चलो, कुछ अच्छी बात भी हो जाए, धरती के बचने की

   10  जून 2021

 टेक्नोलॉजी किस तरह जिंदगी बदलती है इसे देखना हो तो इन दिनों हिंदुस्तान के छोटे-छोटे शहर-कस्बों तक पहुंच चुके बैटरी से चलने वाले ऑटो रिक्शा देखने चाहिए। लॉकडाउन में जब बाजार बंद थे और फेरी वालों को सभी इलाकों में जाकर सब्जी और दूसरे सामान बेचने की छूट थी, तो उस दौरान ऐसे बैटरी ऑटो रिक्शा सब्जियों और फलों से लदे हुए घर-घर पहुंचते थे और बिना किसी शोर के, बिना किसी धुएं के आना-जाना करते थे। डीजल से चलने वाले ऑटो रिक्शा इस बुरी तरह आवाज करते हैं कि उन पर चलने वाली सवारियां तो इस शोर से थक ही जाती हैं, उनके ड्राइवर तो सुनने की ताकत धीरे-धीरे खोने लगते हैं, क्योंकि उन्हें पूरे वक्त ऑटो के उसी शोर में रहना पड़ता है। अब अगर इन दोनों किस्म के ऑटो के खर्च का फर्क देखें तो बैटरी का ऑटो रिक्शा हर बरस बदली जाने वाली बैटरी और रोजाना बिजली से उसकी चार्जिंग के बाद भी हर दिन सौ रुपये में 80 किलोमीटर चल जाते हैं, मतलब करीब-करीब एक रुपए में एक किलोमीटर। धुआं गायब, शोर गायब, ऑटो रिक्शा पर चलने वाले लोग इंसान की तरह चैन से बैठ सकते हैं। जिन लोगों को अभी तक बैटरी से चलने वाले ऑटो रिक्शा की अर्थव्यवस्था समझ नहीं आई है, उन्हें कुछ ऑटो चालकों से इस बात को समझना चाहिए और चौराहे पर जब रुकना पड़ता है तब इस फर्क को महसूस करना चाहिए कि आसपास अगर डीजल से चलने वाले आधा दर्जन ऑटो हैं तो क्या हालत होती है, और अगर आधा दर्जन बैटरी वाले ऑटो हैं तो कितनी कम दिक्कत होती है।

टेक्नोलॉजी ने दुनिया में बर्बादी भी कम नहीं लाई है लेकिन यही टेक्नोलॉजी इस बर्बादी को घटाने की ताकत भी रखती है। दुनिया के विकसित देशों में बड़ी-बड़ी गाडिय़ां रोजाना सैकड़ों किलोमीटर का सफर बैटरी से कर रही हैं, और बाकी देशों तक भी ऐसी गाडिय़ां पहुंच रही हैं। एक तरफ तो गाडिय़ों में बैटरी से चलने की टेक्नोलॉजी लगातार सुधर रही है और दूसरी तरफ बैटरी की क्षमता में सुधार भी लगातार किया जा रहा है। इससे जुड़ी हुई एक और बात बाकी है कि बैटरी को बिजली से चार्ज करने के बजाए सौर ऊर्जा से चार्ज करने की तकनीक भी विकसित होते चल रही है, और हो सकता है कि वह किसी दिन बिजली से चार्ज होने के बजाय सौर ऊर्जा से चार्ज होना अधिक सस्ता और आसान होने लगे। आज भी दुनिया के कई देशों में यह इंतजाम चल रहा है कि बैटरी से चलने वाली गाडिय़ां चार्जिंग स्टेशन पर जाकर सीधे बैटरी या बदल लेती हैं, चार्ज करने के लिए इंतजार नहीं करना पड़ता। इस तरह यह नए सेंटर चार्जिंग स्टेशन के बजाय बैटरी बदलने के सेंटर बन गए हैं। 

अब हिंदुस्तान में यह बात अधिक फैली तो नहीं है, लेकिन हो सकता है कि चुनिंदा शहरों से इसकी शुरुआत हो सके वहां जगह-जगह चार्जिंग स्टेशन लग सके, और बैटरी बदलने के सेंटर भी बदल सकें। जिस तरह गाडिय़ों में बैटरी डीजल और पेट्रोल के एक बेहतर रूप में सामने आई है उसी तरह जिंदगी के और बहुत से दायरों को भी देखने की जरूरत है कि वहां के परंपरागत सामानों से बेहतर और कम ऊर्जा खपत वाले दूसरे कौन से सामान आ सकते हैं जिन्हें बनाने में और इस्तेमाल करने में कार्बन फुटप्रिंट कम बढ़ता हो। जिस रफ्तार से इंसान ने धरती को बर्बाद करना शुरू किया, पहले तो ऐसी वैकल्पिक तकनीक से बर्बादी बढऩे की रफ्तार कम हो सकती है, और फिर धीरे-धीरे बर्बादी ही कम हो सकती है।

पर्यावरण दिवस तो निकल गया है लेकिन ऐसी तो कोई बात नहीं है कि उसके बाद पर्यावरण की फिक्र न की जाए, हम तो लॉकडाउन के इस पूरे दौर में आसपास जिस तरह बैटरी के ऑटो रिक्शा का चलन बढ़ते देख रहे हैं और गली मोहल्लों तक जाकर उनको बिक्री करते देख रहे हैं उसे इस मुद्दे पर लिखना सूझा और यह एक अलग बात है कि इससे पर्यावरण का बचाव होगा और ऐसी गाडिय़ां चलाने वाले लोग एक बेहतर जिंदगी भी पा सकेंगे। इसके साथ-साथ यह भी है कि डीजल-पेट्रोल का बैटरी-विकल्प आज भी सस्ता है और जैसे-जैसे बैटरी सस्ती होती जाएगी, वैसे-वैसे और सस्ता होते जाएगा। 

(Dailly Chhattisgarh)

