aajkal लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
aajkal लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

पूरी जिंदगी इमारत से निकलने की जरूरत नहीं, सपना, या दु:स्वप्न?

 1 दिसंबर 2024

चीन में दस-बारह बरस पहले एक छह सितारा होटल बनना शुरू हुई, जिसे बाद में बाजार की जरूरतों के हिसाब से एक रिहायशी इमारत में तब्दील कर दिया गया। हॉंगझाऊ के कारोबारी इलाके में यह इमारत अब 20 हजार लोगों के रहने के लायक बन रही है जो कि दुनिया की सबसे बड़ी बस्ती रहेगी। इसमें आगे चलकर 30 हजार लोग तक रह सकेंगे, और इमारत में इतने किस्म की सहूलियतें हैं कि यहां रहने वाले लोग पूरी जिंदगी बाहर निकले बिना रह सकते हैं। इसमें सुपर मार्केट, स्वीमिंग पूल, रेस्त्रां, अस्पताल, और स्कूल-कॉलेज सभी कुछ रहेंगे। इसे अंग्रेजी जुबान में डिस्टोपियन कहा जा रहा है जो कि एक दु:स्वप्न, डरावना, नर्क सरीखा, शोषण करने वाला, तानाशाह, और भी कई किस्म की नकारात्मक बातों से जुड़ा हुआ शब्द है।

अब यह इमारत किस तरह की साबित होती है इस पर तो अभी हमें कुछ पढऩे नहीं मिल रहा है, लेकिन यह सोच अपने आपमें पहली नजर में अटपटी, और दूसरी नजर में भयानक लगती है कि इस दुनिया के एक देश के एक शहर के भीतर एक इमारत में एक पूरी दुनिया ही खड़ी कर दी जाए, जो कि उसके भीतर बसे लोगों को पूरी जिंदगी वहीं पर बने रहना सुझाए। इसे बनाने वाले का तर्क यह भी है कि ऐसी बसाहट की वजह से शहर पर ट्रैफिक का दबाव घटेगा, क्योंकि लोगों का सारा काम इमारत के भीतर हो जाएगा। लेकिन ऐसी जिंदगी से समाज किस तरह का खड़ा होगा यह सोचना भी कुछ भयानक लगता है।

दुनिया में डिस्टोपियन शब्द की मिसाल देने के लिए पहले भी इस तरह की नियंत्रित जिंदगी की इमारतों की कल्पना की गई थी। इनमें लोगों की जिंदगी पर पूरी तरह काबू, जानकारियों पर नियंत्रण, और इसे चलाने वाली सत्ता की तानाशाही की तरह कई कहानियां लिखी गई हैं, कुछ फिल्में भी बनाई गई हैं। एक नजर में देखें तो ऐसी रिहायशी सोच लोगों को मशीनों के पुर्जे की तरह बना देने वाली दिखती है जो कि उसी जगह कमा रहे हैं, खा रहे हैं, और बाहरी दुनिया से जिनका कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह इंतजाम बसाहट की योजना के हिसाब से तो किफायत का लगता है, लेकिन यह समाज को खत्म कर देने की एक सोच भी है। लोग अगर मुर्गीखाने की मुर्गियों की तरह कतार में खड़े रहकर एक ही तरह का दाना खाकर कटने के पहले तक की जिंदगी गुजारने को तैयार हैं, तो यह सस्ती भी पड़ सकती है, वक्त और मेहनत भी बचा सकती है, लेकिन वह सोचने-समझने वाला इंसान नहीं बना सकती, वह एक बक्से में बंद सीमित सोच वाले पुर्जे बना सकती हैं।

लोगों के दिमाग पर कब्जा करने के लिए दिमाग के भीतर घुसना जरूरी नहीं रहता, उन्हें किसी नियंत्रित स्थिति में रखकर भी उनकी सोच को एक सरीखा किया जा सकता है। बहुत से संगठन, राजनीतिक दल, आध्यात्मिक संगठन, और धर्म इस तरह का करते भी हैं कि उनके सदस्यों में सिर बहुत से रहते हैं, लेकिन दिमाग किसी में नहीं रहते। दिमाग सिर्फ एक जगह से सबको मानसिक गुलामों की तरह नियंत्रित करता है, और लोग पुर्जे बनकर रह जाते हैं। जॉर्ज ऑरवेल सरीखे विज्ञान कथा लेखकों ने वक्त के बहुत पहले ऐसे उपन्यास लिखे जो कि बाद के दशकों में सही साबित होते रहे। लोगों की पूरी जिंदगी को नियंत्रित करने के लिए यह एक बहुत बड़ा साधन हो सकता है कि उनकी चौबीसों घंटों की जिंदगी पूरी की पूरी नियंत्रित की जाए। इससे लोगों का रहना, खाना-पीना, कमाना, और गंवाना तो नियंत्रित किया ही जा सकेगा, वे किस तरह के लोगों से मिल सकेंगे, किस तरह का मनोरंजन कर सकेंगे, इसे भी काबू किया जा सकेगा।

अभी तक सरकार और कारोबार लोगों के दिल-दिमाग को प्रभावित करने के लिए, उस पर कब्जे के लिए धर्म और जाति, रंग, नस्ल, और प्रादेशिकता का इस्तेमाल करते आए हैं। लेकिन पूंजीवाद अपनी अपार ताकत के साथ किस तरह लोगों की जिंदगी को गन्ने का रस निकालने वाली मशीन में डालकर उसका अधिक से अधिक रस हासिल कर सकता है, उसकी एक बड़ी मिसाल यह इमारत है जो कि साधारण समझ रखने वाले लोगों को एक बड़ी शानदार और कामयाब योजना लगेगी, और सतह के नीचे इसके खतरे लोगों को आसानी से समझ नहीं आएंगे।

लोगों को पूंजीवाद की साजिशें जल्दी और आसानी से समझ नहीं पड़तीं। पूंजीवाद साबुन को रेशे वाला बनाता है ताकि बदन की चमड़ी रगड़ी जा सके, और वह टॉवेल को नर्म बनाने का लिक्विड अलग से बेचता है, ताकि टॉवेल एकदम नर्म रहे। वह एक तरफ फास्टफूड को बढ़ावा देता है, और फिर उससे होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए बड़े महंगे इलाज मुहैया कराता है। अमिताभ बच्चन सुबह तनिष्क के गहने बेचते हैं, और शाम होते-होते वे सोना गिरवी रखकर कर्ज उठाने की कंपनियों को बढ़ाने लगते हैं। भारत के राज्यों में जहां बिल्डरों के लिए अमीरों की कॉलोनी के ही एक हिस्से में वहां के गरीब कामगारों के लिए भी छोटे-छोटे मकान बनाने की बंदिश लगाई गई थी, वहां इन बिल्डरों ने सरकार के साथ मिलकर गरीबों के मकानों के लिए शहर के बाहर जमीन छांटने, या सरकार को भुगतान कर देने की रियायत पा ली, और कामगारों के पास रहने के मकसद को ही शिकस्त दे दी। इसलिए चीन के इस एक सबसे बड़े अनोखे और अजीब रिहायशी प्रोजेक्ट के खतरों को लोकतंत्र, समाजशास्त्र, और मनोविज्ञान के नजरिए से भी समझना होगा। यह समाज के भीतर मिलीजुली बसाहट को खत्म करने की एक सोच को भी बढ़ा सकता है।

(Daily Chhattisgarh)


यूक्रेन के बाद इजराइल में अमरीका का प्रॉक्सीवॉर?

 4 अगस्त 2024

 फिलीस्तीन पर इजराइल के हमलों के बीच फिलीस्तीन के हिमायती लेबनान के हथियारबंद संगठन हिजबुल्ला, यमन से इजराइली जहाजों पर हमला करने वाले एक और हथियारबंद संगठन हूथी, और इनके पीछे बताए जा रहे ईरान तक अब इजराइली हमलों का विस्तार हो चुका है। अभी दो दिन पहले उसने कुछ घंटों के भीतर ही लेबनान में हिजबुल्ला के सबसे बड़े कमांडर को मार गिराया, और ईरान के राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण में पहुंचे हुए फिलीस्तीनी हमास के मुखिया, और गाजा में प्रधानमंत्री रहे हुए इस्माइल हानिया को मार डाला। इसके साथ ही अब इजराइल पर ईरानी जवाबी हमले की आशंका को देखते हुए अमरीका ने अपनी बड़ी फौज उसे बचाने के लिए तैनात की है। ऐसा लगता है कि एक शहर गाजा पर इजराइल की चल रही फौजी कार्रवाई एक क्षेत्रीय संघर्ष में बदल सकती है, जिसमें अमरीका अपनी पूरी फौजी ताकत के साथ शामिल हो सकता है।

अब अमरीका की पूरी दुनिया में मौजूदगी को देखें तो यह बात साफ दिखती है कि रूस-यूक्रेन के बीच चल रही जंग में नाटो देशों की तरफ से अगुवाई करते अमरीका ने जिस तरह यूक्रेनी सैनिकों की जिंदगी दांव पर लगवाकर रूस की फौजी और आर्थिक ताकत को खोखला करने की कोशिश की है, कुछ उस तरह की कोशिश उसकी मध्य-पूर्व के इलाके में ईरान को खोखला करने के लिए भी हो सकती है। आज अगर अमरीकी फौजी ताकत के साथ इजराइल अपनी खुद की फौजों को लेकर ईरान से जंग के किसी मोर्चे पर आमने-सामने रहता है, तो इससे ईरान पर कुछ उसी तरह की चोट पड़ सकती है, जैसी कि अमरीकी कोशिशों के बावजूद भी रूस पर नहीं पड़ सकी। जिस तरह यह माना जा रहा है कि यूक्रेन के मोर्चे पर फौजी और आर्थिक मदद करके नाटो देश एक प्रॉक्सीवॉर लड़ रहे हैं, और रूस को भविष्य के किसी मोर्चे की नौबत आने के हिसाब से खोखला कर रहे हैं, कुछ वैसा ही खोखला ईरान को करने की चाहत अमरीका और इजराइल दोनों की लंबे समय से रही है। और जहां तक प्रॉक्सीवॉर की बात है, तो ईरान भी इजराइल के खिलाफ हमास, हिजबुल्ला, और हूथी के कंधों पर बंदूक रखकर प्रॉक्सीवॉर चला ही रहा है।

इस जटिल अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में यह भी समझने की जरूरत है कि आज अमरीका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बना हुआ चीन यूक्रेन के मोर्चे पर पूरी तरह रूस के साथ है, और वह कुछ कम हद तक मध्य-पूर्व में ईरान के साथ हमदर्दी रखेगा, क्योंकि ईरान भी रूस के साथ गठजोड़ करते हुए अमरीका के खिलाफ है। इसलिए आज जो चीन सीधे-सीधे न तो यूक्रेन के मोर्चे पर फौजी लड़ाई में शामिल है, न ही वह ईरान-इजराइल मोर्चे में सीधे शामिल होगा, लेकिन इन दोनों ही मोर्चों पर अमरीकी हितों के खिलाफ चीन की सक्रियता, अमरीका की परेशानी का सबब तो होगा ही। इन दिनों दुनिया में जंग और कारोबार के मोर्चों में एक बड़ा जटिल अंतरसंबंध रहता है। चीन ने रूस को कोई फौजी मदद नहीं दी, लेकिन उसे आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ा रखने के लिए उसने सब कुछ किया। मध्य-पूर्व के देशों में अभी हाल में ही चीन ने अपनी बड़ी दखल दर्ज कराई, जब उसने बरसों की मेहनत के बाद सऊदी अरब और ईरान के बीच रिश्ते कायम करवाए। इस कामयाबी और नए गठबंधन में चीन ने अपनी जमीन पर बैठे-बैठे इन दोनों के रिश्ते सुधरवाए, और इनके बीच कूटनीतिक संबंध कायम हुए। इस महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक समझौते के बाद चीन का इस इलाके में एक नया महत्व कायम हुआ है।

आने वाली दुनिया में देशों और गठबंधनों के बीच जो नई व्यवस्था बनेगी, और नए रिश्ते कायम होंगे, उनमें अपनी सरहदों से परे इस तरह की मध्यस्थता का अपना एक बड़ा महत्व रहेगा, और इसमें चीन की एक कामयाबी के बाद कोई और कामयाबी उसे विश्व स्तर के एक बड़े खिलाड़ी का दर्जा दिला देगी। ऐसा लगता है कि इजराइल के कई तरफ खुल चुके मोर्चों में अमरीका इजराइल का परंपरागत साथ तो दे ही रहा है, उसके साथ-साथ वह मध्य-पूर्व में एक प्रॉक्सीवॉर खड़ा करने, और उसके नफे-नुकसान पर भी जरूर सोच रहा होगा। अफगानिस्तान में उसकी फौज और सरकार को जैसी भयानक शर्मनाक शिकस्त मिली है, उससे भी अमरीकी अहंकार तिलमिलाया हुआ होगा, और हो सकता है कि परमाणु हसरतों को पालने वाले इराक को कमजोर करने की अमरीकी हसरत भी इजराइल के बहाने पूरी हो रही हों। शायद यह भी एक वजह रही कि अमरीका एक तरफ तो लगातार इजराइल को युद्धविराम की नसीहतें देने का नाटक करते रहा, मलबा और कब्रिस्तान बन चुके गाजा पर फूडपैकेट गिराते रहा, और इसके साथ-साथ वह इजराइल को इतनी हथियार देते रहा, इतने बम देते रहा कि जिनसे हर फिलीस्तीनी को दस-दस बार मारा जा सके।

इसलिए आज इजराइल के तनाव को महज क्षेत्रीय तनाव मानकर चलना गलत होगा। ईरान के रहते इजराइल की फौजी हिफाजत की कोई गारंटी हो नहीं सकती, इसलिए भी शायद इजराइल को यह पसंद आ रहा हो कि फिलीस्तीन पर अपने जुल्म ढहाने के बाद वह उसमें मददगार अमरीका को लेबनान, यमन, और ईरान तक भी घसीटे। अमरीका को अपने परंपरागत दुश्मन, रूस, चीन, और ईरान से निपटने का एक मौका भी इजराइल की शक्ल में मिलता है, और इन तीनों देशों की फौजी ताकत को घटाना, अमरीका को एक सस्ता सौदा लग सकता है। उधर उसे प्रॉक्सीवॉर के लिए यूक्रेन मिला, और इधर इसी काम के लिए उसे इजराइल हासिल है। देखना है कि अपनी जमीन पर ऐसा अपमान झेलने के बाद ईरान किस तरह की जवाबी फौजी कार्रवाई करता है, और अमरीका इस मोर्चे पर किस हद तक शामिल होता है।   

(Daily Chhattisgarh)

महिलाओं के खिलाफ उठने वाली उंगलियों वाले खूंखार पंजों के राज

  14 जनवरी, 2024 

 

न सिर्फ हिन्दुस्तान में बल्कि पूरी दुनिया में एक तो महिलाओं को आदमियों के मुकाबले दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जाता है, उन्हें हिकारत से देखा जाता है। पश्चिमी सभ्यता में सुनहरे बालों वाली गोरी महिलाओं को ब्लॉंड कहकर उनकी काल्पनिक बेवकूफियों के अंतहीन लतीफे बनाए जाते हैं। पूरी दुनिया में महिलाओं खराब ड्राइवर माना जाता है, यह माना जाता है कि उनकी व्यंग्य की समझ कम रहती है। सोशल मीडिया पर ऐसे लतीफे भरे रहते हैं जो कि शादीशुदा जिंदगी में मर्द की नर्क सरीखी जिंदगी, और उसके लिए जिम्मेदार उसकी बीवी की कहानी बताते हैं। यह सब कुछ इतना आम हो चुका है कि खुद महिलाएं ऐसे लतीफे बताते हुए हिचकती नहीं हैं। 

