बात की बात, 19 अगस्त 2020

 

बात की बात, 19 अगस्त 2020

 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अगस्त 2020

 

गर पूरा परिवार बाहर के अध्यक्ष का हिमायती है, तो उसमें हर्ज क्या है?

 अभी हफ्ते भर पहले प्रकाशित हुई एक किताब जिसमें अगली पीढ़ी के युवा नेताओं के इंटरव्यू हैं, उसमें ऐसा छपा है कि प्रियंका गांधी ने किताब के लेखकों को कहा है कि वे अपने भाई राहुल गांधी से पूरी तरह सहमत हैं कि किसी गैरकांग्रेसी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। किताब के मुताबिक प्रियंका ने कहा है कि हममें (परिवार) से किसी को पार्टी अध्यक्ष नहीं होना चाहिए, पार्टी के अपना रास्ता खुद तलाशना चाहिए। 

अभी पिछले दो घंटों में देश के तमाम मीडिया में इस किताब से प्रियंका की बातचीत के हिस्से छा गए हैं, और यह किसी किताब की बिक्री के लिए एक शानदार तरीका भी रहता है। लेकिन इन कुछ घंटों में दिल्ली में प्रियंका, या कांग्रेस पार्टी की तरफ से इन खबरों के खिलाफ कुछ नहीं कहा गया है, तो हम भी पहली नजर में किताब के लेखकों से उनकी बातचीत से सही मान रहे हैं। प्रियंका का इंटरव्यू पढऩे लायक है, क्योंकि उसमें परिवार और पार्टी की बहुत सी बातों पर पहली बार उनका बयान आया है, लेकिन आज यहां उस पर लिखने का मकसद कांग्रेस अध्यक्ष के बारे में लिखना है। 

अगर ये बातें सही हैं, तो कांग्रेस पार्टी के पास एक बार गांधी नाम की लाठी के बिना अपने पैरों पर खड़े होने का एक मौका आया हुआ दिख रहा है। और खुद गांधी परिवार के इन तीन लोगों को भी कुछ बरस चैन से गुजारना चाहिए, अगर वे सचमुच ही पार्टी की लीडरशिप से कुछ या अधिक वक्त के लिए अलग होना चाहते हैं, तो शायद यह सबसे सही मौका है, और अगर इस मौके को यह परिवार चूकता है, तो यही माना जाएगा कि वह मन-मन भावे, मूड़ हिलावे का काम कर रहा है। 

आज जब हम इस परिवार के बाहर कांग्रेस अध्यक्ष की संभावना पर चर्चा कर रहे हैं, तो हो सकता है कि पहले हमारी लिखी हुई कुछ बातों से परे जाकर, या उसके खिलाफ भी जाकर हम यहां लिख रहे हों। शीशे पर लुढक़ते पारे की तरह अस्थिर राजनीति में जब हालात बदलते हैं, तो व्यक्तियों और पार्टियों के कुछ पहलुओं के बारे में हमारे जैसे लोगों के खयालात भी बदलते हैं। आज कांग्रेस पार्टी में गांधी परिवार सर्वमान्य और स्वाभाविक नेता है, तो यह यथास्थिति कांग्रेस के लिए पार्टी के भीतर विवादहीन और सुविधाजनक लगती है। लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस की संभावनाएं, और खुद इस परिवार की संभावनाएं यह स्थिति जारी रहने पर कमजोर लगती हैं। हो सकता है कि परिवार से परे की पार्टी  लीडरशिप पार्टी का भी भला कर सके, और इस परिवार को भी सांस लेने का एक मौका दे सके। आज जब तक कांग्रेस में लीडरशिप के स्तर पर कोई शून्य नहीं है, तब तक यह सोचना कुछ मुश्किल है कि उसे कौन भर सकते हैं। लेकिन यह संभावना असंभव नहीं है। 18 बरस प्रधानमंत्री रहने के बाद जब नेहरू गुजरे थे, तो उनके रहते-रहते ही यह सवाल उठने लगा था कि नेहरू के बाद कौन? लेकिन नेहरू के बाद भी हिन्दुस्तान खत्म नहीं हुआ, जब भारतीय जनता पार्टी संसद में दो सीटों पर आ गई थी, तब भी उसकी संभावनाएं खत्म नहीं हुई थीं, और आज वह संसद में फर्श, दीवार, और छत तक पर काबिज हुई है। जब इमरजेंसी लगी थी, तो उसके बाद के चुनाव में इंदिरा का जो हाल हुआ था, उससे लगता था कि अब वे खत्म हो गई हैं, लेकिन वे तो ढाई बरस के भीतर ही खुद-गिरी जनता पार्टी सरकार के बाद सत्ता पर आ गई थीं। नरसिंहराव के प्रधानमंत्री रहते हुए सोनिया परिवार से कोई भी न पार्टी अध्यक्ष थे, और न ही किसी मंत्री पद पर भी थे, लेकिन फिर भी यह परिवार पार्टी की सत्ता पर फिर से आ गया, और लगातार दो कार्यकाल के लिए मनमोहन सिंह की सरकार बनाने में कामयाब हुआ। इसलिए इस परिवार को ऐसी किसी दहशत में रहने की कोई जरूरत भी नहीं है कि एक बार पार्टी की कमान किसी बाहरी के हाथ चली गई, तो वह घर में लौटेगी ही नहीं। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि काबिल मालिक वे नहीं होते हैं, जो कि अपने कारोबार को बर्बाद करने की हद तक खुद चलाते हैं, काबिल मालिक वे होते हैं जो काबिल मैनेजर रखकर उसके हाथों कारोबार को कामयाब बनाते हैं। 

किसी पार्टी में इतनी जिंदगी बाकी भी रहना चाहिए कि वह सबसे आसानी से हासिल एक विकल्प से परे सोचने की मशक्कत भी कर सके। बिना ऐसी मशक्कत के, पार्टी के बाकी लोगों के सामने बिना किसी संभावना के पार्टी मुर्दा होने लगती है। आज देश में बहुत से ऐसे कांग्रेस नेता हो सकते हैं जो कि पार्टी को राहुल या सोनिया के मुकाबले बेहतर तरीके से चला सकें। पार्टी के नेताओं की क्षमता को कम नहीं आंकना चाहिए। कांग्रेस में प्रदेश स्तर पर भी कई ऐसे नेता हाल के बरसों में उभरकर सामने आए हैं जिन्होंने बड़ी उम्मीदें जगाई हैं। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए जिस दम-खम के साथ भाजपा की रमन सरकार का विरोध किया था, और जिस अभूतपूर्व-ऐतिहासिक बहुमत के साथ उन्होंने कांग्रेस की सरकार बनाई, कुछ वैसी ही मेहनत और लड़ाई की जरूरत कांग्रेस को देश भर में है। 

राहुल, सोनिया, और प्रियंका से परे की कांग्रेस लीडरशिप, कांग्रेस विरोधी पार्टियों, खासकर भाजपा, के हाथों से एक बड़ा मुद्दा भी छीनकर ले जाएंगे। कुनबापरस्ती या व्यक्तिवादी पार्टी का भाजपा का आरोप हमेशा ही कांग्रेस के खिलाफ एक आसान और सदासुलभ हथियार रहा, फिर चाहे उसके अपने साथियों में से अधिकांश ठीक इसी तरह के व्यक्तिवादी और कुनबापरस्त क्यों न रहे हों। भाजपा ने समय-समय पर, और सबसे लंबे समय तक शिवसेना और अकाली दल इन दो पार्टियों पर सवारी की है, और दोनों ही परले दर्जे की व्यक्तिवादी और कुनबापरस्त पार्टियां रही हैं। ठीक ऐसी ही पार्टी बसपा के साथ भी भाजपा की भागीदारी रही है, और एनडीए की दूसरी पार्टियों में दर्जन भर पार्टियां ऐसी ही खूबी या खामी वाली रही हैं। फिर भी भाजपा का अकेला हमला कांग्रेस पर ही होते आया है, और वह भी किसी गैरगांधी पार्टी अध्यक्ष रहने से बेअसर हो जाएगा। 

जो भी कारोबार, या राजनीतिक-सामाजिक काम अधिक चुनौतियों भरे होते हैं, उनमें नया खून हमेशा ही कुछ न कुछ बेहतर संभावनाएं ला सकता है। कांग्रेस को अपने इस राज परिवार की आम सहमति के बाद इनकी हसरत और इनकी जरूरत की इज्जत करनी चाहिए, और अपने आपको एक दीवालिया पार्टी न मानकर दूसरा नेता चुनना चाहिए। हो सकता है कि देश और प्रदेशों में कांग्रेस पार्टी नए लोगों के बारे में सोचे, तो इसके भीतर एक लोकतांत्रिक उत्साह भी आए। अगले आम चुनाव में अभी खासा वक्त है, और यही सही समय है कि पार्टी किसी और को अगर मुखिया चुनने जा रही है तो वह अभी चुना जाना चाहिए, छांटा जाना चाहिए। 

(Daily chhattisgarh)

सरकार से जनता तक लापरवाही-गैरजिम्मेदारी का जानलेवा सिलसिला

 खाने-पीने के शौक के लिए विख्यात शहर इंदौर की एक तस्वीर किसी ने ट्विटर पर पोस्ट की हैं कि वहां बाजारों में लोग खाने-पीने किस तरह टूट पड़े हैं। उस शहर में खाने-पीने की संस्कृति ऐसी है कि लोग रात खाने के बाद भी घर से निकलकर बाजार जाते हैं, और वहां कुछ-कुछ और भी खाते हैं। इसलिए अब तो वैसी भीड़ वहां दिखनी ही थी। लेकिन छत्तीसगढ़ के अलग-अलग कई शहरों से खबर यह है कि कोरोना पॉजिटिव के आंकड़े चाहे कितने ही बढ़ते जाएं, लोग लॉकडाऊन खत्म होने के तुरंत बाद खाने-पीने के लिए निकल पड़े हैं। आबादी का एक बहुत छोटा सा हिस्सा ऐसा होगा जो कि कोरोना से डरा हुआ होगा, बाकी लोगों की धडक़ लॉकडाऊन खुलने के साथ ही खुल गई है। 

राजधानी में सुबह की सैर पर निकले लोग बिना मास्क निकलते हैं, और अगल-बगल सटे हुए चलते हुए गप्प मारते जाते हैं। जितना उन्हें अच्छा लगता है, उतना ही अच्छा कोरोना को भी लगता होगा। लोगों को याद होगा कि जिस वक्त लॉकडाऊन दुबारा लगाने की नौबत आ रही थी उस वक्त उसे दो-तीन दिन लेट किया गया क्योंकि सामने हरेली का त्यौहार था। आज फिर पोला के मौके पर उसी तरह का माहौल दिख रहा है, सरकारी जलसा भी चल रहा है, और लोगों के बीच भी त्यौहारों का माहौल सिर चढक़र बोल रहा है। कोरोना को और चाहिए क्या? वह नास्तिकों के बीच तो भूखों मर जाता है, लेकिन आस्तिकों के बीच उसके शिकार चलकर पहुंचते हैं। 

लापरवाह लोगों को याद रखना चाहिए कि उनके परिवार के बच्चे और बूढ़े बेबस हैं कि वे उन्हें रोक नहीं सकते, लेकिन उनसे कोरोना पाने का खतरा जरूर रहते हैं। इसी तरह दफ्तरों के बड़े लोग, कारोबार के मालिक अगर लापरवाह होते हैं, तो उनके मातहत भी खतरा झेलते हैं। ऐसे लापरवाह लोगों को देश का झंडा उठाकर राष्ट्रप्रेम साबित करने में तो बड़ा मजा आता है, लेकिन उन्हें यह फिक्र नहीं रहती कि इस देश के लोगों को बचाने के लिए पुलिस, स्वास्थ्य कर्मचारी, और एम्बुलेंसकर्मियों जैसे लोग अपनी जान दे रहे हैं ताकि कोरोनाग्रस्त लोग बच सकें। जो अब तक कोरोना से बचे हुए हैं, वे न अपनी सोच रहे, न परिवार की, न ऐसे कोरोना-योद्धाओं की। 

आज देश की हालत यह है कि कोरोना के तनाव के चलते आत्महत्याएं लगातार बढ़ रही हैं, और एक-एक आत्महत्या के पीछे दसियों हजार लोग मानसिक अवसाद को शिकार होकर हताश बैठे हैं, दहशत में हैं। इनमें से किसी भी बात की फिक्र किए बिना जब संपन्न और विपन्न सभी किस्म के लोग लापरवाही में ऐसे लगे हैं कि उसका उन्हें कोई भुगतान होना है। ऐसे लोग ही जिंदगियां बचाने वाले लोगों की जिंदगियां लेने के जिम्मेदार भी हैं। 

दरअसल हिन्दुस्तानी लोगों की सामूहिक जिम्मेदारी की भावना शून्य है। सडक़ पर कोई एक फिसलकर गिर पड़े, तो आसपास के तमाम लोगों को पहले हॅंसी आती है, उसके बाद उन्हें उठाने के लिए उनके हाथ बढ़ते हैं। किसी सामान की ट्रक पलटती है तो उसे लूटने में लोग सबसे आगे रहते हैं। पुलिस मुफ्त में हेलमेट या मास्क बांटती है, तो संपन्न तबके लोगों की लार भी टपकने लगती है कि मुफ्त का जो-जो मिल जाए अच्छा है। जिस देश को अपने ऊपर दुनिया का सबसे अच्छा देश होने का घमंड हो, जो अपने आपको सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां बताता हो, उस देश का हाल यह है। लोग दूसरों की जान ले लेने की हद तक लापरवाह हैं, गैरजिम्मेदार हैं, और सरकारें इस कदर कायर हैं कि वे ऐसे लापरवाह लोगों पर कोई कार्रवाई करने के बजाय उन्हें मुफ्त में मास्क बांटती हैं। मुफ्त के मास्क के मुकाबले हजार-हजार रूपए जुर्माना होने लगे, तो हिन्दुस्तानी जनता में जिम्मेदारी थोड़ी सी आ भी सकती है। 

इस देश में सरकारें इस कदर गैरजिम्मेदार हैं कि जून के आखिरी हफ्ते में केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर ने कोरोना-वैक्सीन पर मानव परीक्षण के लिए इतनी तैयारियां कर लेने को कहा था कि 15 अगस्त को उसकी घोषणा हो सके। उस वक्त तक मानव परीक्षण बस शुरू होने की तारीख भर आई थी कि 7-8 जुलाई से परीक्षण शुरू होगा, और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने वैक्सीन उतारने की तारीख भी छांट ली थी कि आजादी की सालगिरह पर यह काम किया जाएगा। ऐसे गैरजिम्मेदार देश में आम जनता की गैरजिम्मेदारी किसी हैरानी की बात नहीं है। सरकार और केन्द्र सरकार के संगठनों के रूख लोगों का रूख भी तय करते हैं। आज देश में सामूहिक जिम्मेदारी और सामूहिक जवाबदेही शून्य है। यह बात किसी भी राष्ट्रीय खतरे की घड़ी में खतरे को कई गुना बढ़ा सकती है, बढ़ाती है। अमरीका कोरोना के खतरे के बीच एक अलग किस्म का खतरा झेल रहा है, वहां पर लोग मास्क न पहनने को अपना बुनियादी संवैधानिक अधिकार मानकर चल रहे हैं, और मास्क की तमाम बंदिशों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, सार्वजनिक और सामूहिक रूप से मास्क जला रहे हैं। अपने बुनियादी अधिकारों को लेकर लोगों को सेहत के खतरे भी दिखना बंद हो गए हैं, और सरकार के निर्देश मानना भी उन्हें गैरजरूरी लग रहा है। हिन्दुस्तान में सरकार कागजी निर्देश तो इतने दे रही है कि कोई फोन करने पर पहले 20 सेकेंड सिर्फ कोरोना से सावधानी सुननी पड़ रही है, ऐसे में कभी यह भी हो सकता है कि किसी इमरजेंसी में, पुलिस, फायरब्रिगेड, या एम्बुलेंस को बुलाने के लिए फोन लगाया जाए, और कोरोना सुनते हुए ही कोई दम तोड़ दे। दूसरी तरफ लोगों के बीच यह टेलीफोन-चेतावनी मजाक बन गई है, कोरोना का खतरा मजाक बन गया है। एक से अधिक मामलों में केन्द्र सरकार के संगठन यूजीसी या दूसरे कोई संगठन ऐसे माहौल में भी इम्तिहान लेना तय कर रहे हैं, और अपने महफूज टापुओं पर बैठे सुप्रीम कोर्ट के जज उन इम्तिहानों पर रोक भी नहीं लगा रहे हैं। खुद जज तो मामलों की सुनवाई वीडियो के मार्फत कर रहे हैं, क्या इम्तिहान देने वाले बच्चों को ऐसी हिफाजत हासिल हो सकेगी?
 
देश का यह सिलसिला जानलेवा साबित होगा। यह लापरवाही जितनी लंबी खिंचेगी, उतनी ही लंबी लोगों की बेरोजगारी, बेकारी, गरीबी भी रहेगी। लोगों को अगले कुछ महीने जिंदा रहने की मदद करके, नियम-कानून कड़ाई से लागू करके, किसी वैक्सीन के आने तक कोरोना के खतरे को अगर टाला जाए, तो ही बेहतर है। आज लापरवाह लोगों को उनकी जुर्माना-भुगतान की ताकत के मुताबिक तगड़ा जुर्माना लगाना चाहिए ताकि लोग बिना मास्क मटरगश्ती करना भूल जाएं, और डॉक्टर-पुलिस जैसे तबकों के लिए खतरा न बनें। सरकारों को इस मौके पर अपनी लोकप्रियता, और वोटरों को खुश रखने की फिक्र नहीं करना चाहिए, देश और दुनिया को इतिहास के इस सबसे बड़े खतरे से बचाने की जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए।

(Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 अगस्त 2020

 

अपने को अतिरिक्त सम्मान का हकदार बना अदालतें लोकतंत्र के खिलाफ हैं...

 भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े की एक परदेसी मोटरसाइकिल सवारी पर सुप्रीम कोर्ट के एक प्रमुख वकील और एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण की ट्वीट को सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की अवमानना माना है, और अभी दो दिन बाद अदालत उनकी सजा तय करेगी। प्रशांत भूषण ऐसी सजा से डरने वाले वकील नहीं हैं, उन्होंने अपने पिता, देश के एक वरिष्ठ वकील और भूतपूर्व कानून मंत्री के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट के बहुत से जजों के भ्रष्ट होने की बात कई बार औपचारिक रूप से कही थी, और शायद 10 बरस पहले से वह अवमानना केस भी चल रहा था, और अब शायद उसे भी खोला जा रहा है। 

हम कुछ दिन पहले इस मुद्दे पर लिख चुके हैं कि हम प्रशांत भूषण के तर्क से सहमत हैं कि कोई जज सुप्रीम कोर्ट नहीं होता, और किसी जज के तौर-तरीकों की आलोचना अदालत की आलोचना नहीं हो सकती। हमारा खुद का यह मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अपने गृहनगर नागपुर में सुबह की सैर पर थे, और वहां खड़ी एक बहुत महंगी विदेशी मोटरसाइकिल को देखकर उनका पुराना शौक जाग गया, और वे मोटरसाइकिल पर बैठकर उसे महसूस करने लगे। इसे लेकर देश में सैकड़ों कार्टून बने, और लाखों ट्वीट की गईं। जाहिर है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को इस तरह सार्वजनिक रूप से देखना देश को बहुत बार तो नसीब होता भी नहीं है। सीजेआई की आलोचना करने वाले भी हजारों लोग थे कि एक भाजपा नेता के बेटे की मोटरसाइकिल पर इस तरह बैठना उन्हें शोभा नहीं देता। हम तो शोभा के ऐसे पैमानों पर भरोसा नहीं करते लेकिन फिर भी चूंकि देश का सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, और यहां तक कि छोटी अदालतें भी अपने मान-सम्मान को लेकर छुईमुई के पौधे की पत्तियों की तरह संवेदनशील रहती हैं, इसलिए उन्हें कम से कम यह सोचना चाहिए कि अपने सार्वजनिक बर्ताव से वे हॅंसी-मजाक या हिकारत का सामान न बनें। 

अब जब यह मुद्दा बन ही गया, और प्रशांत भूषण जैसे दसियों हजार लोगों ने सोशल मीडिया पर अदालत की जमकर चर्चा की, जज की बाईक सवारी की आलोचना की, और अदालत ने सुनवाई करके इसे अपनी अवमानना मान ही लिया, तो देश को आज इस पर चर्चा करनी चाहिए। यह देश अंग्रेजों के उन रीति-रिवाजों से आजाद नहीं हुआ जिन पर इस देश का सुप्रीम कोर्ट और बाकी की न्यायपालिका अभी चलते हैं। अंग्रेजों को अपने ठंडे देश में माकूल बैठने वाली जो काली पोशाक हिन्दुस्तान की सत्ता पर ठीक लगती थी, वही काला बोझ हिन्दुस्तानी न्यायपालिका आज तक ढो रही है। जब धरती खौलती रहती है, तब भी अदालतें वकीलों से काले लबादे में वहां पहुंचने की उम्मीद करती हैं। लेकिन हिन्दुस्तान का लोकतंत्र अंग्रेजों के छोड़े हुए ऐसे लबादों को नहीं ढोता। यह लोकतंत्र एक जिंदा लोकतंत्र है, इसने इमरजेंसी भी देखी है, उससे भी उबरा है, कई और किस्म की तानाशाही भी देखी हैं, उनसे भी उबरा है। इस देश का इतिहास गांधी के आंदोलन का है जो कि उस वक्त की सत्ता से असहमति रखने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाते थे। इस देश को अपने ऐसे गौरवशाली लोकतांत्रिक इतिहास को याद रखना चाहिए, और देश के जो लोग सुप्रीम कोर्ट के रूख से सहमत नहीं हैं, उन्हें अदालत के रूख के खिलाफ एक सविनय अवज्ञा आंदोलन छेडऩा चाहिए। 

आज प्रशांत भूषण की जिस ट्वीट को लेकर सुप्रीम कोर्ट इस कदर संवेदनशील हो गया है, वह आज भी सोशल मीडिया पर मौजूद है। जिन लोगों को लगता है कि प्रशांत भूषण सही हैं, उनके पास आज भी यह हक हासिल है कि वे उस ट्वीट को री-ट्वीट करके कहें कि वे प्रशांत भूषण की बात से सहमत हैं, और वे अपने आपको अदालत के सामने पेश कर रहे हैं कि जो सजा प्रशांत भूषण की, वही सजा उन्हें भी दी जाए। 

सविनय अवज्ञा का आजाद हिन्दुस्तान में यह कोई पहला मौका नहीं रहेगा, और न ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से, उसके रूख से, उसके जजों के सार्वजनिक बर्ताव से असहमति का यह पहला मौका रहेगा। लेकिन लोकतंत्र अदालत से ऊपर है, अदालत लोकतंत्र का एक हिस्सा है, पूरा का पूरा लोकतंत्र नहीं। इसलिए अदालत के इस रूख और प्रशांत भूषण को गुनहगार ठहराने से असहमत लोगों के सामने आज भी यह मौका है कि वे अगले दो दिनों में अपनी असहमति को इतिहास में दर्ज कराएं, और सुप्रीम कोर्ट को यह अहसास कराएं कि उसे महज प्रशांत भूषण को सजा नहीं देनी होगी, हजारों, दसियों हजार, या शायद लाखों लोगों को सजा देनी होगी। 

यह तो हिन्दुस्तान में अदालतों को लेकर एक निहायत ही गैरजरूरी लिहाज बरता जाता है। अमरीका में देखें तो वहां किसी को जज बनाने के पहले लंबी-चौड़ी खुली संसदीय सुनवाई चलती है, और संभावित जज से उसकी निजी जिंदगी, उसकी निजी सोच पर कई-कई दिन तक सवाल पूछे जाते हैं। वहां पर अदालतों में जब कोई नाजुक मामला फैसले तक पहुंचता है, तो सुनवाई के वक्त भी, और फैसले के दिन भी मामले के पहलुओं से जुड़े हुए लोग अदालत के बाहर सडक़ों पर प्रदर्शन करते हैं, बैनर-पोस्टर लेकर नारे लगाते हैं, और खुलकर अपनी बात रखते हैं। आज हिन्दुस्तान में अगर ऐसा हो तो उसे जजों को प्रभावित करने वाला काम मान लिया जाएगा, और उसे अदालत की अवमानना भी मान लिया जाएगा। 

इस देश में संसद और उसकी तर्ज पर विधानसभाओं ने अपने आपको जनता की प्रतिक्रियाओं से महफूज रखने के लिए अलग कानून बना रखे हैं। कुछ बातों को अदालत अपनी अवमानना मानती है, और इस देश की संसदीय व्यवस्था कुछ बातों को अपने विशेषाधिकार का हनन मानती है। संसद और विधानसभाओं को अपार अधिकार दिए गए हैं कि उनका विशेषाधिकार भंग करने वाले लोगों को वे कितनी भी सजा दे सकती हैं। अदालतों की सुनाई गई सजा की तो सीमा है, लेकिन सदन किसी को कितनी भी सजा दे सकता है। यह पूरा सिलसिला अलोकतांत्रिक है। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। किसी एक जज के अधिकार, किसी एक सांसद या विधायक के अधिकार देश के आम नागरिकों के अधिकार से अधिक कैसे हो सकते हैं? अगर अस्पताल में लोग जाकर किसी डॉक्टर को पीटते हैं, तो उस डॉक्टर का क्या कोई विशेषाधिकार हनन होता है? क्या यह उस डॉक्टर की अवमानना गिनी जाती है? उस डॉक्टर के पास पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने, अदालत में केस करने की आजादी रहती है, और उतना ही हक भी रहता है। अदालत या संसद को इससे अधिक कोई हक क्यों होना चाहिए? किसी मामले की सुनवाई के दौरान अगर कोई वकील या गवाह जजों के साथ बदसलूकी करते हैं, तो भी उसके लिए आपराधिक मामला चलाने का एक प्रावधान रहना चाहिए, न कि जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाले लोग उसे अपनी अवमानना मानें। ऐसा मानना यही जाहिर करता है कि जजों और सांसद-विधायकों में लोकतंत्र के लिए संविधान में लिखे गए शब्दों भर की समझ है, और लोकतंत्र की भावना उन्हें छू नहीं गई है। जनता के बीच से आंदोलन खड़ा होना चाहिए ताकि यह सिलसिला खत्म हो सके। देश के किसी भी आम नागरिक, सरकार के किसी भी आम कर्मचारी के अधिकार, उनका सम्मान जजों और सांसद-विधायकों से कम कैसे हो सकता है? इसलिए चुनिंदा तबके अपने सम्मान के पुतले खड़े करें, और फिर उनकी हिफाजत के लिए बंदूकों का घेरा डलवा दें, यह लोकतंत्र नहीं है। संविधान की भावना के खिलाफ जाकर इस देश के ताकतवर तबके ऐसे नियम बनाते आए हैं जो अलोकतांत्रिक हैं। इस काम में संसद और विधानसभाओं के भी मुकाबले न्यायपालिका बहुत आगे है, और उसने अपने आपको लोकतंत्र में अपनी भूमिका के मुकाबले बहुत अधिक और अतिरिक्त सम्मान का केन्द्र बनाकर रखा हुआ है। हम ऐसे भेदभाव के खिलाफ हैं। अदालतों को या किसी भी और संवैधानिक संस्था को ऐसे विशेषाधिकार देना आम जनता के नागरिकता के बुनियादी अधिकारों के खिलाफ है। 

आज इस देश में जो लोकतांत्रिक आंदोलनकारी हैं, उनके सामने यह एक मौका है कि वे अपने आपको प्रशांत भूषण के साथ खड़ा दिखाएं, और इसकी राह तो गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन से दिखाई ही थी। अंग्रेजों के कानूनों की परवाह करके अगर गांधी उस यथास्थिति को बने रहने देते, तो देश तो कभी आजाद होता ही नहीं।

(Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अगस्त 2020

 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 अगस्त 2020

 

आजादी के जलसे की तैयारी के बीच दलित बच्ची की ऐसी रेप-हत्या

 दो दिन पहले आजादी की सालगिरह के जलसे की तैयारी के बीच हमने देश के ऐसे कुछ तबकों को याद किया था जिनके लिए आजादी आज भी नहीं है। जिस 14 अगस्त की दोपहर हम यह लिख रहे थे, और इसके साथ गुजरात के उना में दलितों के साथ हुई हिंसा की तस्वीरों से तिरंगा बना रहे थे, ठीक उसी समय उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी में दिल दहलाने वाली एक और हिंसा दलितों के साथ हो रही थी। तेरह बरस की एक बच्ची दोपहर शौच के लिए गन्ने की खेतों की तरफ गईं, और उसके साथ दो युवकों ने बलात्कार किया, उसकी जीभ काट ली, उसकी आंखें निकाल लीं, और उसके गले में फंदा डालकर खेत में घसीटा, और फिर उसे मार डाला।  गांव के ही संतोष यादव और संजय गौतम पर रेप का आरोप लगा है, और पुलिस ने पोस्टमार्टम में गैंगरेप पाए जाने के बाद इन दोनों को रेप-हत्या में गिरफ्तार कर लिया है। 

हिन्दुस्तान में परिवार और जान-पहचान से परे जितने बलात्कार होते हैं, उनके पीछे एक बात खुलकर दिखती है कि वे समाज में ऊंची समझी जाने वाली जातियों के लोगों द्वारा उनसे नीची समझी जाने वाली जातियों के लोगों पर किए जाते हैं। ऐसा ही कुछ हत्या या हिंसा के दूसरे मामलों में भी होता है कि अपने से कमजोर जाति पर हिंसा के मामलों में दिखता है, हालांकि प्रदेशों की सरकारें और भारत सरकार के आंकड़े ऐसी व्यक्तिगत हिंसा के पीछे जाति के आधार पर विश्लेषण करके सामने रखते नहीं हैं, लेकिन आए दिन आने वाली ऐसी खबरों को देखें तो यह बात साफ दिखती है कि सबसे अधिक निजी हिंसा इस देश में दलितों के खिलाफ होती है, उसके बाद आदिवासियों के खिलाफ, और उसके बाद दूसरी कमजोर जातियों के खिलाफ। जो लोग जातिवादी व्यवस्था के अस्तित्व को मानना नहीं चाहते, वे इसके खिलाफ कुछ तर्क आसानी से ढूंढकर निकाल सकते हैं कि ऐसी हिंसा किसी जाति के आधार पर नहीं होती, बल्कि संपन्नता के आधार पर होती है, और संपन्न लोग विपन्न लोगों के साथ ऐसी ज्यादती इसलिए अधिक करते हैं क्योंकि वे प्रतिरोध करने की हालत में नहीं रहते। हो सकता है कि ऐसा हो, लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि दलित आबादी का अधिकांश हिस्सा सबसे गरीब है, उसके बाद आदिवासियों का अधिकांश हिस्सा गरीब है। लेकिन आदिवासियों के साथ एक बात रहती है कि उन्हें हिन्दू समाज का सवर्ण हिस्सा अछूत नहीं मानता, और उनके साथ उतने जुल्म उन्हें जरूरी नहीं लगते जितने कि दलितों के साथ लगते हैं। मध्यप्रदेश में आज भी बहुत से इलाकों के किसी भी गांव में कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर चढक़र नहीं निकल सकता, और हर बरस ऐसे में हिंसा की कई वारदातें सामने आती हैं, पुलिस की सुरक्षा में ऐसी बारात निकाली जाती है, और अभी कुछ समय पहले की तस्वीरें याद पड़ती हैं जिनमें घोड़ी पर चढ़ा दलित दूल्हा, और हिफाजत करते चल रही पुलिस सवर्ण पत्थरों से बचने के लिए हेलमेट लगाए हुए थे। 

लेकिन उत्तरप्रदेश में अभी जिस दलित बच्ची के साथ यह बलात्कार और हिंसा हुई है, उसे देखकर कुछ और बातों पर भी सोचने को दिल करता है। पहली बात तो यह कि क्या ऐसे जुर्म देखते हुए भी हमें मौत की सजा के खिलाफ अपनी सोच को बदल नहीं देना चाहिए? हमारी सोच महज सोच है, देश का कानून तो ऐसे बलात्कारी-हत्यारों को मौत की सजा दे ही सकता है क्योंकि आज उसका प्रावधान है। बच्ची से सामूहिक बलात्कार, उसके बाद उसकी जीभ काटना, उसकी आंखें निकालना, उसे खेत में घसीटना, और उसे मार डालना, ये सारे काम मौत की सजा से कम किसी लायक नहीं हैं, और जब कभी इस पर फैसला आएगा, हमारा अंदाज है कि मौत की सजा ही होगी। लेकिन उससे कमजोर तबकों पर, कमजोर जातियों पर, बच्चियों पर खतरा कम नहीं हो जाता। उत्तर भारत और मध्यप्रदेश ऐसी दलित ज्यादतियों की अधिक वारदातों वाले राज्य हैं। उत्तरप्रदेश के बारे में यह कहा जाता है कि वहां पुलिस का साम्प्रदायीकरण भी हुआ है, और जातिकरण भी हुआ है। समाजवादी पार्टी के मुलायम-अखिलेश की सरकारों के चलते वहां की पुलिस का यादवीकरण लिखा जाता था। अभी पुलिस की धर्मान्ध और जातिवादी सोच के चलते अल्पसंख्यक तबके, और दलित लगातार समाज और पुलिस दोनों के निशानों पर बने हुए हैं। यह सिलसिला खत्म करने की नीयत उत्तरप्रदेश की किसी पार्टी में नहीं दिखती है, और कमोबेश यही हाल मध्यप्रदेश में भी है। 

दलितों और आदिवासियों की हिफाजत के लिए अलग से कानून बने हुए हैं, और अभी कुछ समय पहले उसके कुछ प्रावधानों की धार भोथरी करने की कोशिश की गई थी, लेकिन पूरे देश में उसका जमकर विरोध हुआ, और वह सिलसिला वापिस लेना पड़ा। दिक्कत यह है कि सरकार, संसद, और न्यायपालिका, मीडिया और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं में अगर इन कमजोर तबकों के लोग भी बैठे हुए हैं, तो भी वे खुद ताकत पाकर सत्ता की एक सोच से लैस हो जाते हैं, और जिन तबकों से वे आते हैं, उनके वर्गहित के खिलाफ काम करने लगते हैं।
 
पिछले दो दिनों से देश में आजादी के बहुत गीत गाए जा रहे हैं, प्रधानमंत्री ने भी कल आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास का सबसे लंबा भाषण दिया है। लेकिन देश में दलितों की जो हालत है, उन पर हिंसा की वारदातों के चलते हुए भी प्रधानमंत्री सहित बहुत से नेताओं के मुंह नहीं खुलते हैं। गुजरात के उना में दलितों पर जुल्म के जो नजारे सामने आए, उन्होंने पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान के लिए शर्मिंदगी पैदा की थी। लेकिन इस देश में फैसले लेने की ताकत रखने वाले तबकों को कोई शर्म नहीं आती, उन्हें आजादी के जलसे मनाने में फख्र जरूर होता है।

(Daily chhattisgarh)