दीवारों पर लिक्खा है, 1 नवंबर 2021


 

उघड़े बदन पर मंगलसूत्र, विज्ञापन का विवाद और..

 1 नवंबर 2021

   

हिंदुस्तान के एक फैशन ब्रांड सब्यसाची ने अभी कुछ मंगलसूत्र बाजार में उतारे तो उनके इश्तहार भी आए और इश्तहारों में एक महिला को मंगलसूत्र पहने हुए और अपने पुरुष साथी की छाती पर सिर टिकाए हुए दिखाया गया है। यहां तक तो ठीक था क्योंकि मंगलसूत्र तो भारतीय शादीशुदा महिला के पुरुष साथी का ही प्रतीक होता है, लेकिन इसमें यह महिला बिना अधिक कपड़ों के, काले रंग की ब्रा में दिख रही है, और यह तस्वीर खासी उत्तेजक लग रही है। ऐसी पोशाक में किसी मॉडल या किसी अभिनेत्री का दिखना कोई अटपटी बात नहीं है, बिकिनी में रोज ही बहुत सी मॉडल दिखती हैं, लेकिन किसी को उसके संदर्भ ही उत्तेजक बनाते हैं। अब इस महिला का संदर्भ क्योंकि एक शादीशुदा हिंदू भारतीय महिला का मंगलसूत्र था, जो कि पति की मंगल कामना करने वाला एक सुहाग या सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसे परंपरागत भारतीय हिंदू महिला के संदर्भ में देखा गया, और उस नाते सिर्फ एक काली ब्रा वाला हिस्सा लोगों को अटपटा लगा. मध्य प्रदेश के भाजपा सरकार के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने तुरंत यह चुनौती दी कि सब्यसाची मुखर्जी 24 घंटे में यह इश्तहार बंद करें वरना मध्य प्रदेश पुलिस उनके खिलाफ जुर्म दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार करने निकलेगी। आज की खबर के मुताबिक सब्यसाची ने लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए माफी भी मांग ली है और इस इश्तहार को हटा भी दिया है।

हिंदुस्तान इन दिनों विज्ञापनों को लेकर कई किस्म के विवाद देख रहा है। एक दूसरे ब्रांड की ज्वेलरी के विज्ञापन में हिंदू मुस्लिम को लेकर, या किसी और विज्ञापन में समलैंगिकता को लेकर जरा सी प्रगतिशीलता, उदारता दिखाई गई तो परंपरागत लोगों को वह इतनी बुरी तरह खटकी कि सोशल मीडिया पर उसके बायकाट का अभियान छेड़ गया और कंपनियों को वे विज्ञापन हटाने पड़े। इसमें बड़े-बड़े ब्रांड के विज्ञापन थे, और वह इस तरह कोई बदन दिखाने वाले भी नहीं थे, लेकिन लोगों को न हिंदू-मुस्लिम एकता की बात सुहाई और ना ही समलैंगिकता की बात। विज्ञापन देने वाली कंपनियां चाहतीं तो ऐसे विरोध के सामने डटे रहतीं, लेकिन ऐसा लगता है कि उनको संकीर्णतावादी, परंपरावादी ग्राहकों के खोने का खतरा भी दिख रहा होगा, इसलिए उन्होंने ऐसे विज्ञापन वापस ले लेना बेहतर समझा होगा।

किसी कारोबार के ऐसे किसी एक-दो विज्ञापनों के चलने या न चलने को लेकर हमारी कोई फिक्र नहीं है क्योंकि दुनिया के बहुत से विकसित देशों में या आधुनिक देशों में विज्ञापनों में तरह-तरह का देह प्रदर्शन चलता है, और लोग उसके साथ जीना सीख लेते हैं, वह लोगों को खटकता भी नहीं है। लेकिन जो सबसे उदार देश माने जाते हैं, वहां पर भी राजनीतिक भेदभाव के, रंगभेद के, औरत-मर्द के भेदभाव के विज्ञापनों को बड़ी कड़ाई से रोका जाता है, और कई बार तो ऐसा भी लगता है कि कुछ बड़े ब्रांड भी ऐसे विवादास्पद विज्ञापन जानबूझकर तैयार करवाते हैं, ताकि बाद में उन पर प्रतिबंध लगे, और वे खबरों में बने रहें। इसलिए भारत की संस्कृति और यहां के लोगों का बर्दाश्त देखे बिना यहां कोई विज्ञापन बनाने पर उसका ऐसा नतीजा निकल सकता है। अब यह कानूनी रूप से तो गलत विज्ञापन नहीं था, लेकिन सांस्कृतिक रूप से यह विज्ञापन अटपटा जरूर था, क्योंकि एक शादीशुदा महिला के सुहाग का प्रतीक कहा जाने वाला यह मंगलसूत्र जिस तरह के देह प्रदर्शन के साथ दिखाया जा रहा था, वह मंगलसूत्र की परंपरा से मेल नहीं खा रहा था. कानूनी रूप से यह कोई जुर्म नहीं था लेकिन सांस्कृतिक रूप से लोग इस पर आपत्ति कर सकते थे।

