दीवारों पर लिक्खा है, 11 नवंबर

पुलिस इतनी भ्रष्ट है कि वह राजनीतिक दबाव से दबी हुई

संपादकीय
11 नवम्बर 2017


दिल्ली के करीब हरियाणा के गुडग़ांव, जिसका नाम बदलकर गुरूग्राम कर दिया गया है, में एक स्कूल में छोटे से बच्चे की हत्या में पहले पुलिस ने वहां के कंडक्टर को पकड़कर बलात्कारी, हत्यारा सब कुछ बता दिया था, और उसके पास से हत्या का चाकू तक बरामद करने का दावा किया, उसे जेल भेज दिया। इस बारे में हम पहले लिख चुके हैं कि आंदोलन और मीडिया के दबाव के चलते पुलिस कभी-कभी ऐसी गलतियां या ऐसे गलत काम करती है। लेकिन अब जैसे-जैसे यह मामला आगे बढ़ रहा है यह दिख रहा है कि उसमें उस स्कूल के ग्यारहवीं का एक छात्र सीबीआई की जांच के मुताबिक हत्यारा है, और इस मामले की जांच में हरियाणा पुलिस ने न सिर्फ लापरवाही बरती थी, बल्कि साजिश भी रची थी। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ में जोगी सरकार के रहते हुए विद्याचरण शुक्ल के सहयोगी रामावतार जग्गी की हत्या हुई थी, जिसमें अमित जोगी का नाम आया था, और अदालत में मुकदमा चला था, उसमें भी पुलिस ने हत्यारों को बचाने, भगाने, और झूठा केस तैयार करने का ऐसा काम किया था कि अदालत से ऐसे पुलिस अफसर बर्खास्त भी किए गए, और उनको सजा भी दी गई। कैद से ऐसे कुछ पुलिस अफसर अभी ऊपरी अदालत में मामले के चलते हुए जमानत पर हैं, बर्खास्त तो कई हो गए हैं।
ऐसे कई मामलों को अगर देखें तो यह समझ पड़ता है कि भारत की पुलिस भारी राजनीतिक और सामाजिक दबाव के नीचे काम करती है, और दूसरे कई मामलों को देखें तो यह भी दिखता है कि पुलिस गले-गले तक भ्रष्ट भी है। आम लोगों का जब पुलिस से वास्ता पड़ता है, तो देश में बोलचाल की चलन की भाषा में कहा जाता है कि पुलिस अपने बाप की भी नहीं होती, यानी पिता का केस भी फंस जाए, तो पुलिस उससे वसूली और उगाही कर ही लेगी। यह बात बहुत गलत नहीं लगती है। आम जनता का तजुर्बा पुलिस को लेकर बहुत ही खराब है, और यह कहा जाता है कि ईश्वर खाकी से बचाए। इन