दीवारों पर लिक्खा है, 15 मई 2021


 

चलो, कोरोना की चर्चा बहुत हुई, कुछ जात-पात की चर्चा हो जाये

  हिंदुस्तान में लोगों की सोच धर्म और जाति के दायरे में कैद रहती है। अधिकतर लोगों से बात करें तो धर्म और जाति के उनके पूर्वाग्रह, उनकी सोच और उनकी बातचीत पर, उनके फैसलों पर हावी रहते हैं। कहीं भी बैठकर लोग बातें करते रहते हैं तो अगर उस भीड़ में मौजूद किसी के हुलिए और उसके नाम से उसके धर्म, या खासकर उसकी जाति, का अंदाज ना लगे तो बहुत से लोग बड़ी असुविधा महसूस करते हैं कि उसे किस जाति का मान कर बात की जाए। और बातचीत इससे भी तय होती है कि वहां मौजूद लोगों में किन जातियों के लोग हैं और किन जातियों के लोग नहीं हैं। इसके अलावा धर्म तो है ही, कि अगर किसी धर्म के लोग मौजूद हैं, तो ही उसके खिलाफ ना बोला जाए और अगर किसी धर्म के लोग नहीं हैं तो उस धर्म की बुराइयां याद करके या गढक़र चर्चा में लाई जाए। ऐसे में अभी एक बड़ा दिलचस्प मामला सामने आया है। पहली पहली नजर में तो ऐसा लगा कि मानो किसी ने कुछ गलत जानकारियां जोड़-घटा कर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की एक पोस्ट तैयार की है, लेकिन फिर एक-एक नाम को परखा गया तो यह समझ आया कि यह तो बहुत ही दुर्लभ केस मामला है।

हिंदुस्तान में आज जिस वैक्सीन की सबसे अधिक मांग है, और जो सबसे अधिक चर्चा है, उस वैक्सीन को बनाने वाले के नाम की चर्चा तो कुछ अधिक ही हो चुकी है और लोगों को यह मालूम है कि कोवीशील्ड नाम की वैक्सीन बनाने वाली सिरम इंस्टीट्यूट नाम की कंपनी का मालिक एक पारसी नौजवान अदर पूनावाला है। अब इस वैक्सीन के लिए एक  खास किस्म के कांच की शीशी भी लगती है और इस शीशी को बनाने वाली कंपनी का मालिक एक और पारसी है, ऋषभ दादाचानजी। पूनावाला भी पारसी और दादाचानजी भी पारसी। अब इसके बाद इन वैक्सीन का ट्रांसपोर्ट करने के लिए जो खास ट्रकें बनाई गई जो कि एक फ्रिज की तरह वैक्सीन को बहुत ही कम टेंपरेचर पर लेकर एक शहर से दूसरे शहर जा सकें वे ट्रकें देश और दुनिया के सबसे मशहूर पारसी, टाटा की बनाई हुई हैं। इन्हें कोल्ड स्टोरेज की तरह का बना कर टाटा ने आनन-फानन देश में उतार दिया। अब यह देखें कि वैक्सीन एक बार पहुंच गईं तो उन्हें कैसे और कहां रखा जाए, तो इसकी तैयारी इस देश में एक और मशहूर पारसी परिवार, गोदरेज की कंपनी गोदरेज अप्लायंसेज के बनाए हुए मेडिकल फ्रीजर वैक्सीन रखने के काम आ रहे हैं। अब बात यहीं पर खत्म नहीं होती है, इन वैक्सीन को सूखी बर्फ के जिन बक्सों में रखा जाता है वे बक्से किसने बनाएं? ये बक्से एक और पारसी फारुख दादाभाई की कंपनी के बनाए हुए हैं। और फिर इन वैक्सीन को कारखाने से लेकर अलग-अलग शहरों तक कौन सी कंपनी मुफ्त में लेकर जा रही है, यह अगर देखें तो गो एयर नाम की कंपनी एक और पारसी की कंपनी है, इसके मालिक वाडिया ने वैक्सीन के मुफ्त ट्रांसपोर्टेशन का काम शुरू किया और जारी रखा है। अब पारसियों में बहुत से लोग अपना नाम मराठी लोगों की तरह शहर के नाम पर रख लेते हैं जैसे अदर पूनावाला। इसी तरह पारसियों में बहुत से लोग अपना नाम अपने पेशे के साथ जोड़ लेते हैं जैसे जरीवाला, बैटरीवाला, बॉटलीवाला, दारूवाला या कोई और काम वाला। पारसियों के सरनेम का मजाक करने वाले, एक सरनेम अपनी कल्पना से बनाकर बीच-बीच में लिखते थे सोडावाटरबॉटलओपनरवाला। लेकिन अगर देखें कि पेशे के हिसाब से सरनेम बनाना है तो अभी जितने सरनेम हमने गिनाए हैं जो कि वैक्सीन बनाने से लेकर पहुंचाने और रखने तक का काम कर रहे हैं, उनकी आने वाली पीढिय़ां अपना सरनेम वैक्सीनवाला भी रख सकती हैं।