भारत में इन दिनों अलग-अलग प्रदेशों, और देश, की सरकारें अपनी-अपनी सांस्कृतिक सोच, या अपनी धार्मिक प्राथमिकता के मुताबिक अपनी भावनाओं को बहुत जल्दी-जल्दी आहत पा रही हैं, और उन्हें लेकर बड़ी रफ्तार से मामले मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। बहुत से मामले ऐसे हैं जो राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी की पसंद या नापसंद के आधार पर दर्ज होते हैं और फिर अदालतों में उनका कोई भविष्य नहीं रहता है। सब्यसाची के इस शहर के लिए मध्य प्रदेश के गृह मंत्री की सार्वजनिक चेतावनी, चेतावनी तो कम थी, वह एक सत्ता की धमकी अधिक थी, जिसके हाथ में जुर्म दर्ज करना और गिरफ्तार करना है. इसके बाद अदालत से क्या फैसला होता इसकी अधिक फि़क्र सत्तारूढ़ पार्टियों को रहती नहीं है क्योंकि वे अपनी जनता के बीच, अपने वोटरों के बीच, जो संदेश देना चाहती हैं, वह संदेश तो ऐसा केस दर्ज करने और ऐसी गिरफ्तारी से चले ही गया रहता। लेकिन ऐसे विज्ञापनों के विवाद से परे यह भी समझने की जरूरत है कि किसी देश में अगर बरदाश्त को इस तरह घटाया जाएगा, तो वह धीरे-धीरे आम जनता के दिमाग में बैठने लग जाएगा  कि जो बात उसे सांस्कृतिक रूप से ठीक न लगे, उसे वह गैरकानूनी मानकर उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दे। और फिर हिंदुस्तान में पुलिस और अदालत का सिलसिला तो लोगों ने देखा हुआ है कि किस तरह बेकसूर लोगों को भी मुकदमे से निकलने में वर्षों लग सकते हैं।

इसलिए जब किसी लोकतंत्र में लोगों का बर्दाश्त सत्ता के उकसावे पर इस तरह घटाया जाए, उसे खत्म किया जाए, तो फिर वह सिलसिला खतरनाक हो चलता है। यह हवा का एक ऐसा झोंका है जो कि इस रवैये को आगे बढ़ाते चलेगा। जब लोगों को लगेगा कि खबरों में आने का यह एक अच्छा जरिया है, अपने वोटरों को रिझाने का यह एक असरदार तरीका है, तो लोग उस काम में लग जाएंगे। मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा अपनी पार्टी भाजपा की परंपरागत सोच पर चलते हुए ही इस विज्ञापन का ऐसा विरोध कर रहे थे, और उनसे परे भी बहुत से लोगों को यह विज्ञापन अटपटा लगा होगा, लेकिन कानून इस विज्ञापन को गैरकानूनी नहीं मानेगा। अदालत में इस विरोध का कोई भविष्य नहीं है, इसका भविष्य केवल उस सरकार के हाथ है जिसके हाथ में पुलिस नाम का डंडा है। यह डंडा आगे चलकर किस राज्य में किस पर चलेगा, इसका कोई ठिकाना नहीं है, और लोकतंत्र में ऐसी लाठीबाजी को बढ़ावा देना भी ठीक नहीं है। हर जगह सत्ता को नापसंद कई अलग अलग सर हो सकते हैं जो कि इस डंडे से तोड़े जा सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

नेता से असहमति को राजद्रोह करार देना कलंक की बात है...

  31 अक्टूबर 2021

 

भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच हमेशा कुछ बवाल खड़ा करता है। अभी ऐसे मैच के स्टेडियम से एक पाकिस्तानी खिलाड़ी की फोटो आई है जिसने पाकिस्तानी टीम की जर्सी पहनी हुई है, और उस पर धोनी का नाम लिखा हुआ है। जाहिर है कि वह धोनी का फैन है, और अपनी पसंद जाहिर कर रहा है। अब तक उसके खिलाफ किसी जुर्म दर्ज होने, या उसकी गिरफ्तारी की बात सामने नहीं आई है, लेकिन पाकिस्तान में भी ऐसा हो सकता है। हिंदुस्तान में तो ऐसे हर मैच के बाद में दो चार जगहों पर कहीं पटाखे फूटते हैं तो कहीं कोई खुशी मनाते हैं तो उसके बाद उनके खिलाफ जुर्म दर्ज होता है। अभी उत्तर प्रदेश में आगरा में कुछ कश्मीरी छात्रों ने भारत-पाकिस्तान मैच के बाद खुशी मनाई तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उनके खिलाफ राजद्रोह के आरोप में जुर्म दर्ज किया जाएगा। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के एक भूतपूर्व जज दीपक गुप्ता ने एक इंटरव्यू में दिलचस्प बातें कही हैं, जिन्हें समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारतीय टीम को हराने के बाद पाकिस्तानी टीम की जीत का जश्न निश्चित रूप से राजद्रोह का अपराध नहीं है। उन्होंने कहा यह सोचना भी हास्यास्पद है कि यह राजद्रोह के बराबर है। ऐसी खुशी मनाने वालों पर आरोप लगाने के लिए कुछ दूसरी धाराएं हैं, और राजद्रोह के आरोप अदालत में टिक नहीं पाएंगे, इससे समय और जनता का पैसा दोनों बर्बाद होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह जरूरी नहीं है कि हर कानूनी काम अच्छा और नैतिक हो या सभी अनैतिक और बुरे काम गैरकानूनी हों। उन्होंने इस बात पर राहत जाहिर की कि हिंदुस्तान कानून के शासन से चल रहा है, न कि नैतिकता के नियम से. वे बोले-समाज के अलग-अलग धर्मों, और अलग-अलग समय में नैतिकता के अलग-अलग मतलब होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के एक भूतपूर्व जज का यह कहना मायने इसलिए रखता है कि उन्होंने पहले भी कई बार सार्वजनिक रूप से भारत के राजद्रोह कानून की व्याख्या की है और उन्होंने यह भी कहा है कि अब समय आ गया है कि राजद्रोह की धारा की संवैधानिकता को दी गई चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट को कदम उठाना चाहिए, और साफ साफ शब्दों में कहना चाहिए कि यह कानून वैध है, या अवैध है, और इसकी सीमाएं क्या हैं जो इसे इतना कड़ा बनाती हैं। उन्होंने कहा कि यह अंग्रेजों के समय का बनाया गया कानून है जिसे खत्म किया जाना चाहिए। इस मौके पर यह याद रखने की जरूरत है कि भारत के आज के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमणा ने भी राजद्रोह के कानून के इस प्रावधान को जारी रखने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा था कि स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजी राज के दौरान पेश किया गया कानून आज के संदर्भ में आवश्यक नहीं हो सकता। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में एक चुनौती सुनी भी जा रही है।

