आज एक छोटी सी, लेकिन बहुत जरूरी बात पर चर्चा

30  जून 2021

 हिंदुस्तान के अधिकतर हिस्सों में बोलचाल में गालियों का खूब चलन है। और यह बात महज बड़े लोगों के बीच नहीं हैं, बल्कि छोटे-छोटे बच्चे भी सडक़ों पर गालियां देते दिखते हैं और मां-बहन की गंभीर गालियां देते हैं। इतने छोटे बच्चे एक दूसरे की मां-बहन को लेकर सेक्स की गंदी गालियां देते हैं जिसका शायद वह मतलब भी ठीक से नहीं समझ पाते होंगे। लेकिन इनका मतलब यही है कि इन बच्चों के आसपास कोई बड़े लोग इस तरह की गालियां देते ही हैं और उन्हीं से सीखी हुई गालियां कुछ बच्चे शुरू करते हैं, और बाद में बाकी बच्चे उन्हें आगे बढ़ाते हैं। दिक्कत महज इन गालियों की नहीं है जिन्हें सुनते हुए आसपास भले लोगों को, या महिलाओं को और लड़कियों को वहां से गुजरना भी मुश्किल पड़ता हो, या वहां खड़े रहना मुश्किल पड़ता है, दिक्कत इससे आगे की है। जो हमलावर हरकत और सेक्स की गालियां छोटे-छोटे बच्चे देते हैं, वे उनके दिल दिमाग में बैठी रहती हैं। इसका असर यह होता है कि जब भी वे बड़े होते हैं और किसी लडक़ी के साथ छेडख़ानी या अधिक गंभीर सेक्स अपराध करने की कोशिश करते हैं, तो उनके दिमाग में लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार करने को लेकर कोई झिझक नहीं रहती। वह बरसों से, अपनी कम उम्र से, किसी दूसरे की मां बहन को लेकर सेक्स की गालियां इतनी दे चुके रहते हैं कि उनके लिए किसी के साथ सेक्स की ज्यादती करने में कोई झिझक नहीं रह जाती। इसलिए गालियों को महज गालियां मान लेना और उन्हें बदजुबान मान लेना काफी नहीं है। समाज में जब वह बच्चे गालियों से शुरुआत करते हैं और जाहिर तौर पर एक दूसरे की मां बहन को लेकर गालियां देते हैं, या खेल खेल में बिना किसी की मां-बहन को संबोधित किए हुए हवा में गालियां निकालते रहते हैं, क्रिकेट की गेंद को मां-बहन की गाली देते हैं, किसी स्कूटर या कार को मां-बहन की गाली देते हैं तो उसका नतीजा यही होता है कि किसी महिला के साथ सेक्स को लेकर संवेदनशीलता पूरी तरह से खत्म हो जाती है और वह उन्हें अपने अधिकार की बात लगने लगती है।

हिंदुस्तान कहने को अपनी संस्कृति पर बहुत गर्व करने वाला देश है लेकिन आज उसकी आम संस्कृति यह है कि सार्वजनिक जगहों पर लोग खूब गंदी-गंदी गालियां देते हैं, और कल परसों छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जिस तरह एक कांग्रेस नेता ने सडक़ पर एक ट्रैफिक सिपाही को पेट भर कर मां की गालियां दी हैं, अपनी बीवी की मौजूदगी में गालियां दी हैं, वही हिंदुस्तान की असल संस्कृति रह गई है। जो लोग अधिक समझदार और जिम्मेदार हैं वे सार्वजनिक रूप से गालियां नहीं देते लेकिन आपसी बातचीत में वह मौजूदा लोगों को देखकर जहां गुंजाइश रहती है वहां गालियां देकर अपनी भड़ास निकालते हैं। जो लोग बंद कारों में अकेले चलते हैं वह भी ट्रैफिक की दिक्कतों को लेकर बंद शीशों के भीतर किसी न किसी मां-बहन को गालियां देते रहते हैं, बड़बड़ाते रहते हैं। यह सिलसिला कम से कम सार्वजनिक जगहों पर पूरी तरह खत्म होना चाहिए क्योंकि हिंदुस्तान में ऐसे काम के लिए सजा का इंतजाम किया गया है। दिक्कत यह है कि कुछ लोगों की ऐसी गालियों के खिलाफ अगर पुलिस को बुलाया जाए, तो वह लाठी से हांकते हुए इससे भी बुरी गालियां देने लगती है। नतीजा यह होता है कि सार्वजनिक जगह पर गंदी जुबान को रोकने का मकसद ही हार जाता है।

कुछ लोगों को यह बात अटपटी लग सकती है कि मां-बहन की गालियां देने वाले क्या सचमुच ही बलात्कारी हो सकते हैं, लेकिन यह बात समझना चाहिए कि भाषा लोगों के दिल-दिमाग पर गहरा असर करती है। जिन परिवारों में और जिन समुदायों में बच्चों की भाषा को ठीक रखने की कोशिश की जाती है वहां बच्चों की हरकतें भी अपने आप ठीक होने लगती हैं। यह सिलसिला लंबा चलता है, लेकिन समाज की बेहतरी कोई छोटा काम नहीं है जो कि तेजी से करके जल्दी निपटाया जा सके। लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी खुद की जुबान ठीक रहे और आसपास अगर वे किसी को गंदी जुबान इस्तेमाल करते देखें तो टोकने से ना चूकें। बहुत से लोग बीच में पडऩे से परहेज करते हैं कि कौन उलझे, लेकिन लोगों को यह याद रखना चाहिए कि सार्वजनिक जगहों पर अगर इतनी गंदी भाषा इस्तेमाल हो रही है कि वहां से लड़कियां और महिलाएं निकलने में भी हिचकें  तो यह समाज की एक सामूहिक हार रहती है और लोगों को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी, सामाजिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जून 2021