यह तो हो गई एक अच्छी बात लेकिन धर्म और जाति को लेकर चर्चा करें तो जरूरी नहीं है कि तमाम चर्चाएं अच्छी बातों के इर्द-गिर्द ही रहें। पिछले दिनों लगातार इस देश में जीवनरक्षक इंजेक्शनों की कालाबाजारी करते हुए लोग गिरफ्तार हुए। दिलचस्प बात यह है कि इस देश में तमाम किस्म के जुर्म करने के लिए जिस जाति को सबसे बदनाम करार देने की कोशिश होती है, उस धर्म या जाति के शायद कोई भी व्यक्ति जिंदगी की इस कालाबाजारी में शामिल नहीं थे, क्योंकि गिरफ्तार होने वाले तमाम लोगों के नाम भी सामने आ रहे थे इसलिए यह बात भी हक्का-बक्का करने वाली थी कि एक सवर्ण कारोबारी जाति के इतने लोग इंजेक्शनों की कालाबाजारी में लगे हुए थे! लेकिन बात यहीं पर नहीं टिकती, जब यह बात निकली कि उत्तर प्रदेश की पुलिस ने एक ऐसे गिरोह को गिरफ्तार किया है जो कि कोरोना मृतकों के शव पर से कपड़े और कफन चोरी करके उनको बाजार में बेचता था, तो उसमें भी ऐसी ही सवर्ण उच्च समझी जाने वाली जातियों के लोगों की भीड़ थी और शायद नमूने के लिए उसमें एक अल्पसंख्यक धर्म का व्यक्ति भी था। इसके बाद देखें तो दिल्ली के जिस खान चाचा नाम के रेस्तरां में सैकड़ों ऑक्सीजन कंसंट्रेटर पकड़ाए, और जिसे खबर में देखते ही देश का एक बड़ा हमलावर तबका खान चाचा की गिरफ्तारी के लिए टूट पड़ा, उसको मुंह की खानी पड़ी, जब पता लगा कि यह नाम केवल रेस्तरां का है, इसका मालिक तो एक पंजाबी है, और पंजाबियों में भी उच्च जाति का माना जाने वाला है, तो फिर खान चाचा नाम को छोड़ देना ही लोगों को ठीक लगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि देश भर में जगह-जगह न सिर्फ इंजेक्शनों की कालाबाजारी बल्कि जीवन रक्षक इंजेक्शन नकली तैयार करके उनको बेचने का धंधा जिन लोगों ने किया था उनमें से कोई भी किसी नीची कही जाने वाली जाति के नहीं थे, वे सब के सब ऊंची कही जाने वाली कारोबारी जाति के लोग थे, और गुजरात से लेकर मध्यप्रदेश के इंदौर तक और दिल्ली से लेकर जाने कहां-कहां तक इस कालाबाजारी में लगे हुए थे। नकली इंजेक्शन बनाकर बेचना तो जिंदगी बेचने से कम कुछ नहीं है। अब हैरानी यह है कि जो जातियां अपने आप में बहुत संगठित हैं, जो जातियां अपने आपमें बहुत धर्मालु हैं  उन जातियों के लोग जब ऐसे तमाम धंधों में शामिल दिखते हैं, तो फिर वैक्सीन के कारोबार में कदम-कदम पर जुड़े हुए पारसी लोग भी दिखते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हिंदुस्तान में पारसियों की कुल आबादी 70 हजार से भी कम है, जिन पर आज 133 करोड़ हिन्दुस्तानियों के टीके टिके हुए हैं!

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 मई 2021


 

डबरे के कीचड़ जितना पारदर्शी रखा है केंद्र ने वैक्सीन का मुद्दा, राज्य सरकारें करें तो क्या करें?

  देश के बहुत से प्रदेशों में वैक्सीन को लेकर हंगामा चल रहा है कि टीकाकरण केंद्रों पर टीके बचे नहीं हैं और लोग नाराजगी जाहिर करके वापिस जा रहे हैं। अब यह जाहिर है कि उनकी नजरों के सामने केंद्र सरकार तो सीधे-सीधे है नहीं, इसलिए वे राज्य सरकारों को कोस रहे हैं, जो कि खुद पैसे लेकर बाजार में खड़ी हैं लेकिन जिन्हें टीके देने के लिए किसी कंपनी की ताकत, या नीयत नहीं बची है। दूसरी तरफ आज की एक अलग खबर है कि 13 राज्यों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैक्सीन खरीदी के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किए हैं. एक अलग खबर यह भी है कि केंद्र सरकार ने यह भरोसा दिलाया है कि इस वर्ष दिसंबर तक हिंदुस्तान की 18 बरस से अधिक की तमाम आबादी को टीके लग चुके होंगे, और केंद्र सरकार ने आंकड़े जारी किए हैं कि अगस्त के महीने तक 50 करोड़ वैक्सीन भारत आ जाएंगी। अब इनसे परे वैक्सीन के मोर्चे पर कुछ और खबरें भी आ रही हैं कि रूसी वैक्सीन जिसे कि भारत में इजाजत मिली है, वह कितने की मिलने वाली है, और दूसरी कौन-कौन सी और वैक्सीन हिंदुस्तान आ सकती हैं, कब तक आ सकती हैं। कल ही राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का यह बयान सामने आया था कि वैक्सीन की अंतरराष्ट्रीय स्तर की खरीदी का काम केंद्र सरकार को करना चाहिए था। अब जब मोदी सरकार ने यह तय कर ही लिया है कि 18 से 44 वर्ष उम्र के लोगों को टीके लगाने का खर्च राज्य सरकारों को करना है, तो राज्यों ने टीके खरीद कर लगाने भी शुरू कर दिए हैं, तो यह बात साफ है कि राज्य सरकारें अपनी जनता का खर्च खुद उठाने के लिए, चाहे कितनी ही मजबूरी में क्यों ना हो, तैयार हो चुकी हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने ना सिर्फ राज्य सरकारों को बल्कि देश की जनता को भी एक ऐसी मँझधार में ले जाकर बिना चप्पू की नाँव में छोड़ दिया है, जहां कि धार में कोरोना का भँवर भी खतरनाक अंदाज में दिख रहा है।

