यह ठीक है कि कश्मीर पर कई अलग किस्म के दबाव हैं जो कि भारत के किसी दूसरे प्रदेश पर नहीं है, लेकिन उनसे वहां की सरकार की बदहाली को सही ठहराना मुमकिन नहीं। सैलानियों के मेजबान इस सूबे का हाल जैसा धूल, धुएं और लीद से लबालब है वह देखते ही बनता है (या कहें कि देखते नहीं बनता है?)
वहां के पिछली पीढ़ी के मुख्यमंत्री डॉ. फारूख अब्दुल्ला के बारे में इज्जत से बोलने वाला कोई नहीं टकराया। उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को जरूर कुछ लोग बाप से बेहतर मानते हैं कि वह लोगों से मिल-जुल लेता है और लोगों को कुछ समझता है। फिर चाहे करता कुछ नहीं।
मुम्बई और दूसरे देशों में सैलानी की तरह सितारों के साथ घुमने-फिरने, नाचने-गाने की डॉ. फारूख अब्दुल्ला की तस्वीरें सबको याद हैं। एक आदमी ने कहा- जो चीफ मिनिस्टर पन्द्रह-पन्द्रह दिन अपने स्टेट से बाहर घूमता हो वह काम क्या करेगा?
यह एक लोकप्रिय तर्क हो सकता है और तुरंत एक से दूसरे तक पहुंच सकता है, लेकिन हकीकत यह है कि बहुत से नेता, अफसर, ऐसे होते हैं जो हर दिन काम करने के बाद भी अपने सूबे का नुकसान करते हैं उसे खा-पी जाते हैं। अब अगर राजा साल के तीन सौ पैंसठ दिन दूरसंचार मंत्रालय में काम करता होता, कलमाड़ी पूरे वक्त राष्ट्रमंडल खेलों के दफ्तर में काम करता होता, तो क्या देश का कुछ भला होता?
तीसरी पीढ़ी का मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कई बरस से सत्ता में है, पहले दिल्ली की, अब कश्मीर की। लेकिन एक कलेक्टर के स्तर पर भी जो मामूली मरम्मत या सुधार के काम होने चाहिए, उनका भी कुछ पता नहीं है। सैलानियों से लबालब इस राज्य में कोई आतंकी तो आकर रोकता नहीं कि गांवों के नामों की तख्तियां न लगाओ, सड़क किनारे मील के पत्थर न लगाओ, मोड़ पर सावधान करने वाले बोर्ड न लगाओ, फुटपाथों की ऊंचाई कम न करो।
दरअसल आतंक और अलगाववाद से जूझने के बहाने सरकार को नालायक और निकम्मा बने रहने की छूट दे रखी है। एक हफ्ते में वहां के जितने जिले देखने मिले, सब आगे-पीछे के ही बदहाल थे। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में कलेक्टर भी अपने-अपने जिलों में कोई न कोई काम करते दिखते हैं, कश्मीर में इन तमाम जिलों में कदम-कदम पर लगा कि फलां काम को करने की फुरसत अफसरों को क्यों नहीं है? केन्द्र सरकार से पैसे तो कश्मीर की दूसरे राज्यों के मुकाबिले बहुत अधिक मिलते हैं।
बिजली बंद रहने का हाल यह था कि कोई शाम ऐसी नहीं थी कि सड़क से गुजरते दर्जनों अंधेरे गांव-कस्बे पार न करना पड़े। श्रीनगर में एक अस्पताल की जरूरत पडऩे पर मैं हमारे ड्राइवर मकबूल भाई के साथ वहां के बहुत बड़े सरकारी चेस्ट हॉस्पिटल पहुंचा तो बंद बिजली के बीच अस्पताल के बोर्ड-गेट तक नहीं सूझ रहे थे, टीले पर बसी इमारत तो किसी भी तरह से दिख ही नहीं रही थी। बाजार में भी दूकानें अपने-अपने इंतजाम से रौशन थीं।
सरकार की बदहाली की यह तीसरी पीढ़ी नेशनल कांफ्रेंस की है और दूसरी पीढ़ी की पीडीपी की महबूबा मुफ्ती सईद भी बाप के साए में राजनीति में हैं। लेकिन विरासत किसी को काबिल बना देती तो फिर कनिमोझि महीनों से जेल में क्या होती? (या फिर करूणानिधि से यही उसे विरासत में मिली है?)