हिंदुस्तान में ना केवल केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकारें भी असहमति को दबाने के लिए बार-बार राजद्रोह के कानून का इस्तेमाल करती हैं। किसी सरकार से असहमति लोकतंत्र में एक आम बात रहनी चाहिए, और इससे लोकतंत्र के साथ-साथ सरकार को भी संभलने का और विकसित होने का मौका मिलता है। लेकिन हकीकत यह है कि अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों की बहुत सी सरकारों ने राजद्रोह के कानून का बेजा इस्तेमाल किया है. जिस तरह आपातकाल के दौरान इंदिरा इज इंडिया का नारा लगाया गया था, उसी तरह आज कहीं कोई मोदी को हिंदुस्तान मान लेते हैं, तो कहीं किसी राज्य में किसी मुख्यमंत्री को ही राज्य मान लेते हैं, और उनकी आलोचना पर राजद्रोह के मुकदमे दर्ज हो जाते हैं। जैसा कि जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा है ऐसे मामले अदालत में टिकते नहीं है लेकिन राजद्रोह के मामले में क्योंकि जमानत मिलने में दिक्कत होती है इसलिए जमानत होने तक की जेल को सत्ता एक सजा की तरह लोगों को दिखा देती है, ताकि बाकी लोगों की असहमति उनकी जुबान पर न आ सके, या उनकी कलम से न निकल सके। सरकारों का राजद्रोह के कानून का इस्तेमाल ऐसा अंधाधुंध है कि जिस पर चाहे उस पर यह कानून लगाकर उसे जेल में डाल दिया जाता है। लेकिन जब अदालतें इस कानून के इस्तेमाल को गलत पाती हैं, और लोगों को महीनों बाद या बरसों बाद जेल से छूटने का मौका मिलता है, तो उस वक्त अदालतें सरकारों पर जुर्माना और हर्जाना नहीं लगाती हैं कि जिसकी जिंदगी का इतना वक्त जेल में गया है, उसे सरकार हर्जाना दे, और इस बात को अदालतें अफसरों के रिकॉर्ड में दर्ज भी नहीं करवाती हैं कि उन्होंने बदनीयत से ऐसे मामले दर्ज किए थे, फिर चाहे वे उन्हें हांकने वाले नेताओं के दबाव में ही क्यों ना दर्ज किए गए हो।

हिंदुस्तान में लोकतंत्र की समझ लगातार कमजोर होते चल रही है, और ऐसी कमजोर समझ के देश में लोगों को आसानी से इस बात पर से सहमत कराया जा सकता है कि सत्ता से असहमति देश से असहमति है, या किसी सत्तारूढ़ नेता से असहमति देश के खिलाफ बगावत है। यह सिलसिला खत्म करने की जरूरत है और सुप्रीम कोर्ट को बिना देर किए हुए इस मामले की सुनवाई करके राजद्रोह के इस कानून को, या इसकी अधिक बेजा इस्तेमाल हो रही धाराओं को खत्म करना चाहिए। कहने के लिए तो केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में लगातार कहा है कि उसने गैरजरूरी हो चुके कानूनों को खत्म करने का अभियान छेड़ा हुआ है, और ऐसे सैकड़ों कानून खत्म किए गए हैं, लेकिन आज इस राजद्रोह कानून का सबसे अधिक बेजा इस्तेमाल अदालतों में जाकर साबित भी हो रहा है, इस कानून को, राजद्रोह कानून की धाराओं को खत्म किया जाना चाहिए। यह अदालती फैसला आने के पहले भी लोगों को सजा देने की नीयत से, कैद में रखने की नीयत से इस्तेमाल किया जा रहा है, यह लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है, इनसे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है, और सुप्रीम कोर्ट को इसे प्राथमिकता के साथ सुनना चाहिए, और जो सरकारें, जो अफसर इसका बेजा इस्तेमाल करते हुए मिलते हैं, उनके रिकॉर्ड में ऐसे काम दर्ज भी होने चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

एमपी के विधायक के लिए वेटिकन से आयी निराशा

 31 अक्टूबर  2021


मध्य प्रदेश के भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा आज बड़े निराश होंगे। कल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेटिकन जाकर पोप से मुलाकात की तस्वीरें चारों तरफ छाई हुई हैं, और खुद प्रधानमंत्री के ट्विटर और फेसबुक जैसे पेज लगातार इन तस्वीरों को पोस्ट कर रहे हैं। वे पोप से गले मिल रहे हैं, उनके गाल से गाल सटा रहे हैं, और बाइबल को उठाकर सिर पर रख रहे हैं। यह एक अलग बात है कि हिंदुस्तान में गोवा में चुनाव होने जा रहे हैं जहां ईसाई बहुतायत है, लेकिन रामेश्वर शर्मा को इस वजह से भी राहत मिलने वाली नहीं है। अभी कुछ ही समय तो हुआ है जब उन्होंने एक कार्यक्रम में वीडियो कैमरे के सामने कहा था कि हिंदुओं को फादर और चादर से दूर रहना चाहिए। फादर तो जाहिर है ईसाई के लिए कहा जाता है, और चादर जाहिर है कि मुस्लिम महिलाओं के ओढ़ने के कपड़े को कहा जाता है। उन्होंने दशहरा के कार्यक्रम में मंच से भाषण देते हुए कहा था कि फादर और चादर तुम्हें बर्बाद कर देंगे, यह पीर बाबा तुम्हारे मंदिर जाने में बाधा हैं, पीरों को पूजने वालों को कह दो कि तुम जमीन में दफन करने में भरोसा रखते हो, और हम दुनिया को जलाने वालों पर भरोसा रखते हैं, जो बजरंगबली हैं. इस तरह की बहुत सी बातें वह हिंदुत्व को लेकर अपनी हमलावर सोच के तहत करते रहते हैं, इसलिए उनका यह हक भी बनता है कि पोप से इस तरह गले मिलते, लिपटते नरेंद्र मोदी को देखकर वह निराश हो जाएं।

लेकिन ऐसे विधायक की ऐसी बातों को छोड़ भी दें तो भी लोगों का धर्म से जुड़े लोगों के बारे में तजुर्बा बड़ा गड़बड़ रहता है। अभी जाने-माने फिल्म निर्देशक प्रकाश झा की एक वेब सीरीज 'आश्रम' की शूटिंग के दौरान मध्यप्रदेश में बजरंग दल ने प्रकाश झा पर हमला किया, क्योंकि यह वेब सीरीज 'आश्रम' नाम वाली है, और इसमें किसी बाबा के कुकर्मों का जिक्र है। जब इस हमले की खबर चारों तरफ फैली तो लोगों ने सोशल मीडिया पर बजरंग दल से पूछा कि अगर हमला ही करना था तो आसाराम और राम रहीम जैसे बाबाओं के आश्रम पर क्यों नहीं किया जो कि बलात्कार ही कर रहे थे, और आश्रम में ही कर रहे थे। अब अगर ऐसे आश्रमों वाले देश में आश्रम पर एक वेब सीरीज बन रही है तो उस पर हमले से क्या सुधरेगा? खैर धर्म के कुकर्मों की बात कोई नई नहीं है, और आज इस मुद्दे पर यहां लिखने का एक मकसद यही है कि टेक्नोलॉजी दुनिया में एक ऐसा काम करने जा रही है जिससे कि हो सकता है धर्म के कुछ कुकर्म कम हो जाएं।

जर्मनी में अभी कुछ ईसाई चर्चों में एक रोबो पादरी का इस्तेमाल शुरु हुआ है जो कि अलग-अलग 5 भाषाओं में बाइबल के प्रवचन पढ़ सकता है, नसीहत में दे सकता है, आशीर्वाद दे सकता है, और धार्मिक संस्कार करवा सकता है। आज से 500 बरस पहले ईसाई धर्म में यूरोप भर में मार्टिन लूथर ने एक सुधारवादी आंदोलन शुरू किया था, और उसके 500 बरस पूरे होने के मौके पर यह रोबो प्रयोग के तौर पर कई चर्चों में इस्तेमाल किया जा रहा है। जाहिर है कि चर्च जाने वाले लोगों की प्रतिक्रिया इस पर मिली-जुली हो सकती है, लेकिन चर्च के ढांचे के भीतर काम करने वाले पादरियों में इसे लेकर बेचैनी है। उन्हें लग रहा है कि उनके पेट पर लात पड़ने वाली है और उनका रोजगार छिनने वाला है। हालांकि हकीकत यह है कि पूरे यूरोप में पादरियों की कमी चल रही है, और चर्चों में धार्मिक संस्कार कराने को वे कम पड़ रहे हैं। ऐसे में यह पादरी रोबो 5 भाषाओं में संस्कार भी करवा सकता है, और जब हाथ उठाकर आशीर्वाद देता है तो उससे प्रकाश की किरण भी निकलकर श्रद्धालुओं पर पड़ती है। हालांकि यह पूरी तरह मौलिक प्रयोग नहीं है क्योंकि कुछ बरस पहले चीन के एक बौद्ध मंदिर में एक रोबो भिक्षु का उपयोग शुरू किया गया था, जो कि मंत्र पढ़ता था, और धर्म की बुनियादी बातों को बोलता था।

अब यह रोबो जब तक किसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस ना हो जाए, और जब तक जिंदा पादरियों से यह कुछ बुरी बातें सीख न ले, तब तक तो यह भक्त जनों के लिए अच्छा साबित हो सकता है, क्योंकि आज दुनिया भर के चर्चों में पादरियों को बच्चों के यौन शोषण के आरोप झेलने पड़ रहे हैं. यूरोप के विकसित लोकतंत्रों में ऐसी घटनाएं लाखों में हुई हैं, यह बात खुद चर्च द्वारा करवाई गई जांच में सामने आई है न कि किसी चर्च विरोधी के लगाए गए आरोपों में। इसलिए फिलहाल तो ऐसे रोबो पादरियों से यह खतरा नहीं है कि वे बच्चों का यौन शोषण भी करेंगे लेकिन हो सकता है कि कभी इन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दिया जाए, और उसके बाद ये असल पादरियों से सभी तरह की बातों को सीखें, और तब जाकर ये बच्चों के लिए खतरनाक भी साबित हो सकते हैं। लेकिन फिलहाल इससे चर्च के भक्तों के बच्चों को एक सुरक्षित धार्मिक माहौल मिल सकता है।

अभी चर्च से जुड़े हुए पहलुओं में यह बहस चल रही है कि क्या धार्मिक संस्कारों का इस तरह मशीनीकरण करना ठीक है? अब हिंदुस्तान में अगर देखें तो यहां बहुत से हिंदू मंदिरों में बिजली की मशीनों से चलने वाले नगाड़े और ढोल मंजीरे इस्तेमाल होने लगे हैं, जो कि बिना भक्तों के भी अकेले पुजारी शुरू कर लेते हैं, और माहौल बन जाता है। हालांकि अभी पुजारी का विकल्प किसी रोबो में सामने नहीं आया है, लेकिन ढोल-मंजीरा बजाने वाले भक्तों का विकल्प तो मशीन में आ गया है। अब धीरे-धीरे यह भी हो सकता है कि जिस तरह किसी कॉमेडी शो में टीवी प्रसारण के पहले हंसने की आवाज, खिलखिलाने की, और तालियों की आवाज जोड़ दी जाती है, उसी तरह धर्म स्थलों में भी भक्तों की आवाजें जोड़ दी जाएं ताकि कम रहने पर भी वह बाहर से भक्तों की अधिक संख्या का झांसा दे सके। इसमें बुराई कुछ नहीं है क्योंकि धर्म कुल मिलाकर बहुत से लोगों को वैसे ही झांसा देता है, और अगर यह एक और झांसा देकर अधिक भीड़ का नजारा पेश करने लगे तो भी वह कोई पहला झांसा नहीं रहेगा।

अब वेटिकन गए हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पोप को भारत आने का न्योता दिया है, और ऐसी कोई वजह नहीं है कि पोप भारत ना आएं क्योंकि यहां बड़ी संख्या में ईसाई आबादी है, और बड़ी संख्या में और लोगों को भी ईसाई बनाया जा सकता है, या कि वह बन सकते हैं, क्योंकि आज के उनके धर्म में उन्हें पावों का दर्जा देकर रखा गया है, और हो सकता है कि चर्च में उन्हें चर्च में थोड़ी बराबरी का मौका मिल जाए। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रधानमंत्री की पार्टी पूरे देश में जगह जगह हिंदुओं के धर्मांतरण का जो आरोप लगाती है और जो जाहिर तौर पर चर्च पर लगाया जाता है, उसके मुखिया पोप का हिंदुस्तान आना कैसा माना जाएगा? खैर अगले कुछ बरस तो पोप को बुढ़ापे में भी दुनिया भर का दौरा करना पड़ेगा, और उसके बाद एक विकसित हो रही नई तकनीक मेटावर्स की मेहरबानी से लोग होलोग्राम की शक्ल में दुनिया में कहीं भी पहुंच सकेंगे, और वहां पर लोगों के बीच बैठकर किसी कार्यक्रम में शामिल भी हो सकेंगे। उस दिन हो सकता है कि पोप को हिंदुस्तान न आना पड़े, और उनके होलोग्राम से गले मिलकर मोदी उसका स्वागत कर सकें, या फिर यह भी हो सकता है कि मोदी का होलोग्राम जाकर पोप के होलोग्राम का गले लगकर स्वागत कर सके। और होलोग्राम आकर, जाकर स्वागत करेगा, तो उससे फादर से दूर रहने का मध्य प्रदेश के भाजपा विधायक का फतवा भी निभा जाएगा क्योंकि मोदी को पोप से सीधे गले नहीं मिलना पड़ेगा। फिलहाल तो धर्म में टेक्नोलॉजी के उपयोग को लेकर लोगों के बीच उत्सुकता से भरी जो बहस है जर्मनी से शुरू हुई है, उसे देखना चाहिए।

दीवारों पर लिक्खा है, 31 अक्टूबर 2021


 

सरकारी दफ्तरों को कागजों में फंसाकर जनता की जिंदगी बर्बाद करना बंद करना चाहिए

 30 अक्टूबर 2021

 

केंद्र सरकार के बारे में एक खबर यह आई है कि वह लालफीताशाही और नौकरशाही को घटाने के लिए केंद्र के सचिवालय और मंत्रालय में कोई ऐसी प्रक्रिया लागू कर रही है, जिससे एक फाइल चार अफसरों से अधिक के हाथों तक ना जाए। आज देशभर में अलग-अलग सरकारों में, अलग-अलग सरकारी दफ्तरों में हालत यह रहती है कि एक-एक फाइल बहुत से कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच घूमते रहती है, और जिनका सरकार से वास्ता पड़ता है वे हिंदी के एक बड़े तकलीफदेह सीरियल, ऑफिस-ऑफिस की तरह तकलीफ पाते रहते हैं। अभी इस खबर से हमें केंद्र सरकार के कामकाज में क्या फर्क पड़ेगा यह तो समझ नहीं आ रहा, लेकिन सरकारी दफ्तरों से जिनका वास्ता पड़ता है वे जानते हैं कि वहां बैठे हुए लोगों की दिलचस्पी कागजों को अधिक से अधिक लटकाने और घुमाने में रहती है ताकि थके-हारे लोग खुद होकर रिश्वत की बात करें ताकि काम जल्दी निपट जाए। पर जब लोग इस इशारे को भी नहीं समझते हैं, तो सरकारी अमला खुलकर उन्हें बतलाता है कि इस कागज पर जब तक कुछ नहीं रखोगे, वह उड़ जाएगा, इसलिए कागज पर कुछ रखो। और इस वसूली के चक्कर में सरकारी अमला इतने गैरजरूरी कागजों को मांगता है कि जिन्हें जुटाने में लोग थक जाते हैं।

