कहवे के साथ कश्मीर-9 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कहवे के साथ कश्मीर-9 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

एक शिकारे वाले ने बताया सियासत का नया मतलब...


24 जून 2011
सुनील कुमार
आज शायद इस सफरनामे की आखिरी किस्त होगी क्योंकि रोज के काम की भाग-दौड़ के बीच हर सुबह ऐसा लिखना भारी भी पडऩे लगता है और अखबार की अपनी तंग सीमाएं भी होती हैं। लेकिन यह लिखते हुए इन दिनों कश्मीर की खबरों पर नजरें कुछ अधिक जाती हैं और पहली बार के देखे कश्मीर से मेरी जानकारी और सोच पर पड़े फर्क से लगता है कि राज्य या केंद्र सरकार को अधिक से अधिक अखबारनवीसों को अधिक से अधिक प्रदेश देखने को भेजना चाहिए जिससे कि विविधताओं से भरा हुआ यह देश सबको बेहतर समझ आए, और ऐसा अनुभव देश की एकता बढ़ाने में बहुत कारगर साबित हो सकता है।
कश्मीर में अपने घर 68 बरस बाद लौटने वाले कबीर शाह और उनके परिवार के मन में भारत के वीजा नियमों को लेकर जो नाराजगी है वह कश्मीर के बहुत से लोगों में है। हो सकता है कि यह पाकिस्तान में भी उन लोगों के मन में हो जिनकी जड़ें किसी वक्त हिन्दुस्तान में थीं या यहां बाद में उनके किसी तरह के रिश्ते बने। हैदराबाद की सानिया मिर्जा की पाकिस्तान में शादी तो बहुत खबरों में आई लेकिन कश्मीर जो कि भारत और पाकिस्तान के बीच सरहद से बंटा हुआ है, वह पौन सदी पहले तक तो एक ही था और रोटी-बेटी के रिश्ते वहां आम थे। ऐसे में लोगों को अगर सुख और दुख के मौके को एक-दूसरे तक पहुंचने के लिए दस-बीस बरस का इंतजार वीजा के लिए करना पड़ता है तो इससे दोनों तरफ की हुकूमतों से लोगों की नाराजगी बढ़ती है।
डल झील पर हमें शिकारे में सैर कराते हुए आशिक भाई की जुबान और उनके हाथों के चप्पू एक सी रफ्तार से चलते थे। पूरे वक्त एक रनिंग कमेंटरी तीन घंटे तक डल झील के बारे में तो बताती ही रही, कश्मीर के बारे में और भी बहुत सी बातें वे कहते रहे। उन्होंने सियासत शब्द का एक नया ही मतलब सामने रखा। उन्होंने कहा कि कश्मीर में यह शियासत है, शिया का मतलब काला पहनने वाले और सत का मतलब सत्य। इस तरह सियासत से शियासत होते हुए उसका मतलब एक काले सच की तरह का हो गया है। अब उनकी यह बात जम्मू-कश्मीर की सियासत से नाराज लोगों के मन की बात भी हो सकती है और सियासत के सारे खेल को एक काला सच साबित करने वाली भी हो सकती है।
लेकिन जिन लोगों से हमारा वास्ता पड़ा उसमें पाकिस्तानपरस्त लोग नहीं थे। दर्जनों लोगों से मुलाकात और लंबी बात के बाद भी लोग बस इतने ही बुरे थे कि वे बुरी सरकारों के लिए हिकारत पाले बैठे थे। इससे अधिक नफरत या हिंसा उनके मन में नहीं थी। वे पाकिस्तान के साथ जाने का सोचने वाले तो बिल्कुल ही नहीं थे और उनका मानना था कि सरकारी बंदूकों की हिंसा अगर कश्मीर में खत्म हो जाएगी, अगर केंद्र सरकार से राज्य सरकार तक और बैंकों से लेकर बीमा दफ्तरों तक रिश्वत का चलन खत्म हो जाएगा, अगर लोगों को रोजगार मिलने लगेगा तो पत्थर चलने भी बंद हो जाएंगे। वहां के कामगार और कारीगर सैलानियों से फायदे जानते हैं और यह भी जानते हैं कि मिलिटेंसी बढऩे से लोगों का आना खत्म हो जाता है। जब तक सैलानी हैं तब तक तो वहां के लोग बर्फ पर स्लेज गाड़ी पर उन्हें बिठाकर खुद खींचकर भी रोजी कमा लेते हैं। (हालांकि हमें ऐसे घूमने की नौबत नहीं आई लेकिन मैं इस नजारे को