लेकिन आम महिलाओं के मुकाबले जहां कोई महिला कामकाजी हो जाती है, राजनीति या सार्वजनिक जीवन में किसी ऊंचाई पर पहुंच जाती है, वहां उसके खिलाफ और हजार किस्म की बातें होने लगती हैं। महिला का घर की दहलीज के बाहर पांव रखना उसे कई किस्म की अप्रिय चर्चाओं का सामान बना देता है। इसके बाद जैसे-जैसे उसका काम का दायरा बढ़ता है, जैसे-जैसे उसे अधिक लोगों के साथ उठना-बैठना पड़ता है, काम के सिलसिले में कहीं-कहीं जाना पड़ता है, वैसे-वैसे वह अधिक निशाने पर आते चलती हैं। उसकी हर कामयाबी के लिए उससे ऊंची जगह पर बैठे हुए किसी मर्द की मेहरबानी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, और उस महिला की मानो आगे बढऩे, ऊपर पहुंचने, कामयाब होने की कोई क्षमता ही न हो। यहां पर भी किसी भी पेशे या कारोबार में कामयाब महिला के खिलाफ बोलने वालों में उससे कम कामयाब महिलाओं का बड़ा हिस्सा रहता है। 

अगर कोई महिला जरा सी खूबसूरत हो गई, तो उसकी हर कामयाबी को उसके रूप-रंग से जोडक़र देखा जाता है, और यह ढूंढने की कोशिश होती है कि उसके ऊपर के किस मर्द को इस रूप-रंग की मेहरबानी से जोड़ा जा सके, ताकि महिला की तरक्की को इस काल्पनिक मेहरबानी से जोड़ा जा सके। किसी संस्थान में महिला को तरक्की मिली, तो बोलचाल की आम जुबान में कहा जाता है कि बॉस के साथ सोकर आई होगी। अंग्रेजी जानने वाले लोग इसे कार्पोरेट क्लाइंबर कहते हैं, और हर तरक्की के साथ महिला के चाल-चलन को और गंदा ठहराने का सिलसिला आगे बढ़ते रहता है। एक वक्त था जब लोग यह मानकर चलते थे कि महिला घर के बाहर निकल रही है, तो फिर अब उसका बचे रहना मुमकिन नहीं होगा। 

दरअसल, किसी भी महिला का आसपास के पुरूषों से अधिक कामयाब होना तो दूर रहा, महज बराबरी का कामयाब हो जाना भी उसके चाल-चलन पर हमले का सामान बन जाता है। और तो और साहित्य जैसे पढ़े-लिखे दायरे में भी किसी लेखिका का महत्व पा जाना, या अधिक छप जाना संपादक के साथ उसके रिश्तों की सेक्सी-कल्पनाओं को पैदा कर देता है। किसी अखबार या टीवी चैनल में किसी लडक़ी या महिला को उसकी काबिलीयत से कोई मौका मिल जाना भी अपनी देह को सीढ़ी बनाकर उसके ऊपर चढऩे से जोड़ दिया जाता है, मानो उसके पास देह से अधिक कुछ न हो। 

यह पूरा सिलसिला मर्दों की असुरक्षा की भावना से उपजा हुआ रहता है जो कि किसी भी कामयाब या काबिल लडक़ी या महिला को देखकर तुरंत ही हीनभावना के शिकार हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें पीढिय़ों से यही सोच विरासत में मिली है कि लड़कियों और महिलाओं को मर्दों के मातहत ही काम करना चाहिए। मनुस्मृति ने यही सिखाया है कि किस तरह लडक़ी को पहले पिता, फिर पति, और फिर पुत्र का गुलाम रहना चाहिए। बचपन से स्कूली किताब में कमल घर चल, और कमला जल भर पढऩे वाले लडक़े जब मर्द बनते हैं, तो वे कमला को पढ़ते देखकर सहम जाते हैं, और जब कमला पढ़ाई में कमल से आगे निकल जाती है, तो उसके मुकाबले अधिक पढऩा तो बड़ा मुश्किल रहता है, लेकिन उसे बदनाम करना बड़ा आसान रहता है। इसलिए मर्दों की सोच अपने-अपने देश की मनुस्मृतियों की अलग-अलग किस्मों का शिकार रहती हैं, और दुनिया का कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जो कि औरत को बराबरी का दर्जा देता हो। कोई महिला पोप नहीं बन सकती, न पादरी बन सकती, न मौलवी बन सकती, न शंकराचार्य बन सकती, न पुजारन बन सकती। और तो और देवी की प्रतिमाओं के कपड़े बदलते हुए बाहर पर्दा टांगकर भीतर यह काम पुरूष पुजारी ही करते हैं, ऐसे काम के लिए भी किसी महिला को मौका नहीं मिलता कि वह देवी के मंदिर में पुजारन हो जाए। इसलिए धर्म ने पूरी दुनिया में हजारों बरसों से औरतों को नीचा दिखाने का जो सिलसिला चला रखा है, तमाम पुरूष-सोच उसी का शिकार है, और आज भी लोगों को किसी भी दायरे में आगे बढ़ती महिला आंखों की किरकिरी सरीखी खटकती है। 

मेरा देखा हुआ है कि किसी पेशे में काम करती हुई कोई महिला रोजाना दस-दस घंटे काम करे, और काम से लौटकर घर का पूरा काम करे, सामाजिकता निभाए, परिवार के आग्रह पर प्रवचन में भी जाकर बैठे, दोनों तरफ के परिवारों की तमाम जरूरी और गैरजरूरी जिम्मेदारियां उठाए, और इसके बाद भी हर तरफ से शिकायतें पाए, हर तरफ बदनामी झेले। ऐसी कई कामकाजी, और बहुत ईमानदारी से मेहनत करने वाली, होनहार महिलाओं के मामले मेरे देखे हुए हैं जिनकी सौ फीसदी जायज तरक्की भी उनके बदन से जोड़ दी जाती है। और ऐसे बहुत से मामलों में तोहमत लगाने वालों की एक और नीयत शामिल रहती है। कामकाजी महिला घर, दफ्तर, और दुनिया तीनों में बदनाम होती है। फिर चाहे वह हर मोर्चे पर कमरतोड़ काम करके, होनहार होने से, अपने हुनर से कामयाब हुई हो। जो हाथ उसे दबोच न पाएं, या जिन हाथों से वह छूट जाए, उनकी उंगलियां उसके खिलाफ सबसे पहले उठ जाती हैं, उसके खिलाफ सबसे पहले नुकीले पत्थर उठा लेती हैं।

इस आखिरी बात का आधा हिस्सा तो मैंने सोचा था, लेकिन इसे एक महिला दोस्त को भेजा तो उसने इसमें बाकी आधा हिस्सा जोड़ दिया। जाहिर है कि महिला के साथ होती बेइंसाफी की कल्पना कुछ हद तक तो मेरे लिए मुमकिन था, लेकिन बाकी हिस्सा एक भुगते हुए सच से निकला था, जो कि किसी महिला के लिए ही मुमकिन था।  

(Daily Chhattisgarh)

रिलेशनशिप टिप की वजह

 31 जुलाई 2022

  

 

हिन्दी में बहुत पहले, आज से चालीस बरस पहले, एक पत्रिका अपने एक कॉलम के लिए हम लोगों को बड़ा खींचती थी। कहने के लिए युवा वर्ग के लिए छपने वाली इस पत्रिका में ‘मैं क्या करूं?’ नाम का एक कॉलम छपता था जिसमें लोग अपनी नौजवानी की दिक्कतों या उलझनों का जवाब चाहते थे। उस वक्त के हिसाब से उस कॉलम के सवाल भी कुछ अधिक हिम्मती रहते थे, और शायद जवाब भी। खैर, उस वक्त वैसा एक ही कॉलम हिन्दी में था, इसलिए उसे पढऩे का इंतजार रहता था। बाद में अंग्रेजी पढऩे के साथ-साथ समझ आया कि अंग्रेजी के पत्र-पत्रिकाओं में तो वैसे कॉलम का चलन आम हैं, और जिनकी कोई उलझन नहीं रहती है, वे भी वैसे कॉलमों को पढ़ते हैं। दूसरों की जिंदगी की निजी दिक्कतों को सुनना, और फिर उसे सुलझाने का सुझाव भी पढऩा, बहुत से लोगों के लिए बहुत दिलचस्पी का होता है। हालांकि कुछ परामर्शदाता ऐसे भी हैं जो कि ऐसा कॉलम लिखने के खिलाफ रहते हैं कि जिन लोगों की जिंदगी में ऐसी कोई समस्या या उलझन नहीं रहती है, वे भी उससे अपने आपको जोड़ लेते हैं, और अपने लिए वैसी कोई काल्पनिक समस्या सच मान बैठते हैं। फिलहाल अंग्रेजी में ऐसे कॉलम धड़ल्ले से चलते हैं, और इनमें संबंधों की जटिलताओं पर परामर्श से लेकर लोगों की सेक्स-जिंदगी की दिक्कतों पर सुझाव तक रहते हैं।

अभी पिछले कुछ हफ्तों से मैंने अपने फेसबुक पेज पर रिलेशनशिप-टिप नाम का एक सिलसिला शुरू किया है जिसमें गिने-चुने बीस-पच्चीस शब्दों में कोई एक ऐसी सलाह रहती है जिसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए। यह किसी मनोवैज्ञानिक-परामर्शदाता विशेषज्ञता से उपजी हुई सलाह नहीं रहती है, लेकिन यह आम जिंदगी में खुद के जिए हुए, और दूसरों से सुने हुए से बनी धारणाएं हैं जो कि मैं दूसरों के सोचने-विचारने के लिए सामने रख देता हूं। लेकिन इससे किसी की उलझन सुलझे या न सुलझे, खुद मेरे लिए इससे अभूतपूर्व उलझनें पैदा हो रही हैं, क्योंकि आसपास के कई तरह के लोग लिखी गई एक-एक बात को मेरे उनसे रिश्तों पर कही गई बात मान ले रहे हैं, या उनके किसी और से रिश्ते के बारे में कही गई बात!

अब बात व्यक्तिगत रूप से कुछ खतरे की हो जाती है, कई संबंध और कई दोस्तियां खोने का खतरा खड़ा हो जाता है, कई लोगों से बातचीत में तनाव की नौबत आ जाती है, कुछ लोगों ने इसे साफ-साफ उनकी बेइज्जती मान लिया है, और कुछ ने यह संदेश भी भेजा कि उन्हें बेईमान-धोखेबाज लिखते हुए मुझे कोई शर्म नहीं आई? एक दोस्त ने फेसबुक पर ही यह लिखा कि उसे यह हैरानी है कि मेरे परिवार ने अब तक मुझे घर से निकालकर बाहर फेंका क्यों नहीं है? जितने मुंह, उतनी बातें।

अब बिना किसी खास उलझन के जब इस तरह की सुलझन लिखने का शौक चर्राया है, तो कुछ खतरे तो होना जायज ही था। और फिर यह किसी के पूछे गए सवाल के जवाब में लिखने के बजाय, मसीहाई अंदाज में दी गई नसीहत अधिक थी, तो मसीहा को सलीब पर तो ठुकना ही था, और वही हो भी रहा है।

दरअसल संबंधों को लेकर हिन्दुस्तान के अधिकतर लोगों के बीच बहुत खुली बातचीत का सिलसिला कम रहता है। लोग निजता खत्म हो जाने के डर से आसपास के लोगों से भी बहुत खुलासे से बहुत सी बातें नहीं करते। इसके अलावा सेक्स और प्रेमसंबंधों जैसे मुद्दे अभी भी अधिकतर लोगों के लिए वर्जित-विषय जैसे हैं, और उन पर भी बहुत चर्चा नहीं होती है। बहुत से प्रेमी-जोड़े भी ऐसे रहते हैं, जो आपस में जो करते भी हैं, जो जीते भी हैं, उस पर वे खुलकर चर्चा नहीं करते। यहां तक कि बात तो दो लोगों के बीच की है, लेकिन असल जिंदगी में दो लोग हमेशा ही दो नहीं रहते, और बहुत से लोगों की जिंदगी में एक तीसरे किसी के आने से कम या अधिक वक्त के लिए यह एक त्रिकोण बन जाता है, और उससे कैसे निपटना है इसका अंदाज बहुत से लोगों को नहीं रहता। वे लोग तो फिर भी खुशकिस्मत रहते हैं जिनके पास कोई राजदार ऐसी दिक्कत और परेशानी की बात करने के लिए रहते हैं, लेकिन वे भी अपनी जिंदगी के पूर्वाग्रहों पर टिकी हुई सलाह ही दे पाते हैं, उनकी सलाह भी किसी पेशेवर परामर्शदाता जैसी नहीं रहती है, और अक्सर ही वह काम की होने के बजाय बर्बाद करने वाली अधिक रहती है। लोगों को ऐसी किसी सलाह के लिए किसी से बात करते समय यह भी सोचना चाहिए कि हर शुभचिंतक अच्छे सलाहकार हों, यह जरूरी तो नहीं।

ऐसे में मुझे सूझा कि किसी एक व्यक्ति के निजी संबंधों से परे, किसी के भी किसी भी तरह के संबंधों को लेकर क्या सावधानी की ऐसी कोई बातें लिखी जा सकती हैं जो कि लोगों को समय रहते सोचने का मौका दे, सोचने पर मजबूर करे, और यह किसी सलाह या इलाज की तरह न होकर, एक रिमाइंडर की तरह रहे, और लोगों को याद दिलाए कि मुझे याद रखना। अपनी खुद की उम्र का खासा बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद मेरे पास खुद के लिए ऐसी किसी चेकलिस्ट की जरूरत कम है, लेकिन ऐसी चेकलिस्ट बनाने के लिए तजुर्बा बड़ा लंबा है कि लोगों को संबंधों के बारे में क्या-क्या सोच लेना चाहिए।

इन बातों की चर्चा कई लोगों के मुंह में बड़ा कड़वा स्वाद छोड़ जा रही है, क्योंकि सावधानियां किसी को नहीं सुहातीं। अगर किसी से घर-दफ्तर में आग बुझाने के सामान तैयार रखने को कहा जाए, तो लोग आमतौर पर ऐसा समझ लेते हैं कि ऐसे सलाहकार उनके बुरे की ही बात सोचते हैं। लेकिन हकीकत तो यह है कि अगर किसी बुरी नौबत से सचमुच ही बचना है, तो वक्त रहते उसके बारे में सोचकर, उसकी कल्पना करके, उस हिसाब से तैयारी करके रखना होता है। जीवन बीमा तभी तक कराया जा सकता है, जब तक जीवन रहता है, जिसका कोई फायदा मरने के बाद बाकी परिवार को मिलता है, उसे मरने के बाद नहीं किया जा सकता। इसलिए आपसी रिश्तों में तनाव आ जाने के बाद उन तनावों की कल्पना का कोई फायदा नहीं रह जाता, तब तो वह कल्पना नहीं हकीकत हो चुकी रहती है। इसलिए संबंधों को लेकर आत्ममंथन, आत्मविश्लेषण, और मूल्यांकन जैसे काम बिगाड़ आने के पहले ही काम के रहते हैं, सब कुछ बिगड़ जाने के बाद कुछ भी बच जाना मुमकिन नहीं रहता।

इसलिए लोगों को अपने संबंधों के अपने अच्छे दिनों के चलते हुए ही बुरे दिनों की आशंका किए बिना, वैसी किसी नौबत के आने पर क्या करना चाहिए इस बारे में सोच जरूर लेना चाहिए। अब इस बात को एक मिसाल के साथ समझा जाए तो वह यह है कि आज हिन्दुस्तान में हर दिन पुलिस के पास दर्जनों या सैकड़ों ऐसी शिकायतें पहुंचती हैं कि किसी ने उनकी अंतरंग तस्वीरें, या नग्न या अश्लील वीडियो वायरल कर दिए हैं। इनमें से अधिकतर मामलों में ये वीडियो और ये तस्वीरें लोगों की खुद ही अपने साथी को दी हुई रहती हैं, और रिश्ते खराब हो जाने पर इनका नाजायज इस्तेमाल होने लगता है। अंग्रेजी में इसके लिए रिवेंज-पोर्न शब्द खासे अरसे से चल रहा है, इसका हिन्दी तरजुमा बदले का सेक्स-वीडियो जैसा कुछ हो सकता है। अब जब सब कुछ अच्छा चलते रहता है, उस वक्त लोगों को यह सूझ भी नहीं सकता कि भर्ती के अपने उस वक्त के सबसे प्यारे इंसान के साथ शेयर की गई इन निजी चीजों का कोई बेजा इस्तेमाल भी कभी हो सकता है, लेकिन सच तो यह है कि इनमें से बहुत सी चीजें किसी तीसरे-चौथे तक पहुंचती हैं, और कुछ चीजें सोशल मीडिया पर भी चली जाती हैं। अब अगर मेरी सुझाई गई बातों से लोगों को अपनी तस्वीरें और वीडियो साझा करते वक्त एक बार फिर सोचना सूझता है, तो इससे उनका भला ही हो सकता है।

मेरी सुझाई हुई हर बात यहां लिखने के लिए आज की इस जगह से कई गुना अधिक जगह लग सकती है, और लोगों को यह अटपटा भी लग सकता है कि एक उम्रदराज अखबारनवीस छिछोरेपन की लगतीं इन बातों को क्यों लिख रहा है, फिर यह भी है कि मुफ्त में दी गई सलाह की कोई इज्जत तो होती नहीं है, फिर भी जैसे बिना किसी मांग के भी कोई पेड़ फल, पत्ते, फूल देते रहते हैं, उसी तरह मैं अपने को सूझी गई बातें साझा करते रहता हूं। किसी के काम आए तो ठीक, और काम न आए, तो ये बातें मेरी डायरी सरीखी दर्ज होती चल रही हैं।

(Daily Chhattisgarh)

बिना ऑनर वाले समाज में लोकप्रिय ऑनर-किलिंग

8 मई 2022


हैदराबाद में अभी एक नए किस्म का लवजिहाद हुआ। लडक़ी मुस्लिम थी, और लडक़ा हिन्दू धर्म का दलित। दोनों ही गरीब भी थे, और कॉलेज पढ़ते हुए मोहब्बत हुई, और लडक़ी के भाई की मर्जी के खिलाफ जाकर इन दोनों ने शादी कर ली। हिन्दुस्तान में आमतौर पर मुस्लिम लडक़े और हिन्दू लडक़ी की शादी को हिन्दू संगठनों ने, और भाजपा ने लवजिहाद का नाम दिया है, लेकिन यहां मामला उल्टा था। शादी के कुछ दिनों के भीतर ही लडक़ी के भाई ने अपने एक रिश्तेदार के साथ मिलकर इस दलित बहनोई को खुली सडक़ पर लोगों के बीच मार डाला। बहन देखती रह गई, रोकती रह गई, लेकिन चाकू के हमले तब तक जारी रहे जब तक वह मर नहीं गया।

हिन्दू लडक़ी के मुस्लिम लडक़े से शादी करने पर उसका धर्म बदल जाने का एक मुद्दा रहता है, और कुछ मामलों में खानपान का भी मुद्दा रहता है। हिन्दू समाज का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिमों को नीची नजर से भी देखता है, इसलिए ऐसी शादी को भी सामाजिक अपमान मान लिया जाता है, और हर बरस ऐसे कई कत्ल होते हैं जिन्हें मीडिया में ऑनर-किलिंग लिखा जाता है, और जिनसे किसी का भी ऑनर जुड़ा नहीं रहता। लेकिन इस मामले में मुस्लिम और दलित परिवार के लडक़े-लड़कियों के बीच सामाजिक प्रतिष्ठा का इतना बड़ा मुद्दा शायद न रहा हो, लेकिन लडक़ी के भाई को बहन का दूसरे धर्म में शादी करना नहीं सुहाया, और उसने बहन को विधवा कर दिया, और खुद जेल चले गया।

हिन्दुस्तान में जितने किस्म की ऑनर-किलिंग देखी जाए, वे सबकी सब लड़कियों और महिलाओं को लेकर ऑनर, यानी सम्मान, की एक जनधारणा से जुड़ी रहती हैं। किसी लडक़ी या महिला से बलात्कार हो तो बलात्कारी के परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा कम हो या न हो, बलात्कार की शिकार के परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा खत्म ही मान ली जाती है। पोशाक और रहन-सहन को लेकर हजार किस्म की बंदिशें लड़कियों और महिलाओं पर ही लगाई जाती हैं, परिवार से लेकर स्कूल-कॉलेज तक उनके लिए नियम बनाए जाते हैं, और खाप पंचायतें यह तय करती हैं कि लड़कियों को मोबाइल फोन इस्तेमाल न करने दिए जाएं, उन्हें जींस न पहनने दिया जाए। हिन्दुस्तानी मर्दों के एक बड़े हिस्से ने अपने परिवार और अपनी जात-बिरादरी की लड़कियों और महिलाओं के लिए एक तालिबान जाग उठता है, और तरह-तरह की बंदिशें लगाने लगता है।

इस देश की बहुत सी जिम्मेदार और ताकतवर कुर्सियों पर बैठे हुए मंत्री, केन्द्रीय मंत्री, और मुख्यमंत्री तक महिलाओं को लेकर हिंसक और दकियानूसी बातें करते हैं, और उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक साबित करने की फूहड़ कोशिश करते हैं। इस मामले में अधिकतर राजनीतिक दलों के लोग बढ़-चढक़र मुकाबला करते हैं, और बलात्कार की शिकार लड़कियों पर लांछन लगाने में ममता बैनर्जी जैसी महिला नेता भी पीछे नहीं रहतीं जिन्होंने इस किस्म की घटिया और हिंसक बातों को अपनी आदत में शुमार कर लिया है। अकेले मनोहर लाल, या योगी आदित्यनाथ को क्यों कोसा जाए जब संघ परिवार और भाजपा के बाहर के आजम खान सरीखे तथाकथित समाजवादी नेता भी बलात्कार की शिकार बच्ची की नीयत पर शक करके उसे राजनीतिक साजिश का हिस्सा करार देते हैं, और सुप्रीम कोर्ट की लात पडऩे पर बिलबिलाते हुए मजबूरी में माफी मांगते हैं।

दो दिन पहले हैदराबाद में जिस तरह की एक मुस्लिम नौजवान ने अपने बहनोई को मारकर बहन को विधवा कर दिया है, उसकी सोच पर मुस्लिम समाज के भीतर की वह कट्टरता तो हावी रही ही होगी जो कि मुस्लिम लडक़ी को दूसरे, तीसरे, या चौथे दर्जे का इंसान करार देती है, बल्कि उसके साथ-साथ उसके दिमाग पर देश का यह माहौल भी हावी रहा होगा कि परिवार की लडक़ी अगर अपनी मर्जी से ऐसा बड़ा फैसला लेती है तो वह भी पूरे परिवार के लिए अपमानजनक है, और उसकी सजा दी जानी चाहिए।

लोगों के बीच अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की धारणा इतनी मजबूत है, अपने धर्म, अपनी जाति, अपनी संपन्नता, और ताकत का अहंकार इतना बड़ा है कि वे परिवार की लडक़ी के किसी प्रेमप्रसंग, या पसंद की शादी पर सजा देने के लिए खुद ही जुर्म करते हैं, तथाकथित ऑनर-किलिंग के मामलों में अहंकार इतना बड़ा रहता है कि वे भाड़े के हत्यारे भी नहीं ढूंढते, और अपने हाथों हिसाब चुकता करके अपनी खोई इज्जत वापिस पाने की कोशिश करते हैं। यह बात भी तय है कि सोचे-समझे ऐसे कत्ल के पहले इन लोगों को यह भी अहसास रहता होगा कि इसके बाद वे कई बरस कैद में रहेंगे, या उम्रकैद, या फांसी भी हो सकती है, लेकिन इनका अहंकार ऐसी सजा के खौफ से भी ऊपर रहता है।

ऐसे मामलों में सरकार, पुलिस, और अदालतें कर भी क्या सकते हैं? हर किसी की हिफाजत के लिए उनके साथ पुलिस तो लगाई नहीं जा सकती, और ऐसे कत्ल के बाद गिरफ्तारी और सजा दिलवाने की बात ही सरकार के काबू की बात रहती है। लेकिन जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक ऐसी हत्याएं नहीं रूक सकतीं। जब लोग जानते-समझते कत्ल करते हैं, थाने जाकर खुद अपने को पुलिस के हवाले कर देते हैं, सजा काटने को वे इज्जत वापिस पाना समझते हैं, तो फिर उन्हें रोकना मुमकिन नहीं है।

फिर इस मामले में जिस हैदराबाद शहर की बात है, वह एक विकसित और बड़ा शहर है। ऐसे में यहां पर शहरीकरण के थोड़े से असर की उम्मीद की जा सकती थी, लेकिन वह शायद इसलिए नहीं हो पाई कि बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी के चलते हुए यह शहर मुस्लिम सोच का एक कबीला भी बना हुआ है, और धर्म के सबसे कट्टर लोगों का जमावड़ा ऐसे में हो जाता है। जब किसी धर्म के लोग कबीलाई अंदाज में बड़ी संख्या में इक_ा रहते हैं, तो वह धर्म की कट्टरता को बढ़ाने का काम करता है, कट्टरता को घटाता नहीं है। किसी भी धर्म, जाति, पेशेवर-तबके की भीड़ उसके बीच के सबसे घटिया लोगों को मुखिया बनने का मौका देती हैं, और उनके असर में समाज के लोगों का रूख किसी भी बदलाव के खिलाफ बड़ा हिंसक हो जाता है।

बिना सामाजिक बदलाव के पुलिस और अदालत की कितनी भी कड़ी कार्रवाई कट्टरता को शायद ही घटा सके। शहरीकरण से जो उम्मीद है वह भी पूरी होते नहीं दिख रही, और पढ़ाई-लिखाई भी किसी को बेहतर इंसान बनाने में मदद करती हो, ऐसा कहीं साबित नहीं होता। ऐसे में हिन्दुस्तान जैसे पाखंडी देश में अलग-अलग धर्म के लोगों के बीच, अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच शादियों को बढ़ावा देने, और उनके लिए बर्दाश्त बढ़ाने की जरूरत है। तब तक ऐसी हिंसा जारी रहेगी, और जब वह मरने-मारने तक पहुंचेगी, तो ही लोगों को उसके बारे में पता चलेगा।

(Daily Chhattisgarh)

 

विनोद कुमार शुक्ल के दर्द के बहाने कुछ चर्चा किताबों के कारोबार पर..

  13 मार्च 2022

 

हिन्दी के एक सबसे बड़े साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल अपनी रचनाओं से परे एक बार खबरों में हैं। पहले सोशल मीडिया पर एक अभिनेता-लेखक से बातचीत में उनकी कही यह तकलीफ सामने आई कि देश के दो बड़े प्रकाशन समूहों से उन्हें अविश्वसनीय रूप से कम रॉयल्टी मिल रही है। उनकी यह शिकायत भी सामने आई कि उनसे बिना पूछे इन दोनों प्रकाशकों ने उनकी किताबों के ई-बुक संस्करण छापे हैं। उन्होंने कहा कि वे इतने सालों से ठगे जा रहे हैं, और वे अब इन दोनों प्रकाशकों से स्वतंत्र होना चाहते हैं। उनके बताए गए जो आंकड़े सामने आए हैं उसके मुताबिक इन दोनों प्रकाशकों से उन्हें सालभर में कुल 14 हजार रूपए मिले हैं जबकि इन दोनों से उनकी पौन दर्जन किताबें छपी हैं जो कि हिन्दी की सबसे चर्चित किताबें रही हैं।

लेकिन सुबूतों के बिना यह कहना मुश्किल है कि प्रकाशकों की यह बात गलत है कि वे सीमित संख्या में ही किताबें प्रकाशित करते हैं जिन्हें लेखक कभी भी आकर जांच सकते हैं, और विनोद कुमार शुक्ल के साथ उन्होंने कोई बेईमानी नहीं की है, उन्हें पूरा हिसाब-किताब भेजा है, और उन्हें अनुबंध के मुताबिक भुगतान किया है। विनोद कुमार शुक्ल का कहना है कि प्रकाशक उन्हें कम रॉयल्टी देकर ठग रहे हैं, और नए संस्करणों की जानकारी भी उन्हें तब दी जाती है जब वे प्रकाशित होकर आ जाते हैं। इस विवाद पर कई और लोगों ने कई बातें कही हैं जो कि लेखक और प्रकाशक के बीच वैचारिक और कारोबारी मतभेद भी बताती हैं, और लेखकों का असंतुष्ट होना भी। इस कारोबार को जानने वाले लोगों का कहना है कि हिन्दी के लेखक को प्रकाशक की तरफ से अधिकतम दस फीसदी रॉयल्टी दी जाती है।

हिन्दी साहित्य की किताबों के कारोबार को अगर समझें तो लेखकों का बड़ा बुरा हाल सुनाई पड़ता है। कुछ दर्जन सबसे कामयाब लेखकों को अगर छोड़ दें, तो अधिकतर लेखक प्रकाशक को भुगतान करके कुछ सौ किताबें छपवाते हैं, और उन्हें 25-50 किताबें अपने करीबी लोगों में बांटने के लिए मिल जाती हैं, और बाकी किताबें प्रकाशक सरकारी या लाइब्रेरी खरीदी के अपने नेटवर्क में खपाने की कोशिश करते हैं। लेखक के संपर्क अगर अधिक होते हैं तो उनकी किताबों की कहीं-कहीं चर्चा हो जाती है, और इन दिनों सोशल मीडिया पर अपनी किताबों का अंधाधुंध प्रचार करके भी हिन्दी के सबसे अधिक चर्चित लेखक भी कुछ हजार किताबों की बिक्री में कामयाब होते हैं। लेकिन रॉयल्टी पाने वाले लेखकों में भी पांच-दस फीसदी रॉयल्टी का मतलब बड़ी छोटी रकम है, जो कि किसी भी लेखक के लिए गुजारे का सामान नहीं है।

यह किसी प्रकाशक ने किसी लेखक से कहा भी नहीं है कि उनकी जिंदगी किताबों की कमाई के भरोसे चल जाएगी, और लेखक भी दूसरों के तजुर्बे से यह बात जानते ही हैं। हम किसी एक लेखक के किसी एक प्रकाशक के साथ अनुबंध की शर्तों के पूरे न होने के बारे में यहां पर नहीं लिख रहे, हम व्यापक तौर पर इस कारोबार के बारे में लिख रहे हैं ताकि हम कारोबार से आगे बढक़र पाठक तक की बात कर सकें।

हिन्दी के बड़े से बड़े लेखक-प्रकाशक की किताबें शायद 30-35 फीसदी कमीशन पर दुकानदार बेचते आए हैं। वह भी तब जब किताबें बिक जाएं। किताब में पहला पूंजीनिवेश वक्त और प्रतिभा का लेखक का होता है, और उसके बाद प्रकाशक का। अच्छे प्रकाशक किताब का संपादन करते हैं, गलतियां सुधारते हैं, लेखक से अनुबंध करके किताब की छपाई करते हैं, मीडिया में किताब के बारे में छपवाने की कोशिश करते हैं, कहीं पुस्तक मेले में या किसी और जगह किताबों का प्रमोशन करते हैं, और दुकानदारों या पुस्तकालयों को उधार में मोटे कमीशन पर किताबें पहुंचाते हैं। यह कारोबार कुछ कच्चा कारोबार है। किसी भी जगह किताबें मौसम या दीमक की शिकार हो सकती हैं, डिलिवरी के दौरान खराब हो सकती हैं, किसी मामले-मुकदमे में फंस सकती हैं, या प्रतिबंधित हो सकती हैं। इन सबका बोझ भी कुल मिलाकर प्रकाशक पर ही पड़ता है। हो सकता है कि इससे परे भी प्रकाशक पर कुछ और बोझ होते हों, और लेखक पर भी कुछ और बोझ होते हों।

अब हम एक पाठक के नजरिए से इस कारोबार को देखें तो लगता है कि प्रकाशक-मुद्रक के स्तर पर सौ रूपए में तैयार होने वाली किताब दुकान के स्तर पर तीन सौ से छह सौ रूपए में जब बिकती है, तो उसके खरीददार कम ही रह जाते हैं। हिन्दी के आम पाठकों की साहित्यिक चेतना और उसके साहित्यिक सरोकार शायद ऐसे नहीं रहते कि जिंदगी के दूसरे खर्चों को कम करके कुछ किताबें खरीदी जाएं। यही वजह है कि हिन्दी के सबसे चर्चित लेखकों में से एक विनोद कुमार शुक्ल की किताबें भी सैकड़ों में ही बिकती हैं, और उनकी सालाना कमाई पन्द्रह हजार रूपए भी नहीं हो पाती है। साहित्य के बजाय राजनीतिक और विवादास्पद मुद्दों पर लिखने वाले हिन्दी लेखकों की कमाई इसके मुकाबले कुछ या कई गुना अधिक हो सकती है, लेकिन वह भी किसी के गुजारे के लिए काफी नहीं हो सकती।

अब सवाल यह है कि जिस लेखन-प्रकाशन कारोबार का सारा दारोमदार एक खरीददार-पाठक पर टिका होता है, वही अगर दो-चार हजार तक भी नहीं पहुंचता, तो यह एक बड़ा नाजुक कारोबार है, फल या सब्जी के धंधे जैसा, या उससे भी अधिक नाजुक। इतने सीमित खरीददारों के भरोसे लेखक भी क्या कर ले, और प्रकाशक भी क्या कर ले? और इन दोनों के बीच की खींचतान जिस छोटी सी कमाई पर टिकी है, वह अपने आपमें बड़ी सीमित और छोटी है। अगर उसमें बेईमानी हो रही है, लेखक का शोषण हो रहा है, तो वह रूपयों की शक्ल में एक छोटा शोषण है।

जब इस देश की आबादी का तकरीबन आधा हिस्सा हिन्दी बोलने वाला माना जाता है, पचास करोड़ से अधिक लोग हिन्दीभाषी हैं, तो उनके बीच हिन्दी साहित्य की किताब हजार-दो हजार भी न बिक पाना कई सवाल खड़े करता है। पहला सवाल तो यही है कि क्या लोग हिन्दी साहित्य खरीदना नहीं चाहते, या फिर वह उनकी पहुंच से दूर है? एक सवाल यह भी है कि क्या हिन्दी साहित्य की किताबों की लागत, और उनकी कीमत का अनुपात सही है? क्या किताबों के दाम काफी कम हो जाने से उनके पाठक-ग्राहक बढ़ सकते हैं? मेरा यह मानना है कि हिन्दी साहित्य की किताबों के दाम इतने अधिक रखे जाते हैं कि लोगों ने धीरे-धीरे उन्हें अपनी सीमा से बाहर मान लिया, और खरीदना बंद कर दिया, शायद धीरे-धीरे पढऩा भी बंद कर दिया। क्या किताबों को सस्ता छापकर, कम कमीशन के रास्ते बेचकर, उनकी अधिक संख्या में बिक्री हो सकती है? यह एक सवाल मुझे बार-बार सताता है कि क्या लेखक प्रकाशकों के चले आ रहे ढर्रे से परे भी कुछ कर सकते हैं ताकि उनकी किताबें कम दाम पर बिकें, और ग्राहक-पाठक बढ़ें?

हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं की किताबों को लेकर सस्ते प्रकाशन के कुछ प्रयोग हुए भी हैं, और जब-जब किताबें कम दाम पर लोगों को मिलती हैं, वे अधिक संख्या में खरीदते हैं, अधिक लोग खरीदते हैं, और अधिक पढ़ते भी हैं। अधिक दाम और सीमित संख्या किसी कारोबार के लिए तो अधिक माकूल हो सकते हैं, लेकिन क्या यह सचमुच ही लेखक के हित में है कि उसका लिखा बस कुछ हजार लोगों तक पहुंचकर सीमित रह जाए?

अब सवाल यह भी है कि प्रकाशक का किताबों की बिक्री का एक नेटवर्क होता है, और वह नेटवर्क किसी एक किताब के लिए खड़ा नहीं किया जा सकता, उसके लिए कई किताबों के प्रकाशक ही कामयाब हो सकते हैं। ऐसे में लेखक अपनी किताब खुद प्रकाशित करे, और उसे बेचे यह भी मुमकिन नहीं लगता। लेकिन प्रकाशकों को खुद अपने हित में भी बहुत कम दाम और कमाई वाली किताबें छापनी चाहिए, ताकि ग्राहक बढ़ सकें, पाठक बढ़ सकें। जब तक ग्राहक-पाठक की यह बुनियाद चौड़ी नहीं होगी, यह कारोबार एक खंभे पर खड़े हुए बड़े से होर्डिंग जैसा रहेगा जिसे वक्त की आंधी कभी भी गिरा देगी।

आज विनोद कुमार शुक्ल की तकलीफ की खबरों से यह लिखने का मौका मिला है, और मेरी यह साफ-साफ सोच है कि समझदार लेखक-प्रकाशक को अखबारी कागज जैसे सस्ते कागज पर, बिना पु_े वाले कवर में किताब छापनी चाहिए, उसे कम कमीशन पर इंटरनेट पर बेचना चाहिए, और अधिक पाठकों को ग्राहक बनाने की कोशिश करनी चाहिए। महंगी छपाई, महंगी जिल्द से किसी के लिखे हुए की इज्जत नहीं बढ़ती, उसे कितने अधिक लोग पढ़ते हैं, लिखे हुए कि कितने अधिक लोग तारीफ करते हैं, उससे लेखक की इज्जत बढ़ती है। महंगी छपाई और महंगी जिल्द प्रकाशन के कारोबार का एक हिस्सा है, वह लेखन का हिस्सा नहीं है। लेखक को अपनी सीमित किताबें दिखने में खूब अच्छी पाने का लोभ छोडऩा चाहिए। ऐसा सुना है कि इंटरनेट पर अमेजान कुल सत्रह फीसदी कमीशन पर लेखक-प्रकाशक के पते से किताब उठाता है, और देश भर में कहीं भी डिलीवर करता है। इसमें भुगतान भी चार-छह दिनों के भीतर ही हो जाता है। मतलब यह कि यह किताब दुकानों को दिए जाने वाले कमीशन से आधा ही है।

लेखकों को अपने स्तर पर यह सोचना चाहिए कि परंपरागत प्रकाशकों का कोई विकल्प हो सकता है क्या, जो कि उनका (लेखकों का) अधिक भला कर सके? प्रकाशकों को भी सीमित ग्राहकों को महंगी किताब बेचने से परे के विकल्प सोचने चाहिए कि पढऩे की आदत बनाए रखने के मुताबिक कम दाम पर किताबें बेची जाएं, ताकि वे अधिक संख्या में बिकें, और प्रकाशन का कारोबार अधिक संख्या में लोगों पर टिका रहे, अधिक भरोसे का रहे।

किताब को छापने और बेचने का मेरा एक अलग तजुर्बा रहा है जो कि बताता है कि आज के बाजार की हिन्दी साहित्य की अधिकतर किताबें एक चौथाई बाजार भाव पर आ सकती हैं, अगर लेखक-प्रकाशक गैरजरूरी महंगी क्वालिटी के चक्कर में न पड़ें। पूरी दुनिया में आज हर कारोबार सीमित कमाई और असीमित ग्राहकों के मामूली समझ वाले फॉर्मूले पर काम कर रहा है, और जमे हुए प्रकाशक अगर ऐसा करना नहीं चाहते तो कुछ जनसंगठनों को भी इस धंधे में उतरना चाहिए।

 

भारतमाता की वंदना करने वाले इस रफ़्तार से घटिया बयानों पर

  30 नवंबर 2021

   

कांग्रेस के चर्चित लोकसभा सदस्य शशि थरूर ने कल दोपहर संसद भवन से अपनी एक तस्वीर फेसबुक पर पोस्ट की जिसमें वे छह अलग-अलग महिला सांसदों के साथ दिख रहे हैं। ये सभी इस तस्वीर में खुश दिख रही हैं, और शशि थरूर ने इस तस्वीर को लेकर भाजपा के लोगों द्वारा किए हमले के बाद अपनी पोस्ट में यह बात जोड़ी है कि ऐसी सेल्फी लेने की पहल महिला सांसदों की ओर से की गई थी, और यह अच्छे मजाक के रूप में ली गई फोटो थी, और उन्होंने मुझसे यह फोटो पोस्ट करने के लिए भी कहा था, अब यह देखकर दुख होता है कि कुछ लोग इस तस्वीर से आहत हैं। लेकिन मुझे काम की अपनी जगह पर अपनी साथी सांसदों के साथ ली गई इस तस्वीर से खुशी है। दरअसल शशि थरूर ने फेसबुक पर इस तस्वीर को पोस्ट करते हुए लिखा था कि कौन कहते हैं कि लोकसभा काम करने के लिए आकर्षक जगह नहीं है। उनकी लिखी हुई इसी बात को लेकर भाजपा के लोग उन पर तमाम किस्म के हमले कर रहे हैं और प्रियंका गांधी से जवाब मांग रहे हैं कि उनका सांसद संसद को एक आकर्षक जगह कह रहा है। महिलाओं के सम्मान में कही बातों की समझ भी भाजपा के ये नेता शायद खो चुके हैं।

भारत की आज की राजनीति इस कदर घटिया हो चुकी है कि अपनी साथी सांसदों के साथ ली गई एक ऐसी मासूम तस्वीर, जिसे जाहिर तौर पर एक गैर कांग्रेसी महिला सांसद ही ले रही है, उसे लेकर एक बवाल खड़ा करना यह न सिर्फ शशि थरूर के लिए अपमानजनक है बल्कि जितनी महिला सांसद इस तस्वीर में दिख रही हैं, ऐसा विवाद उनका भी बड़ा अपमान है। अगर महिला सांसदों के लिए शशि थरूर ने संसद को काम करने की एक आकर्षक जगह लिखा है, तो ना तो उन्होंने कोई ओछी बात लिखी है, न ही किसी का अपमान किया है। अभी दो-चार ही दिन हुए हैं कि किसी एक राज्य में एक मंत्री ने सडक़ों की चिकनाई को लेकर ऐसा बयान दिया है कि उन्हें कैटरीना कैफ के गानों की तरह चिकना बनाया जाए। लोगों को यह भी याद होगा कि लालू यादव ने एक समय बिहार की सडक़ों को हेमा मालिनी के गालों की तरह चिकना बनाने की बात की थी। लंबे समय तक भाजपा और एनडीए के साथ काम कर चुके शरद यादव ने संसद के भीतर ही शहरी महिलाओं के लिए परकटी जैसे शब्द इस्तेमाल किए थे। और जहां तक शशि थरूर का सवाल है तो उनकी पत्नी सुनंदा पुष्कर को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी आमसभा में 100 करोड़ की गर्लफ्रेंड जैसे शब्द कहे थे। शशि थरूर ने महिला सांसदों के अलावा दूसरे सांसदों के साथ भी खींची गई इसी तरह की ग्रुप फोटो पोस्ट की है और लिखा है कि इन तस्वीरों को कोई वायरल नहीं करेगा।

अब सोशल मीडिया पर जगह-जगह ऐसी तस्वीरें दिखती हैं कि किसी कार्यक्रम में या किसी स्टेडियम में लड़कियां और महिलाएं जाकर शशि थरूर के साथ अपनी सेल्फी लेती हैं और पोस्ट करती हैं। हो सकता है बहुत से लोगों को उनकी निजी जिंदगी के कुछ विवादों के बावजूद उनका व्यक्तित्व आकर्षक लगता हो, उनकी किताबें पठनीय लगती हों, संसद या और उसके बाहर उनके भाषण अच्छे लगते हों, या फिर अक्सर चर्चा में रहने वाली उनकी अंग्रेजी आकर्षक लगती हो। राह चलते और सार्वजनिक जगहों पर अगर लड़कियां और महिलाएं शशि थरूर के साथ अपनी तस्वीरें खिंचवाने में गर्व महसूस करती हैं तो उनमें कोई बात तो ऐसी होगी। ऐसे में प्रियंका गांधी का नाम ले लेकर जिस तरह से मध्य प्रदेश के दिग्गज भाजपा मंत्रियों ने शशि थरूर को लेकर सवाल पूछे हैं, वह बहुत ही ओछी बात है। ऐसे विवाद खड़े करने वाले नेताओं को यह भी याद रखना चाहिए कि वह महिला सांसदों की सहमति मर्जी और पहल से खींची गई ऐसी तस्वीर को लेकर जब बखेड़ा खड़ा करते हैं, तो वे उन तमाम महिलाओं का भी अपमान करते हैं, और यह भी बताते हैं कि सभ्य समाज के तौर-तरीके बखेड़ेबाज लोगों को छू नहीं गए हैं। यह वही मध्यप्रदेश तो है जहां से आज शशि थरूर के खिलाफ ये बयान जारी किए जा रहे हैं और जहां पर भाजपा सरकार के पिछले एक मंत्री रहे हुए राघवजी को अपने ही नौकर के साथ जबरिया बलात्कार या सेक्स के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था। ऐसे और भी कई सेक्स स्कैंडल मध्य प्रदेश में हुए थे, लेकिन हम शशि थरूर और महिला सांसदों की इस इस तस्वीर के संदर्भ में किसी सेक्स स्कैंडल को याद करना नहीं चाहते, हम भाजपा के नेताओं की बयानबाजी को लेकर इसे याद कर रहे हैं. राजनीति और सार्वजनिक जीवन में इतना नीचे नहीं गिरना चाहिए कि जिन लोगों से वैचारिक असहमति हो उन पर हमला करते हुए देश की संसद की आधा दर्जन महिला सांसदों का भी इस तरह अपमान किया जाए।

भारत के राजनेताओं को लेकर समय-समय पर जितने किस्म के विवाद सामने आए हैं उनकी लिस्ट अगर बनाई जाए तो भाजपा कहीं भी कांग्रेस के पीछे नहीं रहेगी। इसलिए किसी एक दिन की सुर्खियां कब्जाने के लिए इस तरह की बकवास बहुत ही घटिया बात है, और सार्वजनिक जीवन के लोगों को, गैरराजनीतिक भी, ऐसी बकवास के खिलाफ खुलकर बयान देना चाहिए। शशि थरूर एक अच्छे लेखक हैं एक अच्छे वक्ता हैं उनका लंबा अंतरराष्ट्रीय तजुर्बा है वह संयुक्त राष्ट्र संघ में लंबा काम कर चुके हैं और सार्वजनिक  जीवन में उन्हें घटिया बोलने के लिए नहीं जाना जाता। वह दरियादिली के साथ सभी पार्टियों के नेताओं को जन्मदिन या दूसरे मौकों पर बधाई देने से नहीं चूकते फिर चाहे इसे लेकर राजनीति के लोग उनकी आलोचना ही क्यों न करें। भाजपा के जिन नेताओं ने इस तस्वीर को लेकर शशि थरूर के खिलाफ उनके चरित्र की तरफ इशारा करते हुए घटिया बातें कही हैं उन्होंने राजनीति में गिरावट का एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। शशि थरूर के साथ इस तस्वीर में अलग-अलग पार्टियों की महिला सांसद हैं और सांसदों का सम्मान करना अगर भाजपा के नेता नहीं सीख पाए तो उन्हें कम से कम महिला का सम्मान तो करना चाहिए क्योंकि वे भारत माता के गुणगान करते हुए थकते नहीं हैं। कांग्रेस के एक सांसद से अपने विरोध का चुकारा करने के लिए ऐसा घटिया काम भाजपा के नेताओं को नहीं करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

विचारों को इस हद तक काबू करने वाला फेसबुक का यह एकाधिकार-कारोबार

10 नवंबर 2021

   

फेसबुक को लेकर विवाद खत्म होने का नाम नहीं लेते हैं। अभी पश्चिमी दुनिया इस कंपनी में काम करने चुकी एक महिला अधिकारी को सुन रही है जिसने अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक, वहां की सांसदों को इस पर सोचने के लिए मजबूर किया है कि फेसबुक में किस तरह लोगों की हिफाजत से अधिक ख्याल अपनी कमाई का किया जाता है। हालांकि इस कंपनी ने इस बात को गलत करार दिया है, लेकिन इस भूतपूर्व महिला अधिकारी के खुलासे के पहले भी दुनिया में लोग लगातार इस बात को सोच रहे थे। और हिंदुस्तान का तजुर्बा फेसबुक को लेकर इसलिए भी खराब रहा है कि यहां उसने अति महत्वपूर्ण कहे जाने वाले कई लोगों के अकाउंट से नफरत फैलाने को अनदेखा किया, और दूसरे बहुत से भली नीयत वाले लोगों की लिखी गई बातों को ब्लॉक किया, भले लोगों को पोस्ट करने से रोक दिया। इसके साथ-साथ इस बात को याद रखने की जरूरत है कि किस तरह फेसबुक लोगों की जिंदगी पर छाया हुआ एक ऐसा सोशल मीडियम है जिसका गहरा असर लोगों की सोच पर हो रहा है। इस कंपनी के कंप्यूटर यह भी तय करते हैं किस-किस व्यक्ति को किस तरह की चीजें अधिक दिखानी हैं। और इस काम में कंपनी किस राजनीतिक विचारधारा को, या राजनीतिक दल को आगे बढ़ा सकती है, यह बाहरी लोगों के लिए अभी एक रहस्य की बात है। इसके अलावा फेसबुक ने अपने पेज पर दिखाने वाले इश्तहारों को लेकर भी एक और विवाद पैदा किया था कि कुछ खास राजनीतिक दलों का विज्ञापन की जगहों पर इस तरह कब्जा हो जाए कि दूसरों को कोई मौका ही न मिले।

फेसबुक के मुद्दे पर लिखने का हमारा यह कोई पहला मौका नहीं है, लेकिन जिस तरह सोशल मीडिया पर इसका एकाधिकार होते चल रहा है, यह भी समझने की जरूरत है कि इसने सोशल मीडिया या मैसेज मीडिया के दो दूसरे सबसे प्रमुख माध्यमों पर कब्जा कर रखा है, इंस्टाग्राम, और व्हाट्सएप। इन तीनों को अगर देखें तो यह कंपनी विचारों को प्रभावित करने का इतने विकराल आकार का एक खतरा बन चुकी है कि जिसका अंदाज लोगों को ठीक से लग नहीं रहा है। कहने के लिए तो अमेरिका में मीडिया के कारोबार के एकाधिकार के खिलाफ एक वक्त कानून हुआ करता था जो कि टीवी रेडियो और अखबारों के किसी एक हाथ में होने को रोकने के लिए था। अब पता नहीं वह कानून उस कारोबारी देश में इस्तेमाल हो रहा है या नहीं, लेकिन यह तय है कि हिंदुस्तान में विचारों को प्रभावित करने का जिस तरह का एकाधिकार फेसबुक और उसके इन दो औजारों ने हासिल कर लिया है वह हिंदुस्तान के लोकतंत्र के लिए एक बड़ी खतरनाक बात है। खतरनाक बात इसलिए भी है कि इन जगहों पर नफरत और हिंसा की बातों को रोकने का कोई औजार विकसित नहीं किया गया है। फिर जिन लोगों को फेसबुक बहुत खास मानता है उसमें हिंदुस्तान के कुछ खास राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े सत्तारूढ़ नेता हैं जिनके हिंसा के पोस्ट भी किसी कार्रवाई से बच जाते हैं, और दूसरी तरफ जो अमन पसंद लोग हैं उनकी लिखी हुई अहिंसक बातें भी ब्लॉक कर दी जाती हैं।

 इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान की बाकी भारतीय भाषाओं को समझने और उनमें फैलाई जा रही हिंसा को रोकने के लिए फेसबुक ने पर्याप्त औजार नहीं बनाए हैं। हिंदुस्तान के लोग फेसबुक के सबसे बड़े यूजर हैं, लेकिन हिंदुस्तान को लेकर फेसबुक की सुरक्षा प्रणाली सबसे ही कमजोर है। यह मानना भी ठीक नहीं होगा कि एक चतुर कारोबारी लापरवाही में ऐसा कर रहा है, यह भी हो सकता है कि वह राजनीति करने वाले दूसरे कारोबारियों के साथ मिलकर भी ऐसी लापरवाही दिखा रहा हो ताकि कुछ लोगों की पसंद की हिंसा की बातें फैलाई जा सके। क्योंकि सोशल मीडिया दुनिया में एक नई चीज है, और इसमें जो सबसे कामयाब प्लेटफॉर्म हैं उन्हीं पर सबसे अधिक लोग जाते हैं, क्योंकि उनके सबसे अधिक पहचान के लोग वहीं पर रहते हैं. इसलिए कोई अमनपसंद लोग कोई अलग प्लेटफॉर्म बनाएं तो उसकी कामयाबी की संभावना बिल्कुल ही कम है। अमरीका में तो नफरत पर जिंदा पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्विटर पर उन्हें ब्लॉक कर दिए जाने के बाद ट्विटर के मुकाबले एक नया प्लेटफॉर्म शुरू करने की घोषणा की थी और वहां के अनगिनत नफरती अरबपति उनके साथ भी थे, लेकिन उनकी वह मुनादी किसी किनारे नहीं पहुंच पाई।

खुद अमेरिकी लोकतंत्र इस बात को लेकर अभी परेशान है कि रूस की सरकार अमेरिकी सोशल मीडिया के मार्फत अमेरिकी वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है या नहीं? और अगर कर भी रही है तो उसे अमेरिका किस तरह रोक सकता है, किस तरह वह बाहरी तत्वों को अपने लोकतंत्र को काबू में करने से रोक सकता है। ऐसी नौबत हिंदुस्तान के भीतर भी आ सकती है, आ रही है, या आ चुकी है। हो सकता है कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला सच ऐसा चुनिंदा सच हो जिसे कि दिखाने में किसी राजनीतिक दल की दिलचस्पी हो और जो फेसबुक जैसे कारोबार के साथ सांठगांठ करके उस पर खासा वक्त गुजारने वाले लोगों की सोच को प्रभावित करने का काम कर रहा हो। भारतीय लोकतंत्र को परिपच्ता पाने में लंबा वक्त लगेगा यहां के वोटरों की जागरूकता जागने का काम अभी बाकी ही है। इसलिए फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर की जा रही कारोबारी शरारत का जमकर विरोध करना जरूरी है। इस प्लेटफार्म ने अपने खिलाफ सभी शिकायतों के लिए एक स्वतंत्र ट्रस्ट बना रखा है, लेकिन आज उस पर शिकायत करने वाले लोग किसी एक विचारधारा की तरफ से सैलाब की तरह पहुंच जाते हैं, क्योंकि वे इस औजार को जानते हैं, और ऐसा विरोध दर्ज करने के लिए तैनात हैं। दूसरे लोगों को भी इसकी ताकत को समझना होगा और इसे इस्तेमाल करना होगा।

अभी कुछ दिन पहले ही हमने फेसबुक के एक नए प्रोजेक्ट मेटावर्स के बारे में लिखा था, और वह फेसबुक के मुकाबले भी सैकड़ों गुना अधिक ताकत लेकर आ सकता है। ऐसे किसी दिन की तैयारी करने के लिए हमने कारोबार के लोगों को सावधान किया था, लेकिन अब लग रहा है कि उसके राजनीतिक बेजा इस्तेमाल के बारे में हमने नहीं लिखा था, जो कि अब जरूरी लग रहा है। अगर फेसबुक जैसी कोई ताकत सौ गुना अधिक ताकत हासिल कर लेती है, तो उससे हजार गुना अधिक सावधान रहने की भी जरूरत होगी।

(Daily Chhattisgarh)

जनता की जागरूकता देश के ढांचे की बुनियादी मजबूती है

 9 नवंबर 2021

  

ऑस्ट्रेलिया में अभी कोरोना का टीका लगवाने के बाद टीके वाले लोगों के बीच हुई एक लॉटरी में एक युवती को एक मिलियन अमेरिकी डॉलर मिल गए। भारत के रुपए के मुताबिक करीब 7.50 करोड़ रुपए। वहां पर लोगों के बीच टीका लगवाने को लेकर अधिक उत्साह नहीं था इसलिए सरकार ने एक लॉटरी शुरू की, और टीकाकरण करवाने वाले लोगों के बीच किसी का नाम निकालकर उसे लॉटरी मिलनी थी, और इस युवती को टीके लगवाने के बाद लॉटरी भी मिल गई। दूसरी तरफ अमेरिका एक ऐसा देश है जहां पर लोग तमाम किस्म के ईनाम, पुरस्कार, और नगद रकम के बावजूद, टीके लगवाने से बड़ी संख्या में कतरा रहे हैं। अमेरिकी लोगों में अपनी आजादी को लेकर एक ऐसी जिद है जो उन्हें उकसाती है कि टीका लगवाना, या न लगवाना, उनका कानूनी हक है। वहां अभी अमेरिकी सरकार ने यह आदेश जारी किया है कि 100 से अधिक कर्मचारियों वाली हर कंपनी को अनिवार्य रूप से अपने कर्मचारियों को दो-दो टीके लगवाने पड़ेंगे, लेकिन इसके खिलाफ लोग अदालत चले गए हैं। लोग मास्क लगाने के खिलाफ हैं, उसे लेकर भी अदालत चले गए, सडक़ों पर उन्होंने मास्क जलाते हुए प्रदर्शन किया। अमेरिकी सरकार चाहकर भी हवाई सफर पर टीकाकरण का प्रतिबंध लागू नहीं कर पा रही है।

दूसरी तरफ हिंदुस्तान को देखें तो यहां सोशल मीडिया पर दो-चार लोगों को छोडक़र टीकाकरण का किसी ने विरोध नहीं किया। लोगों ने लंबी-लंबी कतारें लगाकर टीके लगवाए और राज्य सरकारें लगातार केंद्र सरकार पर दबाव बना रही हैं कि उन्हें अधिक टीके दिए जाएं ताकि वे अपनी तमाम आबादी को लगा सकें। हिंदुस्तान में टीकों को लेकर जागरूकता का एक बड़ा लंबा इतिहास रहा है। इस देश में तकरीबन तमाम आबादी ने अपने बच्चों को पोलियो के टीके लगवाए और कुछ वक़्त के लिए उत्तर भारत के कुछ एक गिने-चुने गांवों के मुस्लिम परिवारों को छोडक़र किसी ने इसका बहिष्कार नहीं किया, और नतीजा यह निकला कि भारत पोलियो मुक्त देश बन गया। कोरोना की मार भी हिंदुस्तान में घनी बस्तियों, और कमजोर अस्पतालों के बावजूद कम रही, उसकी वजह भी कई लोग यह मानते हैं कि तरह-तरह के जो टीके हिंदुस्तान में बचपन से लगते हैं उसकी वजह से बच्चों में कई तरह की प्रतिरोधक क्षमता रहती है, और इसलिए हिंदुस्तान में कमजोर इंतजाम के बावजूद मौतें कम रही। यह कहना वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं होगा कि दूसरी बीमारियों के लिए लगाए गए टीकों की वजह से आज लोगों को कोरोना का असर नहीं हो रहा है, लेकिन यह तथ्य अपनी जगह सही है कि जब कभी ऐसी कोई चुनौती आती है तो हिंदुस्तान की तकरीबन तमाम आबादी एक वैज्ञानिक सोच के साथ अपने बच्चों को, या खुद को टीके लगवाने के लिए खड़ी हो जाती है।

अब इस बात को भी समझने की जरूरत है कि जिस देश में अंधविश्वास घर-घर तक फैला हुआ था, या है,  जहां पर चेचक के टीके के मुकाबले लोग माता की पूजा पर अधिक भरोसा करते थे, जहां पर आज भी सांप काटने से लेकर दूसरे कई किस्मों की बीमारियों तक लोग झाड़-फूंक करवाते हैं, वहां भी लोग टीका लगवाने के लिए सामने आए। इस मामले में हिंदुस्तान, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों के मुकाबले बहुत आगे रहा जहां पर किसी ईनाम या नकद रकम की जरूरत नहीं पड़ी और लोगों को दबाव डालकर भी टीके नहीं लगाने पड़े। भारत सरकार जितने टीकों की सप्लाई कर पाई, उतने टीके आनन-फानन लग जा रहे हैं, और कोई टीके लोगों का इंतजार करते हुए फ्रिज में बंद नहीं रहते। मतलब, अब जिस दिन भी बच्चों को टीके लगने शुरू होंगे, उस दिन भी लोग सामने आएंगे, और अधिकतर लोग ऐसे दिन का इंतजार भी कर रहे हैं। इस बात को समझने की जरूरत है कि भारत के कम पढ़े-लिखे लोगों में, अंधविश्वास से भरे हुए देश में, टीकाकरण को लेकर यह जो जागरूकता है, यह कोई छोटी बात नहीं है। इस देश में अगर टीकाकरण के लिए लोगों को नगद रकम या लॉटरी में ईनाम देना पड़ता तो वह कितना महंगा पड़ता है उसकी कितनी लागत आती है। तो भारत में लोगों के बीच टीकाकरण को लेकर यह जो जागरूकता है यह इस देश में आजादी के बाद से लगातार मेहनत करके जो वैज्ञानिक सोच विकसित की गई थी, उसी का नतीजा है कि टीकाकरण पर लोगों का भरोसा है।

लोगों का भरोसा आज भी तंत्र-मंत्र, जादू, झाड़-फूंक पर से पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन जो लोग इन बातों पर भरोसा रखते हैं वे लोग भी टीका तो लगा ही लेते हैं। इस बात का सबसे बड़ा सबूत यह है कि पोलियो इस देश से पूरी तरह खत्म हो गया। अगर कहीं भी कोई बच्चा पोलियो वैक्सीन से से बच गया रहता तो पोलियो पूरी तरह खत्म नहीं हुआ रहता। इसलिए आजादी के बाद से लगातार देश के लोगों में जो वैज्ञानिक सोच जिस हद तक भी विकसित हो पाई उसी का नतीजा था कि कोरोना के टीकों का कोई विरोध नहीं हुआ। जब विकसित देशों में लोग टीके लगवा नहीं रहे हैं और आज ऐसे लोग बड़े खतरे में पड़ रहे हैं वहां की सरकारें यह नहीं समझ पा रही हैं कि कैसे लोगों को समझाया जाए, कैसे उनकी कानूनी चुनौतियों से जूझा जाए, ऐसे में हिंदुस्तान में अगर टीकों का कोई भी विरोध नहीं हो रहा है, तो इसकी तारीफ की हक़दार देश में फैल रही तमाम किस्म की धर्मांधता के बावजूद लोगों में बची हुई वैज्ञानिक चेतना है. टीकों पर उनका भरोसा है इसीलिए हिंदुस्तान आज बच पा रहा है। देश में कोरोना के मैनेजमेंट में जितने तरह की नाकामयाबी हुई है, उसके लिए देश की सरकार जिम्मेदार रही है, लेकिन जितने तरह की कामयाबी हुई है, उसके लिए देश की आम जनता हक़दार है।

जब किसी देश में किसी किस्म के इंफ्रास्ट्रक्चर की बात होती है तब वहां गिना जाता है कि वहां पर सडक़ें कितनी हैं, बिजली कितनी फैली हुई है, इलाज की सहूलियतें कितनी हैं, पढ़ाई-लिखाई के संस्थान कितने हैं. जनता की सोच, उसकी जागरूकता को भी ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर में जोड़ कर गिनना चाहिए। जनता की सोच किसी मुसीबत के मौके पर किस तरह सरकार के बोझ को हल्का कर सकती है, यह हिंदुस्तान में कोरोना के इस दौर में साबित हुआ है। अमरीका की तरह ही, हिंदुस्तान के कानून के मुताबिक कोरोना का टीका लगाना किसी के लिए भी जरूरी नहीं है। यहां भी कुछ बददिमाग लोग अगर चाहते, तो अड़ सकते थे कि वे टीका नहीं लगाएंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि देश में जो आम चेतना है, वह टीकाकरण के पक्ष में पीढिय़ों से चली आ रही है। पीढिय़ों की यह जागरूकता हाल के वर्षों में खत्म नहीं की जा सकी है। इस बात को लेकर देश की सरकारों को और राजनीतिक ताकतों को यह सबक लेना चाहिए कि जनता में जागरूकता देश के ढांचे का एक मजबूत हिस्सा रहती है, और उसे न कम आंकना चाहिए और न उसे तबाह करने की कोशिश करनी चाहिए।

(Daily chhattisgarh)

हुसैन को याद रखने की जरूरत


26 दिसंबर 2011
आजकल
हुसैन को याद रखने की जरूरत

पुराने कानूनों और नई टेक्नालॉजी ने दुनिया के साथ-साथ भारत के लिए कई किस्म की नई चुनौतियों खड़ी कर दी हैं। अमरीका जैसे कुछ देश जिन्होंने टेक्नालॉजी बदलने की रफ्तार से ही कानून भी बदल लिए, वे भी आज इन कानूनों के कई पहलुओं से रोज जूझ रहे हैं। इंटरनेट ने लोगों की जिंदगी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहुत से ऐसे नए पहलू जोड़े हैं जिनके बारे में कुछ बरस पहले तक मीडिया का एकाधिकार सा बने रहने की वजह से कभी सोचने की नौबत नहीं आई थी। अब बहुत मामूली से खर्च के साथ कोई भी व्यक्ति इंटरनेट पर जाकर वहां अपने मन की बहुत किस्म की बातें लिख सकते हैं, दूसरे लोगों को महान या घटिया बता सकते हैं। इस नई आजादी ने कल तक अखबारों के संपादक नाम की एक सेंसरशिप को खत्म कर दिया है और अब लोग सीधे-सीधे दूसरे लोगों तक पहुंच जाते हैं, पल भर में, सभी सरहदों को चीरकर।

भारत सरकार ने एक ताजा नोटिस इंटरनेट की बहुत सी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों को देकर कहा है कि वे वहां से आपत्तिजनक सामग्री हटाएं। दूसरी तरफ दिल्ली की एक अदालत ने अभी दो दिन पहले ही ऐसा ही एक नोटिस इन वेबसाइटों को दिया है जो मोटे तौर पर पश्चिमी दुनिया से चलती हैं, और समय-समय पर दुनिया के अलग-अलग देशों के प्रतिबंध झेलने की आदी हैं। फेसबुक, ट्विटर और इसी किस्म की दूसरी बहुत सी वेबसाइटें लोगों के बीच बातचीत, विचार-विमर्श और गाली-गलौज का रिश्ता मुहैया कराती हैं। पिछले एक बरस में भारत की सरकार को अपने भ्रष्टाचार के खिलाफ जितने किस्म के आंदोलन झेलने पड़े उनमें जनमत को तैयार करने और बात को फैलाने में इन वेबसाइटों ने खासी मदद की। नतीजा यह है कि सरकार इन पर लोगों की लिखी बातों से नाखुश है। लेकिन बात महज इतनी नहीं है। बिना किसी रोक-टोक के जब लोगों को अपनी किसी भी तरह की दिल-दिमाग की हालत के चलते लिखने और नेट पर डाल देने की सहूलियत है, और जब तक कोई कानूनी जांच न हो तब तक लोगों को एक यह छूट भी मिली हुई है कि वे बेनामी, गुमनामी के साथ, किसी नकली नाम से भी यह काम कर सकते हैं, तो नतीजा यह कि लोग किसी की वल्दियत पर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो किसी की मां के चाल-चलन की बात कर रहे हैं।

हमारा अपना अनुभव यह रहा है कि यह बेकाबू आजादी जितना भला कर रही है उतना ही एक ऐसा बुरा भी कर रही है जिसके खिलाफ किसी किस्म की कानूनी कार्रवाई इस टेक्नालॉजी के बेसरहद होने से मुमकिन भी नहीं है। भारत की सरकार अगर किसी वेबसाइट को रोक भी देगी, तो दुनिया के बहुत से देशों ने ऐसा करके देख लिया है, उससे कुछ नहीं थमता। तो ऐसे में इस मर्ज का इलाज क्या है?

दरअसल इंटरनेट लोगों को बिना अपनी शिनाख्त उजागर किए लिखने की एक ऐसी छूट देता है जो कि अब तक किसी ऐसे सार्वजनिक शौचालय के दरवाजे के भीतर की तरफ ही हासिल होती थी। उसमें भी पहले और बाद में उसी शौचालय में जाने वाले लोग तो यह अंदाज लगा ही सकते थे कि यह किसने लिखा होगा, लेकिन इंटरनेट पर जहां भारत के ही करोड़ों लोग हैं, और जहां बेचेहरा बने रहने की पूरी सहूलियत हासिल है वहां पर पखाने की इस दरवाजे के भीतर लिखने वाले का अंदाज भी लगाना मुमकिन नहीं है। कहने को तो यह भी है कि कम्प्यूटर, इंटरनेट और फोन पर भेजा गया एक शब्द भी इतनी जानकारियों के साथ दर्ज होता है कि उसे तलाश कर अदालत में साबित किया जा सकता है। लेकिन एक सवाल यह उठता है कि कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन के बिना ओर-छोर के अंतहीन फैले हुए बरगद के पेड़ पर टहलती हुई लाखों चीटियों में से किसी एक चींटी को कैसे तो कोई तलाशेगा और फिर कैसे उसके पदचिन्ह अदालत में साबित करेगा? कैसे कोई समंदर में रेत के एक कण को पहचानकर उसे कानून के कटघरे तक ले जाएगा? यह काम डॉन को पकडऩे से भी मुश्किल है।
दूसरी बात यह कि अभिव्यक्ति की जिस स्वतंत्रता को लेकर कानून अपने आपमें अभी कमजोर है, एक-एक मामले पर सुप्रीम कोर्ट तक बहस गई हुई है, ऐसे में करोड़ों लोगों की रोजाना की अभिव्यक्ति को पुलिस या कोई दूसरी जांच एजेंसी कब तक पकड़ते रहेगी और अदालतों में लगी हुई मामलों की कतारों में ऐसे मामलों को कब जगह मिलेगी? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरे लोगों के अपने सम्मान, अपने निजी जीवन के हक, एक की धार्मिक भावनाएं और दूसरे की धार्मिक भावनाएं, एक के नैतिक मूल्य और दूसरे के नैतिक मूल्य, इन सबमें इतने किस्म की विविधता है, टकराव है कि कोई भी दूसरे की कही हुई बात को अपना अपमान मान सकते हैं, और अपने हक का दावा कर सकते हैं। दूसरी तरफ जो कहने वाले लोग हैं, लिखने और इंटरनेट पर डालने वाले लोग हैं उनके अपने ये तर्क हो सकते हैं कि अभिव्यक्ति की यह उनकी अपनी स्वतंत्रता है।

कहने के लिए भारत का मौजूदा, और नया-नया, सूचना तकनीक कानून इतना कड़ा है कि वह लोगों को छपी हुई बातों के मुकाबले, इंटरनेट पर डाली गई बातों के लिए अधिक आसानी से अधिक कड़ी सजा दिला सकता है। लेकिन सवाल यह है कि पहले से बोझ तले टूटी कमर वाली जांच एजेंसियों और अदालतों के पास ऐसे नए मामलों के लिए वक्त कहां से निकलेगा? कहने के लिए सरकार के पास पानी की जांच करने के लिए सहूलियत है, लेकिन अगर देश भर के हर नदी-तालाब के पानी की जांच हर हफ्ते करवाई जाए तो क्या इन प्रयोगशालाओं से कोई नतीजे निकल सकेंगे? इसलिए हम इस मौजूदा हाल को किसी आसान इलाज के लायक नहीं समझते। हम यहां पर अपनी तरफ से कोई बात इसलिए सुझाना नहीं चाहते क्योंकि दुनिया के लोगों की अभिव्यक्ति की जरूरतें अलग-अलग हैं। हमें तो आए दिन, या रोज-रोज लिखने का मौका मिल जाता है, जिन लोगों को तकलीफ हमसे ज्यादा है और कहने को जगह कहीं नहीं हैं, वे लोग अपनी भड़ास को, अपनी शिकायत या तकलीफ को अगर इंटरनेट पर नहीं निकालेंगे तो वह भड़ास उनके मन के भीतर इक_ा हो-होकर किसी अलग किस्म का धमाका करेगी।

यहां पर लगे हाथों हम भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक और पहलू पर भी बात करना चाहेंगे। यहां सेंसर हो चुकी फिल्में के पर्दे पर पहुंचने के पहले ही उनके खिलाफ अदालतों में मामले दर्ज होने लगते हैं, किसी की तस्वीर को लेकर मामला चलने लगता है तो किसी गाने को हटाने की मांग होने लगती है। धर्मों को लेकर सामाजिक तनाव इतना है कि खुलकर उस बारे में बात नहीं हो सकती और एक बहुत ही सतही जुर्म की तरह, एक थाने के स्तर पर ही किसी के लिखे के खिलाफ, किसी के कहे के खिलाफ यह जुर्म दर्ज हो जाता है कि उसने किसी और की धार्मिक भावनाओं को आहत पहुंचाई है। हजारों ईश्वरों वाले भारत जैसे देश में किसी एक के धार्मिक अधिकार भी किसी दूसरे की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले हो सकते हैं। एक धर्म पूरी तरह अहिंसा पर चलता है और उसके लोग यह दावा कर सकते हैं कि दूसरे धर्म के लोग जब बलि या कुर्बानी देते हैं, तो अहिंसा की उनकी धार्मिक भावना को चोट पहुंचती है। किसी धर्म या आध्यात्म के तहत महिलाओं से भेदभाव की व्यवस्था हो सकती है, और कोई दूसरा धर्म यह कह सकता है कि उनके देश में ऐसा भेदभाव उनकी धार्मिक भावना को आहत करता है। आज योरप के कई देशों में यह हो भी रहा है। मुस्लिम महिलाओं के बुर्के के खिलाफ फ्रांस और कुछ दूसरी जगहों पर जिस तरह के कानून बन रहे हैं उन्हें मुस्लिम अपने धार्मिक अधिकारों के खिलाफ मान रहे हैं और दूसरे लोग उसे अपने देश की संस्कृति के खिलाफ मान रहे हैं। तो ऐसे टकराव इंटरनेट के बिना भी चलते हैं जहां पर कि लोगों के चेहरे हैं, उनकी शिनाख्त है।

भारत के मौजूदा हाल में हमें कुछ बहुत ही खतरनाक किस्म की साम्प्रदायिक या आतंकी बातों के अलावा, इंटरनेट पर अधिक रोक-थाम की गुंजाइश इसलिए नहीं दिखती क्योंकि इस बात पर मतभेद बने रहेगा कि क्या आपत्तिजनक है, और क्या नहीं। लेकिन अभी भारत की सरकार ने और एक अदालत ने यह बात इंटरनेट कंपनियों से कही है, और अब करोड़ों लोग उत्सुकता से यह देख रहे हैं कि आपत्तिजनक और अभिव्यक्ति की कौन सी परिभाषाएं लागू होती हैं। दुनिया का अब तक का अनुभव तो यह रहा है कि कुछ बहुत हिंसक, बहुत आतंकी और बच्चों के सेक्स-शोषण जैसे जाहिर तौर पर पहचाने जा सकने जुर्म तो एजेंसियों के घेरे में आ जाते हैं लेकिन छोटी-मोटी गाली-गलौज और छोटा-मोटा चरित्र हनन रोकने के लायक माना नहीं जाता। लायक न मानने के यहां पर हमारे दो मतलब हैं, एक तो यह कि उन्हें इतनी अहमियत नहीं दी जाती कि उसे रोकने की कोशिश हो, दूसरी बात यह कि उसे रोकना कानूनी-तकनीकी रूप से मुमकिन ही न हो।

भारत में जो लोग आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मजा लेना चाह रहे हैं, ले रहे हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि हजार बरस पहले हिन्दुओं की बनाई नग्न प्रतिमाओं की तरह की कुछ पेंटिंग्स बनाने की वजह से मकबूल फिदा हुसैन को इस किस्म के इतने कानूनी मुकदमे झेलने पड़े कि बची जिंदगी सैकड़ों अदालतों में फेरे लगाने के बजाय उन्होंने इस देश को ही छोड़ देना बेहतर समझा। उन्हें तो दुनिया के कई देशों में जगह मिल गई, लेकिन बाकी लोगों की कही छोटी-छोटी बातों पर भी अगर उन्हें अदालतों में इस तरह खड़ा कर दिया जाएगा तो वे कैसे जिंदा रह पाएंगे? और यह काम बहुत मुश्किल भी नहीं है। अपनी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचने के तर्क के साथ ही लोग अगर देश भर की हर जिला अदालत में किसी एक के खिलाफ मामले दर्ज करेंगे तो अब कोई कितने जिलों में हर पेशी पर जा पाएगा? हम किसी भी नए कानून के बनाए जाने के पहले मौजूदा कानूनों पर अमल की नाकामयाबी पर सोच-विचार बेहतर समझते हैं। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें आज के कानून का इस्तेमाल न कर पाने वाले नालायक लोग नए कानूनों को बनाने की बात करते हैं ताकि उनकी आज की कमजोरियां, आज के कानून की कमजोरियां साबित की जा सकें।

इंटरनेट पर लोगों की लिखने की आजादी अब एक ऐसी हकीकत है जो वापिस नहीं जा सकती। एक संभावना ने जन्म जब ले लिया, तो फिर उसे मां के पेट में डाला नहीं जा सकता। अब वह कितनी अच्छी है और कितनी बुरी, उसके साथ किस तरह का बर्ताव किया जाए और कैसे निपटा जाए, यही बात हो सकती है और सच तो यह है कि आज इंटरनेट बिना किसी मां-बाप के, बिना किसी पालने वाले के, अपने आप पलने वाला माध्यम बन चुका है और उस पर नामुमकिन रोक-टोक की कोशिश भारत की आज की सरकार को ऐसा बताती है मानो उसके पास लुकाने-छुपाने को बहुत कुछ है।

हमारा यह मानना है कि इंटरनेट पर हमले उन्हीं लोगों पर होते हैं जो जिंदगी में कुछ बने हुए हैं। ऐसे लोग वहां पर झूठ का पर्दाफाश कर सकते हैं बजाय अदालतों के। लेकिन कुछ मामलों में अगर बदनीयत हमलावर कानून तोड़ते हुए कुछ लिखते हैं, तो वे अपनी मुसीबत का सामान खड़ा कर रहे हैं। अधिकार और जिम्मेदारी को मिला-जुलाकर ही देखा जा सकता है और ऐसा कुछ भी करते हुए हुसैन को याद रखना चाहिए।