छत्तीसगढ़ में पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने रिटायर हुए मुख्य सचिव अरुण कुमार के पीछे लग जाने पर मजबूरी में उन्हें एक काम दिया था, और अपनी पूरी नौकरी काम न करने के लिए जाने जाने वाले अरुण कुमार को उन्होंने प्रशासनिक सुधार कमेटी का चेयरमैन बना दिया था, ताकि 1 बरस उनकी सहूलियतें जारी रहें। आसपास में काम करने वाले लोगों का अरुण कुमार का तजुर्बा यह था कि उनके चेंबर में फाइलें जाती थीं। लेकिन वहां से वापस नहीं आती थीं। ऐसे व्यक्ति को प्रशासनिक सुधार का जिम्मा देकर सरकार ने उससे साल भर के लिए पीछा तो छुड़ा लिया था, लेकिन उससे न कुछ और होना था, और न हुआ। पूरे देश की सरकारों को और दूसरे सरकारी संगठनों, संस्थाओं के दफ्तरों को अपने कामकाज को घटाने की जरूरत है, लेकिन सवाल यह है कि रिश्वत की संभावनाओं को घटाने की यह सलाह दे कौन, और उसे माने कौन?

दुनिया के विकसित और परिपक्व लोकतंत्रों में सरकारों के कागजात देखें, तो उन में लिखा रहता है कि किसी फार्म को भरने में अमूमन कितना वक्त लगेगा। हिंदुस्तान से अमेरिका जाने वाले लोग जब वीजा फार्म भरते हैं, तो उसमें वहां की सरकार ने कोशिश करके कम से कम जानकारी मांगने का काम किया है। ऐसा सभ्य लोकतंत्रों में सभी सरकारी कागजात में होता है। हिंदुस्तान में इसके ठीक उल्टे लोगों को हर सरकारी अर्जी के साथ इतने किस्म के कागज लगाने पड़ते हैं, जो कि उसी सरकारी दफ्तर में पहले से जमा रहते हैं, या उसी सरकारी दफ्तर के जारी किए हुए रहते हैं। किसी विश्वविद्यालय में परीक्षा की अर्जी भरने पर उसी विश्वविद्यालय की पुरानी अंक सूचियों को लगाना पड़ता है जो कि उसी विश्वविद्यालय में जमा हैं, वहीं से बनाई हुई हैं। अब तो तमाम काम का कंप्यूटरीकरण हुए बरसों गुजर चुके हैं, लेकिन अपने चंगुल में फंसे हुए किसी इंसान से अधिक से अधिक कागजात नहीं छोडऩे की सरकारी दफ्तरों की हवस खत्म नहीं होती है।

हिंदुस्तान के दफ्तरों को चाहिए कि अपने हर फार्म में यह देखें कि कौन-कौन सी जानकारी मांगना गैरजरूरी है, कौन-कौन से कागजात मांगना गैरजरूरी है। इसके अलावा अभी केंद्र सरकार जो पहल करते दिख रही है, वैसी पहल भी राज्य सरकारों में और स्थानीय संस्थाओं के दफ्तरों में जरूरी है कि फाइल कम से कम टेबिलों पर जाए, और जल्द से जल्द उसका निपटारा हो। इसके लिए जरूरी हो तो हर फाइल की स्थिति विभागों की वेबसाइट पर चलनी चाहिए ताकि लोगों को घर बैठे पता लग सके और खुद सरकार भी जांच सके कि कौन सी फाइल किस टेबल पर कितने दिन रही। ऐसा नहीं कि सरकार में सारे के सारे लोग खराब रहते हैं, बहुत से ईमानदार, और बहुत से भ्रष्ट लोग, ऐसे रहते हैं जो कि हर शाम ऑफिस छोडऩे के पहले टेबल खाली करके जाते हैं। ऐसे लोग काम को तेजी से निपटाते हैं फिर भले उसके पीछे उनकी कमाई की नीयत हो या ईमानदारी से काम करने की नीयत हो। देर से होने वाले काम से वसूली-उगाही का खतरा तो रहता ही है, देश की उत्पादकता का भी बड़ा नुकसान होता है। लोगों को सरकारी दफ्तरों के बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं और कुल मिलाकर उन दफ्तरों में काम करवाने वाले दलालों के मार्फत काम करवाना पड़ता है। ऐसा करते हुए बहुत से लोगों के सामने यह दिक्कत भी सामने आती है कि वे जब दफ्तर पहुंचते हैं संबंधित अधिकारी या कर्मचारी छुट्टी पर, या गैरमौजूद मिलते हैं। होना यह चाहिए कि विभागीय वेबसाइट पर हर अधिकारी और कर्मचारी की छुट्टी दिख जानी चाहिए, या वे दौरे पर हैं, या पूरे दिन किसी बैठक में हैं, तो वह भी दिख जाना चाहिए ताकि लोगों का वक्त खराब ना हो। और क्योंकि यह बात मामला सरकारी कामकाज से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसमें लोगों की निजी जिंदगी का कोई राज भी उजागर नहीं हो रहा है। अफसर और कर्मचारी किस-किस दिन दफ्तर में नहीं रहेंगे, यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उजागर होनी चाहिए।