 

एक उंगली देख कांप उठे भयभीत देश को दीवारों पर इश्तहारों से कोई दिक्कत नहीं

 20 जून  2021

 कुछ वक्त पहले हिंदुस्तान में एक फिल्म आई जिसमें अभिनेत्री स्वरा भास्कर अपने ही बदन को सेक्स सुख देते हुए दिख रही थी। हिंदी भाषा में लोग बात करते हुए सेक्स से जुड़े बहुत से शब्दों से परहेज करते हैं इसलिए हस्तमैथुन शब्द की जगह तरह-तरह के शब्द जोडक़र काम चलाना पड़ता है। इस फिल्म के इस सीन को लेकर जिसमें कोई अश्लीलता नहीं थी, और जो कि जिंदगी की एक हकीकत बयान करने वाला सीन था, उस पर खूब बवाल खड़ा हुआ। देश भर से उसके खिलाफ लिखा गया। लोग इस सीन के जितने खिलाफ थे, उतने ही इस बात के भी खिलाफ थे कि स्वरा भास्कर ने कुछ किया था। स्वरा अपनी राजनीतिक विचारधारा के चलते हुए और लगातार मुखर बने रहने की वजह से देश के करोड़ों नफरतजीवियों के निशाने पर हमेशा ही बनी रहती हैं। वे अगर सुबह उठकर ट्वीट करें कि आज पूरब की तरफ चलना चाहिए, तो महज उनकी बात को खारिज करने के लिए लाखों समर्पित लोग पश्चिम की तरफ चलने लगेंगे। ऐसी नफरत का केंद्र बनी हुई स्वरा न तो किसी हमले से डरती हैं और न ही सच को बोलने से परहेज करती हैं, इसलिए इस फिल्म के इस सीन से उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी जो कि हस्तमैथुन करने के बुनियादी इंसानी हक को महिलाओं को भी उतना ही देता है जितना कि पुरुषों के पास हमेशा से रहते आया है।

जिन लोगों को यह लगता है कि हस्तमैथुन कोई पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता का ईसाई प्रभाव है जो कि हिंदुस्तानी नौजवानों को बर्बाद कर रहा है तो उन्हें अपने ही देश के इतिहास को पढऩा चाहिए जिसमें दुनिया में सेक्स की सबसे मशहूर किताब तरह-तरह के तरीके बताती है कि कैसे अधिक से अधिक देहसुख हासिल किया जा सकता है, और जो सेक्स के 84 किस्म के आसन बताती है। लोगों को यह भी देखना चाहिए कि सैकड़ों बरस पहले बने इस देश के मंदिरों की दीवारों पर इंसानों के सेक्स और इंसानों के जानवरों के साथ सेक्स और हर किस्म के सेक्स की मूर्तियां कैसे बनाई गई थीं। इसलिए यह देश सेक्स से ऐसे बड़े परहेज वाला देश भी कभी नहीं रहा है।

अब देखने की मजेदार बात यह है कि एक फिल्म में एक अभिनेत्री अगर अपने बदन को सेक्स सुख दे रही है तो उसकी एक उंगली से इस देश को इतनी बड़ी तकलीफ हो गई जितनी तकलीफ उसे कभी इस देश की दीवारों पर लिखे इसी बात के इश्तहारों से नहीं हुई थी। हिंदुस्तान की दीवारों को देखें तो वे गुप्त रोग विशेषज्ञों के इश्तहारों से भरी हुई हैं जिनमें से कोई भी शिक्षित या प्रशिक्षित डॉक्टर नहीं है, और सारे के सारे फर्जी इलाज करने वाले, नीम-हकीम कहे जाने वाले, नीम और हकीम दोनों शब्दों को बदनाम करने वाले लोगों के सेक्स क्लीनिक के हैं। हिंदुस्तानी दीवारों पर ऐसे सेक्स क्लीनिक के इश्तहार उस वक्त से चले आ रहे हैं जब पुरातत्व विभाग को खुदाई में दीवार मिली भी नहीं थी। जो सबसे पुरानी दीवारें हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में मिली होंगी, उन पर भी किसी डॉक्टर मुल्की या डॉक्टर शाह का इश्तिहार लिखा हुआ जरूर रहा होगा जिसे बाद में शर्मीले पुरातत्ववेत्ताओं ने मिटा दिया होगा। एक तरफ तो सेक्स के नाम पर बीमारियों का हौव्वा खड़ा करके उनके इलाज का दावा करने वाले ऐसे इश्तहारों का पहला ही शब्द लिखा रहता है कि बचपन से हस्तमैथुन करने की वजह से जो कमजोरी आ गई है उसका शर्तियां इलाज किया जाता है। इसका मतलब है कि यह समाज सेक्स और हस्तमैथुन इन दोनों के अस्तित्व को तो अनंत काल से देखते आ रहा है। सेक्स क्लीनिक के विज्ञापनों को किसी ने आपत्तिजनक माना हो और उनके खिलाफ आंदोलन छेड़े हों ऐसा तो पिछले 50 साल में कहीं पढऩे में नहीं आया क्योंकि यह इश्तहार मोटे तौर पर आदमियों को खींचने के लिए रहते हैं, लडक़ों को खींचने के लिए रहते हैं जिन्हें यह समाज यह मौलिक अधिकार देता है कि वह हस्तमैथुन भी कर सकते हैं, उसकी वजह से बीमारियों के शिकार भी हो सकते हैं, और फिर ऐसे फर्जी इलाज करने वाले गुप्त रोग विशेषज्ञों के पास भी जा सकते हैं। 

लडक़ों और पुरुषों के ऐसे काम करने पर समाज को कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर एक अभिनेत्री ने एक फिल्मी कहानी की जरूरत को पूरा करने के लिए अपने ही बदन पर अपनी उंगली धर दी तो मान लो यह पूरा देश ही सिहर उठा। सारे के सारे मर्दों को लगा कि यह उंगली तो उनकी मर्दानगी पर उठ गई है, हस्तमैथुन के उनके एकाधिकार पर उठ गई है। सेक्स के अधिकार पर उनकी मोनोपोली खतरे में पड़ गई है, और ऐसे हाल में तो आगे जाकर महिलाएं और भी हक मांगने लगेंगी, और फिर जो महिला अपने बदन को खुद सुख दे पाएगी उसे भला मर्द की जरूरत क्या रह जाएगी? यह समाज तो बहुत ही खतरनाक समाज हो जाएगा जहां औरत बिना मर्द के अपने बदन की जरूरत को पूरा कर लेगी !  

इसलिए ऐसी फिल्म के ऐसे सीन के खिलाफ और इसे करने वाली अभिनेत्री के खिलाफ जमकर लिखा गया उसे हिंदुस्तानी संस्कृति पर हमला मान लिया गया और उसे भारतीयता के खिलाफ मान लिया गया मानो हिंदुस्तानी दीवारों पर इश्तहार करने वाले सेक्स क्लीनिक के गैरचिकित्सक फर्जी डॉक्टर यूरोप और अमेरिका के लोगों का इलाज करते हैं और हिंदुस्तानी संस्कृति में तो मानो कोई हस्तमैथुन है ही नहीं जिसके लिए वे दीवारों पर इश्तहार लिखते हैं। यह अजीब सा पाखंडी समाज है जिसे एक औरत का उसकी देह पर उसका हक देखते भी नहीं बनता। यह देश ऐसे मर्दों का देश है जो कि खुद संतुष्टि पा लेने वाली महिला को देखकर दहशत में आ जाते हैं. जिन्हें किसी महिला की सेक्स की जरूरत मर्द पर आश्रित रहने तक ही अच्छी लगती है। ऐसा कायर देश जो कि स्वरा भास्कर की एक उंगली को देखकर कांप उठा था उसे देश पर मर्दों के लिए दीवारों पर लिखे गए सेक्स क्लीनिक के इश्तहारों के हस्तमैथुन से कोई दिक्कत नहीं दिखती है, ऐसा है मेरा देश!

अब यह वक्त आ गया है कि औरत से जुड़े हुए तमाम मुद्दों पर उनकी बात सुनी जाए, उनकी लिखी हुई बात को पढ़ा जाए, और हिंदुस्तानी मर्द अपनी सोच पर फिक्र करें कि कैलेंडर की 21वीं सदी के 21 साल में भी वे किस तरह हज़ारों बरस पहले की पत्थर की किसी गुफा में जी रहे हैं ! 

(Daily Chhattisgarh)

सत्तारूढ़ गुंडों के जुर्म पर पार्टी को बोलना और सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए

 30  जून 2021

 कल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में सत्ता की गुंडागर्दी का एक भयानक नजारा देखने मिला जब कांग्रेस पार्टी के एक ब्लॉक अध्यक्ष ने सडक़ पर गलत तरफ से स्कूटर चलाकर लाने पर रोकने वाले ट्रैफिक सिपाही को खूब मां बहन की गालियां बकी, उसे तरह-तरह की धमकियां दीं, उससे धक्का-मुक्की की, उसे मारने के लिए कई बार हाथ उठाया, और उसका मोबाइल फोन छीन लिया। यह सब कुछ दिनदहाड़े व्यस्त सडक़ पर बाजार के बीच किया। पुलिस की पोशाक में ड्यूटी पर तैनात, अपना काम करते हुए एक सिपाही के साथ इस तरह का सुलूक लोगों को कई बरस जेल भेजने के लिए काफी होना चाहिए।  यह तो अच्छा हुआ कि बिलासपुर की पुलिस ने अपने सिपाही का साथ दिया और कांग्रेस नेता के खिलाफ जुर्म दर्ज किया, उसकी गिरफ्तारी के लिए उसकी तलाश की जा रही है, वरना आमतौर पर सत्ताधारी गुंडों को बंद कमरे में बिठाकर, पुलिस के छोटे कर्मचारियों को दबाकर एक जुबानी समझौता करवा दिया जाता है। 

इसी तरह का नजारा छत्तीसगढ़ में कई जगह सत्तारूढ़ गुंडों की हरकतों का देखने मिला है, दिक्कत यह है कि अधिकतर मामलों में सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी दोनों ही चुप भी रह जाते हैं। यह कोई नई बात नहीं है, और न ही यह केवल छत्तीसगढ़ की बात है, हिंदुस्तान के अधिकतर प्रदेशों में हर सत्तारूढ़ पार्टी के मवाली इसी तरह का काम करते हैं और अपनी ड्यूटी पूरी कर रही पुलिस का साथ देने के लिए अक्सर उनके बड़े अफसर भी साथ नहीं रहते। यही वजह है कि छोटे पुलिस कर्मचारी चेहरा देख-देखकर काम करते हैं। राजनीतिक गुंडों पर हाथ डालना, अपना किसी मुश्किल इलाके में तबादला करवाने सरीखा काम माना जाता है। देश में जगह-जगह ऐसा होता भी है कि सत्तारूढ़ गुंडों पर जिसने हाथ डाला, तुरंत ही या कुछ दिन रुककर उन्हें किसी मुश्किल जगह भेज दिया जाता है और यह बाकी लोगों के लिए भी एक इशारा होता है कि सत्ता पर हाथ डालने से बचें। यह भी एक वजह रहती है कि किसी प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी में शामिल होने वाले लोग अधिक रहते हैं, और उसे छोडऩे वाले लोग कम रहते हैं। पश्चिम बंगाल में ही यह नजारा देखने लायक है कि जिन लोगों ने ममता बनर्जी की पीठ में छुरा भोंककर पार्टी छोड़ी थी और भाजपा में गए थे, उनमें से हजारों लोग आज कतार लगाकर घरवापिसी के लिए खड़े हैं और ऑटो रिक्शा में लाउडस्पीकर लगाकर पूरे शहर में मुनादी कर रहे हैं कि उन्होंने भाजपा में जाकर बहुत बड़ा गलत काम किया था, और अब दीदी के पास लौटना चाह रहे हैं। दीदी के पास लौटने की ऐसी और कोई मजबूरी नहीं है सिवाय इसके कि सत्तारूढ़ पार्टी की गुंडागर्दी और पुलिस के किसी मामले में फंसने पर विपक्ष में होने का नुकसान, इसका खतरा उन्हें दिख रहा है।

यह तो भला हो मोबाइल फोन पर वीडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा का जो कल बिलासपुर के बाजार में किसी ने कांग्रेसी गुंडे की इस हरकत को रिकॉर्ड कर लिया और यह भी रिकॉर्ड किया कि किस तरह एक पुलिस सिपाही सहनशील बना हुआ इस गुंडागर्दी के खिलाफ हाथ नहीं उठा रहा था वरना वह कद काठी में इतना था कि इस कांग्रेस नेता को वहीं पीटकर रख देता जिसने कि बाद में यह दावा किया है कि उसकी बीवी भी साथ में थी। यह बात भी सोचने के लायक है कि बीवी साथ में रहते कोई नेता सडक़ पर किस तरह की गुंडागर्दी कर सकता है और किस तरह पुलिस को गंदी गालियां दे सकता है। यह सिलसिला अधिकतर प्रदेशों में सत्ता की मेहरबानी से चलने वाली गुंडागर्दी को बढ़ाते भी चलता है। एक तरफ तो पुलिस सूरजमुखी की तरह हो जाती है जो कि सत्ता का चेहरा देख-देखकर यह तय करती है कि कौन सी बात जुर्म है, और कौन सी नहीं। 

दूसरी तरफ सरकारी वकील सत्तारूढ़ पार्टी के पसंदीदा और उसके तय किए हुए होते हैं इसलिए अदालत में सजा दिलवाने की उनकी दिलचस्पी उस वक्त घट जाती है जब कटघरे में उनके ही संगी साथी रहते हैं। फिर इसके बाद सत्ता की ताकत ऐसी रहती है कि पुलिस गवाहों को मार-मारकर भगा देती है या बागी बना देती है, तमाम सबूतों को बर्बाद कर देती है। और सच तो यह है कि सत्ता की मर्जी के खिलाफ किसी को सजा दिला पाना बहुत ही मुश्किल काम होता है। फिलहाल जिस घटना से यह लिखना शुरू हुआ है उसे लेकर प्रदेश कांग्रेस को अपना मुंह खोलना चाहिए और प्रदेश के गृह मंत्री को भी बताना चाहिए कि उनकी पार्टी के ब्लॉक अध्यक्ष जब उनकी उनके विभाग की पुलिस को पीट रहे हैं, मां-बहन की गालियां दे रहे हैं तो गृहमंत्री की जिम्मेदारी अपनी पार्टी के प्रति बनती है या अपने सिपाही के प्रति? 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जून 2021


 

एमपी में व्यवस्था से लड़ता एक नौजवान आईएएस

 19  जून 2021

 मध्यप्रदेश में एक आईएएस अधिकारी को लेकर बड़ा विवाद चल रहा है। इस नौजवान अफसर के तेवर कुछ ऐसे हैं कि 4 बरस में उसका 9 बार तबादला हो चुका है, और उसके खिलाफ कई तरह की कार्रवाई भी सरकार कर रही है। दूसरी तरफ इस अफसर ने अपने बड़े अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ सार्वजनिक रूप से भी बहुत सी बातें कही हैं जो कि लोगों को कुछ हैरान भी करती हैं। अब ताजा मामला यह है कि इस अफसर ने अपने से सीनियर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि उसने सीएम हाउस में किसी से बात की और इस जूनियर का तबादला करवा दिया। इसके साथ-साथ उसने यह भी कहा कि सीएम की पत्नी और इस कलेक्टर की पत्नी दोनों  एक जाति संगठन में अध्यक्ष और सचिव हैं, इस नाते उनका घरोबा है। लेकिन इस अधिकारी को अभी सरकार की तरफ से जो नोटिस मिला है वह इस बात के लिए हैं कि उसने राजधानी से एक बड़ी अफसर द्वारा टेलीफोन पर कही गई बातों को आईएएस अफसरों के एक व्हाट्सएप ग्रुप में पोस्ट किया। अपने से बड़ी अफसर के टेलीफोन कॉल को रिकॉर्ड करना और उसकी बातों को पोस्ट करना इसे सरकार ने बहुत बड़ा जुर्म माना है और इस नौजवान अफसर के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई है।

अब यहां पर दो-तीन बातों को देखना जरूरी है कि किसी अफसर को अगर उससे बड़े किसी अफसर ने टेलीफोन पर या रूबरू कोई बात कही है, तो उसे रिकॉर्ड करना क्या एक जुर्म माना जाना चाहिए? सवाल यह है कि एक सीनियर और एक जूनियर अफसर के बीच अगर कोई निजी बात हो रही है तो यह उनकी निजी हैसियत से होने वाली बात है इस पर कोई सरकारी नियम लागू नहीं हो सकते। दूसरी तरफ अगर उनके बीच सरकारी कामकाज को लेकर कोई बात हो रही है तो कोई भी बात रिकॉर्ड से परे की क्यों होनी चाहिए? अगर बात नियम-कानून के तहत सही है, तो उसे रिकॉर्ड पर लाने में क्यों दिक्कत होनी चाहिए, फिर चाहे वह फाइल हो या कोई व्हाट्सएप ग्रुप हो। इस देश में सूचना का अधिकार इसीलिए लागू किया गया है कि लोगों को सरकार से जुड़ी हुई तमाम बातों को मालूम करने का हक होना चाहिए। सूचना का अधिकार एक किस्म से सरकार की जवाबदेही तय करता है और कुछ वैसा ही काम इस अफसर ने किया है। उसने अपने से सीनियर अफसर की कही हुई बातों को अफसरों के समूह में पोस्ट किया। 

सरकारी ढांचे के फौलादी मिजाज को जो लोग बहुत इज्जत करने के लायक मानते हैं, उन लोगों को तो यह बात अटपटी लगेगी कि अपने सीनियर की बातों को कोई रिकॉर्ड करें। लेकिन सरकार में यह एक आम बात भी रहती है कि जिस फाइल पर चर्चा करें लिखा जाता है उस पर चर्चा के बाद फाइल में यह बात दर्ज भी की जाती है कि चर्चा क्या हुई। उसी बात को दर्ज करना अटपटा लग सकता है, जो बात किसी भ्रष्टाचार की हो जो बात नियमों के खिलाफ हो, जो बात किसी का पक्ष लेने की हो, या जो बात किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह की हो। ऐसी बातों से परे अगर नियम-कायदे की बात दो अफसरों के बीच हो रही है तो उसे रिकॉर्ड करने में क्यों दिक्कत होनी चाहिए? खासकर तब, जब वह बात सरकारी कामकाज को लेकर हो रही है। टेलीफोन की बातचीत को तो बाद में शब्दश: लिखा नहीं जा सकता, इसलिए उसे रिकॉर्ड कर लेना एक बेहतर तरीका है। 

हम मध्यप्रदेश के इसी मामले को लेकर नहीं, इसके पहले भी कई बार इस मुद्दे पर लिख चुके हैं कि लोगों को सरकारी कामकाज के सिलसिले में जो भी बातचीत करनी है उसे रिकॉर्ड करना चाहिए, ताकि अगर उसमें कोई गैरकानूनी सुझाव दिया जा रहा है, या कोई भ्रष्ट सुझाव दिया जा रहा है, तो उसके खिलाफ लडऩे के लिए एक सामान रहे। यह हर किसी का न सिर्फ एक हक है, बल्कि हर किसी की एक जिम्मेदारी भी है। अगर कोई सरकारी अफसर किसी दूसरे अफसर से फोन पर किसी नाजायज काम के लिए बात करें तो यह उस दूसरे अफसर की कानूनी जिम्मेदारी भी रहती है कि उसके नाजायज हिस्से को वह सरकार या कानून के सामने रखे। नाजायज बातें सुनकर उन पर चुप रहना यह जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाले लोगों की जिम्मेदारियों के खिलाफ है। इसलिए हम पहले से यह बात लिखते आए थे कि सरकारी बातचीत टेलीफोन पर मिलने वाले सरकारी निर्देश, इन सबको रिकॉर्ड करके रखना चाहिए और इसमें कोई सरकारी नियम आड़े नहीं आते। 

सरकार ने अपने किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को बर्खास्त करने के लिए एक ब्रह्मास्त्र बनाकर अपने हाथ में रखा हुआ है और सरकारी सेवा नियमों में एक लाइन जोड़ी है कि उनका बर्ताव सरकारी कर्मचारी या अधिकारी जैसा ना होने पर उनकी सेवा समाप्त की जा सकती है। अनबिकमिंग ऑफ एन ऑफिसर, नाम की यह शर्त पूरी तरह से धुंधली है और यह बेजा इस्तेमाल करने के लिए ही बनाई गई है। हम अभी मध्यप्रदेश के इस मामले में सही या गलत पर नहीं जा रहे हैं, कौन भ्रष्ट है और कौन नहीं, उस पर हम कोई बात नहीं कह रहे हैं, लेकिन हम इतना जरूर कह रहे हैं कि सरकारी कामकाज में कोई निजी बात क्यों रहना चाहिए जिसे कि रिकॉर्ड ना किया जाए या जिसे सार्वजनिक रूप से कहा न जा सके? ऐसे 10-20 और अफसर अगर सामने आएंगे तो बड़े मंत्रियों और बड़े अफसरों का मातहत अधिकारियों और कर्मचारियों को गलत काम करने के लिए कहना भी बंद होने लगेगा। लोकतंत्र के हित में यही है कि इस तरीके को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि सब कुछ पारदर्शिता से हो सके। अगर सरकार को अदालत में जाना पड़ा, तो वहां उसकी शिकस्त होगी। 