पेशेवर झूठों की कहानी

3 अक्टूबर 2011
आजकल
सुनील कुमार

इंटरनेट पर सुब्रमण्यम स्वामी को रोजाना दर्जनों ट्वीट पोस्ट करते देखना बड़ा दिलचस्प भी रहता है और हैरान करने वाला भी। उनकी कुछ बातों को गंभीरता से लेना इसलिए जरूर लगता है क्योंकि वे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर अपने कई आरोपों को दस्तावेजों के साथ साबित करने का काम कर चुके हैं और दुनिया के बड़े जाने-माने विश्वविद्यालयों में उन्हें पढ़ाने के लिए बुलाया जाता है। इसलिए उन्हें महज साम्प्रदायिक, शिगूफेबाज कहकर खारिज कर देना जायज नहीं होगा। उनकी बातें साम्प्रदायिकता के जहर से भरी रहती हैं लेकिन वे अपने आरोपों को देश की सबसे बड़ी अदालत तक ले जाकर उन्हें सही साबित करने का हौसला दिखाने वाले कुछ गिने-चुने नेताओं में से हैं जिनकी अपनी पार्टी का न कोई बड़ा ढांचा है और न ही उन्हें इस लड़ाई में किसी और से बहुत बड़ा सहारा मिलता।
मैंने उनसे ट्विटर पर कुछ आरोपों को लेकर जब सुबूत मांगे तो उनका जवाबी हमला तो कम था लेकिन उनके समर्थन में चौकन्नी और मेहनत करने वाली टीम ने सीधी गाली-गलौज शुरू करने और बिना किसी जानकारी के मुझे कांगे्रस की तनख्वाह पर जीने वाला लिखना शुरू कर दिया। उन्हें यह जानकर थोड़ी सी निराशा हो सकती है कि कांगे्रस के कुछ लोग मुझे भाजपा की तनख्वाह पर जीने वाला मानते हैं, सरकार में बैठे कुछ लोग नक्सलियों का मददगार मानते हैं, नक्सलियों से हमदर्दी रखने वाले मुझे सरकार का हिमायती मानते हैं। कुल मिलाकर कोई भी मुझे अपना नहीं मानता क्योंकि किसी व्यक्ति या संगठन के बजाय जब मुद्दों पर लिखना होता है तो कभी किसी के खिलाफ कड़वी बातें लिखी जाती हैं तो कभी उनके किसी विरोधी के खिलाफ। और इंटरनेट के ट्विटर पर मेरे सरीखे छोटे शहर के अखबारनवीस के बारे में अधिक लोग जानते नहीं हैं इसलिए किसी से एक लाईन का सीधा सवाल भी लोगों को तुरंत उकसा देता है कि वे गाली-गलौज शुरू कर दें।
खुद सुब्रमण्यम स्वामी ने सुबूत की मांग के मेरे ट्वीट के जवाब में लिखा कि भारतीय मीडिया किसी सुबूत को परखने की ताकत नहीं रखता।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक अपनी लड़ाई को तर्कसंगत और न्यायसंगत साबित करने में लगे हुए, दुनिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों में पढऩे और पढ़ाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी जिस तरह की बातें लिखते हैं उससे यह हैरानी होती है कि ऐसे बेबुनियाद झूठ की उन्हें जरूरत क्यों पड़ती है? अभी उन्होंने लिखा-विष कन्या की बहन, अनुष्का उर्फ अलेजान्द्रा ने सोनिया के हमशक्ल का रोल निभाना शुरू कर दिया है। वह पी.चिदंबरम को आदेश जारी करती है। दो अक्टूबर को सुबह राजघाट पर ध्यान से देखें। उन्होंने आगे लिखा कि अनुष्का रोजाना उस पर (यह शायद चिदंबरम के बारे में ही है) चीखती है-स्वामी को गिरफ्तार करो, भारतीय संविधान टायलेट पेपर है उसे फेंक दो। वे आए दिन इटेलियन माफिया जैसे आरोप लगाते रहते हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि सोनिया और जेटली प्रेस को कहते रहते हैं कि वे उनके (स्वामी के) बारे में कोई भी अच्छी खबर न छापे।
मुझे ऐसी किसी अनुष्का नाम के विष कन्या के बारे में अलग से जानकारी नहीं है कि स्वामी किसके बारे में लिख रहे हैं, लेकिन मुझे उनके इस आरोप पर जरा भी भरोसा नहीं है कि कोई सोनिया गांधी की हमशक्ल होकर राजघाट पर पहुंचेगी।
इस मुद्दे पर आज लिखने की इसलिए सूझ रही है कि कांगे्रस के चर्चित, विवादास्पद और ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह की एक शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने बाईस लोगों या वेबसाईटों के खिलाफ जुर्म कायम किया है जहां पर उनके बारे में अपमानजनक बातें लिखी गई हैं। सुब्रमण्यम स्वामी जिस तरह के आरोप रोज कई बार लगा रहे हैं, उनको साबित करना शायद उनके जैसे ताकतवर अदालतबाज के लिए भी मुश्किल होगा और उनसे अदालत में सोनिया से जुड़े मुद्दों पर बहस करना कांगे्रस तय करती है या नहीं इसका अंदाज लगाना मुश्किल होगा। लेकिन जो सोनिया गांधी मीडिया में किसी से किसी तरह की बात न करने के लिए जानी जाती है वह मीडिया के लोगों को स्वामी के पक्ष की कोई खबर न बनाने को कहे, यह बात भरोसमंद नहीं लगती।
दिग्विजय सिंह के दायर किए गए मामले से बहुत पहले ही फेसबुक पर कई लोगों से इस बात को लेकर मेरा गहरा मतभेद रहा कि कुछ साम्प्रदायिक सोच के लोगों का रोज का लिखा हुआ झूठ कई लोग एक सच की तरह फैलाना शुरू कर देते हैं और जब मैं उनसे जान-पहचान होने के नाते जांच-परख लेने की अपील करता हूं तो वे मुझे इस खेमे का या उस खेमे का एजेंट लिखने लगते हैं। इंटरनेट की मेहरबानी से झूठ को फैलाना जितना आसान है, उतना ही आसान झूठ को पकड़ लेना भी है। जब बहुत ही सनसनीखेज और बड़े-बड़े आरोप लगते हैं तो उनको जांच लेना मेरी आदत में शुमार हो गया है। नतीजा यह होता है कि सोनिया या राहुल के बारे में, सोनिया के मायके के बारे में, सोनिया के इटेलियन माफिया या पोप से रिश्तों के बारे में जितने तरह की बातें इंटरनेट पर तैरती हैं वे सारी की सारी बातें घोर साम्प्रदायिकता फैलाने वाली एक-दो दर्जन वेबसाईटों तक जाकर खत्म हो जाती हैं, और इससे आगे भी किसी भी भरोसेमंद समाचार स्रोत तक नहीं पहुंच पातीं। सोनिया गांधी के न्यूयॉर्क में इलाज के दौरान सुब्रमण्यम स्वामी ने बहुत किस्म के ऐसे आरोप लगाए कि अमरीकी अदालतों में सोनिया की कांगे्रस पार्टी के दायर किए गए मुकदमे कैसे वापिस लिए जा रहे हैं या इस किस्म की कुछ और बातें। उनके बारे में पूछने पर उनके पास कोई जवाब नहीं था और उनके हिमायतियों के पास गंदी गालियां थीं।
कोई सच का साथ इस हद तक छोड़कर झूठ की बुनियाद पर अपनी दुश्मनी की इमारत को कब तक खड़ा रख सकता है, उससे एक लंबे सार्वजनिक जीवन में उसका क्या फायदा हो सकता है, यह सोचना बड़ा मुश्किल है लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी इसकी एक बहुत बड़ी मिसाल हैं।
आज जिन लोगों को भारत की सूचना तकनीक कानून की जानकारी नहीं है उन्हें यह जान लेना बेहतर होगा कि अखबार में किसी को बेइज्जत करके दसियों बरस तक संपादक बचे रह सकता है, लेकिन आईटी एक्ट इतना कड़ा है और उसमें सजा की संभावना, या आशंका जो भी कहें, इतनी अधिक है कि लोगों का बचना खासा मुश्किल होगा। लोगों को इंटरनेट पर किसी के खिलाफ झूठ लिखते हुए एक धेले का भी खर्च नहीं होता, जबकि अखबार को छापना खासा मुश्किल होता है। ऐसे में लोगों को किसी के चाल-चलन से लेकर किसी के परिवार तक के बारे में सफेद झूठ लिखने में भी पल भर नहीं लगता और फिर उस झूठ में दिलचस्पी रखने वाले लोग उसे एक संक्रामक रोग की तरह फैलाने में जुट जाते हैं।
दिग्विजय सिंह ने पुलिस में जो मामला दर्ज करवाया है वह कुछ लोगों को जब तक सजा दिलवाने में कामयाब हो सके तब तक बहुत से और लोग लापरवाही से किसी के भी बारे में झूठ लिखना जारी रख सकते हैं। लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने का एक मकसद यह भी है कि कम से कम इस कॉलम को पढऩे वाले लोग ऐसी गलती से भी बचें, और किसी सजा के खतरे से भी। सच और झूठ, जायज और नाजायज, तय करने का मामला तो अपने-अपने नजरिए से लोग करते हैं, लेकिन अदालत में जब कोई मामला जाता है तो वहां पर सच सिर्फ वही होता है जो अदालत में सच साबित किया जा सके। जो लोग नेहरू-गांधी परिवार की रगों में दौडऩे वाले खून को लेकर एक डीएनए टेस्ट के सुबूत की तरह साम्प्रदायिक नफरत को रात-दिन लिख रहे हैं और फैला रहे हैं वे लोग तभी तक कानून से बचे हैं जब तक कोई उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं करता और उन्हें अनदेखा करना बेहतर समझता है। अब तक बहुत से अखबार भी अपनी छापी झूठी बातों के साथ भी इसलिए चलते रहते हैं क्योंकि उनके खिलाफ कोई अदालत तक जाने को लोग वक्त, खर्च और इज्जत की और अधिक बर्बादी मानते हैं। लेकिन इंटरनेट के मामले में चूंकि कानून बहुत अधिक कड़ा है इसलिए लोग इसे छोटी बर्बादी मानते हुए झूठे को बर्बाद करना भी तय कर सकते हैं।

इसे यही खत्म किया जाए?

05 सितंबर 2011
आजकल
सुनील कुमार
इन दिनों इंटरनेट पर ट्विटर नाम के एक ऐसे वेबसाईट पर मेरा खासा वक्त गुजरता है जिस पर लोग अपनी बातों को कुल 140 अक्षरों में टाईप करके डाल सकते हैं। इस गिनती में शब्दों के बीच की खाली जगह भी गिनी जाती है और इसलिए बहुत कम में अपनी बात कहनी होती है। लोग इससे निपटने का एक यह रास्ता निकाल लेते हैं कि अंगे्रजी के शब्दों के हिज्जों को वे इस तरह बदल देते हैं कि अक्षर कम हो जाएं लेकिन लोगों को बात फिर भी समझ आ जाए। लोग एक-दूसरे की कही हुई बातों पर अपनी राय भी लिख सकते हैं, किसी की बात को अपने नाम के साथ आगे भी बढ़ा सकते हैं और हमारी तरह वहां से चुनिंदा बातों को निकालकर अखबार में छाप भी सकते हैं।
जब लगातार ट्विटर के इस्तेमाल से कम शब्दों में किसी बात को पढऩा और कम शब्दों में लिखना होता है तो धीरे-धीरे जिंदगी में एक किस्म की किफायत आने लगती है। इंटरनेट पर मुफ्त में हासिल ट्विटर का कुछ लोग यह नुकसान भी देख सकते हैं कि मुफ्त होने से लोग यहां रोज दर्जनों या उससे भी अधिक बातें डाल सकते हैं और पिछली बात को सुधारकर भी डाल सकते हैं इसलिए एक लापरवाही और फिजूलखर्ची इंटरनेट के साथ जुड़ी रहती है।
एक समय जब टेलीग्राफ का इस्तेमाल होता था तब उसे भेजने के लिए हर शब्द के पैसे लगते थे और जब लोगों को अपनी बात कम शब्दों में लिखना नहीं आता था तो तारघर का कर्मचारी कटौती सुझाता था। धीरे-धीरे वे तार खत्म होते चले गए जिनके बारे में एक वक्त ऐसी दहशत होती थी कि तार आने पर उसे खोला बाद में जाता था किसी बीमार रिश्तेदार को याद करके रोना-पीटना पहले शुरू हो जाता था। उस वक्त एक मजेदार लाईन कही जाती थी-चि_ी को तार समझना और बीमार को पार समझना।
इसके बाद कुछ बरसों का फासला रहा और मोबाईल फोन पर एसएमएस आ गया। लेकिन मोबाईल फोन टेलीग्राम की तरह दो लोगों के बीच की ही बात इधर-उधर करता है, उस पर कोई बात ऐसी नहीं रहती जिसे कि इंटरनेट की तरह सभी लोग एक साथ देख सकें। इस मायने में ट्विटर एक बिल्कुल अलग किस्म का तजुर्बा रहा जिसे लोगों ने हाथों-हाथ ले लिया। इससे लोगों को हर पल यह देखने मिल जाता है कि दुनिया में कहां, कौन, किस मुद्दे पर क्या ट्वीट कर रहा है। खैर, इसे पूरी तरह समझने के लिए तो लोगों को इंटरनेट पर ही जाना होगा, लेकिन आज इस बात से चर्चा शुरू करने का मकसद जिंदगी में किफायत पर कुछ चर्चा करना है।
इसकी जरूरत इसलिए लगी कि पिछले कुछ हफ्तों में दिल्ली में चल रही हवा के झोंके पूरे-पूरे दिन या पूरी-पूरी रात झेलने वाले टीवी समाचार दर्शकों को डॉक्टर के पास जाने की नौबत आ रही है जो कि अकड़ी हुई कमर या अकड़ी हुई गर्दन को देखकर यह पूछते हैं कि क्या लगातार कई घंटे टीवी के सामने बैठने के बाद यह तकलीफ हुई है? टीवी हो या अखबार, या जिंदगी का कोई और दायरा, अगर किफायत न बरती गई तो जिंदगी एक ऐसे अंतहीन फैले हुए बरगद की तरह है जिस पर इंसान चींटी की तरह घूमते हैं। मतलब यह कि पूरी जिंदगी लगाने के बाद भी न उतना किया जा सकता, न उतना देखा जा सकता, न उतना सुना जा सकता और उतना लुत्फ उठाया जा सकता जितना कि रोज नया पैदा हो रहा है। जितनी देर में कोई एक अच्छी किताब पढ़ सकता है, उतनी देर में दुनिया में शायद सैकड़ों उतनी ही, या उससे भी, अच्छी किताबें और छप जाती हैं। इसलिए वक्त के इस्तेमाल और अपने तन-मन-धन के इस्तेमाल में अगर लोग सावधान नहीं रहेंगे तो वे अच्छी चीजों के करीब भी नहीं पहुंच पाएंगे और बेमायने चीजों में उलझकर वक्त को बर्बाद कर देंगे।
ट्विटर जैसी किफायत को अगर कोई गंभीरता से लेता है तो वह कुछ उसी तरह का काम है जिस तरह अखबार में खबरों के पन्ने बनाते हुए जब अखबारनवीस सुर्खियां तय करते हैं तो एक-एक शब्द, एक-एक अक्षर और एक-एक मात्रा में कटौती करके कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक मतलब को सामने रखने की कोशिश करते हैं। मेरा ऐसा मानना है कि इस किस्म के पेशे में लगे हुए लोग जिंदगी के दूसरे दायरों में भी इस किफायत का जाने-अनजाने इस्तेमाल तो करते ही हैं। यह किफायत लोगों के मिजाज में आ सकती है अगर वे किफायत की सोच के लिए ईमानदार हों।
यह बात किसी को छोटी लग सकती है लेकिन हमसे ठीक एक पीढ़ी पहले के बुजुर्ग ऐसे होते थे जो घर के कमरों से गुजरते हुए लाईट और पंखा बंद करते चलते थे। जो खाना पकने के साथ ही उसी वक्त खा लेते थे ताकि दुबारा गर्म करने की नौबत न आए। जो बाजार से सामान के साथ आने वाले प्लास्टिक के थैलों को संभालकर रख देते थे कि उनका दुबारा इस्तेमाल हो सके। यह पीढ़ी कई किस्म की किफायतों से चलती थी, और धरती अगर बची हुई है तो ऐसे ही मिजाज के चलते हुए बची हुई है। आज अमरीकी तौर-तरीकों से अगर बाकी दुनिया भी चलने लगे तो इंसान धरती पर रोज इतना कूड़ा पैदा कर देंगे कि जिसे धरती जिंदगी भर में नहीं निपटा पाएगी। यह तो गनीमत है कि धरती के बाकी लोग बददिमाग अमरीकियों की तरह नहीं हैं कि जो चर्बी चढ़ाने के सामान ढेर-ढेर पैकिंग में लाएं और फिर चर्बी घटाने के लिए ढेर-ढेर बिजली और खर्च करें।
जिस अमरीका से एसएमएस या ट्विटर जैसी चीजें निकली हैं वहां के लोगों की असल जिंदगी पर भी अगर इस किफायत का एक साया पड़ा होता तो धरती पर कचरे के बढऩे और धरती के बेजा इस्तेमाल, इन दोनों में एक बड़ी कटौती हुई रहती। इसीलिए मैंने ऊपर लिखा कि किफायत के लिए सोच में अगर लोग ईमानदार हों तो ही भला हो सकता है। किफायत की सोच अगर महज दिखावे की हो तो लोग गांधी की तरह इस्तेमाल हो चुके लिफाफों के पीछे के कागज को लिखने में तो काम ला सकते हैं लेकिन जिंदगी के किसी दूसरे दायरे में वे सामानों की भयानक बर्बादी भी कर सकते हैं।
अगर कोई सच ही किफायत बरतना चाहता है तो यह जिंदगी में एक बड़ा दिलचस्प तजुर्बा भी हो सकता है। कुछ वक्त पहले इसी कॉलम में या कहीं और मैंने यह सुझाया था कि सचिन तेंदुलकर से लेकर अमिताभ बच्चन तक, बहुत से मशहूर लोग अगर इतना ही करने लगें कि अपने जींस और टी-शर्ट जैसे कपड़ों को बिना पे्रस किए पहनने लगें तो कपड़ों पर खर्च होने वाली बिजली में एक बड़ी कटौती हो सकती है। अगर लोग इतना करने लगें कि वे नहानी में फौव्वारे की जगह बाल्टी में पानी लेकर नहाने लगें, तो भी पानी की खासी बचत हो सकती है। लोग कारों की जगह कभी-कभी स्कूटर-मोटरसाइकिल चलाने लगें, इनकी जगह कभी सायकिल चलाने लगें तो उनकी सेहत भी बेहतर रहेगी और यह धरती भी कुछ अधिक वक्त जिंदा रह सकेगी। इसलिए किफायत के फायदे गिने-चुने नहीं हैं। एक इंसान के किफायत दूसरों को राह भी दिखा सकती है और जिस तरह कोई अफवाह फैलती है, संक्रामक बीमारी फैलती है, उसी तरह किफायत भी फैल सकती है।
लेकिन इस बात को करते हुए यह लगता है कि मिनटों की फिजूलखर्ची के लिए जिन टेलीविजन समाचार चैनलों को मैं आए दिन कोसते रहता हूं वैसी फिजूलखर्ची तो अखबारों में पन्नों के हिसाब से होती है। बीस-बीस पेज के अखबार शायद दस पेज में आसानी से निकल सकते हैं, लेकिन शब्द और अर्थ में कटौती करने के लिए जिस हुनर और मेहनत की जरूरत होती है, उसे न जुटाकर अखबार पन्ने बढ़ाते चलते हैं। नतीजा यह होता है कि चार लाईनों की बात को जब चौदह लाईनों में टाईप किया जाता है तो कागज भी अधिक खर्च होता है, स्याही भी अधिक लगती है और ऐसे घूरे में से काम की बात ढूंढते हुए अखबार के पाठक का वक्त भी अधिक खर्च होता है। तो ऐसा नहीं कि किफायत की जरूरत दूसरों को ही है और ऐसी नसीहत छापने वाले मीडिया को नहीं।
बातों को दुहराने में और अधिक फिजूलखर्ची करने के बजाय इसे यही खत्म किया जाए?