पहलुओं से परे एक और पहलू पुलिस का बाकी रह जाता है कि वह वक्त पडऩे पर किस तरह बेरहम हो जाती है, और एक मुजरिम के अंदाज में काम करती है। इसकी अनगिनत मिसालें हमने बस्तर में देखी हैं जहां के दर्जनों मामलों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (क्योंकि प्रदेश का मानवाधिकार आयोग निरंतर नींद में है) ने राज्य सरकार को अनगिनत नोटिस भेजे हैं, और अपनी जांच में बस्तर के पुलिस अफसरों को हत्या, बलात्कार, और बस्तियों को जलाने के मामलों में कुसूरवार पाया है। बस्तर में काम करने वाले अखबारनवीसों को भी मालूम है कि पुलिस वहां पर किस तरह राज करती आई है, और पिछले कुछ बरसों में वहां पर हुए हजारों करोड़ के सरकारी कामकाज के टेंडरों में पुलिस का दखल इतना रहा है, वहां पर खनिज-खुदाई के मामलों में पुलिस का दखल इतना रहा है कि कई अफसरों के अरबपति होने की चर्चा है।
अब सवाल यह उठता है कि पुलिस इस कदर भ्रष्ट है कि वह उसी हद तक राजनीतिक दबाव में रहती ही है। फिर वह बेरहम और हिंसक भी है। तो फिर ऐसी एजेंसी से जनता किस तरह की ईमानदार जांच की उम्मीद कर सकती है जिसके चलते ऊपर की अदालतें सही इंसाफ कर सकें? यह भी बात आम चर्चा में रहती है कि किस तरह निचली अदालतों में गवाह, सुबूत, और फैसले, बहुत से मामलों में खरीदने के लिए उपलब्ध रहते हैं। इन सबको देखें तो एक घोर निराशा होती है कि क्या इस देश में सबसे कमजोर को बिना हिंसा किए, बिना हथियार उठाए, क्या कभी इंसाफ मिल सकता है? आज सबसे अधिक कमजोर और बेजुबान लोगों वाले आदिवासी इलाकों में नक्सलियों के पहुंचने, जगह पाने, और पनपने के पीछे पुलिस और सरकार के दूसरे कुछ अमलों की ऐसी ही तमाम खामियों का हाथ रहा है।
यह अकेले हरियाणा या छत्तीसगढ़ की बात नहीं है, पूरे देश को पुलिस के बारे में सोचना पड़ेगा, वरना लोकतंत्र पर से लोगों का भरोसा और भी उठते चलेगा। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 11 नवंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 10 नवंबर