श्रीनगर की डल लेक के किनारे हजरत बल दरगाह है। उसी के जरा से पहले सोच समझकर शेख अब्दुल्ला की मजार बनाई गई है। उस वक्त अदालतें चौकस नहीं थीं, इसलिए झील पर ही यह काम किया गया। लेकिन हजरत बल दरगाह पर पहुंचने वाले हजारों लोगों में से एक परिंदा भी शेख अब्दुल्ला की मजार पर ठहरा नहीं दिखा। एक तख्ती तक वहां लगी नहीं दिखी और छह बार वहां से गुजरने पर भी सन्नाटा ही दिखा। अपने बाप और दादा की मजार पर एक तख्ती तक कश्मीर के मुख्यमंत्री क्यों नहीं लगवा पाए?
जब आतंक का साया हो, अलगाववादियों के पत्थर चल रहे हों, तो सरकार को सरहद का बहाना देकर कई किस्म का काम नकारने का रास्ता मिल जाता है। कश्मीर में राज्य सरकारों की नाकामयाबी को वे लोग आसानी से समझ सकते हैं जिन्होंने बेहतर सरकारें देखी हैं, बेहतर राज्य देखें हैं। बाकी सैलानी तो जन्नत के नजारे देखते-देखते ही लौट जाते हैं। हो सकता है कि देश के कई राज्य इससे भी बुरे चल रहे हों, और वहां के लोगों को कश्मीर में कुछ न खटकता हो।
उमर अब्दुल के दादा शेख अब्दुल्ला इस राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री रहे। और उन्हीं की पार्टी ने उतने बरस लगातार राज किया जितने बरस नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे, 1947 से 1964 तक। नेहरू के जाने के जरा से पहले ही उनके इस राज्य ने पहला कांग्रेसी मुख्यमंत्री देखा 1964 में। फिर 1965 से यहां के प्राईमिनिस्टर की कुर्सी का नाम बदलकर चीफ मिनिस्टर कर दिया गया। कुल मिलाकर तीन बरस के पीडीपी के राज को छोड़ें तो अब्दुल्ला और नेहरू के कुनबों की पार्टी ही इस पर राज करती रहीं, लेकिन यहां का बुरा हाल कायम रहा। राजधानी से बेहतर तो और कहीं कुछ हो नहीं सकता।
राज्य का धर्मनिरपेक्ष मिजाज आतंकी घटनाओं, अलगाववाद और कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर देने से परे, रोजमर्रा में बना हुआ है। साम्प्रदायिक दंगे सुनाई नहीं पड़ते, शायद इसलिए भी कि यहां पंडितों ने उसी तरह रहना सीख लिया है जिस तरह गुजरात में मुसलमानों ने। लेकिन शायद एक वजह और भी है। यहां से गए नेहरू की बेटी ने एक पारसी से शादी की थी, और उसकी अगली पीढ़ी तो इटली से बहू ले आई। कश्मीर के आज के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की शादी एक फौजी अफसर रामनाथ की बेटी पायल से हुई और उमर अब्दुल्ला की बहन सारा की शादी सचिन पायलट से हुई। अब कश्मीर के आम लोगों का यह अंदाज है कि उमर अब्दुल्ला की बहन की शादी राहुल गांधी से हो सकती है। उमर के पिता फारूख अब्दुल्ला ने एक अंग्रेज-ईसाई नर्स मौली से शादी की थी। इसलिए सत्ता पर काबिज कुनबे का निजी मिजाज दिल्ली के गांधी-नेहरू कुनबे सरीखा ही है।
कश्मीर के कई इलाकों से गुजरते एक गौर करने वाली बात यह भी थी कि यहां के किसी भी सर्वजनिक जगहों पर अखबार बिकते देखने को नहीं मिला जिस तरह हमारे यहां सड़क किनारे, चायठेलों, पानठेलों, बस स्टैंड, होटलों के आसपास अखबारों को बिकते देखा जा सकता है पर यहां ऐसा कोई चलन नहीं दिखा। शायद केवल घरों तक पहुंचता हो। वैसे यहां कई प्रेस काम्प्लेक्स हैं, कई अखबार छपते हैं। हो सकता है इसका कारण यह भी हो कि आतंकी गतिविधियों, हिंसा की खबरों से यहां आने वाले पर्यटकों का हौसला कम होता हो।
(बाकी कल)
वहां के पिछली पीढ़ी के मुख्यमंत्री डॉ. फारूख अब्दुल्ला के बारे में इज्जत से बोलने वाला कोई नहीं टकराया। उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को जरूर कुछ लोग बाप से बेहतर मानते हैं कि वह लोगों से मिल-जुल लेता है और लोगों को कुछ समझता है। फिर चाहे करता कुछ नहीं।
मुम्बई और दूसरे देशों में सैलानी की तरह सितारों के साथ घुमने-फिरने, नाचने-गाने की डॉ. फारूख अब्दुल्ला की तस्वीरें सबको याद हैं। एक आदमी ने कहा- जो चीफ मिनिस्टर पन्द्रह-पन्द्रह दिन अपने स्टेट से बाहर घूमता हो वह काम क्या करेगा?
