02 अगस्त 2026

भारत में इन दिनों डिजिटल तकनीक की मेहरबानी से कई तरह के काम ऑनलाईन होते चले गए हैं। सरकार के भी, संसद या विधानसभाओं के भी, और अदालतों के भी। लोग अब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कई किस्म की कार्रवाई ऑनलाईन देख सकते हैं, वादी-प्रतिवादी यह भी देख सकते हैं कि उससे फीस लेने वाले वकील ने अदालत में कितनी मेहनत से बहस की, या नहीं की। जनता संसद और विधानसभा की कार्रवाई का कुछ हिस्सा देखकर यह जान सकती है कि उसके निर्वाचित नेता वहां पर कितनी मेहनत कर रहे हैं, या सदन में बैठते ही नहीं हैं। लेकिन सरकार में छोटी-छोटी सी जानकारी को हासिल करने के लिए लोगों को सूचना के अधिकार के तहत महीनों तक धक्के खाने पड़ते हैं क्योंकि सरकारी अमला अपने कब्जे की कोई भी जानकारी बाहर निकलने नहीं देना चाहता, क्योंकि जानकारी बाहर निकली, तो कई तरह के राज बाहर निकल जाएंगे, और राज-काज के धंधे में किसी को राजदार बनाना घाटे का सौदा होता है।
हिन्दुस्तान में यूपीए सरकार के समय से सूचना का अधिकार लागू हुआ है, इसके लिए कई सामाजिक आंदोलनकारियों ने बड़ी मेहनत की थी, जिनमें यूपीए मुखिया सोनिया गांधी के आसपास के लोग भी शामिल थे, और उसी वक्त सूचना के अधिकार को लेकर एक कड़ा कानून बना था, जो कि संसद से इसलिए आसानी से और तेजी से पास हो गया था कि लोगों को उसका खतरा समझ नहीं आया था। अब जब सूचना का अधिकार सरकारी ढांचे में सूचना का हथियार माना जाने लगा है, तो सरकारी लोगों का रूख जनता के इस बड़े औजार के लिए एकदम बदल गया है। आरटीआई कानून बेजा इस्तेमाल होता है, यह कह-कहकर सरकार के लोगों ने इसे बदनाम करने की बड़ी कोशिशें कीं, लेकिन इसी आरटीआई से निकली जानकारी से देश-प्रदेश के कई सबसे बड़े भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ भी हुआ।
हमने पिछले बरसों में लगातार इस बात को लिखा कि आरटीआई को राईट टू इंफर्मेशन के बजाय रिस्पॉसिबिलिटी टू इंफॉर्म किया जाना जरूरी है, ताकि जनता इसके लिए अर्जी लगाकर, एक रकम जमा कर अपने हक की जानकारी मांगने धक्के न खाती रहे। अब जब भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों में शासन-प्रशासन का बहुत सारा काम ऑनलाईन हो रहा है, एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के बीच, या एक ही दफ्तर के भीतर भी, फाइलें ऑनलाईन आती-जाती हैं, तो क्या जनता को इन फाइलों तक पहुंच देना ठीक होगा? कम्प्यूटरों की व्यवस्था में यह इंतजाम बड़ा आसान रहता है कि किसी को लिखने की छूट देना, किसी को सिर्फ पढऩे की छूट देना, और किसी को डाउनलोड करके प्रिंट करने की भी। क्या सरकार का जो-जो कामकाज सूचना के अधिकार के तहत जनता की पहुंच के भीतर का रखा गया है, क्या सरकार खुद होकर भी उस तक ऑनलाईन पहुंच की छूट जनता को दे सकती है? उस फाइल तक, उस कागज तक जाना, उसकी प्रतिलिपि पाना जब जनता का हक है, और जब वह कागज सरकार के अपने भीतरी, घरेलू कामकाज के लिए ऑनलाईन है, तब उसे जनता की पहुंच में ला देने में कौन सी गोपनीयता खत्म हो जाएगी?