 तालाब जब गर्मियों में सूख जाते हैं तो उनके बीच में बच गई थोड़ी सी कीचड़ में बहुत से लोग उतरते हैं और हाथों से कीचड़ को टटोल-टटोलकर वे मछलियां पकडऩे की कोशिश करते हैं। उतने कीचड़ में मछलियां तैर कर भाग भी नहीं पाती हैं और पकडऩे वालों के हाथ आ जाती हैं। लेकिन इस कीचड़ में दिखता कुछ नहीं है, हाथ को हाथ नहीं सूझता, आंखों से तो कुछ भी नहीं दिखता, और जो होता है वह हाथों से टटोलकर होता है। हिंदुस्तान में आज वैक्सीन के मोर्चे पर हालत कुछ ऐसी ही है। केंद्र सरकार ने पूरे देश को रौंदे हुए कीचड़ में हाथों से मिला दिए गए मिट्टी-पानी की तरह का हाल बना दिया है जिसमें किसी को कुछ सूझ नहीं रहा है. राज्य सरकारें बिना कुछ दिखते हुए कीचड़ में हाथ धंसाए हुए वैक्सीन ढूंढ रही हैं कि कुछ मिल जाए तो अपने प्रदेश की जनता को लगा दिया जाए।

मीडिया के बहुत से लोग वैक्सीन के मोर्चे पर अंतहीन कतारों में लगे हुए लोगों की नाराजगी दिखा रहे हैं। यह नाराजगी जायज इसलिए है कि हर किसी के सिर पर कोरोना से मौत  का खतरा मंडरा रहा है और लोगों को बेचैनी है कि उन्हें वैक्सीन कब लगेगी। लेकिन सवाल यह है कि हिंदुस्तान की राज्य सरकारें किसी सुपर बाजार में जाकर यह वैक्सीन नहीं खरीद सकतीं और न ही अमेजॉन जैसे किसी ऑनलाइन स्टोर पर इसे आर्डर कर सकती हैं। कुछ राज्यों ने और दर्जन भर से अधिक राज्यों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैक्सीन की खरीदी के लिए प्रक्रिया शुरू की है लेकिन वह कब कहां से कितने में मिलकर लोगों को लगना शुरू हो पाएगी यह अंदाज लगाना भी बड़ा मुश्किल है। दूसरी तरफ जब बाकी के राज्य इस तरह से विदेशों से वैक्सीन खरीदी की दौड़ में लगते, उसके पहले आज केंद्र सरकार के आज कहे गए आंकड़े यह बता रहे हैं कि अगस्त तक उसकी आर्डर की हुई 50 करोड़ वैक्सीन आ जाएंगी और दिसंबर तक पूरे देश की वयस्क आबादी को वैक्सीन लग जाएगी। उसने 95 करोड़ आबादी के लिए 216 करोड़ टीके खरीदने की अपनी तैयारी  आज बताई है।  केंद्र सरकार की पेश की गयी इस नई जानकारी के बाद राज्य सरकारें क्या करें? अगर वे महंगे दामों पर कहीं से वैक्सीन खरीद लें तो उन्हें इस तोहमत के लिए तैयार रहना होगा कि केंद्र सरकार की इस घोषणा के बाद भी उन्होंने इतनी वैक्सीन क्यों खरीदी? और भारत के दो वैक्सीन निर्माता कंपनियों में से एक ने आज यहां कहा है कि वह दूसरी दवा कंपनियों के साथ इस वैक्सीन का फार्मूला बांटने के लिए तैयार है ताकि वे भी इसे बना सकें। तो ऐसे में राज्य सरकारें क्या समझें ? जिस कंपनी ने यह घोषणा की है उसने यह वैक्सीन भारत सरकार के संगठन आईसीएमआर की मदद से विकसित की थी और जाहिर है कि सरकार की खर्च में भागीदारी थी और सरकार का इस पर कोई हक भी है। लेकिन यह सब केंद्र सरकार के रहस्य की बातें हैं जिस पर केंद्र सरकार आसमान से बिजली की तरह कडक़ कर अपनी बात कहती है लेकिन जिससे किसी राज्य को कुछ पूछने का हक हासिल नहीं है। 

कुल मिलाकर पिछले 1 महीने में वैक्सीन को लेकर इस देश में जो धुंध छाई है वैसे तो सर्दियों में भी प्रदूषित दिल्ली में नहीं छाती। अब अपने-अपने प्रदेशों में जनता की नाराजगी झेलती हुई राज्य सरकारें क्या करें? केंद्र सरकार से वैक्सीन मांगने का कोई असर नहीं है, केंद्र सरकार को इंपोर्ट करने के लिए कहने का कोई हक नहीं है, और देश के भीतर कब और कंपनियां बनाने लगेंगी, किस रफ्तार से वैक्सीन मिलेगी, इसका कोई ठिकाना नहीं है. ऐसे में हजारों करोड़ खर्च के इस काम को राज्य सरकारें  किस तरह आगे बढ़ाएं यह एक बहुत दुविधा का फैसला है। आज देश की जनता अपने को टीका लगने को लेकर जिस तरह अंधेरे में हैं, उसी तरह राज्य सरकारें भी अंधेरे में हैं कि केंद्र से क्या मिलेगा, बाजार से क्या मिलेगा. केंद्र जो घरेलू खरीद या इंपोर्ट करने की बात कह रहा है, क्या वह उसे राज्यों को बेचेगा या मुफ्त में मिलेगा? बारिश आने के पहले सूखते हुए तालाब, या डबरे में बच गए कीचड़ में मछली पकड़ते हुए लोगों की भीड़ जिस तरह मिट्टी और पानी को मता देती है, कुछ वैसा ही हाल आज देश में टीकाकरण को लेकर केंद्र सरकार ने कर रखा है। कीचड़ जितनी पारदर्शिता !

