दीवारों पर लिक्खा है, 20 मार्च 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

न सफाई की मशीनें, न आग बुझाने की, फिर भी गौरव?

20 मार्च 2026 

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बड़े निजी अस्पताल में गंदे पानी का ट्रीटमेंट करने वाले टैंक में सफाई कर्मचारी उतरे, तो उनमें से तीन की मौत वहां बनी हुई गैस से हो गई। सफाई कर्मचारियों के साथ देश भर में जगह-जगह ऐसे हादसे होते रहते हैं, और जब बाकी पूरी दुनिया ऐसी सफाई के लिए मशीनों का इस्तेमाल करती है, सफाई कर्मचारी गैस मास्क लगाकर ही ऐसी टंकियों में या गटर-नालों में उतरते हैं, तब भारत इन मशीनों से दूर है। मशीनें हैं जरूर, लेकिन वे जरूरत जितनी नहीं हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि दमकल गाडिय़ां हैं जरूर, लेकिन जरूरत जितनी नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि इधर गटर में उतरे हुए सफाई कर्मचारी दम घुटने से मरते हैं, तो उधर फायर ब्रिगेड का इंतजार करते हुए लोग दम घुटने से जिंदगी खो बैठते हैं। पूरे देश में ये दोनों ही सहूलियतें शहरी विकास के साथ जुड़ी हुई हैं, और शहरों का बाकी विकास तो हो जाता है, लेकिन सफाई की मशीनी क्षमता, और आग बुझाने की पर्याप्त क्षमता अधिकतर राज्यों में स्थानीय शासन की प्राथमिकता नहीं रहती।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में फायर ब्रिगेड को म्युनिसिपल से लेकर पुलिस को इसलिए दिया गया था कि पुलिस अधिक कड़ाई और अनुशासन से इस इमरजेंसी सेवा को बेहतर चला सकेगी। लेकिन जिम्मा तो पुलिस को दे दिया गया, सहूलियतें नहीं दी गईं, नतीजा यह हुआ कि बिना पर्याप्त गाडिय़ों, और बिना पर्याप्त कर्मचारियों के अब फायर ब्रिगेड मानो किसी की जिम्मेदारी नहीं रह गई। अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पूरे प्रदेश के बारे में सरकार से जवाब-तलब कर रहा था कि आग से जूझने की क्षमता विकसित करने में इतनी लापरवाही क्यों है? ठीक इसी तरह अब जब म्युनिसिपल के इलाके में, राज्य की राजधानी में सफाई कर्मचारी मर गए हैं, तो यह बात सामने आ रही है कि अस्पताल में नगर निगम से एसटीपी की सफाई का अनुरोध किया था, और म्युनिसिपल ने इसे खुद करवाने कह दिया था। अब खबरें बताती हैं कि खुद म्युनिसिपल के पास इस विशाल और विकराल हो चुके शहर में शौचालयों और गटरों की सफाई के लायक मशीनें गिनी-चुनी हैं। जाहिर है कि नेताओं, और अफसरों के बंगलों से वक्त मिलने पर ही बाकी जगह गाडिय़ां जा पाती होंगी, और इस अस्पताल की तरह बहुत से लोग ठेकेदारों के मोहताज रहते होंगे सफाई के लिए।

साथ-साथ चल रही इन दोनों खबरों से यह लगता है कि क्या ऐसी शहर सरकार को सचमुच ही गौरवपथ नाम की कोई चीज बनानी चाहिए? क्या शहर का गौरव किसी चौराहे से, बगीचे या सडक़ से होता है, या फिर वह आंखों से दूर एक ऐसी छुपी हुई सुविधा से होता है जिसकी चर्चा तो नहीं होती, लेकिन जिससे शहर का, और नागरिकों का जीवन सुरक्षित होता है, और सहूलियत का रहता है। आज शहरों में जगह-जगह कहीं गौरवपथ, कहीं गौरव गार्डन, कहीं सडक़ के डिवाइडरों का सौंदर्यीकरण, तो कहीं किसी नई प्रतिमा का स्थापना, अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ-साथ नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा, और उनके अहंकार को पूरा करना भी प्राथमिकता में रहता है। नतीजा यह होता है कि बुनियादी जरूरतें किनारे धरी रह जाती हैं। जब से स्थानीय शासन, या म्युनिसिपल की धारणा शुरू हुई, तब से ही साफ पानी, साफ शहर, रौशनी और सडक़, ये ही म्युनिसिपल की प्राथमिकताएं मानी जाती हैं। अब इन बुनियादी जरूरतों के पूरे न होने पर भी म्युनिसिपल साज-सज्जा, और राजनीतिक स्मारकों में जुट जाती हैं, जनता की साफ और सुरक्षित जिंदगी की जरूरतें हाशिए पर चली जाती हैं।

