कानूनों के बेजा इस्तेमाल की सरकारी हरकत अंग्रेज सरकार के वक्त से बहुत अलग नहीं है..
16 जून 2021
हिंदुस्तान के अदालती फैसलों में भी कोरोना सी लहर आते रहती हैं। पिछले कुछ हफ्तों से अदालतें एक बार फिर उम्मीदें जगा रही हैं कि वे सरकार की हामी भरने वाली संस्था ना होकर जनता और संविधान की भी फिक्र करने वाली जिम्मेदार अदालतें हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने कल 3 छात्र-छात्राओं को आतंकी आरोपों के मामले में जमानत देते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि सरकार की नजर में विरोध के संवैधानिक अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच फर्क करने वाली लकीर कुछ धुंधली हो गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इन गिरफ्तार लोगों को जमानत देते हुए केंद्र सरकार के यूएपीए कानून की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें आतंकवाद और आतंक शब्द की परिभाषा कहीं पर नहीं दी गई है।
अदालत ने कहा कि यूएपीए में आतंकवादी काम की परिभाषा अस्पष्ट है और आतंकवादी काम का इस्तेमाल किसी भी आपराधिक काम के लिए नहीं किया जा सकता, खासकर ऐसे कामों के लिए जिनकी परिभाषा पहले से अन्य कानूनों में तय है। अदालत ने सरकार को सावधानी बरतने की नसीहत देते हुए कहा कि ऐसा न करने पर इस बेहद घृणित अपराध की गंभीरता खत्म हो जाएगी। पिछले साल दिल्ली में पिंजरातोड़ नाम के एक सामाजिक आंदोलन के कार्यकर्ता और जेएनयू-जामिया के तीन छात्र-छात्राओं को दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगे की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया था और वे लंबे समय से जेल में चले आ रहे थे। अब अदालत ने इन्हें जमानत देते हुए जो बातें कही हैं, उनमें यह भी है की असहमति को दबाने के लिए सरकार के जहन में विरोध के संवैधानिक अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच का फर्क धुंधला हो गया है, और अगर इस रवैया को बढ़ावा मिलता है तो यह लोकतंत्र के लिए दुखद दिन होगा।
देश के मीडिया का एक हिस्सा, और देश के बहुत से सामाजिक विचारक, कई राजनीतिक दल लगातार नौजवान छात्र-छात्राओं के ऐसे गंभीर कानून के तहत गिरफ्तारी के खिलाफ बोलते और लिखते चले आ रहे थे। लेकिन केंद्र सरकार के मातहत दिल्ली पुलिस ने इस तरह की बहुत सी गिरफ्तारियां की और उनमें देश के सबसे कड़े एक कानून को लागू करके इनकी जमानत अब तक नहीं होने दी थी। जब किसी बेकसूर सामाजिक कार्यकर्ता पर आतंकवादी होने का आरोप लगाया जाता है या उस पर देशद्रोह या राजद्रोह के आरोप लगा दिए जाते हैं या फिर उन पर सांप्रदायिकता फैलाने की बात कही जाती है और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी जाती है, तो इसका असल मकसद देश में ऐसे बाकी जागरूक लोगों का हौसला पस्त करना होता है। कुछ गिने-चुने लोगों को ऐसे कड़े कानूनों के तहत गिरफ्तार करके जेल में लंबे समय तक रखकर, मुकदमों को आगे न बढ़ाकर सरकारें लोकतांत्रिक आंदोलनों को खत्म करती हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश और उसकी इस टिप्पणी को देखते हुए देश में बाकी जगहों पर भी इस किस्म की कार्रवाई के बारे में दोबारा सोचना चाहिए।
छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता, मजदूर अधिकारों के लिए अदालतों में लडऩे वाली एक प्रमुख वकील सुधा भारद्वाज को भी महाराष्ट्र में गिरफ्तार हुए हजार दिन हो रहे हैं और वे भी अब तक बिना जमानत जेल में हैं। लोकतंत्र में सामाजिक कार्यकर्ताओं को अदालती फैसलों के भी पहले इस तरह की सजा देना सरकार के हाथ में है। ऐसे मामलों का जब अदालती निपटारा होगा, तब जाकर यह पता लगेगा कि उनके खिलाफ चलाए गए मुकदमे में कुछ दम था या नहीं। और उसके बाद भी देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंचने में फिर बरसों लग जाते हैं। लेकिन इस बीच ऐसे आंदोलनकारियों की जिंदगी तबाह करना सरकार के हाथ में रहता है और यह काम देशभर में जगह-जगह चल रहा है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।
देश में ऐसे अलोकतांत्रिक कानूनों को भी खत्म करना चाहिए जो अंग्रेजों ने हिंदुस्तानियों पर राज करने के लिए एक बदनीयत से बनाए थे, और जो एक गुलाम देश के लायक थे. हिंदुस्तान के आजाद होने के बाद पौन सदी गुजर रही है और अब तक हिंदुस्तानी कानून अगर अंग्रेजों का पखाना ढोकर चल रहा है तो उसमें फेरबदल की जरूरत है. लेकिन दिक्कत यह है कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने कई कानूनों को और अधिक कड़ा किया है जिससे लोकतांत्रिक आंदोलनों की, असहमति की गुंजाइश और कम हो गई है। इसके अलावा ऐसे कानूनों के तहत नाजायज कार्रवाई के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और अदालतों से इनका निपटारा होने तक एक पूरी पीढ़ी के हौसले खत्म करने का सरकारी मकसद तो पूरा हो ही जाता है। अब यह समझ में नहीं आता है कि सरकार की ऐसी कार्यवाही के खिलाफ अदालतों से कैसे जल्दी इंसाफ मिल सके और कैसे ऐसी मिसाल कायम हो सके जो बाद में दूसरे मामलों में भी इस्तेमाल हो?
खुले धोखे को अनदेखा करने वाला मीडिया, सरकार, सब बराबरी से जिम्मेदार लूट के
15 जून 2021
इन दिनों बड़े से बड़े अखबार या टीवी चैनल की वेबसाइटों को देखें, या कुछ ऐसी वेबसाइटों को देखें जो न अखबार की हैं न टीवी चैनलों की, और जो सिर्फ बहुत ही प्रमुख और कामयाब वेबसाइट हैं, तो उन पर कई किस्म के झांसे के इश्तहार दिखाई पड़ते हैं. बहुत से इश्तहार तो खबरों के बीच में इस तरह से दबे-छुपे रहते हैं जिस तरह किसी पेड़ के तने या पत्तों के बीच में कुछ जानवरों के छुपने की तस्वीरें कभी-कभी सामने आती हैं कि उन्हें पेड़ से अलग करके देखना ही नहीं हो पाता। ऐसे इश्तहार आमतौर पर धोखा देने वाले रहते हैं, और चूँकि वेबसाइटों को विज्ञापन से कमाई का लेना-देना रहता है इसलिए वे इस बात की परवाह भी नहीं करतीं कि उनकी खबरों के बीच, उनके दूसरे पोस्ट के बीच किस तरह के झांसे वाले इश्तहार दिखाई पड़ रहे हैं। जाहिर तौर पर बहुत से लोग इन्हें देख कर धोखा खाते भी होंगे।
अभी ऐसा ही एक इश्तहार एक फिल्म कलाकार सुशांत सिंह राजपूत से जुड़ी हुई एक तस्वीर के नीचे आया जिसे रायपुर के ही एक कंप्यूटर से वेबसाइट पर जाकर देखा गया था और उसके नीचे इस इश्तहार में नोटों का ढेर उठाए हुए एक गरीब आदमी की तस्वीर है और यह लिखा हुआ है कि रायपुर के एक गरीब मजदूर ने किस तरह 1 करोड़ 16 लाख रुपए अपने मोबाइल फोन से कमा लिए। अब इस तरह की अविश्वसनीय कमाई के बहुत से इश्तहार वेबसाइटों पर दिखते हैं, और अगर कंप्यूटर का इंटरनेट किसी तकनीकी वजह से अपने को इंदौर के इलाके में बताता है तो इस इश्तहार में रायपुर की जगह इंदौर आ जाता है। देश के अलग-अलग कोनों