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 मई 2021


 

छवि बचाना छोडक़र जिंदगी बचाने में लगें प्रधानमंत्री मोदी

  फ्रांस की एक विख्यात कार्टून और व्यंग्य की पत्रिका है चार्ली एब्दो, जिसने दुनिया के मुस्लिमों को नाराज करते हुए मोहम्मद पर कुछ कार्टून बनाए थे, और वह मामला बढ़ते -बढ़ते इतना बढ़ गया था कि फ्रांस में उस पत्रिका के दफ्तर पर आतंकी हमला हुआ और शायद दर्जन भर से अधिक लोग मारे गए थे। लेकिन उस वक्त फ्रांस की सरकार और इस पत्रिका के लोग इस बात पर डटे रहे कि वे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी आतंक के सामने कमजोर नहीं होने देंगे। हालत यह है कि उन्हीं कार्टूनों को लेकर अभी कुछ हफ्ते पहले पाकिस्तान से फ्रांस के राजदूत को निकाल देना के बारे में एक प्रस्ताव पाकिस्तान की संसद में लाया गया, और इस तनाव के पीछे भी चार्ली एब्दो के वे कार्टून ही थे। उस वक्त हिंदुस्तान सहित दुनिया के मुस्लिम विरोधी लोगों ने खूब जश्न मनाया था और इस पत्रिका की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत की थी। हिंदुस्तान में तो कई लोगों के बीच इस पत्रिका के लिए हमदर्दी देखकर लग रहा था कि वे बिना फ्रेंच सीखे भी इसे खरीदना शुरू कर देंग। आज उस पत्रिका का एक कार्टून सामने आया है जिसमें हिंदुस्तान में ऑक्सीजन की कमी से मरते हिंदुस्तानी दिख रहे हैं और यह सवाल किया गया है कि जिस देश में 33 करोड़ देवी देवता हैं क्या उनमें से एक भी ऑक्सीजन पैदा करने की ताकत नहीं रखते? कार्टूनिस्ट ने 33 करोड़ की जगह 33 मिलियन लिख दिया है लेकिन उससे मुद्दे की बात पर कोई फर्क नहीं पड़ता। 

इन दिनों हिंदुस्तान में कार्टूनिस्टों से लेकर कॉमेडियन तक केंद्र सरकार पर जिस तरह से बोल रहे हैं उससे लगता है कि लोगों की धडक़ थोड़ी खुल रही है। कुछ एक टीवी चैनल अपनी बहसों में सत्तारूढ़ गठबंधन के प्रवक्ताओं से कुछ सवाल करने का हौसला सा कुछ दिखा रहे हैं, और लोगों को यह समझ नहीं आ रहा है कि यह सचमुच वापिस आया हुआ हौसले का कोई टुकड़ा है या कि सरकार अपनी साख खत्म हो जाने के बाद कम से कम उस मीडिया की साख बचने देना चाहती है, जो मीडिया आगे चलकर सरकार की साख बचाने का असर बचाकर रख सके। सोशल मीडिया की मेहरबानी से देश के चर्चित और गिने-चुने राजनीतिक विश्लेषकों की बंधी-बंधाई सोच और राय तक सीमित नहीं रहना पड़ता और बहुत से नए नए लोग बिल्कुल ताजा तर्कों के साथ सोशल मीडिया पर नई राय सामने रखते हैं। जो कार्टूनिस्ट कहीं नहीं भी छपते हैं, वे भी दमदार काम करके सोशल मीडिया पर इन दिनों पोस्ट कर रहे हैं। ऐसे में जब एक घनघोर और कट्टर मोदीभक्त फिल्म कलाकार अनुपम खेर मोदी सरकार को देश की आज की नाकामी के लिए जिम्मेदार मानते हुए उससे सवाल करने को जायज मान रहे हैं, तो इससे उन्हीं का एक पुराना टीवी कार्यक्रम याद पड़ता है जिसमें वह बार-बार कहते हैं कि कुछ भी हो सकता है, कार्यक्रम का नाम भी शायद वही था। ऐसा लगता है कि वह ‘कुछ भी’ अभी हो गया है, क्योंकि अभी एक पखवाड़ा ही हुआ है जब एक पत्रकार शेखर गुप्ता के एक ट्वीट के जवाब में देश में गिरती लाशों की चर्चा में अनुपम खेर ने बेमौके की बेतुकी बात ट्विटर पर पोस्ट की थी कि जीतेगा तो मोदी ही। खैर उसके लिए सोशल मीडिया पर उन्हें इतनी धिक्कार मिली कि  उन्होंने उसकी कल्पना भी नहीं की होगी। और जो लोग सोशल मीडिया पर हर नौबत में जीतेगा तो मोदी ही पोस्ट करने के लिए रखे गए हैं, वे लोग भी अनुपम खेर के कुछ काम नहीं आ सके थे। ऐसे में आज जब अनुपम खेर कड़े शब्दों में मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं, और उसे जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, तो इस सरकार के लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि ऐसा समर्पित कार्यकर्ता भी आज साथ नहीं रह गया है।

दरअसल हिंदुस्तान में पिछले वर्षों में मोदी सरकार ने विपक्ष को सुनना, आलोचकों को सुनना, और मीडिया के जिम्मेदार तबके को सुनना, जिस हद तक बंद और खत्म कर दिया था, वही वजह थी कि देश में नौबत बिगड़ती चली गई, और सरकार के लोगों ने यह मान लिया था कि आलोचना का तेवर रखने वाले विपक्षी नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, मीडिया या दूसरे लेखक कलाकारों की कोई बात तो सुनना ही नहीं है, क्योंकि ये सारे ही लोग टुकड़ा-टुकड़ा गैंग हैं और देश के दुश्मन हैं, गद्दार हैं, पाकिस्तान भेज दिए जाने के लायक हैं। जब आप देश के इतने बड़े सोचने-विचारने वाले, जिम्मेदार, देशभक्त, और समाज में समरसता चाहने वाले तबके को गद्दार कहकर खारिज कर देते हैं और उसकी किसी भी बात को नहीं सुनते हैं, तो आपके सिर पर आसमान से जब बिजली गिरते रहती है तो भी इस तबके की कही गई सावधानी सुनाई नहीं पड़ती है। 

दरअसल लोकतंत्र में तमाम लोगों को सुनना बंद कर देना अच्छी बात इसलिए नहीं है कि अगर संसदीय बाहुबल ऐसा करने की छूट भी देता है तो भी सरकार सबको अनसुना करके सिवाय गलतियां करने और सिवाय गड्ढे में गिरने के और कुछ नहीं कर पाती। इसी सरकार की यह बात नहीं है जो भी ऐसी सरकार हो जो कि आलोचना को बिल्कुल भी बर्दाश्त ना कर सके, वह अपनी मनमानी ताकत से मनमाने काम जरूर कर सकती है, लेकिन न मुसीबत से बच सकती है और न किसी खतरे से। भारत में आज नौबत यही है। 

आज यही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि हिंदुस्तान में कोरोना के इस दूसरी लहर के पीछे इस देश में राजनीतिक और धार्मिक जमघट भी जिम्मेदार हैं जिनमें लोगों को बड़ी संख्या में संक्रमण फैला। अब देश का एक तबका ऐसा है जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की राय को भी एक विदेशी, भारत विरोधी संगठन करार देते हुए खारिज कर सकता है, लेकिन यह वही तबका होगा जो कल तक मोहम्मद पर बनाए गए कार्टूनों पर खुशी मना रहा था, और आज 33 करोड़ हिंदू देवी देवताओं की नाकामी पर बनाए गए इस कार्टून पर जिसके पास कहने को कुछ नहीं है। आज हम किसी एक मुद्दे पर बात नहीं कर रहे हैं बल्कि देश और दुनिया के अलग-अलग तबकों की कही हुई बातों को सुनने की सरकार की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर बात करना चाहते हैं कि कितने भी बहुमत से चुनकर आई हुई कोई सरकार, लोगों के बहुत बड़े तबके की बातों को पूरी तरह अनसुना करके कहीं से लोकतांत्रिक काम नहीं कर सकती। उसे मनमाना सरकारी काम करने का जनादेश तो चुनाव में मिला है, लेकिन कोई चुनावी-जनादेश सरकार को लोकतंत्र के प्रति, जनता के प्रति, जवाबदेही खत्म करने का कोई अधिकार नहीं देता है। आज हिंदुस्तान में केंद्र सरकार को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि आज जब उसके खुद के अनुपम खेर किस्म के घरेलू लोग हालात को इतना नकारात्मक बता रहे हैं, तो अब इस हालात को सकारात्मक दिखने की और कोशिश करना ठीक नहीं होगा।  हम अनुपम खेर के शब्दों को ही दोहराना चाहेंगे जिसमें उन्होंने कहा है, सरकार के लिए अपनी छवि बचाने से ज्यादा जरूरी लोगों की जान बचाना होना चाहिए, उन्होंने कहा है कि इमेज बनाने के अलावा जिंदगी में और भी बहुत कुछ है, उन्होंने यह भी कहा है कि जिस काम के लिए चुना गया है वही काम करे सरकार। हम इन तीनों बातों को देश के तीन प्रमुख अखबारों की सुर्खियों से लेकर यहां लिख रहे हैं,  भीतर की खबर में उन्होंने बहुत कुछ और कहा है, और क्योंकि यह एक टीवी इंटरव्यू में कहा है इसलिए इससे मुकरने का कोई खतरा हमें नहीं दिखता। अनुपम खेर की बात को सुनकर इस सरकार को अब वही करना चाहिए जो किसी एक घरेलू शुभचिंतक की कही हुई बात पर करना चाहिए। हमारे कम लिखे को सरकार अधिक पढ़े, और अनुपम खेर की कही बातों को बार-बार पढ़े।

(Daily Chhattisgarh)

वारों पर लिक्खा है, 12 मई 2021


 

यह वक्त दूसरों की मदद का है अपने-आप में सिमटने का नहीं

  दुनिया के विकसित देशों के कुछ वीडियो बीच-बीच में सोशल मीडिया पर चलते हैं जिनमें किसी रेस्तरां, फूड कॉर्नर, कॉफी शॉप में लोग जाते हैं, काउंटर पर भुगतान करते हैं और कहते हैं, दो कॉफी, एक सस्पेंडेड। ऐसे वीडियो बतलाते हैं कि कुछ देर बाद कोई गरीब, बेघर या जरूरतमंद दिखते हुए लोग वहां पहुंचते हैं, और काउंटर पर पूछते हैं कि क्या कोई सस्पेंडेड कॉफी है ? और काउंटर से उन्हें या तो कुछ देर इंतजार करने कहा जाता है, या तुरंत उन्हें कॉफी या कोई दूसरा नाश्ता दिया जाता है। यह पूरा सिलसिला बड़ा दिलचस्प है और यह यूरोप के कुछ देशों से शुरू हुआ है। वहां पर कई लोग जब खाने पीने का सामान लेने जाते हैं तो जरूरतमंदों की मदद करने के लिए अपने खरीदे सामान से अधिक का भुगतान करके आते हैं, और वहां आर्डर देते समय ही बता देते हैं कि कितना सामान उन्हें ले जाना है और कितने सस्पेंडेड सामान का भी भुगतान करके जा रहे हैं। इन रेस्त्रां के कारोबारी भी ऐसी समाजसेवा को बढ़ावा देते हैं क्योंकि इससे उनकी खुद की एक सामाजिक जिम्मेदारी पूरी होती है, वे गरीब जरूरतमंद की मदद में एक जरिया बन जाते हैं और फिर उनका खुद का कारोबार तो इससे बढ़ता ही है। लेकिन यह वीडियो सिर्फ पश्चिमी देशों का हो ऐसा भी नहीं है। हिंदुस्तान में ही मुंबई में मुस्लिम बस्तियों में निकलें तो फुटपाथ पर रेस्तरां के सामने बहुत से गरीब लोग एक कतार में एक उकडू बैठे हुए दिखते हैं। इन्हें रेस्तरां के काउंटर पर बैठा आदमी गिनती बताकर बुलाता है और भीतर बिठाकर खिलाता है। इस बारे में पता लगता है कि कोई रहमदिल दानदाता अपनी मर्जी की गिनती के लोगों के लायक खाने के पैसे जमा कर जाते हैं, और फिर रेस्त्रां मालिक किस्तों में ऐसे लोगों को बुलाकर, बिठाकर खिला देते हैं।

लोगों की मदद करने के बहुत से तरीके होते हैं, हिंदुस्तान में बहुत बड़े हिस्से में यह भी प्रचलन में हैं कि खाना बनना शुरू हो तो पहली रोटी गाय की बनती है और आखिरी रोटी कुत्ते की। इसके बाद ऐसा भी कहा जाता है कि कामयाब रसोई वही होती है जिसमें घर के लोगों के खाने के बाद भी अचानक आ गए मेहमान, या भूखे के लायक भी खाने के लिए बचा रहना चाहिए। बहुत से लोग अभी लॉकडाउन के बीच में अपने दुपहिए पर या अपनी कार में जानवरों के खाने की तरह-तरह की चीजें लेकर निकलते हैं, कहीं गाय-कुत्ते को रोटी डालते हैं, तो कहीं किसी और जानवर को किसी तरह की सब्जी खिलाते हैं। ऐसा इसलिए भी कर रहे हैं कि इन दिनों सभी तरह के होटल, ढाबे, रेस्तरां बंद हैं और वहां से इन जानवरों को खाने जो मिल जाता था वह अभी बंद हो चुका है। इसलिए लोग जरूरतमंदों की मदद के बहुत से तरीके सोचते हैं और काम करते हैं।

आज कोरोना की बीमारी के इस खतरे के बीच भी बहुत से ऐसे सामाजिक संगठन है जो बीमारों को अस्पताल पहुंचाने से लेकर अस्पताल से लाश घर पहुंचाने तक के काम में जुटे हुए हैं, और अगर किसी के पास भुगतान करने की ताकत है तो वह भुगतान कर दें, और ताकत नहीं है तो उसे मुफ्त भी पहुंचा कर आते हैं। कल ही सोशल मीडिया पर एक ऐसे डॉक्टर की तस्वीर आई है जिसकी बीपी की मशीन और स्टेथोस्कोप टेबल पर है, और उसने नोटिस लगा रखा है कि जब तक लॉकडाउन चल रहा है, दवा के दाम अपने हिसाब से दें। मतलब यही है कि जिसके पास भुगतान की ताकत नहीं है, वह भुगतान न करें। बहुत से शहरों में मामूली ऑटो रिक्शा वाले ऐसा ही कर रहे हैं और उन्होंने नोटिस लगा रखा है कि मरीज को अस्पताल ले जाने का कोई किराया नहीं लिया जाएगा। कुछ ऑटो रिक्शा महिलाओं से किराया नहीं ले रहे हैं, कुछ बुजुर्गों से किराया नहीं ले रहे हैं। यह पूरा सिलसिला बताता है कि बहुत आम लोगों के मन में भी दूसरों के लिए बहुत कुछ करने का जज्बा है। और जाहिर है कि बहुत से ताकतवर लोग ऐसे हैं जो कि कुछ भी नहीं कर रहे हैं या इतना कर रहे हैं जो कि उनकी छोटी उंगली के कटे हुए नाखून से भी कम है। अभी एक भरोसेमंद खबर आई थी कि किस तरह देश के एक कारोबारी अजीम प्रेमजी ने पिछले एक बरस में करीब 8 हजार करोड़ रुपए का दान दिया है, यानी हर दिन 22 करोड़ ! यह रकम छोटी नहीं होती है, खासकर तब जब इसे मुकेश अंबानी के 100 करोड़ के दान के साथ रखकर देखा जाए। यह वक्त ऐसा है जिसमें बहुत अनपढ़ और मजदूर सरीखे काम करने वाले दानदाता भी अपनी आज की बदहाली के बीच भी किसी के काम आ रहे हैं, और जिनके पास दौलत के पहाड़ हैं वे किस तरह उसमें से पत्थर का एक छोटा सा टुकड़ा उठाकर दुनिया पर एहसान करने के अंदाज में दे रहे हैं।


आज यहां पर इस मुद्दे पर लिखने का एक मकसद यह भी है कि लोगों को अपने-अपने दायरे के भीतर भी दूसरों की मदद के बारे में सोचना चाहिए। और इसकी शुरुआत लोगों को अपने खुद के दायरे से करनी चाहिए कि उनके साथ में काम करने वाले जिन लोगों को उन्हें लॉकडाउन के कारण या बीमारी के डर के कारण, या सचमुच बीमार हो जाने पर छुट्टी देनी पड़ी है, उन्हें वह कम से कम पूरी तनख्वाह तो दे सकते हैं। आज लोगों को अपने निजी काम करने वाले घरेलू कर्मचारियों की तनख्वाह काटने के पहले यह भी सोचना चाहिए कि वे किस तरह जी सकेंगे? अगर उन्होंने खुद होकर छुट्टी नहीं ली है और लॉक डाउन की वजह से वे काम पर नहीं आ सके हैं, या मालिक के घर पर किसी के कोरोनाग्रस्त होने से उन्हें रोका गया या उनके खुद के घर पर किसी के कोरोनाग्रस्त होने से उन्होंने काम पर आना बेहतर नहीं समझा, तो ऐसे में उन्हें तो जिंदा रहने के लिए मदद करना हर सक्षम व्यक्ति की जिम्मेदारी होनी चाहिए। जब इस दायरे में जिम्मेदारी लोग निभा लें, तो उसके बाद उन्हें दूर के लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए कि वह किसके लिए क्या कर सकते हैं. बहुत से घरों में बीमारी के दौरान बहुत से ऐसे मेडिकल सामान इकट्ठा हो जाते हैं जो बात में काम के नहीं रहते, ऐसे वक्त पर किसी सामाजिक संस्था के माध्यम से उन्हें जरूरतमंद लोगों तक तुरंत पहुंचा देना चाहिए। आज हजार-पांच सौ का ऑक्सीमीटर लेना हर किसी के बस की बात नहीं है, और हर कोई तो थर्मामीटर भी नहीं ले पाते। इसलिए आज खाने-पीने के सामान से लेकर दवा और मेडिकल उपकरण तक, अस्पताल पहुंचाने या अंतिम संस्कार में मदद तक, कई किस्म से आप लोगों के काम आ सकते हैं। लोगों को न केवल खुद ऐसा करना चाहिए बल्कि आसपास के दूसरे लोगों को भी मददगार बनने की प्रेरणा देना चाहिए। आज की यह बहुत बड़ी जरूरत है और अगले साल-दो साल तक बीमारी और बेरोजगारी से देश और दुनिया का जो हाल रहना है उसमें यह जरूरत बने रहेगी, लोगों को दूसरों के काम आना सीखना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 11 मई 2021


 

हर्षवर्धन हैं ही ऐसे या फिर मसखरी की कोई लिखी हुई स्क्रिप्ट पढ़ रहे हैं?

  इन दिनों हिंदुस्तान में पार्टियों को चुनाव लडऩे के लिए दूसरे देशों में जाकर प्रचार करना भी समझ आने लगा है। कर्नाटक के चुनाव के वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेपाल के मंदिरों का दिनभर दौरा करके भारत के चुनाव आयोग के शिकंजे से बाहर भी थे, और हिंदुस्तान के हर टीवी चैनल पर भी दिनभर छाए हुए थे। अभी जब बंगाल में चुनाव चल रहा था तो मतदान के वक्त नरेंद्र मोदी बांग्लादेश के मंदिरों में घूम रहे थे और चुनाव आयोग का कोई शिकंजा उन पर नहीं था। नरेंद्र मोदी ने ही यह सिलसिला शुरू किया कि देश के बाहर बसे हुए प्रवासी भारतीयों के बीच चुनाव प्रचार या चंदा अभियान के लिए अमेरिका तक जाकर विशाल कार्यक्रम करना। जब देश में प्रशांत किशोर जैसे पेशेवर चुनावी रणनीतिकार लोकतांत्रिक चुनाव मैनेज करते हैं, और ममता बनर्जी को इतनी बड़ी जीत दिलाने में मददगार रहते हैं, पता नहीं चुनाव में क्या-क्या तरीके आजमाए जाने लगे हैं । ऐसे में चुनावों के बीच में भी कई किस्म के तरीकों का इस्तेमाल दिखता है, जो दिखता तो है लेकिन समझ में आसानी से नहीं आता है।

अब जब कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आलोचनाओं से कुछ अधिक घिरते दिखते हैं तो अचानक केंद्र सरकार के कोई मंत्री कोई ऐसा बयान जारी करते हैं कि हल्के-फुल्के मीडिया का खासा वक्त उसी की आलोचना में निकल जाए या उसकी चर्चा में निकल जाए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन जो कि आज हिंदुस्तान पर छाए हुए सबसे बड़े खतरे और हिंदुस्तान को सबसे बड़ा नुकसान पहुंचा रहे कोरोना से जूझने के लिए अकेले जिम्मेदार मंत्री रहने चाहिए, आए दिन मसखरी की बातें करके खबरों को अपनी तरफ खींचते हैं, और कोरोना के असली खतरे की तरफ से, सरकार की असली नाकामयाबी की तरफ से ध्यान बंटवा लेते हैं। पिछली बार उन्होंने लॉकडाउन और कोरोना के बीच मटर छीलते हुए अपनी तस्वीर पोस्ट की थी, और तबसे लेकर अब तक बीमारी और बचाव को लेकर बहुत ऐसे गैरगंभीर बयान दिए हैं जिससे वह तो खबरों में बने रहे और लोगों का गुस्सा भी ऐसे स्वास्थ्य मंत्री पर निकलते रहा। कुछ ही हफ्ते हुए हैं कि उन्होंने देश के सबसे घाघ कारोबारी रामदेव के फज़ऱ्ी मेडिकल दावों के साथ लांच की गई फज़ऱ्ी दवाओं को सर्टिफिकेट देते हुए मंच से उनका प्रचार किया था। लेकिन क्या वह अनायास ऐसा करते हैं या यह किसी प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार की सोची हुई हरकत रहती है कि प्रधानमंत्री को आलोचना से बचाने के लिए दूसरे लोगों को आलोचना के घेरे में लाया जाए और खबरों को उस तरफ मोड़ा जाए?

