तालिबान ने हिंदुस्तान में गोडसे की पूजा देखकर तो अपने आत्मघाती हमलावरों का अभिनन्दन नहीं सीखा?
23 अक्टूबर 2021
अफगानिस्तान 2011 में जब अमेरिकी फौजों के
काबू में था, और कहने के लिए वहां पर एक स्थानीय सरकार थी, उस वक्त काबुल
के एक पांच सितारा होटल में तालिबान ने एक आत्मघाती हमला किया था, जिसमें
बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे, मरने वालों में बहुत से अफगानी भी थे. अभी
9 साल बाद तालिबान ने उन आत्मघाती हमलावरों के परिवारों को उसी होटल में
न्योता देकर बुलाया और उन्हें पैसे और तोहफे दिए, उनका सम्मान किया। इस
मौके पर अफगानिस्तान के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी भी मौजूद थे और
उन्होंने कहा कि ये आत्मघाती हमलावर देश के, और हमारे हीरो हैं। इन
हमलावरों के परिवारों को नगद रकम के साथ एक-एक जमीन देने का वादा भी
तालिबान ने किया था और अब सरकार बनने पर उसे पूरा किया जा रहा है। इस बात
को लेकर अफगानिस्तान के बहुत से दूसरे लोग नाराज भी हैं क्योंकि इस तरह के
जितने आत्मघाती हमले तालिबान आतंकियों ने किए थे, उनमें मरने वाले अधिकतर
अफगान ही थे। जिस होटल में यह सम्मान समारोह हुआ उस होटल पर तालिबान ने दो
बार हमला किया था जिसमें दर्जनों अफगान मारे गए थे। आज तालिबान ने इन
हमलावरों की तारीफ में एक वीडियो भी जारी किया है जिसमें उन हमलों में
इस्तेमाल की हुई आत्मघाती जैकेट को भी दिखाया गया है. एक आतंकी कहे जाने
वाले और अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित संगठन, हक्कानी नेटवर्क, के मुखिया आज
अफगानिस्तान के गृह मंत्री हैं और उन्होंने खुलकर यह बात कही है कि दुनिया
चाहे कुछ भी कहे आत्मघाती हमलावर हमारे हीरो हैं और बने रहेंगे।
आज इस मामले पर लिखने की जरूरत क्यों लग रही है? यह तो अफगानिस्तान का एक ऐसा अलोकतांत्रिक मामला है जिसकी कि आदत अफगानिस्तान में लोगों को पड़ चुकी है, और ऐसे ही तालिबानी आतंक के बढ़ते-बढ़ते आज हालत यहां तक आ गई है कि वहां औरतों को इंसान नहीं माना जाता। अब सुना जा रहा है कि दूसरे धर्म के लोगों को बाहर निकलने कहा जा रहा है, और खुद मुस्लिम धर्म को मानने वाले शिया समुदाय के लोगों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है। तो ऐसे देश के बारे में वहां अगर आतंकियों का सम्मान हो रहा है तो उस बारे में लिखने की जरूरत क्यों होनी चाहिए? यह सवाल कुछ पाठकों के मन में उठ सकता है इसलिए यह लिख देना ठीक है कि इतिहास से सबक लेना तो बहुत से लोग सुझाते हैं लेकिन वर्तमान से भी सबक लेना चाहिए और अड़ोस-पड़ोस से भी सबक लेना चाहिए यह तमाम लोग नहीं सुझाते। आज हालत यह है कि हिंदुस्तान में दिल्ली हरियाणा सरहद पर किसान आंदोलन के करीब एक सिख धर्म ग्रंथ की बेअदबी का आरोप लगाकर सिख निहंगों ने जिस तरह एक दलित को काट-काटकर टांग दिया, उसे तालिबानी हिंसा से जोडक़र देखने की जरूरत है। तालिबान का किया हुआ सब कुछ अपने धर्म के नाम पर किया हुआ बताया जाता है, महिलाओं के हक कुचल देना भी शरीयत के नाम पर बतलाया जाता है, और हाथ-पैर काटने की सजा भी वहां चौराहों पर दी जाती है और नई तालिबान सरकार ने भी चौराहे पर सिर कलम करने की वह पुरानी सजा कायम रखने की घोषणा की है।
कुछ ऐसा ही मिजाज हिंदुस्तान में धर्म के नाम पर एक इंसान के टुकड़े कर देने का है, और इस हत्यारे निहंग के पुलिस में समर्पण करने जाने के पहले दूसरे निहंगों की तरफ से सार्वजनिक अभिनंदन किया गया और लोगों ने इसे गर्व की बात माना। कुछ ऐसी किस्म की बात देश में दूसरी कई जगहों पर दूसरे धर्मों के लोगों के बीच होती है। राजस्थान में एक किसी मुस्लिम को मारने वाले और उसका वीडियो बनाने वाले हिंदू का सार्वजनिक रूप से अभिनंदन किया गया था। उत्तर प्रदेश की एक छोटी पार्टी जो अपनी सांप्रदायिकता के लिए जानी जाती है, उसने घोषणा की थी कि वह मोहम्मद अफऱाज़ुल नाम के मजदूर को सार्वजनिक रूप से मारने और उसे जिंदा जलाने वाले शंभू लाल रैगर को आगरा से