सवाल अब कांग्रेस छोडऩे का नहीं है, उसमें बने रहने का है

  08 जून 2021

 उत्तर प्रदेश से सांसद रहे और यूपीए सरकार में मंत्री रहे जतिन प्रसाद आज कांग्रेस छोडक़र भाजपा में चले गए। यह दलबदल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के खासे पहले हुआ है, इसलिए इसे चुनाव के समय लिया गया फैसला नहीं कहा जा सकता, और न ही यह बंगाल, असम, केरल के चुनावों के ठीक पहले लिया गया है जिसे कि पार्टी, चुनाव में नुकसान पहुंचाने की बात कहे। अब दलबदल कोई बड़ा मुद्दा नहीं रहा और खासकर दूसरी पार्टियां छोडक़र भाजपा में जाने वाले इतने अधिक हो गए हैं कि बहुत से लोग मजाक में कहते हैं कि देश तो कांग्रेसमुक्त होते चल रहा है लेकिन भाजपा उसी रफ्तार से कांग्रेसयुक्त होते चल रही है। भाजपा में दूसरी पार्टियों से इतने अधिक लोग शामिल हुए हैं कि उनके प्रभाव क्षेत्र में भाजपा के पुराने परंपरागत नेता और कार्यकर्ता निराश होकर किनारे भी बैठने लगे हैं। 

लेकिन दलबदल का एक दूसरा नजारा बंगाल में देखने मिल रहा है, जहां पर तृणमूल कांग्रेस छोडक़र भाजपा में जाने वाले लोग अब सत्ता पर लौटने वाली ममता बनर्जी के बिना जीना मुश्किल है कहते हुए घरवापिसी की कतार में लगे हुए हैं। कुछ नेताओं के तो ऐसे बयान आए हैं कि वे ममता बनर्जी बिना जिंदा नहीं रह सकेंगे। आज अगर ममता पार्टी के दरवाजे खोल दे तो भाजपा विधायक दल का एक बड़ा हिस्सा तृणमूल कांग्रेस में लौट सकता है। लेकिन अभी अगले बरस उत्तर प्रदेश सहित दूसरे कई राज्यों में चुनाव होने हैं और उन चुनावों को लोकसभा के अगले चुनावों के पहले का रुझान भी माना जाएगा इसलिए ऐसी उम्मीद है कि चुनावी प्रदेशों में बड़ी संख्या में दलबदल होगा। और फिर जिस उत्तर प्रदेश के लिए आज दलबदल हुआ है, उस उत्तर प्रदेश में तो मायावती ने बसपा से इतने लोगों को पार्टी से निकाल दिया है कि भाजपा उनका भी शिकार कर सकती है। 

कांग्रेस के लोग तो अपनी पार्टी से थक-हारकर और निराश होकर अगर भाजपा या किसी दूसरी पार्टी में जाते हैं, तो वह कोई हैरान करने वाली बात नहीं होगी। इस पार्टी ने अपने जो तौर तरीके बना लिए हैं, उनके चलते हुए बहुत से लोग इसे छोड़ सकते हैं फिर चाहे उन्हें भाजपा या किसी और पार्टी से कुछ मिलने की उम्मीद हो या ना हो। आज मुद्दा भाजपा के करवाए हुए दलबदल का नहीं है, आज मुद्दा है कि कांग्रेस पार्टी अपने लोगों को संभाल कर रखने लायक क्यों नहीं रह गई है? पार्टी के दो दर्जन बड़े नेताओं ने पिछले बरस पार्टी के नियमित अध्यक्ष बनाने की मांग के साथ-साथ पार्टी के तौर-तरीके सुधारने की मांग भी की थी, लेकिन पार्टी ने उसके बाद वक्त गँवाने, लोग और सीट-वोट खोने के अलावा कुछ नहीं किया। बंगाल विधानसभा में आज कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हाथ भी सिर्फ दूसरे विधायकों के बदन के हिस्से की तरह रह गया है, एक भी पंजा छाप विधायक उस राज्य में नहीं रह गया जहां किसी वक्त कांग्रेस का राज हुआ करता था। 

कांग्रेस की बेहतरी चाहने वाले नेताओं की चिट्ठी को भी शायद साल भर होने आ रहा होगा या कुछ समय में साल पूरा हो जाएगा। पार्टी कितने विधानसभा चुनाव बिना किसी अध्यक्ष के, महज़ कार्यकारी अध्यक्ष के तहत लडक़र हार चुकी है। अभी भी पार्टी के अगले अध्यक्ष को चुनने का कोई ठिकाना नहीं दिख रहा है। पिछले महीने ऐसी खबर आई कि जून के अंत में पार्टी अध्यक्ष का चुनाव होगा और कुछ मिनटों में ही यह खबर आ गई कि कोरोना के चलते यह चुनाव नहीं होगा। यह पूरा सिलसिला कांग्रेस के बहुत से लोगों को निराश कर रहा है क्योंकि अगर पार्टी की लीडरशिप वाला परिवार ही देश के ऐसे नाजुक मौके पर अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से कतरा रहा है, न खुद अध्यक्ष बन रहा है न किसी और को निर्वाचित होने दे रहा है, तो ऐसे में कांग्रेस के बहुत से नेता देश के हित में और अपने हित में अपनी राजनीति को तय करने पर मजबूर तो होंगे ही। 

दरअसल राजनीति में एक बार आने के बाद उससे संन्यास लेना शायद ही किसी से हो पाता है। इसलिए कांग्रेस अगर आज अपनी लीडरशिप का सवाल हल नहीं कर पा रही है, तो उसके बहुत से नेताओं को अपने भविष्य का सवाल हल करना पड़ेगा। जतिन प्रसाद अगले बरस के विधानसभा चुनावों के पहले के एक संकेत की तरह हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने घर को सुधारना चाहिए क्योंकि आज उसकी जो हालत है उसमें उस पार्टी में बने रहने वाले लोगों को लेकर यह हैरानी हो सकती है कि वे अब भी किस उम्मीद से वहां पर हैं? आज सवाल भाजपा का किसी का शिकार करके ले जाने का नहीं है, आज तो सवाल यह है कि कांग्रेस में बचे हुए लोग किस उम्मीद से वहाँ बचे हुए हैं? और देश के लोकतंत्र की आज की इस नौबत में देश की यह ऐतिहासिक पार्टी अपनी जिम्मेदारी से क्यों कतरा रही है? कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हुए राहुल गांधी के ही दोबारा अध्यक्ष बनने की चर्चा उनके इस्तीफे के समय से लगातार चल रही है, लेकिन राहुल अपना इरादा साफ ही नहीं कर रहे हैं। इस परिवार में तीन लोग हैं और अगर परिवार से ही लीडरशिप तय होनी है तो उसे घर बैठकर तय कर लेना चाहिए। इतने बड़े देश में इतने चुनावों के आते-जाते हुए भी अगर कांग्रेस पार्टी और यह परिवार इस तरह जिम्मेदारी से कतरा रहे हैं तो इससे लोकतंत्र का नुकसान अधिक बड़ा है, कांग्रेस के पास तो शायद अब नुकसान के लायक कुछ बचा नहीं है। देखें आगे क्या होता है।

(Dailly Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 9 जून 2021


 

बात की बात, 8 जून 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 8 जून 2021


 

 08 जून 2021

 दुनिया में लोग किसी के बारे में राय तय करते हुए उसके परिवार को बड़ा वजन देते हैं कि वे किस परिवार के हैं। अब ऐसे में आज की एक खबर दिल को थोड़ी सी तकलीफ देती है कि दक्षिण अफ्रीका में एक अदालत ने महात्मा गांधी की पड़पोती को एक कारोबारी धोखाधड़ी के मामले में 7 साल की कैद सुनाई है। गांधी के किसी वंशज को किसी जुर्म में सजा सुनाई जाए, यह बात गांधी का सम्मान करने वाले लोगों को तकलीफ तो पहुंचाती है, लेकिन गांधी की आत्मा भी अपने बाद की तीसरी-चौथी पीढ़ी तक लोगों की नीयत और उनके कामकाज पर काबू तो नहीं रख सकती। फिर यह भी है कि गांधी का डीएनए होने से लोगों के ऊपर वैसे भी उम्मीदों का बहुत बोझ रहता है, जिन्हें ढोते हुए जीना मुश्किल रहता है, ऐसे में अगर वंशज थक-हारकर उसकी फिक्र करना छोड़ दें, गांधी की विरासत की साख की फिक्र करना छोड़ दें, और आम इंसान जिस तरह रहते हैं, उस तरह जीने लगें, तो उसमें भी कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। बहुत से लोग बड़ी ऊंची साख वाली विरासत से परे कुछ ऐसे काम कर बैठते हैं जो यह बात साबित करते हैं कि डीएनए कुछ भी नहीं होता। लोग अपनी मर्जी से काम करते हैं, और देखने वाले उन्हें उनके पुरखों की साख से जोडक़र देखने की कोशिश करते हैं, जो कोशिश हर बार कोई नतीजा पेश नहीं कर पाती।

दुनिया के तमाम लोकतंत्रों में कानून तकरीबन सभी लोगों के लिए एक सरीखे रहते हैं। महात्मा गांधी बहुत महान थे लेकिन उनके नाम की कोई रियायत उनके वंशजों को उनके काम के लिए देना भी नाजायज और अलोकतांत्रिक होगा। खुद गांधी ऐसी किसी रियायत के खिलाफ अनशन पर बैठ जाएंगे। इसलिए लोगों को साख का वारिस मानना सिरे से ही गलत बात है। लोग दौलत के वारिस हो सकते हैं, डॉक्टर और वकील जैसे पेशे में आने वाली पीढ़ी अपने मां-बाप के पेशेवर कामकाज की वारिस भी हो सकती है, लेकिन साख की वारिस नहीं हो सकती। गांधी के बहुत से वंशज दक्षिण अफ्रीका में बसे हुए हैं जहां पर गांधी का एक वकील से महात्मा बनने का सफर शुरू हुआ था, जब उन्हें एक ट्रेन सफर से लात मारकर उतार दिया गया था। उस देश में गांधी के कई वंशज उसी वक्त से अभी तक चले आ रहे हैं, और जैसा कि जाहिर है गांधी विरासत में कोई कारोबार तो छोड़ नहीं गए थे कि जिस पर वंशज जिंदा रह सकें, इसलिए वंशजों ने अपने-अपने हिसाब से सामाजिक काम किए, और कारोबारी काम भी।

साख की विरासत बड़ा मुश्किल काम है। देश के एक सबसे बड़े लोकतांत्रिक नेता जवाहरलाल नेहरू के नाती संजय गांधी जवाहर की पार्टी के ही सर्वेसर्वा थे, और जवाहर की बेटी के राजनीतिक वारिस भी थे। लेकिन इंदिरा गांधी का भावनात्मक दोहन करके संजय गांधी ने हिंदुस्तानी इतिहास की सबसे अधिक लोकतांत्रिक बात इमरजेंसी लागू करवाई थी, और फिर उस पूरे दौर में जो कुछ किया था, वह इंदिरा को अपने नाम पर कलंक लगा हो या ना लगा हो, वह कांग्रेस पार्टी और नेहरू के नाम पर बहुत बड़ा कलंक था क्योंकि परिवार तो नेहरू का ही गिना जाता था। और नतीजा यह निकला कि नेहरू के नाती की बददिमागी ने नेहरू की बेटी का राजनीतिक भविष्य चौपट कर दिया, इंदिरा गांधी पूरे देश में अपनी पार्टी और सरकार की संभावनाओं को खो बैठीं। संजय गांधी की मौत एक हवाई हादसे में हुई थी और उसका नतीजा यह निकला कि उनके बड़े भाई राजीव गांधी को पायलट की नौकरी छोडक़र राजनीति में आना पड़ा। अब यह कल्पना करना कुछ मुश्किल है कि अगर वह हवाई हादसा नहीं हुआ होता, तो आज कांग्रेस पार्टी का, और इस देश का क्या हुआ होता? 

जिन लोगों को आपातकाल लगाने का फैसला याद है और आपातकाल की ज्यादतियां याद हैं, उस दौर में संजय गांधी के गिरोह की तानाशाही और मनमानी याद है, वे भी आसानी से यह कल्पना नहीं कर सकते कि अगर संजय गांधी एक हादसे के शिकार होकर भारतीय राजनीति से मिट न गए होते तो क्या हुआ होता? और यह बात सोचना जरूरी इसलिए है कि संजय के रहते-रहते भी इंदिरा गांधी 1980 में सत्ता में आ गई थीं। आपातकाल के बाद इंदिरा को शिकस्त देने वाली जनता पार्टी की सरकार कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाई थी। और यह भी याद रखने की जरूरत है कि जब कांग्रेस की यह वापसी हुई, उस वक्त संजय गांधी कांग्रेस के एक सबसे बड़े और सबसे ताकतवर नेता तो थे ही, वे इंदिरा गांधी के राजनीतिक वारिस भी समझे जा रहे थे। लेकिन एक वारिस की हरकतें और करतूतें ऐसी थीं कि हादसे का शिकार होने वाले संजय गांधी को भी आज कांग्रेस पार्टी याद करने की हिम्मत नहीं करती। कांग्रेस के कार्यक्रमों में और बहुत से लोगों के लिए तो श्रद्धांजलि के कार्यक्रम हो जाते हैं, लेकिन हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में देखते हैं कि नालियों के बीच में एक बहुत खराब जगह पर बिठा दी गई संजय गांधी की आधी प्रतिमा को खुद कांग्रेसी देखने नहीं जाते। 

इसलिए साख की कोई ऐसी विरासत नहीं होती कि  आने वाली पीढिय़ां उस साख की हकदार बनाई जा सकें, जिसे उनके पुरखों ने मेहनत से हासिल किया था। चुनावी राजनीति में जरूर कुछ लोग अपने पुरखों की साख दुहने की कोशिश कर लेते हैं, लेकिन पुरखों की साख किसी के जुर्म में रियायत पाने का सामान नहीं बन पाती, बल्कि समाज ऐसे लोगों की सजा तय करते हुए कुछ अधिक ही कडक़ बन जाता है कि इन्होंने पुरखों का नाम डुबा दिया। इसलिए गांधी की पड़पोती को एक कारोबारी जालसाजी के लिए 7 वर्ष की कैद होना गांधी को हॅंसी का सामान नहीं बनाता। नाथूराम गोडसे के पिता को यह मालूम नहीं था कि उनका बेटा देश का सबसे बड़ा हत्यारा बन जाएगा, अगर ऐसा एहसास रहता तो शायद वे औलाद पैदा करने से परहेज ही करते। इसलिए गांधी का नाम डुबाने वाले दिखते हुए उनके वंशज असल में उनका नाम नहीं डुबा रहे, अपना खुद का नाम डूबा रहे हैं। पुरखों का नाम तो बनाने और बिगडऩे से परे हो जाता है। तीसरी-चौथी पीढ़ी में किसी के किए हुए काम से ना तो पुरखों का नाम रोशन होता और ना पुरखों के नाम पर कालिख पुतती। 

(Dailly Chhattisgarh)


सोशल मीडिया पर झूठ आगे बढ़ाना भी उतना ही बड़ा जुर्म, सम्हलें

  07 जून 2021

 मशहूर फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार अस्पताल में भर्ती हैं और पिछले बरसों में भी हर कुछ महीनों में अस्पताल जाते हैं, और ठीक होकर घर लौटते हैं। उम्र भी इतनी हो गई है कि बीमारी पीछा ही नहीं छोड़ती है। और उन्हें चाहने वाले इतने हैं कि वे भी पीछा नहीं छोड़ते हैं। एक से अधिक बार उनके गुजर जाने की अफवाहें फैलीं। लोगों ने सोशल मीडिया की मेहरबानी से एक की पोस्ट को आगे बढ़ाते हुए दिलीप कुमार के गुजरने के पोस्टर तक बना लिए, और उन्हें लोगों ने सोशल मीडिया और व्हाट्सएप जैसे मैसेंजर की मेहरबानी से खूब आगे बढ़ा दिया। अब उनके परिवार की तरफ से लोगों से अपील की गई है कि उनकी तबीयत के बारे में ट्विटर पर पोस्ट किया जाएगा, और लोग अपने मन से गलत जानकारी आगे न बढ़ाएं।

यह बात महज़ दिलीप कुमार के साथ हो रही हो ऐसा नहीं है, सोशल मीडिया ने लोगों को यह ताकत दे दी है कि वे पल भर में ही किसी का पोस्ट किया हुआ सच या झूठ अपने एक भी शब्द को जोडऩे की जहमत उठाए बिना आगे बढ़ा सकते हैं, और फिर मजे से बैठकर यह देख सकते हैं कि कितने लोग उन्हें रीपोस्ट कर रहे हैं, कितने लोग उनके पोस्ट पर कुछ लिख रहे हैं। लोग आज वैसे भी कारोबार और काम के बिना पिछले एक बरस से थके हुए से घर बैठे हैं, या बहुत कम काम कर रहे हैं, और ऐसे में सोशल मीडिया उनके लिए बड़ा सहारा है। फिर बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि कुछ मौलिक नहीं लिख पाते, 2 वाक्य भी सही नहीं लिख पाते, ऐसे में उन्हें दूसरों के पोस्ट किए हुए को आगे बढ़ाकर अपने सोशल मीडिया पेज पर कुछ न कुछ पेश करना एक अलग किस्म की उपलब्धि लगती है। ऐसे लोग बड़ी तेजी से झूठी खबर, सनसनीखेज बातें, गढ़ी गई तस्वीर या गढ़े गए वीडियो आगे बढ़ाते हैं। मनोविज्ञान की मामूली समझ कहती है कि घर में जिनकी कोई नहीं सुनते होंगे, वे सोशल मीडिया पर अधिक सुनाते होंगे। 

सोशल मीडिया ने हर किसी को ऐसा लोकतांत्रिक अधिकार दिया है कि वे मनचाही बातों को तब तक पोस्ट कर सकते हैं जब तक कि देश का कानून उन्हें  जुर्म के लेबल के साथ ब्लॉक करवाने की कार्यवाही शुरु ना करें, इसके पहले आमतौर पर उन्हें कोई ब्लॉक नहीं करते। हाल के महीनों में फेसबुक ने जरूर कुछ किस्म की बातों को ब्लॉक करना शुरू किया है, लेकिन शायद उसकी हिंदी भाषा की समझ कम है, या उसका कंप्यूटर हिंदी के शब्दों के गलत मतलब समझता है, और बहुत सी मासूम बातें भी ब्लॉक कर दी जा रही हैं। लेकिन इनके मुकाबले गलत और झूठ को आगे बढ़ाने वाले लोग लाख गुना हैं। बहुत से जानकार लोग बतलाते हैं कि कुछ राजनीतिक दल अपने भाड़े पर रखे गए साइबर सैनिकों से रात-दिन मनचाही पोस्ट करवाते हैं, किसी को धमकियों से कुचलवा देते हैं, तो किसी को भगवान बना देते हैं। अब किसी को भगवान बनाने पर न तो कानूनी रोक है, और न ही सोशल मीडिया के कंप्यूटरों को उससे कोई दिक्कत होती है। लेकिन जिम्मेदार लोगों को सोशल मीडिया पर न सिर्फ अपने स्तर पर सावधानी बरतनी चाहिए बल्कि जहां कहीं किसी झूठी बात को, गलत जानकारी को देखें, उसका सार्वजनिक रूप से विरोध भी करना चाहिए। 

हो सकता है कि कुछ लोग बिना सही जानकारी के और बिना किसी बदनीयत के भी गलत बातें पोस्ट करते हों, लेकिन उनको भी चौकन्ना करना इसलिए जरूरी है कि किस दिन वे ऐसी बेवकूफी या मासूमियत के साथ भी जेल चले जाएं, इसका कोई ठिकाना नहीं है। अखबारों में छपने का जमाना लद गया, मानहानि के कानून बहुत धीमी रफ्तार से चलने वाली अदालतों में बरसों चलते थे, और सजा के ठीक पहले आमतौर पर समझौता भी हो जाता था, लेकिन सूचना तकनीक जितनी तेज रफ्तार है, उसके लिए कानून भी उतना ही कड़ा बना है। बात की बात में किसी के खिलाफ जुर्म दर्ज हो जाता है, और इन दिनों तो लोगों की धार्मिक भावनाएं, राजनीतिक भावनाएं, सामाजिक भावनाएं, सब बहुत तेजी से भडक़ रही हैं। ये सब भावनाएं पेट्रोल बन चुकी हैं और उनमें तेजी से आग लग जाती है। इसलिए आज लोगों को न केवल खुद सावधान रहना चाहिए बल्कि अपने शुभचिंतकों को सावधान करना भी चाहिए कि वे लापरवाही से कुछ भी पोस्ट न करें क्योंकि अदालत ऐसी किसी मासूमियत पर कोई भरोसा नहीं करती, अदालत में तो लोग अपने लिखे और पोस्ट किए हुए के लिए पूरी तरह से जवाबदेह रहते हैं। 

लोगों को सोशल मीडिया पर कुछ न कुछ पोस्ट करने की हड़बड़ी से बचना चाहिए। ऐसी कोई बंदिश किसी पर नहीं रहती कि अगर वे हर दिन दो-चार चीजें पोस्ट नहीं करेंगे तो उनका अकाउंट बंद हो जाएगा। इसलिए लोगों को बहुत सावधानी से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना चाहिए, वहां वे ना सिर्फ जुर्म के शिकार हो सकते हैं बल्कि अपनी बेवकूफी में किसी जुर्म के भागीदार भी हो सकते हैं। किसी और ने कोई गलत बात पोस्ट की है, इसलिए आप भी उसे आगे बढ़ा सकते हैं, कानून ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसलिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल जितना ही यह भी सीख लेना चाहिए कि किसी बात को इंटरनेट पर ही कैसे ढूंढ लिया जाए कि वह सच है या नहीं। हम हर दिन ऐसे दर्जनों बड़े जानकार और समझदार लोगों को देखते हैं जो किसी झूठ को सच समझकर उसे आगे बढ़ाते रहते हैं। लोग कुछ वक्त लगाकर सीखें कि कैसे हर बात को परखा जा सकता है कि वह सच है या झूठ। 

(Dailly Chhattisgarh)

कहावत-मुहावरों के कई पन्ने पूरी तरह नाजायज, खत्म हों

  जून  2021


थाईलैंड के एक विश्वविद्यालय में लैब्राडोर नस्ल के कुत्तों को ट्रेनिंग दी जा रही है कि वह लोगों को सूंघकर यह पता लगा लें कि वे कोरोना पॉजिटिव हैं या नहीं। अभी वैज्ञानिकों को प्रयोग के स्तर पर जो नतीजे मिले हैं उनके मुताबिक कोरोना की प्रारंभिक जांच, रैपिड टेस्ट से मिलने वाले नतीजों के मुकाबले कुत्तों के पहचाने गए नतीजे अधिक सही निकल रहे हैं। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि अगर बड़ी संख्या में कुत्तों को प्रशिक्षित किया जा सका तो उन्हें भीड़ की जगहों पर, स्टेडियम, रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट पर तैनात करके कोरोना के मरीजों को पहचाना जा सकेगा। अभी थाईलैंड के अलावा फ्रांस, ब्रिटेन, चिली, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, और जर्मनी में भी कुत्तों को ऐसा प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 

यह तो लोगों ने पहले से देखा हुआ है कि किसी जुर्म के होने पर मुजरिम की तलाश के लिए पुलिस अपने प्रशिक्षित कुत्ते को लेकर पहुंचती है, जो बहुत से मामलों में मौके को सूंघकर और जाकर मुजरिम को पकड़ भी लेते हैं. इसी तरह एयरपोर्ट और दूसरी जगहों पर प्रशिक्षित कुत्ते सूंघकर विस्फोटकों को पकड़ लेते हैं, और नशीले पदार्थों को पकड़ लेते हैं। हालत यह है कि किसी जुर्म की जगह पर अगर पुलिस पहुंचे तो लोगों को ठीक से भरोसा नहीं होता है कि जांच हो पाएगी या नहीं, लेकिन पुलिस का कुत्ता पहुंच जाए तो लोगों का भरोसा हो जाता है कि मुजरिम पकड़ में आ जाएंगे।

इन बातों से परे बहुत सी दूसरी जगहों पर कुत्तों का इस्तेमाल हो रहा है, वे किसी भूकंप में गिरी इमारतों, या किसी हवाई हमले में गिरी इमारतों के मलबे में से लोगों को तलाशने में भी बचाव कर्मियों की मदद करते हैं, जिंदा या मुर्दा लोगों का पता गंध से ही लगा लेते हैं, ताकि कम मेहनत में उन तक पहुंचा जा सके। बहुत से प्रशिक्षित कुत्ते ऐसे हैं जो नेत्रहीन लोगों के साथ चलते हैं और उनके गाइड का काम करते हैं। इसी तरह बीमार लोगों की पहियों वाली कुर्सी को खींचकर ले जाने का काम भी कुछ कुत्ते करते हैं और दुनिया का इतिहास ऐसी सच्ची कहानियों से भरा हुआ है जहां मालिक के गुजर जाने पर उनके पालतू कुत्ते वर्षों तक उनकी समाधि पर रोज आते रहे या वहां डेरा डालकर बैठे रहे।

दिक्कत यह है कि घर की चौकीदारी करने के मामले में सबसे वफादार प्राणी माना जाने वाला कुत्ता इंसान के लिए सबसे आसान और सहज गाली की तरह भी इस्तेमाल होता है। वैसे तो इंसान अपनी कहावतें और मुहावरों में अनंत काल से अपने से परे तमाम किस्म के प्राणियों को गालियों की तरह इस्तेमाल करते आए हैं, लेकिन कुत्तों के ऊपर इंसानों की कुछ खास मेहरबानी है। ऐसा शायद इसलिए भी है कि कुत्ता सबसे अधिक प्रचलित पालतू प्राणी है, और सबसे अधिक वफादार भी समझा जाता है। जो सबसे अधिक वफादार हो उसे सबसे जल्दी गाली बना लेना इंसान के हिसाब से देखें तो कोई अटपटी बात नहीं है, इंसान होते ही ऐसे हैं कि जो उनके सबसे अधिक काम आए उन्हें वह गालियों की तरह इस्तेमाल करें। 

अब अगर हिंदी भाषा में कहावतें और मुहावरों को देखें तो कुत्ते को लेकर सबसे ही खराब गालियां बनाई जाती हैं। जब किसी को बद्दुआ देनी हो तो कहा जाता कि वे कुत्ते की मौत मरेंगे, और यह कहने के मतलब बूढ़ा होकर स्वाभाविक मौत नहीं होता, यह रैबीज के शिकार तड़पकर मारने वाले कुत्ते होते हैं।  जब किसी इंसान के मां-बाप को गाली देनी हो तो हिंदी फिल्मों में आमतौर पर उन्हें कुत्ते के पिल्ले या कुतिया के पिल्ले कहा जाता है, और धर्मेंद्र तो कुछ अधिक हिंसक होकर यह भी बोलते आए हैं कि कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा। एक और फिल्मी डायलॉग तो एक लतीफे में बदल चुका है, फिल्म शोले में धर्मेंद्र हेमा मालिनी से कहते हैं कि बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना। इसे लेकर कई कार्टून बने हैं जिनमें कुत्तों की पूरी टोली जाकर किसी से पूछते हुए दिखती है कि हममें क्या कमी है जो बसंती को हमारे सामने नाचने से मना किया जा रहा है? अब बसंती जिन कुत्तों के सामने ना नाचे और जिन कुत्तों का वीरू खून पी जाए, उनसे अब इंसान यह उम्मीद करते हैं कि वे अपनी जान खतरे में डालकर इंसानों के लिए एक काम और करें, और कोरोना के मरीज पकड़ें। 

अब तक कुत्ते जमीनी सुरंग ढूंढ लेते हैं, दूसरी जगहों पर विस्फोटक ढूंढते हैं, हत्यारे और डकैत ढूंढते हैं, नशे के सौदागरों को पकड़ते हैं, नशीले पदार्थों का जखीरा कहीं हो तो उसे पकड़ते हैं, और बदस्तूर गालियां खाते चलते हैं और नए-नए काम करना सीखते चलते हैं। यानी फौजी, पुलिस, बचाव कर्मी, होने के साथ-साथ अब कुत्ते पैथोलॉजिस्ट,  डॉक्टर का काम भी करने लगे हैं, इसलिए इंसानों को एक बार सोचना चाहिए कि क्या कुत्ते को लेकर बनाई गई गालियों में से कुछ गालियों को कम करना जायज नहीं होगा?

इंसान कुत्तों के ऊपर ही इतनी सारी गालियां क्यों बनाते हैं, और कुत्तों को लेकर ही इतनी सारी कहावतें और मुहावरे क्यों गढ़े गए थे इस बारे में सोचें तो ऐसा लगता है कि कुत्ते अपनी वफादारी से और अपनी दूसरी खूबियों से इंसानों के मन में एक गहरी हीन भावना पैदा कर देते हैं, जो कि पहला मौका मिलते ही वफादारी को फेंककर करीबी लोगों की पीठ में छुरा भोंकने में लग जाते हैं। अब हाल के बरसों में हिंदुस्तान में एक पार्टी छोडक़र दूसरी पार्टी में जाने वाले लोगों को देखें, किसी पार्टी या विचारधारा के साथ उनकी बेवफाई देखें, उनकी गद्दारी देखें, तो यह जाहिर है कि किसी भी वफादार प्राणी को देखकर उनके मन में हीनभावना तो आएगी ही। कुछ ऐसा ही सिलसिला जिंदगी के अलग अलग दायरों में अनंत काल से चले आ रहा होगा जब इंसानों को अपनी बेईमानी, अपने धोखे के बाद जब कुत्ता दिखता होगा, तो लगता होगा कि उनसे तो कुत्ता बेहतर है जो आसपास के लोगों को धोखा नहीं देता। शायद उसी वक्त ऐसी कहावतें और ऐसे मुहावरे गढ़े गए होंगे।

हिंदी में कहावत और मुहावरों की सबसे प्रतिष्ठित किताब को देखें तो उसमें कुत्तों पर सैकड़ों लोकोक्तियां बनी हुई हैं, और हर एक के मतलब में यह लिखा हुआ है कि वह नीच व्यक्ति, बुरे व्यक्ति, दुष्ट और पापी के लिए बनाई गई हैं। अब इंसान अपने भीतर के सबसे बुरे लोगों के लिए कुत्तों पर ही दर्जनों कहावत बनाकर बैठा है, और अपनी हर मुसीबत, और अब तो सबसे खतरनाक जानलेवा बीमारी से बचने, के लिए भी वह कुत्तों को झोंक रहा है। सबसे वफादार को इस तरह खतरे में डालकर क्या इंसान को किताबों में दर्ज कुत्तों के खिलाफ किसी भी गाली को इस्तेमाल करने का नैतिक अधिकार बचता है?
 (Daily Chhattisgarh)

दिल्ली में उठा मलयालम जुबान के आत्मगौरव का दिलचस्प मुद्दा

 06 जून 2021

 दिल्ली के एक प्रमुख सरकारी अस्पताल गोविंद बल्लभ पंत इंस्टीट्यूट आफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च ने अभी एक नया विवाद खड़ा कर दिया, जब उसके नर्सिंग सुपरिटेंडेंट की तरफ से नर्सों के लिए एक आदेश जारी हुआ कि वे ड्यूटी पर रहते हुए सिर्फ हिंदी या अंग्रेजी में बात करें. उनके खिलाफ किसी मरीज ने शिकायत की थी कि वे आपस में मलयालम में बात करती हैं और इससे दूसरे सहकर्मियों को और मरीजों को असुविधा महसूस होती है और वह अपने को असहाय महसूस करते हैं क्योंकि वह इस भाषा को नहीं जानते। क्योंकि नर्सों में बड़ी संख्या मलयालम बोलने वाली नर्सों की है, इसलिए यह नौबत आती है, और दिल्ली में अधिकतर मरीज और बहुत से दूसरे अस्पताल कर्मचारी इस भाषा को नहीं जानते। इस पर तुरंत ही केरल से लोकसभा सदस्य बने राहुल गांधी ने विरोध किया और केरल की राजधानी के लोकसभा सदस्य शशि थरूर ने भी ट्विटर पर इस चिट्ठी को डालकर इसके खिलाफ लिखा। यह नाराजगी देखते हुए अस्पताल प्रशासन ने इस आदेश को वापस ले लिया और यह भी साफ किया कि यह आदेश नीचे के स्तर पर निकाल दिया गया था, और अस्पताल के प्रमुख प्रशासन को इसकी जानकारी भी नहीं थी।

अब यह मामला एक किस्म से खत्म हो चुका है क्योंकि यह आदेश वापस लिया जा चुका है, लेकिन एक दूसरे हिसाब से इस पर चर्चा होनी चाहिए कि अस्पताल में मरीजों के बीच डॉक्टरों और कर्मचारियों को किस जुबान में बात करनी चाहिए। दिल्ली क्योंकि देश की राजधानी है इसलिए वहां पर तो देश के हर हिस्से से आए हुए लोग रहते हैं और जरूरत होने पर अस्पताल में भर्ती भी होते हैं, इसलिए हर मरीज की समझ में आने वाली जुबान में बात करना तो मुमकिन नहीं है, लेकिन दिल्ली वह जगह है जहां पर अस्पतालों के बहुत से दूसरे कर्मचारी और बहुत से दूसरे डॉक्टर हिंदी या अंग्रेजी में बात करते होंगे, उनमें से कुछ लोग दिल्ली की अपनी स्थानीय जुबान पंजाबी में भी बात करते होंगे। यह बात सही है कि अस्पताल के बहुत से कर्मचारियों और अधिकतर मरीजों के लिए मलयालम को जरा भी समझ पाना मुमकिन नहीं है। इसलिए अगर किसी स्तर पर यह तय किया गया कि ड्यूटी पर रहते हुए नर्सें हिंदी या अंग्रेजी में ही बात करें, तो उसके पीछे के तर्क को भी समझने की कोशिश करनी चाहिए। 

अस्पताल में जब मरीज भर्ती रहते हैं तो वह एक अलग किस्म की दहशत में रहते हैं, और पिछले डेढ़ बरस से तो कोरोना से न सिर्फ मरीज, बल्कि घर बैठे हुए सेहतमंद लोग भी दहशत में हैं और बड़ी खराब मानसिक हालत से गुजर रहे हैं। ऐसे में अगर अस्पताल के बिस्तर पर मरीज को आसपास नर्सों को एक ऐसी जुबान में बात करते देखना सुनना पड़े जिसे कि वे ना समझ सके, तो इससे उनकी बेचैनी बढऩा बहुत स्वाभाविक है। फिर यह भी है कि अस्पताल में ड्यूटी पर मौजूद नर्सों को उस दौरान एक-दूसरे से जो बात करनी है वह अधिकतर तो मरीजों के बारे में या अस्पताल की दूसरी बातों के बारे में ही रहेंगी, निजी बातें तो बहुत ही कम होंगी। इसलिए अगर किसी इलाके में आम प्रचलित भाषा में बात करने की उम्मीद अगर किसी से की जाती है तो उसे उनकी अपनी मातृभाषा के अपमान के रूप में देखना गलत होगा। अगर केरल के किसी अस्पताल में पंजाब की आधा दर्जन नर्सें हों, और वे वहां पंजाबी में बात करने लगें, तो वहां भर्ती सिर्फ मलयालम या अंग्रेजी जानने वाले मरीजों का मन बेचैनी और आशंका से भर जाएगा कि वह जाने क्या बात कर रही हैं. अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिए सिर्फ दवाइयां ही इलाज नहीं होतीं, डॉक्टर और नर्सों का व्यवहार भी इलाज होता है. मेडिकल साइंस में यह सिखाया भी जाता है कि मरीजों की बेचैनी कम करना किस तरह डॉक्टरों और नर्सों की जिम्मेदारी है। 

यह भी समझने की जरूरत है कि जब लोगों को ना समझने वाली किसी भाषा के बीच अधिक समय तक रहना पड़ता है, तो इससे उनके बीच, उनके मन में एक थकान आने लगती है। जब चीनी भाषा ना समझने वाले लोग चीन के दौरे पर रहते हैं और वहां सार्वजनिक जगहों पर दूसरे लोगों को सिर्फ चीनी भाषा में बात करते देखते हैं तो पर्यटकों के बीच एक, लैंग्वेज फटीग, थकान आने लगती है। और फिर पर्यटक तो एक दिलचस्प और मजेदार मकसद से गए हुए लोग रहते हैं, इसलिए वे एकदम से किसी आशंका से नहीं भर जाते, लेकिन अस्पताल में भर्ती मरीज तो अपनी खुद की सेहत के लिए भर्ती रहते हैं और जब आसपास नर्सेज मलयालम में बात करें तो उस भाषा को ना समझने वाले मरीज यही समझते रहेंगे कि उनके बारे में जाने क्या बात हो रही है। 

हम किसी एक भाषा के हिमायती नहीं हैं, और अगर हिंदुस्तान में अपने प्रदेशों से बाहर गए हुए लोग टूटी-फूटी भाषा में भी कोई दूसरी भाषा या बोली बोलते हैं तो भी वह काफी है, उनसे लोग बहुत शुद्ध व्याकरण की उम्मीद भी नहीं करते। इतना जरूर है कि जिस जगह पर काम करना है, उस जगह की प्रचलन की भाषा को सीख लेना एक अतिरिक्त फायदे का काम होता है। क्योंकि मलयालम बोलने वाली नर्सें अंग्रेजी बोल सकती हैं, इसलिए अगर अस्पताल ने उनसे अंग्रेजी या हिंदी में बात करने की उम्मीद की है, तो यह मरीजों के हित में देखने की जरूरत है, न कि इसे मलयालम के विरोध के रूप में देखने की. हम तो हिंदुस्तान के किसी भी कोने में दूसरे प्रदेशों से गए हुए डॉक्टरों और गई हुई नर्सों के बारे में इसी तर्क को सही मानेंगे कि वह मरीजों और दूसरे जुबान वाले सहकर्मियों के बीच ऐसी आम भाषा में बोले जिसे सब जानते हैं या अधिकतर लोग जानते हैं।

इसकी एक दूसरी मिसाल यह भी है कि बहुत से परिवारों में कुछ लोग एक अलग किस्म की जुबान विकसित कर लेते हैं और वे हर शब्द के आगे-पीछे कुछ अक्षर लगाकर बोलते हैं जिन्हें समझने वाले ही समझ पाते हैं। ऐसे परिवारों में जो लोग ऐसी अनोखी जुबान नहीं समझते वे अपने-आपको उपेक्षित और अपमानित पाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी मौजूदगी में लोग ऐसी बातें कर रहे हैं जो उन्हें बताना नहीं चाहते हैं। यह सिलसिला किसी का विश्वास जीतने में मदद नहीं कर सकता, यह सिलसिला लोगों के विश्वास को खोने का है, दिल्ली के अस्पताल ने चाहे जो समझ कर अपना फैसला वापस लिया हो, हम किसी भी प्रदेश में बाहर से आकर काम करने वाले दूसरी जुबान के लोगों से यह उम्मीद करेंगे कि वे लंबे समय तक अगर काम कर रहे हैं तो वह आपस में भी स्थानीय जुबान को समझने और बोलने की कोशिश करें और अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो हिंदुस्तान के किसी भी प्रदेश में आम प्रचलन की हिंदी और अंग्रेजी से काम चलाएं। जहां लोगों को अपने काम के दौरान दूसरों से मिलना रहता है, उनके बीच रहना है,  वहां उनका विश्वास जीतने में कोई बुराई नहीं है, और जो लोग थोड़ी-बहुत अंग्रेजी या हिंदी बोल सकते हैं, उन्हें मरीजों, या सहकर्मियों की मौजूदगी में आपस में ऐसी भाषा नहीं बोलनी चाहिए जिसे दूसरे न समझ सके। मलयालम भाषा बोलने वाले लोगों का पूरे देश में भरपूर सम्मान होता है, और इस व्यावहारिक उम्मीद को उस भाषा के आत्मगौरव से जोडऩा सही नहीं है।

(Dailly Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 6 जून 2021