 अभी इसी स्वास्थ्यमंत्री हर्षवर्धन का ताजा बयान है कि कोरोना संबंधित तनाव दूर करने के लिए लोगों को 70 फ़ीसदी कोको कंटेंट वाली डार्क चॉकलेट खाना चाहिए। आज जहां इस देश में लोगों के रोजगार छिन गए हैं, लोग बिना तनख्वाह, बिना मजदूरी घर पर बैठने को मजबूर हैं, जहां केंद्र और राज्य सरकार के दिए हुए बहुत सस्ते या मुफ्त अनाज की वजह से लोग भूखे मरने से बच रहे हैं, वैसे में इस देश का स्वास्थ्य मंत्री लोगों को डार्क चॉकलेट खाने के लिए कह रहा है, ताकि वे कोरोना के तनाव से बच जाएँ! इस देश की 90 फ़ीसदी आबादी ऐसी महंगी चीज खरीदने की ताकत से परे है, और इस देश की 99 फ़ीसदी आबादी ने कभी डार्क चॉकलेट का नाम भी नहीं सुना होगा। यह कुछ उसी किस्म की बात है कि लोगों को प्रदूषण से बचने के लिए घरों को एसी करवा लेने और महंगे एयर क्लीनर लगवा लेने, और एयरकंडीशंड कार में चलने की नसीहत दे दी जाए। कई बार यह भी लगता है कि क्या कोई केंद्रीय मंत्री सचमुच इतना बेवकूफ हो सकता है कि वह ऐसी संवेदनाशून्य बातें करे? या फिर उसे बेवकूफी की ऐसी स्क्रिप्ट तैयार करके दी जाती है कि लोगों का ध्यान उसी की तरफ चले जाए? यह समझ पाना हमारे लिए नामुमकिन है क्योंकि इन दिनों जिस तरह से कोई राजनीतिक दल लाखों लोगों को सोशल मीडिया पर अपने भाड़े के मजदूरों की तरह इस्तेमाल कर सकता है, कर रहा है, वैसी बातें 10 बरस पहले तक किसने सोची थीं ? इसलिए आज जब देश के मीडिया का अधिकतर हिस्सा सत्ता का गोदी मीडिया होने का सार्वजनिक का तमगा पाकर भी उस कामयाबी पर खुश है, गौरवान्वित है, तब फिर ऐसे मीडिया की मदद से किसी गढे हुए बयान को इस्तेमाल करके आलोचनाओं को दूसरी तरफ मोडऩा एक सोचा-समझा काम भी हो सकता है? 

आज हम महज इसी एक मुद्दे पर शायद नहीं लिखते, लेकिन बिहार से एक दूसरा मामला सामने आया है जिसमें वहां के भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी खबरों के घेरे में हैं कि किस तरह उन्होंने अपनी सांसद निधि से खरीदी हुई दर्जनों एंबुलेंस बिना ड्राइवरों के खड़ी रखी हैं। बिहार के ही एक दूसरे बाहुबली यादव नेता पप्पू यादव ने इस मुद्दे को जोरों से उठाया, और आज बिहार सरकार ने कोरोना मरीजों के लिए दौड़-दौडक़र घूम-घूमकर काम करते हुए पप्पू यादव को गिरफ्तार कर लिया कि वे लॉकडाउन के नियम तोड़ रहे हैं। अब बिहार के कुछ लोगों का यह मानना है कि नीतीश कुमार ने ऐसा करके एक तरफ तो राज्य के सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए के एक भाजपाई नेता राजीव प्रताप रूडी को परेशानी में डाल दिया है क्योंकि पप्पू यादव का मामला जितना उठेगा उतना ही रूडी का निकम्मापन दिखेगा। दूसरी तरफ लालू यादव के जेल से बाहर आते ही उन्हें हीरो की तरह खड़े होने का मौका न देकर एक दूसरे यादव को गिरफ्तार करके उसे हीरो बनाया जा रहा है तो क्या यह भी नीतीश कुमार की एक और चाल है ? और क्या वे एक तीर से दो निशाने साध रहे हैं? बिहार के कुछ पत्रकारों ने इस किस्म की अटकल लिखी है जिसका कोई सुबूत तो हो नहीं सकता है लेकिन राजनीतिक अटकलें तो ऐसी ही लगती हैं। अब अगर नीतीश के इस काम को देखें जो कि जाहिर तौर पर अटपटा लग रहा है कि लॉकडाउन में रात-दिन लोगों की मदद करते पप्पू यादव को गिरफ्तार किया गया है, और दूसरी तरफ हर्षवर्धन इस बीमार देश की बेरोजगार और गरीब जनता को देश की सबसे महंगी आयातित डार्क चॉकलेट खाने का सुझाव देने की मसखरी कर रहे हैं । अब इसे क्या कहा जाए क्या नेता सचमुच इतने बेवकूफ हो सकते हैं कि घर में चावल ना हो तो बादाम खाकर पेट भरने की सलाह दे दे? यह देश की जनता पर भी है कि वह सोचे कि आज के हालात के जिम्मेदार कौन लोग हैं, कटघरे में किसे होना चाहिए, और उनकी तरफ नजरें ना जाएं इसलिए कुछ दूसरे लोग फुटपाथ पर खड़े होकर मदारी की तरह हरकतें कर रहे हैं, तिलिस्मी ताबीज बेचने जैसी हरकतें कर रहे हैं। यह सिलसिला मासूम लगता तो नहीं है, आगे प्रशांत किशोर जैसे किसी पेशेवर को हकीकत मालूम होगी।

(Daily Chhattisgarh)