संपादकीय
9 नवम्बर 2017

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल बहुत समय बाद इस तरह का राजनीतिक तनाव हुआ कि कांग्रेस और भाजपा के बीच पथराव सड़कों पर देखने मिला। कांग्रेस नोटबंदी की बरसी मना रही थी, और उसके कार्यक्रम के मुकाबले भाजपा नोटबंदी की सालगिरह मना रही थी। ऐसे में दोनों के बीच पथराव कब और कैसे शुरू हुआ यह तो वीडियो रिकॉर्डिंग देखने से जाहिर होगा, लेकिन हमारा ख्याल है कि ऐसे मामले में सत्तारूढ़ पार्टी की जिम्मेदारी बड़ी रहती है क्योंकि प्रदेश में उसी की सरकार है, और कानून-व्यवस्था ठीक रखने का जिम्मा सरकार का रहता है। विपक्ष और सरकार इन दोनों के तेवर एक जैसे रहना ठीक नहीं है, क्योंकि विपक्ष की कोई सरकारी जवाबदेही नहीं रहती। आज छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के अलावा सड़कों पर प्रदर्शन और विरोध के स्तर पर जोगी कांग्रेस भी कहीं कम नहीं दिखती है, और कई शहरों में मुद्दों को उठाने में वह इन दोनों से आगे भी रहती है। ऐसे में चुनाव के पहले के बारह महीने से कम के दिन अगर ऐसा टकराव जगह-जगह देखेंगे तो पुलिस फिर केवल इसी में लगी रहेगी, और उसका बाकी काम धरा रह जाएगा।
आज प्रदेश और देश दोनों जगह भाजपा की सरकार है, और इस पार्टी को सत्तारूढ़ पार्टी होने के तौर-तरीके समझने चाहिए, और अधिक जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। राज्य में कांग्रेस को विपक्ष में चौदह बरस हो गए हैं, और इतने बरसों की किसी सरकारी गड़बड़ी के लिए, नाकामयाबी के लिए वह जवाबदेह नहीं है। दूसरी तरफ केन्द्र में यूपीए की सरकार गए तीन बरस हो गए हैं, और मोदी सरकार ने यूपीए की हर बात को खारिज करके सारे फैसले अपनी मर्जी से लिए हैं, इसलिए वाहवाही हो, या कि आलोचना, वह भी मोदी और भाजपा के ही हिस्से है। ऐसे में भाजपा सड़कों पर आकर अधिक कुछ साबित नहीं कर सकती। इस पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं से लेकर राज्य के नेताओं तक ने बार-बार कहा है कि पार्टी के कार्यकर्ता मतदाताओं तक जाकर अपनी सरकारों की कामयाबी उन्हें बताएं। यह बताना सड़कों पर पथराव से साबित नहीं हो सकता।
भाजपा की सरकार को भी यह समझना चाहिए कि इतनी लंबी सत्ता के बाद पार्टी के बहुत से नेता और कार्यकर्ता यह मानकर चलते हैं, और यह उम्मीद करते हैं कि वे कानून तोड़ सकते हैं, और पुलिस उनका कुछ नहीं बिगाड़ेगी। छत्तीसगढ़ के लिए कांग्रेस के प्रभारी पी.एल.पुनिया ने आज कहा भी है कि छत्तीसगढ़ की पुलिस भाजपा के नौकर की तरह काम कर रही है। यह बात केवल विपक्षी कांग्रेस करे, ऐसा भी नहीं है, प्रदेश में जगह-जगह जहां भी ढीले-ढाले पुलिस अफसर हैं, वहां ऐसा हो भी रहा है। भाजपा के लोग किसी अफसर को पीट रहे हैं, तो भी उनके खिलाफ रिपोर्ट लिखने की हिम्मत पुलिस में नहीं है। सत्तारूढ़ भाजपा और सरकार दोनों को यह समझना चाहिए कि रोजाना की तनातनी या रोजाना के जुर्म में पुलिस एक बार तो सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों की मदद कर सकती है, लेकिन इससे जनता की नजर में पार्टी और सरकार दोनों गिर जाते हैं। और इसके साथ-साथ दूसरा खतरा यह बढ़ते चलता है कि पार्टी से जुड़े बाकी लोगों का भी जुर्म का हौसला बढ़ जाता है।
राज्य सरकार को पुलिस को अधिक ईमानदारी से काम करने देना चाहिए, और अपनी पार्टी के लोगों को बचाने का काम नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह पुलिस मतदान के दिन आकर नाराज मतदाताओं के दिल बदलने का काम नहीं कर पाएगी। दोनों-तीनों पार्टियों को यह भी समझना चाहिए कि सड़कों पर तनातनी अगर नाजायज और नाटकीय है, तो जनता उसे भी समझती है, और वह मतदान के दिन इनको समझा भी देगी।
(Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार
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