हिंदुस्तान में जब से सूचना का अधिकार कानून लागू हुआ है तबसे फाइलों का रहस्य थोड़ा सा घटा है, फिर भी यह आम लोगों के बस का नहीं रह गया कि वे अपने से संबंधित हर फाइल की कॉपी आरटीआई के तहत हासिल कर सकें, और फिर अपना काम तेजी से करवा सकें। लोग फाइल ले भी लेते हैं, तो भी उनका काम रफ्तार से नहीं हो सकता क्योंकि सरकार का ढांचा काम को रोकने के हिसाब से बनाया गया है, काम को करने के हिसाब से नहीं। सरकारी अमला अपनी जिम्मेदारियों की बात ही नहीं करता, अपने अधिकारों की बात करता है, उन्हें यह मालूम है कि वे कितने दिन तक कागज को रोक सकते हैं, क्या अड़ंगा लगाकर वापस भेज सकते हैं, और कौन-कौन सी दूसरी गैरजरूरी चीजों को मांग सकते हैं।

छत्तीसगढ़ का हमारा तजुर्बा यह कहता है कि यहां जब कभी प्रशासनिक सुधार के बारे में कोई बात तो हुई है, तो वह नारे की तरह अधिक हुई है, लेकिन हकीकत में जमीनी स्तर पर लोगों की परेशानी घटाने की कोई कोशिश नहीं हुई। सरकार को अपने अफसरों से प्रशासनिक सुधार का प्रयोग बंद करना चाहिए। इसके लिए तो आम जनता के बीच के लोगों को लेकर उनसे सलाह लेनी चाहिए कि कौन-कौन सी जानकारी गैरजरूरी है, और कौन-कौन सी प्रक्रिया वक्त बर्बाद करती है। सरकारें अगर यह सोचती हैं कि आम जनता का वक्त बर्बाद करने में कोई हर्ज नहीं है, तो यह भी समझ लेना चाहिए कि इससे राष्ट्रीय उत्पादकता भी प्रभावित होती है और जनता का सरकार में भरोसा तो खत्म होता ही है। यह भी एक बड़ी वजह रहती है कि एक कार्यकाल पूरा करने के बाद कोई-कोई सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव हार जाती है क्योंकि लोगों के मन में उसके कामकाज के खिलाफ एक नाराजगी बैठी रहती है। इसलिए न केवल जनता की तरफ से ऐसी मांग उठनी चाहिए, बल्कि सत्तारूढ़ पार्टी को भी अपने खुद के भले के लिए ऐसी कोशिश करनी चाहिए जिससे अगले चुनाव के वक्त एंटी इनकंबेंसी कही जाने वाली नौबत ना आए, और लोग सरकार से नाराज होकर सत्तारूढ़ पार्टी को पूरी तरह ख़ारिज न कर दें।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अक्टूबर 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अक्टूबर 2021


 

कुदरत की बनाई दुनिया के मुकाबले इंसान की बनाई जा रही एक आभासी दुनिया

 29 अक्टूबर 2021

 

दुनिया में जो लोग पिछले डेढ़ बरस में जगह-जगह हुए लॉकडाउन और वर्क फ्रॉम होम से अब तक पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं, उनके लिए आने वाला वक्त कुछ और चीजें लेकर आने वाला है। एक नई जुबान खबरों में सामने आ रही है, जिसमें वर्चुअल-रियलिटी विजन (मेटावर्स) का इस्तेमाल हो रहा है। और इसी को ध्यान में रखकर दुनिया में ईश्वर की तरह ताकतवर हो चुकी कंपनी फेसबुक ने अपना नाम बदलकर मेटा कर लिया है। अब यह समझना थोड़ा सा मुश्किल भी हो सकता है कि मेटावर्स से क्या होगा। तो इस बारे में फेसबुक सहित दूसरी कुछ कंपनियां मिलकर जो एक नया आभासी वातावरण, वर्चुअल एनवायरमेंट बना रही हैं, उसे समझने की जरूरत है। अभी लोगों ने इंटरनेट पर कंप्यूटर और मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हुए दो लोगों के बीच तरह-तरह की ऑडियोवीजुअल बैठकें की हैं, और इसके साथ-साथ तरह-तरह की कॉन्फ्रेंस भी की हैं। लेकिन अब मेटावर्स के बारे में कहा जा रहा है कि इसे कुछ खास किस्म के हेडसेट लगाकर ऐसा महसूस किया जा सकेगा कि लोग इस आभासी दुनिया के भीतर चल-फिर रहे हैं, उठ-बैठ रहे हैं, वहां दूसरे लोगों से मिल रहे हैं, वहां काम कर रहे हैं, वहां खरीदारी कर रहे हैं, और घर के भीतर भी ऐसे हेड सेट लगाकर लोग दफ्तर की तरह काम कर सकेंगे, या घर में बैठे-बैठे ही दुनिया की दूसरी जगहों की सैर कर सकेंगे। यह कंप्यूटर स्क्रीन पर चलने वाली बैठकों से बहुत ही अलग किस्म का अनुभव होगा और लोग ऐसा महसूस करेंगे कि वे सचमुच इस दुनिया के दूसरे हिस्सों में जाकर वहां लोगों से मिल रहे हैं, सब कुछ देख रहे हैं, और कई किस्मों के काम कर रहे हैं। यह शायद किसी 3-डी फिल्म देखने की तरह होगा, जिसमें देखने वाले उसके भीतर जाकर उसे जी भी सकेंगे।