यह एक लोकप्रिय तर्क हो सकता है और तुरंत एक से दूसरे तक पहुंच सकता है, लेकिन हकीकत यह है कि बहुत से नेता, अफसर, ऐसे होते हैं जो हर दिन काम करने के बाद भी अपने सूबे का नुकसान करते हैं उसे खा-पी जाते हैं। अब अगर राजा साल के तीन सौ पैंसठ दिन दूरसंचार मंत्रालय में काम करता होता, कलमाड़ी पूरे वक्त राष्ट्रमंडल खेलों के दफ्तर में काम करता होता, तो क्या देश का कुछ भला होता?
तीसरी पीढ़ी का मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कई बरस से सत्ता में है, पहले दिल्ली की, अब कश्मीर की। लेकिन एक कलेक्टर के स्तर पर भी जो मामूली मरम्मत या सुधार के काम होने चाहिए, उनका भी कुछ पता नहीं है। सैलानियों से लबालब इस राज्य में कोई आतंकी तो आकर रोकता नहीं कि गांवों के नामों की तख्तियां न लगाओ, सड़क किनारे मील के पत्थर न लगाओ, मोड़ पर सावधान करने वाले बोर्ड न लगाओ, फुटपाथों की ऊंचाई कम न करो।
दरअसल आतंक और अलगाववाद से जूझने के बहाने सरकार को नालायक और निकम्मा बने रहने की छूट दे रखी है। एक हफ्ते में वहां के जितने जिले देखने मिले, सब आगे-पीछे के ही बदहाल थे। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में कलेक्टर भी अपने-अपने जिलों में कोई न कोई काम करते दिखते हैं, कश्मीर में इन तमाम जिलों में कदम-कदम पर लगा कि फलां काम को करने की फुरसत अफसरों को क्यों नहीं है? केन्द्र सरकार से पैसे तो कश्मीर की दूसरे राज्यों के मुकाबिले बहुत अधिक मिलते हैं।
बिजली बंद रहने का हाल यह था कि कोई शाम ऐसी नहीं थी कि सड़क से गुजरते दर्जनों अंधेरे गांव-कस्बे पार न करना पड़े। श्रीनगर में एक अस्पताल की जरूरत पडऩे पर मैं हमारे ड्राइवर मकबूल भाई के साथ वहां के बहुत बड़े सरकारी चेस्ट हॉस्पिटल पहुंचा तो बंद बिजली के बीच अस्पताल के बोर्ड-गेट तक नहीं सूझ रहे थे, टीले पर बसी इमारत तो किसी भी तरह से दिख ही नहीं रही थी। बाजार में भी दूकानें अपने-अपने इंतजाम से रौशन थीं।
सरकार की बदहाली की यह तीसरी पीढ़ी नेशनल कांफ्रेंस की है और दूसरी पीढ़ी की पीडीपी की महबूबा मुफ्ती सईद भी बाप के साए में राजनीति में हैं। लेकिन विरासत किसी को काबिल बना देती तो फिर कनिमोझि महीनों से जेल में क्या होती? (या फिर करूणानिधि से यही उसे विरासत में मिली है?)
श्रीनगर की डल लेक के किनारे हजरत बल दरगाह है। उसी के जरा से पहले सोच समझकर शेख अब्दुल्ला की मजार बनाई गई है। उस वक्त अदालतें चौकस नहीं थीं, इसलिए झील पर ही यह काम किया गया। लेकिन हजरत बल दरगाह पर पहुंचने वाले हजारों लोगों में से एक परिंदा भी शेख अब्दुल्ला की मजार पर ठहरा नहीं दिखा। एक तख्ती तक वहां लगी नहीं दिखी और छह बार वहां से गुजरने पर भी सन्नाटा ही दिखा। अपने बाप और दादा की मजार पर एक तख्ती तक कश्मीर के मुख्यमंत्री क्यों नहीं लगवा पाए?
जब आतंक का साया हो, अलगाववादियों के पत्थर चल रहे हों, तो सरकार को सरहद का बहाना देकर कई किस्म का काम नकारने का रास्ता मिल जाता है। कश्मीर में राज्य सरकारों की नाकामयाबी को वे लोग आसानी से समझ सकते हैं जिन्होंने बेहतर सरकारें देखी हैं, बेहतर राज्य देखें हैं। बाकी सैलानी तो जन्नत के नजारे देखते-देखते ही लौट जाते हैं। हो सकता है कि देश के कई राज्य इससे भी बुरे चल रहे हों, और वहां के लोगों को कश्मीर में कुछ न खटकता हो।
उमर अब्दुल के दादा शेख अब्दुल्ला इस राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री रहे। और उन्हीं की पार्टी ने उतने बरस लगातार राज किया जितने बरस नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे, 1947 से 1964 तक। नेहरू के जाने के जरा से पहले ही उनके इस राज्य ने पहला कांग्रेसी मुख्यमंत्री देखा 1964 में। फिर 1965 से यहां के प्राईमिनिस्टर की कुर्सी का नाम बदलकर चीफ मिनिस्टर कर दिया गया। कुल मिलाकर तीन बरस के पीडीपी के राज को छोड़ें तो अब्दुल्ला और नेहरू के कुनबों की पार्टी ही इस पर राज करती रहीं, लेकिन यहां का बुरा हाल कायम रहा। राजधानी से बेहतर तो और कहीं कुछ हो नहीं सकता।
राज्य का धर्मनिरपेक्ष मिजाज आतंकी घटनाओं, अलगाववाद और कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर देने से परे, रोजमर्रा में बना हुआ है। साम्प्रदायिक दंगे सुनाई नहीं पड़ते, शायद इसलिए भी कि यहां पंडितों ने उसी तरह रहना सीख लिया है जिस तरह गुजरात में मुसलमानों ने। लेकिन शायद एक वजह और भी है। यहां से गए नेहरू की बेटी ने एक पारसी से शादी की थी, और उसकी अगली पीढ़ी तो इटली से बहू ले आई। कश्मीर के आज के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की शादी एक फौजी अफसर रामनाथ की बेटी पायल से हुई और उमर अब्दुल्ला की बहन सारा की शादी सचिन पायलट से हुई। अब कश्मीर के आम लोगों का यह अंदाज है कि उमर अब्दुल्ला की बहन की शादी राहुल गांधी से हो सकती है। उमर के पिता फारूख अब्दुल्ला ने एक अंग्रेज-ईसाई नर्स मौली से शादी की थी। इसलिए सत्ता पर काबिज कुनबे का निजी मिजाज दिल्ली के गांधी-नेहरू कुनबे सरीखा ही है।
कश्मीर के कई इलाकों से गुजरते एक गौर करने वाली बात यह भी थी कि यहां के किसी भी सर्वजनिक जगहों पर अखबार बिकते देखने को नहीं मिला जिस तरह हमारे यहां सड़क किनारे, चायठेलों, पानठेलों, बस स्टैंड, होटलों के आसपास अखबारों को बिकते देखा जा सकता है पर यहां ऐसा कोई चलन नहीं दिखा। शायद केवल घरों तक पहुंचता हो। वैसे यहां कई प्रेस काम्प्लेक्स हैं, कई अखबार छपते हैं। हो सकता है इसका कारण यह भी हो कि आतंकी गतिविधियों, हिंसा की खबरों से यहां आने वाले पर्यटकों का हौसला कम होता हो।
(बाकी कल)