दशकों से स्थानीय संस्थाओं को देखते हुए अभी भी हमारे लिए यह तय करना दुविधा का मामला है कि इन्हें चलाने के लिए अफसर बेहतर होते हैं, या निर्वाचित जनप्रतिनिधि? कानून के हिसाब से पंचायत हो या म्युनिसिपल, इनके निर्धारित चुनाव करवाना एक संवैधानिक जिम्मेदारी है, ठीक उसी तरह, जिस तरह संसद और विधानसभाओं के चुनाव तय समय पर होते हैं। लेकिन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का जो हाल स्थानीय संस्थाओं में दिखता है, उससे मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या सचमुच ही भारत के इस हिस्से के शहर ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए तैयार हैं, या फिर यहां अफसरों से ही म्युनिसिपलों को चलवाना चाहिए? यह सवाल कुछ अलोकतांत्रिक लग सकता है, लेकिन निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी अपनी जिम्मेदारियों, और अधिकारों के बीच तालमेल बैठाते बहुत कम दिखते हैं। फिर इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ये जनप्रतिनिधि वही तो बन सकते हैं जिन्हें राजनीतिक दल उम्मीदवार मनोनीत करते हैं। ये उम्मीदवारी किसी भी तरह से स्थानीय संस्थाओं को चलाने को ध्यान में रखने की क्षमता के हिसाब से तय नहीं की जाती, धर्म, जाति, उपजाति, और जीत की संभावना को देखते हुए जब स्थानीय संस्थाओं की लीडरशिप के लिए उम्मीदवार तय होते हैं तो इन्हें चलाने की क्षमता किसी प्राथमिकता सूची में नहीं रहती। ऐसे में लगता है कि इनके राजनीतिक दबाव और नियंत्रण से परे शायद अफसर अकेले ही कुछ बातों को बेहतर तरीके से तय कर पाते, लेकिन पंचायती राज कानून के बाद अब हमारी यह चर्चा केवल एक काल्पनिक चर्चा है जिसकी कोई संभावना नहीं है।

ऐसे में स्थानीय संस्थाओं पर काबिज लोगों को ही अपनी जिम्मेदारी बेहतर तरीके से समझना होगा, और जिस म्युनिसिपल को सैकड़ों-हजारों करोड़ रूपए साल का टैक्स मिलता है, उसे शहर के बुनियादी ढांचे पर खर्च करना चाहिए। यह ढांचा ओवरब्रिज और फ्लाईओवर का नहीं रहता, महंगे, और गैरजरूरी निर्माणों का भी नहीं रहता, यह ढांचा सफाई, और सुरक्षा का ढांचा रहना चाहिए। जिस प्रदेश के शहरों की आग बुझाने की क्षमता को लेकर हाईकोर्ट को अफसरों की क्लास लगानी पड़े, उस प्रदेश को, और उसके शहरों को अपने बारे में भी सोचना चाहिए कि क्या वे इस सबसे बुनियादी जरूरत के बारे में भी अदालती फटकार और लताड़ के बाद ही हाथ-पैर हिलाएंगे?

इंसानों को गटर और सेप्टिक टैंक में उतरवाकर सफाई करवाना अमानवीय है, कहने के लिए इसके खिलाफ कानून भी है, लेकिन उस पर अमल की परवाह किसी को नहीं रहती। अगर म्युनिसिपल ही पर्याप्त संख्या में सफाई मशीनें मुहैया कराती, तो लोगों को, सफाई कर्मचारियों को अमानवीय और जानलेवा स्थितियों में जाकर ऐसे काम नहीं करने पड़ते। यह सिलसिला बहुत ही शर्मिंदगी का है, जब तक शहर की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं, किसी शहर को किसी योजना के नाम के साथ गौरव नहीं लिखना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)               

दीवारों पर लिक्खा है, 19 मार्च 2026


 

अमरीका, रूस, और चीन का तरह-तरह से मोहताज भारत कुछ सबक भी ले...

19 मार्च 2026 

 

भारत में रसोई गैस की कमी से खलबली तो मची हुई है, लेकिन नौबत भगदड़ तक नहीं पहुंची है। घरेलू गैस सिलेंडर कुछ देर से सही, मिल तो जा रहे हैं, और बाजार के लिए कारोबारी गैस सिलेंडर की सप्लाई तकरीबन बंद है, लेकिन इस देश में कालाबाजारी इतनी संगठित और व्यवस्थित है कि कुछ शहरों में गिने-चुने रेस्त्रां छोडक़र बाकी सबका हाल खींचतान कर चल ही रहा है। पोहे के ठेलेवालों ने 30 रूपए का पोहा 50 रूपया कर दिया है, जाहिर है कि यह कालाबाजारी में महंगे मिलने वाले सिलेंडर का अतिरिक्त दाम है। एक प्लेट पोहे पर ब्लैक में मिले सिलेंडर से शायद एक-दो रूपए का ही फर्क पड़ा होगा, लेकिन दाम 20 रूपए बढ़ाने का एक मौका मिल गया। अभी भारत में ईरान के तंग रास्ते से गुजरते हुए दो एलपीजी जहाज पहुंचे हैं, लेकिन उनसे कितने दिन की सप्लाई होगी, कितने दिन की एलपीजी की कमी कायम रहेगी, यह अभी साफ नहीं है। फिर आज भी अमरीकी इजाजत से भारत में रूसी तेल आ रहा है, और अगले कुछ हफ्तों में अमरीका इस इजाजत को खत्म भी कर देगा, तो क्या उसके बाद पेट्रोल-डीजल की कोई कमी होगी, यह भी अभी साफ नहीं है। साफ तो अभी जंग के बादल ही नहीं हैं कि खाड़ी के देशों में चल रही बमबारी से वहां से तेल और गैस का बाहर निकलना कब तक कितना प्रभावित रहेगा। ऐसे में भारत के लोगों को अपनी पेट्रोल-डीजल, और गैस की खपत के बारे में खुद होकर भी सोचना चाहिए। सरकार शायद अधिक कड़े फैसले तेजी से न ले पाती है, न उसकी घोषणा सरकार के लिए सहूलियत की बात रहती, लेकिन बाजार, घरेलू खपत, और संस्थागत ईंधन की खपत को काबू में करने की बात सभी लोगों को सोचनी चाहिए, न सिर्फ आज के इस परेशानी के दौर में, बल्कि बाद में भी। 

आज दुनिया में अलग-अलग देशों ने इस नौबत से जूझने के लिए कई तरह के कड़े फैसले लिए हैं। पाकिस्तान में बिजली की कमी हो गई है, जिसकी वजह से स्कूलें बंद कर दी गई हैं, और दफ्तरों को चार दिन का कर दिया गया है। पाकिस्तान में एलएनजी से बिजली बनाने के प्लांट बंद कर दिए थे क्योंकि रूस-यूक्रेन संकट से वही सबक निकला था। अब पाकिस्तान तेजी से सौर ऊर्जा को बढ़ा रहा है, और कोयले से बिजली भी बढ़ाई जा रही है ताकि आयातित तेल या गैस पर मोहताज रहना घट सके। भारत के ही बगल के बांग्लादेश में यूनिवर्सिटी और बहुत से स्कूल बंद कर दिए गए हैं, बिजली कटौती आम हैं, एलएनजी आयात पर निर्भरता कम करने के लिए कोयले से बिजली उत्पादन बढ़ाया जा रहा है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है। लेकिन उसने कोयले से बिजली बनाना बढ़ा दिया है, और कोयले के निर्यात को फिलहाल रोक दिया है ताकि घरेलू बिजली उत्पादन में कमी न रहे। चीन को रूस और ईरान से तेल मिलना जारी है, लेकिन उसने अपने बिजली घरों को अधिकतम क्षमता पर ले जाना जारी रखा है। दक्षिण कोरिया में कोयले से बिजली पर लगी गई एक सीमा को हटा दिया गया है, उसे अधिक से अधिक बनाया जा रहा है, परमाणु बिजली उत्पादन भी बढ़ाया जा रहा है, और बाहर से आने वाली एलएनजी की खपत को कम करने के लिए सभी उद्योगों को कह दिया गया है। थाईलैंड ने ऊर्जा बचत के कई तरीके लागू किए हैं, और लोगों से गैरजरूरी जमाखोरी न करने को कहा है। योरप में गैस की कीमतें 50 फीसदी तक बढ़ गई हैं, बहुत से देश कोयला और परमाणउ बिजलीघरों पर वापिस लौट रहे हैं, और बड़े-बड़े विकसित देशों जर्मनी, फ्रांस, और ब्रिटेन ने ऊर्जा बचत के अभियान चलाए हैं। जापान ने कोयले से बिजली बनाने को सबसे तेज किया है, ताकि एलएनजी पर निर्भरता कम रहे। 

एलएनजी हो, या पीएनजी हो, किसी भी तरह की गैस की कमी से अब लोग परंपरागत कोयले के बिजलीघरों की तरफ लौट रहे हैं क्योंकि अभी खाड़ी के युद्ध के धीमे पडऩे का भी कोई आसार नहीं दिख रहा है। यह युद्ध बंद हो जाने के बाद भी समंदर के धीमे रास्ते पेट्रोलियम और गैस की आवाजाही पता नहीं कब सामान्य हो सकेगी। इसलिए समझदारी इसी में है कि दुनिया भर के देश इसे एक लंबा खतरा मानकर अपने तौर-तरीके ठीक करें। ईंधन की खपत घटाने की आदत इस मुसीबत के टल जाने पर भी काम की ही रहेगी, किफायत कभी बुरा सबक नहीं होती। भारत जैसे देश को यह सोचना चाहिए कि किस तरह वह सौर ऊर्जा से खाना पकाने के कुछ दशक पहले के एक कार्यक्रम को बढ़ा सकता है। 20-25 बरस पहले सोलर कुकर बड़ी सब्सिडी पर मिलते थे, और धूप के कुछ घंटों में वे धीमी रफ्तार से खाना बहुत अच्छा पकाते थे, और उससे ईंधन की बचत भी होती थी। लेकिन हाल के दशकों में हमने सोलर कुकर की न कोई सरकारी योजना सुनी, और न ही सोलर कुकर के कोई इश्तहार दिखे। आज जब लोग नाली के पानी से गैस बनाकर खाना पकाने के लतीफे बना रहे हैं, तब लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि भारत के अधिकतर हिस्से में साल में 8 महीने या उससे भी अधिक वक्त तक मुफ्त मिलने वाली सूरज की किरणों का इस्तेमाल करके सेहतमंद खाना क्यों नहीं पकाया जाता? अब तो सोलर पैनल भी सस्ते हो रहे हैं, और सोलर कुकर में तो शायद सोलर पैनल भी नहीं लगते थे। जिस तरह की सौर-तकनीक से भी पानी गर्म हो सके, या खाना पक सके, बिजली बन सके, उस तरफ तेजी से बढऩा चाहिए। आज दो हफ्तों की खाड़ी की जंग ने यह बता दिया है कि दुनिया एक मजबूत जमीन पर नहीं खड़ी है। और भारत जैसे देश बहुत बड़ा बाजार हैं, डेढ़ अरब की तरफ बढ़ती हुई आबादी की हर तरह की जरूरतें बहुत हैं, लेकिन भारत आज भी इतने अधिक मामलों में अमरीका की इजाजत, चीन के कच्चे माल और पुर्जों, और रूस के तेल का मोहताज है कि जिसकी हद नहीं। ऐसी नौबत में भारत को किफायत, सौर ऊर्जा, और सार्वजनिक परिवहन जैसी कम ईंधन की तकनीक पर बड़े पैमाने पर जाना चाहिए, ताकि अगली ऐसी किसी अंतरराष्ट्रीय मुसीबत में भारत किसी कमी के संकट में न फंसे। 

(Daily Chhattisgarh)               

पांच राज्यों के चुनावों में विदेशी मुद्दों की छाया कितनी, धर्म की कितनी?

18 मार्च 2026 

 

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है, और अगले महीने 9 से 29 तारीख के बीच असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और पुदुचेरी में चुनाव हो जाएंगे। इन पांच राज्यों में तीन राज्य कुछ अधिक दिलचस्प हैं जहां मुस्लिम और ईसाई आबादी काफी है। इनमें असम में करीब 34 फीसदी मुस्लिम, और 4 फीसदी ईसाई वोटर हैं। कुछ जिले ऐसे भी हैं जहां मुस्लिम वोटर 50 से 70 फीसदी तक हैं। भाजपा के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा मुस्लिम आबादी को बरसों से एक बड़ा मुद्दा बनाकर चल रहे हैं कि राज्य का ढांचा ही बढ़ते मुस्लिमों से बदल जाएगा। मुस्लिमों के साथ-साथ असम और पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से आकर बसे हुए लोगों का भी एक बड़ा मुद्दा है जिनकी छंटनी करने में चुनाव आयोग लगा हुआ है, और दसियों लाख वोटरों के कागजात की छानबीन बंगाल में अभी बाकी है। वहां सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस ने यह सवाल भी उठाया है कि चुनाव की घोषणा के दिन तक 50 लाख से अधिक वोटरों के कागजात की जांच बाकी है, और ऐसे में चुनाव कैसे करवाए जा सकते हैं? बंगाल में असम से कम, लेकिन 27 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। कुछ जिलों में मुस्लिम वोटरों का अनुपात खासा है। बंगाल में भी वामपंथी पार्टियों और कांग्रेस को पीछे छोडक़र भाजपा प्रमुख विपक्षी दल बनी हुई है, और उसने बांग्लादेशी घुसपैठियों का एक बड़ा मुद्दा बनाया हुआ है। अब केरल चलते हैं जहां पर 27 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, और 18 फीसदी ईसाई वोटर हैं। इन दोनों प्रमुख अल्पसंख्यक समुदायों को देखें, तो केरल इन सारे पांच राज्यों में सबसे आगे है। तमिलनाडु और पुदुचेरी में मुस्लिम और ईसाई वोटर मिलाकर करीब 12 फीसदी हैं, और इन राज्यों में धार्मिक ध्रुवीकरण जैसी नौबत नहीं है। 

इस मुद्दे पर लिखने की आज इसलिए सूझी कि मुस्लिम बहुल राज्यों में आज एक अलग किस्म का तनाव भी चल रहा होगा। इजराइल और अमरीका, दोनों गैरमुस्लिम, और एक किस्म से मुस्लिम-विरोधी देशों ने एक शिया-मुस्लिम देश ईरान पर इतिहास का सबसे बड़ा हमला किया है। फिर इसके जवाब में ईरान ने अड़ोस-पड़ोस के दूसरे मुस्लिम देशों पर हमला किया है, जहां पर अमरीकी फौजी अड्डे हैं। कहने के लिए ये हमले सिर्फ फौजी ठिकानों पर हो रहे हैं, लेकिन पूरी दुनिया में ऐसे कोई हमले दर्ज नहीं हो रहे जो फौज पर किए जाएं, और फौज पर ही निशाना लगे। यूक्रेन से लेकर गाजा तक, और ईरान के पड़ोसियों से लेकर अफगानिस्तान के काबुल तक नागरिक ठिकानों पर हमले आम बात हैं, और केरल से खाड़ी के देशों में जाकर बसे हुए और काम करने वाले लाखों मलयाली लोगों पर ईरान-युद्ध का क्या असर होगा, यह अभी साफ नहीं है। भारत के मुस्लिमों में शिया मुस्लिम बहुत कम हैं, इसलिए जब खाड़ी के दूसरे गैरशिया मुस्लिम देशों पर शिया-ईरान का हमला हो रहा है, तो ऐसे देशों में बसे हुए भारतीय मुस्लिम, और गैरमुस्लिमों की क्या प्रतिक्रिया होगी, यह अभी साफ नहीं है। फिर यह भी साफ नहीं है कि क्या भारत के घरेलू प्रादेशिक चुनावों में इन सबका कोई असर होगा। लेकिन हम जिस तरह असम और बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठिया मुस्लिमों, और बाकी मुस्लिमों के मुद्दे को देख रहे हैं, उसी तरह केरल में भी हम मुस्लिम और ईसाई समुदाय की भावनाओं को समझना चाहते हैं क्योंकि केरल अपने लोगों की परदेस में मौजूदगी की वजह से हो सकता है कि कई भावनाओं से, घटनाओं से प्रभावित होता हो। 

हमने अंदाज लगाने की कोशिश की, तो बंगाल और असम में तो बांग्लादेशी, और दीगर मुस्लिमों के मुद्दे सबसे बड़े हैं। एक तरफ भाजपा खुलकर इन दोनों तबकों के खिलाफ हैं, हिमंत बिस्वा सरमा तो हेट-स्पीच की सीमा में भीतर दूर तक जाकर बयान देते हैं, और बंगाल में भी जिन दसियों लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से अभी तक बाहर हैं, उनमें शायद मुस्लिम ही सबसे अधिक हैं। कई लोगों का यह भी मानना है कि मतदाता पुनरीक्षण का अभियान चुनावी नतीजे पहले ही तय कर चुका है। बंगाल में एक वक्त जो मुस्लिम समुदाय वामपंथियों के साथ था, वह अब पूरी तरह से ममता बैनर्जी के साथ है, क्योंकि वामपंथी किसी भी तरह से भाजपा को रोकने की ताकत अब नहीं रखते। ऐसे में ममता के पक्ष में मुस्लिमों का एक मजबूत ध्रुवीकरण चुनावी नतीजों को ममता के खिलाफ भी ले जा सकता है, क्योंकि करीब 27 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं में से एक बड़े हिस्से के मतदाता सूची से बाहर हो जाने का आसार दिख रहा है। 

अब चूंकि हम सभी चुनावी राज्यों पर धार्मिक आधार पर एक नजर डाल रहे हैं, इसलिए तमिलनाडु, और उसके छोटे से पड़ोसी पुदुचेरी की भी बात कर लें, जो कि एक ही वंश के हैं। पुदुचेरी 1962 में उस वक्त के मद्रास राज्य (अब तमिलनाडु) से अलग हुआ, और तब से यह केन्द्र प्रशासित प्रदेश चले आ रहा है। इन दोनों ही राज्यों की जातीय संरचना में, संस्कृति और भाषा में बड़ी समानता है। दोनों में अल्पसंख्यकों से लेकर ब्राम्हण और पिछड़ी जातियों का अनुपात आसपास है, और दोनों में दलित समुदायों का अनुपात भी करीब है। इसलिए इस चुनाव में हम धार्मिक आधार पर विश्लेषण में मोटेतौर पर तमिलनाडु को देख रहे हैं जहां कि द्रविड़ पहचान, और तमिल भाषा सबसे बड़े मुद्दे रहते हैं। यहां पर ईसाई और मुस्लिम आबादी 12 फीसदी के करीब है, लेकिन वह सत्तारूढ़ दलित पार्टी, डीएमके के साथ रहती है। तमिलनाडु में भाजपा वहां की सत्तारूढ़ डीएमके को हिन्दूविरोधी करार देते आई है, और डीएमके के मंत्री-मुख्यमंत्री, और बाकी बड़े-बड़े नेता भाजपा को इसका मौका भी देते आए हैं। तमिलनाडु की राजनीति एकदम खुलकर दलित, और गैरदलित राजनीति है, इसलिए यहां पर हिन्दुओं और दूसरे अल्पसंख्यक धर्मों के बीच कोई सीधा ध्रुवीकरण नहीं है। यह जरूर है कि गैरहिन्दू लोग अपने को एक गैरदलित पार्टी के साथ अधिक जुड़ा हुआ पाते हैं क्योंकि वहां पर भाजपा सनातनी मुद्दों को लेकर अपनी जमीन बनाने में लगी हुई है। एक दिलचस्प, लेकिन छोटा सा पहलू यह भी है कि जिस तरह असम और बंगाल में बांग्लादेश एक मुद्दा है, उसी तरह तमिलनाडु में श्रीलंका के तमिलों का मुद्दा हमेशा बने रहता है। हम यह तो नहीं कहते कि तमिलनाडु का चुनाव श्रीलंका के तमिल मुद्दे से प्रभावित होगा, लेकिन केन्द्र पर सत्तारूढ़ गठबंधन की श्रीलंका नीति, और खासकर तमिल नीति को तमिलनाडु में गौर से देखा जाता है। वहां पर भाजपा गैरडीएमके पार्टी के साथ भागीदारी करके अपने सनातनी एजेंडे को आगे बढ़ा सकती है, लेकिन आज खाड़ी में जो चल रहा है, या बांग्लादेशी घुसपैठियों का जो मुद्दा है, तमिलनाडु इन दोनों से अछूता है। उसके धर्म और जाति के मुद्दे घरेलू हैं। 

यह विश्लेषण कुछ लोगों को इन राज्यों के चुनावी विश्लेषण के पैमाने पर एक अतिसरलीकरण लग सकता है, लेकिन हमने एक नजर में दिखने वाले, धर्म, जाति, और विदेशी मुद्दों को छूने की कोशिश भर की है। देखते हैं आगे कुछ अधिक जानकार विश्लेषक इन पहलुओं पर क्या लिखते हैं।

(Daily Chhattisgarh)               

दीवारों पर लिक्खा है, 18 मार्च 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 मार्च 2026




 

एक ऐसा खुला रैबीज-डॉग जिसकी जिंदगी 3 साल बाकी

17 मार्च 2026 

 

अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प का यह दूसरा कार्यकाल अभी सवा साल भी पूरा नहीं कर सका है, और पिछले चार दिनों में जो बात सबसे तल्खी से उभरकर आई है, वह यह कि आज ट्रम्प खुद, और उसके चक्कर में अमरीका दुनिया में सबसे अलग-थलग पड़ चुके हैं। आज अमरीका के कल तक के अपने पिट्ठू इजराइल के अलावा कोई देश उसके साथ बचा नहीं है, और खुद ट्रम्प आज इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का पिट्ठू दिख रहा है। अब तक जो पूरी दुनिया पर साम, दाम, दंड, भेद से राज करते आया था, आज अपनी गुंडागर्दी में दूसरे देशों की मदद मांग रहा है, लेकिन कोई देश उसके साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है। क्या पिछले सौ-पचास बरस में अमरीका का यह बदहाल किसी और राष्ट्रपति ने आज तक किया था? जिस अमरीका की तरफ देखे बिना नैटो देशों की सुबह नहीं होती थी, नैटो देशों के मुखिया सोने के पहले यह देखते थे कि क्या अमरीका का कोई संदेश आया है, या उससे जुड़ी हुई कोई जरूरी बात है, उसके बाद ही सोने जाते थे। आज उसी अमरीका के राष्ट्रपति की फौजी-मदद की अपील को एक-एक करके वे सारे देश खारिज कर चुके हैं जिन देशों ने मध्य-पूर्व के अलग-अलग देशों पर हमले में अब तक अमरीका का साथ दिया था, बदनामी और तोहमतें झेलने की कीमत पर भी। ट्रम्प आज ठीक उस तरह अकेला पड़ गया है जिस तरह रैबीजग्रस्त कोई कुत्ता अकेले रह जाता है, जिसे पकडक़र पिंजरे में बंद कर देना जरूरी समझा जाता है, आज ट्रम्प दुनिया के लिए रैबीज-डॉग जैसा ही खतरनाक हो चुका है, और उसके काटे की कोई वैक्सीन भी नहीं है। हम रैबीज-डॉग से तुलना नाजायज मानते हैं क्योंकि कोई कुत्ता खुद होकर तो रैबीज-संक्रमित होता नहीं है, ट्रम्प तो आज जो कुछ कर रहा है, सब अपनी बददिमागी से। ऐसे में एक बेकसूर कुत्ते की मिसाल का इस्तेमाल हम मजबूरी में इसलिए कर रहे हैं कि ट्रम्प दुनिया के लिए ठीक उतना ही खतरनाक हो चुका है। रैबीज-संक्रमित कुत्ते के सामने तो जिंदगी बचे-खुचे दिनों की रहती है, ट्रम्प के सामने तो करीब पौने तीन बरस का कार्यकाल बाकी है। 

हमने आज इस पर लिखना जरूरी इसलिए समझा कि ईरान के मोर्चे पर एक समुद्री रास्ता खोलने के लिए ट्रम्प ने दुनिया भर के देशों से फौजी मदद मांगी है, और उसने खासकर नैटो-देशों को यह खुली धमकी दी है कि अगर वे साथ नहीं देते हैं, तो यह नैटो के भविष्य के लिए बहुत बुरी बात होगी। अभी ईरान की जंग में अमरीकी जनता की मर्जी के खिलाफ अमरीका को फंसा देने वाले ट्रम्प की फौजी मदद की इस अपील पर फ्रांस ने कह दिया कि यह उसकी लड़ाई नहीं है। जापान ने भी सहयोग से इंकार कर दिया, और कहा कि वह तेल आयात पर निर्भर तो है, लेकिन अमरीका के साथ मिलकर युद्ध में शामिल नहीं होगा। दक्षिण कोरिया ने मना कर दिया, और कहा कि वे क्षेत्रीय स्थिरता चाहते हैं, लेकिन अमरीकी गठबंधन में नहीं। ब्रिटेन ने भी अपने युद्धपोत भेजने से मना कर दिया, और कहा कि वह कूटनीति पर जोर देगा। खाड़ी के अमरीकी-सहयोगी देशों, यूएई, और सउदी अरब ने भी जंग में अमरीका का साथ देने से मना कर दिया, और कहा कि उन्हें पहले सूचना नहीं दी गई, और वे अमरीका-इजराइल की नीति से असहमत भी हैं। खाड़ी के जिन देशों में अमरीका फौजी अड्डे बनाकर चल रहा है, वे भी आज लड़ाई में ईरान के हमले झेल रहे हैं, लेकिन जंग में वे साथ नहीं उतरे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने ट्रम्प की मांग को खारिज कर दिया, और कहा कि वे जंग में शामिल नहीं होगा। तुर्की ने ट्रम्प की अपील को अमरीका की गलती कहा, और जंग में शामिल होने से मना कर दिया। जर्मनी तो ग्रीनलैंड को लेकर अमरीकी गुंडागर्दी के समय से ट्रम्प का बड़ा मुखर आलोचक रहा है, और उसने ग्रीनलैंड और ईरान दोनों पर ट्रम्प के फैसलों को खारिज करते हुए खतरनाक बताया है। उसने अभी ट्रम्प की अपील पर कहा है कि वह अपने जहाज नहीं भेजेगा, यह उसकी लड़ाई नहीं है, और अमरीका को पहले कूटनीति पर जोर देना चाहिए। जर्मनी ने कहा कि ईरान पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हैं, और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा पर खतरा गहराएगा। जर्मनी ने यूरोपीय संघ के साथ मिलकर कहा कि वह ईरान के जंग में अमरीका को कोई फौजी समर्थन नहीं देगा, और ट्रम्प की नीतियां एकतरफा और खतरनाक हैं। इटली को ट्रम्प का करीबी माना जाता था, उसने ट्रम्प की धमकी को नामंजूर कर दिया है, और कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कानून का पूरा सम्मान होना चाहिए। इटली ग्रीनलैंड से लेकर ईरान के जंग तक खुलकर अमरीका के खिलाफ है, और उसने साफ-साफ कहा कि यह जंग अमरीका की समस्या है, जिसे कि कूटनीति से हल किया जाना चाहिए। इस मामले में इटली यूरोपीय संघ के साथ है, जिसने यह कहा है कि वह ट्रम्प के हमलों के साथ नहीं हैं। इस पूरे महीने में ईरान पर हमले को लेकर यूरोपीय संघ ट्रम्प के खुलकर खिलाफ है, और वह इसके पहले भी ग्रीनलैंड के मुद्दे पर पूरी तरह से डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ था। ईरान पर ईयू ने यह कहते हुए मना कर दिया कि यह उसकी लड़ाई नहीं है। ईयू की मुखिया ने ईरान पर हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ कहा। 

अमरीका के अंदर भी ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग 36-40 फीसदी के आसपास है। जो मतदाता दोनों प्रमुख पार्टियों से परे हैं, वे बेचैन हैं। महंगाई, तरह-तरह के टैरिफ, और पेट्रोलियम अचानक बहुत महंगे हो जाने से लोग खफा हैं। खुद ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी में फूट है, और संसद में जरूर इन सांसदों ने  जंग के फैसले पर सरकार का साथ दे दिया है, लेकिन बाहर खुलकर कई रिपब्लिकन सांसद जंग के खिलाफ बोल रहे हैं। जिस हिन्दुस्तान में ट्रम्प के लिए हवन-पूजन होता था, वहां वह अब न सिर्फ मुस्लिम समुदाय की धिक्कार पा रहा है, बल्कि देश के विचारवान लोग भी अब उसे धिक्कार रहे हैं। ऐसे लोग और ऐसे महिला आंदोलनकारी भी, जो कि ईरान की मुल्ला-सरकार के कट्टरपंथ के खिलाफ रहते हैं, वे भी आज ईरान पर इस तरह के फौजी हमले के मुद्दे पर ईरान के साथ खड़े हो गए हैं। 