 

छोटे से एसएमएस से एक बड़ी बात तक



आजकल
25 जुलाई 2011
सुनील कुमार
अभी कुछ हफ्ते पहले मुझे कश्मीर जाने का मौका मिला तो वहां एक बात को लेकर खासी तकलीफ रही कि एयरटेल के मेरे दो मोबाईल फोन, दोनों पोस्टपेड होने के बाद भी वहां पर ईमेल और एसएमएस से परे रहे। कश्मीर में सुरक्षा के कारणों से प्रीपेड मोबाईल फोन, शायद बाहर से गए हुए, काम नहीं करते। वहां के लोगों से यह भी पता लगा कि उनकी बहुत सी रिश्तेदारी पाकिस्तान में होने के बावजूद वहां से पाकिस्तान फोन नहीं लग सकता। एयरटेल के साथ घंटों माथा फोडऩे पर बार-बार इस कंपनी ने यही कहा कि कश्मीर में एसएमएस पर कानूनी रोक लगी हुई है। लेकिन हमारे साथ में ही रिलायंस और वोडा फोन के जो मोबाईल फोन यहां से गए हुए थे वे वहां एसएमएस से लेकर इंटरनेट तक सभी काम कर रहे थे। जाहिर है कि या तो एयरटेल का कानून का आड़ लेना गलत था या फिर बाकी टेलीफोन कंपनियों कानून तोड़कर यह सहूलियत अपने ग्राहकों को दे रही थीं।
लेकिन आज यहां पर चर्चा टेलीफोन पर नहीं है बल्कि लोगों के बात करने के हक पर है। कश्मीर को लेकर एक रिपोर्ट पाकिस्तान के एक अखबार डॉन में छपी है जिसमें एक ऐसी प्रदर्शनी का जिक्र है जो कि दिल्ली, ऑस्ट्रेलिया के सिडनी, जर्मनी के बर्लिन के अलावा हॉलैंड के एक शहर में भी लगी और इसमें ऐसे एसएमएस थे जिन्हें कश्मीर के लोग भेज नहीं पाए थे और जो एक प्रोजेक्ट के तहत लोगों से लिखवाए गए थे। कश्मीर के लोगों से कहा गया कि अगर वे एसएमएस लिख पाते तो क्या लिखते? इसमें लोगों ने अपनी छोटी-छोटी घरेलू बातें भी लिखीं, कुछ शेयर लिखे और कुछ राजनीतिक बातें भी लिखीं। कश्मीर के जो लोकल कनेक्शन पोस्टपेड हैं उनमें शायद एसएमएस की सुविधा रहती है लेकिन उस राज्य के बाहर के फोन, खासकर प्रीपेड फोन और राज्य के भीतर के भी प्रीपेड फोन एसएमएस पाना और भेजना नहीं कर पाते।
इन दिनों मैं पूरी दुनिया की खोज-खबर कुछ अधिक हद तक रखने के लिए इंटरनेट पर ट्विटर पर रोजाना कई घंटे लगाकर अपने कंधे और हाथ को तबाह करने की हद तक पहुंच चुका हूं। इसमें पाकिस्तान के लोगों के लिखे हुए छोटे-छोटे से संदेश सबसे अधिक राजनीतिक बेचैनी के होते हैं और गिनती में बहुत अधिक भी होते हैं। दुनिया के जिन इलाकों में टकराव अधिक है वहां अगर बोलने की आजादी कुछ कम है तो वहां के लोग जहां राह दिखती है वहां जाकर दीवारों पर लिखने लगते हैं। मुझे याद है कि पिछले बरस दिसंबर के महीने में कई दिन हम लोग ईरान में थे जहां पर इंटरनेट पर फेसबुक जैसी वेबसाईटों पर रोक लगी हुई थी लेकिन हमारे संपर्क का ऐसा कोई नहीं था जिसने उसका तोड़ निकालकर न रखा हो और अपने देश के कानून के खिलाफ वह फेसबुक का इस्तेमाल न कर रहा हो।
हिन्दुस्तान में बोलने और लिखने की आजादी पर रोक का सबसे बुरा और सबसे लंबा दौर एक ही था, इमरजेंसी का। इस दौर में अखबारों से झुकने कहा गया था और इतिहास गवाह है कि उनमें से अधिकतर अखबार लेट गए थे। लोगों को आपातकाल एक अनुशासन पर्व दिखने लगा था और संजय गांधी ने लोगों को इस देश का ऐसा भविष्य दिखने लगा था जैसा चमचमाता हुआ इतिहास भी सोने की इस चिडिय़ा का कभी न रहा हो। लेकिन उस दौर में भी कुछ लोग ऐसे थे जो कि बोलने की आजादी के रास्ते निकाल लेते थे और अखबारों में न सही, पर्चों में लिखकर कसर पूरी करते थे। कुछ अखबारों में उस वक्त लोगों ने प्रूफ की गलतियां जानबूझकर छोड़कर इंदिरा गांधी के नाम को इंदिरा गधी जैसा भी किया था और कुछ पर कार्रवाई हुई थी, कुछ कार्रवाई से बच गए थे।
इसलिए जब किसी देश या प्रदेश में बोलने की आजादी कम होती है तो लोग पर्चों में लिखने लगते हैं, शौचालयों के दरवाजों के भीतर की तरफ लिखने लगते हैं और कहीं-कहीं दीवारों पर भी। कुल मिलाकर होता यह है कि जब समाज में लोगों की भड़ास अधिक हो और उसके निकलने की राह बिल्कुल न हो, तो वह तरह-तरह के धमाकों के साथ निकलती है। ये धमाके बंधी उंगलियों वाली बिरादरी के अपने भी हो सकते हैं और किसी कमजोर बिरादरी के लिए नक्सलियों की तरह बाहर से आकर किए गए धमाके भी हो सकते हैं।
इंटरनेट पर लोगों को अपनी भड़ास निकालने का बहुत बड़ा चौपाल मिल गया है जहां वे अपनी बातों को लिखकर टांग सकते हैं और उस पर दुनिया के लोगों का असर देख भी सकते हैं। इंटरनेट की टेक्नालॉजी में अराजकता की जितनी संभावनाएं हैं उनके चलते लोग यहां पर आजादी का बेजा इस्तेमाल भी कर लेते हैं लेकिन कम से कम इसके बाद लोगों के मन में भड़ास कुछ कम बचती है।
कश्मीर में अगर लोगों के एसएमएस पर रोक लगती है, उनके फेसबुक पर कुछ लिखने के बाद अगर वहां की सरकार उन्हें गिरफ्तार करती है तो ऐसी तमाम चीजें कुछ पत्थर बनकर उन पथरावों में जुड़ जाती हैं जो कि वहां की सड़कों पर कुछ अलगाववादी भी करवाते रहते हैं। जब जुबान से कुछ लफ्ज निकलने पर रोक, जब हाथ की कलम कुछ लिख न सके, जब उंगलियां कोई एसएमएस बनाकर भेज न सकें तो फिर ऐसे खाली हाथ अगर पत्थर उठा लेते हैं तो उसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।
मैं यहां पर लोगों के ऐसे निजी हक से परे की कुछ ऐसी नौबत भी सोचता हूं जिनमें किसी समाज को इसलिए बोलने का मौका नहीं मिलता क्योंकि शहरी और संपन्न तबके की दिलचस्पी वाला मीडिया इन बातों को बाजार की दिलचस्पी का नहीं पाता। ऐसा तबका एक ऐसा आदिवासी तबका भी हो सकता है जो कि ऐसे शहरी समाज के हाथों हांके जाते लोकतंत्र को अपनी जरूरतों का नहीं पाते और चूंकि उसकी खुद की बोली, उसकी जुबान, उसकी बातों की हिन्दुस्तान के शहरी लोकतंत्र में जगह नहीं दिखती इसलिए वह नक्सली बमों को शायद कभी-कभी अपनी बात जोरों से बोलने की इजाजत दे देता है। शायद धर्म, संपन्नता, जाति के आधार पर कमजोर तबकों को अपनी बात रखने का बराबर का मौका नहीं मिलता और इसलिए शायद उनकी बेचैनी तरह-तरह की हरकतों की शक्ल में बाहर निकलती है।
मैं अभी कश्मीर जैसे किसी राज्य की सुरक्षा की जरूरतों को नकार नहीं रहा लेकिन मेरा यह भी मानना है कि लोगों को जब तक बोलने की आजादी नहीं रहेगी, जब तक उनकी बातों को सामने आने का हक नहीं मिलेगा तब तक उनकी बेचैनी कुछ खतरनाक बनी रहेगी। वैसे भी आज के जमाने में जब लोगों की बातों की आवाजाही पल-पल होती है तब अगर ऐसे हक या मौके से किसी तबके को दूर रखा जाएगा तो वह दिखने के लिए कुछ अलग किस्म की दीवारें भी ढूंढ़ेगा और उसकी बातें फिर हो सकता है कि उतनी मासूम न रहें।
हिन्दुस्तान के आज के हालात में मैं यह मानता हूं कि जब सरकारों और नेताओं की बददिमागी इतनी अधिक हो गई है कि जब वे लोगों की लिखी और कही बातों के असर से अपने को ऊपर मानते हैं तो फिर लोग असर का कोई और रास्ता तलाशने पर बेबस हैं। ऐसा एक रास्ता आज देश भर में नेताओं और सरकारों पर से भरोसा उठ जाने की शक्ल में सामने आया है। इसलिए महज बोलने का मौका काफी नहीं हो सकता, उस बोलने का असर होना जरूरी है तभी जाकर लोगों को अपना कहा हुआ, कहा हुआ लगेगा। वरना किसी दीवार के सामने खड़े होकर कुछ कहकर किसी को तसल्ली नहीं हो सकती।
कश्मीर में जिस तरह लोगों से लिखे हुए एसएमएस लेकर इसकी एक प्रदर्शनी लगाई गई, क्या उसी तरह की प्रदर्शनी देश के दूसरे इलाकों के ऐसे लोगों की बातों की नहीं लग सकती जहां कि लोग फोन से दूर हैं, शायद लिखने की ताकत से दूर हैं। क्या सामाजिक कार्यकर्ताओं में से कुछ ऐसी पहल कर सकते हैं कि वे बेजुबान तबकों तक जाकर उनकी बातों को सुनें, उन्हें एसएमएस या ट्विटर की अक्षर सीमा के भीतर बांधें और उन्हें किसी वेबसाईट पर डालकर वहां उसकी प्रदर्शनी लगाएं? आज भारत जैसे लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी का मोटा मतलब मीडिया के मालिकों या उसके ताकतवर लोगों, या उसे खरीदने की ताकत रखने वाले लोगों की बोलने की आजादी रह गया है। सबसे कमजोर तबके के बोलने के लिए हवा और आसमान भी नहीं है, इसलिए कई बार उसकी तरफ से उसकी बात धमाकों के साथ सामने आती है। यह बात लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है और इस लोकतंत्र को ऐसा रास्ता निकालना होगा कि बेइंसाफी को सबसे अधिक झेलने को बेबस, सबसे गरीब, सबसे पिछड़ा, सबसे दबा-कुचला तबका अपनी बात को कहीं सामने रख सके, उसकी बात को कोई सुने और यह लोकतंत्र उसकी बातों पर गौर करे।