देश आजाद होने का मतलब यह नहीं कि वे राजा नहीं, और आप प्रजा नहीं!

02 अगस्त 2026  

 

ठोस घटनाओं पर लिखना कुछ आसान होता है, लोगों की जानकारी में भी उसके तथ्य रहते हैं, खुद भी तुरंत पढ़ा हुआ रहता है, और संदर्भ अधिक बखान करने की जरूरत नहीं रहती। लेकिन कई बार हमारी कोशिश रहती है कि कुछ ऐसे अमूर्त मुद्दों को उठाया जाए जो कि आमतौर पर आंखों से ओझल रहते हैं, लेकिन जिंदगी के लिए मायने बहुत रखते हैं। ऐसा ही एक मुद्दा भारत में राजा और प्रजा का है। कहने के लिए तो लोकतंत्र के आने के साथ ही ये दोनों शब्द खत्म हो जाने चाहिए थे, लेकिन आज सरकारों में बैठे हुए लोग, न सिर्फ बड़े लोग, बल्कि छोटे से छोटे लोग भी अपने को राजा समझते हैं, और वहां पहुंचने वाली, टैक्स देने वाली जनता को प्रजा समझते हैं। नतीजा यह होता है कि असल हिन्दुस्तान के सरकारी दफ्तर एक टीवी सीरियल ‘ऑफिस-ऑफिस’ की तरह हो जाते हैं, और जनता मुसद्दीलाल बनी फिरती रहती है। लेकिन हम बात सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार तक सीमित रखना नहीं चाहते, सरकार इससे परे भी कई और किस्म से जनता का शोषण करती है, आज उन्हीं पहलुओं पर थोड़ी सी चर्चा हो जाए। 

भारत में लोग अस्पताल जाएं, किसी सरकारी दफ्तर, या जेल में किसी कैदी से मिलने के लिए, जमीन की रजिस्ट्री कराने जाएं, राशन लेने जाएं, या प्रॉपर्टी टैक्स पटाने, सरकार का रूख जनता के लिए ऐसा रहता है कि जनता की जिंदगी का सरकार मनचाहा इस्तेमाल कर सकती है। वह कभी राशन की कतार में लगा सकती है, कभी रेलवे टिकट की कतार में, कभी गैस सिलेंडर की बहुत लंबी कतार में, कभी टैक्स पटाने के लिए बैंक के चालान काउंटर की कतार में। ऐसा लगता है कि कतार में रहने वाले लोगों का देश के पास  और किसी तरह का इस्तेमाल ही नहीं है, उनकी कोई उत्पादकता ही नहीं है, और बाकी की पूरी जिंदगी भी वे अगर कतार में रहेंगे, तो भी इस देश पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अपनी ही जनता के वक्त की ऐसी बर्बादी से बेफिक्र सरकार दरअसल गैरजिम्मेदार सरकार भी होती है, जो कि अपने नागरिकों की क्षमताओं, और संभावनाओं को बर्बाद करने से परहेज नहीं करती।


सरकार में दरअसल लंबी कतार लगवाने के पीछे एक बड़ी जाहिर किस्म की बदनीयत भी रहती है। कई लोग अपनी निजी मजबूरियों के चलते कतारों में वक्त बर्बाद नहीं कर पाते, और वे फिर ऐसे रास्ते ढूंढते हैं कि काम जल्दी निपट जाए। यहीं पर सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोग बेचेहरा दलालों का इस्तेमाल करके काम को जल्दी करने के लिए वसूली-उगाही करते हैं, और जनता अपने समय को बचाने के लिए यह रिश्वत देने को मजबूर हो जाती है। कई जगहों पर तो यह कारोबार इतना व्यवस्थित हो जाता है जितना व्यवस्थित तो सरकारी काम भी नहीं होता। सरकार की कोई जवाबदेही नहीं होती, वह संसद, विधानसभा, या अदालत में बहुत बुरी नौबत आने पर भी अधिक से अधिक छुपाते हुए कम से कम जानकारी देकर बचने के हुनर में माहिर हो चुकी रहती है, और नियमित कामकाज के लिए वसूली-उगाही को साबित करना तब तक मुमकिन नहीं हो पाता, जब तक किसी को रंगे हाथों न पकड़ लिया जाए, या कोई स्टिंग ऑपरेशन न किया जाए। 

हमेशा से ही कुछ अखबार, टीवी चैनल, या कुछ समाचार वेबसाइटें वसूली-उगाही के स्टिंग ऑपरेशन करते आए हैं, और जिनके खिलाफ सुबूत दर्जे की बातें दर्ज हो पाती हैं, उनमें से कुछ पर ढीली-ढाली कार्रवाई अगर हुई, तो होती है, अमूमन कुछ नहीं होता। ऐसे में सरकारी दफ्तरों में हर काम के लिए कतार लगवाना मुनाफे का कारोबार होता है, और सीमित दिन, सीमित घंटे, सीमित काउंटर, और उन पर भी असीमित लंच-अवर से लोगों की मजबूरी बढ़ती चलती है। फिर जब देश की संस्कृति में लोगों से कतार लगवाकर उगाही करने की बात घर कर जाती है, तो फिर जहां उगाही नहीं होना है, वहां भी कतार लगवाने की संस्कृति विकसित हो जाती है। सरकारें यह परवाह नहीं करतीं कि उसे बिजली का बिल जमा करवाना है, या लाखों रूपए फीस मिलने वाली रजिस्ट्री करनी है, हर जगह काम को धीमा किया जाता है, सर्वर ठप्प हो जाने का बहाना बनाया जाता है, और अधिक से अधिक देर की जाती है। किसी अस्पताल में पर्ची बनवाने के लिए पांच-पांच रूपए फीस लेकर कतार में लगे हुए लोगों को जब वक्त बहुत अधिक लगने लगता है, तो ऊपर से दस-बीस रूपए लेकर पर्ची बनवा देने वालों का कारोबार पनपता है। अदालत में मामले की अगली पेशी जल्दी देने, या देर से देने, किसी दिन सुनवाई न करने, या किसी एक वकील के मौजूद न होने की बात कहकर तारीख बढ़ा देने का सिलसिला चलते ही रहता है। वहां पर मुकदमा करने वाले लोग, या शिकायतकर्ता सुनवाई की कतार में लगे ही रहते हैं, और यहीं से फिल्मों को, तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख, का डायलॉग मिलता है। 

