बरसों की बेइंसाफी में भी सुधार की एक गुंजाइश है

 08 दिसंबर 2024

मध्यप्रदेश का एक मामला सामने आया है कि किस तरह कई बरस पहले 21 बरस के एक नौजवान को 9 बरस की एक बच्ची से बलात्कार, और उसके कत्ल को लेकर मौत की सजा सुनाई गई थी, इसके बाद दो और अदालतों ने इस सजा को जारी रखा, लेकिन अभी एक जिला अदालत ने सुबूतों की गलत व्याख्या करार देते हुए इस गरीब व्यक्ति को बरी कर दिया जो कि अब नौजवान से बढ़ते हुए 11 बरस में अधेड़ बनने जा रहा है। 

बीबीसी की एक रिपोर्ट अनोखीलाल नाम के इस शख्स की इस अनोखी दर्दभरी कहानी को खुलासे से बताती है। इसके मुताबिक 2013 में एक बच्ची की लाश मिलती है जिसके साथ रेप भी हुआ था, और कुछ लोगों ने कहा कि अनोखीलाल उसके साथ दिखा था, तो आसपास के लोगों की भारी नाराजगी को देखते हुए पुलिस ने रफ्तार से काम किया था। महीने भर पहले ही दिल्ली में निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था, और एमपी में भी पुलिस और अदालत सामाजिक दबाव के गवाह थे। पुलिस ने कुल 9 दिनों में जांच पूरी कर ली, और उसके बाद कुल 13 दिनों में अदालत में अनोखीलाल को समाज के लिए खतरा बताते हुए फांसी सुना दी। इस गरीब आदिवासी के पास वकील करने के लिए भी पैसा नहीं था, और सरकार की तरफ से उसे मुकदमा शुरू होने के एक दिन पहले ही वकील मिला। पहली अदालत से फांसी की सजा मिलने के बाद यह मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गया, और सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में पाया कि सुनवाई में कई तरह की खामियां थीं। 

जब एक दूसरी अदालत ने भी उनकी फांसी जारी रखी, तो इसके बाद देश में बड़ी और कड़ी सजा पाने वाले कमजोर लोगों को कानूनी मदद देने वाले नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली की एक पहल, प्रोजेक्ट-39ए ने अनोखीलाल की मदद करना शुरू किया, और बरसों की लड़ाई के बाद अब उसे बरी किया गया है। अनोखीलाल अब बाहर की दुनिया को अटपटा पा रहा है, और उसके मन में यह सवाल भी उठता है कि जिंदगी के जो 11 साल बर्बाद हो गए, उसकी भरपाई कौन करेंगे? वे अब मजदूरी करके जिंदगी को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। 

कानून के छात्रों, उनके प्राध्यापकों, और कुछ वकीलों वाला प्रोजेक्ट-39ए ऐसे कई लोगों की मदद कर रहा है। इनमें से एक व्यक्ति की ऐसी ही बहुत लंबी कैद के बाद की रिहाई के बाद उसका इंटरव्यू लिया हमने इस अखबार या हमारे यूट्यूब चैनल के लिए किया था। 

आज देश में कई ऐसे लोग जेलों में हैं जिनकी बरसों से सुनवाई ही शुरू नहीं हो पाई है। दूसरी तरफ कई लोगों के मामले निचली अदालतों से तो निपट गए हैं, लेकिन ऊपर की अदालतों तक का बड़ा लंबा सफर अभी बाकी है। ऐसे में जो कैदी अपने परिवार को चलाने के लिए अपनी मेहनत से ही कमाने वाले रहते हैं, उनके नुकसान की भरपाई कैसे हो सकती है? 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम अपने इस कॉलम, या अखबार के संपादकीय में, या अपने यूट्यूब चैनल पर बहुत बार इस बात को उठाते हैं कि लंबी सुनवाई, और लंबी कैद से गुजरने के बाद अगर कोई बेकसूर साबित होते हैं, तो उनमें से गरीब लोगों को आर्थिक मुआवजा मिलना चाहिए। पैसेवाले लोगों के परिवारों के लिए तो जिंदा रहना किसी तरह मुमकिन हो सकता है, लेकिन जो लोग महज अपनी मेहनत से कमाते हैं, उनके जेल में रहने पर उनका घर तो भूखों मरने की कगार पर पहुंच जाता है। ऐसे गुजरे हुए बरसों की पूरी भरपाई तो बेगुनाही के बाद नहीं हो पाती, लेकिन कुछ हद तक तो मदद की ही जा सकती है। 

जनकल्याणकारी शासन को गरीबों की फिक्र अलग से करनी चाहिए। अभी सुप्रीम कोर्ट ने भी एक आदेश में कहा है कि जो विचाराधीन कैदी उन पर चल रहे मुकदमों में अधिक संभव सजा का एक तिहाई हिस्सा जेल में काट चुके हैं, उन्हें जमानत दिलवाने के लिए जेल अफसर अदालतों में अर्जी लगाएं। इससे विचाराधीन कैदियों को राहत भी मिलेगी, और जेलों में भीड़ भी घटेगी। हम दस-बीस बरस बाद जाकर अदालत से बेगुनाह साबित हुए लोगों के बारे में सोचते हैं, तो उन्हें राहत और मुआवजा सब कुछ दिया जाना चाहिए। सरकार की क्षमता अपार रहती है, उसका बजट भी बहुत बड़ा रहता है, इसलिए वह चाहे तो बेगुनाह साबित लोगों को कैद के दिनों की राहत दे सकती है। 

भारत में प्रचलित कानून के परंपरागत सामंती मिजाज को बदलने की जरूरत है। उसे एक लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी शक्ल देना जरूरी है। अब यह अंग्रेजों का राज नहीं है। आज तो सडक़ हादसों में मरने वालों को भी सरकारी राहत राशि मिलती है, जिनमें से कुछ की तो गलतियां भी हादसों में रहती होंगी। इसलिए अदालत से बेकसूर साबित लोगों को उनकी जिंदगी के इतने गुजरे हुए बरसों का मुआवजा मिलना चाहिए। 

दूसरी तरफ देश के बाकी लॉ स्कूलों को, और वकीलों के संगठनों को भी यह देखना चाहिए कि वे किस तरह सबसे कमजोर तबके के कैदियों की मदद कर सकते हैं। हमने यह बात उस वक्त भी लिखी थी जब सुप्रीम कोर्ट ने एक तिहाई संभावित सजा काट चुके लोगोंं की जमानत भी रिहाई का आदेश दिया था। कुछ हफ्तों पहले उस पर लिखते हुए हमने सुझाया था कि कानून के छात्रों, और नौजवान वकीलों को जेल अफसरों की मदद करके ऐसे कैदियों को जल्द छुड़ाने में हाथ बंटाना चाहिए। 

लेकिन बेकसूर साबित कैदियों को कैद के दिनों का मुआवजा देने के लिए देश में एक नए संविधान संशोधन की जरूरत पड़ेगी, और जनता और जनसंगठनों को सांसदों, और विधायकों के बीच यह चर्चा छेडऩी चाहिए, और सोशल मीडिया पर इसे आगे भी बढ़ाना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

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