इस भूखी दुनिया में खाने की बर्बादी रोकना जरूरी

    24 जुलाई 2021

 दुनिया के बहुत से देशों में कारोबार कर रही अमेरिका की स्टारबक्स नाम की कॉफ़ी कंपनी ने घोषणा की है कि वह अमेरिका के अपने फास्ट फूड और कॉफ़ी के आउटलेट में न बिका हुआ खाने-पीने का सामान उस इलाके के जरूरतमंद और भूखे लोगों के लिए ऐसे समाजसेवी संगठनों को देगी जो उसे बांट सकें। इस कंपनी ने अगले 10 बरस में 100 मिलियन डॉलर की ऐसी मदद करने की घोषणा की है। अभी हम इस रकम को लेकर यह अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं कि यह कंपनी कितनी बड़ी है और अमेरिकी हालात में यह मदद कितनी बड़ी रहेगी। लेकिन हम इसे इस मुद्दे के रूप में देख रहे हैं कि दुनिया के बहुत से ऐसे खाने-पीने के कारोबार हैं जिनमें बहुत सा सामान बचता है जो फेंकने में जाता है या बर्बाद हो जाता है. दूसरी तरफ हर शहरी इलाके में बहुत से गरीब लोग भूखे रहते हैं या कम खा कर जीते हैं. कारोबार की सामाजिक जिम्मेदारी के हिसाब से देखें तो ऐसा लगता है कि इन दोनों का एक मेल हो सकता है. और दुनिया के बहुत से ऐसे बड़े दुकानदार भी हैं जो सामान फेंकने के बजाय उन्हें निकालकर दुकान के बाहर रख देते हैं और जरूरतमंद लोग उन्हें उठाकर ले जाते हैं. दुनिया में भूख बहुत बुरी तरह फैलती और बढ़ती जा रही है, दूसरी तरफ खाने-पीने की बर्बादी इतनी अधिक होती है कि अमेरिका जैसे दुनिया के कई देश बहुत बुरी तरह के मोटापे के शिकार हैं। मोटापे का मतलब जरूरत से अधिक खाना ही होता है। तकरीबन तमाम अधिक मोटे लोग खाने की बर्बादी बदन के बाहर करने के बजाय बदन के भीतर करते हैं. नतीजा यह होता है कि वह महंगे अस्पतालों के लिए एकदम फिट मरीज हो जाते हैं। इस हिसाब से भी यह सोचने की जरूरत है कि जो लोग जरूरत से अधिक खा रहे हैं, यानी जिनके पास जरूरत से अधिक खाना है, उन लोगों से भी कुछ खाना गरीबों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है।

इस मुद्दे पर पढ़ते हुए भारत की एक प्रमुख पर्यावरण पत्रिका डाउन टू अर्थ में छपा हुआ एक लेख दिख रहा है जिसमें फीडिंग इंडिया नाम के एक संगठन के बारे में बताया गया है। इस संगठन की एक संस्थापक सृष्टि जैन ने कहा कि हर शादी में औसतन 15-20 फ़ीसदी खाना बर्बाद होता है और जो कि 25-50 किलो से लेकर 800 किलो तक रहता है इतने खाने से 100-200 लोगों से लेकर 2-4 हजार लोगों तक का पेट भरा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट भी मेहमानों की संख्या सीमित करने के बारे में सोच रहा था, लेकिन तब तक अधिक व्यावहारिक बात यह है कि अधिक बने हुए खाने को किस तरह भूखे लोगों तक पहुंचाया जाए, और उनका संगठन यह काम करने में लगा हुआ है। डाउन टू अर्थ पत्रिका ने एक बड़े कैटरर से बात की जो शादियों की पार्टियों में खाने का इंतजाम करते हैं. उनका तजुर्बा यह रहा कि छोटी पार्टियों में करीब 40 फ़ीसदी खाना बर्बाद होता है और बड़ी पार्टियों में यह 60 फ़ीसदी तक हो सकता है क्योंकि लोग जितने मेहमानों को बुलाते हैं उतने आते नहीं, और वे जितने किस्म की चीजें बनाते हैं उतनी चीजों की खपत नहीं होती। उनका कहना यह है कि 500 लोगों की दावतों में 700 लोगों के खाने लायक खाना बना लिया जाता है, और ऐसी दावत तो में कई बार 300 लोग ही पहुंचते हैं.

यह कोई बहुत मौलिक और नई सोच की बात नहीं है हिंदुस्तान में आज से कई दशक पहले मुंबई में एक कोई समाजसेवी संगठन ऐसा था जो शादी-ब्याह के बाद बचा हुआ बिना जूठा खाना ले जाकर अपनी गाड़ियों में गरीब बस्तियों में जरूरतमंद गरीबों को खिलाता था। हर दावत में खाना जरूरत से ज्यादा बनता है और बर्बाद होने के बजाय ऐसा खाना दूसरों तक पहुंचाना एक बड़ा भला काम है. मुंबई के अलावा कुछ और शहरों में भी अलग-अलग स्तर पर यह काम हुआ है और कुछ जगहों पर तो लोगों ने दावतों में खाने की बर्बादी रोकने के लिए खाने की टेबलों पर यह तख्ती लगानी शुरू कर दी है कि कृपया उतना ही खाना लें जितना आप खा सकते हैं। कुछ संपन्न और सवर्ण तबकों में ऐसी दावतों के वीडियो भी सामने आए हैं जिनमें कोई एक जिम्मेदार व्यक्ति खड़े होकर प्लेट रखने वाले लोगों को वापिस भेज रहे हैं कि प्लेट का पूरा खाना खाकर खाली प्लेट लेकर आएं।

ऐसी जागरूकता और इसी तरह तरह की पहल जरूरी है क्योंकि आज दुनिया में एक तरफ खाने की बर्बादी जारी है और दूसरी तरफ भूख से लोगों की जिंदगी बर्बाद हो रही है। इन दोनों बातों को जब भी एक साथ रखकर देखें, तो लगता है कि यह संपन्न तबके की और समाज की एक किस्म की हिंसा है जो कि गरीब और भूखे लोगों को अनदेखा करके खाना-पीना इतना बर्बाद करती है। लोग इस बात को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बना लेते हैं कि वे कितने अधिक किस्म के खाने परोसते हैं, और कितना जबरदस्ती लोगों को खिला सकते हैं, फिर भले ऐसा खिलाना उनके मेहमानों की सेहत के लिए बहुत नुकसानदेह ही क्यों ना हो। इसलिए समाज में ऐसी जागरूकता की जरूरत है जो लोगों को सीमित किस्म के खाने परोसने के सामाजिक प्रतिबंध भी लगाए। कुछ शहरों में कुछ समाज के लोगों ने ऐसा किया हुआ भी है। दूसरी तरफ दावतों के बाद बचे हुए खाने को जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने के लिए सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए। हमने अलग-अलग किस्म के बहुत से समाजसेवी संगठनों के काम देखे हैं जो कि बड़ी मेहनत करते हैं लाशों को घर पहुंचाने का काम करते हैं, कफन-दफन का काम करते हैं, अंतिम संस्कार करते हैं। इसलिए खाने की बर्बादी रोकने के लिए भी ऐसे संगठन जरूर बन सकते हैं, या मौजूदा संगठन इस काम को भी कर सकते हैं. 

(Daily chhattisgarh)

किसान मवाली हैं, तो फिर ऐसे मवालियों का उगाया न खाएं !

23 जुलाई 2021

 केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी कल भाजपा कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसानों के प्रदर्शन पर एक सवाल का जवाब दे रही थीं, और उन्होंने काफी आक्रामक तरीके से कहा- फिर किसान आप उन लोगों को बोल रहे हैं, मवाली हैं वो। इसका वीडियो मौजूद है जो उनके शब्दों को बड़ा साफ-साफ बतला रहा है। लेकिन जैसा कि बाद में होता है, उन्होंने एक और बयान में कहा कि उनके शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा गया है, फिर भी अगर उनके शब्दों से कोई किसान आहत हुआ है, तो वह उन्हें वापस लेती हैं। इन दोनों बातों के वीडियो हमने देखे हैं और इन दोनों बातों में कहीं गलतफहमी की कोई गुंजाइश नहीं है।

मीनाक्षी लेखी केंद्रीय राज्य मंत्री बनने के पहले सुप्रीम कोर्ट सहित बहुत सी अदालतों में वकालत कर चुकी हैं, और पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुकी हैं। वे हिंदी भाषी इलाके से हैं इसलिए किसी गैर हिंदी भाषी प्रवक्ता या नेता के मुंह से निकले अटपटे शब्दों के लिए उन्हें संदेह का लाभ देने की कोई गुंजाइश भी मीनाक्षी लेखी के साथ नहीं है। वे लंबे समय से भाजपा के कई पदों पर दिल्ली में ही काम करती रही हैं जो कि मोटे तौर पर हिंदी भाषी प्रदेश है और वह खुद भी वकील रहते हुए वे मवाली शब्द का मतलब न समझें ऐसा हो नहीं सकता। इसलिए अपने शब्दों के बचाव में बाद में उनका चाहे जो बयान नुकसान को घटाने के लिए आया हो, किसानों की जो बेइज्जती होनी थी, वह तो हो ही चुकी है। राजनीति में सत्ता पर रहते हुए बहुत से लोग इस तरह बड़े हमलावर शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, वह अगर ज्यादा आक्रामक रहते हैं तो वह पूरे के पूरे वाक्यों और मिसालों को बहुत ही हमलावर बनाकर बोलते हैं, गाड़ी के नीचे आ जाने वाले पिल्ले जैसी मिसाल । यह जानते हुए भी बोलते हैं कि इन दिनों किसी शहर स्तर के नेता की कही हुई बात को भी कई कई कैमरे रिकॉर्ड करते ही रहते हैं. इसलिए यह समझना मुश्किल होता है कि कौन सी बात किसके मुंह से चूक से निकली है, और कौन सी बात सोच-समझकर किसी हथियार की तरह चलाई गई है। फिर भी किसानों के व्यापक तबके के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब में उन्हें मवाली करना कुछ अधिक ही हमलावर और अपमानजनक बात है इसलिए पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने बिना वक्त गवाएं तुरंत ही मीनाक्षी लेखी के इस्तीफे की मांग की है, और उन्होंने यह भी याद दिलाया है कि दिल्ली की सरहद पर आंदोलन शुरू होने के बाद से किसानों के खिलाफ कई भाजपा नेताओं ने समय-समय पर अपमानजनक बातें कही हैं, उनके आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की है।

यह बात बहुत हद तक सही है क्योंकि केंद्र सरकार सहित हरियाणा के भी कई भाजपा नेताओं, और मंत्रियों ने किसानों के बारे में समय-समय पर बहुत ओछी बातें कही हैं। और हैरानी यह होती है कि किसानों पर ऐसे हमलों के बीच ही असम, बंगाल, और केरल जैसे चुनाव भी निपट गए, अब तो उस पंजाब का चुनाव सामने खड़ा हुआ है जहां से इस आंदोलन में शुरू से किसान आए हुए हैं, इससे जुड़े हुए हैं। देश में कोई एक प्रदेश किसानों के मुद्दों से सबसे अधिक जुड़ा हुआ है तो वह पंजाब है. आज देश में जितने किस्म के अलग-अलग पेशेवर तबके हैं उनमें शायद किसान ही अकेले ऐसे हैं जो भ्रष्टाचार से सबसे कम जुड़े हुए हैं, जो कोई भी गुंडागर्दी नहीं करते हैं, और जो कुदरत और सरकार इन दोनों के रहमो करम पर जीते हुए मेहनत करते हैं, और राजनीतिक दलों और सरकारों के किए हुए वायदों के पूरे होने की उम्मीद रखे हुए जिंदगी गुजार लेते हैं। किसानों ने अपने आंदोलन में कभी किसी को मारा नहीं है, देश का इतिहास गवाह है कि हर बरस हजारों किसान आत्महत्या कर लेते हैं, लेकिन ऐसा कोई भी साल नहीं है जब किसानों ने कुछ दर्जन भी हत्याएं की हों। और एक तबके के रूप में तो किसानों ने कभी भी कोई हिंसा नहीं की है। दिल्ली में भी स्वतंत्रता दिवस के दौरान जिन लोगों ने वहां आकर हिंसा की वे लोग भाजपा से जुड़े हुए थे, चर्चित और नामी-गिरामी थे जिनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के साथ हैं, और जिनके खिलाफ सुबूत भी मिले और मुकदमे भी चल रहे हैं. लेकिन किसानों ने एक तबके के रूप में, एक आंदोलन के रूप में कोई हिंसा नहीं की।

इसलिए हमारा ख्याल है कि किसानों को मवाली कहना न सिर्फ किसानों का अपमान है, बल्कि इस देश के हर उस इंसान का अपमान है जिसका पेट किसानों के उगाए हुए अनाज से भरता है. और किसानों से परे भी लोगों को ऐसी जुबान का विरोध करना चाहिए और भाजपा के लिए बेहतर यह होगा कि एक मंत्री की कही हुई बात और फिर वापस लिए गए शब्दों से ऊपर जाकर, वह एक पार्टी के रूप में किसानों से माफी मांगे, और अपनी पार्टी के बाकी नेताओं के लिए भी यह चेतावनी जारी करे कि किसानों के बारे में अभद्र और अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करने से बाज आएं. ऐसा नहीं है कि बंगाल और केरल के चुनावों में भाजपा के नेताओं का किसानों के खिलाफ कहा हुआ कमल छाप के खिलाफ न गया हो। देश के हर प्रदेश में किसान हैं और कम से कम आम नागरिकों में तो बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि किसानों से हमदर्दी रखते हैं, किसानों के लिए सम्मान रखते हैं. इसलिए भाजपा को पंजाब चुनाव में इस मवाली-शब्दावली का नुकसान हो उसके पहले उसे खुले दिल से, और साफ शब्दों में, बिना किंतु परंतु किए हुए किसानों से माफी मांगनी चाहिए। 

(Daily chhattisgarh)

बिना देर किए हिंदुस्तान में पेगासस से की गई जासूसी की सर्वोच्च जांच शुरू हो

    22 जुलाई 2021

 दुनिया के कई देशों में लोगों के मोबाइल फोन पर घुसपैठ करके जासूसी करने वाले इजराइली सॉफ्टवेयर पेगासस का मामला जल्दी ठंडा होते नहीं दिख रहा है क्योंकि कई विकसित और सभ्य लोकतंत्र इसके शिकार हुए हैं। फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों ने इसकी औपचारिक जांच की घोषणा की है। हिंदुस्तान में लोकतंत्र तो पुराना है और हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भी भरता है, लेकिन यहां पर सरकार अभी तक इस बात पर साफ-साफ जवाब देने से भी कतरा रही है कि उसने पेगासस सॉफ्टवेयर खरीदा था या नहीं, और इससे देश के लोगों पर हुई जासूसी की खबर उसे है या नहीं। यहां पर समझने की बात यह है कि हिंदुस्तान में डाटा प्राइवेसी कानून देश के हर नागरिक और संस्थान को उसके डेटा की सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है और जब लोगों के टेलीफोन पर घुसपैठ करके इस तरह से डाटा चोरी किया गया, तो उसकी जांच और उस पर कार्रवाई भी केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बनती है। लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक इस मामले की जांच के बारे में कुछ भी नहीं कहा है। सरकार का संसद के भीतर और संसद के बाहर बयान बहुत ही अमूर्त किस्म का, गोलमाल शब्दों का बयान है, जिसमें सरकार न तो इस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की बात मंजूर कर रही है और ना इसे इस्तेमाल करने का खंडन कर रही है।

निजता पर आए ऐसे गंभीर खतरे के बीच सुप्रीम कोर्ट में एक पिटीशन लगाई गई है कि सुप्रीम कोर्ट इस जासूसी सॉफ्टवेयर की खरीदी पर रोक लगाए। जैसा कि यह कंपनी कहती है वह इसे केवल सरकारों को बेचती है, ऐसे में हिंदुस्तान में सिर्फ सरकार ही इसे कानूनी रूप से खरीद सकती है, तो सुप्रीम कोर्ट से इस पर रोक लगाने की मांग सीधे-सीधे सरकार पर यह रोक लगाने की मांग है कि वह इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल न करे। अभी इस याचिका पर अदालत में कोई सुनवाई नहीं हुई है लेकिन देश के लोगों को इस जासूसी घुसपैठ के मामले से खत्म होने वाली निजता का मामला बहुत ही भयानक लग रहा है, और हो सकता है कि इसकी गंभीरता को देखकर सुप्रीम कोर्ट इस पर कोई आदेश भी करें। सुप्रीम कोर्ट शायद याचिका को इस नाते भी गंभीरता से देखेगा कि सुप्रीम कोर्ट के एक पिछले मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ उनकी मातहत कर्मचारी द्वारा लगाए गए सेक्स शोषण के आरोपों की जांच के चलते समय बताया जा रहा है कि उस जज का फोन भी पेगासस के रास्ते हैक किया गया था, और शिकायतकर्ता महिला के परिवार के तो 8 मोबाइल फोन नंबर हैक किए गए थे, अब इनमें से कोई बात अभी तक साबित इसलिए नहीं हो रही है कि यदि सरकार ही हर बात की मनाही कर रही है।

फिलहाल हम यह देख रहे हैं कि दुनिया के कई देशों में इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके इतने तरह के काम किए गए कि उससे लोगों के बुनियादी अधिकार बुरी तरह कुचले गए। मेक्सिको में एक ऐसे पत्रकार की हत्या कर दी गई जिस पर पेगासस के माध्यम से नजर रखी जा रही थी, और यह सॉफ्टवेयर जिस फोन में घुसपैठ कर लेता है उसका लोकेशन भी बतला देता है, और उसके कैमरे और माइक्रोफोन से आसपास की बातों को सुन भी लेता है, आसपास की तस्वीरें भी देख लेता है। इसलिए एक बड़ा शक हो रहा है कि मेक्सिको में इस पत्रकार की हत्या के पीछे इस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल का हाथ रहा है। ऐसा ही दुनिया के कुछ दूसरे देशों में कुछ पत्रकारों की गिरफ्तारी के लिए तो किसी के बेडरूम में घुसकर अनैतिक संबंधों की तोहमत लगाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया है। पूरी दुनिया में पेगासस के ग्राहकों ने अपनी दिलचस्पी के जो टेलीफोन नंबर इस कंपनी में दर्ज करवाए थे, ऐसे करीब 50 हज़ार नंबर बताए जा रहे हैं, और हिंदुस्तान में ही ऐसे 300 से अधिक नंबर बताए जा रहे हैं, जिनकी निगरानी करना बताया जा रहा है।
 एक दिलचस्प बात यह है कि खुद इजराइल की सरकार ने अपने देश की इस कंपनी के इस सॉफ्टवेयर के रास्ते दुनिया भर में हुई जासूसी की जांच करवाने की घोषणा की है। लोगों को यह भी याद रखने की जरूरत है कि सऊदी अरब ने दुसरे देश में अपने दूतावास में बुलाकर एक वरिष्ठ पत्रकार की हत्या की थी, उस पत्रकार और उसके आसपास के लोगों के फोन भी इसी पेगासस सॉफ्टवेयर से निगरानी में रखे गए थे, उनमें घुसपैठ की गई थी।

अब दुनिया भर के साइबर विशेषज्ञ यह मान कर रहे हैं कि दुनिया की सरकारों के बीच इस बात को लेकर एक आम सहमति बनना चाहिए की जासूसी के नाम पर किस-किस तरह के अनैतिक काम न किए जाएं। इस तरह की सहमति कुछ दूसरे मामलों में सरकारों के बीच बनी हुई है जैसे मानव क्लोनिंग को लेकर दुनिया की सरकारों के बीच यह सहमति बनी हुई है कि इस पर काम नहीं होना चाहिए। यहां तक कि चीन जैसा दुस्साहसी प्रयोग करने वाला देश अभी कुछ समय पहले अपने देश के तीन वैज्ञानिकों को कैद सुना चुका है जिन्होंने एक बच्चे के जन्म के पहले उसके डीएनए में एडिटिंग करके उसे एचआईवी जैसी बीमारी के खिलाफ एक प्रतिरोधक शक्ति देने का काम किया था। चीन में ऐसी जेनेटिक एडिटिंग के बाद 3 बच्चे पैदा हुए और ऐसा प्रयोग करने वाले तीन वैज्ञानिकों को चीनी अदालत ने अभी कैद सुनाई है।

