भंडारे की मुनादी के पहले आटा-तेल और हलवाई तो ढूंढ लेना था मोदीजी !
आज देश के बहुत से प्रदेशों में 18 वर्ष से ऊपर वालों को लग रहे टीकों का नजारा सामने आया है जिसे देखकर दिल दहल रहा है। यह समझ नहीं पड़ रहा है कि ये टीके कोरोना से बचाव के लिए लग रहे हैं, या इन टीकों को लगाने के नाम पर लोगों के बीच कोरोना और फैलाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लेकर उत्तरप्रदेश और बिहार के बहुत से केंद्रों तक के वीडियो और फोटो सामने आ रहे हैं कि कैसे उनमें लोगों की कतारों में जमकर धक्का-मुक्की हो रही है। छत्तीसगढ़ में तो फिर भी आय वर्ग के हिसाब से तीन-चार अलग-अलग काउंटर बना दिए हैं, इसलिए यहां भीड़ थोड़ी सी बँटी है लेकिन उत्तरप्रदेश और बिहार में तो हाल भयानक है, और वहां मौजूद लोगों में मारपीट चल रही है, उसके वीडियो पोस्ट किए जा रहे हैं। लोग सोशल मीडिया पर लगातार लिख रहे हैं और मौके पर पहुंचे हुए समाचार एजेंसियों के लोगों को बता भी रहे हैं कि किसी तरह का कोई इंतजाम नहीं है, और पूरी की पूरी भीड़ एक दूसरे से धक्का-मुक्की में लगी हुई है।
लोगों को याद होगा कि 19 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बैठक की और उसके तुरंत बाद यह घोषणा कर दी गई कि 1 मई से पूरे देश में 18 से 44 वर्ष उम्र के लोगों को टीके लगाए जाएंगे, और इसका इंतजाम राज्य सरकार खुद करेंगी, वही इसकी खरीदी करेंगी, वही इसका भुगतान करेंगी, वही इसको लगाएंगी। केंद्र सरकार ने केवल इस आयु वर्ग की घोषणा कर दी और तारीख की घोषणा कर दी। आज नतीजा यह है कि देश की करीब आधी आबादी 18 से 44 बरस उम्र की है और वह टीके लगवाने के लिए एक साथ पहुंचने की हकदार हो गई हैं। कहने के लिए तो केंद्र सरकार ने एक मोबाइल एप्लीकेशन बना दिया है जिससे कि लोग अपना रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं, लेकिन आबादी का एक बड़ा तबका ऐसा है जो न स्मार्टफोन रखता और ना रजिस्ट्रेशन करा सकता, इसलिए वह तबका तो मौके पर ही पहुंच रहा है। टीकाकरण केंद्रों पर जो अंधाधुंध भीड़ दिख रही है और जितनी धक्का-मुक्की चल रही उससे एक बात तो है कि कोरोना टीकों से थमे या नहीं, कोरोना का फैलना तो आज ही तय हो गया है। लोगों को याद होगा कि 20 अप्रैल को हमने इस मुद्दे पर इसी जगह सम्पादकीय लिखा था कि जब तमाम काम राज्यों को ही करने हैं तो केंद्र सरकार कौन होती है जो यह तय करे कि 18 से 44 बरस के लोगों को टीके लगना 1 मई से शुरू होगा? आज न बाजार में टीके हैं, और न ही कंपनियां राज्यों को देने की हालत में हैं। जब मोदी सरकार को खुद को टीके देने थे तो कई किस्म के दर्जे बना दिए गए थे, पहले 60 बरस के ऊपर के लोग, फिर दूसरा दर्जा बना स्वास्थ्य कर्मचारी और फ्रंटलाइन वर्कर, फिर तीसरा दर्जा बना 45 वर्ष से ऊपर के दूसरी बीमारियों के शिकार लोग, और यह दर्जे अभी चल ही रहे हैं। जनवरी से अब तक केंद्र सरकार इन्हीं के लिए राज्यों को पूरी तरह से टीके नहीं दे पाई है। ऐसे में देश की आधी आबादी को 1 मई की तारीख बताकर टीकाकरण के लिए झोंक देना एक बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी का काम था जो कि मोदी सरकार ने अपने पहले के कुछ दूसरे कामों की तरह ही किया। जिस तरह बिना तैयारी के नोटबंदी की गई, बिना तैयारी के जीएसटी लागू किया गया, बिना तैयारी के लॉकडाउन किया गया, उसी तरह बिना किसी तैयारी के 1 मई से इतनी बड़ी आबादी के टीकाकरण की घोषणा कर दी गई। जब राज्यों को सब कुछ अपने ही दम पर करना था तो इस बात को भी राज्यों पर छोडऩा था और राज्य अपने हिसाब से तय करते कि वे पांच-पांच बरस आयु वर्ग के अलग-अलग समूह बनाकर उन्हें अलग-अलग तारीखों पर बुलाते और इस तरह का मजमा लगने की नौबत नहीं आने देते।
इस काम के लिए तो केंद्र सरकार के बड़े-बड़े जानकारों की जरूरत ही नहीं थी यह तो गूगल करके पता लगाया जा सकता था कि इस आयु वर्ग में कितनी आबादी आएगी और क्या उतनी आबादी को एक किसी तारीख को एक साथ टीकाकरण शुरू करना मुमकिन काम है? केंद्र सरकार ने राज्यों को एक बहुत मुसीबत में और देश की आबादी को एक बहुत बड़े खतरे में धकेल दिया है। आज देश में टीका सप्लाई की जो हालत है उसके चलते हो सकता है कि एक-दो बरस तक भी तमाम आबादी को टीके ना लग सके और यह भी हो सकता है कि एक बरस में जितने लोगों को टीके लगें उनको एक बरस के बाद फिर से इसका डोज देने की नौबत आने लगे। ऐसी हालत में लोगों को धक्का-मुक्की के लिए टीकाकरण केंद्रों पर इस तरह छोड़ दिया गया है। इसके तमाम खतरे हमने 20 अप्रैल के संपादकीय में ही गिनाये थे। और आज जगह-जगह से वैसा नजारा देखने मिल रहा है। पता नहीं इससे कोरोना थमेगा अधिक या फैलेगा अधिक। कोई हैरानी नहीं कि सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि देश भर में भंडारा खोलने की मुनादी के पहले प्रधानमंत्री को यह तो देखना था कि आटा-तेल बाजार में है या नहीं, और हलवाई है या नहीं?
मौत के ऐसे बड़े खतरे के बीच लोग शादी से बचें, बच्चों से भी...
देश के अलग-अलग राज्यों में सरकारें कोरोना के खतरे को देखते हुए शादी जैसे पारिवारिक समारोह, या अंतिम संस्कार जैसे सामाजिक कार्यक्रमों पर भी अलग-अलग रोक लगा चुकी हैं। आज किसी भी राज्य में शादी में 10-20 लोगों से अधिक की मौजूदगी की इजाजत नहीं है और मौत होने पर भी ऐसे ही गिनती के लोगों को जाने की छूट है। लेकिन सोशल मीडिया पर बड़े दिलचस्प वीडियो सामने आ रहे हैं, किसी में बैंड पार्टी ना होने पर कोई दूल्हा खुद ही नगाड़ा बजाते दिख रहा है, किसी वीडियो में एक दूल्हा घोड़ी वाले के साथ घोड़ी पर सवार शादी के लिए अकेले ही चले जा रहा है। कल ऐसी खबर आई कि एक दूल्हा कार चलाकर खुद ही चले गया और शादी करके दुल्हन को ले आया। दूसरी तरफ उत्तर भारत की ऐसी कई खबरें हैं जिनमें 20 लोगों की इजाजत मिली और 200 लोगों की दावत चल रही थी जिस पर छापा मारकर लोगों को गिरफ्तार किया गया। एक कार्यक्रम तो खबर में ऐसा आया जिसमें शादी की दावत चल रही थी और खाने वालों में झगड़ा हुआ, गोली चली तो एक मेहमान की मौत हो गई, और बाकी वहां से भाग निकले।
पिछले बरस जब कोरोना मामूली फैला हुआ था और लॉकडाउन लगा हुआ था, उस वक्त हमने लोगों के लिए यह नसीहत इसी जगह पर लिखी थी कि लोगों को अभी बच्चे पैदा करने का सिलसिला शुरू नहीं करना चाहिए क्योंकि इस बात का कोई ठिकाना नहीं है कि आने वाला वक्त कैसा रहेगा और यह बीमारी कब तक चलेगी। उस वक्त भी हमने लोगों को शादी से बचने को भी कहा था लेकिन तब दुनिया इतनी बड़ी बर्बादी नहीं देख रही थी जैसी कि आज देख रही है। आज तो हालत यह है कि घर में किसी एक को कोरोना हो रहा है तो बाकी लोग भी उस संक्रमण के शिकार हो रहे हैं। ऐसे में शादी के लिए लडक़ी के घर जाना और फिर दुल्हन को ससुराल लेकर आना, इस फेर में दर्जनों लोगों का तो एक-दूसरे से सामना होता ही होगा, साथ में खाना या खिलाना होता होगा, और सबके लिए खतरा बढ़ता होगा। यह वक्त सिवाय अंतिम संस्कार के और किसी भी निजी कार्यक्रम का नहीं है। बिहार के कुछ जिम्मेदार पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपने प्रदेश के लोगों से हाथ जोडक़र प्रार्थना की है कि वे मुंडन, जनेऊ संस्कार, और बाकी किसी भी किस्म के पारिवारिक समारोहों से बचें, जिनके लिए बाद में बहुत वक्त रहेगा। एक बार महामारी की मार कम हो तो उसके बाद ऐसे कार्यक्रम करते रहें। आज इन कार्यक्रमों में मौजूद लोगों, घर के लोगों, और रिश्तेदारों को खतरे में डालने के साथ-साथ सार्वजनिक स्तर पर भी बीमारी बढ़ाने का काम भी इससे हो रहा है।
लेकिन हिंदुस्तान की हकीकत यह है कि जब बड़े-बड़े नेता लाखों की भीड़ वाली आमसभा को देखकर खुश होते हैं और यह कहते हैं कि जहां तक नजर जा रही है वहां तक लोग ही लोग दिख रहे हैं, और जहां चुनावी रैली में, रोड शो में, लोगों के रेले में, धक्का-मुक्की होते रहती है, और कोई भी मास्क नहीं दिखता, वहां तो लोगों के सामने कोई ऐसी मिसाल पेश नहीं होती है कि देश खतरे में है, लोगों की जिंदगी खतरे में हैं, और लोगों को बचकर घर में रहना चाहिए, किसी कार्यक्रम से बचना चाहिए। जब चुनाव प्रचार जैसे गैरजरूरी कार्यक्रमों में और कुंभ जैसे निहायत जरूरी कार्यक्रम में दसियों लाख की भीड़ जुटती है तो आम लोगों को 100-200 लोगों की भीड़ से कैसे रोका जा सकता है ? नतीजा यह होता है कि देश के नेताओं के स्तर से जो पैमाने तय होते हैं, नीचे तक वे ही चलते जाते हैं और खतरा बढ़ता ही जाता है।
आज यहां पर इस बारे में लिखने का मकसद यह है कि हम लोगों को एक बार फिर याद दिलाना चाहते हैं कि यह बीमारी कब तक रहेगी इसका कोई ठिकाना नहीं है और लोगों को आज शादी-ब्याह को जहां तक टाल सकें टालना चाहिए, किसी सगाई वगैरह को भी टालना चाहिए क्योंकि जिंदगी का ठिकाना तो है नहीं और इस बार कोरोना जवान लोगों को भी शिकार बना रहा है, तो ऐसे में क्या फायदा कि जहां रिश्ता तय किया जाए वहां कोई मौत हो जाए और फिर लोगों के मन में एक संदेह बना रहे कि रिश्ता होने की वजह से ऐसा हुआ है। फिर जो शादीशुदा लोग हैं और जिनके बच्चे की गुंजाइश है जिनकी तैयारी है, उन्हें भी बहुत सावधान रहना चाहिए क्योंकि आज के समय में महिला को कोई सुरक्षित अस्पताल मिले या ना मिले, और वहां पर संक्रमण के खतरे के बिना इंतजाम हो सके या नहीं। ऐसी नौबत को देखते हुए आज लोगों को अपनी भावनाओं पर काबू पाना चाहिए और नए रिश्ते बनाने से, परिवार में नए लोगों को लाने से, खुद नए परिवारों में आने-जाने से, और बच्चे पैदा करने से अपने को रोकना चाहिए। आज जब जिंदगी का कोई ठिकाना नहीं है तो इस बात का क्या मतलब है कैसी शादी की जाए जिसमें कुछ ही दिनों में किसी एक की मौत हो जाए और दूसरे के लिए पहाड़ सी बाकी जिंदगी अकेले के सामने खड़ी रहे। अभी कई ऐसी खबरें आई है कि शादी के दो-चार दिन के भीतर ही किसी एक को कोरोना हो गया, मौत हो गई। इसलिए आज का वक्त बहुत सावधानी से रहने का है, यह ना किसी समारोह का वक्त है, ना लापरवाही से खाना खिलाने का है, और जिंदगी भर के रिश्ते बनाने का वक्त तो बिल्कुल ही नहीं है, साथ ही अगले एक बरस तक लोगों को बच्चे पैदा करने के बारे में भी नहीं सोचना चाहिए।
जनता का पैसा बेदर्दी से कबाड़ में तब्दील करने की मिसालें चारों तरफ
बिहार में वहां के एक बाहुबली नेता पप्पू यादव ने अभी एक भंडाफोड़ किया कि आज जब कोरोना मरीजों को अस्पताल ले जाने के लिए और लाशों को वापस लाने के लिए कहीं एंबुलेंस नहीं मिल रही है, लोगों को बहुत मोटी रकम देनी पड़ रही है, वैसे में छपरा के किसी अहाते में 30 एंबुलेंस गाडिय़ां खड़ी हुई हैं, जिन्हें ढंककर रख दिया गया है और इन्हें भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूड़ी की सांसद निधि से लिया गया था ऐसा उन पर लिखा हुआ भी है। अब कल जब यह वीडियो चारों तरफ फैला और पप्पू यादव ने यह सवाल किया कि एंबुलेंस की जरूरत के समय एंबुलेंस ढंक कर रख दी गई हैं, और उनका कहना है कि ऐसी 100 गाडिय़ां हैं जिन्हें सांसद निधि से खरीदा गया जो कि जाहिर तौर पर जनता का ही पैसा होता है और वे एंबुलेंस इधर-उधर कर दी गई हैं, वे चल नहीं रही है। दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री रहे हुए आज के भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूड़ी का यह कहना है कि एंबुलेंस के लिए ड्राइवर नहीं मिले इसलिए इन्हें ढंककर रखा गया है। इस पर पप्पू यादव ने दिलचस्प जवाब दिया है कि 2016 में छपरा में केंद्रीय मंत्री की हैसियत से रूड़ी ने नितिन गडकरी और सुशील मोदी की मौजूदगी में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत ड्राइविंग प्रशिक्षण संस्था का उद्घाटन करवाया था। ऐसी संस्था जिस लोकसभा क्षेत्र में शुरू की गई, वहां पर आज सरकारी एंबुलेंस के लिए भी ड्राइवर नसीब नहीं हो रहे, इस पर अफसोस करते हुए पप्पू यादव ने अपनी तरफ से दर्जनों ड्राइवर खड़े कर दिए और कहा कि ये एंबुलेंस चलाएंगे।
यह बात जाहिर है कि पिछले एक महीने से अधिक वक्त हो चुका है जब देश में कोरोना उफान पर है, और चारों तरफ यह चर्चा पहले से चली आ रही थी कि दूसरी लहर पहले से अधिक खतरनाक रहने वाली है। ऐसे में केंद्र और बहुत से राज्यों की सरकारों ने जिस तरह लापरवाही दिखाई और कोई तैयारी नहीं की, यह उसकी एक मिसाल है। राजीव प्रताप रूड़ी केंद्र सरकार में वजन रखने वाले भाजपा सांसद हैं और बिहार में उनकी पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन में हैं। ऐसे में अगर जनता के पैसों से खरीदी गई एंबुलेंस चलाने के लिए ड्राइवर नसीब नहीं हो रहे हैं तो पप्पू यादव का यह सवाल तो जायज है कि ऐसे ड्राइविंग प्रशिक्षण संस्थान का क्या फायदा हुआ अगर बिहार जैसे बेरोजगारी से भरे हुए राज्य में कुछ ड्राइवर भी तैयार नहीं हो सके। लेकिन यह हाल अलग-अलग सरकारों में अलग-अलग प्रदेशों में कई जगह देखने मिल रहा है कि जब तक सिर पर से पानी निकल नहीं जाता तब तक सरकारें जागती नहीं हैं।
इस देश में लंबे समय से प्रधानमंत्री राहत कोष नाम से एक फंड चले आ रहा था जिसका ऑडिट सीएजी करता था जो पूरी तरह से पारदर्शी था, लेकिन पिछले बरस के कोरोना और लॉक डाउन के वक्त से एक नया फंड बनाया गया जिसे पीएम केयर्स फंड का नाम दिया गया और जिसे सीएजी के ऑडिट से बाहर रखा गया। इस फंड को मिलने वाले दान पर टैक्स की छूट तो वैसी ही रखी गई है जैसी कि किसी भी दूसरे सरकारी फंड की होती है, लेकिन इसे सीएजी की नजरों से बाहर रखने का रहस्य आज तक लोगों के समझ नहीं आया है, और ना ही इस फंड से क्या खर्च हो रहा है यह लोगों के सामने रखा गया है। इसलिए आज जब यह बात उठती है कि देशभर में इस फंड से ऑक्सीजन प्लांट मंजूर किए गए थे लेकिन वे लगे नहीं हैं, उनमें से बहुत गिने-चुने लगे हैं, तो सवाल यह उठता है कि एक पारदर्शी फंड रहता जिससे जुड़ी हुई तमाम बातें इसकी वेबसाइट पर मौजूद रहतीं तो लोग पहले से इसे लेकर सवाल करते कि इसके तहत दी गई मंजूरी से क्या काम हुआ है, कितनी रकम किस चीज पर खर्च हुई है। लेकिन लोकतंत्र में जहां किसी चीज को ढँककर रखा जाता है वहां उसमें सड़ांध आने लगती है।
लेकिन आज का हमारा मकसद पीएम केयर्स फंड को लेकर अधिक चर्चा करने का नहीं है, चर्चा की बात यह है कि इस फंड से देश भर में जहां-जहां वेंटिलेटर भेजे गए उनमें बड़ी संख्या में वेंटिलेटर खराब निकले, डॉक्टरों ने जगह-जगह उसके इस्तेमाल से मना कर दिया कि उससे मरीजों की जान को खतरा हो सकता है क्योंकि वह चलते चलते कभी भी रुक जाते हैं। आज सरकारी ढांचा इस किस्म का है कि खर्च करने की हड़बड़ी रहती है, उस खर्च से आए हुए सामान के रखरखाव की हड़बड़ी नहीं रहती, उसे चलाने के लिए कर्मचारियों को रखने की हड़बड़ी नहीं रहती। बिहार में जिस तरह एंबुलेंस खाली खड़ी हुई है, उसी तरह छत्तीसगढ़ सहित दूसरे बहुत से प्रदेशों में वेंटिलेटर जैसी जीवन रक्षक मशीनें खाली रखी हुई हैं और उन्हें चलाने का प्रशिक्षण किसी को नहीं दिया गया है। हजारों कर्मचारियों का सरकारी अमला है लेकिन ऐसी महंगी और जान बचाने वाली मशीनों को चलाने की ट्रेनिंग उन्हें नहीं दी गई। इसके पहले भी पिछली भाजपा सरकार के समय छत्तीसगढ़ में एक बहुत ही बदनाम स्वास्थ्य सचिव के रहते हुए सोनोग्राफी की ऐसी नकली मशीनें खरीद ली गई थीं जो कि किसी काम की नहीं थीं, और मंत्रालय में बैठे अफसरों ने सप्लायर के साथ मिलकर उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक भिजवा भी दिया गया था जहां पर उन मशीनों को चलाने वाले कोई कर्मचारी नहीं थे। वे मशीनें चलने लायक नहीं थीं, उसकी रिपोर्ट को समझने वाले डॉक्टर वहां नहीं थे। सरकारी खरीदी में भारी गड़बड़ी की जाती है जैसे कि बिहार की इन एंबुलेंस की खरीदी में की गई होगी, लेकिन बाद में उनका इस्तेमाल हो रहा है या नहीं यह कैसी हालत में है इसकी फिक्र तो आज उस मुसीबत के समय भी नहीं की जा रही जब जब चारों तरफ तबाही फैली हुई है।