में जिस इलाके से आप इंटरनेट पर पहुंचेंगे, इसी इश्तहार में सिर्फ शहर का नाम बदल जाएगा और उस शहर का मजदूर एक करोड़ 16 लाख रुपए अपने मोबाइल फोन से कमाते हुए दिखने लगेगा। ऐसे दूसरे को इश्तहारों में एक बहुत ही आलीशान कोठी के सामने एक बहुत ही महंगी विदेशी कार में बैठा हुआ एक नौजवान, या एक युवती दिखते हैं और उसके साथ भी कुछ इसी किस्म का एक उकसाता हुआ विज्ञापन स्लोगन लिखा रहता है कि किस तरह उन्होंने 1 महीने में ही कमाई करके यह बंगला, गाड़ी सब कुछ खरीद लिया। आप जिस शहर से इंटरनेट पर पहुंचें, उसी शहर का नाम उसी इश्तहार में दिखने लगता है।
अब सवाल ये उठता है कि भारत सरकार का इतना कड़ा सूचना तकनीक कानून है कि जिसके तहत मामूली चूक करने वाले और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करने वाले लोग भी आए दिन कानून के फंदे में फंसते रहते हैं। दूसरी तरफ जो ठग, धोखेबाज, और जालसाज लगातार इस तरह इंटरनेट पर लोगों को धोखा देते हैं, वह हमारे जैसे साधारण समझ वाले लोगों को भी मामूली आंखों से समझ में आने वाले धोखेबाज़ हैं, लेकिन भारत सरकार के साइबर क्राइम पकडऩे वाले लोगों को यह नहीं दिखता, न ही राज्यों को यह दिखता है कि इसमें क्या जालसाजी है। यह कुछ उसी किस्म का है जिस तरह एक फाड़े गए साइलेंसर वाली बड़ी सी मोटरसाइकिल भारी शोरगुल करते हुए चौराहे पर से पुलिस के सामने से निकल जाती है, लेकिन पुलिस को उसकी आवाज सुनाई नहीं पड़ती। फिर चाहे बाकी तमाम लोगों को शोरगुल से दिक्कत क्यों ना हो। इसी तरह ये जालसाज विज्ञापन लोगों को इंटरनेट पर दिखते हैं, लोगों के व्हाट्सएप पर आते हैं, लेकिन सरकार इनमें से कोई जालसाजी नहीं रोक पाती। दूसरी बात यह भी है कि जिन वेबसाइटों पर धोखाधड़ी के ऐसे विज्ञापन रात-दिन आते हैं और उन पर टंगे रहते हैं, क्या उन वेबसाइटों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वे अपनी सामग्री के साथ, अपनी खबरों के साथ, इस तरह की धोखाधड़ी के विज्ञापनों का दिखना बंद करें या फिर धोखे में भागीदारी करके भी कमाई करने की चाह में सब उलझे हुए हैं?
यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ते चल रहा है और हर दिन लाखों नए लोग इंटरनेट पर जुड़ते हैं जो कि भरोसेमंद वेबसाइटों के विज्ञापनों को भी भरोसेमंद मान लेते हैं, और कई विज्ञापन तो ऐसे दबे-छुपे अंदाज में रहते हैं कि वे पहली नजर में खबर ही लगते हैं। इसलिए इस धोखाधड़ी को बंद करने का काम होना चाहिए और सरकार को इस पर कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए। दूसरी तरफ हिंदुस्तान में एक एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल नाम की एक संस्था है और वह संस्था भी धोखा देने वाले विज्ञापनों या झूठे दावे करने वाले विज्ञापनों पर कार्यवाही करने का दावा करती है। इस संस्था को भी ऐसे विज्ञापन देने वाले से पूछना चाहिए कि वह रायपुर के उस मजदूर की जानकारी दें जिसे एक करोड़ 16 लाख रुपए की कमाई अपने मोबाइल फोन से हुई है। यह सिलसिला इसी तरह चलते रहने देना गलत है, और यह बहुत से लोगों की गैर जिम्मेदारी का नतीजा है यह मीडिया की भी गैर जिम्मेदारी है, केंद्र और राज्य सरकारों की भी गैर जिम्मेदारी है और एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया की गैर जिम्मेदारी तो है।
राम मंदिर के नाम पर क्या इतना बड़ा घोटाला हुआ है?