कोलकाता के उन रिक्शों से भी भयानक पा रहा था जिनमें एक इंसान दूसरे इंसान को बर्फ पर इस तरह खींचकर ले जाए। और फिर मेरे भारी-भरकम वजन को लेकर तो मुझे ढोने वाले घोड़े पर तरस आ रहा था और ऐसे में स्लेज गाड़ी पर बिठाकर कोई दूसरा इंसान बर्फ पर पैदल चलता हुआ खींचे, यह सोचना भी भयानक लग रहा था।) इसलिए मेहनतकश लोग आतंक के साथ तो बिल्कुल नहीं हैं और कश्मीर के जिन लोगों की मुलाकात पाकिस्तान से आए हुए लोगों से होती है वे लोग भी पाकिस्तान की तरफ रूख करने की सोच नहीं सकते।
इन दिनों जितना बुरा हाल पाकिस्तान का हो रखा है और वहां से आने वाले लोग वहां की बदहाली जिस तरह बयां करते हैं उसके चलते कश्मीर के उन लोगों का नशा भी हिरन हो गया है जो लोग सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कारणों से पाकिस्तान से लगाव महसूस करते थे या हैं। लेकिन कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि अगर कश्मीर को स्वयत्तता देने जैसे जटिल मामले पर जनमतसंग्रह जैसा कोई नासमझी का काम किया जाएगा तो हो सकता है कि एक बड़ी आबादी आजादी की वकालत करने लगे। वहां के एक पत्रकार ने कहा कि जनमतसंग्रह में हर इंसान का एक वोट होगा और उनमें बहुत कम ऐसे हैं जो ऐसी आजादी के साथ जुड़ी हुई दिक्कतों के बारे में जानते हों या समझते हों। जो उसने कहा उससे मुझे कुछ महीने पहले फिलीस्तीन की राह पर पूरे रास्ते जोर-शोर से नारे लगाने वाले एक पाकिस्तानी दोस्त की याद आ रही थी जो कि ईरान की संसद के भीतर भी जोरों से नारे लगा रहा था-हम क्या चाहते, आजादी।
यही नारा कश्मीर के कुछ लोगों ने नारे की शक्ल में नहीं, बातचीत की शक्ल में रखा और इस एक अखबारनवीस साथी ने कहा कि यह आजादी कितनी महंगी पड़ेगी यह भारत से अलग होने के बाद ही इस कश्मीर को समझ आएगी। एक मुल्क कितनी दिक्कतों से चलता है इसका अहसास जनमतसंग्रह में हिस्सा लेने वाले लोगों को नहीं होता।
कश्मीर से लौट आने के बाद यहां पर जब अन्ना हजारे और उनकी टोली लोकपाल विधेयक के दायरे में प्रधानमंत्री को लाने या न लाने के बारे में एक जनमतसंग्रह की वकालत कर रही है, मांग कर रही है तो मुझे कश्मीर के इस पत्रकार साथी की बात याद पड़ रही है कि किसी जटिल मुद्दे पर जनमतसंग्रह के क्या खतरे हो सकते हैं? और सैद्धांतिक रूप से मैं देश के हर व्यक्ति को एक ही कानून के दायरे में रखने का हिमायती होने के बाद भी ऐसे मुद्दों पर किसी जनमतसंग्रह के खिलाफ हूं। मत उन्हीं मामलों पर लिया जाना चाहिए जिन पर लोगों की समझ हो। कल के दिन दूसरे किस्म की संवैधानिक जटिलताओं को लेकर भी लोकतंत्र के नाम पर एक जनमतसंग्रह की बात कोई और कर सकता है और कोई पारदर्शिता के नाम पर पारदर्शी तौलियों की भी वकालत कर सकता है। जब आज दिल्ली में बैठे बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोग जाने किस नीयत के चलते ऐसे मुद्दे पर जनमतसंग्रह जैसी नासमझी की बात सोच-समझकर करते हैं तो फिर कश्मीर में खतरों के तले जीते लोग अगर ऐसी भावनात्मक बात सोचते हैं तो उसमें कोई हैरानी नहीं।
और अगर इतिहास को कोई पूरी तरह अनदेखा करना नहीं चाहता है तो उसे यह भी याद रखना होगा कि 1947 में जब जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने भारत के अंगे्रज गर्वनर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन के साथ कश्मीर के भारत में विलय की बात की थी तो उसी समय यह तय हुआ था कि कश्मीर की जनता कहां जाना चाहेगी यह तय करने के लिए एक जनमतसंग्रह कराया जाएगा। यह दस्तावेज काफी लंबा-चौड़ा है जिसके बारे में यहां अधिक लिखना मुनासिब नहीं है लेकिन यह ऐतिहासिक हकीकत है कि 1950 के बाद से भारत की सरकार ने अपने-आपको इस वायदे से पूरी तरह से अलग कर दिया और पाकिस्तान इस तरफ के दो तिहाई कश्मीर को भारत के कब्जे का कश्मीर कहता है और भारत कश्मीर के उस तरफ के एक तिहाई हिस्से को पीओके कहता है, पाक ऑक्यूपाइड कश्मीर।
ऐसे ऐतिहासिक जटिल मामले की छाया कश्मीर की आज की जिंदगी और सोच पर कम नहीं है।
श्रीनगर के लोग याद करते हैं कि किस तरह कोई 600 बरस पहले का हिंदू और बौद्ध राजाओं का राज इस इलाके में था। बाद में मुगलों के आने पर यहां मुसलमान राजा हुए। इस तरह न सिर्फ यह शहर बल्कि पूरा का पूरा जम्मू-कश्मीर इन तीनों धर्मों के लोगों की मिली-जुली और अलग-अलग बसाहटों वाला है और इन तीनों के लोगों ने आपस में रहना सीखा हुआ है। जिस वक्त हम हजरत बल दरगाह पहुंचे तो वहां जाहिर तौर पर मुसलमान अधिक थे लेकिन वहां इत्मीनान से फैले-पसरे सिख परिवार भी दिख रहे थे। उस दरगाह के भीतर पहुंचकर जो आराम से बैठे थे, वे वहां सिर्फ हड़बडिय़ा सैलानी की तरह नहीं आए थे और दरगाह के दरख्तों के साए में वे परिवार सहित देर तक थे। कुछ ऐसा ही हाल सोनमर्ग के रास्ते पर पड़ी एक मजार या दरगाह के बाहर देखने मिला जहां पर किसी हिंदू आस्थावान ने एक हरे कपड़े पर पीर बाबा की जय का नारा लिखकर अपने नाम सहित वहां टांग रखा था। हमने इस सफरनामे के शुरू में ही एक तस्वीर छापी थी जिसमें भारतीय फौज के एक हिंदू लांसनायक की याद में बनाई गई समाधि एकदम मुस्लिम समाधि की तरह की थी।
डल झील पर बसी हुई बस्ती को देखने के लिए जब हम वहां सड़क पर गाड़ी छोड़ पैदल बस्ती में घुसे तो मुहाने पर ही ईरान के धर्म गुरुओं की तस्वीरों वाला बोर्ड लगा था। ईरान के अपने ताजा अनुभव का सुबूत देते हुए मैंने अपने वहां के दोस्तों को कहा कि यह शिया बस्ती दिखती है। वहां पर आबादी का बड़ा हिस्सा तो सुन्नियों का है लेकिन शिया भी वहां कम संख्या हैं तो सही। लेकिन मैंने जानना चाहा कि क्या इन दोनों बिरादरियों के बीच लखनऊ की तरह के शिया-सुन्नी दंगे होते हैं तो उन्होंने कहा कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता, कभी नहीं हुआ।
कबीर शाह से मिलने के लिए मैं जब वहां एक बहुत भीतर के गांव गया तो वहां भी लोगों से यह पूछता रहा गांव में शिया भी हैं क्या और क्या उनकी मस्जिद, उनके कब्रिस्तान अलग हैं? तो पता लगा कि ये जगहें तो अलग-अलग हैं ही, और इस वजह से भी छोटे गांव में एक-दो शिया परिवार रहने से बचते हैं क्योंकि उन्हें सामाजिक रस्मों में दिक्कत आती है। इन दोनों बिरादरियों के बीच आमतौर पर वहां शादियां भी नहीं होतीं लेकिन बाहर के शहरों में जाने के बाद तो कश्मीरी हिंदू और मुस्लिम भी शादियां करते दिख जाते हैं। यह बातचीत वहां के शासक अब्दुल्ला परिवार के बारे में मैं इसी जगह दो-तीन दिन पहले लिख भी चुका हूं कि किस तरह फारुख अब्दुल्ला ने एक अंगे्रज ईसाई से शादी की, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला ने एक हिंदू लड़की से शादी की, और उमर अब्दुल्ला की बहन ने एक हिंदू गूजर सचिन पायलट से शादी की। लेकिन मुस्लिम समाज में ऐसी बातें आम नहीं हैं। (बाकी कल)