    (Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 18 जून 2021


 

कोरोना के मोर्चे पर फिक्र की दो अलग-अलग बातें

 18  जून 2021

 आज जब देश के बाकी तमाम हिस्सों में कोरोना की मार कुछ हल्की होती दिख रही है, तब महाराष्ट्र में यह अंदेशा जताया जा रहा है कि तीन-चार हफ्तों में कोरोना की तीसरी लहर वहां शुरू हो सकती है। लेकिन इस बीच एक बड़ी फिक्र की बात यह सामने आई है कि अहमदाबाद से लेकर असम तक जिन नदियों में कोरोना की जांच हुई, उन सारी नदियों के पानी के तमाम सैंपल कोरोना पॉजिटिव निकले। गुजरात में साबरमती नदी में पिछले 1 बरस में आईआईटी गांधीनगर ने जितने सैंपल लिए सब पॉजिटिव मिले और यह सैंपल सैकड़ों की संख्या में लिए गए। इसी तरह असम की कई नदियों से सैंपल लिए गए और उसमें भी कोरोना पॉजिटिव रिजल्ट आए। अब तक यह माना जा रहा था कि जो नाले-नालियों का पानी है जिनमें अस्पतालों से और कोरोनावायरस मरीजों के घरों से निकला हुआ पानी, अस्पताल के कचरे के बहकर आने से, कोरोना वायरस मिल रहा है, वह अब ऐसी नदियों के पानी में भी मिल रहा है जहां पर गंदा पानी सीधे नदी में नहीं मिलता है, और उन्हें जल शोधन संयंत्र से साफ करके ही नदी में भेजा जाता है फिर भी वहां कोरोना वायरस पाया गया है।

आईआईटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पहले तक केवल गंदे पानी की नालियों में ही कोरोना वायरस के जिंदा रहने की बात मिली थी, लेकिन अब उन नदियों के पानी में भी यह मिल रहा है जहां पर लोग नहाते हैं या जहां से पानी लेकर उसे लोगों के पीने के लिए भेजा जाता है, तो यह एक नए खतरे की नौबत है। इस बात को लेकर विज्ञान थोड़ा सा हैरान भी है लेकिन यह खतरा हमें बहुत अजीब नहीं लग रहा है। यह वायरस जिस रफ्तार से अपनी शक्ल बदल रहा है, और अलग-अलग तरह से यह विज्ञान के लिए चुनौती खड़ी कर रहा है, उसमें इसके हवा से फैलने या पानी से फैलने का खतरा महज कुछ दूर ही था, वह खतरा पूरी तरह से नामौजूद नहीं था। अब जब दुनिया के देश, कोई कोरोना की तीसरी लहर के कगार पर है, कोई कोरोना की दूसरी लहर के कगार पर, तब पानी में ऐसा खतरा मिलना एक बहुत ही फिक्र की बात है। और फिर ये सैंपल एक-एक नदी से सैकड़ों की संख्या में लिए गए, और हर सैंपल में कोरोना वायरस मिला। इसका मतलब यह है कि यह किसी गलती से निकाला गया नतीजा नहीं है। ऐसे में पानी में कोरोना का होना आगे किस तरह खतरा बन सकता है यह भी सोचने की बात है, और उसके लिए सावधानी बरतने की बात भी है।

आज जो लोग कोरोना को गुजर चुका मान रहे हैं, और वैक्सीन से परहेज कर रहे हैं या लापरवाह हो रहे हैं उन्हें भी इन ताजा नतीजों को देखते हुए अपने तौर-तरीके बदलने चाहिए। इन वैज्ञानिक निष्कर्षों को देखते हुए भारत सरकार को देश भर के लिए इससे बचाव के तरीके निकालकर राज्यों के साथ बांटने चाहिए और देश के दूसरे वैज्ञानिक संस्थानों के लोगों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए कि ऐसे खतरे से कैसे बचा जा सकता है। यह मामला महज एक-दो नदियों का नहीं है गुजरात में तो कई झीलों का पानी भी लिया गया और उनमें भी हर सैंपल में कोरोना वायरस मिला है। इसलिए यह किसी एक नदी के प्रवाह से फैला हुआ नहीं है, और यह बात भी है कि यह पानी में इस तरह जिंदा रह रहा है कि वह कई हफ्तों तक लगातार लिए गए नमूनों में लगातार बने रहा। आईआईटी गुजरात ने 4 महीने तक लगातार हर हफ्ते कई नदियों और झीलों से सैंपल लिए, और उनमें से हर किसी में कोरोना पॉजिटिव मिला। इस देश की शायद आधी आबादी सीधे नदी-तालाब में निस्तारी से काम चलाती है, और अगर इनके पानी से कोरोना अगर इंसानों में आने लगेगा, या जानवरों में जाने लगेगा तो क्या होगा?