ट्रम्प ने अपने मनमाने फैसलों से दुनिया को हजार किस्म की आर्थिक दिक्कतों में तो डाल ही दिया है, अब उसने दुनिया को एक असाधारण ईंधन-संकट में भी डाल दिया है, जो पता नहीं कब जाकर दूर हो पाएगा। तब तक खुद अमरीका के भीतर लगातार ऐसे सार्वजनिक बयान आ रहे हैं कि यह निहायत गैरजरूरी, नाजायज, और गैरकानूनी जंग किस तरह अमरीकी जनता पर आर्थिक बोझ भी है। यह धारणा भी घर करती जा रही है कि इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू आधी सदी से इस ताक में था कि कब अमरीका में कोई परले दर्जे का बेवकूफ राष्ट्रपति आए, जिसे वह झांसे में लेकर ईरान पर जंग में घसीट ले, और अब जाकर उसे मौका मिला है। अब लोगों को ट्रम्प, उसके उपराष्ट्रपति, और उसके दूसरे सत्ता-सहयोगी लोगों के पुराने वीडियो पोस्ट करने का मौका मिल रहा है जिसमेंं वह बीते बरसों में लगातार इस बात का विरोध करते रहा कि अमरीका को बाहर कोई जंग छेडऩी चाहिए, ईरान पर कोई हमला करना चाहिए। बड़बोले ट्रम्प के बड़े-बड़े शब्द अब निगलना उसके लिए भी मुमकिन नहीं रह गया है। अब देखना यही है कि रैबीज-डॉग की तरह लाइलाज, और खतरनाक हो चुके इस ट्रम्प को दुनिया पौने तीन बरस और कैसे झेलेगी, और इन बरसों में वह दुनिया में किस-किसको और काटेगा। अगर अमरीकी संसद महाभियोग चलाकर, या अमरीकी मंत्रिमंडल दिमागी रूप से विचलित ट्रम्प को हटा नहीं देता, तो यह ट्रम्प अपने बाकी कार्यकाल में अमरीका को एक अछूत देश बनाकर छोड़ेगा, जिसका अकेला सगा इजराइल बचेगा।

(Daily Chhattisgarh)               

दीवारों पर लिक्खा है, 16 मार्च 2026


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निजी सम्पत्ति पर उपासना, इजाजत लेने की जरूरत नहीं सरकार से हिफाजत का हक

16 मार्च 2026 

 पिछले हफ्ते भर से उत्तरप्रदेश का संभल एक बार फिर खबरों में बना हुआ है। वहां के एक मंझले पुलिस अफसर ईद की तैयारियों की शांति समिति की बैठक के वायरल हुए वीडियो में कहते सुनाई दे रहे हैं- बहुत सारे लोगों को खुजली मची हुई है कि ईरान और इजराइल-अमरीका का झगड़ा हो रहा है, अगर इतनी परेशानी है तो जहाज का टिकट कटवाओ, और ईरान चले जाओ। इस अफसर ने इसी बैठक में खुलकर कहा कि ईरान के लिए छाती पीटने वालों को ईरान चले जाना चाहिए। उसने यह भी कहा कि अगर सडक़ पर नमाज पढ़ी तो जेल भेज देंगे, इलाज करेंगे। जो लोग ईरान के समर्थन में या अमरीका-इजराइल के खिलाफ रील बना रहे हैं, उनके संदर्भ में इस अफसर ने बैठक में कहा-रील बनाई, तो रेल बना देंगे। इन हमलावर बयानों पर देश के बहुत से भले लोग लिख रहे हैं कि क्या अगर कोई हिन्दू अमरीका और इजराइल के लिए हवन और प्रार्थना करे, तो क्या पुलिस की यही जुबान होगी? देश के एक बड़े मुस्लिम नेता सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा- यह मुल्क आपके बाप का नहीं है, पुलिस का काम हिफाजत देना है, धमकी देना नहीं है। कुल मिलाकर साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील चले आ रहा एक जिला, यूपी का संभल अब अपने एक खुले आक्रामक साम्प्रदायिक अफसर को और देख रहा है। इसके पहले भी यहां ऐसे दूसरे अफसर आ चुके हैं। 

कल 15 मार्च को ही संयुक्त राष्ट्र में दुनिया भर के लिए इस्लामोफोबिया के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने की याद दिलाई है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि सरकारों को नफरत फैलाने वाले बयानों को रोकने, धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने, और भेदभाव के खिलाफ ठोस कदम उठाने होंगे, जिनमें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का पूर्ण पालन सुनिश्चित करना भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतेरेश ने कहा कि ऑनलाइन मंचों को हेट स्पीच और उत्पीडऩ समाप्त करने के लिए काम करना होगा जो किसी व्यक्ति के धर्म या उसकी आस्था के आधार पर उसे निशाना बनाते हैं। 15 मार्च के इस अंतरराष्ट्रीय दिवस के मौके पर एक और बड़ी चीज हुई। 

यूपी के ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह महत्वपूर्ण फैसला दिया कि किसी निजी सम्पत्ति में बनी हुई मस्जिद, या किसी निजी जगह पर नमाज पढऩे पर, या धार्मिक सभा आयोजित करने पर कोई कानूनी रोक नहीं है। हाईकोर्ट ने इसी जिले संभल के साथ-साथ एक और जिले बदायूं के अफसरों को कड़ी फटकार लगाई कि निजी सम्पत्ति के भीतर धार्मिक गतिविधियों के लिए प्रशासन से किसी भी तरह की पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है, और अफसर निजी परिसरों में होने वाली नमाज या प्रार्थनाओं में दखल न दें। अदालत ने ऐसी प्रार्थना या उपासना को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार माना, और अफसरों को फटकार लगाई कि अगर उन्हें कानून व्यवस्था बिगडऩे का डर है, तो या तो वे उसे संभालने की जिम्मेदारी दिखाएं, या अपना तबादला करवा लें, या इस्तीफा दे दें। अदालत ने कहा कि कोई धार्मिक गतिविधि सार्वजनिक सडक़ या सम्पत्ति पर होती है, तभी पुलिस की इजाजत जरूरी होगी। इन दो जिलों में प्रशासन ने लोगों की निजी सम्पत्ति पर भी नमाज पढऩे पर रोक लगाई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस का काम निजी सम्पत्ति पर, या मस्जिद में नमाज पढ़ रहे लोगों को रोकना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वे शांतिपूर्ण ऐसा कर सकें, उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने का जिम्मा उस पर है। अदालत ने हैरानी जाहिर की कि पुलिस सुरक्षा देने के बजाय नमाज पढऩे पर ही रोक लगा रही थी। अदालत ने कहा कि पुलिस सिर्फ इस आधार पर किसी धार्मिक आयोजन को निजी सम्पत्ति पर नहीं रोक सकती कि वहां भीड़ है, या वहां तनाव हो सकता है। संभल में एक मस्जिद में रमजान के दौरान प्रशासन ने यह प्रतिबंध लगाया था कि वहां कुल 20 लोग नमाज पढ़ेंगे। दो अलग-अलग बेंचों में आए हुए दो अलग-अलग जिलों के मामलों में जजों ने अफसरों को फटकार लगाई है, और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला भी दिया है कि निजी स्थान पर धार्मिक गतिविधियां पूर्ण रूप से संरक्षित हैं, और संभावित तनाव के नाम पर लोगों के धार्मिक अधिकार नहीं छीने जा सकते। कानून के विश्लेषकों का मानना है कि उत्तरप्रदेश का यह फैसला इस साम्प्रदायिक बना दिए गए प्रदेश में अल्पसंख्यकों के लिए राहत की बात है जो निजी मस्जिदों या घरों में प्रार्थना करते हैं, और उस पर पुलिस और प्रशासन तरह-तरह की नाजायज कार्रवाई करते हैं। कानून के जानकार कहते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के ये दो फैसले मिसाल कायम करते हैं कि निजी सम्पत्ति पर धार्मिक आयोजन के लिए कोई पूर्व अनुमति जरूरी नहीं है। 

किसी हाईकोर्ट के फैसले देश के बाकी राज्यों के हाईकोर्ट में भी एक नजीर के रूप में तब तक इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जब तक उन प्रदेशों के हाईकोर्ट ने वैसे ही मामलों में उससे अलग या उलट कोई फैसला न दिया हो। अब हम सोचते हैं कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां हर इतवार किसी न किसी शहर या कस्बे में किसी निजी घर में होने वाली ईसाई प्रार्थना सभा पर लगातार साम्प्रदायिक लठैत संगठनों के जो हमले होते हैं, और धर्मांतरण के मनमानी आरोप लगाकर ईसाई समुदाय के लोगों को गिरफ्तार किया जाता है, बहुत से मामलों में तो कैमरों के सामने ही पुलिस की मौजूदगी में ये लठैत ईसाई स्त्री-पुरूषों को, पादरियों को पीटते हैं, घरों या चर्चों में तोडफ़ोड़ करते हैं, क्या ऐसी घटनाओं पर भी उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट के इन फैसलों के नजीर की तरह इस्तेमाल किया जा सकेगा? वैसे तो कल इस्लामोफोबिया के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया गया है, और यूपी में ये पूरी घटनाएं मुस्लिमों के खिलाफ चल रही पुलिस-प्रशासन की ज्यादती और हिंसा की रही हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में ईसाईयों के खिलाफ जो कार्रवाई चल रही है, क्या उस पर भी सुप्रीम कोर्ट के वे ही फैसले लागू होंगे, जिनका हवाला इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसलों ने दिया है? या फिर यहां पर कोई अलग तर्क काम करेगा? यह समझ लेने की जरूरत है कि जब समाज में किसी संगठन को, या किसी आस्था या विचारधारा को हिंसक और हमलावर होने की छूट दी जाती है, बढ़ावा दिया जाता है, तो फिर उसे मनचाही सीमा पर रोक देना मुमकिन नहीं होता। उत्तरप्रदेश इस बात की एक जलती-सुलगती मिसाल है कि पुलिस और प्रशासन का धार्मिक ध्रुवीकरण कर देने से वे किस तरह बुलडोजर चलाने लगते हैं, किस तरह सत्ता को नापसंद धर्मों के खिलाफ असंवैधानिक कार्रवाई करने लगते हैं। अगर भारत नाम के इस लोकतंत्र के बाकी हिस्से यूपी जैसी प्रयोगशालाओं से सबक नहीं लेंगे, तो ऐसी प्रयोगशालाओं में बनने वाली जहरीली गैस जाने देश में कहां-कहां भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने जैसा काम करेगी। देश के कई प्रदेशों में हाईकोर्ट बुरी तरह निराश भी कर रहे हैं, और निराश तो कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट भी कर रहा है। लोकतंत्र में यही लचीलापन रहता है कि इसके संस्थान इसे ही निराश कर सकते हैं।

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