आज ही आंध्र के श्रीकाकुलम जिले का एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें कोरोना से मरी हुई मां को मोटरसाइकिल पर बीच में बिठाकर दो भाई शहर के अस्पताल से गांव ले जा रहे हैं। इनमें से कोई भी पीपीई सूट पहने हुए नहीं है क्योंकि शायद इन्हें नसीब भी नहीं रहा होगा, इन्हें एंबुलेंस नहीं मिली, इसलिए यह अपनी जान खतरे में डालकर माँ की लाश बीच में बिठाकर इस तरह से जा रहे हैं। और ऐसे वक्त पर बिहार में दर्जनों दर्जनों एंबुलेंस इस तरह से ढंककर रख दी गई हैं। लोकतंत्र में यह बात बिल्कुल साफ समझ लेनी चाहिए कि सरकारी खर्च की कोई भी जवाबदेही तभी हो सकती है जब सरकारी तंत्र खुद होकर इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से अपने खर्चों को डाले। उन्हें देखकर ही मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ता सवाल कर सकते हैं और ऐसे सवालों से ही सरकारी भ्रष्टाचार थम सकता है। हमने यहां पर राजीव प्रताप रूड़ी की लोकसभा सीट का यह एक हाल महज नमूने के तौर पर पेश किया है देशभर में जगह-जगह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की ऐसी बर्बादी बिखरी हुई होगी और सामाजिक कार्यकर्ताओं को उनकी पड़ताल करके उन्हें उठाना चाहिए। दूसरी तरफ इस देश में सरकार द्वारा इकट्ठा किया गया कोई भी पैसा, सरकार द्वारा टैक्स पर छूट दिया गया कोई भी दान, जनता की नजरों से परे नहीं रहना चाहिए, सरकारी ऑडिट से परे नहीं रहना चाहिए। वह प्रधानमंत्री के स्तर पर हो या किसी और स्तर पर, वह बिना संदेह के नहीं रहता और लोकतंत्र में सरकार के तमाम काम संदेह से परे रहने चाहिए।
दूसरे देशों से दान लेते इस देश को प्रधानमंत्री के लिए नया बँगला बनाने की हड़बड़ी भी है !
हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र में किसी आम चुनाव के बाद बहुमत से आई हुई किसी पार्टी या गठबंधन की सरकार के सामने यह आजादी रहती है कि वह संसद में अपने बाहुबल के अनुपात में जो-जो फैसले लेना चाहे वे लेती रहे, और कमजोर हो चुके विपक्ष को जितना अनसुना करना है उतना करती रहे, लेकिन आजादी का ऐसा इस्तेमाल लोकतंत्र नहीं कहलाता। लोकतंत्र तो बाहुबल के बावजूद विपक्ष को सुनना, देश के मीडिया को सुनना, देश के मुखर तबके की बातों को सुनना, इसे लोकतंत्र कहते हैं। लेकिन मोदी सरकार के साथ दिक्कत यह है कि उसे पहले तो लोकसभा में जिस तरह का स्पष्ट बहुमत एनडीए गठबंधन के अलावा भी भारतीय जनता पार्टी के स्तर पर हासिल था, वह अभूतपूर्व था और उसने मानो मोदी सरकार को अपने मन का सब कुछ करने की एक आजादी दे दी थी। अब धीरे-धीरे एक-एक राज्य जीतते हुए एनडीए के पास राज्यसभा में भी इतना बहुमत हो गया है कि वह अपने अधिकतर कानूनों को वहां भी पास करवा सकती है। नतीजा यह निकला कि पिछले बरस तीन ऐसे किसान कानून ध्वनिमत से पास करा दिए गए जिन्हें लेकर विपक्ष का बहुत विरोध आखिरी तक जारी था। जिसे लेकर देश के इतिहास का एक सबसे मजबूत किसान आंदोलन चल रहा था और आज भी चल रहा है। ऐसे में कुछ एक खबरें हक्का-बक्का करती हैं।
पिछले बरस यह खबर आई कि साढ़े आठ हजार करोड़ रुपयों से एक ऐसा विमान खरीदा गया है जिससे प्रधानमंत्री का सफर अधिक असुरक्षित और अधिक आरामदेह हो जाएगा। इस खर्च में मौजूदा विमान को आधुनिक बनाना भी शामिल है। ऐसा भी नहीं कि प्रधानमंत्री को अभी किसी खराब विमान में चलना पड़ता है, या इतने महंगे विमान के बिना भारतीय प्रधानमंत्री का काम नहीं चल सकता था। इसके बाद अभी जब पूरे देश में ऑक्सीजन की कमी से, वैक्सीन की कमी से, दवाइयों की कमी से, अस्पतालों की कमी से, और हर किस्म की कमी से, बड़ी संख्या में लोग बेमौत मारे जा रहे हैं, उस बीच यह खबर आती है कि प्रधानमंत्री के लिए अगले बरस एक नया बंगला बनकर तैयार हो रहा है और केंद्र सरकार ने उसके लिए 2022 की समय सीमा तय कर दी है। जहां देश के लोगों को सांस नहीं मिल रही वहां प्रधानमंत्री के बंगले के लिए समय सीमा तय हो रही है और इसे घोषित किया जा रहा है! यह सब इस अंदाज में हो रहा है मानो प्रधानमंत्री का आज का बंगला असुविधा का था और उनके लिए या उनके मोर के लिए यह बंगला छोटा पड़ रहा था, या वहां हिफाजत की कोई कमी थी। यह खबर ऐसे वक्त पर आई है जब दिल्ली में सेंट्रल विस्ता नाम का 22 हजार करोड़ का एक ऐसा प्रोजेक्ट चल रहा है जिसमें संसद को नई इमारत मिलने जा रही है और प्रधानमंत्री को यह नया बंगला! अभी तो कुछ महीनों के लिए इस खाली जमीन पर निर्माण के बजाय इसे श्मशान बना देना था, ताकि लोग ठीक से जल तो सकें !
देश के बहुत सारे लोगों के साथ-साथ बंगाल में फिर से लौटकर आई आज की सबसे कामयाब नेता ममता बनर्जी ने चुनाव जीतने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखकर कहा है कि आज जब पूरे देश में लोगों को वैक्सीन की सबसे ज्यादा जरूरत है, जब केंद्र सरकार को 30000 करोड़ रुपए वैक्सीन के लिए निकालने चाहिए, उस वक्त यह सरकार संसद की नई इमारत बनाने के लिए 20000 करोड़ रुपए खर्च कर रही है? आज देश बहुत ही तकलीफ में है, एक-एक करके कई मुख्यमंत्रियों ने ऐसे असुविधा के सवाल प्रधानमंत्री के सामने रखे हैं कि जब देश के लोगों को मुफ्त में वैक्सीन देनी चाहिए उस वक्त यह सरकार सेंट्रल विस्ता नाम के निहायत गैरजरूरी प्रोजेक्ट पर इतना बड़ा खर्च करने जा रही है। देश के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाकर देख ली है और वहां से पिछले मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकाल में ऐसी तमाम अपील खारिज कर दी गई हैं और केंद्र सरकार को सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट को बनाने की छूट दी गई।
आज हालत यह है कि गरीब भूखे मर रहे हैं, लोगों के पास काम नहीं है, बाजार बंद हैं, कंस्ट्रक्शन बंद हैं, लेकिन इस सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट को आवश्यक सेवा घोषित करते हुए उस पर काम जारी रखा गया है। जब पूरे देश में तमाम काम चल रहे थे उस वक्त भी संसद-सत्र को खारिज करवा दिया गया था कि कोरोना के खतरे को देखते हुए संसद का सत्र ठीक नहीं होगा। उस वक्त तो देश में छोटे-छोटे से काम भी चल रहे थे, लेकिन संसद को गैरजरूरी मान लिया गया था। संसद का सत्र गैरजरूरी है लेकिन संसद की अच्छी भली बिल्डिंग की जगह 20000 करोड़ रुपए की नई इमारत का प्रोजेक्ट जरूरी है, यह बात ही लोगों को हक्का-बक्का कर देती है। आज जब देश में ऑक्सीजन की कमी है, दवाई नहीं है, अस्पताल नहीं है, जब दुनिया के दर्जनों देश हिंदुस्तान की मदद के लिए सामान भेज रहे हैं, और तो और पाकिस्तान जैसे बदहाल देश भी अपनी तरफ से पूरी मेडिकल मदद करने का प्रस्ताव भारत को भेज चुके हैं, पाकिस्तान के आम लोग भारत के आम लोगों को शुभकामनाएं भेज रहे हैं, उस वक्त अगर सरकार प्रधानमंत्री के हवाई जहाज, प्रधानमंत्री के बंगले, प्रधानमंत्री के गृहप्रदेश में तीन हजार करोड़ रुपए से सरदार पटेल की प्रतिमा बनवाने के बाद, 20 हजार करोड़ रुपए से नया संसद भवन वगैरह बनाने में लगी है तो लोग हक्का-बक्का हैं कि केंद्र सरकार को इस देश की जनता ने सरकार चलाने के लिए वोट दिया है या ऐसी बेरहमी करने के लिए वोट दिया है?
यह सिलसिला पूरी तरह से संवेदना शून्य है, और इतिहास इसे बुरी तरह दर्ज करके रखेगा। वैसे भी लोग इस बात को खुलकर लिख रहे हैं और आपस में इसकी चर्चा कर रहे हैं कि सरदार पटेल की प्रतिमा की जगह कितने नए एम्स बन सकते थे, कितने वेंटिलेटर आ सकते थे, कितनी जिंदगियों को बचाया जा सकता था, ऐसी तमाम तुलना लोग कर रहे हैं और ऐसे तमाम हिसाब लोग लगा रहे हैं। वैसे तो भारतीय संसदीय लोकतंत्र में एक बार जिसे बहुमत देकर संसद में भेज दिया गया, उसका सब कुछ बर्दाश्त करना संवैधानिक मजबूरी है, लेकिन यह लोकतांत्रिक मजबूरी बिल्कुल नहीं है। लोकतंत्र तो चुनाव प्रणाली से या संसदीय व्यवस्था से बहुत ऊपर की एक चीज होती है जिसमें जनमत का सम्मान भी एक बात होती है, और आज जब यह देश दूसरे देशों से आ रही ऑक्सीजन से अपने लोगों की सांसें जारी रखने पर मजबूर हुआ है, उस वक्त यह देश 20000 करोड़ रुपए का यह शान-शौकत वाला प्रोजेक्ट जबरदस्ती जारी रखकर दानदाता देशों को क्या दिखाना चाह रहा है? अगर इस देश के पास सचमुच संसद की एक निहायत गैरजरूरी इमारत के लिए और उसके आसपास की दूसरी इमारतों के लिए 20000 करोड़ रुपए की फिजूल की रकम है, तो फिर उसे दूसरे छोटे-छोटे देशों से मदद क्यों लेनी चाहिए? मदद देने और लेने में कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए लेकिन जो देश आज दूसरे देशों से मदद ले रहा है उसे अपनी फिजूलखर्ची पर तो काबू पाना चाहिए? आज जहां लाशों को जलने के लिए जगह नहीं मिल रही, जहां कब्रिस्तानों में दफन होने के लिए 2 गज जमीन नहीं मिल रही, वहां पर कई बंगलों के अहाते में अकेले रहने वाले प्रधानमंत्री, एक और अधिक शान शौकत वाले नए बंगले में रहने जाएं, इससे किसका कलेजा ठंडा होगा? अगर प्रधानमंत्री निवास के मोर से भी पूछा जाए वह भी इससे खुश नहीं होगा।
योगी के इस फैसले की काट तो किसी जज के पास भी न होगी
हिंदुस्तान भर में चल रहे कोरोना के खतरे के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अफसरों को एक गौरक्षा हेल्पडेस्क बनाने का आदेश दिया है जिसमें सरकार की तरफ से नीचे तक यह आदेश चले गया है कि कोरोना वायरस की सक्रियता को देखते हुए सभी गौशालाओं में कोरोना प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन कराया जाए, साथ ही मास्क लगाया जाए और बार-बार थर्मल स्क्रीनिंग की जाए। इस आदेश में यह सख्त हिदायत दी गई है कि गौशाला में गायों और अन्य जानवरों के लिए सभी चिकित्सा उपकरण हर समय उपलब्ध रहें ताकि उनकी सेहत का ख्याल रखा जा सके। योगी सरकार की यह बहुत अच्छी बात है कि उसने महामारी की मार के बीच गायों का इतना ख्याल रखा है। खासकर उस वक्त जब यूपी का हाईकोर्ट लगातार यूपी सरकार को कोरोना मोर्चे की बदइन्तजामी को लेकर लताड़ लगा रहा है। ऐसे वक्त गायों का इतना ख्याल रखना कोई छोटी बात नहीं है और हिंदुस्तान में यह रिवाज चले आ रहा है कि जिस किसी बच्चे को पिटाई पडऩे की नौबत आए तो वह माँ-माँ कर कर दौडऩे लगता है, ठीक उसी तरह हिंदुस्तान में कुछ पार्टियां, उनकी सरकारें, और उनके नेता कभी गाय की आड़ में जाकर अपने को बचाते हैं, कभी भारतमाता की आड़ लेते हैं उसके पल्लू के पीछे छुपते हैं, कभी वे देश के तिरंगे झंडे की आड़ लेते हैं, फिर पश्चिम बंगाल जैसा कोई चुनाव रहे तो वे जय श्री राम के पीछे से प्रचार करते हैं। इसलिए आज जब योगी ने गायों की फिक्र की है, तो वह बहुत अच्छी बात दो हिसाब से है कि जिन लोगों को उत्तर प्रदेश में ठीक से इलाज नहीं मिल रहा है उन्हें कम से कम इतनी दिमागी राहत तो रहेगी कि उन्हें ना सही गौमाता को अच्छी तरह इलाज मिल रहा है, और गौमाता के इलाज से बढक़र इंसान का अपना खुद का इलाज थोड़ी हो सकता है? बस यही है कि बाबा रामदेव से लेकर भाजपा के कई मंत्रियों