14 जून 2021
अयोध्या में बन रहे राम मंदिर को लेकर एक बड़ा ही खराब विवाद आज सामने आया है जिसे आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने भी उठाया है और उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने भी। अगर इनके आरोप सही हैं और इनके पेश किए गए दस्तावेज कोई जालसाजी नहीं हैं, तो यह एक भयानक भ्रष्टाचार का मामला दिख रहा है और चूंकि यह राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट को लेकर है जो कि केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया एक ट्रस्ट है इसलिए यह देश की सर्वोच्च स्तर की जांच के लायक मामला है।
पहली नजर में जो दस्तावेज इन दोनों नेताओं ने पेश किए हैं उनके मुताबिक, मंदिर से लगी हुई जमीनों को खरीदने के लिए मंदिर ट्रस्ट लोगों से बात कर रहा था। जिस जमीन को मंदिर खरीदना चाहता था उसका सरकारी रजिस्ट्री रेट करीब 5 करोड़ बताया जाता है। और इस जमीन को दो और लोगों ने उसके मालिक से 2 करोड रुपए में खरीदा। इसे खरीदने के 10 मिनट के भीतर राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट ने उस जमीन को इन नए मालिकों से 18 करोड़ रुपए में खरीदने का एग्रीमेंट किया, और 17 करोड़ रुपए आरटीजीएस से इन नए मालिकों के खाते में डाल दे दिए। 10 मिनट पहले की खरीद-बिक्री में जो दो गवाह थे, उनमें से एक मंदिर ट्रस्ट के सदस्य हैं और दूसरे व्यक्ति अयोध्या के मेयर हैं। और यही दोनों गवाह 10 मिनट बाद की उस जमीन की 18 करोड़ की बिक्री के मामले में भी गवाह हैं। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने इन दोनों रजिस्टर्ड दस्तावेजों को मीडिया के सामने पेश किया है जिनमें भुगतान की जानकारी भी है। मंदिर ट्रस्ट की तरफ से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने इन आरोपों पर कहा कि उन पर तो महात्मा गांधी की हत्या के आरोप भी लगते रहे हैं और वे उसकी परवाह नहीं करते।
अब इस खरीद-बिक्री में जो दो खरीददार हैं उनमें एक हिंदू है और एक मुस्लिम है। इसके दोनों गवाह डॉ. अनिल मिश्रा और ऋषिकेश उपाध्याय मंदिर ट्रस्ट के सदस्य और अयोध्या के महापौर हैं। जमीन को बेचने वाले मूल स्वामी बाबा हरिदास हैं और खरीदने वाले मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपक राय हैं। समाजवादी पार्टी के विधायक और आम आदमी पार्टी के सांसद के उठाए हुए सवाल और उनके पेश किए हुए दस्तावेज हैरान करते हैं कि 5 करोड रुपए रजिस्ट्री दाम की जमीन को दो करोड़ में कैसे खरीदा गया और फिर 10 मिनट में ही उसे साढ़े 18 करोड़ में कैसे बेच दिया गया और आनन-फानन ट्रस्ट के 17 करोड़ों रुपए इस नए खरीददार के खाते में चले भी गए।
जमीन जायदाद के काम करने वाले लोगों को यह बात बड़ी आसानी से समझ आ जाएगी कि यह गोरखधंधा किस तरह किया गया है। अब सवाल यह उठता है यह ट्रस्ट तो केंद्र सरकार का बनाया गया है, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बनाया गया है जिसमें केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि सदस्य हैं। इस तरह से यह धार्मिक ट्रस्ट होने के बावजूद सरकार निर्मित ट्रस्ट है, और इस पर अगर जमीन खरीदी में इतनी बड़ी रकम का घपला करने का ऐसा आरोप लगा है तो केंद्र सरकार को बिना देर किए हुए इसकी जांच करवानी चाहिए क्योंकि यह देश के करोड़ों राम भक्तों और हिंदुओं की आस्था का भी मामला है। इस मंदिर ट्रस्ट में जिस तरह शायद 5000 करोड़ का दान और चंदा इकट्ठा किया है उसके इस्तेमाल पर भी एक बड़ा सवाल इन आरोपों से लगता है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा के ही मुख्यमंत्री हैं इसलिए इस मामले की सीबीआई जांच में राज्य सरकार की असहमति की कोई बात नहीं हो सकती है। देश के इस सबसे बड़े मंदिर निर्माण ट्रस्ट को लेकर जितने गंभीर आरोप लगे हैं प्रधानमंत्री को इस मामले की सीबीआई जांच के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कहना चाहिए कि वे इसकी सिफारिश करें और इसकी तेजी से जांच करवाई जाए, ताकि दान देने वाले, और दान ना देने वाले आस्थावान, लोगों की भी आस्था को चोट ना पहुंचे। तब तक इस ट्रस्ट की ऐसी किसी खरीदी-बिक्री पर रोक भी लगना चाहिए।