एक दूसरा खतरा 
कांग्रेस पार्टी के एक प्रवक्ता ने ट्विटर पर यह पोस्ट करके एक बवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कोरोना वैक्सीन में नवजात बछड़े के खून से निकला गया सीरम मिलाया गया है? वैज्ञानिकों ने इस पर खुलासा किया है कि वैक्सीन विकसित करते हुए किसी एक स्तर पर बछड़े के सीरम का इस्तेमाल होता है, लेकिन लोगों तक पहुँचने वाली वैक्सीन में ऐसा कुछ भी नहीं मिला है। भाजपा ने भी कांग्रेस प्रवक्ता की इस बात को गलत बताया है, और इसे लोगों को वैक्सीन से दूर करने की गैरजिम्मेदार हरकत करार दिया है। कांग्रेस प्रवक्ता की ऐसी पोस्ट हम एक बहुत ही गैर जिम्मेदारी का काम मानते हैं, क्योंकि डायबिटीज के मरीजों के लिए इंसुलिन की दवाई हो या कई किस्म के टीके हों, इनको विकसित करते हुए कई बार जानवरों के शरीर के कुछ पदार्थ इस्तेमाल किए जा सकते हैं। हिंदुस्तान में हिंदुओं के बीच गाय को लेकर जैसी भावनाएं हैं, या मुस्लिमों के बीच में सूअर को लेकर जिस तरह की हिकारत है, या सिखों के बीच जानवरों को काटने के तरीके को लेकर अपनी मान्यताएं हैं, इन सबको पूरा करने की बात अगर की जाएगी तो दुनिया में कोई चिकित्सा-वैज्ञानिक परीक्षण हो भी नहीं सकेंगे। आज जब पूरी दुनिया महामारी का एक खतरा झेल रही है, आज इस वक्त हिंदुस्तान में इतनी बड़ी संख्या में लोग मारे जा चुके हैं, और तीसरी लहर के खतरे का अंदेशा बना हुआ है, उस वक्त इस किस्म की जटिल-वैज्ञानिक बात पोस्ट करना और एक सनसनीखेज समाचार की शक्ल में किसी वैज्ञानिक बात को, सच या झूठ को तोड़-मरोड़ कर सामने रखना, एक जुर्म सरीखा काम है। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है क्योंकि अगर हिंदुओं के बीच इस बात की दहशत हो गई कि इसमें गाय के शरीर के खून या किसी और चीज को मिलाया गया है, तो बहुत से लोग वैक्सीन से परहेज करने लगेंगे। 

लोगों को याद होगा कि जब पोलियो वैक्सीन दी जाती थी तो हिंदुस्तान के कुछ प्रदेशों में कई मुस्लिम इलाकों के बीच इसे लेकर तरह-तरह की आशंकाएं थीं और लोग अपने बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स नहीं पिलाते थे। किसी वैक्सीन को विकसित करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया में अगर किसी स्तर पर किसी जानवर के शरीर का निकला हुआ कोई अंश इस्तेमाल भी होता है तो उसे इस तरह सार्वजनिक मंच पर लापरवाही और गैरजिम्मेदारी से चर्चा और खबर में लाना, उसकी सनसनी फैलाना, एक बहुत ही गैरजिम्मेदारी का जुर्म है। कांग्रेस पार्टी पता नहीं क्या सोच कर अपने प्रवक्ता से ऐसा कहला रही है। अब तक तो कांग्रेस पार्टी का कोई खंडन अपने प्रवक्ता की ट्वीट के खिलाफ आया नहीं है, और उसने देश भर की फजीहत के इस सामान को लेकर अपनी आलोचना का एक बड़ा मौका विरोधी पार्टियों को दिया है। आज देश में तमाम लोगों को ऐसी सनसनी फैलाने से बचना चाहिए और कांग्रेस की इस गैरजिम्मेदारी का बुरा नतीजा पूरे देश में देखना पड़ सकता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 जून 2021


 

नफरत का ऐसा सैलाब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए है बहुत बड़ा खतरा

 17 जून 2021

 हिंदुस्तान बड़ा ही दिलचस्प देश है। लोगों को बारहमासी नफरत से कभी आजादी ही नहीं मिलती, और आबादी का एक बड़ा हिस्सा यह आजादी चाहता भी नहीं है। रात-दिन बहुत से लोग इस फिक्र में दुबले हुए रहते हैं कि हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच कोई तनातनी खड़ी क्यों नहीं हो पाई। जहां पर हिंदू-मुस्लिम विवाद की गुंजाइश कम दिखती है वहां पर लोग हिंदू-ईसाई झगड़ा ढूंढ निकालते हैं, जहां वह भी नहीं दिखता है वहां पर सवर्ण और दलित का झगड़ा ढूंढ निकालते हैं, आदिवासियों से शहरी लोग अपना झगड़ा ढूंढ निकालते हैं। यह सिलसिला कभी खत्म ही नहीं होता, और अब तो सोशल मीडिया की मेहरबानी से नफरत को किसी आग की तरह सुलगाते रहना आसान हो गया है। ताजा बवाल खड़ा किया जा रहा है एक मुस्लिम से शादी करने वाली हिंदू अभिनेत्री करीना कपूर का बहिष्कार करने का। 

ऐसी खबर आई ही थी कि सीता नाम की एक फिल्म बन रही है और उसमें सीता का किरदार निभाने के लिए करीना कपूर को छाँटा जा रहा है तो उसे लेकर कई हिंदू संगठन, और हिंदू धर्म के बहुत से स्वघोषित ठेकेदार विरोध करके अपने अस्तित्व को साबित करने में लग गए हैं कि वे अभी भी जिंदा है, और सक्रिय हैं। उनका विरोध है कि एक मुस्लिम अभिनेत्री को सीता के किरदार के लिए क्यों छांटा गया है। कई दिनों से ट्विटर पर बाइक और करीना खान नाम का एक बहिष्कार चलाया जा रहा था जिस पर दसियों हजार लोगों ने अपनी नफरत जाहिर की थी। आज नागपुर की खबर है कि वहां पर बजरंग दल के लोगों ने जाकर कलेक्टर को एक ज्ञापन दिया है कि अगर यह फिल्म बनी तो इसका जमकर विरोध किया जाएगा और विरोध करने की वजह में उन्होंने कुछ तस्वीरें भी लगाई हैं जिनमें करीना कपूर बिकनी पहने हुए दिख रही हैं और एक फोटो में वे अजमेर की दरगाह की यात्रा भी कर रही हैं। इन बातों को लेकर एक मुस्लिम अभिनेत्री के सीता का किरदार करने का विरोध किया जा रहा है। 