अपनी सरकार की हैवानियत की जांच करवाएं शिवराज

संपादकीय
10 नवम्बर 2017


भोपाल में जो चल रहा है, उससे पता लगता है कि इंसानों के भीतर का एक हिस्सा किस तरह हिंसक है। बोलचाल में इंसान इसे हैवान कहकर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि यह उनसे परे का कोई दूसरा है, लेकिन हकीकत यह है कि हैवान और कहीं नहीं, इंसानों के भीतर ही रहता है, और समय-समय पर वह बाहर निकलता है। भोपाल में जिस तरह दो-चार दिन में दर्जन भर से अधिक लोगों के भीतर का यह हैवान जागा है, वह हक्का-बक्का करने वाला है, और मानव मानसिकता पर अध्ययन करने वाले लोगों को इस पर काम भी करना चाहिए।
खबरों में आ चुका है लेकिन यहां पर सिलसिलेवार पूरा मामला बताना जरूरी है। एक लड़की कोचिंग क्लास से लौटते हुए सामूहिक बलात्कार की शिकार होती है, और वह बलात्कारियों को पहचान भी लेती है, उसके मां-बाप दोनों ही भोपाल में पुलिस में हैं लेकिन उन्हें इसकी रिपोर्ट लिखाने के लिए बीस घंटे से अधिक एक थाने से दूसरे थाने घूमना पड़ता है, और इन जगहों पर वर्दी में बैठे तमाम लोगों के भीतर का इंसान सोया रहता है, और उनके भीतर का हैवान मजा करते रहता है कि जब कुछ लोगों ने इस लड़की के साथ बलात्कार किया है, तो उसे धक्के खिलाकर उसके साथ और हिंसा क्यों न की जाए। मध्यप्रदेश की राजधानी में ही कुछ लोगों की दखल से यह रिपोर्ट दर्ज होती है, तो मीडिया की पूछताछ के खिलाफ हॅंस-हॅंसकर कैमरों के सामने मजाक करते हुए रेलवे एसपी दिखती हैं, और बलात्कार पर यह हॅंसी जब चारों तरफ फैल जाती है तो मध्यप्रदेश सरकार को मजबूर होकर इस अफसर को भी हटाना पड़ता है। अब सवाल यह है कि इस रेलवे एसपी की वर्दी के भीतर तो एक महिला भी थी, लेकिन उस महिला के भीतर भी हैवान ही हॅंसते रहा, और कैमरे में दर्ज हो गया। अपने सहकर्मी पुलिस पति-पत्नी की बच्ची के साथ हुए सामूहिक बलात्कार में भी उसके भीतर के इंसान को नहीं जगाया, और मध्यप्रदेश के लिए शर्मनाक वीडियो दुनिया की बाकी जिंदगी तक के लिए दर्ज हो गया।
लेकिन सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता है, इस लड़की की मेडिकल जांच करने वाली दो सरकारी महिला डॉक्टरों ने यह रिपोर्ट दी कि इसके साथ बलात्कार नहीं हुआ है, और इसने अपनी सहमति और इच्छा से शारीरिक संबंध बनाए हैं। इस रिपोर्ट का हाल यह था कि इसमें इस युवती को पीडि़ता के बजाय अभियुक्त तक लिख डाला।  इसके बाद दूसरे डॉक्टरों ने जांच की, और यह पाया कि पहली रिपोर्ट गलत थी, और इस युवती के साथ बलात्कार हुआ है।
यह हाल उस मध्यप्रदेश में है जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह दिन भर में दो सौ बार प्रदेश की लड़कियों को अपनी भांजी बताते हुए, और उनकी माताओं को अपनी बहन बताते हुए मामा बने रहते हैं, और इस मामा की सरकार का राजधानी में यह हाल है कि एक लड़की से सामूहिक बलात्कार न केवल बलात्कारी कर रहे हैं, बल्कि खाकी वर्दी पहनी हुई पुलिस कर रही है, बल्कि सफेद कोट पहने हुए डॉक्टर भी कर रहे हैं, और यह एक अकेला मामला मध्यप्रदेश और भोपाल में सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों के भीतर की हैवानियत की एक बहुत ही डरावनी और अनोखी मिसाल है। हमारा ख्याल है कि शिवराज सिंह को बेंगलोर के सबसे प्रतिष्ठित मानसिक चिकित्सा वाले संस्थान से एक टीम बुलानी चाहिए, और अपने पुलिस अफसरों और डॉक्टरों की न केवल जांच करवानी चाहिए, बल्कि भविष्य के लिए अपनी तमाम सरकार के लोगों का यह मानसिक प्रशिक्षण भी करवाना चाहिए कि वे अपने भीतर के हैवान को किस तरह दबाकर रखें, और इंसानियत को ऐसे वक्त पर सोने न दें। (Daily Chhattisgarh)

