06 अक्टूबर 2025
भारत
दानदाताओं से भरा हुआ देश है। तिरुपति के मंदिर की कहानी ही साल में कई बार बड़े-बड़े
अखबारों की खबर बनती है कि किस तरह वहां पर कोई दानदाता सौ-पचास किलो सोना चढ़ा गया,
या किसी एक दानदाता ने वहां कितने करोड़ रूपए नगद दान कर दिए। वहां के अधिकतर दानदाता
अपना नाम उजागर किए बिना दान भेज देते हैं, या सोना, नगदी वहां की पोटली में डालकर
चले जाते हैं। देश के प्रमुख तीर्थों पर और भी जगहों पर ऐसा होता होगा क्योंकि अमृतसर
के स्वर्ण मंदिर में हर दिन करीब एक लाख लोग लंगर में खाना पाकर जाते हैं, और इसका
खर्च कोई न कोई तो उठाते ही होंगे, इस धार्मिक खाने के लिए किसी से कोई पैसा नहीं लिया
जाता। फिर तीर्थस्थानों से परे बहुत से धर्मों के बाबाओं और प्रवचनकर्ताओं को भी ढेरों
दान मिलता है, और लोग धर्म के तुरंत बाद धार्मिक कपड़े हुए, धर्म की बातें करने वाले
लोगों को दान देते हैं।
एक
और किस्म का दान देश में देखने मिलता है जिसमें किसी संस्था या संगठन के लोग उसका बिल्ला
लगाए, उसके गमछे-दुपट्टे या टोपी से लैस होकर, कैमरे और वीडियो रिकॉर्डिंग का इंतजाम
करके दान करने जाते हैं। ठंड में सडक़ किनारे पड़े गरीबों को एक कंबल ओढ़ाते हुए कई
लोग तस्वीर खिंचवाते हैं, और फिर उसे हर सोशल मीडिया खातों में डालते हैं। कई ऐसे फोटो
देखने मिलते हैं जिसमें अस्पताल के बिस्तर पर पड़े मरीज को एक केला थमाते हुए एक दर्जन
लोग उसमें हाथ लगाए रहते हैं, और मरीज हक्का-बक्का सा इस भीड़ को देखते हुए एक केला
पाकर धन्य हो जाता है। अब मामला यहां तक रहता तब भी ठीक था, अभी एक सरकारी अस्पताल
के मरीजों के बीच भाजपा के कई कार्यकर्ता पार्टी के दुपट्टे डाले हुए दिख रहे हैं,
और इस वीडियो में साफ-साफ दिख रहा है कि बड़ा सा मोबाइल थामी हुई संपन्न से परिवार
की दिखती हुई एक महिला पांच-पांच रूपए वाले बिस्किट के पैकेट लेकर चल रही है, अस्पताल
की गरीब महिला मरीज को एक पैकेट थमाते हुए वह तस्वीर खिंचवाती है, और फिर पैकेट को
लेकर अगले मरीज की तरफ आगे बढ़ जाती है। इस महिला मरीज को बस कुछ पल के लिए वह पैकेट
छूने मिलता है। वार्ड में एक साथ भाजपा के दुपट्टों वाले बहुत सारे लोग मरीजों को कुछ
देते, या महज थमाते, और फोटो खिंचाते दिख रहे हैं। वीडियो पोस्ट करने वाले व्यक्ति
ने इसे राजस्थान का बताया है, लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह कहां का है, देश
में कहीं भी यह हाल हो सकता है। कुछ लोगों ने इस वीडियो पर यह भी कहा है कि मरीज महिला
के हाथ में पहले से बिस्किट का पैकेट था, यानी उसे बिस्किट पहले मिल चुका था, और यह
दूसरा पैकेट देते हुए पार्टी की महिला बोल-बोलकर फोटो खिंचवा रही है, और फोटो के बाद
पैकेट लेकर चली जा रही है। इस वार्ड में जितने मरीज हैं, उससे अधिक संख्या में दानदाता
दिख रहे हैं, किसी के हाथ में एक केला है, तो किसी के हाथ में बिस्किट का छोटा सा पैकेट,
फोटो खिंचाने का उत्साह सबमें लबालब है।
सच
जो भी हो, हम तो वीडियो पर जो देख रहे हैं उसी से आज की बात शुरू कर रहे हैं कि दान
की हमारी भावना किस हद तक खुदगर्ज हो गई है कि पांच रूपए की मदद करते हुए भी कैमरे
पर उसे दर्ज करवाना जरूरी लगता है ताकि बाद में उससे शोहरत पाई जा सके। क्या दान और
शोहरत का कोई अनुपात होना चाहिए? साठ रूपए का कंबल देकर हजारों लोगों के बीच अपना प्रचार
करना कहां तक जायज है? इसमें गैरकानूनी तो कुछ नहीं है, लेकिन क्या लोगों की नैतिकता
उन्हें सुझाती कि वे प्रचार के अनुपात में दान भी करें? हम कई जगहों पर कॉलेज और विश्वविद्यालयों
के एनएसएस के छात्र-छात्राओं को देखते हैं जो घास-फूस या झाडिय़ों को आधा-एक घंटा साफ
करते हैं, अपना बैनर टांगते हैं, उसके सामने खड़े होकर फोटो खिंचाते हैं, और रिकॉर्ड
के लिए सामान जुटाकर आगे बढ़ निकलते हैं। जितनी समाजसेवा, उससे अधिक खुद की प्रचारसेवा!
दूसरी तरफ इसी देश में, या दुनिया के दर्जनों दूसरे देशों में किसी भी प्राकृतिक आपदा
के समय सबसे पहले, सबसे आगे बढक़र, पानी में डूब-डूबकर घरों तक खाना पहुंचाने, वहां
से फंसे हुए लोगों को उठा-उठाकर नाव से बाहर निकालने वाले सिक्खों में ऐसा आत्मप्रचार
नहीं दिखता। कुछ कार्यकर्ता खालसा एड नाम की संस्था के टी-शर्ट पहने हुए जरूर दिखते
हैं, लेकिन यह प्रचार के लिए कम, पहचान के लिए अधिक रहता है। भारत की अनगिनत प्राकृतिक
विपदाओं में हमने देखा है कि अगर कोई एक समाज सबसे आगे बढक़र नि:स्वार्थ भावना से बचाव
और सेवा में लगता है, तो वह सिक्ख समाज है। हमने आज तक सिक्खों को अस्पताल में, या
सडक़ पर एक केला देकर फोटो खिंचाते नहीं देखा है। बल्कि दिल्ली जैसे शहर में सडक़ किनारे
कई सिक्ख बैठकर लोगों के पैरों के जख्म धोते हुए दिखते हैं, मरहम-पट्टी करते हुए दिखते
हैं। स्वर्ण मंदिर में भी दुनिया भर से पहुंचे हुए अरबपति सिक्ख भी रसोई में काम करते
हैं, लंगर में खाना परोसते हैं, जूठे बर्तन मांजते हैं, और जूते-चप्पल भी साफ करते
हैं।
लोगों
के भीतर इंसानियत कही जाने वाली उस चीज की इतनी कमी क्यों हो गई है कि बिना कैमरों
के उनकी जेब से पांच रूपए का बिस्किट का पैकेट, या एक केला भी गरीब के लिए नहीं निकलता?
यह बात तो ठीक है कि गरीब की ऐसी मदद हो जाए, और उसके बाद उससे सौ गुना दाम और महत्व
वाला प्रचार ऐसे लालची दानदाताओं को मिल जाए, लेकिन यह बात थोड़ी सी अटपटी लगती है
कि लोगों में थोड़ी सी शर्म भी बाकी नहीं रह गई है? इन लोगों का बस चले तो चौराहों
पर लालबत्ती पर किसी को एक सिक्का देते हुए भी सेल्फी लेने लगें, और उसे सोशल मीडिया
पर पोस्ट करने लगें। जो राजनीतिक या सामाजिक संगठन, या एनएसएस जैसे छात्र संगठन दान
या समाजसेवा के काम में लगते हैं, उनको सबको यह सोचना चाहिए कि उन्होंने त्याग कितना
किया है, मेहनत कितनी की है, और उसके एवज में उन्हें कितना प्रचार पाना चाहिए? अगर
यह अनुपात ध्यान में नहीं रखा गया, तो उसका मतलब तो यही होगा कि गरीब मरीजों के जख्मों
पर ये तथाकथित दानदाता परजीवी कीड़ों की तरह पल रहे हैं, और यह हमारे हिसाब से गर्व
की नहीं, शर्म की बात होनी चाहिए। हमने ऐसे भी लोगों को देखा है जिन्होंने अपने परिवार
के किसी सदस्य के गुजरने पर उसकी देह मेडिकल कॉलेज को दान की, लेकिन श्रद्धांजलि सभा
में उसकी तारीफ में दो शब्द भी कहने से लोगों को रोक दिया। जिस दान का ढिंढोरा पीटा
जाए, वह दान नहीं, जरूरतमंद का शोषण होता है।
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