इस बारे में दुनिया के कुछ दूसरे देशों की मिसाल ढूंढी गई, तो पता लगा कि लोकतांत्रिक देशों में पिछली आधी सदी में जगह-जगह यह सोच बढ़ी है कि सरकार नागरिकों से जानकारी छिपाने के बजाय अधिकतर जानकारी खुद सार्वजनिक करे। आज विश्व बैंक और कई लोकतांत्रिक देशों के प्रशासन-विशेषज्ञ इसे आधुनिक शासन की एक जरूरी बुनियाद मानते हैं। इस बारे में मामूली रिसर्च से पता लगा कि दुनिया में सरकारी पारदर्शिता की सबसे पुरानी परंपरा स्वीडन की है जहां 1766 में ही सरकारी दस्तावेजों तक नागरिकों की पहुंच का सिद्धांत मंजूर किया गया था, और बाद में इसे संविधान में जोड़ा गया। इसका मूल सिद्धांत यह है कि जब तक सरकार कोई कानून बनाकर किसी विशेष कारण से किसी किस्म के दस्तावेज को गोपनीय रखना जरूरी साबित न करे, तब तक हर सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक रहना चाहिए। इसके बगल के फिनलैंड में पारदर्शिता का एक नया मॉडल बनाया गया, जहां लोगों को आवेदन देने की नौबत ही न आए, इसलिए सरकार के अधिकतर दफ्तर अपने अधिकतर दस्तावेज खुद ही ऑनलाईन डाल देते हैं, जिसे देखना हो देख लें। इस बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि यह सूचना के अधिकार से भी आगे की व्यवस्था है, क्योंकि इससे सरकार पर व्यक्तिगत आवेदनों का बोझ घट जाता है। पूर्वी योरप के एक और देश एस्टोनिया में जनता अधिकतर सरकारी कामकाज ऑनलाईन देख पाती है, और इससे सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही भी बढ़ती है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की सिफारिशों में बार-बार यह कहा गया है कि सरकार जानकारी मांगने का इंतजार न करे, जो जानकारी सार्वजनिक हो सकती है, उसे खुद प्रकाशित करे।
हमारा यह भी मानना है कि अब प्रकाशन का मतलब कागज पर कुछ छापने जैसा खर्चीला नहीं रहता, अब तकरीबन बिना किसी लागत और खर्च के सरकार अपनी सारी जानकारी ऑनलाईन कर सकती है। अब केन्द्र सरकार के एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके अधिक से अधिक राज्य ई-फाइलिंग प्रणाली पर काम कर रहे हैं। किसी जिले का कलेक्टर किसी फाइल को ऑनलाईन राजधानी में सचिव को भेज सकते हैं, सचिव उस पर अपने विभाग से ऑनलाईन जानकारी और राय ले सकते हैं, वे फाइल को वापिस नीचे या ऊपर भेज सकते हैं, और उसे मंत्री या मुख्यमंत्री तक की मंजूरी कुछ मिनटों में मिल सकती है। ऐसी तकनीकी सहूलियत के लिए पूरी की पूरी फाइल, उसके हर पन्ने को ऑनलाईन भेजा जाता है। अब जब यह पूरी जानकारी ऑनलाईन है, और जनता के सूचना के अधिकार के तहत उसे यह जानकारी कागज पर हासिल करने का हक है, तो इस हक को सीधे-सीधे फाइल पढऩे, और उसके पन्नों को डाउनलोड करके प्रिंट करने का हक क्यों नहीं दे दिया जाता?
