1 अप्रैल 2024
कुछ अरसा पहले छत्तीसगढ़ के कुछ पत्रकारों के साथ बातचीत में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सामने यह बात रखी गई थी कि चूंकि राजनीतिक मुकाबले के तहत कांग्रेस और भाजपा दोनों ही किसानों से बहुत ऊंचे दामों पर तकरीबन तमाम धान खरीद रही हैं, इसलिए इस प्रदेश के किसान और किसी फसल के बारे में सोच भी नहीं सकते, और धान के फसल में अंधाधुंध पानी लगता है, और किसानों को मिलने वाली मुफ्त बिजली की वजह से रात-दिन पंप चलाकर किसान खेतों को तालाब की तरह लबालब रखते हैं। इससे एक तरफ तो फसल की विविधता खत्म हो रही है, और फसल पर आधारित कीट-पतंगों से लेकर दूसरे प्राणियों तक की जैविक विविधता भी खत्म हो रही है। इसलिए सिर्फ धान केन्द्रित खेती न तो इस प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए ठीक है, न जमीन के नीचे के पानी के लिए, और न ही जैव विविधता के लिए। किसान भी आज पूरी तरह सरकारी खरीद के मोहताज हो गए हैं, जो कि उनके लिए भी अच्छी नौबत नहीं है।
सरकारों को यह समझना होगा कि बिजली के उत्पादन को अंतहीन मान लेना ठीक नहीं है, इसी तरह धरती के नीचे के पानी को भी अंतहीन मानना गलत होगा। इसलिए आने वाले वक्त में गाडिय़ों की बैटरियां चार्ज करने बिजली अधिक से अधिक लगेगी, एलन मस्क जैसी भविष्यवाणी को देखें तो एआई के इस्तेमाल से बढऩे वाली बिजली की खपत का तो हिन्दुस्तान में आज किसी को अंदाज भी नहीं है। और चुनावी मुकाबलों में जब राजनीतिक दल एक-दूसरे से आगे बढक़र बिजली की अधिक यूनिटें कोटे में देने की बोली लगाती हैं, तो जाहिर है कि खपत भी बढ़ेगी, और कमाई तो खत्म हो ही जाएगी। भारत सहित दुनिया के अधिकतर देशों में इलेक्ट्रिक-गाडिय़ां बढ़ती चल रही हैं, जैसे-जैसे सार्वजनिक जगहों पर चार्जिंग स्टेशन बढ़ेंगे, इन गाडिय़ों का इस्तेमाल भी बढ़ते रहेगा। इससे प्रदूषण भी कम हो रहा है, इसलिए सरकारें इन पर टैक्स की छूट भी दे रही हैं, और इस वजह से भी इलेक्ट्रिक गाडिय़ां बढ़ती चली जानी है। दूसरी तरफ भारत के संपन्न तबके में संपन्नता बढ़ती जाने से एयरकंडीशनरों का इस्तेमाल बढ़ रहा है जो कि बिजली को प्यासे ऊंट की तरह पीते हैं। अभी कल ही बीबीसी पर एक रिपोर्ट है कि चौथाई सदी बाद दुनिया की 70 फीसदी आबादी शहरों में रहने लगेगी, और जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी को बर्दाश्त करना मुश्किल और महंगा होगा, और इमारतों को ठंडा रखने के लिए बिजली की खपत बढ़ेगी। अब अगर शहरीकरण और बिजली-खपत का लगातार बढऩा दिख रहा है, तो यह भी समझने की जरूरत है कि यह बिजली आएगी कहां से, और किस तरह लोगों की मुफ्त की बिजली के इस्तेमाल की आदत को घटाना जरूरी होते चले जाएगा। आज जब इस बरस दुनिया के 60 देशों में चुनाव होने हैं, तो यह सवाल बड़ा नाजायज लग सकता है, और राजनीतिक दलों को यह माकूल नहीं बैठेगा कि वे लुभावनी बातों से परे कुछ और करें। लेकिन अगर सिर्फ अगले चुनाव की सोचकर ही नेता और पार्टियां फैसले लेंगे, तो देश का भविष्य एक गहरे गड्ढे में और नीचे जाते रहेगा।
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