छत्तीसगढ़ की सड़कों पर तनातनी का अगला साल

संपादकीय
9 नवम्बर 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल बहुत समय बाद इस तरह का राजनीतिक तनाव हुआ कि कांग्रेस और भाजपा के बीच पथराव सड़कों पर देखने मिला। कांग्रेस नोटबंदी की बरसी मना रही थी, और उसके कार्यक्रम के मुकाबले भाजपा नोटबंदी की सालगिरह मना रही थी। ऐसे में दोनों के बीच पथराव कब और कैसे शुरू हुआ यह तो वीडियो रिकॉर्डिंग देखने से जाहिर होगा, लेकिन हमारा ख्याल है कि ऐसे मामले में सत्तारूढ़ पार्टी की जिम्मेदारी बड़ी रहती है क्योंकि प्रदेश में उसी की सरकार है, और कानून-व्यवस्था ठीक रखने का जिम्मा सरकार का रहता है। विपक्ष और सरकार इन दोनों के तेवर एक जैसे रहना ठीक नहीं है, क्योंकि विपक्ष की कोई सरकारी जवाबदेही नहीं रहती। आज छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के अलावा सड़कों पर प्रदर्शन और विरोध के स्तर पर जोगी कांग्रेस भी कहीं कम नहीं दिखती है, और कई शहरों में मुद्दों को उठाने में वह इन दोनों से आगे भी रहती है। ऐसे में चुनाव के पहले के बारह महीने से कम के दिन अगर ऐसा टकराव जगह-जगह देखेंगे तो पुलिस फिर केवल इसी में लगी रहेगी, और उसका बाकी काम धरा रह जाएगा।
आज प्रदेश और देश दोनों जगह भाजपा की सरकार है, और इस पार्टी को सत्तारूढ़ पार्टी होने के तौर-तरीके समझने चाहिए, और अधिक जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। राज्य में कांग्रेस को विपक्ष में चौदह बरस हो गए हैं, और इतने बरसों की किसी सरकारी गड़बड़ी के लिए, नाकामयाबी के लिए वह जवाबदेह नहीं है। दूसरी तरफ केन्द्र में यूपीए की सरकार गए तीन बरस हो गए हैं, और मोदी सरकार ने यूपीए की हर बात को खारिज करके सारे फैसले अपनी मर्जी से लिए हैं, इसलिए वाहवाही हो, या कि आलोचना, वह भी मोदी और भाजपा के ही हिस्से है। ऐसे में भाजपा सड़कों पर आकर अधिक कुछ साबित नहीं कर सकती। इस पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं से लेकर राज्य के नेताओं तक ने बार-बार कहा है कि पार्टी के कार्यकर्ता मतदाताओं तक जाकर अपनी सरकारों की कामयाबी उन्हें बताएं। यह बताना सड़कों पर पथराव से साबित नहीं हो सकता।
भाजपा की सरकार को भी यह समझना चाहिए कि इतनी लंबी सत्ता के बाद पार्टी के बहुत से नेता और कार्यकर्ता यह मानकर चलते हैं, और यह उम्मीद करते हैं कि वे कानून तोड़ सकते हैं, और पुलिस उनका कुछ नहीं बिगाड़ेगी। छत्तीसगढ़ के लिए कांग्रेस के प्रभारी पी.एल.पुनिया ने आज कहा भी है कि छत्तीसगढ़ की पुलिस भाजपा के नौकर की तरह काम कर रही है। यह बात केवल विपक्षी कांग्रेस करे, ऐसा भी नहीं है, प्रदेश में जगह-जगह जहां भी ढीले-ढाले पुलिस अफसर हैं, वहां ऐसा हो भी रहा है। भाजपा के लोग किसी अफसर को पीट रहे हैं, तो भी उनके खिलाफ रिपोर्ट लिखने की हिम्मत पुलिस में नहीं है। सत्तारूढ़ भाजपा और सरकार दोनों को यह समझना चाहिए कि रोजाना की तनातनी या रोजाना के जुर्म में पुलिस एक बार तो सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों की मदद कर सकती है, लेकिन इससे जनता की नजर में पार्टी और सरकार दोनों गिर जाते हैं। और इसके साथ-साथ दूसरा खतरा यह बढ़ते चलता है कि पार्टी से जुड़े बाकी लोगों का भी जुर्म का हौसला बढ़ जाता है।
राज्य सरकार को पुलिस को अधिक ईमानदारी से काम करने देना चाहिए, और अपनी पार्टी के लोगों को बचाने का काम नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह पुलिस मतदान के दिन आकर नाराज मतदाताओं के दिल बदलने का काम नहीं कर पाएगी। दोनों-तीनों पार्टियों को यह भी समझना चाहिए कि सड़कों पर तनातनी अगर नाजायज और नाटकीय है, तो जनता उसे भी समझती है, और वह मतदान के दिन इनको समझा भी देगी।
(Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 9 Novmber 2017

बात की बात, 9 नवंबर

असली मुजरिम गिरफ्तार, तो पहले से बंदी बेकसूर को क्या मिलेगा मुआवजा?

संपादकीय
8 नवम्बर 2017


दिल्ली राजधानी क्षेत्र के एक बड़े अंग्रेजी स्कूल रयान इंटरनेशनल के एक बच्चे की हत्या से पूरे देश का मीडिया उस पर फोकस हो गया था, और हरियाणा में मौजूद इस स्कूल के एक कंडक्टर को वहां की पुलिस ने जनता के भारी दबाव के बीच गिरफ्तार भी कर लिया था। इसके बाद इस मामले की जांच सीबीआई को दे दी गई थी, और सीबीआई ने अब उसी स्कूल के ग्यारहवीं के एक छात्र को गिरफ्तार किया है जिस पर आरोप है कि उसने इम्तिहान आगे बढ़वाने के चक्कर में इस बच्चे की हत्या कर दी थी। अब सवाल यह खड़ा होता है कि इससे वह कंडक्टर बेकसूर साबित हो रहा है तो उसके इतने अपमान और उसकी इतनी प्रताडऩा के लिए कौन जिम्मेदार है?
यह बात पुलिस के मामले में जगह-जगह सामने आती है। कई जगह पुलिस सत्ता की साजिश में भागीदार बनकर इस तरह के काम करती है जो कि कुछ वक्त के लिए काम की रहती है, लेकिन अदालत में लंबे समय तक खड़ी नहीं होता। दूसरी किस्म के मामले रहते हैं मीडिया और जनता के दबाव में किसी को भी बकरा बनाकर पेश कर देना, और प्रदर्शन-दबाव को शांत करना। इसके बाद जब यह गिरफ्तारी गलत साबित होती है, तब प्रदर्शन करने वाले कहीं नहीं रहते, और यह असली मुजरिम की गिरफ्तारी तक के लिए एक बेकसूर को धांस देने का काम रहता है, और पुलिस कई बार सोच-समझकर यह काम करती है। बाद में जब झूठ साबित होता है, तो उस वक्त असली मुजरिम भी पकड़ा जा चुका रहता है, तो पुलिस की बदनामी काफी हद तक धुल जाती है। इस मामले में अगर सीबीआई ने भी कोई चूक नहीं की है, तो ऐसा ही कुछ हुआ दिख रहा है।
लोगों को याद होगा कि इसी दिल्ली में कई बरस से आरूषि हत्याकांड चले आ रहा है जिसमें उसके मां-बाप को ही लोवर कोर्ट ने सजा देकर जेल भेज दिया था, और अब हाईकोर्ट ने उन्हें बरी किया है। अपनी ही बच्ची की हत्या में अगर मां-बाप को बेकसूर होते हुए भी बरसों की सजा काटनी पड़े, तो ऐसी न्याय व्यवस्था पर धिक्कार है क्योंकि कहने के लिए तो न्याय व्यवस्था यह कहती है कि चाहे सौ गुनहगार छूट जाएं, एक भी बेकसूर को सजा नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब भी किसी बेकसूर को बदनामी और कैद के बाद रिहा होते देखा जाता है, तो फिर गुनहगारों की गिरफ्तारी भी  लोगों को फर्जी लगती है। ऐसी हालत में सरकार की तरफ से एक मुआवजे का इंतजाम होना चाहिए कि लोग अगर ऐसा नुकसान झेलते हैं, तो उनकी साख के नुकसान और उनकी जिंदगी की प्रताडऩा के एवज में उन्हें अदालत सरकार से एक मुआवजा दिलवाए। सरकार चाहे तो ऐसे मुआवजे के लिए कोई बीमा भी करवा सकती है ताकि देश में जब आखिरी अदालत से कोई फैसला हो जाए, तो उसके बाद लोगों को बेकसूरी पर मुआवजा मिले।
दूसरी बात यह कि मीडिया या जनता को भी यह समझना चाहिए कि जांच अधिकारियों पर अनावश्यक सार्वजनिक दबाव समाज के ही हितों के खिलाफ रहता है। असली मुजरिम खुले घूमते रहते हैं, जिनसे समाज को खतरा रहता है, और दूसरी तरफ किसी बेकसूर को पकड़कर जनदबाव को शांत करने के लिए जेल में ठूंस दिया जाता है। हम उम्मीद करते हैं कि दिल्ली की इस घटना से बाकी का देश भी एक सबक लेगा और पुलिस या किसी दूसरी जांच एजेंसी को वक्त का अल्टीमेटम देना बंद करेगा। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार