घर के भीतर बहाए जाते लहू को थामने परामर्शदाता चाहिए

संपादकीय
28 जनवरी 2017


पिछले दो दिनों में छत्तीसगढ़ के रायपुर के अखबार कुछ ऐसे हैं कि उन्हें निचोड़ें तो लहू टपकने लगेगा। और यह लहू भी किसी नक्सल या पेशेवर मुजरिमों के जुर्म से बहने वाला लहू नहीं है, यह परिवार के भीतर निजी जिंदगी में अपनों पर की गई हिंसा का ऐसा लहू है जो कि दिल दहला देता है। अभी दो दिन पहले ही किसी बड़ी अदालत ने यह कहा या लिखा था कि जब तक किसी महिला की दिमागी हालत सामान्य रहती है, वह कभी अपने बच्चों को नहीं मार सकतीं। लेकिन छत्तीसगढ़ में दो दिनों में अपनों पर ही ऐसे जुर्म हुए कि उन्हें ऐसी अदालती परिभाषा से नहीं समझा जा सकता।
एक महिला ने अपनी इकलौती संतान को अपने ही घर की छत पर पानी की टंकी में डुबाकर मार डाला, क्योंकि वह महिला एक स्कूली दोस्त से शादी के बाद भी प्रेम करती थी, और प्रेमी उसे संतान सहित मंजूर करने को तैयार नहीं था। प्रेमी के पास जाने के लिए उसने इकलौती बच्ची को डुबाकर मार डाला। कल ही एक मजदूर ने अपने दो बच्चों को इसलिए फावड़े से मार दिया क्योंकि पत्नी ने साथ में प्रदेश के बाहर के ईंट भ_े पर मजदूरी के लिए जाने से मना कर दिया था क्योंकि वहां पति नशे में उसे पीटता था, गुस्सा उतरा बच्चों पर और उन्हें बाप गणतंत्र दिवस पर स्कूल ले जाने के नाम पर लेकर निकला और सोच-समझकर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। यह किसी क्षणिक आवेश का नतीजा नहीं था, बल्कि ठंडे दिल-दिमाग से सोचकर ऐसा किया गया। एक दूसरे मामले में पति की मौत से दुखी महिला ने छोटे बेटे के नाम चि_ी छोड़ी कि वह पति के बिना जी नहीं पा रही है, और वह छोटी बच्ची को लेकर फांसी पर झूल गई। इस किस्म की कुछ और घटनाएं भी हैं, जो कि एक साथ सामने आने की वजह से सोचने पर, और यहां लिखने पर मजबूर करती हैं।
छत्तीसगढ़ आमतौर पर कई किस्म के जुर्म से बचा हुआ प्रदेश माना जाता है। यहां पर पंजाब की तरह नशे की लत नहीं है जो कि वहां जानलेवा साबित हो रही है। इस राज्य में केरल की तरह राजनीतिक हिंसा भी नहीं होती कि आरएसएस और सीपीएम के लोग एक-दूसरे का कत्ल करते रहें। यह राज्य मजदूर हिंसा से भी आजाद है, और छत्तीसगढ़ के मजदूर जगत में अगर अकेली हत्या हुई है, तो वह मालिकों ने  एक मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी की करवाई थी, उत्तर-पूर्व या हरियाणा की तरह यहां मजदूर मालिकों या मैनेजरों की हत्या नहीं करते। लेकिन निजी हिंसा और निजी जुल्म यहां पर कम नहीं हैं। इसकी वजह शायद यह है कि इंसानी मिजाज मोटे तौर पर अधिकतर जगहों पर एक सा रहता है, और पति-पत्नी के बीच तनाव में यह राज्य भी पीछे नहीं है। शादी से परे के अवैध कहे जाने वाले संबंध यहां बड़ी आम बात हैं, किसी भी दूसरे राज्य की तरह, और बहुत से मामलों में ऐसे संबंध कत्ल की अकेली वजह रहते हैं। समाज में वैसे तो शादीशुदा जिंदगी के भीतर वफादारी की उम्मीदें अव्यवहारिक होती हैं, और उनका टूटना बहुत से मामलों में सामने आते रहता है, ऐसे में कुछ शादियां टूट जाती हैं, और लोग अपनी-अपनी राह लग लेते हैं, लेकिन कुछ मामलों में लोगों को इतनी नाराजगी होती है, उनका खून इतना खौलता है कि मामला कत्ल तक पहुंच जाता है। ऐसे अधिकतर मामलों में सामान्य समझबूझ के मुजरिम भी यह अंदाज लगा सकते हैं कि कुछ ही दिनों में पुलिस उन तक जरूर पहुंच जाएगी, लेकिन फिर भी लोग ऐसा जुर्म करते हैं।
इस मामले पर लिखने की वजह यह है कि समाज या सरकार, या दोनों मिलकर ऐसे परामर्श केन्द्र उपलब्ध कराएं जहां पर प्रेम संबंधों या वैवाहिक संबंधों के तनाव सुलझाए जा सकें। आज जुर्म के बाद तो पुलिस, अदालत, और जेल का सिलसिला ही रह जाता है, और कैद काटकर निकले हुए लोगों के लिए शायद ही कोई भविष्य बचता है। ऐसे में हत्या या आत्महत्या जैसे तनाव से बचाने के लिए लोगों को सहज-सुलभ परामर्श बहुत कारगर हो सकता है। ऐसे परामर्शदाता जरूरी नहीं है कि मनोचिकित्सक ही हों, क्योंकि उनकी संख्या ही मानसिक रोगियों की जरूरत पूरी नहीं कर पाती है। इनके लिए ऐसे मनोविश्लेषक और परामर्शदाता जरूरी हैं जो कि पारिवारिक संबंधों के भीतर के तनाव को कम करने के रास्ते सुझा सकें। आज जगह-जगह से इम्तिहान की नाकामयाबी के बाद की खुदकुशी सुनाई पड़ती है। हर कुछ हफ्तों में ऐसी खबर भी आ जाती है कि पसंदीदा मोबाइल फोन न मिल पाने पर घर के भीतर नाराज बच्चे ने खुदकुशी कर ली। प्रेम-प्रसंग में तो प्रेमी-जोड़े जगह-जगह पेड़ों पर टंगे दिख जाते हैं। वैध-अवैध प्रेम-संबंध और उसमें कत्ल भी बड़ी संख्या में हो रहे हैं। यह नौबत सरकार को खतरनाक नहीं भी लग सकती है, लेकिन सामाजिक तनाव को आज घटाना शुरू करेंगे, तो उसका असर दिखने में बरसों लग जाएंगे। इसलिए राज्य सरकार को राज्य के विश्वविद्यालयों में परामर्श के कोर्स शुरू करने चाहिए, और मनोविज्ञान, सामाजिक विज्ञान के साथ परामर्श की तकनीक पढ़ाकर, सिखाकर समाज को ऐसे लोगों की सेवाएं उपलब्ध करानी चाहिए। 

सेक्स हमले के आरोप वाले राज्यपाल की बर्खास्तगी हो, और जांच के बाद सजा भी..

संपादकीय
27 जनवरी 2017


मेघालय के राजभवन से निकलकर जब वी. षणमुगनाथन कल गणतंत्र दिवस पर मेघालय और अरुणाचल दो राज्यों के राज्यपाल के नाते झंडा फहराने जा रहे थे, तब मेघालय के अखबार उनके सेक्स स्कैंडल की खबरों से भरे हुए थे। उन पर एक महिला ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई है कि राजभवन में नौकरी के लिए इंटरव्यू लेते हुए राज्यपाल ने खुद उसे देर शाम अकेले में बुलाया, बाकी कर्मचारियों को छुट्टी दे दी, और बंद कमरे में उस पर झपट पड़े। इसके साथ ही राजभवन के करीब सौ कर्मचारियों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पांच पेज की एक लंबी शिकायत भेजी है जिसमें उन्होंने राज्यपाल के सनसनीखेज तौर-तरीकों को खुलासे से गिनाया है कि किस तरह वे रात में केवल महिला कर्मचारियों की ड्यूटी लगाते हैं, और किस तरह राजभवन में उनका बेडरूम उनकी चुनिंदा महिलाओं के किसी भी समय आने-जाने की जगह हो गई है। इन कर्मचारियों ने एकमुश्त लिखकर यह मांग की है कि राजभवन की गरिमा को बचाने के लिए तुरंत ही राज्यपाल को बर्खास्त किया जाए। इसके चलते राज्यपाल ने अपना इस्तीफा केन्द्र को भेज दिया है।
राजभवन में अपने किस्म का यह एक अनोखा सेक्स स्कैंडल है जिसमें राज्यपाल खुद महिला कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए बंद कमरे में उनके अलग-अलग इंटरव्यू लेते हैं, अपने निवास से पुरूष कर्मचारियों को हटाकर दफ्तर तक सीमित कर देते हैं, और पूरी रात अपने निवास पर केवल महिला कर्मचारियों की ड्यूटी लगाते हैं और किसी महिला को पुलिस थाने पहुंंचकर राज्यपाल पर सेक्स-हमले के रिपोर्ट लिखाना पड़ता है। इसके पहले भी आन्ध्र के राजभवन से नारायण दत्त तिवारी के सेक्स-टेप फैलने का मामला सामने आया था, और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। लेकिन उन पर किसी ने देह शोषण का आरोप नहीं लगाया था, और उनके साथ सेक्स-टेप पर जो महिलाएं थीं, वे शायद उनकी परिचित थीं, या पेशेवर वेश्याएं थीं। देह शोषण का किसी राज्यपाल के खिलाफ यह पहला ही मामला हमें याद पड़ता है।
बड़े-बड़े संवैधानिक ओहदों पर पहुंचने वाले लोग जिनके पास यह सहूलियत रहती है कि वे किसी दूसरे देश जाकर सेक्स की अपनी जरूरतों को पूरी कर सकें, जिन्हें कि सरकार जनता के पैसों से इतनी तनख्वाह भी देती है कि वे आपसी सहमति से खरीदे जा सकने वाले सेक्स को खरीद लें, वे लोग भी जब बेरोजगारों का, या बहुत ही नीचे के ओहदों पर काम करने वाले बेबस कर्मचारियों का शोषण करने लगते हैं, और इतने खुले तरीके से राजभवन को बदनामी दिलाते हैं, तो इससे अधिक शर्मनाक और क्या बात हो सकती है? भारत के इतिहास में यह भी याद नहीं पड़ता कि किसी राजभवन के कर्मचारियों ने राज्यपाल पर इस तरह के सेक्स-आरोप लगाकर केन्द्र सरकार को शिकायत भेजी हो, और राजभवन की इज्जत के लिए उसकी बर्खास्तगी मांगी हो। केन्द्र सरकार को न सिर्फ तुरंत इस राज्यपाल को हटाना चाहिए, बल्कि राज्य की पुलिस को इस महिला की शिकायत पर कार्रवाई भी करनी चाहिए। जब मध्यप्रदेश के व्यापमं घोटाले में वहां के तत्कालीन राज्यपाल का नाम आया था, तब भी हमने उस राज्यपाल की बर्खास्तगी और गिरफ्तारी की मांग की थी। ऐसा न होने पर लोकतंत्र तो वैसे भी जनता के बीच मखौल बना हुआ है, और राजभवनों को भ्रष्टाचार और सेक्स का ऐसा अड्डा बनाने पर लोग राजनीति से, और संवैधानिक-लोकतांत्रिक संस्थाओं से और अधिक नफरत करने लगेंगे। कोई एक राज्यपाल सेक्स-हमले के जुर्म में जेल चले जाए, तो हो सकता है कि उससे देश की और सैकड़ों-हजारों महिलाएं ऐसे हमलों से बच जाएं। 

ऐसे संवेदनाशून्य लोकतंत्र में संविधान पर जलसा बेमतलब

संपादकीय
25 जनवरी 2017


बिहार के सत्तारूढ़ जदयू के मुखिया शरद यादव ने एक बार फिर महिलाओं के बारे में एक ओछी बात कहकर यह साबित किया है कि संसद के भीतर वे और बहुत से मुद्दों पर देश में सबसे अधिक समझदारी की बात करने वाले नेता तो हैं, लेकिन वे महिलाओं के बारे में बात करते हुए अक्सर बहक जाते हैं, और शायद कोई मनोविश्लेषक यह बता सके कि क्या इसके पीछे उनकी कोई कुंठा काम करती है जो उनसे ऐसी बकवास करवाती है। उन्होंने वीडियो कैमरों के सामने मंच और माईक पर यह कहा कि वोट की इज्जत बेटी की इज्जत से बढ़कर है। अब इसके बाद जब हंगामा मचा तो कुछ घंटों के भीतर ही उन्होंने इस पर जवाब तो दिया लेकिन वे अपनी बात पर अड़े रहे और कहा कि वोट और बेटी के लिए मोहब्बत एक सी होनी चाहिए। दूसरी तरफ उत्तरप्रदेश में भाजपा के एक और बड़बोले और बकवासी नेता विनय कटियार ने चुनाव प्रचार में प्रियंका गांधी के बारे में पूछने पर यह कहा कि भाजपा के पास प्रियंका गांधी से कहीं ज्यादा सुंदर प्रचारक हैं। यह कहने का बड़ा साफ मतलब यह है कि प्रियंका गांधी का महत्व उनकी सुंदरता के अलावा कुछ नहीं है, और ऐसा कहकर विनय कटियार ने एक कट्टरतावादी-पुरूषवादी सोच की एक घटिया मिसाल ही सामने रखी हैं।
आमतौर पर तो शरद यादव देश की कई घोर दकियानूसी, साम्प्रदायिक, और महिला विरोधी पार्टियों के मुकाबले कुछ बेहतर राजनीति करते दिखते हैं। उनकी पार्टी ने अभी बिहार में शराबबंदी जैसा एक सकारात्मक फैसला लागू किया है। लेकिन दूसरी तरफ महिलाओं को कभी वे परकटी कह देते हैं, और कभी कोई और ओछी बात कह बैठते हैं। इस एक बयान पर आज हम यहां न लिखते, अगर गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर आज टीवी की खबरों में और अखबारों में इसी तरह की कुछ और खबरें छाई हुई न होतीं। एक दूसरी खबर बस्तर की है जहां पर पुलिस के सबसे बड़े अफसर पर यह तोहमत लगी है कि वहां काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए जब उन्हें एक दूसरी सामाजिक कार्यकर्ता ने एसएमएस भेजा, तो उसके जवाब में उन्होंने संक्षिप्त शब्दों में एक गाली लिख भेजी। यह वही बस्तर है जहां पुलिस और सुरक्षाबलों पर महिलाओं से बड़ी संख्या में बलात्कार के आरोप राष्ट्रीय महिला आयोग ने सही पाए हैं, और उनकी जांच शुरू की है। इसके पहले अदालतों ने भी यह पाया है कि बस्तर मेें तमाम आदिवासियों, और खासकर महिलाओं के साथ सुरक्षा बल की कई तरह की हिंसा चल रही है। इसी बस्तर में कल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह संविधान लागू होने की सालगिरह के गणतंत्र दिवस का झंडा फहराएंगे, और यही पुलिस उनको सलामी भी देगी। अब सवाल यह उठता है कि बीते कल बालिका दिवस मनाया गया, और उसी दिन बस्तर पुलिस का सबसे बड़ा अफसर एक बेकसूर महिला आंदोलनकारी के एक लोकतांत्रिक संदेश के जवाब में उसे सबसे गंदी गाली लिखकर भेज रहा है, तो ऐसे में किसी संविधान का जलसा मनाने का क्या मतलब रह जाता है?
भारत में जब तक कानून के लिए लोगों के मन में सम्मान न रहे, यह बेहतर होगा कि वे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का जलसा न मनाएं। इस देश में जो सबसे कमजोर तबके हैं, उनके साथ सबसे अधिक जुल्म है। दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, और गरीबों के साथ जुल्म की कहानियां खत्म ही नहीं होती हैं। सरकार की अनगिनत एम्बुलेंस मौजूद हैं, और देश के कई प्रदेशों में लगातार लोग अपने बीमार को ढोकर ले जाते दिखते हैं, अपने मुर्दों को ढोकर ले जाने को मजबूर रहते हैं। सरकारी अफसर कुर्सियों पर बैठे, या कुर्सियों से नदारद रहकर जनता का पैसा बर्बाद करते हैं, और जो सबसे कमजोर जनता है, उसके मानो कोई हक ही नहीं रहते। इस देश का संविधान ऐसी व्यवस्था के लिए नहीं बनाया गया था, और दुनिया भर के लोगों को इस देश में बुलाकर, इसके प्रदेशों में बुलाकर आत्मप्रशंसा के भाषणों से देश की बदहाली और हैवानियत की तस्वीरें नहीं छुपती हैं। स्वतंत्रता दिवस हो, या गणतंत्र दिवस, जब कभी ऐसे मौकों पर संविधान का गुणगान किया जाता है, तो वह गुणगान इतना पाखंडी लगता है कि लोगों को संविधानतले कुचलने से हुए जख्म और याद आने लगते हैं। इस देश में सत्ता को जनता के बुनियादी हकों का सम्मान करना सीखना होगा, वरना संविधान के सम्मान का कोई मतलब नहीं है।
हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में जिसके हाथ सत्ता की ताकत आ जाती है, वे मोटे तौर पर जुल्मी होने लगते हैं। ताकत लोगों को खूंखार बना देती है, बेरहम बना देती है, और हिंसक बना देती है। संविधान नाम की किताब को सत्ता पर बैठे लोग मेज के नीचे पांवों को रखने के लिए बनाए गए पटे की तरह इस्तेमाल करते हैं, और ऐसे संवेदनाशून्य लोकतंत्र में संविधान पर जलसा बेमतलब है। 

कर्नाटक में मंत्री-नेता से मिले 162 करोड़ से उठे सवाल

संपादकीय
24 जनवरी 2017


कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और वहां पर लघु उद्योग मंत्री, और कांग्रेस की महिला शाखा की प्रदेश अध्यक्ष पर आयकर के छापे पड़े जिसमें 41 लाख रूपए नगद मिले, एक दर्जन किलो से अधिक सोना मिला, और करीब 162 करोड़ की संपत्ति मिली है। यह बात महज कांग्रेस तक सीमित नहीं है, और महज कर्नाटक तक सीमित नहीं है। अभी तो जितनी दौलत मिली है, इससे कई गुना अधिक खर्च कर्नाटक में भाजपा के मंत्री रहे हुए रेड्डी ने अपने घर की शादी में अभी पिछले महीनों में ही किया है, ऐसी खबरें हैं। और लोगों को याद होगा कि किस तरह कर्नाटक का सबसे बड़ा खनिज माफिया बने हुए रेड्डी बंधु, अपने सिर पर सुषमा स्वराज का हाथ रखे हुए तस्वीरें सहेजकर रखे हुए हैं, और एक वक्त वे कर्नाटक में भाजपा की सरकार को गिराने की हालत में थे। इसलिए इतनी बड़ी रकम और इतनी दौलत मिलना केवल कांग्रेस का कुकर्म नहीं है, राजनीति और सरकार में बहुत से लोग ऐसे हैं जो इस तरह सैकड़ों करोड़ के मालिक बने हुए हैं। लोगों को याद होगा कि मध्यप्रदेश में आईएएस अफसरों का एक जोड़ा इसी तरह से सैकड़ों करोड़ की रकम और पूंजी निवेश के साथ पकड़ाया था।
अब सवाल यह उठता है कि केन्द्र सरकार काले धन पर जिस मार और वार की बात करती है, क्या वह इसी रफ्तार से चलेगा कि लोग जब लाखों-करोड़ कमा लेंगे, तब जाकर सैकड़ों करोड़ जब्त किए जाएंगे, और जब्ती के ऐसे अधिकतर मामले इंकम टैक्स से आखिर में छूट जाएंगे। कालेधन पर कार्रवाई का नारा बड़ा सुहावना है, और इसके चलते जब नोटबंदी की कई-कई दिन-रात चलने वाली कतारें लगीं, तो भी लोगों को लगा कि कालेधन पर कार्रवाई देशद्रोहियों पर कार्रवाई है, और इसलिए लोगों ने कतार में लगने की तकलीफ को राष्ट्रप्रेम मान लिया, और तकलीफ बर्दाश्त कर ली। लेकिन बाजार के जानकारों का यह अंदाज है कि सैकड़ों काले-अरबपतियों में से दर्जन भर पर भी कार्रवाई नहीं होती है, और वह कार्रवाई ऐसे वक्त पर ऐसे अंदाज में होती है कि उसमें से अधिकतर लोग अपना अधिकतर कालाधन बचा लेते हैं।
भारत में टैक्स लगाने के तरीके, टैक्स चोरी पर निगरानी और उसे पकडऩे के तरीके, और पकडऩे के बाद उसे जुर्माने या सजा तक पहुंचाने के तरीके बहुत ही कमजोर है। हालत यह है कि तनख्वाह पाने वाले लोग एक पैसा भी टैक्स छुपा नहीं पाते, बचा नहीं पाते। दूसरी तरफ उनसे सैकड़ों गुना अधिक कमाने वाले लोग टैक्स देने से ही बच जाते हैं। भारत में टैक्स की पूरी प्रणाली को ऐसा बनाने की जरूरत है जिससे कि इस किस्म की सारी चोरी रूक सके जो कि कारखानों से आबकारी शुल्क की चोरी से शुरू होती है, और आयकर की चोरी तक लगातार जारी रहती है। ऐसे में कालेधन पर कार्रवाई का नारा महज चुनावी और राजनीतिक नारा अधिक रहता है, भारत की टैक्स व्यवस्था में कालेधन पर कोई कार्रवाई मुमकिन ही नहीं दिख रही है। आयकर विभाग का पूरा ढांचा इतना बड़ा नहीं है कि वह देश भर के टैक्स चोरों पर नजर भी रख सके, या कार्रवाई कर सके। इसलिए सरकार को एक बुनियादी फेरबदल के बारे में सोचना चाहिए जिससे कि टैक्स चोरी की शुरूआत ही न हो सके। ऐसे मामले में अमरीका जैसे देश से कुछ सीखा जा सकता है, जहां पर कि टैक्स चोरी आमतौर पर सुनाई नहीं देती है, और टैक्स चोरी पकड़ाने पर जहां कैद की सजा का इंतजाम है।
लेकिन कर्नाटक में जो मामला सामने आया है वह आयकर विभाग ने पकड़ा जरूर है, लेकिन वह राजनीति और सरकार में भ्रष्टाचार का एक सुबूत दिखता है। यह पूरा का पूरा मामला टैक्स चोरी से अलग सीधे भ्रष्टाचार का है, और ऐसे भ्रष्टाचार के बारे में हम बार-बार यह लिखते आए हैं कि इसके लिए कैद का इंतजाम जब तक सरकार नहीं करेगी, तब तक रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार को थामना मुमकिन नहीं होगा। राजनीति की सत्ता वाली कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को ऐसे आर्थिक अपराधों के लिए, भ्रष्टाचार और टैक्स चोरी के लिए अधिक और कड़ी सजा का इंतजाम करना होगा, तब जाकर कैद में बैठे हुए कुछ लोगों को सही अक्ल आ सकेगी। आज देश भर में वामपंथियों को छोड़कर बाकी तकरीबन तमाम पार्टियों में ऐसे दर्जे का भ्रष्टाचार आम बात है, और देश को लूट लिया जा रहा है। ऐसी राजनीति के चलते हुए देश में कालाधन कभी खत्म नहीं हो सकता, और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जब तक सत्ता को रिश्वत देना कारोबार की मजबूरी रहेगी, तब तक कारोबार बिना कालेधन के नहीं चल सकेगा। इसलिए भ्रष्टाचार को गोमुख पर ही रोकना होगा, वरना हुगली तक पहुंचते हुए पानी ऐसा हो चुका रहता है कि उसे वहां पर साफ नहीं किया जा सकेगा। 

अपने खुद के ताने-बाने जलाते और दूसरों पर बम गिराते आभासी-लोकतंत्र

आजकल
23 जनवरी 2017  
अमरीका में डोनाल्ड ट्रंप के चुने जाने के पहले तक बाकी दुनिया के लोगों को, और खुद अमरीका के भीतर के वोटरों को ऐसा लगता था कि ट्रंप जीत नहीं पाएगा। जिस तरह से वह अमरीकी कानून का फायदा उठाकर कई बार अपने कारोबार को दीवालिया घोषित करके टैक्स का फायदा उठाते रहा, कैसिनो जैसा धंधा करते रहा, संकीर्णतावादी मानी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी का नेता रहते हुए जिसका चाल-चलन बदनाम रहा, जिसकी हरकतें अश्लील, फूहड़, हिंसक, और अमानवीय रहीं, जिसकी सोच 18वीं सदी की, लोकतंत्र से पहले की रहीं, जिसका निजी जीवन संकीर्ण जीवन-मूल्यों से उल्टा रहा, वह चुनाव जीत गया, और आज अमरीका का राष्ट्रपति है। बहुमत ने उसे चुना, और बहुमत के फैसले को लेकर कुछ बुनियादी सवाल खड़े हुए।
लोकतंत्र जिस बहुमत की पसंद की बुनियाद पर टिका हुआ है, क्या वह सचमुच लोकतंत्र है? यह सवाल अमरीका से परे हिन्दुस्तान के अलग-अलग प्रदेशों में और अलग-अलग लोकसभा या विधानसभा सीटों पर बार-बार उठ खड़े होते हैं। जिन लोगों को लगता है कि हिन्दुस्तानी जनता एक काबिल और ईमानदार प्रतिनिधि चुनना चाहती है, उनकी यह सोच उनकी एक हसरत जरूर हो सकती है, हकीकत नहीं है। हकीकत तो यह है कि अधिकतर सीटों पर जीत को या तो ताजा भुगतान से नगद खरीदा जाता है, या फिर बिना नगदी के धर्म और जाति के आधार पर हासिल किया जाता है। कुछ अधिक पेशेवर सांसद और विधायक, और अब तो पार्षद और पंच-सरपंच भी, ऐसे होते हैं जो कि पांच बरस तक किस्तों पर ऐसी जीत को खरीदते हैं, और कुछ बकाया भुगतान आने वाले पांच बरस में भी धीरे-धीरे करते हैं।
ट्रंप को ही कोसना, और अमरीकी वोटरों को जाहिल कहना इसलिए ठीक नहीं है कि खुद हिन्दुस्तान में ऐसी अनगिनत वजहें हैं जो कि सारी की सारी बुरी हैं, लेकिन वे चुनाव जीतने के लिए काम बहुत आती हैं। और फिर हम जीत के आंकड़ों को देखें, तो किसी एक सीट से जीत से लेकर किसी प्रदेश या देश में किसी एक पार्टी या गठबंधन की जीत तक, नंबर एक और नंबर दो का फासला इतना कम रहता है, और जीतने वाले को भी मिले हुए वोट घर बैठे वोटरों की गिनती से इतने अधिक होते हैं, कि मतदाता की पसंद कही जाने वाली चीज के पास ऐसा कोई सुबूत नहीं होता कि वह सचमुच मतदाता की पसंद है। हिन्दुस्तानी चुनाव पसंद न बताने वाले घर बैठे वोटर तय करते हैं, मैदान में उतरे हुए दूसरे, तीसरे, और चौथे नंबर के उम्मीदवार वोटों को बांटकर, वोटकटवा होकर तय करते हैं, मैदान में उतारे गए फर्जी नीयत वाले उम्मीदवार टक्कर के उम्मीदवार के थोड़े-बहुत धर्म-जाति-आधारित वोटों को नोंचकर तय करते हैं। इसलिए भारत की चुनावी जीत का देश के मतदाताओं के बहुमत से कोई लेना-देना नहीं रहता। जीत का यह झांसा कुछ उसी तरह का रहता है जिस तरह कि कोई भारत-सुंदरी बन जाती है, जो कि देश की सबसे खूबसूरत युवती कहलाती है, हालांकि वह महज उन लोगों के बीच अधिक सुंदर रहती है, जो कि मुकाबले में उतरी होती हैं, न कि देश की बाकी युवतियों से अधिक सुंदर।
हम फिर से चुनावों की तरफ लौटें तो यह बात साफ दिखती है कि भारत की अधिकतर सीटों पर नतीजे इस बात से तय होते हैं कि उम्मीदवार का धर्म क्या है, उसकी जाति क्या है, वह लोगों पर कितना खर्च करने की ताकत रखता है, और वह बाहुबल से या सरकार पर अपने दबदबे से कितने गलत फैसले करवा सकता है, कितने गुनहगार छुड़वा सकता है, कितने बेकसूर अंदर करवा सकता है। चुनाव के वक्त वह कितना खर्च कर सकता है, और चुनाव के बाद उसके पास जाने पर वह जरूरतमंद को कहां से कितना पैसा दिला सकता है, या दे सकता है। ये सारी बातें वोटरों के बीच भारी मायने रखती हैं। इसलिए अब हिन्दुस्तानी चुनाव न सिर्फ वोट के वक्त दी गई रिश्वत से तय होते हैं, बल्कि पिछले बरसों में नेता के किए हुए पूंजी निवेश से भी तय होते हैं, और आने वाले बरसों के लिए लोगों को मिलने वाले दिलासे से भी तय होते हैं।
ऐसे में भारत जैसा लोकतंत्र वोटर लिस्ट से लेकर वोट मशीन तक के मामले में तो एक माहिर मशीन बन चुका है, लेकिन बाकी बातों को अगर ध्यान से देखा जाए तो किसी एक सीट से लेकर पूरे प्रदेश या पूरे देश तक का फैसला निहायत ही अलोकतांत्रिक बातों से तय होता है। दिक्कत यह है कि भारत में चुनाव को निष्पक्ष और स्वतंत्र महज इसलिए मान लिया जाता है कि इसकी मशीन के कलपुर्जे अब ऐसे कस चुके हैं कि वे बड़ी चिकनाई से अपना काम करते हैं, और मशीन को लोकतंत्र मानने का झांसा लोग अपने आपको देते रहते हैं।
हम मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ को लें, जहां पर कि पिछले विधानसभा चुनाव में जीतने वाली पार्टी भाजपा, और हारने वाली पार्टी कांग्रेस के बीच वोटों का फासला महज पौन फीसदी था। अब लोग अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र को अगर देखें कि वहां पर कौन सी नाजायज बातों से पौन फीसदी का ऐसा फासला बना होगा, तो हर सीट पर ऐसे दो-दो, चार-चार मुद्दे दिख जाएंगे जिनकी वजह से ऐसा फासला हुआ होगा। इसलिए चुनावी जीत को लेकर अगर अविभाजित मध्यप्रदेश के एक मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा था कि चुनाव मैनेजमेंट से जीता जाता है, तो वह बात एक हद तक सही है। वह बात दिग्विजय सिंह को बड़ी आलोचना इसलिए दिला गई थी कि वह लोगों के लोकतंत्र पर घमंड को चोट पहुंचाती थी, लेकिन हकीकत यह है कि वही बात हकीकत है, और घमंड में कोई सच्चाई नहीं है, लोकतंत्र कहीं भी देश को सचमुच की पसंद नहीं देता, बेहतर पसंद नहीं देता, और सबसे अच्छी पसंद तो बिल्कुल भी नहीं देता। इसीलिए बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है, जैसी सरकार के वे हकदार होते हैं।
आज भारत के लोकतंत्र में चुनाव लडऩा, जीतकर आना, और फिर अगले चुनाव की जीत की संभावना बनाए रखना, यह सब कुछ इतना मुश्किल काम हो गया है, और ऐसे कड़े मुकाबले का काम हो गया है कि उससे ईमानदारी बाहर हो गई है। इसे समझना हो तो कारोबार की जुबान में समझ सकते हैं कि जिस औद्योगिक-बाजार में अधिकतर कारखाने चोरी की बिजली पर चलते हों, चोरी और टैक्स चोरी के कच्चे माल पर चलते हों, जहां वे एक्साईज-चोरी पर चलते हों, जहां वे मजदूर कानूनों, पर्यावरण कानूनों को तोड़कर चलते हों, वहां पर कोई अगर यह सोचे कि वह ईमानदारी से और सारे नियम-कायदों के तहत कारखाना चला ले, तो उनका धंधा बंद होने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। भारत के लोकतांत्रिक चुनावों में ठीक ऐसी ही नौबत रहती है जहां सारे कायदों को तोड़कर, सारी ईमानदारी को छोड़कर लोग चुनाव लड़ते हैं, और उन्हीं तमाम बातों की मदद से जीतते हैं, जिन बातों को लोकतंत्र नाजायज मानता है।
ट्रंप से लेकर हिन्दुस्तान तक, लोकतंत्र एक झांसा बन गया है, एक ऐसा झांसा जो कि अपने भीतर अपने लोगों के बीच नफरत की लपट से ताने-बानों को जलाने पर उतारू है, जलाते चल रहा है, और दूसरी तरफ अपने इस आभासी (वर्चुअल) लोकतंत्र का दंभ भरते हुए जो दूसरे देशों पर बम गिराकर लाखों बेकसूर भी मार रहा है।

महिला कर्मचारी की प्रताडऩा पर बड़े रेल अफसर जेल भेजे जाएं

संपादकीय
23 जनवरी 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रेलवे के एक बड़े दफ्तर के कर्मचारियों के सांस्कृतिक कार्यक्रम में जब देर रात एक महिला कर्मचारी ने एक बड़ी अफसर के साथ गाना गाने से यह कहकर इंकार किया कि इस गाने की उसकी तैयारी नहीं है, तो उसे अनुशासनहीनता मानकर नोटिस दिया गया, और उसका तबादला कर दिया गया। इस नोटिस की जुबान देखें तो ऐसा लगता है कि उस महिला ने कोई बहुत बड़ा जुर्म कर दिया। उसे यह गिनाया गया कि उसे सांस्कृतिक कोटे से नौकरी मिली थी, इसलिए वह गाना गाने से मना नहीं कर सकती। अभी तक की जो खबरें हैं उनमें ऐसी चर्चा है कि इस महिला को रेलवे के सबसे बड़े एक अफसर के साथ एक बहुत ही अश्लील और फूहड़ गाना गाने के लिए मजबूर किया जा रहा था, और उसने इससे इंकार कर दिया। यह बात मीडिया मेें आई तो अफसरों के हाथ-पांव फूले, और आनन-फानन इस कार्रवाई को रद्द किया गया।
राज्य के महिला आयोग ने इस घटना का नोटिस लेने में बहुत देर की, जबकि उसे जितने साधन-सुविधा मिले हुए हैं, उसे तुरंत ही इस महिला तक पहुंचना था, और उसका साथ देना था। दूसरी बात यह कि रेलवे के इस अफसर के खिलाफ कई तरह के जुर्म दर्ज होने चाहिए। महिला आयोग को तो जुर्म दर्ज करना ही चाहिए, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को भी इस मामले पर इन अफसरों को अदालत में खड़ा करना चाहिए, और इन पर प्रताडऩा का मुकदमा अदालत को खुद को शुरू करना चाहिए। इस महिला के मामले में तो रेलवे बुरी तरह फंस गया है, और उसे तुरंत अपने तौर-तरीके सुधारने पड़े, और कार्रवाई वापिस लेनी पड़ी, लेकिन महिला कर्मचारियों के साथ केन्द्र के संस्थानों मेें, राज्य सरकार के संस्थानों मेें, और निजी संस्थानों में भी शोषण और ज्यादती एक आम बात है। छत्तीसगढ़ में ही एक महिला सिपाही ने आईजी स्तर के इतने बड़े अफसर के खिलाफ शिकायत की, वह शिकायत सही निकली, लेकिन राज्य सरकार उस पर कोई कार्रवाई करने से कतरा रही है। फाइलें एक टेबिल से दूसरे टेबिल पर जा रही है, और इससे राज्य की महिला कर्मचारियों के बीच संदेश यही जाता है कि उनकी शिकायत से किसी बड़े अफसर का आसानी से कुछ बिगडऩे वाला नहीं है। ऐसी कितनी महिला कर्मचारी हो सकती हैं जो कि ऐसी लंबी और कड़ी चढ़ाई वाली लड़ाई लडऩे का दमखम रखती हों?
राज्य सरकार को महिलाओं की सुरक्षा के लिए अपनी नीति एकदम साफ करनी चाहिए। यह सिलसिला ठीक नहीं है, और इससे कामकाजी महिलाओं के बीच आत्मविश्वास पैदा नहीं हो सकेगा। एक तरफ तो राज्य सरकार महिलाओं के सरकारी नौकरी में दाखिले की उम्र सीमा में बहुत बड़ी छूट देकर उन्हें बढ़ावा देना चाहती है, दे रही है, दूसरी तरफ महिलाओं की प्रताडऩा करने वाले मंत्री, विधायक, या अफसर खुले घूमते हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं दिखने पर सामाजिक असमानता बढ़ते चलती है। हमारा तो यह भी मानना है कि रेलवे कर्मचारी पर ऐसी कार्रवाई की खबर आने पर राज्य सरकार को भी इस बारे मेें केन्द्र सरकार को लिखना था, और कड़ी कार्रवाई की मांग करनी थी। लेकिन पहले राज्य सरकार अपने पास दर्ज मामलों पर कार्रवाई कर चुकी होती, तो उसे ऐसा नैतिक अधिकार भी होता। फिलहाल सामाजिक मोर्चों पर भी ऐसे मामलों को उठाने की जरूरत है ताकि महिलाएं अकेली न रह जाएं।

इंटरनेट पर बच्चों का पोर्नो ढूंढते और बांटते हिन्दुस्तानी

संपादकीय
22 जनवरी 2017


इंटरनेट पर चीजों को ढूंढने पर आई एक रिपोर्ट में भारत के कई शहरों के नाम आए हैं कि वहां के लोग किस तरह बच्चों की नंगी तस्वीरों को आगे बढ़ाते हैं, बांटते हैं, ढूंढते हैं, और सहेज कर रखते हैं। ऐसे अलग-अलग लोगों की जानकारी जुटाकर अमरीका, और योरप के देशों में सरकारी जासूस लोगों तक पहुंचते हैं, और उन्हें गिरफ्तार भी करते हैं। जो आंकड़े अभी सामने आए हैं उनके मुताबिक देश में ऐसी सामग्री ढूंढने और दूसरों के साथ साझा करने वाले लोगों में अमृतसर सबसे आगे है, और उसके बाद दिल्ली, लखनऊ ऐसे शहर हैं।
इस बात से हिन्दुस्तान के लोगों को चौकन्ना होने की जरूरत इसलिए है कि आज भी इस देश में अगर बच्चे अपने यौन शोषण की शिकायत मां-बाप से करते हैं, तो उनमें से अधिकतर को झिड़की मिलती है, और डांटकर चुप करा दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि ऐसे बच्चे दुबारा ऐसा होने पर उसकी शिकायत करने का हौसला भी नहीं जुटा पाते। लेकिन अनगिनत ऐसे मामले हो रहे हैं जिनमें कहीं स्कूलों में शिक्षक ही बच्चों से बलात्कार कर रहे हैं, और अभी चार दिन पहले की खबर है कि किस तरह एक स्कूल में प्रिंसिपल और शिक्षकों ने मिलकर बलात्कार किया। इसलिए अच्छा लगे या न लगे, हिन्दुस्तानियों को यह मानना होगा कि बच्चों का यौन शोषण हिन्दुस्तान में अपनी खुद की एक हकीकत है, और यह विदेश से आयातित कोई बीमारी नहीं है, यह न तो शहरी है, और न ही आधुनिक जीवन से इसका कोई लेना-देना है। जहां-जहां बच्चे हैं, और जहां-जहां उनके साथ सेक्स सोचने वाले दिमागी रूप से बीमार लोग हैं, वहां-वहां बच्चे खतरे में हैं।
आज हिन्दुस्तान में लगातार सेक्स-शिक्षा के खिलाफ झंडा-डंडा लेकर खड़े हो जाने वाले लोग दिखते हैं। वे ऐसी शिक्षा को या सावधानी को पश्चिमी सभ्यता का असर मानते हैं, और किशोरावस्था में पहुंच चुके बच्चों को भी उनके बदन के बारे में, बदन की जरूरत के बारे में जागरूक करने के खिलाफ हैं। ऐसी अवैज्ञानिक सोच के चलते हुए यह देश अपनी नौजवान पीढ़ी को, और उससे भी कमउम्र के बच्चों के पीढ़ी को खतरे में डाल रहा है। यह खतरा सिर चढ़कर नहीं दिखता, यह खतरा दबा-छुपा रहता है, और बच्चों की दिमागी हालत को बहुत बुरी तरह जख्मी करता है। इंटरनेट पर सर्च के जो आंकड़े कम्प्यूटर ही ढूंढकर निकाल देता है, वह अपने आपमें एक सुबूत है कि किस तरह हिन्दुस्तान के लोग इस तरह की मानसिक विकृति का शिकार हैं, और वे बाकी दुनिया से अलग किसी और दुनिया के इंसान नहीं हैं। ऐसी मानवीय कमजोरी और मानसिक बीमारी से निपटने के लिए सरकारी जासूस कहीं भी काफी नहीं हो सकते, इससे निपटने के लिए बच्चों को और किशोर-किशोरियों को जागरूक करना ही अकेला रास्ता है। यह जब तक नहीं होगा, तब तक भारत ऐसे खतरे झेलते ही रहेगा।

संघ नेता के आरक्षण विरोधी बयान का दाम भाजपा देगी

संपादकीय
21 जनवरी 2017


बिहार चुनाव के पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख ने आरक्षण के खिलाफ एक बयान दिया था, और बाद में संघ और भाजपा उसे सुधारने की कोशिश करते-करते थक गए, लेकिन बात बनी नहीं। जो नुकसान होना था, वह विधानसभा चुनाव में भाजपा को झेलना पड़ा। अब उत्तरप्रदेश चुनाव के ठीक पहले जयपुर के एक साहितय महोत्सव में आरएसएस के मनमोहन वैद्य ने आरक्षण खत्म करने की चर्चा छेड़ते हुए कई बातें कहीं, और उन्हें लेकर एक नया बवाल खड़ा हो गया है। यह याद रखने की जरूरत है कि देश के किसी भी और राज्य के मुकाबले उत्तरप्रदेश में आरक्षण एक बहुत बड़ा मुद्दा है, और आरक्षित तबकों की राजनीति करने वाली बसपा की मायावती इसी प्रदेश से राज करने के लिए आती हैं। पहले भी वे यहां पर मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, और उनकी पार्टी का सबसे बड़ा जनाधार इसी प्रदेश में है।
आज दिक्कत यह हो गई है कि विशुद्ध रूप से एक साहित्य के कार्यक्रम में भी संघ के एक वरिष्ठ व्यक्ति ने एक निहायत सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे को छेड़कर न सिर्फ साहित्य महोत्सव पर चर्चा को मोड़ दिया, बल्कि उत्तरप्रदेश के चुनाव में भाजपा को इसका जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। इसकी एक और वजह भी है कि पिछले दो बरस में भाजपा और संघ परिवार के संगठनों ने लगातार गोरक्षा के मुद्दे पर, खानपान और पहरावे के मुद्दे पर जिस तरह की एक शुद्धतावादी और सवर्ण सोच को आक्रामकता के साथ आगे बढ़ाया है, उससे भारत के अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, पिछड़े तबके के लोग, और महिलाओं के बीच एक बड़ी दहशत फैली है, और तनाव फैला है। ऐसा लगने लगा कि देश को 21वीं सदी से वापिस घसीटकर 18वीं सदी की ओर ले जाने की कोशिश हो रही है, और कुछ दिनों में हो सकता है कि सतीप्रथा के हिमायती भी बयान देने लगें।
यह पूरा माहौल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उन दावों के ठीक खिलाफ जाता है जिनमें वे भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी में दुनिया के तीन सबसे बड़े देशों में पहुंचता हुआ बताते हैं। भारत के समाज को टुकड़ों में बांटकर, और बड़ी-बड़ी आबादी वाले तबकों को बुरी तरह से कुचलकर कोई अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती। देश में सामाजिक तनाव बढ़ाया जा रहा है, और अर्थव्यवस्था इसकी वजह से चौपट हो रही है, लोगों का मनोबल टूट रहा है, और देश के भीतर वैज्ञानिक सोच खत्म हो रही है। ऐसे कई किस्म के नुकसान अनदेखा करके अब आरक्षण के खिलाफ जो बयान आया है, वह बहुत ही खराब है, सामाजिक समानता के खिलाफ है, और इसका नुकसान महज भाजपा को ही उठाना पड़ेगा, क्योंकि संघ खुद तो चुनाव लड़ता नहीं है।

दूसरों की त्रासदी, अपनी सेल्फी में बेजा इस्तेमाल

संपादकीय
20 जनवरी 2017


सेल्फी लेने की बीमारी के कुछ लोगों का इलाज दिल्ली के एम्स में चल रहा है। और पूरी दुनिया में चिकित्सा विज्ञान सेल्फी लेने के बावलेपन को एक मानसिक बीमारी मानकर लोगों को उससे आगाह कर रहा है। लोग रेल पटरियों पर कटने का खतरा उठाते हुए अपनी तस्वीरें खींच रहे हैं, और बहुत से लोग रेलगाडिय़ों की छत पर बिजली के तारों के नीचे जान देते हुए भी अपनी तस्वीरें ले रहे हैं। मोबाइल फोन के कैमरों ने लोगों को आत्ममुग्ध होने का एक औजार दे दिया है, जिसे कि लोग हथियार की तरह भी इस्तेमाल कर रहे हैं। अभी जर्मनी से बर्लिन के उस स्मारक की तस्वीरें आई हैं जहां पर हिटलर-राज के दौरान मारे गए लाखों यहूदियों के सम्मान में अफसोस की याद बनाई गई है, और वहां पर दफनाए गए यहूदियों की कब्रों पर कूद-कूदकर लोग अपनी तस्वीरें ले रहे हैं, और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर रहे हैं। जर्मन इतिहास में लाखों बेकसूर यहूदियों को मारकर हिटलर ने दुनिया का एक सबसे बड़ा हत्याकांड किया था, और उसे महज मौज-मेले की जगह मानकर लोग तफरीह कर रहे हैं, और उस जगह की गंभीरता को समझे बिना, इतिहास की हैवानियत से नावाकिफ बने हुए अपनी सेल्फी ले रहे हैं, साथियों की तस्वीरें ले रहे हैं।
दरअसल इंसानी मिजाज होता ही ऐसा है। वह दूसरे लोगों के दुख-तकलीफ से जुड़ नहीं पाता। कुछ देर तक तो इंसान दूसरों से हमदर्दी का नाटक कर लेते हैं, लेकिन श्मशान में भी एक बार अर्थी को जमीन पर उतार दिया गया, तो उसके बाद लतीफे शुरू होने, अश्लील बातचीत का सिलसिला छिडऩे, और मृतक के परिवार के बारे में भी तमाम किस्म की बुरी बातें करने से किसी को परहेज नहीं रह जाता। लोग वहां पर हंसते और ठहाके लगाते भी देखे जा सकते हैं। लोगों को यह भी याद होगा कि छत्तीसगढ़ में जब नसबंदी कांड में बिलासपुर में बड़ी संख्या महिलाएं मारी गई थीं, और मुख्यमंत्री उनको देखने अस्पताल पहुंचे थे, तो वहां के स्वास्थ्य मंत्री और स्थानीय मंत्री अस्पताल के भीतर ही जोरों से हंसते हुए समाचार-कैमरों पर कैद हुए थे, और टीवी की खबरों में उनकी हंसी कई दिन तक दिखती रही थी।
लोग दूसरों की तकलीफ से बहुत ही सतही तरीके से जुड़ते हैं। अंग्रेजी और हिन्दी, या उर्दू के कई ऐसे शब्द हैं जो ऐसे लोगों की सोच बताते हैं। अंग्रेजी में एक शब्द है सिम्पैथी, जिसका मतलब होता है हमदर्दी, और दूसरा शब्द है इम्पैथी, यानि सच की हमदर्दी। ऐसा फर्क बाकी भाषाओं में भी रहता है, लेकिन असल जिंदगी में लोग हमदर्दी जताने को हमदर्द होना मान लेते हैं। हमदर्द होना एक अलग ही खूबी रहती है, और वह हर किसी में नहीं रहती। जो लोग बर्लिन के इस नस्लीय कत्लेआम के स्मारक पर जाते हैं, उन्हें अच्छी तरह मालूम रहता है कि वहां किस तरह इतिहास का सबसे खूनी पन्ना दफन है। फिर भी उन्हें वह तकलीफ छू नहीं जाती। और जब ऐसी संवेदनशून्यता के साथ लोगों में अपनी तस्वीरों को खींचने और फैलाने का मोह जुड़ जाता है, तो वह समाज मानवीयता के पैमानों को खोने लगता है।
आज हर किसी को अपने आपको, अपने बच्चों को, अपने साथियों को एक सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारी समझाने और सिखाने की जरूरत है। इसके बिना लोगों में एक-दूसरे के लिए नफरत उसी रफ्तार से बढऩे लगेगी, जिस रफ्तार से लोगों में अपनी सेल्फी लेने की चाह बढऩे लगी है। लोगों का आत्ममुग्ध होना एक सीमा तक तो मानवीय कमजोरी है, लेकिन इसके बाद वह धीरे-धीरे एक मानसिक बीमारी में तब्दील होने लगता है, और जब तक लोगों को यह समझ आए, तब तक तो बहुत से लोगों की बीमारी लाइलाज भी होने लगेगी। फिलहाल जो लोग दूसरों की त्रासदी को अपनी सेल्फी में इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनकी तस्वीरें जहां दिखें, वहां उन्हें धिक्कारने की जरूरत है।

नब्बे बरस के हो चुके नेताओं के दल-बदल की हसरत की अर्थी..

संपादकीय
19 जनवरी 2017


कल जिस तरह अपने बुढ़ापे में माने हुए बेटे के लिए कांग्रेस के बुजुर्ग नेता नारायण दत्त तिवारी ने कांग्रेस का पल्ला छोड़कर भाजपा का दामन थामा है, वह कई लोगों को चौंका सकता है, लेकिन राजनीति में इस तरह की बातें हर चुनाव के पहले सामने आती हैं, और एक पार्टी की गंदगी को दूसरी पार्टी ले जाकर अपनी तश्तरी में सजाती है। यह अधिकतर पार्टियों के साथ चलता है, शायद वामपंथियों के अलावा। लेकिन कुछ लोग यह भी सोच सकते हैं कि जिस नारायण दत्त तिवारी को कांग्रेस ने कई बार मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, राज्यपाल, सब कुछ बनाया, और हैदराबाद के राजभवन से निकले हुए जिनके अश्लील वीडियो भी पार्टी ने बर्दाश्त की है, जिनकी शादी के बाहर की अवैध कही जाने वाली संतान के साथ उनकी बरसों की मुकदमेबाजी भी पार्टी ने बर्दाश्त की, उस पार्टी को इस बुजुर्ग नेता ने अपने आखिरी दिनों में इस तरह छोड़ दिया जैसे वह पार्टी अब अचानक अवैध संतान बन गई हो।
भारत में कई किस्म के दल-बदल होते हैं। चुनावों के ठीक पहले जिन लोगों को अपनी पार्टी में टिकट नहीं मिलता है, वे लोग दूसरी पार्टियों की तरफ भागते हैं, और वहां पर उनकी अच्छी खातिरदारी भी होती है, और जीत की संभावनाओं को देखते हुए उन्हें चुनाव में टिकट भी दी जाती है। कांग्रेस के एक बड़े नेता रहे हेमवती नंदन बहुगुणा की दो औलादों को कांग्रेस ने सिर पर बिठाया, और इन भाई-बहनों ने उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में अपनी पार्टी की संभावनाओं का भ_ा ही बिठा दिया। इसके बाद दोनों ही भाजपा में चले गए, और अब उनकी अगली पीढ़ी भाजपा की टिकट से चुनाव मैदान में भी है। इस नौबत को लेकर कई तरह के कार्टून भी मीडिया में तैर रहे हैं कि अपने पुराने वफादार कांग्रेसी सांसद को कमल छाप पर वोट लगाकर फिर सांसद बनाएं।
चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को विधि आयोग के साथ मिलकर देश के सामने ऐसी नौबत पर बहस शुरू करवानी चाहिए। ये संवैधानिक संस्थाएं कोई फैसला तो नहीं दे सकतीं, और जो संसद ऐसा कोई कानून बना सकती है, और जिसमें विधानसभाओं की मदद की जरूरत होगी, वहां पर दल-बदल का बड़ा सम्मान है। थोक में भी दल-बदल हो सके, उसी हिसाब से दल-बदल का कानून बनाया गया, और कई छोटे राज्यों में रातों-रात सरकार ने अपनी राजनीतिक जात ही बदल डाली। इसलिए ऐसी संसद से किसी सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती, और जनता में वैसी राजनीतिक समझ है नहीं कि दलबदलुओं को हरा सके। इसलिए समाज के भीतर एक जागरूकता लाने के लिए एक बहस की जरूरत है कि दलबदलुओं के चुनाव लडऩे पर किस तरह की रोक लग सके।
एक काल्पनिक विकल्प हमारी नजर में यह दिखता है कि चुनाव की घोषणा हो जाने के बाद दल-बदल करने वाले लोगों के उस चुनाव लडऩे पर रोक लगनी चाहिए। ऐसा कानून आसान नहीं होगा, और यह बात कहने वाले भी बहुत लोग मिलेंगे कि लोकतंत्र को कानूनों से बांधकर नहीं चलाया जा सकता और इसके लिए गौरवशाली परंपराओं की जरूरत पड़ती है। लेकिन भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में हम देखते हैं कि गौरवशाली परंपराओं की जगह एक गाली की तरह की गौरवसाली परंपराओं ने ले लिया है, और जितने भी चुनाव सुधार पिछले दशकों में हुए हैं, वे सारे के सारे चुनाव आयोग के कानूनी दायरे के बढऩे की वजह से हुए हैं, राजनीतिक दलों ने खुद होकर अकेले या सामूहिक रूप से किसी चुनाव-सुधार के लिए कोई पहल नहीं की है।
ऐसे में चुनाव आयोग को ही नब्बे बरस के हो चुके नेताओं के दल-बदल की हसरत की अर्थी निकालने का काम करना पड़ेगा।