनी काबिलीयत परखने के लिए उसमें प्राण भी फूंक देते हैं, और जैसे ही वह शेर जिंदा होता है, वह इन्हीं शिष्यों को खा जाता है। इसलिए इंसानों को आज ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को और अधिक ताकतवर, और अधिक काबिल बनाने की अपनी क्षमता को अधिक परखने का खतरा नहीं उठाना चाहिए। जिसके खतरे इंसानी समझ से परे हैं, महज उसकी संभावनाओं को टटोलने के लिए उसकी ताकत बढ़ाते चलना इसी किस्म के शेर को खड़ा करना होगा। 

अमरीका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय हार्वर्ड के एक प्रोफेसर ने दूसरे ग्रहों के प्राणियों से संपर्क की किसी संभावना को लेकर ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का जो खतरा बताया है, वह इसके खतरों की महज एक कल्पना है, ऐसी अनगिनत और स्थितियां आ सकती हैं जिनमेंं ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस इंसानों के लिए, दूसरे प्राणियों और प्रकृति के लिए, पूरी की पूरी धरती के लिए जानलेवा हो सकता है। वह दुनिया में तीसरे विश्व युद्ध को रोकने के लिए परमाणु हथियारों को खतरनाक पाएगा, और पूरी दुनिया के परमाणु हथियारों के जखीरों को एक साथ खत्म करना तय कर लेगा, तो इससे महज हथियार खत्म नहीं होंगे, पूरी दुनिया ही खत्म हो जाएगी। ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस अगर किसी देश की आबादी को जुल्मी पाएगा, तो हो सकता है उसके खिलाफ कोरोना जैसे किसी वायरस का हमला तय कर ले, अगर उसे लगेगा कि दुनिया को कोयले के प्रदूषण से बचाना है, तो वह दुनिया भर के कोयला-बिजलीघरों को बंद और खत्म करने के लिए पल भर में तरीके ढूंढ लेगा, खदानों को तबाह कर देगा, बिजलीघरों को ठप्प कर देगा, बिजली के ग्रिड बर्बाद कर देगा। जिन कारखानों के प्रदूषण उसे धरती के लिए नुकसानदेह लगेंगे, उन कारखानों को वह तबाह कर देगा। ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस अपने आपमें दुनिया का सबसे खतरनाक तानाशाह बनने की पूरी ताकत रखेगा, इसलिए हिटलर से अरब-खरब गुना अधिक ताकतवर एक तानाशाह खड़ा करने की जिद छोडऩी चाहिए, और जब तक ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के खतरों से बचाव के रास्ते न सूझ जाएं, तब तक उसमें और प्राण नहीं फूंकने चाहिए। ये तमाम खतरे तो आज लोगों को सूझ रहे हैं, लेकिन कृत्रिम बुद्धि लोगों की कल्पनाओं से परे नए खतरे सोच सकती है, नई बर्बादी कर सकती है। 

(Daily Chhattisgarh)

कब्र से निकाल लाशों से रेप भी रोक नहीं पाता मजहब..

 30 अप्रैल 2023

 

जब कभी ऐसा लगे कि इससे अधिक दिल दहलाने वाली खबर कम होगी, तभी कुछ ऐसा आ जाता है कि उसके पहले कि हैवानियत कम लगने लगती है। पाकिस्तान की एक खबर आई कि वहां इस्लाम छोड़ चुके एक नास्तिक सामाजिक कार्यकर्ता हैरिस सुल्तान ने अपनी एक किताब में यह लिखा है कि किस तरह वहां लोग अपनी लड़कियों की कब्र पर ताले लगाकर रख रहे हैं कि उनके दफन बदन बलात्कार से बचाए जा सकें। द कर्स ऑफ गॉड, वाई आई लेफ्ट इस्लाम नाम की इस किताब के बारे में हैरिस ने अभी ट्विटर पर लिखा है- पाकिस्तान ने यौन कुंठाओं से ग्रस्त एक ऐसा समाज बनाया है जिसमें लोग अपनी बेटियों की कब्र पर ताले डाल रहे हैं ताकि उन्हें बलात्कार से बचाया जा सके। हैरिस ने लिखा है कि जब आप बलात्कार से बचाने के लिए बुर्के की बात करते हो, तो ऐसी सोच कब्र तक ले जाती है। 

पहली नजर में यह खबर फर्जी लगी, और हिन्दुस्तान के कई बड़े अखबारों ने इसे छापा था, लेकिन कम से कम एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने इसे अपनी वेबसाइट से बिना कुछ लिखे हटा दिया। लेकिन जिस पाकिस्तानी अखबार के हवाले से यह बात हिन्दुस्तानी अखबारों में आई है, डेली टाईम्स नाम के उस अखबार में ढूंढते हुए उसके एडिटोरियल कॉलम में 28 अप्रैल को इस बारे में लिखा हुआ मिला। पाकिस्तान के बारे में इस संपादकीय में लिखा गया है- अपने देश के पारिवारिक मूल्यों पर बड़ा गर्व करने वाले पाकिस्तान में हर दो घंटे में एक औरत से बलात्कार होता है। लेकिन दिल दहलाने वाली एक बात यह है कि महिलाओं की कब्र पर ताले डालने पड़ रहे हैं कि लाशों से बलात्कार न हों। पाकिस्तान में नेक्रोफिलिया (लाश से सेक्स) के मामले अंधाधुंध बढ़ रहे हैं, और ऐसे में यह आसानी से समझ आता है कि लोग अपने गुजरे हुए लोगों को इनसे बचाना चाहते हैं। इस यौन कुंठाग्रस्त समाज में महिला का अस्तित्व एक ऐसे खिलौने से अधिक नहीं है जिससे खेलते हुए लोग उसके हाथ-पैर मोड़ सकते हैं। कुछ ही दिन पहले एक हाईवे के किनारे 18 बरस की लडक़ी की जली हुई लाश मिली है जिसे कुल्हाड़े से काटा गया था। लेकिन ऐसे कितने ही मामले पाकिस्तान की सरकार का ध्यान खींचने के लिए काफी नहीं है। इस देश में कुछ बिना दांत-नाखून के कानून हैं, और कुछ नारों वाले पोस्टर हैं, और प्रेस कांफ्रेंस में किए जाने वाले दावे हैं, जो सब बेअसर हैं। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग का कहना है कि 40 फीसदी से अधिक पाकिस्तानी महिलाएं जिंदगी में किसी न किसी तरह की हिंसा झेलती हैं। 

अखबार ने, और एक प्रमुख पाकिस्तानी अखबार ने जब इस बारे में लिखा है तो इस खबर को खारिज करना ठीक नहीं है। हैरिस सुल्तान नाम के लेखक ने तो इस बारे में लिखा ही है, पाकिस्तानी अखबार ने इस पर संपादकीय ही लिखा है, इसलिए इसे पाकिस्तान या मुस्लिम विरोधी प्रचार मानना ठीक नहीं है। भारत की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी बन गई एएनआई ने भी यह समाचार जारी किया है। कुछ और खबरें बताती हैं कि किस तरह कब्रों से निकाल-निकालकर लाशों से बलात्कार के कई मामले सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान में 2011 में कब्रिस्तान के एक चौकीदार को गिरफ्तार किया गया था जब उसने मंजूर किया था कि उसने 48 महिलाओं की लाशों से बलात्कार किया है। 

अब पाकिस्तान की बात छोडक़र बाकी दुनिया की बात भी करनी चाहिए क्योंकि देशों की संस्कृति तो अलग-अलग हो सकती है, लेकिन इंसानों की बुनियादी सोच कुछ कमी-बेसी के साथ मिलती-जुलती हो सकती है। जिन देशों में यौन कुंठाएं जितनी अधिक रहती हैं, वहां पर यौन अपराध उतने ही अधिक होते हैं। जहां पर लोगों के मिलने-जुलने और सेक्स-संबंध बनाने पर रोक नहीं होती है, वहां अपराध की जरूरत भी कम पड़ती है। दुनिया के बहुत से धर्म कई किस्म की नैतिकता सिखाते हैं, और हर धर्म में पाप, स्वर्ग, नर्क की धारणाएं तो हैं ही। लेकिन वेटिकन के तहत आने वाले चर्चों में बच्चों से बलात्कार का इतिहास पूरी दुनिया में बिखरा हुआ है। और धर्म भी कहीं पीछे नहीं हैं। यह इसलिए भी है कि जो-जो धर्म अपने लोगों पर ब्रम्हचारी रहने की शर्त थोपते हैं, उनके बदन अपनी जरूरत कहीं न कहीं से पूरी कर लेते हैं। ब्रम्हचर्य कागज पर तो लिखे जाने लायक शब्द है, लेकिन असल जिंदगी में इस पर अमल तकरीबन नामुमकिन रहता है। 

पाकिस्तान या उस किस्म की दकियानूसी संस्कृति वाले देश महिलाओं को बुर्के में रखकर, या दूसरे धर्मों और संस्कृतियों के लोग उन्हें किसी दूसरे किस्म के पर्दे, घूंघट में रखकर यह मान लेते हैं कि मर्दों को उत्तेजना से बचाया जा सकेगा। लेकिन ऐसा होता कुछ नहीं है। अगर औरत के कपड़े ही मर्दों को उत्तेजना से बचाते, तो फिर कब्र के भीतर का महिला का बदन तो बाहर से दिखता नहीं है, कब्र खोदकर उससे बलात्कार की नौबत क्यों आती? 

समाज में जब-जब लोगों की प्राकृतिक जरूरतों पर कानूनी या सामाजिक रोक लगाई जाती है, तब-तब कई किस्म के अपराध बढ़ते हैं। पाकिस्तान में अगर हर दो घंटे में एक महिला से बलात्कार के आंकड़े हैं, तो यह मानकर चलना चाहिए कि कई बलात्कार होने पर ही कोई एक बलात्कार रिपोर्ट होता होगा। जिस धर्म में अच्छे चाल-चलन और नेक काम पर जन्नत में हूरों का वायदा हो, और बुरे काम पर दोजख की आग में जलना बताया गया हो, वहां भी अगर लाशों से बलात्कार हो रहा है, तो उसका मतलब यही है कि मजहब किसी को बुरे काम से नहीं रोकता, दिखावे के लिए मजहब को जितना मान लिया जाए, वह इंसान के भीतर की हैवानियत को नहीं रोक पाता। यह भी हो सकता है कि धर्मों की नीयत ही ऐसी हैवानियत (सच तो इसे इंसानियत कहना ही होगा) पर रोक लगाने की नहीं होगी। 

फिलहाल उन धर्मों के लोग राहत महसूस कर सकते हैं जो लाशों को जला देते हैं, क्योंकि उनके भीतर के यौन कुंठाग्रस्त लोग भी पंचतत्वों से तो बलात्कार कर नहीं सकते। 

अगर इस्लाम छोड़े हुए, और नास्तिक बन चुके एक लेखक की किताब की ही बात होती, तो उसे इस धर्म को बदनाम करने की कोशिश माना जा सकता था, लेकिन जब वहां का एक प्रमुख अखबार इस पर संपादकीय लिख रहा है, तो इसे झूठी खबर मानना ठीक नहीं है। सभी धर्मों के लोग अपने-अपने भीतर के मुजरिमों पर अपने धर्म के असर को एक बार फिर आंक लें कि धर्म किस बुरे काम को रोक पाता है।

तलाक के बाद, या उसके बिना, बेहतर समाज के लिए महिला आत्मनिर्भर हो..

 1 अगस्त 2021

 सोशल मीडिया पर एक लाइन अभी पढऩे मिली कि एक दुख भरी शादी के मुकाबले बिना दुख वाला तलाक बेहतर होता है। बात एकदम खरी है और उन देशों या समाजों के लिए इसकी अधिक अहमियत है जहां पर तलाक को एक बदनाम शब्द माना जाता है। हम यहां पर ऐसे समाज के तलाक की चर्चा नहीं कर रहे जहां मर्दों को ही इसका आसान हक हासिल और औरतों को यह हक मानो मिला हुआ नहीं है, तमाम लोगों की बात कर रहे हैं, जहां पर तलाक देना दोनों के ही हक की बात होती है. वहां पर एक तकलीफ और यातना भरी हुई शादीशुदा जिंदगी को ढोने के बजाय उससे आजाद होकर अकेले होना और फिर आगे की अपनी जिंदगी को खुद तय करना किस तरह बेहतर होता है इसे समझने की जरूरत है।

हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से में जब शादी के बाद लडक़ी को घर से विदा किया जाता है तो उसे रवानगी के तोहफे की शक्ल में एक नसीहत दी जाती है कि डोली मां-बाप के घर से उठ रही है, अब अर्थी ससुराल से उठना चाहिए। इसे एक अच्छी महिला होने का पैमाना माना जाता है कि वह ससुराल में मर-खप जाए, तकलीफ की जिंदगी गुजार ले, या तनाव को बर्दाश्त कर ले, लेकिन उसे छोडक़र कभी ना निकले। बहुत से भाई इस बात के हिमायती अधिक दूर तक होंगे कि लडक़ी लौटकर मां बाप के घर कभी ना आए क्योंकि मां-बाप तो अपना वक्त गुजार कर रवानगी डाल देंगे, और उसके बाद लौटी हुई बहन भाइयों की ही जिम्मेदारी रह जाएगी। उसके बाद उस बहन के अगर बच्चे हुए तो उनकी भी जिम्मेदारी भाइयों के परिवार पर आएगी, और कानून की अगर बात करें तो लडक़ी मां-बाप की दौलत में बराबरी की हकदार भी होती है, इसलिए भी हो सकता है कि भाइयों में बहन के लौटने के नाम से ही दहशत होने लगे। ऐसे में हिंदुस्तान के अधिकतर समाज में लडक़ी से ससुराल की ज्यादतियां बर्दाश्त करने की उम्मीद की जाती है। चाहे वह यातना झेलते-झेलते मानसिक रोगी ही क्यों न हो जाये, वह खुदकुशी ही क्यों न कर ले, या उसकी दहेज हत्या ही क्यों ना हो जाए. आमतौर पर लडक़ी के मां-बाप, उसके भाई इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि वह किसी तरह ससुराल में एडजस्ट हो जाए, वहां उसका तालमेल बैठ जाए।

लेकिन जब हम अपने आसपास के लोगों को देखते हैं और एक नजरी सर्वे सा करते हैं कि कौन सी लड़कियां ऐसी हैं जो तनाव को बाकी जिंदगी झेलने के बजाय, एक सीमा तक झेलने के बाद ससुराल और शादी के बंधन से निकलने की हिम्मत जुटा पाती हैं? ऐसा सोचने पर आसपास दिखता यह है कि या तो बहुत संपन्न परिवारों की ऐसी लड़कियां जिनके मां-बाप, भाई उनके साथ में खड़े हुए हैं, वे बाहर निकलने का हौसला जुटा पाती हैं, या फिर मजदूर तबके की ऐसी महिलाएं जिन्हें घर लौटने के बाद में एक कोठरी में अपनी कमाई पर जीने की हिम्मत रहती है, वह भी शादी को तोडक़र बाहर निकलने की हिम्मत दिखा पाती हैं। लेकिन इनसे परे तलाक के मामलों में बाकी महिलाओं का हौसला कुछ कम दिखाई पड़ता है, और केवल वही महिलाएं तलाक का हौसला कर पाती हैं, जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहती हैं. यह निष्कर्ष किसी सर्वे पर आधारित नहीं है केवल आसपास के मामलों को देखते हुए ऐसा लगता है कि आर्थिक रूप से संपन्न महिला यातना के सिलसिले को तोडऩे का हौसला जुटा पाती है। इसलिए यह बात बहुत मायने रखती है कि शादी के पहले ही हर लडक़ी को आर्थिक रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जाए ताकि उसके मायके के लोग अगर उसका साथ न भी दें तो भी वह अपने दम पर जिंदा रह सके।

अपने दम पर जिंदा रह सके यह बात तो सोचने का मतलब किसी कोने से भी यह सुझाना नहीं है कि शादी के बाद लडक़ी को उसके मायके की संपत्ति में हिस्सा ना मिले या तलाक के बाद उसके पति और ससुराल से उसे बराबरी की एक जिंदगी जीने का इंतजाम ना मिले। हम इन दोनों इंतजामों के साथ-साथ यह बात सुझाना चाहते हैं कि हर लडक़ी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना उसके परिवार और समाज इन दोनों के लिए भी जरूरी है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसी सरकारें जो कि गरीब लड़कियों की शादी में सरकार की तरफ से समारोह का इंतजाम करती हैं, और घर बसाने के लिए कुछ सामानों का तोहफा भी देती हैं, उन्हें ऐसे लुभावने रस्म-रिवाज का जिम्मा उठाने के बजाय महिलाओं की आत्मनिर्भरता के बारे में कुछ अधिक सोचना चाहिए, और करना चाहिए। सोचने की जरूरत है कि किसी वजह से कोई लडक़ी या महिला अकेले रह जाए, तो उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए सरकार क्या कर सकती है?

हिंदुस्तान के ही केरल जैसे प्रदेश को देखें तो वहां ना केवल पढ़ाई-लिखाई बल्कि कई किस्म की पेशेवर ट्रेनिंग का ऐसा इंतजाम है कि केरल के कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं रह जाते। पूरे हिंदुस्तान में मेडिकल ढांचे में जितने किस्म के तकनीकी काम रहते हैं, उनमें केरल से निकले हुए लोग बड़ी संख्या में दिखते हैं। उनके अलावा अंग्रेजी का डिक्टेशन लेने या अंग्रेजी टाइप करने जैसे कामों के लिए भी केरल के लोग बहुत दिखते हैं। फिर बड़ी-बड़ी मशीनों को चलाने में दिखते हैं, उनकी मरम्मत में दिखते हैं। जहां पर पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ हुनर सिखाने का इंतजाम भी होता है, वहां सभी लोग आत्मनिर्भर हो जाते हैं। हमारा यह मानना है कि एक आत्मनिर्भर समाज ही आत्मसम्मान से भरा हुआ समाज हो सकता है, और ऐसा ही समाज यातनामुक्त भी हो सकता है, क्योंकि वहां लोग मजबूरी के संबंधों को ढोने के बजाय बाहर निकलकर अपने दम पर जीने की एक संभावना तो देखते ही हैं।

हिंदुस्तान में शादी को लेकर जितने किस्म का पाखंड प्रचलन में है, वह बताता है कि कन्या का दान किया जाता है। हिंदू शादी में इस्तेमाल होने वाला यह शब्द मानो लडक़ी का दर्जा जिंदगी भर के लिए तय कर देता है कि वह दान में दी जाने वाली एक चीज है। और जिसे दान में कोई सामान मिलता है, उसे उस सामान का अधिक महत्व तो कभी समझ में आता भी नहीं है। इसके साथ-साथ हिंदू समाज में पति के जितने प्रतीकों को सुहाग के प्रतीकों के नाम पर एक महिला पर लाद दिया जाता है, उससे भी वह एक आश्रित का दर्जा पा लेती है, और उसका आत्मविश्वास, उसकी आत्मनिर्भरता इन सब को अच्छी तरह कुचल दिया जाता है। फिर समाज की मान्यताएं भी रहती हैं कि औरत के सुहागिन होकर मरने को उसकी किस्मत की बात माना जाता है। मतलब यह कि औरत अपने पति की मरते तक सेवा करें और उसके मरने के साथ ही उसके प्रतीकों को उतार हिंदुस्तान में शादी को लेकर जितने किस्म का पाखंड प्रचलन में है कामा वह बताता है की कन्या का दान किया जाता है। हिंदू शादी में इस्तेमाल होने वाला यह शब्द मानव लडक़ी का दर्जा जिंदगी भर के लिए तय कर देता है कि वह दान में दी जाने वाली एक चीज है। और जिसे दान में कोई सामान मिलता है उसे उस सामान का अधिक महत्व तो कभी समझ में आता भी नहीं है। इसके साथ साथ हिंदू समाज में पति के जितने प्रतीकों को सुहाग के प्रतीकों के नाम पर एक महिला पर ला दिया जाता है उससे भी वह एक आश्रित का दर्जा पा लेती है और उसका आत्मविश्वास उसकी आत्मनिर्भरता इन सब को अच्छी तरह कुचल दिया जाता है। फिर समाज की मान्यताएं सी रहती हैं की औरत के सुहागिन होकर मरने को उसकी किस्मत की बात मानी जाती है। मतलब यह की औरत अपने पति कि मरते तक सेवा करें और उसके मरने के साथ है ही उसके प्रतीकों को उतार दे, तोड़ दे, और पोंछ दे।

एक महिला के दिमाग में यह बैठा दिया जाता है कि शादी सात जन्मों का संबंध रहता है। इसलिए वह एक जन्म के बाद भी इस बंधन से आजाद होने की नहीं सोच पाती। ऐसी मानसिकता के बीच जरा भी हैरानी की बात नहीं रहती कि कोई महिला पूरी जिंदगी शादीशुदा जिंदगी की यातनाओं को ढोते हुए मर-खप जाती है, और शायद ही कभी अपने मां-बाप के घर पर दोबारा अपना हक पाने के लिए लौट पाती है। आर्थिक आत्मनिर्भरता से परे एक लडक़ी के सामाजिक और पारिवारिक का हक पर भी खुलकर बात होनी चाहिए और इस सोच को जगह-जगह कुचलना चाहिए कि मां-बाप के घर से बस डोली ही निकलती है, और अर्थी तो ससुराल से ही निकलेगी।

हिंदुस्तान के कानून में लडक़ी को मां-बाप की दौलत पर बराबरी का हक दिया गया है, और शादी के खर्च या दहेज को इस हक का विकल्प मान लेना नाजायज बात तो होगी। यह समझने की जरूरत है कि समाज में प्रचलित इस धारणा को भी जगह-जगह धिक्कारना चाहिए कि दहेज के साथ लडक़ी का हक देना पूरा हो जाता है। मां-बाप लडक़ी की शादी पर खर्च अपनी शान शौकत के लिए करते हैं। और दहेज लेना-देना तो वैसे भी जुर्म के दर्जे में आता है और इस सिलसिले को खत्म करना जरूरी है। कोरोना और लॉकडाउन के पूरे दौर में शादियों में 25-50 लोगों का ही बंधन रहा, और वैसे में भी लोगों ने शादियां कर दीं, समारोह कर दिए।

इसलिए अब एक कानून बनाकर प्रदेश सरकारों को भी अतिथि नियंत्रण लागू करना चाहिए ताकि लड़कियों के मां-बाप पर दिखावे की शान-शौकत का जलसा करने का बोझ भी ना रहे। ऐसा करके कानून एक ऐसा माहौल खड़ा करने में मदद कर सकता है जिसमें लड़कियों के नाम पर खर्च दिखाने के लिए शानशौकत की दावत दर्ज कर ली जाए, जिनसे उस लडक़ी को अपनी किसी मुसीबत के वक्त कोई मदद तो मिलती नहीं है। इसलिए लडक़ी के हक और उसकी आत्मनिर्भरता के मुद्दे पर समाज में व्यापक चर्चा जरूरी है, अलग-अलग कई मंचों पर इस मुद्दे पर बात होनी चाहिए, और ऐसी बात जब अधिक होती है तो वह नीचे तक भी उतरती है. सामाजिक मंचों को ऐसी बहस छेडऩी चाहिए ताकि लोगों के दिल-दिमाग में बैठे हुए पुराने ख्यालात निकल भी सकें, और नई कानूनी बातें घुस भी सकें।

हिंदुस्तान जैसे समाज में लडक़ी और महिला की आर्थिक आत्मनिर्भरता को उनके बुनियादी मानवाधिकार मानना चाहिए। और उनकी ऐसी आत्मनिर्भरता उनके बच्चों की परवरिश के लिए भी एक बेहतर नौबत रहती है, जब बच्चे रिश्तेदारों से किसी मदद के मोहताज नहीं रहते, और अपनी मां की कमाई पर अच्छे से जिंदा रह सकते हैं. ऐसा समाज ही एक बेहतर समाज भी बन सकता है जिसमें एक महिला आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हो, और आत्मविश्वास से भरी हुई हो।

(Daily Chhattisgarh)

एक्टिविस्ट को जर्नलिस्ट मानने की चूक न करें

22 जून 2015


मध्यप्रदेश में कल एक पत्रकार के अपहरण के बाद उसकी हत्या की खबर है, और पहली खबर में आई जानकारी के मुताबिक वहां के खनिज माफिया ने यह हत्या की है जिसके खिलाफ यह पत्रकार अदालत में मुकदमा लड़ रहा था। इसके पहले उत्तरप्रदेश में एक पत्रकार को जलाकर मारने के बाद एक मंत्री पर यह तोहमत है कि उसने पुलिस भेजकर इस पत्रकार को जलवाया क्योंकि इसने सोशल मीडिया पर इस मंत्री के खिलाफ कुछ लिखा था। अब वह मंत्री इसके बाद से लगातार फरार चल रहा है, पुलिस में उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज है, मरने वाले पत्रकार ने आखिरी बयान में उसका नाम बताया है, और पत्रकार का गरीब परिवार एक पेड़ के नीचे धरना देते टीवी की खबरों में दिख रहा है। इस हादसे के दो दिन बाद ही उत्तरप्रदेश में एक दूसरे पत्रकार के बारे में एक खबर आई कि उसे मोटरसाइकिल से बांधकर घसीटा गया। एक खबर छत्तीसगढ़ के भाटापारा से दो दिन पहले ही आई है कि वहां एक साप्ताहिक अखबार के संपादक को सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक भतीजे ने धमकी दी है। 
एक और खबर सोशल मीडिया पर तैर रही है कि भारत में पिछले एक बरस में किस तरह करीब पौन सौ पत्रकारों की हत्या हुई है। इसके साथ-साथ जोड़कर देखें तो छत्तीसगढ़ के ही बिलासपुर और गरियाबंद में पत्रकारों की हत्या को कुछ महीने या बरस हो चुके हैं, और अब तक कोई सुराग नहीं है। कोई दो बरस पहले बस्तर में एक अखबार के संवाददाता की हत्या हुई थी, जिसके पीछे नक्सलियों का हाथ आया था। 
अब हम पत्रकार या अखबारनवीस तबके को देखें तो यह इतना व्यापक हो गया है कि इसका दायरा कहां शुरू होता है और कहां खत्म होता है यह अंदाज लगाना मुश्किल है। देश में लाखों अखबार हैं, छत्तीसगढ़ जैसे छोटे प्रदेश में ही दसियों हजार अखबारों के नाम रजिस्टर हैं, और उनमें से कम या अधिक दिनों तक छपने वाले भी हजारों अखबार हैं। अब एक-एक अखबार के दर्जन भर पत्रकार हो सकते हैं, और दर्जनों हो सकते हैं। जहां तक भारत के अधिकतर क्षेत्रीय मीडिया का सवाल है तो उसके पत्रकार पूर्णकालिक पत्रकार दो मायने में नहीं होते, एक तो उनका पत्रकारिता से परे कोई कारोबार होता है, या फिर वे अखबार से इतनी तनख्वाह नहीं पाते कि उन्हें पूर्णकालिक कर्मचारी माना जाए। ऐसे में जो लोग रोजगार से परे अखबारनवीसी करते हैं, वे तमाम लोग भी पत्रकार तो हैं, लेकिन उनमें से बहुत से लोगों का कामकाज पत्रकारिता से परे भी कई तरह का रहता है। 
अब जैसे अखबार मालिक हैं, या मीडिया मालिक हैं, उन पर कोई रोक नहीं है कि वे मीडिया के अलावा दूसरा कारोबार न करें, इसी तरह अखबारनवीस भी आज जर्नलिस्ट होने के साथ-साथ एक्टिविस्ट भी हैं, वे दूसरे कारोबार भी करते हैं, दूसरी जगहों पर नौकरी भी करते हैं, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से ऐसे लोग परंपरागत पेशेवर मीडिया से परे भी अपनी बातों को लिखते हैं। अब ऐसे में जब किसी पत्रकार की हत्या होती है तो वह पत्रकार की हत्या तो गिनी जाती है, लेकिन वह जमीन के कारोबार में हुई है, एक आंदोलनकारी के रूप में हुई है, किसी निजी रंजिश से हुई है, या फिर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके जानकारी निकालकर अदालत में जाकर किसी के खिलाफ मुकदमा चलाने की वजह से हुई है? 
यह फर्क समझने की जरूरत है कि आज कई नए तबके खड़े हो गए हैं जो पत्रकारिता के साथ-साथ मिलकर चल रहे हैं। ऐसा एक तबका अपने को आरटीआई एक्टिविस्ट कहता है और जो सरकार या सूचना के अधिकार के दायरे में आने वाले बाकी संस्थानों से जानकारी निकालकर उसके आधार पर चारों तरफ शिकायतें भेजता है, अदालतों में जनहित याचिका दायर करता है, और धरने पर भी बैठ जाता है। ऐसा दूसरा तबका है जो कि बिना किसी परंपरागत मीडिया के या परंपरागत मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया पर अपना एक अलग आंदोलन चलाता है, और वहां का हिसाब-किताब भी लोग दूसरी जगह चुकता करते हो सकते हैं, और दूसरी जगह का हिसाब-किताब भी ऐसे पत्रकार सोशल मीडिया पर चुकता कर सकते हैं, करते हैं। 
इसलिए आज पत्रकार पर हमला या पत्रकार की हत्या इस बात के बारीक खुलासे की जरूरत है। जिस तरह भारत में किसान की आत्महत्या और किसानी की वजह से आत्महत्या दो अलग-अलग चीजें भी हो सकती हैं। एक किसान किसी प्रेम संबंध की वजह से या किसी बीमारी से थककर भी खुदकुशी कर सकता है, उसी तरह एक पत्रकार की हत्या के पीछे गैरअखबार वजहें भी हो सकती हैं। ऐसे में यह मूल्यांकन जरूरी है कि हत्या या हमले के पीछे मीडियाकर्मी होना या अखबारनवीसी की वजह है, या कि किसी मामले-मुकदमे की वजह से यह हत्या हुई है? 
मध्यप्रदेश के जिस पत्रकार की हत्या को लेकर आज यहां बात शुरू की है उसकी हत्या से हमको तकलीफ हुई है। लेकिन खबर में जो वजह आई है, वह खनिज माफिया के खिलाफ मुकदमेबाजी की है। मेरी समझ यहां पर कुछ कमजोर पड़ती है कि एक पत्रकार को एक आंदोलनकारी के रूप में किस हद तक सक्रिय होना चाहिए? और एक पत्रकार का काम उसके मीडिया से परे कितनी दूर तक जायज माना जाए? वैसे तो लोकतंत्र में हर पत्रकार एक नागरिक भी है, और उसके लोकतांत्रिक-नागरिक अधिकार पत्रकार होने से घट नहीं जाते। लेकिन एक दूसरी बात जो मुझको बहुत जरूरी लगती है वह यह कि पत्रकार को अपने मीडिया से परे बाकी के लोकतांत्रिक मोर्चों पर अपनी सक्रियता सीमित रखनी चाहिए। 
बहुत से पत्रकार मंच, माला, महत्व, माईक, और मौजूदगी की पत्रकारिता करते हैं। वे पुराने कार्टूनों या लतीफों के मुताबिक जेब में कैंची लेकर चलते हैं कि कब कहां फीता काटने बुला लिया जाए। अपनी दूसरी जेब में ऐसे लोग एक माचिस लेकर चलते हैं कि सरस्वती प्रतिमा के सामने दीया जलाने के वक्त ऐसा न हो जाए कि आयोजकों के पास माचिस न रहे। फिर कई पत्रकार ऐसे रहते हैं जो अपने लिखे हुए, या कि लिखाए हुए को बेअसर पाकर बेशर्म सरकार के खिलाफ या कारखानेदारों के खिलाफ अदालत तक जाना जरूरी समझते हैं क्योंकि जब कलम बेअसर हो जाए, तो कानून की तलवार उठाना उनको जायज लगता है। 
मैं ऐसे तमाम जर्नलिस्ट-एक्टिविस्ट के खिलाफ हूं, क्योंकि इससे एक्टिविज्म को तो ताकत मिलती है, और जर्नलिज्म की साख गिरती है। जब लोग अखबारनवीसी को किसी और आंदोलन के लिए एक औजार या हथियार बना लेते हैं, तो उस आंदोलन का मकसद चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह अच्छी अखबारनवीसी नहीं रह जाती। इसलिए ऐसे लोग अखबारनवीसी का नकाब ओढ़कर आंदोलन करते हैं, और देश में ऐसे दो ही आंदोलन थोड़ी दूर तक मुझको जायज लगे क्योंकि वे पत्रकारिता पर हमले के खिलाफ भी थे। एक तो आजादी की लड़ाई के दौरान जब अखबारनवीसी पर अंग्रेज सरकार की बंदिशें थीं, और उस दौर के अखबारनवीस जिस तरह अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ अखबार निकालते थे, आंदोलन में शामिल होते थे और जेल जाते थे, वह अखबारनवीसी को बचाने की लड़ाई भी थी, देश को आजाद कराने की लड़ाई तो थी ही। ऐसा दूसरा मौका आपातकाल के दौरान आया जब बहुत से अखबार और उसके पत्रकार इंदिरा और संजय गांधी के पांव की धूल को पुलित्जर पुरस्कार समझ बैठे थे, और उस वक्त कई लोगों को एक आंदोलनकारी बनकर मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप के हमले का मुकाबला करना पड़ा था। लेकिन इन दो मौकों को छोड़ दें, तो भारत के पूरे इतिहास में पत्रकारिता को, और पत्रकारों को किसी और आंदोलन में शामिल होने की जरूरत नहीं थी। 
पत्रकारिता का एक खास दर्जा तभी तक जायज है जब तक इस दर्जे के लोग इसकी पवित्रता का सम्मान करते हुए इसकी शुद्धता और इसकी ईमानदारी का ख्याल रखें। इसके बिना जिस तरह एक कारखानेदार आज हजारों करोड़ खर्च करके देश का सबसे बड़ा अखबारदार भी बन जा रहा है, और उससे उसकी कोई अखबारी साख नहीं बन रही, वैसा ही हाल अखबारनवीसों का भी होने लगेगा। यह बात जरूरी इसलिए है कि आज देश भर में जगह-जगह पत्रकार की परिभाषा धुंधली हो चली है। आज हर कोई पत्रकार हो चले हैं, और कोई भी खालिस पत्रकार रह गए हैं या नहीं, यह मूल्यांकन खासा मुश्किल हो गया है। बहुत सारी गाडिय़ों पर आज प्रेस और पत्रकार के लेबल लगे देखते हैं, और उसके साथ-साथ किसी राजनीतिक पार्टी का पदाधिकारी होने का लेबल भी दिखता है। अब यह सोचने की बात है कि एक राजनीतिक पार्टी की पदाधिकारी को पत्रकार माना जाए, या कि न माना जाए? यह याद रखने की जरूरत है कि देश के मीडिया में राजनीतिक दलों के जो अपने अखबार हैं उनकी साख केवल अपनी पार्टी के प्रवक्ता जितनी है, उससे परे उनकी कोई साख नहीं है, और उनकी कोई अहमियत भी नहीं है। लोकतंत्र में वे राजनीतिक दल का एक भोंपू हैं, और उनको मीडिया मानना पूरी तरह से गलत है। लोकतंत्र में मीडिया को एक अघोषित चौथे स्तंभ का जो दर्जा हासिल है, उस दर्जे के हकदार भी राजनीतिक प्रकाशन नहीं हो सकते। इसलिए ऐसे लोगों की हत्या जो कि मीडिया से भी जुड़े हुए थे, और ऐसे लोगों की हत्या जो सिर्फ मीडिया से जुड़े हुए थे, उसमें फर्क करके देखने की जरूरत है। एक एक्टिविस्ट को जर्नलिस्ट मानने की चूक नहीं करना चाहिए। 

अपना धर्म, अपना ईश्वर खुद गढ़ें!

आजकल
18 जुलाई 2011
सुनील कुमार
जब आसपास की जिंदगी कम दिलचस्प हो तो आज के जमाने में कस्बा बन चुकी दुनिया के बाकी हिस्सों में इंटरनेट से जाकर बहुत सी नई बातें देखी जा सकती हैं। जब आपके आसपास के लोग सिर्फ उन्हीं पुरानी बातों को करते रहें, जिनके बारे में कई-कई बार लिखा जा चुका हो तो फिर रौशनदान से बाकी दुनिया में झांकना ताजी हवा के एक झोंके जैसा होता है।
एक वेबसाईट पर लोगों से कहा गया कि वे अपना धर्म गढ़ें। हर मजहब कभी न कभी, किसी न किसी ने तो शुरू किया ही है। महावीर हों या बुद्ध, ईसा हों या गुरुनानक, हर धर्म की शुरुआत किसी एक इंसान की की हुई ही है। इसलिए इस वेबसाईट ने लोगों की हौसलाअफजाई की की वे भी एक नए धर्म की कल्पना करके उसके बारे में लिखें और हो सकता है कि लोगों को वह पसंद आ जाए और वे एक नए धर्म के संस्थापक बन जाएं!
इस पर करीब हजार लोगों ने लिखकर भेजा और फिर इस वेबसाईट को चलाने वाले ने इसे रोक दिया ताकि अब तक आई हुई कल्पनाओं को सामने रखा जा सके और उसके बाद फिर और लोगों की इंट्री को जगह मिले। इसमें धर्म के नाम, किस बात में इस धर्म की आस्था है, रीति-रिवाज और इसके त्यौहारों की जानकारी भेजना है। इसमें से कुछ कल्पनाओं को देखें।
धर्म का नाम आधुनिकता, आस्था यह कि आप खुद अपने ईश्वर हैं, आप अपने मूल्य, नैतिक-सिद्धांत, और दूसरे विश्वास खुद तय करते हैं। रीति-रिवाज-आपके जन्मदिन पर छुट्टी रहे और आप अपने-आपके लिए एक तोहफा खरीदें। प्रमुख छुट्टियां-पहला बड़ा त्यौहार आपका जन्मदिन रहेगा, दूसरी बड़ी छुट्टी शुक्रवार की रहेगी, हर कोई शुक्रवार को प्यार करता है (क्योंकि अगले दो दिन छुट्टी रहती है)। इस धर्म के मानने वाले अपनी छोटी-मोटी छुट्टियां खुद तय करेंगे।
मेरे हिसाब से यह एक बड़ी दिलचस्प दिमागी मशक्कत है कि लोग अपनी सोच से एक धर्म डिजाइन करें। जो लोग धर्म को गंभीरता से लेते हैं उनको भी अपने-अपने धर्मों में कोई खामी दिखती होगी या किसी खूबी की कमी लगती होगी। कोई रीति-रिवाज खटकता होगा और हो सकता है कि उस धर्म के त्यौहार की तारीखें अंगे्रजी कैलेंडर से तय होने वाली छुट्टियों के साथ मेल न खाती हों। हम हिंदुस्तान के ही अलग-अलग धर्मों को देखें तो ही इनके बहुत से बुरे रीति-रिवाज लोगों को खटक सकते हैं, खटकते हैं। जिन लोगों का धर्म पर भरोसा है और जिन्हें अभी तक अपने धर्म की मरम्मत करने की जरूरत नहीं लगी है, वे भी जब एक नया धर्म गढऩे की मशक्कत करेंगे तो उन्हें अपने मौजूदा धर्म के खराब हिस्सों और पुर्जों की समझ आने लगेगी।
मैं अपनी निजी सोच में एक खालिस नास्तिक हूं और इस नाते न तो मुझे कभी धर्म की जरूरत लगती और न ही ईश्वर की। इतनी सी बात को खुले-खुले कहकर मैं पिछले महीनों में ताजा-ताजा दोस्त बने बहुत से मुस्लिम फिलीस्तीनियों को खो भी चुका हूं। जब मैं ईश्वर के बारे में खुलकर कुछ कड़वी बातें लिख देता हूं तो उसके बाद फेसबुक पर या इंटरनेट की ऐसी दूसरी दोस्ती वाली साईटों पर कुछ दोस्तों की तरफ से सिर्फ चुप्पी मिलने लगती हैं। नास्तिक की जगह शायद बहुत किस्म की आस्थाओं में है ही नहीं। क्योंकि मैं किसी अलग किस्म के ईश्वर पर आस्था रखने को भी मुझे किसी खास किस्म के ईश्वर की तरफ खींचने की कोशिश कुछ धार्मिक प्रचारवादी लोग कर सकते हैं। लेकिन जो ईश्वर के अस्तित्व को ही न मानता हो उस पर तो ऐसे प्रचारवादी लोगों को पहली कमरतोड़ मेहनत तो आस्था पैदा करने के लिए करनी पड़ेगी। चट्टान पर फसल लगाना मुश्किल होता है। इसलिए मेरी आस्था से बेहतर एक कोई दूसरी आस्था मुझे टिकाने की गुंजाइश भी जब नहीं होती तो कुछ लोग मुझे बिल्कुल ही फि जूल का मान लेते हैं।
अब ऐसे में अगर मेरे जैसे कड़क नास्तिक को भी अगर एक धर्म डिजाइन करने को कहा जाए और शर्त यह हो कि यह करना ही है तो अभी यहां तक पहुंचकर मैं सोचना शुरू कर रहा हूं कि मेरा धर्म किस किस्म का होगा?
मुझे लगता है कि दुनिया की जो सबसे पुरानी बिरादरियां हैं, ऐसे मूल निवासी या आदिवासी लोगों की आस्था शायद मेरी सोच के अधिक करीब होगी जो कि प्रकृति से जुड़ी हुई है। ईश्वर की धारणा से परे, कुदरत पर मेरा अपार भरोसा है। कुदरत पूरी तरह वैज्ञानिक है और उसके तमाम फैसलों के पीछे न्यायसंगत और तर्कसंगत कारण नजर आते हैं। कुछ लोगों को लग सकता है कि बादल फटने, बाढ़ आने, भूकंप आने या कहीं सूखा पड़ जाने के पीछे कौन सी न्यायसंगत और तर्कसंगत, वैज्ञानिक वजह हो सकती है। कुदरत का अपना एक सिलसिला है और उसने कभी इंसानों को कोई गारंटी कार्ड नहीं दिया था कि उसके ज्वालामुखी कभी फटेंगे ही नहीं, या भूकंप कभी आएगा ही नहीं। उसकी धरती का ढांचा इसी किस्म का है कि वह ऐसी तमाम उथल-पुथल से गुजरता ही रहेगा और इंसान को इस बहुत ही कुदरती हलचल के बीच रहना सीखना होगा।