भाजपा से जुड़े हुए जितने अभिनेता और अभिनेत्री रहे हैं उन्होंने किस-किस फिल्म में किस धर्म के लोगों का किरदार निभाया था इसकी एक लंबी लिस्ट बन सकती है। लव जिहाद नाम का एक शब्द उछालकर जिस तरह से समाज में नफरत और दहशत दोनों फैलाई जा रही थी, उस वक्त भी नफरतजीवी लोग यह देखने से इंकार कर रहे थे कि किस तरह भाजपा की सांसद अभिनेत्री हेमा मालिनी ने पहले से शादीशुदा एक अभिनेता धर्मेंद्र से दूसरी शादी करने के लिए धर्म बदला था। अब यह बात लव जिहाद के दायरे में आती है या नहीं यह कहना मुश्किल है क्योंकि नफरतजीवी लोगों ने लव जिहाद की कोई सरकारी परिभाषा अभी तक जारी नहीं की है। लेकिन सवाल यह है कि अगर हिंदुस्तान में नफरत इस हद तक इस्तेमाल की जानी है कि किसी धर्म के किरदार को उसी धर्म के कलाकार निभाएं, तो फिर यहां एक धर्मराज की जरूरत है, यहां लोकतंत्र की जरूरत ही क्यों हैं?

यह बात हिंदू धर्म के देश के सबसे संगठित संगठन भाजपा की तरफ से औपचारिक रूप से नहीं उठाई गई है, लेकिन पिछले हफ्ते-दो हफ्ते से सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही सबसे घटिया और सबसे हिंसक इस नफरत का कोई विरोध भी भाजपा की तरफ से नहीं किया गया है, और न ही केंद्र सरकार ने ऐसी हिंसक नफरत पर कोई कार्रवाई की है जिसमें एक मुस्लिम से शादी करने वाली जन्म से हिंदू अभिनेत्री के एक हिंदू किरदार करने के खिलाफ यह आंदोलन चलाया जा रहा है। ऐसी नफरत फैलाना अगर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है तो फिर क्या उत्तर प्रदेश और दिल्ली में की जाने वाली एक-एक अकेली ट्वीट को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मान लेना ठीक है? चूँकि बजरंग दल देश में सत्तारूढ़ भाजपा के सहयोगी संगठन आरएसएस के तहत आने वाले दर्जनों संगठनों में से एक माना जाता है, इसलिए भाजपा और आरएसएस को भी इस मुद्दे पर अपनी राय जाहिर करनी चाहिए कि वे फिल्मी किरदार निभाने वाले लोगों के लिए धार्मिक अनिवार्यता तय करना चाहते हैं क्या? अगर ऐसा नहीं है तो हिंदुस्तान में आज की जलती-सुलगती दिक्कतों और बुनियादी मुद्दों की तरफ से ध्यान भटकाने के लिए इस किस्म के शिगूफे राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा क्यों बनने दिए जा रहे हैं? क्या अब कोई मुस्लिम लेखक हिंदू किरदारों को लेकर कोई कहानी भी नहीं लिख सकेंगे? या क्या अब राही मासूम रजा को कब्र से निकालकर रामायण लिखने की सजा सुनाई जाएगी? देश के इस खतरनाक होते माहौल पर राजनीतिक दलों की, और उनसे भी अधिक सरकार की चुप्पी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक खतरा है। एक तरफ तो देशभर में अलग-अलग प्रदेशों में सत्तारूढ़ दल से असहमति रखने वाले लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा अध्यादेश के तहत जुर्म दर्ज करने का काम थानेदार भी कर ले रहे हैं, और दूसरी तरफ पूरे देश में नफरत और हिंसा के ऐसे संगठित अभियान को चलाने वाले लोगों की नीयत और उनके खतरे को केंद्र सरकार इस हद तक अनदेखा कर रही है। आज यह नफरत फैलाने वाले लोग, लव जिहाद नाम का शब्द उछालकर हिंसा करने वाले लोग, इस बात को पूरी तरह अनदेखा करते हैं कि किस-किस राजनीतिक दल के कौन-कौन से सांसद और मंत्री ऐसे ही लव जिहाद के तहत अपना परिवार बसाकर सुख से जीते हैं।

एक तरफ तो बड़े-बड़े नेता अपनी खुद की शादी के वक्त ऐसे किसी फतवे की फिक्र नहीं करते, देश के बड़े-बड़े कामयाब लोग और दौलतमंद लोग ऐसे फतवों और झंडे-डंडों से परे जब चाहे जिससे शादी करते हैं, और अपनी मर्जी से धर्म निभाते हैं या नहीं निभाते हैं। लेकिन आम लोगों को ऐसे नफरत की मार मारने के लिए ऐसे ही बजरंग दल जैसे संगठनों के लोग झंडे-झंडे लेकर निकलते हैं। इनको अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए और उसे साबित करने के लिए ऐसे शिगूफा तलाशकर रखने पड़ते हैं। लेकिन ऐसी हरकतें हिंदुस्तान की राष्ट्रीय एकता के खिलाफ हैं, और जो राजनीतिक दल, जो सरकार इसके खतरों को कम आंकती हैं, वह हमारे हिसाब से कम गुनहगार नहीं हैं।

(Daily Chhattisgarh)