सरकारी गोपनीयता के हिमायती लोगों का कहना है कि जिस तरह अभी भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग के चुनिंदा टुकड़े पोस्ट करने या फैलाने पर रोक लगाई है, वैसी नौबत सरकारी फाइलों के साथ भी आ सकती है कि लोग उसके चुनिंदा पन्ने को फैलाकर सरकार, किसी अफसर, या किसी कंपनी को बदनाम करें। यह तर्क फिजूल का इसलिए लगता है कि यही काम कोई भी नागरिक सूचना के अधिकार के तहत इन्हीं सारे कागजों को हासिल करके प्रतिलिपियों के गट्ठे में से चुनिंदा पन्ने निकालकर भी कर सकते हैं। हजार पेज के जवाब में से वे पसंद के दो पैरा निकालकर एक नजरिया गढ़ सकते हैं। फिर ऑनलाईन तेजी से ऐसी पहुंच हो जाने से क्या फर्क हो जाएगा?
फाइलों को ऑनलाईन करने के विरोधियों का यह तर्क है कि हर पल, हर फाइल तक लोगों की पहुंच रहने से उन फाइलों पर टिप्पणियां करने वाले, फैसले लेने वाले अफसरों पर एक मानसिक दबाव रहेगा, और वे खुलकर अपनी राय फाइलों पर नहीं लिख सकेंगे। इस पर, बहस के लिए, हमारा तर्क यह है कि जब ऐसी टिप्पणियों वाले पन्ने, और ऐसे फैसले सूचना के अधिकार में जनता हासिल कर ही सकती है, तो इसे ऑनलाईन मुहैया कराने का हक कौन सा अतिरिक्त खतरा खड़ा करेगा? बस यही तो है कि लोग महीनों तक धक्के खाने से बचेंगे, आरटीआई की अपीलों के सालों तक चलने वाले दौर से बचेंगे, और संविधान की भावना के अनुरूप जानकारी जल्दी पा जाएंगे, इससे अगर कोई भांडाफोड़ होना है, तो वह जल्दी हो जाएगा, कोई नया भांडा तो नहीं फूटेगा।
लोकतंत्र जानकारी मांगने का अधिकार नहीं होना चाहिए, लोकतंत्र जानकारी देने की जिम्मेदारी होना चाहिए। अभी तक यह तो हो सकता था कि सरकारी ढांचे के हर पन्ने को ऑनलाईन डालने जितनी क्षमता सरकारी अमले की नहीं है। लेकिन अब ई-फाइलिंग अनिवार्य होते चलने से चूंकि सारी फाइल ऑनलाईन है ही, इसलिए उसमें से जो फाइलें आरटीआई के तहत जनता की पहुंच के भीतर की हैं, उन्हें खोल दिया जाए। क्यों आज लोगों को सरकारी दफ्तर पहुंचकर पोस्टल ऑर्डर के साथ अर्जी लगाने पर मजबूर किया जाए, फिर महीनों तक घुमाने के बाद उन्हें अपील करने कहा जाए, और फिर अपील खारिज होने पर और ऊपर तक अपील करने कहा जाए, और फिर राज्य सूचना आयोग से अपील खारिज होने पर राष्ट्रीय सूचना आयोग भेजा जाए। देश में आरटीआई की परिभाषा में तकरीबन तमाम चीजें एकदम साफ हैं कि उन्हें जनता की पहुंच में रखा गया है, या किसी गोपनीयता या राष्ट्रीय सुरक्षा की वजह से जनता से परे रखा गया है। हम तो महज जनता की पहुंच की बातों को बिना आरटीआई प्रक्रिया के जनता की ऑनलाईन पहुंच में कर देने की बात कह रहे हैं। हिन्दुस्तान को डिजिटल करने की सोच भी सैद्धांतिक रूप से तो यही सुझाती है कि सूचना का अधिकार इस तकनीक के साथ जोड़ दिया जाए, और राजा और प्रजा, दोनों ही गैरजरूरी मशक्कत से बचाया जाए। क्या पारदर्शिता सचमुच ही इतनी डरावनी होती है कि जनता किसी फाइल को देखती रहे, तो अफसर या मंत्री उस पर सही टिप्पणी करने से डरें? इस संदर्भ में प्रेमचंद की लिखी एक विख्यात लाईन याद आती है- बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न करोगे?
ईमान की बात को पारदर्शिता करके फिर इस वाक्य को पढक़र देखें।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें