पर्यावरण बर्बादी की तोहमत बढ़ती आबादी पर लगाने वालों के खुद सोचने की बात
आज पर्यावरण दिवस पर पूरे देश में जगह-जगह पर्यावरण को बचाने की चर्चा की जाएगी। पर्यावरण को बचाने की यह सोच बुनियादी रूप से गलत बात है क्योंकि बचाना तो इंसानों को खुद को है, पर्यावरण का क्या है। इंसान खत्म हो जाएंगे तो हजार-दो हजार साल में पर्यावरण अपने-आप बेहतर हो जाएगा। इंसानों को धरती को बचाने के लिए पर्यावरण नहीं बचाना है, उनको अपने-आपको बचाने के लिए पर्यावरण बचाना है, वरना धरती बचे रहेगी, इंसान ही चल बसेंगे। आज पर्यावरण के साथ दिक्कत सबसे बड़ी यह हो गई है कि इसे बचाने की तकरीबन पूरी ही जिम्मेदारी सरकारों ने अपने पर ओढ़ ली है। सरकारें अपने देश के कारोबार पर काबू तय करती हैं या ढील तय करती हैं, और जिस तरह के भ्रष्टाचार से नेता सत्ता पर आते हैं, उससे जाहिर है कि उनका काम महज ढील तय करना रहता है, किसी तरह का काबू उनकी प्राथमिकता में नहीं रहता। और यह बात हम अमेरिका से लेकर हिंदुस्तान की सरकार तक जगह-जगह देख रहे हैं कि पर्यावरण बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से अलग हिंदुस्तान में जिस तरह ग्रीन ट्रिब्यूनल बनाया गया है, तो वैसी जगह पर ऐसे ही लोगों को भेजा जाता है जो कि ढील की बात कर सकें।
खैर ऐसे माहौल में आज पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है और तमाम बड़े लोग इस मौके पर कई जगहों पर कुछ बोलेंगे और क्योंकि कोरोना की दहशत अभी जारी ही है इसलिए अधिक लोग वेबीनार पर बयान देंगे कि पर्यावरण को बचाना कितना जरूरी है और उसके तुरंत बाद से अपने बड़े-बड़े काफिले इस्तेमाल करना शुरू कर देंगे, बड़े-बड़े बंगले, बड़े-बड़े दफ्तर, और उनमें लगे हुए अनगिनत एयर कंडीशनर। धरती पर अगर इंसानों को अपने-आपको बचाना है तो उसका अकेला जरिया अब यह रह गया है कि सरकारों से परे लोग अपने ऐसे समूह तैयार करें जो कि हर लोकतांत्रिक औजार और हथियार का इस्तेमाल करके सरकारों और अदालतों को बेबस करें कि वे धरती को बर्बाद करने की कारोबारी कोशिशों को, सरकारी कोशिशों को खत्म करें।
आज इस मौके पर यह भी याद करने की जरूरत है कि जिन लोगों को धरती की बढ़ती हुई आबादी धरती पर बोझ लगती है और यह लगता है कि यह आबादी पर्यावरण को बर्बाद करके ही छोड़ेगी, उन लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि आबादी का सबसे गरीब हिस्सा वह है जो कि गिनती में तो ज्यादा है, लेकिन जिसकी प्रति व्यक्ति खपत सबसे ही कम है। हिंदुस्तान में भी सबसे गरीब की प्रति व्यक्ति अनाज की खपत, बिजली की खपत, पेट्रोलियम की खपत, या कांक्रीट की खपत सबसे ही कम है। वह सबसे ही कम प्लास्टिक का कचरा पैदा करते हैं, और वह जितना खाते हैं खर्च करते हैं, उससे कहीं अधिक वे अपने बदन की ऊर्जा से धरती पर काम करते हैं। आज अगर मजदूरों की, ठेले और रिक्शे वालों की, किसी भी किस्म का मेहनत का रोजगार करने वालों की दिन भर की ऊर्जा को देखें, तो यह बात साफ है कि वे जितनी चीजों का इस्तेमाल करते हैं उससे अधिक ऊर्जा के लायक काम रोज करते हैं। इसलिए आज के दिन लोगों को अपनी इस गलतफहमी को दूर कर लेना चाहिए कि धरती पर बढ़ती हुई आबादी धरती पर बोझ है। एक हजार सबसे गरीब लोग मिलकर जितनी खपत नहीं करते हैं, उससे कहीं अधिक खपत 10 रईस लोग करते हैं। इसलिए यह बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए कि पर्यावरण की बर्बादी का बढ़ती आबादी से कोई रिश्ता है। दूसरी बात यह यह कि बढ़ती हुई आबादी मेहनत और मजदूरी की संभावनाएं लेकर पैदा होती है। इन संभावनाओं को खत्म करने के लिए सरकार और कारोबार मिलकर जितने किस्म का मशीनीकरण कर रही हैं, उस मशीनीकरण से पर्यावरण की अधिक बर्बादी हो रही है, न कि बढ़ती हुई आबादी की वजह से।
दूसरी बात जो हिंदुस्तान के आम शहरों से देखने मिल रही है कि सफाई के नाम पर स्थानीय म्युनिसिपल जिस अंधाधुंध रफ्तार से खर्च करती हैं, और अपने नागरिकों को खुश रखने के लिए उन्हें मनमाना कचरा पैदा करने देती हैं, और उन पर सफाई का कोई जिम्मा नहीं डालती, यह शहरी पर्यावरण की बर्बादी का एक बड़ा कारण है. दक्षिण भारत के कुछ एक छोटे शहरों ने यह मिसाल कायम की है कि किस तरह म्युनिसिपल सफाई पर एक धेला भी खर्च किए बिना, लोगों को जिम्मेदार बनाकर कचरे से कमाई कर सकती हैं। लेकिन जब स्थानीय संस्थाओं के निर्वाचित नेता वोटरों की चापलूसी में लगे रहते हैं तो वे उन्हें किसी तरह की जिम्मेदारी सिखाने का कड़वा काम नहीं करते। जिन स्थानीय संस्थाओं को नागरिकों को सिखाना चाहिए कि वे अपने घर पर ही कचरे को किस तरह से अलग करें ताकि बाद में उसकी छंटाई में खर्च ना हो और वह कचरा काम आ सके। म्युनिसिपल खर्च बढ़ाकर, गाडिय़ां बढ़ाकर, कर्मचारी बढ़ाकर अपनी शान दिखाने में लगे रहती हैं। हिंदुस्तान में लोग दूसरे प्रदेशों से सीखना तो दूर रहा। अपने प्रदेश से भी नहीं सीखते। छत्तीसगढ़ में ही अंबिकापुर में एक कलेक्टर और म्युनिसिपल कमिश्नर ने जिस तरह महिलाओं से समूह बनाकर कचरे को छंटवाकर उसकी बिक्री से कमाई शुरू करवाई थी, उसमें कमाई महत्वपूर्ण नहीं थी, कचरे की रीसाइकिलिंग महत्वपूर्ण थी, लेकिन इस राज्य के बाकी शहरों ने इससे भी कुछ नहीं सीखा।
दुनिया भर में कारखानों को तो पर्यावरण तबाह करने के लिए कोसा ही जाता है, लेकिन सम्पन्न शहरी लोग जऱा खुद भी आइना देख लें इसलिए इन पहलुओं पर हम लिख रहे हैं।
अगला जन्म किसी सभ्य देश में मिले...
हिंदुस्तानी सडक़ों पर देखें तो लोग जब तक किसी पुलिस वाले को ना देखें, तब तक सीट बेल्ट लगाना उन्हें जरूरी नहीं लगता, न ही हेलमेट लगाना। हेलमेट लगा भी लें तो उसके नीचे का बेल्ट लगाना लोगों को अपनी तौहीन लगती है। किसी हादसे की नौबत आने पर बिना बेल्ट लगा ऐसा सिर पर महज धरा गया हेलमेट सबसे पहले उडक़र दूर जाकर गिरेगा। जो लोग सीट बेल्ट वाली महंगी गाडिय़ां खरीदते हैं, और जिनकी गाडिय़ों में हादसे की हालत में बचाने के लिए एयरबैग्स भी लगे रहते हैं, वे भी अधिक दाम तो दे देते हैं, लेकिन यह सीट बेल्ट लगाने की जहमत यह जानकर भी नहीं उठाते कि अगर सीट बेल्ट नहीं लगाया तो शायद हादसे की हालत में एयर बैग भी नहीं खुलेगा। यह सिलसिला हिंदुस्तान में इतना आम है कि किसी को हेलमेट या सीटबेल्ट की याद दिलाई जाए तो वे हैरान होकर पूछते हैं कि क्या पुलिस यहां जांच करती है? यमराज की जांच की किसी को परवाह नहीं रहती, मौत की किसी को परवाह नहीं रहती, बस पुलिस से चालान ना हो जाए, बाकी तो सब ठीक है। जब लोग अपने खुद के शरीर के जिंदा रखने के लिए इस हद तक गैरजिम्मेदार हैं, तो उनसे यह उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही बड़ी बात होगी कि वे दूसरों के अधिकारों का सम्मान करेंगे। नतीजा यह होता है कि जो लोग सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार बने रहते हैं, वे लगातार एक भड़ास में भी जीते हैं, और कई ऐसे मौके आते हैं जब उन्हें लगता है कि क्या सारी सार्वजनिक जिम्मेदारी सिर्फ उन्हीं की है ?
जिस तरह अभी कोरोना के मामले में हुआ कि दुनिया के कई देशों में लोगों को हाइजीन फटीक होने लगी, कि साफ-सफाई और सावधान रहने का सिलसिला कब तक चलेगा, और थककर लोग लापरवाह होने लगे, ठीक वैसा ही उन शहरों में होता है जहां सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट या शराब पीने पर कोई रोकने वाले नहीं रहते, बिना सीट बेल्ट और हेलमेट चलने वालों का चालान नहीं होता, और जहां पर नशा करके गाड़ी चलाने पर कभी कोई कार्यवाही नहीं होती। चारों तरफ ऐसी अराजकता देख-देखकर नियम कायदे मानने वाले लोग भी थक जाते हैं और धीरे-धीरे वे भी गैर जिम्मेदार होने लगते हैं। यह सिलसिला कुछ वैसा ही रहता है जैसा कि बैठकों में हमेशा वक्त पर पहुंचने वालों को हमेशा ही देर तक लापरवाह और लेट-लतीफ लोगों का इंतजार करना पड़ता है, और धीरे-धीरे लोगों को लगता है कि बैठक में वक्त पर पहुंचना अपने-आपको तकलीफ देने के अलावा और कुछ नहीं है, और थके हुए पाबंद लोग धीरे धीरे खुद भी लेट पहुंचने लगते हैं।
आज चारों तरफ फैले हुए कोरोना की वजह से लोगों को संक्रामक रोग शब्द से बार-बार वास्ता पड़ रहा है। लेकिन अच्छी और बुरी दोनों किस्म की बातें और आदतें भी संक्रामक होती हैं, अच्छी बातों का संक्रमण बहुत कम और बहुत देर से होता है। नियम-कानून मानकर चलने वाले लोगों की देखा-देखी, जल्दी संक्रमण नहीं होता, दूसरी तरफ जो लोग नियमों को तोडक़र चलते हैं उनका संक्रमण जल्दी होता है। जिम्मेदार लोग अधिक वक्त तक असुविधा झेलते हुए जिम्मेदार नहीं रह पाते। इसलिए किसी भी सभ्य समाज को यह भी सोचना चाहिए कि उसके अराजक लोग ना सिर्फ दूसरों के लिए खतरा रहते हैं, ना सिर्फ दूसरों की जिंदगी को खराब करते हैं, बल्कि अपनी खराब आदतों का संक्रमण दूसरों तक फैलाने का एक खतरा भी रखते हैं और ऐसा संक्रमण फैलता ही है। यही वजह है कि बहुत से लोग यह मनाते हैं कि अगला जन्म किसी सभ्य देश में मिले।
नाश्ते के बिल को लेकर पीएम की पुलिस जाँच वाले देश भी धरती पर
फिनलैंड की प्रधानमंत्री सना मरीन के खिलाफ पुलिस ने जांच शुरू की है कि क्या उन्होंने अपने सरकारी निवास पर बाहर की एक कैटरिंग कंपनी द्वारा परोसे गए नाश्ते के हर महीने का भुगतान पाने के लिए कहीं नियमों को तोड़ा है? यह डेढ़ बरस के नाश्ते के बिल का मामला है, जो कि कुल मिलाकर प्रधानमंत्री के एक महीने के वेतन से काम का है। और प्रधानमंत्री ने अपनी ओर से यह घोषणा भी कर दी है कि उनके पहले के प्रधानमंत्रियों द्वारा लिया जाता रहा यह भत्ता उन्होंने भी अपने अफसरों की राय पर लिया था, लेकिन इस भत्ते को तय करने में उनका कोई हाथ नहीं था, और ना उन्होंने इसे मांगा था, फिर भी उन्होंने अपनी तरफ से यह घोषणा कर दी है कि प्रधानमंत्री के जिम्मे और भी बहुत से काम रहते हैं, इसलिए वे इस विवाद की रकम का भुगतान अपने निजी खाते से कर रही हैं, और जांच के बाद अगर यह पता लगता है कि उन्हें पात्रता थी भी, तो भी वे इसका इस्तेमाल नहीं करेंगी। फिनलैंड एक ऐसा देश माना जाता है यहां पर सत्ता और जनता के बीच फासला दुनिया में सबसे कम है, और वहां पर जनता अपने नेताओं के इस किस्म के किसी भी गैरबराबरी के हक़ के बेजा इस्तेमाल के सख्त खिलाफ रहती है। फिनलैंड के जीवन स्तर के मुताबिक यह रकम बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन एक अखबार की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने यह जांच शुरू कर दी है और प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसरों से पूछताछ चल रही है कि यह खर्च किसने मंजूर किया था।
हिंदुस्तान में लोग इस बात को लेकर हैरान हो सकते हैं कि क्या किसी देश की प्रधानमंत्री के नाश्ते के ऐसे खर्च को लेकर इस किस्म की जांच की जा सकती है, क्योंकि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा करने वाले देश का हाल यह है कि सरकारी रेस्ट हाउस और सर्किट हाउस या दूसरे किस्म के विभागीय विश्राम गृह बनते ही इसीलिए हैं कि वहां पर नेता और अफसर जाकर मुफ्तखोरी कर सकें, और उनके मुफ्त खाने-पीने का इंतजाम विभागीय अधिकारी करें। जब-जब मंत्रियों या उनसे बड़े लोगों के दौरे किसी शहर में होते हैं, तो विश्राम गृह या सर्किट हाउस में चरने वाले लोगों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है, और उनके पास आने वाले उनके परिचित, रिश्तेदार, मीडिया के लोग, पार्टी के लोग वहां मुफ्त में खाते-पीते हैं और शायद ही किसी मामले में इसका कोई बिल किसी नेता या अफसर को दिया जाता है। यह मान लिया जाता है कि यह शिष्टाचार कुछ कुर्सियों पर तैनात अफसरों का अघोषित जिम्मा है। आमतौर पर सर्किट हाउस में मंत्रियों के खर्चे का सरकारी भुगतान के लिए छोटा सा बिल बनता है, या नहीं भी बनता है, लेकिन उससे 25-50 गुना अधिक खाने वाले लोगों का कोई भुगतान सरकार की तरफ से नहीं किया जाता, न मंत्री की तरफ से किया जाता, और भुगतान का जिम्मा तहसीलदार का मान लिया जाता है। इसी तरह वन विभाग के खासे अतिथि सत्कार दिखाने वाले रेस्ट हाउस में स्थानीय रेंज ऑफिसर के मत्थे खर्च पड़ता है, और इसके एवज में उसे यह रियायत मिलती है कि उसे अपनी काली कमाई का कुछ हिस्सा ऊपर तक नहीं पहुंचाना पड़ता और उसे मेहमाननवाजी के खाते में मान लिया जाता है। बहुत से मंत्री और अफसर तो इस बात के लिए जाने जाते हैं कि उनके पहुंचने पर खाने की मेज पर और कमरे में बड़े-बड़े मर्तबान मेवा भरकर रखे जाते हैं और वे अपने जाने के पहले अपनी गाड़ी में साथ लेकर चल रहे बड़े पीपों में उनको खाली करवाते चलते हैं।
हिंदुस्तान में कभी इस बात की कल्पना नहीं की जा सकती कि किसी मंत्री, या मुख्यमंत्री, या प्रधानमंत्री के सरकारी निवास पर होने वाले सरकारी खर्च का कोई ऐसा बारीक हिसाब रखा जाता होगा। लेकिन फिर भी कम से कम दुनिया में कहीं ईमानदारी जिंदा है इसका एहसास करने के लिए किस्से कहानी की तरह ऐसे कुछ देशों के असल हाल को जान लेना भी अच्छा है ताकि अपने छोटे बच्चों को यह बतलाया जा सके कि दुनिया भी में ऐसे भी देश हैं। आज विश्व साइकिल दिवस भी है और यूरोप के कुछ देश ऐसे भी हैं जहां के प्रधानमंत्री साइकिलों पर चलते हैं। अधिक दूर क्यों जाएं भारत के बगल में भूटान के प्रधानमंत्री लगातार साइकिल पर चलते थे और राह चलते रुक कर कभी मजदूरों के साथ मिट्टी खोदने लगते थे, तो कभी खेतों में काम करने लगते थे। उनका फेसबुक पेज उनकी साइकिल सवारी से यूरोप के कुछ देशों के प्रधानमंत्रियों की तस्वीरों की तरह भरा रहता था।
हिंदुस्तान जैसे देश में जहां जरूरत ना रहने पर भी गाडिय़ों का बड़ा काफिला नेताओं के साथ चलता है, वहां पर किसी सादगी की कल्पना असंभव सी है। लेकिन जो सच में ही विकसित देश हैं, और जहां पर लोकतंत्र परिपक्व है, ऐसे बहुत से देशों में इस तरह की सादगी लगातार दिखती हैं, जो किसी अपवाद के रूप में नहीं है, जो सचमुच ही वहां पर एक परंपरा है। अब क्या आज हिंदुस्तान में कोई ऐसी कल्पना कर सकते हैं कि यहां प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री या किसी मंत्री के नाश्ते के बिल के भुगतान को लेकर पुलिस की जांच शुरू हो सके? ऐसे पदों पर बैठे हुए लोगों के खाने-पीने के बिल का भुगतान करने की अगर कहीं नौबत आती भी होगी तो आसपास खड़े हुए पुलिस अफसर खुशी-खुशी उस भुगतान के लिए तैयार रहते होंगे। इसलिए फिलहाल फिनलैंड की इस सच्ची घटना को एक कहानी की तरह अपने बच्चों को जरूर सुनाएं कि दुनिया में ऐसे भी देश हैं जहां प्रधानमंत्री और आम लोगों के बीच अधिकारों को लेकर किसी तरह का कोई फासला नहीं है, और मामूली सी चूक होने पर भी उन्हें अपनी जेब से ना केवल भरपाई करनी पड़ती है, बल्कि उसकी पुलिस जांच भी चल रही है।
21वीं सदी का दिल्ली हाईकोर्ट क्या कुछ सदी पीछे चला गया?
किसी एक से मिलते-जुलते मुद्दे पर लगातार लिखना ठीक नहीं रहता लेकिन इन दिनों हिंदुस्तान में कोरोना और कोर्ट का हाल कुछ ऐसा है कि उन पर लिखने के मौके तकरीबन रोज खड़े रहते हैं। कल ही हमने यह बात लिखी कि मद्रास हाई कोर्ट के जज ने समलैंगिकता के एक मुद्दे पर अपनी समझ को नाकाफी बताते हुए कहा कि वे मनोचिकित्सक से समय लेकर उनसे इस मुद्दे को बेहतर समझना चाहते हैं, ताकि जब वे इस पर फैसला दें तो वह दिमाग से निकला हुआ न रहे, दिल से निकला हुआ भी रहे। उसमें हमने यह लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बड़े-बड़े जजों को मुद्दों की समझ के लिए प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए, उन्हें जानकार लोगों को बुलाकर खुद छात्र-छात्रा बनकर क्लास में बैठना चाहिए, और अपनी सारी जिज्ञासाओं को शांत करना चाहिए, इससे वे बेहतर जज बन पाएंगे।
अब कल जब हमने यह लिखा होगा, उसी समय दिल्ली हाईकोर्ट में एक जज जस्टिस विपिन सांघी कोरोना वैक्सीन मामले की सुनवाई करते हुए अपनी एक निजी राय भी वकीलों के सामने रख रहे थे। जज की जुबानी राय की वैसे तो कोई कीमत नहीं होती, और जो अदालत के लिखित आदेश में आखिर में सामने आता है, वही मायने रखता है, लेकिन ऐसी जुबानी राय से कम से कम जज की सोच के बारे में भी कुछ पता लगता है। कई बार होता यह है कि सबूतों और गवाहों की बुनियाद पर जो फैसले आते हैं, उनमें जो बातें जज नहीं लिख पाते, उन बातों को भी सुनवाई के दौरान कह सकते हैं। जस्टिस सांघी ने केंद्र सरकार की वैक्सीन तैयारी और वैक्सीन नीति को लेकर तो उसकी जमकर खिंचाई की ही है, लेकिन यह कोई नई बात नहीं रही। जिस-जिस अदालत ने भारत में वैक्सीन के इंतजाम को लेकर बात की, उन सबने केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया ही है, लेकिन इन्होंने एक दूसरी बात कही जो कि सोचने लायक है, और इस मुद्दे पर भी कुछ हफ्ते पहले हम लिख भी चुके हैं।
जस्टिस सांघी ने कहा कि वे अपनी खुद की राय रख रहे हैं कि जब केंद्र सरकार ने 18 से 44 बरस के लोगों को वैक्सीन लगाने की घोषणा की और सरकार के पास वैक्सीन थी नहीं, तो ऐसी घोषणा क्यों की? उन्होंने कहा कि भारत में 60 वर्ष से ऊपर के लोगों को कोरोना वैक्सीन लगाने में प्राथमिकता दी गई जबकि नौजवानों को वैक्सीन लगाने में प्राथमिकता देनी चाहिए थी, क्योंकि 60 वर्ष के ऊपर के लोग तो अपनी जिंदगी जी चुके हैं, और यह नौजवान पीढ़ी है जो कि देश का भविष्य है। उन्होंने अपने आपको 60 वर्ष से ऊपर के बुजुर्ग तबके में गिनते हुए यह कहा कि हम तो अब जिंदगी की ढलान पर हैं, लेकिन नौजवान पीढ़ी से इस देश का भविष्य बनना है। उन्होंने कहा कि 80 बरस के लोग तो अपनी उम्र जी चुके हैं, और अब वह देश को कहीं आगे नहीं ले जा सकते, ऐसे में अगर वैक्सीन सीमित संख्या में थी तो नौजवान पीढ़ी को प्राथमिकता देनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि आदर्श स्थिति तो यह होती कि हर किसी को टीका मिलता, लेकिन जब हर किसी के लिए है नहीं, तो कम से कम नौजवान पीढ़ी को पहले मिलना चाहिए था। उन्होंने भारत सरकार के वकील से कहा कि आप ऐसे फैसले से शर्मा क्यों रहे हैं, यह तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आगे का रास्ता तय करे, दूसरे देशों ने ऐसा किया है, इटली ने अपने बुजुर्ग लोगों से माफी मांग ली थी कि हमारे पास अस्पतालों में आपके लिए पर्याप्त बिस्तर नहीं हैं।
पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ दिन पहले ही इसी पन्ने पर लिखा था कि किस तरह जापान में अकाल पडऩे पर जब लोगों के पास खाने को नहीं रहता था तो वे अपने परिवार के बुजुर्गों को एक पहाड़ी पर ईश्वर के दर्शन कराने के नाम पर ले जाते थे और वहां से नीचे फेंक देते थे। यह फिल्म इसी पर केंद्रित थी। लेकिन 1-2 सदी पहले की यह कहानी कल दिल्ली हाईकोर्ट में फिर दोहराई जाएगी इसका अंदाज हमें नहीं था। 21वीं सदी के 21वें बरस की देश की राजधानी की एक सबसे बड़ी अदालत जज की इस राय की गवाह बनी कि बुजुर्गों के जिंदा रहने का हक जवानों के मुकाबले कम माना जाना चाहिए। यह खबर पढ़ते ही पल भर को ऐसा लगा कि इस अदालत की दुनिया 1-2 सदी पहले चली गई है। अब सवाल यह उठता है कि जज की बात से मन पर पड़ती हुई लात के दर्द को कुछ देर के लिए अलग कर दें, तो यह एक कड़वी हकीकत है कि धरती के लिए बुजुर्गों के मुकाबले जवान अधिक उत्पादक हैं। लेकिन एक सवाल यह भी उठता है कि सभ्यता का विकास पिछले हजारों वर्षों में क्या हमें इस मोड़ पर ले आया है कि जहां पर किसी इंसान की उत्पादकता ही उसके जिंदा रहने के हक का सबसे बड़ा सुबूत हो? यह तो जंगल की सोच रहती है, जंगली जानवरों की सोच रहती है जो कि सबसे ताकतवर के सबसे आखिर तक जिंदा रहने की हिमायती रहती है। जंगल में जिसकी उत्पादकता नहीं रह जाती, उसे जिंदा रहने का हक भी नहीं रह जाता। उसी प्रजाति के जानवर भी अपने ही बीमार या जख्मी साथी को खा जाते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि एक बर्फीली पहाड़ी पर गिरे हुए विमान के मुसाफिरों ने आखिर में अपने बीच के मरने वाले लोगों को खाना शुरू कर दिया था। कल जस्टिस सांघी की बातें कुछ उसी किस्म की लगने लगीं कि क्या हम एक बार फिर सबसे ताकतवर के जीने की सबसे अधिक संभावना वाली नौबत में पहुंचे हुए हैं या ऐसी नौबत इन हजारों-लाखों बरसों में कहीं गई ही नहीं थी, और वह, सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट, हमारे ही बीच अनबोले बिनलिखे शब्दों में दिल-दिमाग में चली ही आ रही थी?
यह सोचना बड़ा तकलीफदेह होता है, और हमने खुद इसी सवाल को कुछ वक्त पहले उठाया था कि जब लोगों के सामने तय करने का यह बहुत बड़ा संकट आकर खड़ा हो जाएगा कि वे अपने को जन्म देने वाले मां-बाप को बचाएं, या अपने पैदा किए हुए अपने बच्चों को बचाएं, या अपनी पीढ़ी के लोगों को बचाएं, तो उस वक्त समझ पड़ेगा कि लोगों की प्राथमिकता क्या है? कल दिल्ली हाईकोर्ट के जज ने जो सवाल उठाया है, उस सवाल को पहली नजर में खारिज कर देना तो बहुत आसान है, लेकिन उसके बारे में जितना ज्यादा सोचें उतना ही ज्यादा मन दुविधा से बाहर निकलने लगता है, और दिल के किसी एक कोने से यह आवाज उठने लगती है कि वे गलत क्या कह रहे हैं? यह बात उस वक्त तो अधिक गलत लग सकती है जब देश की सरकार की जिम्मेदारी हर किसी को वैक्सीन जुटाकर देना थी, लेकिन उस जिम्मेदारी का वक्त तो चले गया, अब वैक्सीन कहीं है नहीं, सरकार का कोई इंतजाम है नहीं, तो ऐसे में जो है उससे किसकी जिंदगी बचाई जाए ? जवान जिंदगी बचाई जाए या बुजुर्ग जिंदगी बचाई जाए? इस बारे में अपने आसपास अपने परिवार के लोगों की कल्पना करके असल नाम भरकर, असल चेहरे भरकर, अगर इस पहेली को सुलझाने की कोशिश करें, तो लगता है कि हमारे भीतर भी एक जस्टिस सांघी दिखने लगेगा!
बड़े जजों का सीखना बंद नहीं होना चाहिए, मद्रास हाईकोर्ट जज ने पेश की अपनी मिसाल
मद्रास हाईकोर्ट के एक जज ने कुछ हफ्ते पहले यह घोषणा की कि वे समलैंगिकता से जुड़े एक मामले पर कोई फैसला या आदेश देने के पहले खुद मनोचिकित्सक से मिलेंगे ताकि वे समलैंगिकता को बेहतर तरीके से समझ सके। उन्होंने अदालत में खुलकर यह बात कही और उन्होंने यह साफ किया कि वे अभी अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं है और इस विषय की उन्हें अच्छी समझ नहीं है, ऐसे में अगर वे कोई फैसला देंगे तो वह उनके दिमाग से निकला हुआ होगा, और वे चाहते हैं कि फैसला उनके दिल से निकला हुआ हो। उन्होंने खुद होकर कहा कि वह एक मनोवैज्ञानिक शिक्षा पाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वे अपने खुद के पूर्वाग्रहों को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं और खुद की सोच के विकास की कोशिश भी कर रहे हैं। तमिलनाडु का यह मामला दो युवतियों का है जो कि पूरी जिंदगी जीवनसाथी बनकर एक दूसरे के साथ रहना चाहती हैं लेकिन दोनों के परिवार इसका विरोध कर रहे हैं। जज ने इन दोनों युवतियों के अलावा इन दोनों के परिवारों को भी एक ऐसे परामर्शदाता के पास भेजा, जो कि समलैंगिक मुद्दों को जानने समझने की समझबूझ रखते हैं। परामर्शदाता ने इन दोनों युवतियों और इनके परिवारों से बातचीत करके अदालत को सीलबंद रिपोर्ट दी जिसमें इन सबकी इस मुद्दे पर समझ के बारे में उसका निष्कर्ष था।
इस मामले पर कुछ हफ्ते बाद भी लिखने की जरूरत अभी इसलिए पड़ रही है कि गोवा की एक अदालत ने एक बहुत चर्चित सेक्स शोषण मामले पर अपना फैसला देते हुए आरोप लगाने वाली युवती के खिलाफ जितने किस्म की टिप्पणियां की हैं, वे दिल दहलाने वाली हैं। इस जज के अलावा पहले भी कुछ दूसरे प्रदेशों में कुछ ऐसे जज रहे हैं जिन्होंने देह शोषण के मामलों में महिलाओं के खिलाफ बहुत ही अवांछित और नाजायज टिप्पणियां की हैं जिनसे यह पता लगता है कि उनकी महिलाओं की मानसिकता की समझ शून्य से भी गई गुजरी है, वे महिलाविरोधी पूर्वाग्रहों से लदे हैं। इस अखबार से जुड़े हुए एक फेसबुक पेज पर आजकल में ही लिखा गया है कि हिंदुस्तान में किसी को जज बनाने के पहले बलात्कार की शिकार महिलाओं के बारे में उनसे खुलकर बातचीत करके उनकी समझ का अंदाज लगाना चाहिए, और इस मुद्दे के अलावा भी सामाजिक न्याय से जुड़े दूसरे मुद्दों पर उनकी सोच पर उनसे बात करनी चाहिए, इसके बाद ही उनकी नियुक्ति होनी चाहिए।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि इस अखबार में हम अपने इस कॉलम में ऐसी चर्चा में पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि जिस तरह अमेरिका में किसी को जज बनाने के पहले उससे लंबी चौड़ी पूछताछ होती है, और सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने के पहले अमेरिकी संसद की एक कमेटी वैसे संभावित जजों से लंबी-लंबी बैठकें करती हैं और देश में जलते-सुलगते तमाम मुद्दों पर उनकी सोच का पता लगाती है. ऐसी संसदीय सुनवाई वहां की संवैधानिक अनिवार्यता रहती है। ऐसी सुनवाई का मतलब ही यह होता है कि उनके पूर्वाग्रहों का अंदाज लगा लेना और उसके बाद यह तय करना कि ऐसे पूर्वाग्रहों वाले लोगों को जज बनाना ठीक होगा या नहीं। हिंदुस्तान में भी न सिर्फ महिलाओं से जुड़े हुए मुद्दे बल्कि दलित और आदिवासी लोगों से जुड़े हुए मुद्दे, गरीब और मजदूरों से जुड़े हुए मुद्दे, ऐसे हैं जिनकी समझ बहुत से जजों में बहुत कम दिखाई पड़ती है। पिछले बरस जब कोरोना के बाद देश भर में एक साथ लॉकडाउन लगाया गया उस वक्त हजार-हजार मील पैदल चलकर जिंदा या मुर्दा घर लौटने वाले मजदूरों के हक में जब कुछ लोग अदालत पहुंचे, तो जजों ने इस मुद्दे को समझने से ही इंकार कर दिया। हमारा मानना है कि मजदूरों को इंसाफ नहीं मिला जबकि वे करोड़ों की संख्या में थे, और जाहिर तौर पर तकलीफ में थे, और सरकार के पास उस नौबत का कोई जवाब नहीं था, उन लोगों की तकलीफ का कोई समाधान नहीं था, लेकिन अदालत के पास भी वह नजर नहीं थी जो कि सबसे गरीब लोगों की इस सबसे बड़ी त्रासदी को देखकर समझ सकती। इसलिए आज जब मद्रास हाईकोर्ट के एक जज खुलकर इस बात को मंजूर कर रहे हैं कि अपने पूर्वाग्रहों से उबरने के लिए और इस मुद्दे को बेहतर समझने के लिए वे अपने मनोवैज्ञानिक शिक्षण के लिए जा रहे हैं, ताकि यह फैसला देते समय कानूनी नुक़्तों के आधार पर दिमाग से फैसला निकलने के बजाय वह दिल से निकल सके, तो उनकी बात से और जजों को भी कुछ सीखना चाहिए। हिंदुस्तान की बहुत सी दूसरी अदालतों के बहुत से दूसरे बड़े-बड़े जजों को ऐसी समझ की जरूरत है। आज अधिक से अधिक होता है यह है कि बड़े जज अपनी अदालतों में काम करने वाले अच्छे वकीलों में से किसी को छांटकर उन्हें न्याय मित्र बना कर किसी मामले में नियुक्त करते हैं ताकि वे उस मामले की बारीकियां जजों को समझा सकें। लेकिन ऐसे में एक खतरा यह भी रहता है कि यह न्याय मित्र जजों को समझाते हुए खुद ही अपने पूर्वाग्रह से मुक्त ना हो सके, और इसलिए जजों का ऐसा समझना पूरी तरह से खतरे से खाली भी नहीं है। मद्रास हाई कोर्ट के जज ने एक बेहतर राह दिखाई है जिसमें वह ऐसे मामलों के जानकार किसी मनोचिकित्सक या किसी परामर्शदाता से समझ लेने वाले हैं।
हाल के वर्षों में छोटी और बड़ी बहुत सी अदालतों के जजों ने सामाजिक न्याय की अपनी कमजोर समझ का आक्रामक प्रदर्शन किया है। उन्होंने अपने महिला विरोधी नजरिए को सिर पर मुकुट की तरह सजा कर फैसले सुनाए हैं, उन्होंने बहुत सी अवांछित और नाजायज बातें फैसलों में लिखी हैं, कुछ मामले तो ऐसे भी रहे जिनमें जजों की टिप्पणियों के खिलाफ अदालती अपील होने के पहले ही लोगों को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा और ऐसी टिप्पणियों को रुकवाना पड़ा। हिंदुस्तान एक बहुत ही दकियानूसी और पाखंडी देश है जहां पर मिट्टी और पत्थर की बनी देवियों की तो पूजा की जाती है, लेकिन जीती जागती महिला को जलाकर मारना, उससे बलात्कार करना, उसे अपमानित करना, उसे सोशल मीडिया पर हजार-हजार अकाउंट्स से बलात्कार की धमकी दिलवाना, उसके बच्चों को बलात्कार की धमकी दिलवाना। यह देश कुछ इस किस्म का देश है, इसलिए जज भी इसी समाज से निकल कर आते हैं, इसी समाज में जीते हैं, और महिलाओं को लेकर उनकी समझ अगर पूरी तरह बेइंसाफी से भरी हुई है, तो उसमें हमें जरा भी हैरानी नहीं होती। ऐसा करने वाले केवल पुरुष जज नहीं होते, ऐसे फैसले देने वाली महिला जज भी होती हैं, जिनकी खुद की मानसिक परिपक्वता पुरुषप्रधान समाज में दबे कुचले तरीके से हुई रहती है। यह उसी किस्म की महिलाओं जैसी रहती हैं जो किसी अफसर को या नेता को कमजोर कायर दब्बू नाकामयाब साबित करने के लिए उसे चूडिय़ां भेंट करने जाती हैं मानो चूडिय़ां किसी कमजोरी का सुबूत हैं। इसलिए इस देश में महिलाओं जैसे तमाम कमजोर तबकों, जिनमें सेक्स की अलग पसंद वाले समूह भी शामिल हैं, उन्हें लेकर जजों की एक क्लास लगनी चाहिए, जिसमें वे खुलकर अपने अज्ञान को उजागर करते हुए सवाल करें, और उनके अज्ञान को दूर करने का रास्ता अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञ निकालें। सुप्रीम कोर्ट तक के बहुत से जजों ने समय-समय पर समाज के कमजोर तबकों के अधिकारों को समझने से इसलिए नाकामयाबी दिखाई है क्योंकि उन तबकों की उन्हें समझ नहीं रह गई। हमारा तो यह मानना है कि किसी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक या परामर्शदाता से मुद्दों को समझने की तरह ही सामाजिक हक़ीक़त के बहुत से मुद्दों को समझने के लिए जजों को समाज के कमजोर तबकों की गहरी समझ रखने वाले विशेषज्ञ जानकार लोगों को आमंत्रित करके उनकी क्लास अटेंड करनी चाहिए।