लोकसभा का चुनाव लड़वाएगी। राजस्थान में 3 बरस पहले, बाबरी मस्जिद गिराने के दिन 6 दिसंबर को इस शंभूलाल ने इस मुस्लिम मजदूर को बिना किसी भडक़ावे के, बिना किसी तनाव के, सार्वजनिक जगह पर मारा, जिंदा जलाया, और उसका वीडियो बनाकर चारों तरफ बांटा। उस हत्यारे का भी सम्मान किया गया। ऐसा कई जगह हुआ है। कई जगहों पर गाय ले जाने के आरोप में किसी मुस्लिम को पीट-पीटकर मारने वाले लोगों का सम्मान होता है, तो नाथूराम गोडसे का सम्मान तो होते ही रहता है, जगह-जगह उसकी प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, जगह-जगह उसके मंदिर बनाए जाते हैं, और उसे महिमामंडित करना बंद ही नहीं होता है।
हिंदुस्तान के बड़े तबके में तालिबान को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है और अगर हिंदुस्तान के किसी संगठन का किसी व्यक्ति का तालिबान से कोई जुबानी नाता भी जोड़ दिया जाए तो उसके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हो जा रही है। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान में जगह-जगह धर्म के आधार पर, नफरत के आधार पर, जब सार्वजनिक रूप से किसी को मारा जा रहा है और हत्यारे का इस तरह सार्वजनिक अभिनंदन हो रहा है, तो ऐसे लोगों में और तालिबान में फर्क क्या है? जिस निहंग ने अभी एक दलित को काटकर टुकड़े टांग दिए वह तालिबान से किस मायने में अलग है? ऐसे ही पंजाब के आतंक के दिनों में भिंडरावाले के आतंकियों ने लगातार छंाट-छाँटकर हिंदुओं को मारा था, और उन हत्यारों का स्वर्ण मंदिर में कितनी ही बार सम्मान हुआ था। अब आतंकियों का ऐसा सम्मान और आत्मघाती तालिबानों का ऐसा सम्मान, इसमें फर्क अगर कोई ढूंढना चाहे तो ढूंढ ले, हमको तो इसमें कोई फर्क दिखता नहीं है। दोनों ही धर्म के नाम पर किए गए हथियारबंद आतंक हैं, जो कातिल थे, कातिल हैं, और कातिल ही रहेंगे। इसलिए दुनिया को महज इतिहास से सबक लेने की जरूरत नहीं रहती, दुनिया को अधिक बड़ा सबक वर्तमान से मिल सकता है. यह देखने की जरूरत है कि जब धर्म के नाम पर हिंसा आगे बढ़ती है और जब धर्म के नाम पर किसी इलाके या देश का राज्य चलाया जाता है तो वह धर्म किस तरह कातिल हो जाता है, वह किस तरह हत्याएं करने लगता है, उसमें इंसाफ की कोई भी गुंजाइश नहीं बच जाती है। इस बात को समझने की जरूरत है जिन लोगों को आज हिंदुस्तान को एक हिंदू राज्य बनाने की सनक सवार है, उन्हें यह भी देखना चाहिए कि अफगानिस्तान में आज मुस्लिम दूसरे धर्मों के लोगों को कम मार रहे हैं, खुद मुस्लिमों को अधिक मार रहे हैं। ऐसा ही एक संगठन के मुस्लिम आतंकियों ने पाकिस्तान में दूसरे समुदाय के मुस्लिम नागरिकों के साथ किया। धर्म पहले तो दूसरे धर्म के लोगों को मारता है, लेकिन बाद में वह अपने ही धर्म के अलग-अलग समुदाय के लोगों को मारना शुरू करता है। इसलिए तालिबान को हत्यारा मानना और निहंग को या शंभूनाथ रैगर को अलग मानना एक परले दर्जे की बेवकूफी की बात होगी। किसी भी लोकतंत्र में समझदारी की बात यही होगी कि ऐसे तमाम धर्मांध आतंकी संगठनों को काबू में करना, जेल भेजना, सजा दिलवाना, और खत्म करना। लेकिन फिर गोडसे की प्रतिमाएं कैसे लग सकेंगी? कहीं तालिबान ने हिंदुस्तान में गोडसे की पूजा देखकर तो अपने आत्मघाती हमलावरों का अभिनन्दन नहीं सीखा?धर्म को कितनी अराजकता की इजाजत मिलनी चाहिए देश में?
22 अक्टूबर 2021
हिंदुस्तान के एक बहुत चर्चित फिल्म कलाकार
आमिर खान ने दिवाली के ठीक पहले यह सलाह दी कि लोग सडक़ों पर पटाखे ना
फोड़ें। उनकी यह सलाह कोई निजी सलाह नहीं थी, बल्कि टायर बनाने वाली एक
कंपनी के एक इश्तहार में उन्होंने यह बात कही। इस तरह इस इश्तहार के लिए
मोटे तौर पर यह कंपनी जिम्मेदार थी और क्योंकि टायर का सडक़ों से लेना-देना
रहता है इसलिए शायद टायर कंपनी को सडक़ों को महफूज रखना भी सूझा होगा। खैर
जो भी हो आमिर खान और उनकी पिछली पत्नी कुछ बरस पहले भी एक विवाद में थे जब
उनकी पूर्व पत्नी किरण राव ने भारत में रहने में अपने को सुरक्षित न महसूस
करने की बात कही थी। उस बात को लेकर भी सोशल मीडिया पर बात का मतलब समझे
और निकाले बिना दुर्भावना से उनके खिलाफ एक बड़ा अभियान चला था, और उसके
बाद से आमिर तकरीबन चुप चल रहे थे। अब आमिर खान को दिखाने वाले इस इश्तहार
के बारे में कर्नाटक के एक सांप्रदायिक मिजाज वाले भाजपा सांसद अनंत कुमार
हेगड़े ने इस टायर कंपनी को चि_ी लिखकर कहा है कि इस विज्ञापन से हिंदुओं
में नाराजगी है। उन्होंने लिखा है- आमिर खान इस इश्तहार में लोगों को सडक़ों
पर पटाखे नहीं जलाने की सलाह दे रहे हैं, जो कि बहुत अच्छा संदेश है,
सार्वजनिक के मुद्दों पर आपकी चिंता के लिए मैं आपकी सराहना करता हूं, और
आपसे एक और समस्या के समाधान का अनुरोध करता हूं जिसमें शुक्रवार और अन्य
महत्वपूर्ण त्योहारों के दिन नमाज पढऩे के नाम पर मुस्लिमों द्वारा सडक़ें
जाम कर दी जाती हैं। उन्होंने लिखा कि कई भारतीय शहरों में यह बहुत आम
नजारा है और ऐसे वक्त एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी गाडिय़ां भी ट्रैफिक
जाम में फंस जाती हैं जिसे बड़ा नुकसान होता है. सांसद हेगड़े ने यह भी
लिखा है कि वह अपनी कंपनी के विज्ञापनों में ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा भी
उठाएं क्योंकि हमारे देश में मस्जिदों के ऊपर लगे लाउडस्पीकर से अजान के
समय बहुत अधिक शोर होता है।
आमिर खान ने शायद अपने मन की बात नहीं कही है और एक विज्ञापन में उनसे जो कहने के लिए कहा गया वह कहा हो, और इस कंपनी के मालिक गोयनका तो एक हिंदू हैं इसलिए ऐसा खतरा नहीं लगा होगा कि एक मुस्लिम अपने पैसे से पटाखों के खिलाफ अभियान चला रहा है। भाजपा के इस सांसद से ऐसी ही प्रतिक्रिया की उम्मीद की जा रही थी क्योंकि उनका पुराना रिकॉर्ड कुछ इसी किस्म का रहा है। लेकिन इन दोनों पक्षों की नीयत से परे हम इस मुद्दे पर आना चाहते हैं जिसमें चाहे एक हिंदू त्योहार दिवाली पर चारों तरफ अंधाधुंध पटाखे जलाकर इतना प्रदूषण फैला दिया जाता है कि दमे के मरीजों को सांस के मरीजों को भारी तकलीफ होने लगती है और उनके लिए बड़ा खतरा इक_ा हो जाता है। भारत के शहरों के वैज्ञानिक परीक्षण बतलाते हैं कि दिवाली के पटाखों से प्रदूषण का स्तर कितना बढ़ जाता है और हवा कितनी जहरीली हो जाती है इसलिए किसी बारात में फूटने वाले पटाखे या किसी के जुलूस में फूटने वाले पटाखों से परे दिवाली के पटाखों में फर्क यह है कि एक साथ कुछ घंटों में अंधाधुंध संख्या में फूटने वाले रहते हैं और उसे हवा में प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक बढ़ जाता है।
लेकिन भाजपा सांसद अनंत हेगड़े ने जो दूसरा मुद्दा उठाया है वह मुद्दा भी सही है कि नमाज पढऩे के लिए सडक़ों को कैसे रोका जा सकता है? हिंदुस्तान में जहां पर कि सांप्रदायिक नजरिए से धर्मों के बीच एक अंधा मुकाबला चलता है और एक धर्म सार्वजनिक जीवन को बर्बाद करने के लिए दूसरे धर्म से अधिक गैर जिम्मेदारी दिखाने में लगे रहता है. ऐसे में अगर नमाज से जाम होने वाली सडक़ों के मुकाबले अगर हिंदू मंदिरों के सामने कोई विशाल आरती होने लगे सडक़ों के बीच विशाल भंडारा लगने लगे तो क्या होगा? नमाज तो हफ्ते में एक दिन पढ़ी जाती है, लेकिन आरती तो सडक़ों पर रोज की जा सकती है, दिन में दो बार की जा सकती है। इसका मुकाबला कैसे तय होगा कि किसे कितनी इजाजत मिले? हेगड़े ने मस्जिदों से लाउडस्पीकर से दी जाने वाली अजान की बात उठाई है। दिन में कई बार कुछ -कुछ मिनटों की यह अजान बहुत से लोगों के लिए दिक्कत खड़ी करती है लेकिन इसके टक्कर में साल में कई-कई दिन, शायद दर्जनों दिन हिंदू मंदिरों से और हिंदू धार्मिक आयोजनों से रात-रात भर जगराते के लाउडस्पीकर बजते हैं, अखंड रामधुन एक-एक हफ्ते चलती है, और तरह-तरह के घरेलू हवन और यज्ञ में भी लाउडस्पीकर लगा दिया जाता है। अब इसका हिसाब कैसे लगाया जाए कि दिन में 5 बार अजान में कितने वक्त लाउडस्पीकर चलता है, और अखंड रामधुन में उससे कम घंटे चलता है या उससे अधिक घंटे चलता है?
धर्म से परे भी अगर हम ध्वनि प्रदूषण की बात करें, तो जितने धार्मिक जुलूस निकलते हैं, उन्हीं के टक्कर के लाउडस्पीकर शादी की बारात में भी चलते हैं, किसी तरह के विजय जुलूस में भी चलते हैं, और मोटे तौर पर लाउडस्पीकर का कारोबार करने वाले लोग कानून को हाथ में लेकर चलते हैं, और अपने को मिलने वाले पैसों को जायज ठहराने के लिए अधिक से अधिक ऊंची आवाज में इसे बजाते हैं। यह पूरा सिलसिला बहुत खतरनाक है, सार्वजनिक जीवन में अराजकता पूरी तरह खत्म होनी चाहिए चाहे, वह सडक़ों पर नमाज हो, चाहे वह सडक़ की चौड़ाई को घेरते हुए गणेश और दुर्गा बैठाने का मामला हो, चाहे वह प्रतिमा स्थापना और विसर्जन के जुलूस हों, चाहे वे किसी रिहायशी इलाके में किसी मंदिर या गुरुद्वारे में बजने वाले लाउडस्पीकर हों। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। राजनीतिक दल धार्मिक तत्वों को खुश करने के लिए कभी इन पर कोई कार्यवाही नहीं करेंगे और कट्टरता बढ़ते-बढ़ते ऐसी बढ़ती है कि अभी धर्मांध निहंगों ने एक गरीब दलित को काट-काट कर उसके बदन के हिस्से टांग दिए और हत्यारे का सार्वजनिक अभिनंदन करते हुए उसे पुलिस के सामने पेश किया गया। यह सिलसिला देश में हाल के वर्षों में एक सबसे ही खतरनाक, वीभत्स, और हिंसक मामला था जिससे कुछ लोग हिले हैं, और कुछ लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि धर्म के नाम पर तमाम हिंसा उन्हें जायज लगती है।
हिंदुस्तान में केवल अदालतों को यह काम करना पड़ेगा कि वह धर्म के सार्वजनिक पहलू को काबू में करें, और किसी का जीना हराम न होने दें। आज हालत यह है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के ढेर सारे फैसलों और आदेशों के बावजूद धर्म बेकाबू है, और धर्मांध लोग अंधाधुंध हिंसा करते हैं जो उन्हें खुद को हिंसा नहीं दिखती। एक धर्म के लोगों को मिसाल के तौर पर दूसरे धर्म की अराजकता और हिंसा हासिल रहती है और देखा-देखी सिलसिला बढ़ते चले जा रहा है। इस सिलसिले को खत्म करना चाहिए। धर्म एक निजी आस्था का सामान रहना चाहिए जिसके लिए लोग अपनी निजी जगह पर आराधना करें, न कि सार्वजनिक जगह पर अवैध कब्जा करके, अवैध निर्माण करके, नियम-कानून को तोड़ते हुए आराधना करें, लाउडस्पीकर बजाएं। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। धर्म आज हिंदुस्तान की एक सबसे बड़ी दिक्कत हो गई है, एक सबसे बड़ा खतरा बन गया है, जिससे उबरने की जरूरत है।
गालियां ही नाशुक्रे इंसानों की जान बचाने के काम आ रही हैं..
21 अक्टूबर 2021
हिंदुस्तान और दूसरे बहुत से देशों की
अलग-अलग जुबान में सूअर को एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। ठीक उसी
तरह जिस तरह की कुत्ते को, या सांप को। जबकि सूअर दुनिया के बहुत से देशों
में लोगों के खाने के काम भी आता है, और गंदगी को साफ भी करता है। इस पर भी
लोग उसे बहुत बुरी गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं और कुछ धर्मों में तो
सूअर को बहुत ही बुरा माना जाता है, और अगर उस धर्म के लोगों को भडक़ाना हो
तो किसी एक सूअर को मारकर उस धर्म के धर्मस्थल पर फेंक देना दंगा शुरू
करवाने की पर्याप्त वजह हो सकती है। सूअर को लोग गाली की तरह अपने
घर-परिवार के सामने या क्लास के बच्चों के सामने इस्तेमाल करते हैं। किसी
ने कोई बहुत बुरा काम किया तो उसे कहा जाता है कि सूअर जैसा काम मत करो,
मानो कि सूअर बहुत बुरा काम करता है। आमतौर पर जानवरों के खिलाफ जितने
किस्म की कहावतें और मुहावरे प्रचलन में रहते हैं, उन्हें देखते हुए हम कई
बार इस जगह पर लिखते हैं कि इंसानों को अपनी भाषा से बेइंसाफी खत्म करनी
चाहिए। लेकिन कहावतें और मुहावरे उसी युग के बने हुए हैं जिस वक्त जानवरों
के अधिकारों का सम्मान करना तो दूर रहा, खुद इंसानों में शूद्रों का सिर्फ
अपमान होता था, महिलाओं का सिर्फ अपमान होता था, और किसी किस्म की गंभीर
बीमारी, विकलांगता वाले लोग गाली बनाने के ही काम के माने जाते थे। इसलिए
अब जब सूअर को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो आज की 2 खबरें याद
पड़ती हैं।
यूरोप में हालैंड के एमस्टरडम एयरपोर्ट के आसपास किसान एक मीठी कंद उगाते हैं, और जब मिट्टी खोदकर फसल निकाली जाती है तो कंद के कुछ टुकड़े जमीन में रह जाते हैं और कंद के साथ-साथ कुछ तरह के केंचुए वगैरह बाहर आ जाते हैं। इनको खाने के लिए वहां पर बड़े-बड़े पंछी टूट पड़ते हैं, और लगे हुए एयरपोर्ट पर आते-जाते विमानों के लिए खतरा बन जाते हैं। विमानों के जेट इंजन में अगर कोई बड़ा पंछी चले जाए तो क्रैश लैंडिंग करने की नौबत भी आ जाती है। ऐसे में इस एयरपोर्ट ने एक तरकीब निकाली है, उसने ऐसे खेतों के एक हिस्से में 20 सूअर छोड़ दिए जो कि निकली हुई कंद को तेजी से खाकर खत्म कर रहे थे और एक दिन के भीतर ही उन्होंने कंद के निकले हुए सारे टुकड़े खत्म कर दिए। नतीजा यह हुआ कि यहां पंछियों का आना रुक गया। दूसरी तरफ एयरपोर्ट के एक अलग तरह तरफ, इतनी ही जमीन को बिना सूअर रखा गया और वहां फसल से निकले गए मीठे कंद के टुकड़े पड़े रहे, और उन्हें खाने के लिए बड़े-बड़े पंछी पहुंचते रहे। अब एयरपोर्ट के आसपास के इलाके को पंछियों से मुक्त रखने के लिए यह तरकीब दूसरी जगहों पर भी आजमाने की बात चल रही है।
लेकिन एक दूसरी खबर यूरोप से अलग अमेरिका के न्यूयॉर्क से आई है जहां पर चिकित्सा वैज्ञानिकों ने एक सूअर की किडनी को एक इंसान के शरीर से जोड़ दिया है और वह किडनी ठीक से काम कर रही है। इस ट्रांसप्लांट के पहले सूअर के जींस में इंसानी जींस भी डाले गए थे ताकि मानव शरीर सूअर की किडनी को तुरंत खारिज ना कर दे। यह प्रयोग ब्रेन डेड घोषित हो चुके एक मरीज के शरीर पर उसके परिवार की इजाजत से किया गया, और सूअर की किडनी को इस मरीज के शरीर के बाहर ही रखा गया था जहां वह मरीज की खून की नलियों के साथ ठीक से काम करते रही। डॉक्टरों ने ट्रांसप्लांट के इस प्रयोग को पूरी तरह सामान्य बतलाया है और इसे पहली बार दूसरे प्राणी की किडनी का सफल ट्रांसप्लांट भी कहा है। आज दुनिया भर में एक लाख से अधिक लोग अंग प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे हैं जिसमें से 90 हजार सिर्फ किडनी की कतार में हैं।
यह बात कई बरस पहले भी सामने आई थी जब यह कहा गया था कि सूअर का शरीर इंसान के शरीर से सबसे अधिक मिलता-जुलता है और किसी दिन सूअर के अंग इंसान को लग सकेंगे, इससे दो किस्म की नैतिक अड़चन आ रही थी एक तो यह कि कई धर्मों में सूअर को बहुत ही निकृष्ट प्राणी माना जाता है, ऐसे धर्म के लोग सूअर के अंग लगे हुए इंसानों को क्या मानेंगे? इंसान मानेंगे या सूअर मानेंगे? दूसरा नैतिक सवाल यह खड़ा होता है कि सूअर को इंसान के करीब लाने के लिए जब इंसान के जींस सूअर के शरीर में डाले जाते हैं, तो फिर वह सूअर क्या खाने के काम में भी लाया जा सकता है? या उसे खाना इंसानों के एक हिस्से को खाने जैसा तो नहीं मान लिया जाएगा? लेकिन ये दोनों नैतिक सवाल ऐसे नहीं हैं जिनका रास्ता न निकल सके। सूअर के अंग लगवाना तो दूर की बात है, आज भी अलग-अलग धर्मों के लोग अलग-अलग किस्म से काटे गए जानवरों को ही खाते हैं। मुस्लिमों के तरीके से काटे गए जानवरों को सिक्ख नहीं खाते और सिक्खों के तरीके से काटे गए जानवरों को मुस्लिम नहीं खाते। ऐसा ही कुछ और धर्मों में भी है। लेकिन परहेज की अपनी सीमाएं हैं, जिनको मानने में किसी को बहुत दिक्कत भी नहीं होती। इसी तरह जिन इंसानों को सूअर की किडनी या उसके दूसरे अंगों से परहेज नहीं होगा वही ऐसे अंग लगवाएंगे, और जिन्हें सूअर से परहेज है, वे या तो इंसानी अंग का इंतजार करेंगे या चल बसेंगे।
अभी हम इस बहस में पडऩा नहीं चाहते कि एक जानवर को उसके अंगों के लिए इस तरह से मारना कितनी बड़ी हिंसा है। क्योंकि उसके अंगों के लिए नहीं तो उसके मांस के लिए उसे मारा तो जाता ही है। इसलिए किसी जानवर का मारा जाना इतना बड़ा नहीं नैतिक मुद्दा भी नहीं है और वैज्ञानिक मुद्दा तो है ही नहीं। देखना यही है कि जिस सूअर को सबसे गंदा और सबसे निकृष्ट प्राणी मानकर लोग जिससे नफरत करते हैं, और बिना किसी वजह के नफरत करते हैं, उस प्राणी के बचाए हुए लोग बचना चाहेंगे या नहीं बचना चाहेंगे?
फिलहाल तो लोगों को अपनी जुबान सुधारनी चाहिए और पशु-पक्षियों को गालियां देना बंद करना चाहिए। ऐसा इसलिए भी करना चाहिए कि कुछ विज्ञान कथाओं में पहले भी ऐसा जिक्र हुआ है जिसमें इंसानों की नस्ल के करीब के माने जाने वाले बन्दर जैसे किसी प्राणी के शरीर में इंसान के जींस डालकर उसे एक टापू पर रेडियो कॉलर लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जिस दिन उस इंसान को अंग प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है तो वह पहुंचकर उस टापू के अस्पताल में भर्ती होते हैं, और रेडियो कॉलर के रास्ते उस प्राणी को ढूंढकर लाया जाता है, और उसके शरीर के अंग निकालकर इंसान को लगाए जाते हैं। रॉबिन कुक नाम के एक विज्ञान उपन्यासकार ने दशकों पहले यह कहानी लिखी थी जो कि अभी न्यूयॉर्क में सही साबित होते दिख रही है, और ठीक उस कहानी की तरह पहले सूअर के शरीर में इंसान के जींस डाले गए ताकि उसके अंग इस तरह तैयार रहें कि इंसान का शरीर उन्हें तुरंत ही रिजेक्ट ना कर दे। जानवर आज भी इंसानों के काम आ रहे हैं और आगे भी काम आते रहेंगे। इसलिए लोगों को अपनी कहावतें और मुहावरे सुधारने चाहिए, अपनी बोलचाल की और लिखने की भाषा भी सुधारनी चाहिए और कुत्ते, सूअर इन सबको गालियों की तरह इस्तेमाल करना बंद करना चाहिए।
उत्तराखंड पर कुदरत की लगातार मार से सबक लेने की जरूरत पूरे देश को है..
20 अक्टूबर 2021
करीब 2 बरस की कोरोना के रुकावट के बाद अब
उत्तराखंड में चार धाम की यात्रा शुरू होने को थी, कानूनी दिक्कतें भी सब
हट गई थीं, और वहां पर ऐसी बाढ़ आई है कि अब तक 50 के करीब मौतें हो चुकी
हैं, बहुत से लोग गायब हैं। भारी बारिश हुई है, नदियां उफन रही हैं,
बड़े-बड़े रास्ते बंद हैं, सैलानी जगह-जगह फंसे हुए हैं, और फौज बचाव के
काम में लगी हुई है। मौतों की तकलीफ से परे एक बात यह भी है कि उत्तराखंड
का पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है, देश भर से आए पर्यटक जगह-जगह फंसे हुए
हैं और उन्हें बचाना एक बड़ी चुनौती हो गई है। इससे तुरंत मुसीबत से परे
यह बात भी है कि प्रदेश में बहुत सी जगहों पर किसानों की फसल को भारी
नुकसान हुआ है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले केदारनाथ में जो भयानक
बाढ़ आई थी और जिसमें हजारों मौतों का अंदाज था, हजारों लोगों का अभी तक
कोई पता भी नहीं चला है, उसके बाद यह एक बड़ा हादसा है हालांकि मौतें कम
हैं लेकिन सैलानी जिस तरह प्रभावित हुए हैं उससे यह बात साफ है कि आने वाले
वक्त में भी सैलानी यहां आने से कतराएंगे। दूसरी तरफ यही एक ऐसा वक्त है
जब कश्मीर पहुंचने वाले सैलानी वहां छाँट-छाँट कर की जा रही हत्याओं को
लेकर सदमे में हैं और कश्मीर का पर्यटन कारोबार भी बुरी तरह प्रभावित होने
जा रहा है।
उत्तराखंड के इस ताजा प्राकृतिक हादसे के कई पहलू हैं। पहली बात तो यह कि पूरी दुनिया में मौसम की जो सबसे बड़ी और सबसे कड़ी मार के मौके हैं, वे लगातार बढ़ते चल रहे हैं, और वेदर एक्सट्रीम कही जाने वाली घटनाएं बार-बार हो रही हैं। मौसम में जो तब्दीली इंसानों की करतूतों से आई है, उसी का नतीजा आज उत्तराखंड में इस तरह देखने मिल रहा है। इसके पहले भी लोग लगातार यह बात कर रहे थे कि क्या भारत के पहाड़ी इलाके सचमुच ही इतने पर्यटकों को झेलने की हालत में हैं? क्या वहां पर इतनी सैलानी गाडिय़ों का धुआं, सैलानियों का इतना कचरा, सैलानियों का लाया हुआ खपत का इतना प्रदूषण, क्या ये पहाड़ सचमुच इतना सब कुछ झेलने की हालत में हैं? लगातार होटलों को बनाने के लिए, सडक़ों को चौड़ा करने के लिए, पुल बनाने के लिए, पेड़ कट रहे हैं, जंगल घट रहे हैं, और पत्थरों का सीना चीरकर लोगों की आवाजाही का, रहने का रास्ता तैयार किया जा रहा है। इन सबसे इस पहाड़ी इलाके की प्रकृति पर बड़ा बुरा असर पड़ रहा है जो कि पहले भी भूकंप के खतरे के बीच रहती है। इसलिए आज बिना देर किए यह भी सोचने की जरूरत है कि हिंदुस्तान के पर्यटन केंद्र कितने लोगों को झेल सकते हैं, किन मौसमों में झेल सकते हैं, और अगर पर्यटन उद्योग घटता है, तो फिर इन इलाकों की अर्थव्यवस्था का क्या होगा, क्योंकि यहां का कारोबार कश्मीर के कारोबार की तरह ही सैलानियों पर जिंदा रहता है। आतंक की वारदातों से या प्राकृतिक विपदाओं से जब कभी सैलानी घट जायेंगे तो इस इलाके में रोजगार की बहुत बड़ी दिक्कत खड़ी होगी। इसलिए पर्यटन कारोबार, प्राकृतिक विपदाओं, और जलवायु परिवर्तन के बीच एक संतुलन बनाकर चलना पड़ेगा जो कि आसान बात नहीं है। हिंदुस्तान जैसे देश में जहां पर पर्यटन कारोबार को नियंत्रित करने का अधिकतर अधिकार राज्य सरकारों का रहता है, वहां पर बहुत सोच-विचारकर कोई काम इसलिए नहीं होता कि राज्य सरकारें 5 बरस के लिए ही आती हैं और उन्हें उससे अधिक वक्त की बहुत फिक्र भी नहीं रहती। इसी उत्तराखंड के बारे में यह बात समझने की जरूरत है कि किस तरह वहां हर एक-दो बरस में मुख्यमंत्री बदलते आए हैं, तो ऐसे बदलते हुए मुख्यमंत्रियों से बहुत दीर्घकालीन योजनाओं की उम्मीद भी नहीं की जा सकती।
दूसरी बात यह भी है कि हिंदुस्तान जैसे बड़े देश को जो कि बहुत विविधताओं वाला है और जहां पर पर्यटन के चुनिंदा इलाकों के बहुत से विकल्प हो सकते हैं, जहां पर बहुत सी ऐसी अच्छी जगहें बाकी हैं जहां पर अभी तक सैलानियों के जाने का कोई ढांचा नहीं बना है, तो हिमाचल, उत्तराखंड, कश्मीर जैसे परंपरागत पहाड़ी पर्यटन केंद्रों के साथ-साथ ऐसे दूसरे पर्यटन केंद्र भी विकसित करने की जरूरत है जिससे देश में कारोबार के कुल जमा मौके कम न हों। वैसे हो सकता है कि किसी एक प्रदेश में मौके कम हों, लेकिन हिंदुस्तान जैसे देश में तो लोग सारे प्रदेशों में आ-जाकर वहां कोई न कोई रोजगार और कारोबार ढूंढ ही लेते हैं। इसलिए देश को राष्ट्रीय स्तर पर यह सोचना चाहिए कि साल के अलग-अलग महीनों के लिए लोगों के पास समंदर से लेकर पहाड़ तक कौन से विकल्प हो सकते हैं? ऐसा करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी अच्छा होगा और देश का राष्ट्रीय एकता का ढांचा भी इससे विकसित होगा। आज देश के लोकप्रिय पर्यटन केंद्र भीड़ से भरे रहते हैं, और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में ऐसे प्रदेश हैं जिनको लोगों ने देखा भी नहीं रहता। कुदरत की ऐसी मार को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर पूरे कैलेंडर को सामने रखकर, और अलग-अलग किस्म की जगहों को उनके मौसम के मुताबिक जांचकर पर्यटन का एक ढांचा विकसित करना चाहिए जिससे लोगों को भी जाने-आने का, देश को देखने का मौका मिले।जिम्मेदार-जागरूक इंसानों की पूरी देह सिमट गई है महज आंखों और एक अंगूठे तक !
19 अक्टूबर 2021
अमरीका के लोग अपने अधिकारों को लेकर दुनिया
में सबसे अधिक चौकन्ने लोगों में माने जाते हैं, और आज हालत यह है कि
कोरोनावायरस की महामारी के बीच भी अमेरिकी लोग अपनी सरकारों से लड़ रहे हैं
कि वे मास्क नहीं लगाएंगे, या टीके नहीं लगवाएंगे, और इसके बावजूद वे
विमान में सफर करना चाहेंगे, या दफ्तर में काम करने जाना चाहेंगे। अधिकारों
की यह पराकाष्ठा अमेरिका की तरह किसी और देश में देखने नहीं मिलती जहां
लोग महामारी के बीच भी सडक़ों पर आकर मास्क जलाकर अपना रुख जाहिर करते थे और
सरकारी प्रतिबंधों का विरोध करते थे। ऐसे अमेरिका में एक ताजा मामला सामने
आया है जिसे अधिकारों की इस जागरूकता से जोडक़र देखने की जरूरत है।
अमरीका के फिलाडेल्फिया राज्य में एक ट्रेन में सफर कर रही महिला के बगल में बैठे हुए एक निहत्थे मुसाफिर ने उसके कपड़े फाडऩा शुरू कर दिया और फिर वहीं उसके साथ बलात्कार किया। वह अकेली महिला अपनी पूरी ताकत से इसका विरोध करती रही, लेकिन उस आदमी का मुकाबला नहीं कर पाई। करीब 10 मिनट तक चले इस हमले को आसपास के लोग दूसरे मुसाफिर न सिर्फ देखते रहे, बल्कि अपने मोबाइल फोन से फोटो भी खींचते रहे, और वीडियो भी बनाते रहे। उस महिला का बयान और ट्रेन के डिब्बे में लगे सुरक्षा कैमरों की जांच से यह पता लगता है कि इतनी संख्या में मुसाफिर आसपास थे कि वे मिलकर इस बलात्कारी को पकड़ सकते थे, रोक सकते थे, उनमें से हर किसी के पास मोबाइल फोन थे जिससे वे 911 नंबर डायल करके पुलिस को खबर कर सकते थे या ट्रेन के डिब्बे के भीतर लगे हुए इमरजेंसी अलार्म की बटन दबा सकते थे, या जोरों से चीखकर भी बलात्कारी को डरा सकते थे। लेकिन उन्होंने इनमें से कोई भी काम नहीं किया। उस डिब्बे में पहुंची एक सरकारी कर्मचारी ने जब इस महिला की हालत देखी तो उसने रेलवे और पुलिस दोनों को खबर की, अगले स्टेशन पर इस महिला को उतारकर अस्पताल भेजा गया और उस बलात्कारी को गिरफ्तार किया गया। अब फिलाडेल्फिया के सरकारी वकील यह तय करेंगे कि डिब्बे में मौजूद दूसरे लोग जिन्होंने ऐसी मुसीबत के वक्त भी उस महिला की मदद नहीं की, क्या उनके खिलाफ किसी तरह की कानूनी कार्यवाही की जा सकती है? हालांकि जो लोग ऐसी नौबत में आसपास के लोगों को मदद के लिए आगे बढऩे की ट्रेनिंग देते हैं उनका यह भी कहना है कि लोगों के आगे ना आने की कई वजहें हो सकती हैं जिनमें से एक यह कि वे सदमे में चले जाते हैं, दूसरी वजह ये कि वे यह मानकर चल रहे हैं कि कोई और पहल करें, और तीसरी वजह यह भी हो सकती है कि उन्हें यह भरोसा ना हो कि वे अगर पहल करें तो दूसरे लोग साथ देंगे या नहीं। लेकिन इस मामले में बलात्कारी जाहिर तौर पर निहत्था था, वह एक अकेली महिला से डिब्बे के भीतर बलात्कार कर रहा था, और आसपास के लोग उसका फोटो ले रहे थे उसके वीडियो बना रहे थे, जबकि वे इतनी संख्या में थे कि वे बलात्कार रोक सकते थे।
इस बात को समझने की जरूरत है कि जो समाज अपने अधिकारों को लेकर इस कदर चौकन्ना रहता है कि बात-बात में सरकार के खिलाफ, स्थानीय संस्थाओं के खिलाफ अदालतों तक पहुंच जाता है, मुकदमे दायर करने लगता है, ऐसा समाज अपने बीच किसी महिला पर हुए ऐसे हमले की नौबत में कैसे दर्शनार्थी बने रहता है, बल्कि कैसे वह इसका वीडियो बनाते बैठे रह सकता है, जबकि किसी एक की पहल करने पर और लोग भी सामने आ सकते थे, या किसी एक के चीखने-चिल्लाने पर बलात्कारी डरकर हट सकता था। अपने अधिकारों और अपनी जिम्मेदारियों के बीच का यह बहुत बड़ा फासला अमेरिकी समाज की आज की एक बहुत ही कड़वी और दर्दनाक हकीकत बतलाता है कि लोगों की कानूनी जागरूकता महज अपनी मतलबपरस्ती तक सीमित है, और अपनी जिम्मेदारियों को लेकर उनके बीच जागरूकता नहीं है, उन्हें उसकी परवाह भी नहीं है। अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग किस्म के कानून हैं, और शायद इस राज्य फिलाडेल्फिया में ऐसा कानून नहीं है कि किसी जुर्म के गवाह लोगों को जुर्म के शिकार की किसी तरह की मदद करना ही चाहिए। इसलिए हो सकता है कि इस डिब्बे के बाकी मुसाफिरों के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही ना हो सके।
एक दूसरी हकीकत यह है जो अमरीका के बाहर भी बाकी दुनिया पर भी लागू होती है कि आज लोगों ने मानो अपनी आंखों से कोई भी उल्लेखनीय, महत्वपूर्ण, चौंकाने वाली या सदमा पहुंचाने वाली बात देखना बंद कर दिया है। आज लोग इनमें से जो भी देखते हैं, वह किसी मोबाइल कैमरे के मार्फत देखते हैं। उनके भीतर के इंसान ऐसे मोबाइल फोन के पीछे रहते हैं और कैमरे का लेंस मानो एक सरहद बन जाता है जिसके पास जाकर इन इंसानों को किसी दूसरे की कोई मदद करना जरूरी नहीं रहता। लोगों को याद होगा कि पिछले बहुत सालों से एक कार्टून चारों तरफ फैला हुआ है जिसमें पानी में डूबते हुए किसी एक इंसान का एक हाथ ही बचाने की अपील करता हुआ सतह के ऊपर, बाहर दिख रहा है, और किनारे खड़े हुए दर्जनों लोग अपने-अपने मोबाइल फोन से उसकी फोटो ले रहे हैं, या उसका वीडियो बना रहे हैं। यह नौबत बहुत ही खतरनाक है। हम बहुत दूर जाना नहीं चाहते, अभी 4 दिन पहले ही दिल्ली-हरियाणा सीमा पर किसान आंदोलन के धरना स्थल के पास ही निहंगों के एक जत्थे ने एक दलित नौजवान को सिख धार्मिक ग्रंथ की बेअदबी के आरोप में काटकर टांग दिया, और इस क़त्ल को रोकने वाले कोई नहीं थे। सिख निहंगों ने इस पूरे जुर्म की तोहमत अपने पर ली है और शान से सम्मान करवाते हुए पुलिस के सामने समर्पण किया है। अब जांच में ही पता लग सकेगा कि क्या इतनी हिंसा और इतना खून-खराबा यह किसान आंदोलन के पास, उनके देखते हुए हुआ, या उनके देखे बिना हुआ। और यही एक मामला नहीं है, हिंदुस्तान में जगह-जगह जहां-जहां भीड़त्या कर दी जाती है, या कि गुंडे और दबंग किसी एक गरीब या कमजोर पर हिंसा करते हैं, उसे मार डालते हैं, या जख्मी करते हैं, या उसके कपड़े उतारकर उसका जुलूस निकालते हैं, किसी महिला के साथ भी ऐसा सुलूक करते हैं, और लोग उसके वीडियो बनाते खड़े रहते हैं। पिछले कई वर्षों में ऐसा कोई वीडियो देखना हमें याद नहीं पड़ रहा जिसमें लोग हिंसा का कोई विरोध कर रहे हैं, उसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए वह आज महज अमरीकियों को गाली देना ठीक नहीं है। यह भी याद करने की जरूरत है कि हिंदुस्तान में जब कोई गिरोह कोई टोली या कोई भीड़त्या करने की हद तक हमलावर हो जाती है, तो हिंदुस्तानी भी महज उसका वीडियो बनाने तक सीमित रहते हैं।
यह पूरा सिलसिला इंसान के भीतर की सोच को एक चुनौती देता है जिसे कि बोलचाल में इंसान इंसानियत कहते हैं। हालांकि इंसानियत और हैवानियत नाम की दो अलग-अलग चीजें होती नहीं हैं, और ये दोनों ही एक ही इंसान के भीतर अलग-अलग अनुपात में हो सकती हैं या होती हैं। यह सिलसिला बहुत ही भयानक है क्योंकि यह एक और झूठ को उजागर करता है जिसे समाज की सामूहिक चेतना कहा जाता है। जब लोग समाज की इज्जत करना चाहते हैं, या समाज के लोगों की इज्जत करना चाहते हैं, तो वे समाज की सामूहिक चेतना जैसे फर्जी शब्द का इस्तेमाल करते हैं। जैसा कि अमेरिकी ट्रेन के एक डिब्बे के लोगों ने साबित किया, या जैसा कि सिंघु बॉर्डर पर एक निहत्थे दलित की हत्या से साबित हुआ, या कि जैसा देश भर में कमजोर तबकों पर सार्वजनिक जुल्म से साबित होता है, समाज की सामूहिक चेतना एक फर्जी मुखौटा है जिसके पीछे कोई सच नहीं होता। सच तो यही होता है कि लोग अपने मोबाइल फोन के कैमरे के लेंस के पीछे महफूज बैठे रहना चाहते हैं, और वे दूसरों पर हो रही हिंसा को भी अपने मजे का सामान मानकर चलते हैं। अपने आसपास के बारे में सोचकर देखें कि क्या आपके इर्द-गिर्द ऐसा कोई बलात्कार होने लगेगा तो आप उठकर, खड़े होकर उसे रोकने की कोशिश करेंगे, या फिर उसका वीडियो ही बनाते रहेंगे। अपने खुद के हौसले और अपनी नैतिक जिम्मेदारी इन दोनों को तौल लेना ठीक है। और इसके साथ-साथ यह भी समझ लेना बेहतर होगा कि आपके घर वालों के साथ अगर ऐसा बलात्कार होगा, और दूसरों के पास महज वीडियो कैमरे की बटन दबाने के लिए एक अंगूठा होगा, तो आपको कैसा लगेगा?