ऐसे ट्रस्ट आमतौर पर स्थानीय कलेक्टर के नियंत्रण में माने जाते हैं, जिसके भी नियंत्रण में यह हो उन्हें तुरंत ही इसके बैंक खातों पर एक रोक भी लगानी चाहिए ताकि ऐसी धोखाधड़ी की और कोई खरीदी ना हो सके। ट्रस्ट के प्रभारी सचिव चंपक राय का बयान बहुत ही बुरी तरह अहंकार से भरा हुआ है और गैर जिम्मेदारी का है। यह मौका ऐसे अहंकार को दिखाने का नहीं है कि महात्मा गांधी की हत्या का आरोप भी उन पर लगा था। वे यह भी साफ नहीं कर रहे हैं कि वह किस पर आरोप लगने की बात कर रहे हैं, व्यक्तिगत रूप से उन पर गांधी की हत्या के आरोप की बात कर रहे हैं, या इस ट्रस्ट को लेकर बयान दे रहे हैं।
ट्रस्ट के किसी जिम्मेदार पद पर बैठे हुए व्यक्ति को ऐसी गैरजिम्मेदारी की बात नहीं करनी चाहिए और खासकर धार्मिक आस्था से जुड़े हुए ट्रस्ट के सबसे बड़े ट्रस्टी अगर आरोपों पर सफाई देने के बजाय अपने आपको गांधी हत्या के आरोप झेल चुका साबित कर रहे हैं, तो यह ट्रस्ट के लिए भी बहुत ही शर्मिंदगी की बात है। जो दो लोग इन दोनों खरीद-बिक्री में गवाह रहे हैं, उन्होंने मुंह खोलने से मना कर दिया है, इसलिए यह पूरा मामला भारी संदेह से भरा हुआ है, और जिन-जिन लोगों पर इस ट्रस्ट की जिम्मेदारी आती है उन्हें, और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार, और केंद्र सरकार को तुरंत एक बड़ी जांच की घोषणा करनी चाहिए जिसके बिना इस ट्रस्ट के पास आए हुए हजारों करोड़ों रुपए खतरे में भी हैं और लोगों का भरोसा भी टूट रहा है।
तू डाल-डाल मैं पात-पात के मुक़ाबले में इस बार पुलिस ने बुरा पछाड़ा मुजरिमों को
13 जून 2021
दुनिया के जुर्म और पुलिस के इतिहास की एक सबसे बड़ी घटना अभी पिछले हफ्ते हुई जब अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई ने कई देशों की जांच एजेंसियों के साथ मिलकर दुनियाभर में फैले हुए संगठित अपराध के गिरोहों के बीच की बातचीत को पकड़ा, और उसके आधार पर करीब 800 बड़े माफिया सरगना को गिरफ्तार किया। दुनिया भर में नशीले सामानों की बहुत बड़ी जब्ती हुई, और एक किस्म से संगठित अपराधों की कुछ वक्त के लिए कमर टूट गई। लोगों का मानना है कि माफिया पर कार्रवाई में यह दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी कार्रवाई है, और इसे बड़े दिलचस्प तरीके से अंजाम दिया गया।
हुआ यूं कि अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई ने यह तरकीब सोची कि व्हाट्सएप किस्म का एक दूसरा मैसेंजर एप्लीकेशन ऐसा बनाया जाए जिसकी शोहरत मुजरिमों के बीच में सबसे सुरक्षित मैसेंजर के रूप में फैलाई जाए। उसके बाद इसके ब्लैक मार्केट में मौजूद कुछ खास मोबाइल हैंडसेट पर ही चलने की शोहरत भी मुजरिमों के बीच फैलाई जाए। इस सुरक्षित दिखाए जाने वाले मैसेंजर के लिए हर महीने एक फीस भी ली जाए ताकि वह मुफ्त का ना दिखे। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया की एक जेल में बंद एक बड़े माफिया सरगना को उसका भरोसेमंद बनकर एक अफसर ने एक ऐसा हैंडसेट पहुंचाया जिसमें यह मैसेंजर एप्लीकेशन डाला हुआ था। क्योंकि इतने बड़े सरगना ने इस मैसेंजर एप्लीकेशन की साख का दम भरा तो दुनिया भर में दूसरे मुजरिमों के बीच में जल्द ही उस पर भरोसा कायम हो गया, और वे खुलकर इसका इस्तेमाल करने लगे। जुर्म की अपनी तमाम बातें खुलकर करने लगे। इस एप्लीकेशन पर आने-जाने वाले संदेशों को पढऩे का इंतजाम अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाई जांच एजेंसियों ने कर रखा था। इस मैसेंजर पर बड़े-बड़े मुजरिम खुलेआम नशे की आवाजाही की चर्चा करते थे, सामानों की फोटो भेजते थे जिनके भीतर ड्रग्स छुपाकर भेजी जा रही हैं, कत्ल की चर्चा करते थे कि किसका खून किया जाने वाला है, और तमाम किस्म के जुर्म की बातें खुलकर करते थे क्योंकि उन्हें यह भरोसा था कि यह मुजरिमों का अपना मैसेंजर है और इसकी कोई भी बात कहीं नहीं जा सकती। खास मोबाइल हैंडसेट और भुगतान वाला मैसेंजर, इन दो बातों से इसकी साख बढ़ती चली गई और जांच एजेंसियों को ऐसा लगने लगा कि दुनिया का हर बड़ा जुर्म उनकी आंखों के सामने उनकी जानकारी में हो रहा है, ऐसे में एक वक्त, एक साथ कई देशों में छापा मारा गया और 800 बड़े मुजरिमों को गिरफ्तार कर लिया गया।
आज इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए भी जरूरी है कि आज दुनिया भर में इस बात को लेकर बहस चलती है कि कौन से देश की सरकार किस मैसेंजर सर्विस का गला दबाकर उससे मनचाहे लोगों के मैसेज निकलवाने में लगी हुई है। हिंदुस्तान में भी भारत सरकार का कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ टकराव चल रहा है और व्हाट्सएप के साथ भी। इन सबने दुनिया के लोगों का भरोसा जीता है कि उन पर भेजे गए संदेश पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं, और उन्हें कोई भी सरकार या कोई दूसरी एजेंसी पढ़ नहीं सकती। लेकिन भारत में हाल ही में आईटी कानून में फेरबदल करके यह इंतजाम किया जा रहा है कि ऐसे तमाम सोशल मीडिया और मैसेंजर सर्विसों से सरकार और अधिक जानकारी ले सकें। भारत में जांच एजेंसियों के पास और राज्य सरकारों के पास, कुल करीब 10 एजेंसियों के पास इस बात के अधिकार रहते हैं कि वे लोगों के मोबाइल पर हो रही बातचीत को सुन सकें, फोन पर आने-जाने वाले संदेश पढ़ सकें, ईमेल में झांक कर सकें और यही वजह है कि आज सामान्य टेलीफोन कॉल और एसएमएस को सबसे कम महफूज माना जाता है।
अब धीरे-धीरे लोगों का व्हाट्सएप पर से भी भरोसा हट गया है और बहुत से लोगों को आईफोन के फेसटाइम फीचर पर ही भरोसा रह गया है। इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिका में एक बड़े आतंकी के गिरफ्तार होने पर उसके आईफोन को एफबीआई भी नहीं खोल पाई, और आईफोन बनाने वाली एप्पल कंपनी ने सरकार की कोई भी मदद करने से इंकार कर दिया। अब दुनियाभर के लोगों को लगता है कि जिस फोन को एफबीआई भी नहीं खोल पाई, और जिसे एफबीआई के लिए भी खोलने से एप्पल ने मना कर दिया, वह एक सबसे सुरक्षित फोन और बातचीत करने की सर्विस है।
राजनीति और सरकार में, मीडिया और खुफिया एजेंसी, या बड़े कारोबार में, जिन लोगों को गोपनीयता की जरूरत होती है, उनके बीच अलग-अलग समय पर अलग-अलग मैसेंजर पर भरोसा दिखता है। जब लोगों को यह लगने लगा कि हिंदुस्तान की खुफिया एजेंसी व्हाट्सएप को तोडऩे वाले इजराइली सॉफ्टवेयर खरीद चुकी हैं, तब लोगों ने किसी ने सिग्नल, किसी ने रॉकेट, और किसी ने और कोई मैसेंजर इस्तेमाल करना शुरू किया। धीरे-धीरे आज के बाजार में सबसे सुरक्षित फेसटाइम को माना जा रहा है और कोई हैरानी नहीं होगी कि साल दो साल बाद जाकर पता लगे कि अमेरिकी या इजराइली खुफिया एजेंसियां फेसटाइम की तमाम बातचीत को सुन रही थीं, उसके सारे वीडियो कॉल को देख रही थीं, और उस पर आने-जाने वाले संदेश अपने कंप्यूटरों पर पढ़ रही थीं।
यह पूरा सिलसिला फोन या कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियों और उनमें घुसपैठ करने वाले लोगों के बीच चलने वाले एक अंतहीन मुकाबले का है इसके अलावा अब मैसेंजर सर्विसों या ईमेल सर्विस का एक ऐसा नेटवर्क भी है जिस पर अलग-अलग लोगों को अलग-अलग समय में भरोसा रहता है, और खुफिया एजेंसियां या जांच एजेंसियां लगातार इनमें घुसपैठ करने की तरकीब निकालती रहती हैं. मुकाबला अंतहीन है, हमेशा चलते ही रहेगा, और ताकतवर तबकों को किसी न किसी भरोसेमंद मैसेंजर की जरूरत पड़ती रहेगी। किसी ना किसी भरोसेमंद फोन या कंप्यूटर की जरूरत भी लगेगी जिसमें घुसपैठ आसान ना हो, जिसकी जानकारी को कोई ना निकाल सके। दुनिया में ना सिर्फ मुजरिमों बल्कि सरकारों के कामों में भी ऐसी गोपनीयता की जरूरत रहती है कि उपकरणों से लेकर एप्लीकेशन तक को अधिक से अधिक सुरक्षित रखा जाए। ऐसा इसलिए भी है कि हाल के वर्षों में दुनिया के बड़े-बड़े देशों ने अपने नेटवर्क में ऐसी घुसपैठ देखी है जिसमें दुनिया के किसी कोने में बैठा हुआ कोई एक हैकर अमेरिका के एक शहर में पीने का पानी सप्लाई करने वाली कंपनी के कंप्यूटरों में छेडख़ानी करके किसी एक रसायन को इतना अधिक मिलाने की ताकत पा लेता है, जिससे उसे पीने वाले लोग मर जाएं। इसलिए जांच एजेंसियों की ऐसी घुसपैठ भी नाजायज नहीं है क्योंकि अपराधियों की ताकत बढ़ती चल रही है।
फिलहाल लोगों को यह मानकर चलना चाहिए कि उनकी मैसेंजर सर्विस दुनिया की जांच एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों की नजरों से तभी तक दूर है जब तक वे लोग महत्वपूर्ण नहीं हो जाते। जिस दिन उनकी कोई अहमियत हो जाएगी उस दिन उनके फोन, कंप्यूटर और उनके मैसेंजर पर घुसपैठ होने लगेगी, इसलिए अधिक अच्छा यही है कि किसी किस्म के जुर्म में शामिल ही ना हुआ जाए।
10-12 बरस के बच्चों के गिरोह के सामूहिक रेप से खड़े हुए कई सवाल !
11 जून 2021
हरियाणा के रोहतक से एक दिल दहलाने वाली खबर आई है कि 10 बरस की एक बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार करके उसका वीडियो बनाकर फैलाया गया और ऐसा करने वाले लोगों में एक 18 बरस का नौजवान था, और 8 नाबालिग थे। बलात्कारियों में 5 बच्चे तो 10 से 12 वर्ष उम्र के हैं। यह बच्ची अपने घर के बाहर खेल रही थी और इस टोली ने उसे स्कूल के पास ले जाकर बलात्कार किया, उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग की, बच्ची को धमकी दी, और बाद में यह वीडियो फैलाकर उस बच्ची को ब्लैकमेल करना भी शुरू किया।
इस घटना से बहुत से सवाल उठते हैं, एक तो देश के सबसे चर्चित बलात्कार निर्भया कांड के समय से यह बात सामने आ रही थी कि नाबालिग लोग भी बलात्कार की ताकत और समझ रखते हैं। निर्भया के सामूहिक बलात्कार में एक लडक़ा नाबालिग था इसलिए वह कड़ी सजा से बचा और उसे किसी सुधार गृह में कहीं भेजा गया था। उसके बाद से देश भर में यह चर्चा शुरू हुई कि क्या बलात्कार के ऐसे मामलों के लिए बालिग होने की उम्र को 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष कर दिया जाए? जिस तरह घुटनों पर चोट लगने पर पूरा बदन बिलबिला उठता है उसी तरह देश की चेतना पर निर्भया कांड से एक चोट लगी थी और बिलबिलाए हुए देश ने बलात्कारियों के लिए फांसी की बात की थी। बलात्कारियों को 16 बरस से ही बालिग मान लेने की भी मांग की थी। इन दोनों ही बातों का कई तर्कों के आधार पर लोगों ने विरोध भी किया था। फिर भी बलात्कार के लिए मौत की सजा को जोड़ दिया गया है और बालिग होने की उम्र को घटाने के बारे में भी समाज में चर्चा चल रही है।
अब हरियाणा तो देश में बहुत अधिक सामाजिक नियम कायदे लागू करने वाला प्रदेश है जहां महिलाओं और लड़कियों पर बहुत तरह के प्रतिबंध लगाए जाते हैं, लेकिन कोई बच्ची अगर अपने घर के सामने ना खेले तो वह जिंदा भी कैसे रहे? और इसलिए अगर ऐसे में गांव के ही लडक़े एकजुट होकर गिरोहबंदी करके उस अकेली बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार करें, तो इसे कौन से सामाजिक प्रतिबंध लगाकर रोका जा सकता है? क्या लडक़ों का घूमना-फिरना बंद किया जा सकता है, या लड़कियों का अपने घर के आंगन में भी खेलना रोका जा सकता है? कल की ही बात है उत्तर प्रदेश की महिला आयोग की अध्यक्ष ने एक अटपटा और बहुत खराब बयान दिया कि लड़कियों को मोबाइल फोन देना बंद करना चाहिए क्योंकि पहले वे लडक़ों से फोन पर लंबी लंबी बातें करती हैं और उसके बाद उनके साथ भाग जाती हैं। अब महिला आयोग की अध्यक्ष की अगर ऐसी सोच है तो उस प्रदेश में महिलाओं के अधिकार और महिलाओं की सुरक्षा मर्दों की मर्जी और रहम पर ही हो सकती है, किसी अधिकार के तहत नहीं हो सकती। एक मोबाइल फोन किसी लडक़ी या महिला को उसके बुनियादी अधिकार पाने का मौका देता है, और अगर ऐसी बुनियादी सहूलियत के लिए भी लडक़ी होने की वजह से उसे इससे दूर रखा जाए, तो फिर ऐसे समाज को लड़कियों को पाने का हक ही नहीं है।
जैसा हरियाणा के सामूहिक बलात्कार की घटना को लेकर आज हम यह बात लिख रहे हैं, उस हरियाणा का हाल यह है कि कन्या भ्रूण हत्याओं के चलते हुए वहां पर लड़कियों का अनुपात लडक़ों के मुकाबले देश में सबसे कम है। हरियाणा के बारे में यह कहा जाता है कि वहां बहू लाने के लिए लोग दूसरे कई प्रदेशों में जाकर वहां से लड़कियां लेकर आते हैं क्योंकि उनके अपने प्रदेश में लडक़ों के मुकाबले लड़कियां कम रह गई हैं। ऐसा प्रदेश लड़कियों पर जिस तरह के जुल्म देख रहा है, उसमें किसी मां-बाप की लडक़ी को बड़े करने की हिम्मत भी जवाब दे रही होगी। और उत्तर प्रदेश में एक संवैधानिक पद पर बैठी हुई महिला लड़कियों को फोन से दूर रखने की बात कर रही है।
दरअसल हिंदुस्तान में लड़कियों को छेडऩा उनसे बलात्कार करना, इसमें कोई बुराई नहीं मानी जा रही है। और ऐसा होने पर भारत की न्याय प्रक्रिया कसूरवार को सजा दिलाने में बहुत बुरी तरह नाकामयाब भी रहती है। बलात्कार के मामलों में बड़ी संख्या में पुलिस, थाने में ही समझौता कराकर लडक़ी को डराकर समाज में बदनामी का खौफ दिखाकर वापस भेजने की पूरी कोशिश करती है, और इसके एवज में जाहिर है कि बलात्कारी से उगाही भी करती ही होगी। अब इसके बाद भी अगर लडक़ी या महिला अपनी शिकायत पर डटी रहें तो अदालत में बरसों तक उनका और अपमान होता है। कोर्ट के बरामदे से लेकर अदालत के कटघरे तक लोग अपनी नजरों से उनके साथ और बलात्कार करते हैं, और बलात्कारी को सजा मिलने के पहले तक और उसके बाद भी उसकी शिकार लगातार सजा पाते ही रहती है। ऐसे देश में अगर 10-12 बरस के बच्चे भी गिरोह बनाकर सामूहिक बलात्कार कर रहे हैं और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी कर रहे हैं तो इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह जो हमें सूझती है, वह यह है कि इन लडक़ों को इनके परिवारों में लडक़ी की इज्जत होते कभी दिखी नहीं होगी, मां बाप ने कभी लडक़ी या महिला का सम्मान सिखाया नहीं होगा। यह एक बहुत ही जटिल स्थिति है और समाज इससे कैसे उबरेगा इसका कोई आसान रास्ता हमारे पास नहीं है, लेकिन इस मुद्दे पर सबका सूचना जरूरी है, अपने अपने घर के लडक़ों को संभालना और उन्हें समझाना जरूरी है इस नाते हम इस मुद्दे पर यहां लिख रहे हैं।