यह कुदरत की तरफ से एक ऐसी चुनौती भी इंसानों को है जिसका सामना करते हुए, जिससे बचने की तरकीबें निकालते हुए वह एक ऐसी तैयारी कर ले रहा है जिससे कि आगे जाकर किसी दूसरे ग्रह पर जाने या वहां के लोगों के यहां आने पर वह तमाम बड़ी हलचलों के लिए तैयार रहे। मतलब यह कि जिसे हम प्राकृतिक विपदा कहते हैं वह एक चुनौती अधिक है और सीखने का मौका अधिक है। अगर ज्वालामुखी की मार से बचना लोग नहीं सीख पाएंगे तो कल किसी दूसरे ग्रह से आए हुए लोगों के किसी किस्म के लावे से बचना वे कैसे सीखेंगे? और बाद सिर्फ किसी एक किस्म की नौबत से जूझने की न होकर, उस नौबत के चलते एक तकनीक बना लेने की भी है और उसे परख लेने की भी है।
तो बात हो रही थी कुदरत को लेकर मेरी समझ की, जिसके तहत आम बोने से आम हासिल होता है और बबूल लगाने से बबूल। यहां इन दोनों मिसालों का मतलब आम का बेहतर होना या बबूल का बेकार होना नहीं है, सिर्फ दो अलग-अलग किस्मों की चर्चा है। धर्म को लेकर या ईश्वर को लेकर अगर मुझे अनिवार्य रूप से कोई सोच बहस के लिए बनानी ही है तो मेरा ईश्वर अच्छे कामों का एक ऐसा प्रतीक होगा जो कि इसके अलावा किसी और तरह की आकाशवाणी करने वाला नहीं होगा। वह न तो आदमी होगा और न ही औरत। जिस तरह कुछ आदिवासी समाजों में पेड़, नदी, सूरज, चांद, जानवर और एक-दो और प्राकृतिक प्रतीक उपासना के केंद्र माने जाते हैं उसी तरह कुदरत का यह सिलसिला मेरे लिए एक प्रतीक रहेगा कि जैसा बोओ वैसा काटो।
अब जैसा कि इस वेबसाईट ने पूछा है कि ऐसे नए धर्म के रीति-रिवाज क्या होंगे? तो मुझे लगता है कि मेरे इस धर्म को मानने वाले लोगों के लिए उपासना के तरीके और रीति-रिवाज शायद ऐसे हों कि रोज के अपने काम करने की ताकत का एक हिस्सा अनिवार्य रूप से जो सबसे जरूरतमंद तबके या सार्वजनिक हित के लिए लगाए उसी को माना जाएगा कि उसने पूजा की है। हर किसी के चारों तरफ इतने कमजोर तबके रहते हैं कि उनके लिए बहुत कुछ करने की गुंजाइश उनसे अधिक ताकतवर हर किसी के पास होती है। इसलिए जो ऐसा करे उसी ने उपासना की है यह माना जाए।
जहां तक किसी खास दिन छुट्टी की बात है, तो आज के दुनिया के शहरी ढांचे में जिस जगह जो सबसे सहूलियत का दिन है उसी दिन छुट्टी रहनी चाहिए। आज भी भारत के सरकारी इंतजाम में साल के कुछ दिन किसी कमिश्नरी या किसी जिले में स्थानीय स्तर पर छुट्टियां तय होती हैं। यह सिलसिला तमाम छुट्टियों के लिए होना चाहिए और जिस जगह जो त्यौहार मनाए जाते हैं या जिस जगह जिन छुट्टियों का इस्तेमाल मजे के लिए हो सकता है, वैसी छुट्टियां उन दिनों पर रखना चाहिए। लेकिन मेरा यह भी मानना है कि धार्मिक रिवाजों की कट्टरता की तरह यह भी तय होना चाहिए कि छुट्टियों के हकदार वे ही लोग रहें जो कि उसके पहले के काम के तमाम दिनों में ईमानदारी से अपना काम कर चुके हों। जिस तरह हज पर जाने वाले लोगों के लिए शर्तों की एक लंबी फेहरिस्त रहती है कि ऐसे इंसान अपनी तमाम पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियां पूरी कर ली हैं या नहीं? उसके बाद ही किसी को हज पर जाने का हकदार माना जाता है। वैसा ही इंतजाम मेरी सोच के धर्म में हफ्तावार छुट्टी के लिए भी होना चाहिए कि उस बीच में लोगों ने ईमानदारी से काम के दिनों में अपना काम किया है या नहीं? और जिस तरह ताकत के एक हिस्से का, वक्त के एक हिस्से का इस्तेमाल कमजोर तबकों की भलाई के लिए किया है या नहीं? तो ऐसे काम और ऐसी उपासना कर लेने के बाद ही लोग छुट्टी मनाएं ऐसा मेरा मानना है।
लेकिन आज यहां की यह चर्चा मैंने अपनी सोच के लिए नहीं छेड़ी है। यह तो मैंने अलग-अलग आस्थावान और आस्थाहीन लोगों के सोचने के लिए शुरू की है कि वे अपनी मौजूदा आस्था और उससे जुड़े ईश्वर, रीति-रिवाज, उपासना और छुट्टियों के बारे में क्या सोचते हैं और उसमें क्या फेेरबदल उन्हें बेहतर लगेगा? इसके अलावा कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो कि एक बिल्कुल नए धर्म की कल्पना करें। लोगों के दिल-दिमाग को ऐसी कसरत में डालने के लिए यह बात यहां शुरू की गई और शायद कुछ लोग इसे आपसी बातचीत में या अपने मन में आगे भी बढ़ाएं।