सरकारी दफ्तरों में साहबों से लेकर छोटे कर्मचारियों तक किनके कब दौरे रहेंगे, कब उनकी बैठकें रहेंगी, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। जिनको इनसे काम रहता है, वे एक-एक मुलाकात के लिए दर्जन-दर्जन बार चक्कर लगाते हैं, और थक-हारकर फिर दलालों की शरण में जाते हैं। दलालों की ताकत रहती है कि वे साहब या बाबू से पहले से तय किए हुए वक्त पर, दफ्तर के समय के घंटों पहले, या घंटों बाद जाकर काम करवा लेते हैं, और कुल मिलाकर वह सस्ता पड़ता है। अभी एक किस्सा प्रचलित था जिसमें एक अदालत मुकदमे की सुनवाई के बाद एक पक्ष के हक में फैसला देती है। फैसला जीतने वाला बुजुर्ग जज को दुआ देता है कि आगे चलकर दारोगा जरूर बनना। जज कहता है कि दारोगा तो उससे छोटा होता है, ऐसी दुआ क्यों देते हो? तो इस पर बुजुर्ग कहता है कि नहीं, दारोगा बहुत बड़ा होता है, वह इस मामले में शुरू में ही कह रहा था कि पांच हजार रूपए दो, तो हफ्ते भर में इस मामले को निपटा दूंगा, लेकिन अदालत आने से पांच बरस में 25 हजार रूपए वकील के लग गए, तब फैसला हुआ, बड़ा तो दारोगा ही हुआ। 

इस देश में लोग रोड टैक्स देकर गाड़ी खरीदते हैं, टोल टैक्स देकर सडक़-पुल पर चलते हैं, और बदहाल इंतजाम पर तकलीफ पाते रहते हैं। ट्रेनों में टिकट लेकर चढ़ते हैं, और किसी तरह, किस्मत रही तो, खिडक़ी के रास्ते कोई कुली भीतर धकेल देते हैं, या छत पर खतरा उठाकर चढ़ते हैं, अभी तो कुछ ऐसे लोगों के वीडियो देखने आए जिन्होंने डिब्बों के बंद दरवाजों के बाहर लटककर अपने आपको गमछे के सहारे बांध लिया था, और लंबे सफर पर रवाना हो गए थे। एयरपोर्ट पर लोगों को घंटों पहले बुला लिया जाता है, सरकारी अस्पतालों में हफ्तों बाद जांच की तारीख मिलती है, और महीनों बाद ऑपरेशन की। पटवारी से एक-एक मामूली कागज हासिल करने के लिए कई भार धक्के खाने पड़ते हैं, और थक-हारकर उसे हजारों रूपए रिश्वत देनी होती है। किसी सरकार दफ्तर से रकम वापिसी मिलनी हो, तो वहां के अफसर-कर्मचारी उस रकम में भागीदारी चाहते हैं। सरकारी दफ्तर अपने ही कर्मचारी के मेडिकल बिल, या उसकी पेंशन के कागज निपटाने के लिए उससे रकम में हिस्सेदारी चाहते हैं। 

एक वक्त जिसे सेवा शुल्क कहते थे, एक दूसरी जुबान में जिसे नजराना, शुकराना, या जबराना कहते थे, वह अब रेस्त्रां के बिल में गैरकानूनी सर्विस टैक्स की तरह जुड़ गया है। जीएसटी अलग, और सर्विस टैक्स अलग। ऐसा ही सरकारी दफ्तरों में पैसा जमा भी करना हो, तो उसके लिए रिश्वत, निकालना हो, तो उसके लिए रिश्वत। एक वक्त सीमित घंटों वाले काम के दिनों में असीमित घंटों के लंच के लिए बदनाम एसबीआई की संस्कृति कोरोना की तरह फैलकर पूरे देश को गिरफ्त में ले चुकी है, और जिन टेबिलों पर काम लेट होने से जनता का नुकसान होता है, जनता तकलीफ पाती है, वहां पर टेबिलों से गायब रहने से कुर्सीधारियों का नफा जुड़ जाता है। अब भला ऐसे में कौन वक्त पर कुर्सी पर बैठेगा?

हिन्दुस्तानी जनता को अपनी भड़ास निकालने के लिए जापान जैसे देशों की कहानियां पढ़ लेना चाहिए कि किस तरह वहां हर कोई जिम्मेदारी से अपना काम करने को देश की गौरवशाली संस्कृति मानते हैं। जापान की ऐसी कहानियां पढऩे के लिए लोगों के पास अपार समय भी रहता है क्योंकि वे अगर बेरोजगार हैं, तो खाली ही खाली हैं, और अगर कामकाजी हैं, तो भी घंटों किसी न किसी कतार में लगे रहते हैं, इसलिए दुनिया से निराश होने की जरूरत नहीं है, जापान जैसे देश को देखिए, और यह सोचकर खुश हो लीजिए कि मेरे सीने में नहीं तो, तेरे सीने में सही, हो कहीं भी ठंडक लेकिन, ठंडक रहनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

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