और सांसदों-विधायकों तक की कही हुई बात आज थोड़ी सी अटपटी लगती है कि गाय ऑक्सीजन छोड़ती हैं, गोबर और गोमूत्र के बीच कोई रोग जिन्दा नहीं रह सकता, और गोबर और गोमूत्र लेप लेने से कोरोनावायरस नहीं आता। अब इसके बाद अगर योगी सरकार प्रदेशभर की गौशालाओं में सख्त आदेश निकालकर ऑक्सीजन परखने की मशीन और इलाज की मशीन, बुखार नापने के थर्मामीटर सबका इंतजाम कर रही है, तो भी कोई बात नहीं। वैसे तो गाय भाजपा नेताओं के मुताबिक पर्याप्त ऑक्सीजन पैदा करती है, फिर भी वह मां है इसलिए उसकी सेहत के लिए यह इंतजाम तो होना ही चाहिए।
हिंदुस्तान में दिक्कत यह है कि जब कभी देश की कोई वैज्ञानिक जरूरत रहती है जो कि सरकार पूरी नहीं कर पाती, तो उसके जवाब में इस तरह के धार्मिक, आध्यात्मिक, तथाकथित आयुर्वेदिक, और तथाकथित वैदिक इलाज लागू कर दिए जाते हैं, उन्हें बढ़ावा दिया जाता है। क्योंकि वैज्ञानिक इलाज का इंतजाम करना तो खासी तैयारी मांगता है, लंबी योजना मांगता है, और खर्च भी मांगता है। इसलिए उसकी जगह पर अगर जय श्री राम, भारतमाता, गौ माता, और तिरंगे झंडे से इलाज किया जा सकता है तो वह देसी जुगाड़ सबसे ही अच्छा है। जब लोगों के दिमाग से वैज्ञानिक सोच खत्म कर दी जाए, वे गोमूत्र में सोना देखने लगते हैं, गोबर में हर बीमारी का इलाज देखने लगते हैं और अगर हमारी याददाश्त ठीक साथ दे रही है, तो किसी एक नेता ने तो यह आविष्कार भी पिछले वर्षों में सामने रखा था कि अगर गोबर को बदन पर लेप लिया जाए तो कोई परमाणु प्रदूषण भी बदन को प्रभावित नहीं कर सकता ! अब यह एक अलग बात है कि जिस समय अमेरिकी फौज ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए थे जापानियों के पास उस वक्त गोबर था नहीं, और लाखों जापानी परमाणु विकिरण और प्रदूषण में ही मारे गए थे। इसलिए भारत में गोबर और गोमूत्र की यह तैयारी चीन और पाकिस्तान से किसी परमाणु युद्ध के खतरे की नौबत में भी काम आएगी। और हमारा ख्याल है कि उत्तर प्रदेश के हाई कोर्ट में जहां कल तक योगी सरकार को जजों की फटकार का जवाब देते नहीं बन रहा था, वहां आज सरकार के पास गौशालाओं के लिए की गई है तैयारी एक बहुत बड़ा कानूनी बचाव रहेगी।
इस देश का स्वास्थ्य मंत्री सार्वजनिक मंच पर आकर रामदेव नाम के एक पाखंडी की दवा की साख स्थापित करने का काम करता है जिसके मंच पर किए हुए दावों को ही 24 घंटों के भीतर अमेरिका से विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुख्यालय को झूठा करार देना पड़ता है। सरकार का पूरा नजरिया और भाजपा के बहुत सारे नेताओं और मंत्रियों, सांसदों और विधायकों का नजरिया, वैज्ञानिक जरूरत के जवाब में पाखंड को खड़ा करने का है, और दिलचस्प बात यह भी है कि इस पाखंड को हिंदुस्तान के इतिहास के एक अनदेखे और बिनलिखे अध्याय से भी जोड़ दिया जाता है, उसे गौरवशाली भी करार दे दिया जाता है और यह मान लिया जाता है हिंदुस्तान का विज्ञान पूरी दुनिया में सबसे आगे था और दुनिया यहीं से विज्ञान को लूट कर ले गई थी। जब अपने देश की जनता एक नामौजूद रहे इतिहास पर गर्व करने से अपना पेट भरने लगे, तो फिर सरकार को और चाहिए क्या। इसलिए जैस उत्तर प्रदेश में बिना ऑक्सीजन, बिना इलाज, बिना दवा लोग मर रहे हैं, और सुप्रीम कोर्ट से लेकर यूपी हाईकोर्ट तक के जज बौखलाए हुए हैं, वहां पर गायों को कोरोना से बचाने की यह फि़क्र कमाल की है, और योगी सरकार की इस कल्पनाशीलता की तारीफ करनी चाहिए जो कि इस देश की अदालत में वैधानिक बचाव के लिए फौलादी ढाल की तरह उसके काम आएगी। अदालत में भी जब जज सुनेंगे कि गौशाला की गायों के लिए इतना इंतजाम किया गया है, तो वे मान लेंगे कि इसके बाद ऐसी गौमाताओं की इंसानी औलादों की फिक्र करने और उनके लिए इंतजाम करने की जरूरत क्या है?