अब यह समझने की जरूरत है कि हाल के वर्षों में लोग अपनी असल जिंदगी के मुकाबले ऑनलाइन जिंदगी में जिस तरह उलझे हैं, और जिस तरह की संभावनाओं और आशंकाओं के बीच में अपनी ऑनलाइन मौजूदगी बढ़ाते चल रहे हैं, उस तरह अब अगर वे ऑनलाइन के आभासी वातावरण में जाकर वहां रह सकेंगे, बस सकेंगे, काम कर सकेंगे, वहीं लोगों से मिलजुल सकेंगे, सैर सपाटा कर सकेंगे, तो क्या होगा? उससे असल जिंदगी पर कैसा असर पड़ेगा? आज के मौजूदा रिश्ते पर कैसा असर पड़ेगा? ऐसी बहुत सी बातें टेक्नोलॉजी से परे लोगों के निजी मनोविज्ञान और समाज विज्ञान के नजरिए से देखने और समझने की रहेंगी। जब असल जिंदगी और आभासी जिंदगी के बीच के फासले को इस तरह घटाया जा रहा है, और जब लोगों को आभासी जिंदगी में और अधिक जीने की सहूलियत मुहैया कराई जा रही है जहां पर लोग असल जिंदगी की दिक्कतों से दूर वक्त गुजार सकेंगे, और कामकाज कर सकेंगे, तो फिर यह देखना होगा कि ऐसी आभासी जिंदगी के बढ़ते चलने से उनकी असल जिंदगी पर कैसा असर पड़ेगा? आभासी दुनिया के रिश्तों का असल दुनिया के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा? और यह अंदाज लगाना अभी आसान इसलिए नहीं होगा कि अभी तो इस आने वाली, आभासी दुनिया, मेटावर्स की संभावनाओं और उसकी दखल के बारे में भी लोगों की कल्पनाएं काम नहीं कर रही हैं। लोगों को अभी यह पता नहीं लग रहा है कि ऐसी आभासी दुनिया या ऐसे आभासी वातावरण में क्या-क्या किया जा सकेगा। लेकिन चूंकि दुनिया की बहुत सी कंपनियां, बहुत से विश्वविद्यालय, बहुत से वैज्ञानिक संस्थान इस मेटावर्स पर काम कर रहे हैं, और जैसा कि फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने कहा, यह इतनी बड़ी सोच है कि फेसबुक जैसी कंपनी भी इसे अकेले पूरा नहीं कर सकती थी, इसलिए वह बाकी संस्थानों और कंपनियों के साथ इस प्रोजेक्ट में भागीदार बनी है। इसलिए आज किसी को इस सोच की विकरालता का कोई अंदाज नहीं है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि 10-15 बरस पहले किसी को फेसबुक की इन संभावनाओं का अंदाज नहीं था, या कि व्हाट्सएप के बारे में किसी ने सोचा नहीं था कि वह जिंदगी को इस तरह बदल देगा।

इंसानी मनोविज्ञान के जानकार लोगों, और समाज विज्ञान के जानकार लोगों के लिए यह एक बड़ी चुनौती का समय है कि वे ऐसे मेटावर्स के बारे में कल्पना करें और उससे इंसानों की जिंदगी में पढऩे वाले फर्क के बारे में सोचें। यह सोचना जरूरी इसलिए भी है कि जिस दिन बाजार इस नए औजार को हथियार की तरह इस्तेमाल करके इंसानों की मौजूदा जिंदगी को तहस-नहस करने, और उसे दुहने पर आमादा हो जाएगा, उस दिन लोगों के पास संभलने का वक्त भी नहीं होगा। यह भी सोचने की जरूरत है कि टेक्नोलॉजी और बाजार मिलकर आज के मौजूदा बाजार और रोजगार को किस तरह खत्म या प्रभावित कर सकते हैं। यह सोचना भी आसान नहीं है, और दूसरी बात यह कि मेटावर्स से जुड़ी हुई कुछ कंपनियों को छोडक़र बाकी बाजार पर इस आभासी वातावरण का क्या असर होगा, इसे भी बाकी कारोबार को सोचना चाहिए। इससे हो सकता है कि बहुत से कारोबार खत्म होने की नौबत आ जाए, बहुत से रोजगार पूरी तरह खत्म ही हो जाएं। यह भी हो सकता है कि इससे कारोबार और रोजगार का एक नया आसमान खुल जाए। कुल मिलाकर इस दुनिया के भीतर एक नई आभासी दुनिया बन जाने से हालात में जो भूचाल आएगा, उसे समझने का काम शुरू किया जाना चाहिए, और उसके हिसाब से लोगों को तैयारी भी करनी चाहिए। फिलहाल तो हम इतना ही सुझा सकते हैं कि तमाम लोगों को, जो पढऩा-लिखना जानते हैं, उन्हें इस विषय पर आने वाली हर नई जानकारी को जरूर पढऩा चाहिए क्योंकि इससे उनकी जिंदगी बहुत जल्द ही बदलने जा रही है। ऐसे बदलाव के लिए उन्हें दिमागी रूप से तैयार रहना चाहिए। आगे-आगे देखिए होता है क्या।

(Daily Chhattisgarh)