दुनिया में लोकतंत्र के हिमायती साइबर विशेषज्ञ यह मान कर रहे हैं कि पेगासस जैसे घुसपैठ करने वाले सॉफ्टवेयर बनाने और उसके इस्तेमाल पर रोक के लिए पूरी दुनिया में एक सहमति बननी चाहिए क्योंकि यह कंपनी चाहे जैसे दावे करती रहे कि यह सॉफ्टवेयर सिर्फ आतंक रोकने के लिए और ड्रग माफिया को रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, यह जाहिर है कि इसका इस्तेमाल सरकारों ने अपने विरोधियों के खिलाफ किया है, और ऐसी ताकत रखने वाला घुसपैठिया सॉफ्टवेयर दुनिया के लोकतंत्र को खत्म करके रख सकता है। इसलिए हिंदुस्तान की सरकार को तो इस बारे में बिना देर किए एक जांच की घोषणा करनी चाहिए जिससे वह अपनी खुद की साख भी बचा सकती है, और दुनिया के सभी जिम्मेदार लोकतंत्रों को एक पहल करनी चाहिए कि इस किस्म के घुसपैठिए सॉफ्टवेयर पर रोक लगाई जाए जो कि लोगों की आजादी, लोगों की निजता को इस हद तक खत्म कर सकते हैं। सरकार नहीं करेगी तो सुप्रीम कोर्ट अपनी निगरानी में जांच का हुक्म दे सकता है जिसमें सरकार को हलफनामे पर सब कुछ बताना होगा। 

(Daily chhattisgarh)

आंकड़ों का फरेब सुहाता है देश-प्रदेश की हर सरकार को

   21 जुलाई 2021

 केंद्र सरकार ने लंबे समय बाद हो रहे संसद के सत्र में एक सवाल के जवाब में कहा कि कोरोना के दौर में देश में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई। इसे लेकर देश हक्का-बक्का रह गया और संसद में कई विपक्षी दलों के लोगों ने इसे लेकर खासी नाराजगी जाहिर की क्योंकि इस पूरे दौर में लोग ऑक्सीजन की कमी से कोरोना मरीजों को मरते देख रहे थे, परिवार के लोगों को बिलखते देख रहे थे, अस्पतालों ने नोटिस लगा दिए थे कि ऑक्सीजन उनके पास नहीं है, और मरीजों को कहीं और ले जाएं। ऐसे में केंद्र सरकार का यह कहना कि ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई है, एक बड़ी ही अटपटी बात लग रही है। लेकिन इससे भी अधिक दिलचस्प और तकलीफदेह बात यह है कि किसी राज्य सरकार ने अपने भेजे गए आंकड़ों में केंद्र सरकार को यह नहीं कहा कि उनके राज्य में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत हुई है। केंद्र सरकार की इस बात में दम है कि वह तो महज राज्यों से मिले हुए आंकड़ों को जोडक़र संसद को बतला देती है। यह एक अलग बात है कि केंद्र सरकार लगातार यह देख रही थी कि ऑक्सीजन की कमी से देश में मौतें हो रही हैं और देश में ऑक्सीजन की बहुत बुरी कमी चल रही है, लेकिन जब तक अस्पतालों के इंचार्ज राज्य के अधिकारी यह बात मानेंगे नहीं कि ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुई हैं, तब तक केंद्र सरकार अपनी तरफ से कैसे कह सकती है कि कुछ मौतें ऑक्सीजन की कमी से भी हुई हैं ?

भारत में केंद्र और राज्य सरकारों का यह मिला-जुला पाखंड नया नहीं है। इस देश में पिछली करीब पौन सदी से यह देखने में आ रहा है कि जब कभी भूख से कोई मौत होती है, तो वहां की राज्य सरकार बड़ी तेजी से ऐसी पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश कर देती है जिसमें लाश के पेट से पचा हुआ खाना निकला बताया जाता है। मरने वाले के घर पर कुछ किलो अनाज दिखा दिया जाता है। उस इलाके की राशन दुकान के रिकॉर्ड बताने लगते हैं कि मरने वाले को कुछ दिन पहले ही अनाज दिया गया था। कुल मिलाकर कोई भी राज्य सरकार हिंदुस्तान में आज तक इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुई है कि उनके यहां भूख से कोई मौत हुई है। और तो और, कुपोषण के जो आंकड़े बतलाते हैं कि बहुत से बच्चे कुपोषण की वजह से बहुत गंभीर रूप से कमजोर हैं, उनकी मौत पर भी उनकी मौत को कुपोषण से मौत दर्ज करने में सरकारें कतराती हैं, और उन्हें भी किसी बीमारी से मौत बतला दिया जाता है। बात यहीं तक सीमित नहीं है, कई ऐसे राज्य हैं जिन्होंने पिछले डेढ़ बरस में कोरोना से होने वाली मौतों को कोरोना के साथ दर्ज नहीं किया है और महज किसी और बीमारी से मौत दर्ज कर लिया है। नतीजा यह निकला कि केंद्र सरकार या राज्य सरकार जब कोरोना मौतों पर कोई मुआवजा देने की तैयारी कर रही हैं, तो उस लिस्ट में भी इन मरने वालों के घर वालों का नाम नहीं आ पा रहा क्योंकि उनकी मौतों को ही कोरोना मौत दर्ज नहीं किया गया है।

सरकारों का गजब का करिश्मा तो तब देखने मिलता है जब उनके राज्य में कोई किसान आत्महत्या करते हैं। किसानों की आत्महत्या क्योंकि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बनता है, और सरकार को जवाब देने में मुश्किल होती है, इसलिए देश के कई राज्यों ने किसान की आत्महत्या को कुछ दूसरी वजहों के साथ दर्ज करना शुरू कर दिया है। आत्महत्या करने वाले के पेशे या रोजगार के कॉलम में किसान दर्ज ही नहीं किया जाता। और आत्महत्या की वजह में नशे की आदत, कर्ज में डूबना, या कहीं अवैध प्रेम और सेक्स संबंध जैसी बातें दर्ज कर ली जाती हैं, लेकिन किसानी के नुकसान से, किसानों के कर्ज से आत्महत्या हुई हो, ऐसा रिकॉर्ड में नहीं आने दिया जाता। नतीजा यह होता है कि सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार किसान की आत्महत्या पर उठने वाले असुविधाजनक सवालों से बच जाती हैं।

हिंदुस्तान में केंद्र सरकार और राज्य सरकारें अपनी सार्वजनिक छवि को बचाने के लिए सरकारी आंकड़ों को किसी भी हद तक दबाने-कुचलने, तोडऩे-मरोडऩे के लिए एक पैर पर खड़ी रहती हैं। जनधारणा का प्रबंधन पूरी तरह आंकड़ों और इमेज को लेकर चलता है। एक वक्त कुछ होशियार लोग यह कहते थे कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव 5 साल काम करके नहीं, चुनाव का मैनेजमेंट करके जीते जाते हैं। अब एक बात लग रही है कि चुनाव जनधारणा प्रबंधन से जीते जाते हैं, और लोगों के सामने सरकार की कैसी छवि पेश की जाती है, इससे भी जीते जाते हैं। भारतीय चुनावों में और भी कई मुद्दे रहते हैं जिनमें धर्म और जाति के आधार पर ध्रुवीकरण, लोगों के बहुसंख्यक तबके को खुश करने वाले कई किस्म के मुद्दे रहते हैं जिनमें अल्पसंख्यकों को प्रताडि़त करने के मुद्दे भी शामिल रहते हैं। जब सरकारें झूठे और फरेबी आंकड़ों से अपने को बेहतर दिखाने की कोशिश करती हैं तो राज्यों के भेजे गए झूठे आंकड़ों पर भी केंद्र सरकार ने कोई आपत्ति नहीं की क्योंकि अलग-अलग पार्टियों की राज्य सरकारें जो भेज रही है उनसे केंद्र सरकार की एक देश के रूप में बेहतर छवि बनाने की कोशिश बिना खुद की मेहनत के पूरी हो रही है।

ऐसे में संसद में एक विपक्षी सांसद के दिए गए इस बयान को देखने की जरूरत है जिसने सोशल मीडिया पर लोगों को हिला कर रख दिया है। राज्यसभा में कोरोना पर बहस के दौरान आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि पूरे सदन को उन लोगों से माफी मांगनी चाहिए जिनकी लाशें गंगा में तैर रही थीं, पर उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया गया। झा ने कोरोना संकट के दौरान ऑक्सीजन की कमी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सांसद होने के बावजूद वे लोगों की मदद नहीं कर पाए। मनोज झा ने कहा कि कोरोना के प्रकोप में देश के तमाम परिवारों ने किसी अपने को खोया है। उन्होंने कहा, ‘हम सबको एक साझा माफीनामा उन लोगों को भेजना चाहिए जिनकी लाशें गंगा में तैर रही थीं।’ उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि हमने इस कोरोना महामारी में ऑक्सीजन की कमी के कारण कई मौतें देखी है। उन्होंने कहा कि हम आंकड़ों की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि सच्चाई से रूबरू होकर यह कहना चाहते हैं कि ये जो लोग हमारे बीच से आज चले गए, वो एक जिंदा दस्तावेज छोडक़र गए हैं, हमारी नाकामी का, उन्होंने कहा कि यह कलेक्टिव फेल्योर है 1947 से लेकर अब तक की सभी सरकारों का। मुफ्त वैक्सीन पर भी तंज कसते हुए झा ने कहा कि यह मुफ्त राशन, मुक्त वैक्सीन की बात जो हो रही है, यह कुछ मुफ्त नहीं है, इस वेलफेयर स्टेट का एक कमिटमेंट है, उसको सरकार कम ना करे, उसे बौना ना बनाए। उन्होंने कहा ‘मैं चाहता हूं, जगाना चाहता हूं आपको भी और सभी को भी, क्योंकि हमने असम्मानजनक मौत को देखा है, और अगर हमने इसे दुरुस्त नहीं किया तो आने वाली पीढ़ी आप हमें माफ नहीं करेगी।’

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जुलाई 2021



 

पेगासस से जासूसी जिसने भी करवाई हो, जांच तो सरकार की ही जिम्मेदारी बनती है...

    19 जुलाई 2021

 दुनिया भर में इजराइल की एक कंपनी के बनाए हुए पेगासस नाम के एक सॉफ्टवेयर को लेकर हंगामा मचा हुआ है कि दर्जनों देशों की सरकारों ने इसका इस्तेमाल करके अपने देश के विरोधी नेताओं और मीडिया के लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी की, उनके फोन में घुसपैठ की, वहां से जानकारी चुराई, उनकी लोकेशन देखी कि वह किस वक्त कहां पर थे, उनके फोन की लॉग बुक देखी कि उन्होंने कब किसको फोन किया। और जैसा कि इस सॉफ्टवेयर को बनाने वालों का कहना है, जिस फोन में इसकी घुसपैठ हो गई, उसके कैमरा और माइक्रोफोन का इस्तेमाल करके बिना किसी को पता लगे इस सॉफ्टवेयर ने आसपास की तस्वीरें, वीडियो भेजने का काम किया, और वहां की आवाजों को बाहर ट्रांसमिट किया। कुल मिलाकर दुनिया के सभ्य लोकतंत्रों ने अपने नागरिकों की निजता के लिए जितने किस्म के कानूनी इंतजाम किए हैं, जितने तरह से उनकी हिफाजत के दावे किए हैं उसके ठीक खिलाफ जाकर इस कंपनी के ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया और बेचा जिसने सबके बदन पर से तौलिया खींच दिया। कहने के लिए इस कंपनी का दावा यह है कि वह इजराइल की डिफेंस मिनिस्ट्री की इजाजत से ही दुनिया की चुनिंदा सरकारों को यह सॉफ्टवेयर बेचती है, और इससे आतंकी हमलों पर काबू पाने की सोच बताई गई है, और इसके अलावा नशे की तस्करी, बच्चों की तस्करी, महिलाओं की तस्करी को रोकने के लिए भी इसके इस्तेमाल का दावा किया गया है। कंपनी ने बढ़-चढक़र यह भी कहा है कि वह सरकारों और सरकारी एजेंसियों के अलावा किसी को यह सॉफ्टवेयर नहीं बेचती है। लेकिन दुनिया की बाजार व्यवस्था बताती है कि बाजार में कमाई के लिए काम करने वाले लोग लोकतंत्र या सभ्यता का कितना सम्मान करते हैं, उनको मानवाधिकार की कितनी फिक्र रहती है, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। इसलिए जब ऐसा कोई सॉफ्टवेयर बना है तो यह जाहिर है कि उस तक किसी की भी पहुंच हो सकती है जिसके पास इसको खरीदने की ताकत हो। कहने के लिए तो आज दुनिया के बहुत से जंग के मोर्चों पर इस्तेमाल होने वाले खतरनाक फौजी हथियारों को भी उन्हें बनाने वाले कारखाने, किसी न किसी देश की सरकार को ही बेचते हैं, लेकिन दुनिया का इतिहास बताता है कि गृहयुद्ध में लगे हुए हथियारबंद समूहों तक ये सारे हथियार कहीं न कहीं से पहुंचते ही हैं। दिलचस्प बात यह है कि इजरायल की इस कंपनी ने यह खुलासा भी किया है कि उसका सॉफ्टवेयर अमेरिका के किसी टेलीफोन नंबर पर काम नहीं कर सकता। उसे ऐसा बनाया गया है कि उसका अमेरिका में या अमेरिका के फोन नंबरों पर कोई इस्तेमाल ना हो सके। अब सवाल यह है कि अमेरिकी सरकार का ऐसा कितना काबू इजराइल की इस कंपनी पर है कि वह अमेरिका में जासूसी के लायक सॉफ्टवेयर ही ना बनाएं और यह बात जासूसी की शौकीन अमेरिकी सरकार की मर्जी से हुई है, या उसकी मर्जी के खिलाफ यह भी अभी साफ नहीं है।

खैर, जिन देशों की बात इसमें आ रही है और दुनिया के करीब एक दर्जन सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ने मिलकर इस मामले की तहकीकात की है जिसमें दुनिया का सबसे बड़ा मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल भी शामिल था और दुनिया की कुछ सबसे बड़ी और साख वाली साइबर लैब ने इस मामले की जांच करके अपने नतीजे सामने रखे हैं। कुल मिलाकर जो तस्वीर सामने आ रही है उसमें यह है कि भारत में भी बहुत से ऐसे मीडिया कर्मी जिनका रुख सरकार के खिलाफ आलोचना का रहते आया है उनके फोन में भी पेगासस से घुसपैठ हुई है, दूसरी तरफ शुरुआती खबरें यह कहती हैं कि हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे हुए एक जज के खिलाफ भी इस सॉफ्टवेयर से घुसपैठ हुई और इस जज पर सेक्स शोषण का आरोप जिस मातहत महिला कर्मचारी ने लगाया था, उसकी शिकायत के बाद उसके परिवार के 8 लोगों के टेलीफोन में इस सॉफ्टवेयर से हमले किए गए और वहां से जानकारी चुराने की कोशिश की गई। यह भी बात सामने आई है कि भारत में विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के फोन भी इस हमले के शिकार हुए हैं।

 पिछले कुछ महीनों में ऐसी जानकारियां दूसरी बार सामने आई हैं और पिछली बार भी सरकार की तरफ से साफ-साफ शब्दों में ना तो पेगासस के इस्तेमाल की बात मानी गई थी न इसका खंडन किया गया था, और सिर्फ इतना कहा गया था कि निगरानी के लिए बने हुए कानून के मुताबिक ही काम किया जाता है। अभी भी जब दोबारा यह मामला उठा है और संसद का सत्र चल रहा है तब भी सरकार का रुख यही है कि मीडिया में सरकार पर पेगासस के इस्तेमाल को लेकर जो आरोप लग रहे हैं उन आरोपों में कोई दम नहीं है और वे किसी ठोस बुनियाद पर नहीं खड़े हैं। लेकिन सरकार की बात को ध्यान से पढ़ा जाए तो उसमें सरकार सीधे-सीधे इस बात पर कुछ कहने से बचते हुए दिख रही है कि इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भारत में हुआ है या नहीं। सरकार इस बारे में कुछ भी नहीं कह रही है वह इस बात का खंडन तक नहीं कर रही है।

इस दौरान मीडिया में जो रिपोर्ट आई हैं उनमें जानकार कानूनी विशेषज्ञों का यह कहना है कि सॉफ्टवेयर बनाने वाली विदेशी कंपनी अपने हिसाब से कुछ भी बना सकती है लेकिन हिंदुस्तान का कानून इस बारे में बहुत साफ है कि यहां के कानून के मुताबिक तय किए गए तरीकों से ही लोगों के टेलीफोन या ई-मेल की निगरानी की जा सकती है, लेकिन उनमें किसी तरह की हैकिंग नहीं की जा सकती। हैकिंग अगर सरकार भी इस देश में करती है तो भी वह गैरकानूनी होगी ऐसा जानकर लोगों का कहना है। वैसे तो अभी संसद का सत्र चल रहा है और सरकार जवाबदेही के सबसे बड़े मंच पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए एक किस्म से मजबूर है, लेकिन सच तो यह है कि चतुर और चालबाज सरकारें कुछ गोलमोल शब्दों का सहारा लेकर साफ-साफ जवाब देने से बचती हैं, और इससे अधिक कोई जवाबदेही इस देश में किसी सरकार की रह नहीं गई है। फिलहाल हम इस किस्म की सारी हैकिंग और घुसपैठ को बहुत ही अलोकतांत्रिक, बहुत ही परले दर्जे का जुर्म, और बहुत ही असभ्य बात मानते हैं। यह बात मानवाधिकार के भी खिलाफ है और लोकतांत्रिक देश के नागरिकों के निजता के अधिकार के खिलाफ तो है ही। ऐसे ही आरोपों को लेकर अमेरिका में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की सरकार चली गई थी क्योंकि उन्होंने अपने विरोधियों की बातचीत को रिकॉर्ड करवाने की कोशिश की थी, और एक अख़बार ने उसका भंडाफोड़ कर दिया था।

हिंदुस्तान में भी इस मामले को एक तर्कसंगत अंत तक पहुंचाने की जरूरत है क्योंकि यहां केंद्र और राज्य सरकारों को लोगों की जासूसी करवाने में बहुत मजा आता है, और यह बात लोकतंत्र को खत्म करने वाली हो सकती है। जब अपने विरोधियों को, अपने से सहमत लोगों को, ऐसी जासूसी का शिकार बनाया जाए, तो इसके पीछे जो कोई है उसकी जांच होनी चाहिए। हमारा ख्याल है कि अगर यह मामला कोई सुप्रीम कोर्ट में ले जाए तो वहां आज की हालत में इसकी सुनवाई की उम्मीद बंधती है, और हो सकता है कि अदालत सरकार से यह हलफनामा दायर करने को कहे कि उसने इस सॉफ्टवेयर से देश के लोगों की जासूसी करवाई है या नहीं। यह भी बहुत भयानक नौबत होगी कि कोई बाहरी एजेंसी हिंदुस्तान के लोगों की, किसी के भी कहने पर, ऐसी जासूसी करें। उस हालत में भी यह सरकार की ही जिम्मेदारी होगी कि वह इसकी जांच करवाए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जुलाई 2021


 

लोकतंत्र में बहुमत का मतलब अल्पमत पर डंडा नहीं होता...

   20 जुलाई 2021

 उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने राज्य के एक प्रमुख तीर्थ स्थान हरिद्वार नाम के शहर को कसाईखाना मुक्त बना दिया है, वहां कसाईखानों को जो सरकारी इजाजत मिली हुई थी वह मार्च के महीने में राज्य सरकार ने खारिज कर दी। इस तरह वहां पर मांस की बिक्री भी रोक दी गई है। कुछ लोगों ने इसके खिलाफ उत्तराखंड हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं। इसकी सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर एस चौहान ने राज्य सरकार से कुछ सवाल किए और यह पूछा कि क्या राज्य सरकार लोगों की पसंद तय करेगी? उनका मतलब जाहिर तौर पर लोगों की खानपान की पसंद से था। अब हरिद्वार में बसे हुए मांसाहारी लोग न तो आसानी से शहर छोडक़र कहीं जा सकते और न ही जिंदगी भर की अपनी खानपान की आदतों को रातों-रात सरकारी आदेश की वजह से खारिज कर सकते हैं। ऐसे में यह सवाल देश में थोपी जा रही एक ऐसी संस्कृति के सामने खड़ा किया गया सवाल है जो कि सत्तारूढ़ कुछ चुनिंदा लोगों की पसंद पर देश के बाकी लोगों को चलने पर मजबूर करने की राजनीति से जुड़ा हुआ है।

हरिद्वार शहर को मांसमुक्त शहर बनाने का जो सरकारी अभियान चल रहा है उसके चलते हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की कि लोकतंत्र का अर्थ केवल बहुसंख्यकों का शासन ही नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना भी होता है, उन्होंने कहा- किसी भी सभ्यता की महानता का पैमाना यही होता है कि वह अल्पसंख्यक आबादी के साथ कैसा बर्ताव करती है, हरिद्वार में जिस तरह के प्रतिबंध की बात की गई है उसे यही सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या नागरिकों की पसंद राज्य तय करेगा।

यह मामला अकेले उत्तराखंड का नहीं है क्योंकि भाजपा के राज वाले कई राज्यों ने एक-एक करके ऐसे कई फैसले लिए जिसमें गाय या गोवंश को मारने के खिलाफ, या गाय-भैंस के मांस के इस्तेमाल के खिलाफ तरह-तरह के आदेश निकाले गए। जहां पर ऐसे आदेश थे वहां भी, और जहां पर ऐसे आदेश नहीं थे वहां भी, हमलावर हिंदू जत्थों ने जगह-जगह लोगों को शक के बिना पर पीटा, कई जगह भीड़त्या हुई, और कई जगह सांप्रदायिक तनाव भी खड़ा हुआ। लेकिन दिलचस्प बात यह भी है कि गोवा या केरल जैसे कई राज्य ऐसे भी रहे जहां पर चुनाव लडऩे की वजह से भाजपा ने लोगों से बीफ उपलब्ध कराने का वायदा किया और उत्तर-पूर्व के राज्यों में तो भाजपा के राज में गौ मांस या बीफ उपलब्ध है है ही। इसलिए खाने की जिस संस्कृति को कुछ राज्यों पर थोपा जा रहा है, वहीं कुछ दूसरे राज्यों में अपने एजेंडा को किनारे भी रखा जा रहा है, क्योंकि वहां की बहुतायत आबादी गौ मांस या बीफ खाती ही है। हिंदुस्तान में खानपान के रिवाज को लेकर, कहीं पर शराब पीने के रिवाज को लेकर, तो कहीं पर अंतरजातीय या अंतरधर्मीय शादियों को लेकर तरह-तरह से विभाजन खड़े किए जा रहे हैं। पहनावे को लेकर विभाजन, खानपान को लेकर विभाजन, और लडक़े-लड़कियों के साथ उठने-बैठने या साथ रहने को लेकर विभाजन, यह पूरा तनाव देश पर भारी भी पड़ रहा है।

लेकिन एक बात यह भी है कि जिन लोगों पर ऐसे भावनात्मक मुद्दों का बड़ा असर होता है और जो इसे अपनी एक पुरातन संस्कृति की निरंतरता मान लेते हैं, वे फिर आज की सरकारों की नाकामयाबी को पूरी तरह अनदेखा भी कर लेते हैं, और उन्हें अपने इस काल्पनिक इतिहास में दोबारा जीने के मौके के अलावा किसी और चीज की जरूरत नहीं लगती है। यह पूरा सिलसिला लोगों को आज की जमीनी हकीकत से काट रहा है, और लोगों को गैर मुद्दों में उलझा कर रख रहा है। पूरे हिंदुस्तान के अलग-अलग अनगिनत शहरों को देखें तो वहां पर शहर के पहले थाने कोतवाली के आसपास सराफे की दुकानें रहती थीं, जो कि मोटे तौर पर सवर्ण हिंदुओं या जैन समाज के लोगों की रहती थीं। आज भी सराफा बाजार कोतवाली के आसपास अधिकतर शहरों में दिखता है। लेकिन इसके साथ-साथ इन्हीं इलाकों में बंदूक और कारतूस की दुकानें भी दिखती हैं जिन्हें अधिकतर मुस्लिम चलाते हैं, और उनकी वजह से उन इलाकों में मस्जिदें भी रहती हैं। सैकड़ों बरस से हिंदुस्तान के शहरों का ऐसा ही ढांचा चलते आ रहा है कि हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद ये मिले-जुले इलाकों में रहते आए हैं। अब इलाकों के नाम बदलना, शहरों के नाम बदलना, खानपान बदलना, इन सबका जो सिलसिला चल रहा है, उसकी असली नीयत लोगों का ध्यान असली दिक्कतों की तरफ से हटाना है। यह तो अच्छा है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बहुसंख्यक तबके के राज्य में अल्पसंख्यकों की फिक्र को लेकर सवाल उठाए हैं, और इस पर बहस भी उत्तराखंड से बाहर भी देशभर में होनी चाहिए। लोकतंत्र महज बहुमत का नाम नहीं होता है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 जुलाई 2021


 

इंसान, और जानवर की मिसालें

  18 जुलाई 2021

 सोशल मीडिया पर हर दिन कई समझदार दिखते लोगों का लिखा हुआ पढऩे मिलता है जिसमें इंसान की घटिया हरकतों, इंसान के तरह-तरह के जुर्म में इनको कोसने के लिए जानवरों का इस्तेमाल किया जाता है। कहीं भेड़ की खाल ओढ़े हुए भेडि़ए का जिक्र होता है, तो कहीं आस्तीन के सांप का, तो कहीं रंगे सियार की बात होती है, तो कहीं घडिय़ाल के आंसुओं की। जानवरों के बारे में बड़ी मामूली सी जानकारी रखने वाले भी इस बात को जानते हैं कि इंसान अपनी खुद की कमीनगी को जानवरों की कुछ एक काल्पनिक खामियों के साथ जोडक़र मानो अपने पर लगी तोहमत को घटाना चाहते हैं।

अब इंसानों के किए हुए कामों को देखें तो लगता है कि जानवरों में भला कौन हैं जो ऐसे काम करते हैं? एक भी मिसाल जानवरों में ऐसी नहीं मिल सकती जो इंसानों की कमीनगी का मुकाबला कर सके। अब आज की एक खबर है कि उत्तर भारत के किसी एक गांव में एक बाप-बेटी खुले खेत में सेक्स कर रहे थे और लोगों ने घेरकर उनका वीडियो बनाया, उन्हें वहां से भगाया तो वह लोगों पर पथराव करने लगे। अब उनकी हिफाजत के लिए गांव में उनके घर के बाहर पुलिस तैनात की गई है वरना यह खतरा है कि गांव के लोग उन पर हमला कर सकते हैं। कल या परसों एक दूसरी खबर थी कि एक बेटे ने अपनी मां को मारकर उसकी किडनी और अंतडिय़ाँ बाहर निकाल लीं। अखबार में बैठे हुए यह भी समझ नहीं पड़ता कि इस तरह की हिंसा या इस तरह के जुर्म की कितनी खबरें छापी जाएं, उन खबरों में कितना खुलासा किया जाए। क्या उससे समाज को सावधान होने का मौका मिलेगा या इन खबरों का ही समाज पर बुरा असर पड़ेगा, यह तय करने में मुश्किल होने लगती है। जानवरों में कौन से ऐसे हैं जिनमें इस तरह की मिसालें मिल सकें?

इंसान कैसा-कैसा करते हैं, इसकी एक मिसाल कुछ सौ बरस पहले की अभी पढऩे मिली जब कोरोना से बचाव के लिए टीकों की खबर के साथ-साथ वैक्सीन के इतिहास पर भी छपा, और पढऩे मिला। इतिहास का ऐसा ही एक पन्ना 1803 के बरस का है जब दुनिया भर में स्मॉलपॉक्स बहुत बुरी तरह फैला हुआ था, और वह लोगों को बड़ी संख्या में मार भी रहा था, साथ-साथ उनके बदन पर गहरे दाग छोड़ रहा था, कई लोगों की आंखें खराब कर दे रहा था। वैसे में 1796 के आसपास एक ब्रिटिश डॉक्टर ने स्मालपॉक्स के संक्रमण से बचाव की एक तरकीब ढूंढी, और उसने यह पाया कि एक दूसरा संक्रमण कॉउपॉक्स ऐसा है जिससे संक्रमित लोगों को स्मालपॉक्स नहीं हो रहा था। उसने लोगों को स्मालपॉक्स संक्रमण से बचाने के लिए कॉउपॉक्स के वायरस देने शुरू किए, और ऐसे दुनिया की पहली वैक्सीन सामने आई।

इसका तरीका भी बड़ा आसान था, जिन लोगों को कॉउपॉक्स से संक्रमित किया जाता था, उनके बदन पर 9-10 दिनों में कुछ फोड़े हो जाते थे, और दूसरे लोगों के बदन में खरोंच लगाकर उन फोड़ों का पानी निकाल कर उन्हें छुआ दिया जाता था, तो वे लोग भी कॉउपॉक्स से संक्रमित हो जाते थे, लेकिन स्मालपॉक्स के संक्रमण से बच जाते थे जो कि जानलेवा और बहुत अधिक खतरनाक संक्रमण था।

अब इसमें दिक्कत यह आ रही थी कि संक्रमित लोगों के फोड़ों से निकलने वाला पानी बहुत दूर तक नहीं ले जाया जा सकता था। उसे कुछ सौ किलोमीटर ले जाते हुए भी उसका असर खत्म हो जाता था। ऐसे में यूरोप से अमेरिका अगर यह संक्रमण ले जाना हो ताकि अमेरिका में बुरी तरह फैले हुए स्मालपॉक्स का संक्रमण रोका जा सके, तो उसकी कोई तरकीब नहीं निकल रही थी। लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है विज्ञान का एक तकनीक से रिश्ता होता है इंसानियत से नहीं, इसलिए स्पेन के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने एक तरीका निकाल लिया। यह अनोखा प्रयोग था लेकिन उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया।

1803 में स्पेन के राजा की इजाजत से वहां के दो दर्जन अनाथ बच्चों को छांटकर एक जहाज पर सवार किया गया। राजा की सोच जनकल्याणकारी थी इसलिए उसने इन बच्चों के खाने-पीने का और इनके रखरखाव का अच्छा इंतजाम किया। जहाज के रवाना होने के ठीक पहले डॉक्टरों ने इनमें से दो बच्चों के शरीर में कॉउपॉक्स का संक्रमण डाल दिया। समंदर में सफर के बीच नौ-दस दिनों में इन दो बच्चों की बाहों पर लगाए गए इस टीके के जख्म फोड़ों में तब्दील हो गए और जहाज पर तैनात डॉक्टरों ने इन्हें फोडक़र इसमें से पानी निकालकर दो दूसरे बच्चों की बाहों में खरोंच लगाकर उसमें इसका संक्रमण डाल दिया। अगले नौ-दस दिनों के बाद ये दो बच्चे अपने संक्रमित फोड़ों के साथ तैयार थे, और फिर यही सिलसिला तब तक चलते रहा जब तक जहाज अमेरिका नहीं पहुंच गया। अमेरिका पहुंचने पर सिर्फ आखिरी बच्चे की बाहों में एक फोड़े में पानी था, और डॉक्टरों ने जहाज से उतरते ही उससे संक्रमित पानी निकाल कर दूसरे बच्चों का टीकाकरण शुरू कर दिया जिन पर कि स्मालपॉक्स का खतरा दूसरी उम्र के लोगों के मुकाबले अधिक था। अब अगर देखा जाए कि ये अनाथ बच्चे बिना किसी की इजाजत के इस तरह से वैक्सीन खच्चर की तरह इस्तेमाल किए गए, और इनमें से कुछ बच्चे जहाज पर मर भी गए। तो आज वैक्सीन के कारखानों से निकलकर फ्रीजर जैसी गाडिय़ों में लदकर वैक्सीन दूर-दूर तक जाती है, और एक वक्त यह काम इन अनाथ बच्चों से करवाया गया जिन्होंने इन वैक्सीन को अपने बदन में ढोया, और अपनी जिंदगी की कुर्बानी दी।

जो लोग बात-बात पर इंसान की खामियों के लिए जानवरों की मिसालें ढूंढ लेते हैं, उन लोगों को चाहिए कि इंसान की इस कमीनगी के टक्कर की कोई मिसाल जानवरों में ढूंढकर बताएं। पंछी भी हजारों किलोमीटर उडक़र कई देश पार करके हर बरस किसी एक देश पहुंचते हैं, और मौसम बदलने पर फिर वापस अपने देश आ जाते हैं, लेकिन न वे इंसानों की तरह किसी दूसरे जानवर की पीठ पर सवार होकर आते हैं, और न ही आते जाते हुए किसी दूसरे का हक का खाते हैं। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि दुनिया के इतिहास में उसके हर दौर में इंसान जितने तरह के बुरे काम करते रहा है, उसकी कोई मिसाल इंसानों से परे कहीं देखने नहीं मिलेगी। दुनिया का इतिहास जुल्म से भरा हुआ है और हर जुल्म के लिए महज इंसान जिम्मेदार रहे हैं।

अपने आसपास के लोगों को कैदी बनाकर गुलाम बनाकर उन्हें बाजारों में नीलाम करना, उनसे जानवरों या मशीनों की तरह काम लेकर उन्हें खत्म कर देना, और उन्हें फेंक कर फिर से दूसरे गुलाम खरीद लेना ऐसे कितने ही काम बड़े आम तरीके से इंसान करते हैं।
 
अभी हाल के बरसों तक द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तक जापान ने कई दूसरे देशों में अपनी फौज के लोगों के लिए वहां की स्थानीय लड़कियों और महिलाओं को रखकर चकलाघर बना दिए थे, और उनका मनचाहा शोषण करने के बाद सैनिक अपने देश लौट आए वहां पर अपनी एक अगली पीढ़ी छोडक़र। ऐसा ही अमेरिकी फौजियों ने वियतनाम में किया था, ऐसा ही तालिबान आज अफगानिस्तान में कर रहे हैं जहां वे विधवाओं और लड़कियों की लिस्ट बनाकर विधवाओं को अपने सैनिकों के हवाले कर रहे हैं ताकि वे उनका मनचाहा इस्तेमाल कर सकें। खूब बढ़-चढक़र जानवरों के खिलाफ लिखने वाले इंसानों को जानवरों में ऐसी कोई मिसाल ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए और नाकामयाब होने पर कम से कम आगे जानवरों के खिलाफ अपनी हैवानियत नहीं दिखानी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)