ट्रम्प का हर हफ्ते का यू-टर्न, लचीलापन या विश्वासघात?
24 मार्च 2026
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने दूसरे कार्यकाल के सिर्फ 14 महीनों में इतनी बार अपनी नीतियां, वादे और फैसले पलट चुके हैं कि अब यह उनकी कार्यशैली का स्थायी चरित्र बन गया है। कुछ लोग इसे लचीलेपन और कल्पनाशील सौदेबाजी कहकर बचाव करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इतने कम समय में इतने बड़े-बड़े फैसले उलट-पलट करने वाला कोई निर्वाचित राष्ट्रपति अमेरिकी इतिहास में पहले नहीं हुआ। ट्रम्प अब ‘यू-टर्न राष्ट्रपति’ बन चुके हैं। हर हफ्ते नया पलटाव, नई अनिश्चितता, नया विश्वासघात।
ट्रम्प के यू-टर्न की सूची लंबी और चौंकाने वाली है। ईरान पर अधिकतम दबाव का दावा करते हुए उन्होंने ईरानी तेल पर छूट दे दी। रूस पर सख्ती का ऐलान कर रूसी तेल खरीदने का रास्ता खोल दिया। कनाडा-मैक्सिको पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी, फिर टाल दिया। यूक्रेन युद्ध 24 घंटे में खत्म करने का दावा किया, फिर मदद जारी रखी। ग्रीनलैंड खरीदने का ड्रामा रचा, फिर चुपचाप पीछे हट गए। टिकटॉक बैन का वादा किया, अब एक अमरीकी कंपनी को जोडक़र चीनी मालिक के साथ समझौता कर रहे हैं। क्रिप्टो पर दुश्मनी का रवैया रखा, अब रणनीतिक स्टॉक बनाने की बात कर रहे हैं। यह सिर्फ नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि सिद्धांतों का खुला त्याग है।
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि ट्रम्प के इन यू-टर्न से नैटो देशों, यूरोप और अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों का भरोसा पूरी तरह टूट गया है। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा के नेता अब खुलकर कह रहे हैं कि ‘ट्रम्प की कोई नीति स्थायी नहीं है। आज जो वादा करते हैं, कल पलट देते हैं।’ नतीजा यह कि नैटो देश अब अपनी रक्षा पर खुद ज्यादा खर्च कर रहे हैं। यूरोप में अमरीका-प्रथम को अब महज-अमरीका के रूप में देखा जा रहा है। ट्रम्प ने न सिर्फ अपनी, बल्कि पूरे अमरीका की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुँचाया है।
इसके अलावा, ट्रम्प की कमजोर नब्जों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एपस्टीन से जुड़ी खबरों को दबाने की कोशिशें और इजराइली मोसाद के हाथ में ट्रम्प की कुछ कमजोरियां होने की चर्चाएं लगातार चल रही हैं। कई रिपोर्ट्स और खुफिया सूत्रों में दावा किया जा रहा है कि नेतन्याहू इन कमजोरियों का इस्तेमाल करके ट्रम्प से वह सब करवा रहे हैं, जो आधी सदी में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति से नहीं करवा सके। साथ ही ट्रम्प परिवार के कारोबारी हित भी विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं। क्रिप्टोकरेंसी, रेयर मिनरल्स और अन्य क्षेत्रों में ट्रम्प परिवार के हितों की खबरें बार-बार सामने आ रही हैं। कई देशों से जुड़े इन व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभों के कारण अमेरिकी विदेश नीति व्यक्तिगत स्वार्थ की दिशा में मुड़ती दिख रही है।
ट्रम्प की इस अस्थिरता और व्यक्तिगत हितों की नीति ने पूरी दुनिया की चैरिटी, पर्यावरण, कारोबार और रोजगार को जिस बुरी तरह प्रभावित किया है, उतना तो हिटलर भी नहीं कर पाया था। पर्यावरण समझौतों से पीछे हटना, ग्लोबल वार्मिंग पर चुप्पी, कारोबारी युद्ध, टैरिफ की अनिश्चितता और रोजगार के अवसरों का नुकसान, सब कुछ एक साथ हुआ है।
सबसे बड़ा और लंबे समय तक रहने वाला खतरा यह है कि ट्रम्प का यह मिजाज अगले किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए नवसामान्य बन सकता है। एक बार जब एक निर्वाचित राष्ट्रपति दिखा देता है कि बड़े-बड़े वादे और नीतियाँ इतनी आसानी से पलटी जा सकती हैं, तो भविष्य के नेता भी इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करेंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय समझौतों की विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी, सहयोगी देश खुद को सुरक्षित रखने के लिए अलग गठबंधन बनाने लगेंगे और अमेरिका की वैश्विक लीडरशिप स्थायी रूप से कमजोर हो जाएगी। यह छोटा खतरा नहीं है। यह लोकतंत्र और वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है।
ट्रम्प का हर हफ्ते यू-टर्न अब कोई छोटी बात नहीं रह गया है। यह अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व भूमिका को कमजोर कर रहा है, सहयोगियों का भरोसा तोड़ रहा है और दुनिया भर में अनिश्चितता फैला रहा है। कुछ इसे लचीलापन कहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह अस्थिरता है, जिसकी कीमत न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया चुका रही है। और सबसे अधिक खुद अमरीका चुका रहा है जिसके भीतर यह पूरी तरह, और बुरी तरह स्थापित हो चुका है कि वहां के संविधान में कुछ बुनियादी दरारें हैं जिनकी वजह से वहां के राष्ट्रपति को एक पिशाच-तानाशाह बन जाने का पूरा मौका हासिल हुआ है। इस ट्रंप ने पूरी दुनिया के सामने घटियापन की नई मिसालें कायम की हैं, और इसकी काट किसी भी लोकतांत्रिक देश में आसानी से नहीं निकल पाएगी, इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में सबसे घटिया राष्ट्रपति की तरह दर्ज हो जाना तय है।
अभी तक जो इजराइल अमरीका का पिट्ठू बना चल रहा था, आज उसी इजराइल का पालतू बनकर ट्रम्प उसके हुक्म पर ईरान पर एक अभूतपूर्व हमला कर चुका है, और दुनिया में जंग खत्म करवाने के नाम पर वह सत्ता पर आया था, आज वह दुनिया का सबसे बड़ा जंगखोर बन गया है। इस जंग के साथ-साथ उसने मध्य-पूर्व के देशों में अपने सारे पुराने साथियों को एक ऐसी बुरी मुसीबत में डाला है कि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प और अमरीका की विश्वसनीयता इन सारे देशों के बीच खत्म हो चुकी है क्योंकि अमरीकी फौजी अड्डों के रहते हुए उन्हें कोई हिफाजत तो नहीं मिली, ईरान के गैरजरूरी हमले जरूर मिल रहे हैं। ईरान की इस पूरी तरह नाजायज जंग की वजह से आज पूरी दुनिया जिस बुरी तरह तेल और गैस की कमी का शिकार हो गई है, वह ट्रम्प को अपने घरेलू मोर्चे पर मध्यावधि चुनावों के ठीक पहले भी समझ पड़ रहा है, इसलिए वह कभी रूस पर से तेल बिक्री की रोक हटा रहा है, कभी ईरान पर से, लेकिन पारे की तरह अस्थिर उसके दिमाग और फैसलों की वजह से पूरी दुनिया एक आर्थिक अस्थिरता और अनिश्चितता में घिर गई है, और पूरी दुनिया अकेले ट्रम्प को गालियां दे रही है।
हम ट्रंप के चुनाव अभियान के वक्त से इसके अस्थिर चित्त को लेकर यह लिखते आए थे कि यह राष्ट्रपति बनने के लायक नहीं है, फिर जब अमरीकी वोटरों ने इसे चुन ही लिया, तो फिर हमने यह लिखना शुरू किया कि इसके दिमागी दिवालियापन को देखते हुए अमरीका की संसद को चाहिए कि इसे महाभियोग लगाकर हटाए। चूंकि संसद में बहुमत ट्रंप की पार्टी का है, इसलिए यह काम आसान नहीं होगा, लेकिन अमरीकी इतिहास इस बात को अच्छी तरह दर्ज करेगा कि ट्रंप के मंत्रिमंडल ने ऐसी दिमागी हालत वाले राष्ट्रपति को भी हटाने के बारे में कुछ नहीं किया। वहां के संविधान में यह प्रावधान है कि अगर राष्ट्रपति की दिमागी हालत दफ्तर संभालने लायक नहीं रहती, तो उपराष्ट्रपति के साथ बाकी मंत्री मिलकर राष्ट्रपति को हटा सकते हैं, और उपराष्ट्रपति को दफ्तर दे सकते हैं। हालांकि हमें इस बात में कुछ अधिक भला नहीं दिख रहा है क्योंकि वहां का उपराष्ट्रपति भी ट्रंप की ही टक्कर का नफरती, युद्धोन्मादी, और बद्दिमाग है। अमरीका ने दुनियाभर के बेकसूर देशों, वियतनाम से लेकर फिलिस्तीन और ईरान तक बमबारी में जितने लोगों को मारा है, उन सबकी बद्दुआ का असर है कि अमरीका को आज ऐसी सरकार मिली है।
एक दिन ऐसा आएगा जब कोई न कचरा उठाएगा, तब शहरों में कौन जी पाएगा?
23 मार्च 2026
भारत में जब-जब मानसून में किसी शहर में बाढ़ की नौबत आ जाती है, तो श्मशान वैराग्य की तरह पॉलीथीन-कचरे पर रोकथाम की बात होने लगती है। फिर जैसे-जैसे बाढ़ का पानी उतरता है, शहरी घरों से कीचड़ धुल जाता है, सडक़ों पर आवाजाही शुरू हो जाती है, लोग फिर से कचरा फैलाने लगते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि किसी तीर्थ से लौटते ही लोग नए उत्साह के साथ पाप करने में जुट जाते हैं। आज शहरों की हालत यह होती जा रही है कि नालियों को लोग घूरों की तरह इस्तेमाल करते हैं, हर नाली में तरह-तरह का कचरा पटा हुआ रहता है। लोग प्लास्टिक के कचरे को अधिक खतरनाक मानते हैं क्योंकि पतली झिल्लियां जगह-जगह फंस जाती हैं, और पानी आगे बढऩा बंद हो जाता है। लेकिन न सिर्फ सिंगल यूज प्लास्टिक कही जाने वाली ऐसी पतली झिल्लियों का खतरा है, बल्कि हर वह कचरा खतरा है जो कि नालियों में डाल दिया जाता है। इसके पीछे की अलग-अलग वजहों को समझने की जरूरत है।
एक तो यह कि भारत में निर्वाचित स्थानीय जनप्रतिनिधियों में जनता में अनुशासन लागू करने का हौसला नहीं रहता। महापौर या निगम-पालिका अध्यक्ष न किसी अवैध निर्माण को रोक पाते, न अवैध कब्जे को, और ऐसे में नालियों में कचरा फेंकने वाले लोगों को, या कि हर रात दुकान बंद करते समय बाहर सडक़ों पर पैकिंग का अपार कचरा छोडक़र जाने वाले लोगों पर किसी कार्रवाई की चर्चा भी औसत शहर में नहीं होती। हो सकता है कि देश के कुछ चुनिंदा शहरों में निर्वाचित प्रतिनिधि, और म्युनिसिपलों में तैनात अफसर दिल कड़ा करके कचरा फैलाने वालों पर कुछ सख्ती दिखाने की सोचते भी हों, लेकिन स्थानीय शासन की कुर्सियों पर बैठे अधिकतर लोगों को समझाने, और उनसे अमल करवाने के बजाय सरकारी खर्च पर कचरा इकट्ठा करवाने को अधिक सहूलियत का पाते हैं। नतीजा यह होता है कि जब जनता जिम्मेदार नहीं होती, तो घरों और बाजारों से निकलने वाले कचरे को अलग-अलग छांटने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। जिस कचरे को सड़ाकर खाद बनाई जा सकती है, या जो सडक़र खुद ही खत्म हो सकता है, ऐसे बायोडीग्रेडेबल कचरे के भी प्लास्टिक और दूसरे कचरे के साथ मिलाकर जब कचरा गाडिय़ों में डाला जाता है, तो फिर उसमें से प्लास्टिक अलग करके उसकी री-साइकिलिंग की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है।
कुछ आंकड़े बताते हैं कि भारत में सालाना करीब एक करोड़ टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, और इसमें से सिंगल यूज प्लास्टिक, जिस पर प्रतिबंध लगाया गया है, वह सिर्फ दो-तीन फीसदी रहता है। बाकी सारा कचरा अलग-अलग किस्म की पैकिंग का रहता है, जो अभी भी बिना रोक-टोक धड़ल्ले से चल रही है। अभी सरकार ने एक कानून बनाकर इतना जरूर किया है कि प्लास्टिक के अलग-अलग ग्रेड की पैकिंग इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को अपने इस्तेमाल जितनी मात्रा के उन ग्रेड के प्लास्टिक की री-साइकिलिंग के लिए भुगतान करना पड़ता है। इसके लिए सरकार की रजिस्टर्ड री-साइकिलिंग यूनिट्स हैं, लेकिन यह पूरा सिलसिला सरकारी फर्जीवाड़े से घिरा हुआ है, और जिस तरह गाडिय़ों के प्रदूषण वाले सर्टिफिकेट फर्जी तरीके से बन जाते हैं, वैसे ही प्लास्टिक री-साइकिलिंग के सर्टिफिकेट खरीद लिए जाते हैं।
शहरों में घरों से निकलने वाले कचरे को ही अलग-अलग करने का अभियान छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक उत्साही कलेक्टर के रहते हुए हुआ था, और वहां पर बड़ी संख्या में महिला स्व-सहायता समूह की सदस्यों को रोजगार भी मिल गया था। लेकिन खुद छत्तीसगढ़ में ही बाकी जगहों पर कभी ऐसी योजना का विस्तार नहीं हुआ। अंबिकापुर के प्रयोग की देश में राष्ट्रीय स्तर पर तारीफ हुई थी, लेकिन देश में जिस तरह किसी एक जगह की कामयाबी को दूसरी जगह उपयोग करने की परंपरा नहीं है, उसके चलते अंबिकापुर गार्बेज सेग्रिगेशन के कामयाब प्रयोग का एक टापू बनकर रह गया। अभी कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई सुनाई पड़ी थी जिसमें जजों ने ठोस कचरे के निपटारे में सरकार की नाकामयाबी पर फिक्र और नाराजगी दोनों ही जाहिर की थी, लेकिन मोटेतौर पर यह नाकामयाबी स्थानीय जनप्रतिनिधियों की दहशत से उपजी रहती है, वे वोटरों को नाराज करने वाला कोई काम करना नहीं चाहते, और सरकारी खर्च पर वोटरों की आदत उसी तरह बिगाडऩा जारी रहता है, जिस तरह किसी बारात के जनवासे में बारातियों की आदतों को बिगाड़ा जाता है।
इस मामले में एक आखिरी मुद्दा और है, जो कि कम महत्वपूर्ण नहीं है, फिर चाहे हम उसकी चर्चा आखिर में क्यों न कर रहे हैं। भारत में सफाई कर्मचारियों को जाति व्यवस्था के तहत पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपरागत रूप से उसी काम में जोते रखा जाता है। यह मान लिया जाता है कि बाकी समाज नालियों को घूरे की तरह इस्तेमाल करे, जितना चाहे उतना कचरा फैलाए, गटर साफ करते हुए मरने के लिए कुछ खास जातियों के सफाई कर्मचारी तो अगली कई सदियों तक रहेंगे ही। गरीब और नीची समझी जाने वाली जातियों के सफाई कर्मचारियों की अगली कई पीढिय़ों की गारंटी से लोगों में सफाई के लिए एक हिकारत पैदा होती है, और कचरा फैलाने के लिए उन्हें एक अपार आत्मविश्वास मिलता है। ऐसा लगता है कि भारत के सफाई कर्मचारियों को दस दिन के लिए छुट्टी पर भेज दिया जाए, और देश के सारे नागरिक यह देख लें कि कोई दिन ऐसा भी आ सकता है जब चारों तरफ इतना कचरा रहेगा, और सफाई कर्मचारी यह तय कर लेंगे कि वे इससे बेहतर कोई दूसरा काम कर लेंगे, तो उस दिन इस गंदगी को कौन साफ करेंगे, कौन कचरा उठाएँगे, या हटाएंगे, इसकी एक झलक कचरा फैलाने वाले लोगों को दिख जाना चाहिए। इससे कम में यह देश सुधरते नहीं दिख रहा है, यहां के स्थानीय संस्थाओं के निर्वाचित जनप्रतिनिधि, और वहां नियुक्त अधिकारी लोगों की आदतों को सुधारने पर कोई भरोसा नहीं करते, भला क्यों लोगों को नाराज किया जाए। यह सिलसिला थमना जरूरी है क्योंकि कोई न कोई ऐसा दिन आएगा जब सफाई कर्मचारी इस काम को करने से मना कर देंगे, या इतना भुगतान मांगेंगे कि म्युनिसिपलों के होश ठिकाने आ जाएंगे।
आभासी जिंदगी के सुख, सहूलियतों में उलझी, बर्बाद होतीं असली जिंदगियां…
22 मार्च 2026
दुनिया में इस बात पर भारी उत्सुकता रहती है कि क्या किसी और ग्रह पर भी कोई जिंदगी है? एक सबसे विकसित देश अमरीका अंतरिक्ष अभियानों में सबसे आगे भी रहता है, और वहां पर लोगों के बीच ऐसी साजिशों की कहानियां चलती ही रहती हैं कि कैसे बाहर से कोई उडऩतस्तरी आई, कैसे उसमें दूसरे ग्रहों के लोग उतरे। बहुत सारी खबरें तो ऐसी भी बनती हैं कि कोई दूसरे ग्रह का प्राणी अमरीकी सरकारी एजेंसियों के हाथ लग गया है, और उसके शरीर पर तरह-तरह के प्रयोग चल रहे हैं। यूएफओ और एलियन, अमरीकी जनता के बीच असली रहस्य की तरह बड़ी प्रचलित धारणाएंं हैं, और एआई से बनने वाले वीडियो-फोटो के दशकों पहले से अमरीका से यूएफओ और एलियन की तस्वीरें गढ़ी जाकर दुनिया भर में फैलती आई हैं। लेकिन अंतरिक्ष में दूसरे ग्रहों तक फैली हुई किसी संभावित जिंदगी से परे एक और जिंदगी इस धरती की जिंदगी से परे सामने आई है।
धरती के लोग अपनी असल जिंदगी के साथ-साथ अब एक आभासी जीवन भी जीते हैं। वे आज अपने घर-परिवार, और अपने असल दायरे के दोस्तों, सहकर्मियों, सहपाठियों से परे आभासी दुनिया के लोगों के साथ अधिक जी रहे हैं। फेसबुक या इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों को हर दिन घंटों व्यस्त रखते हैं, और अलग-अलग कई पीढिय़ों के लोग आज इस दिमागी हालत में रहते हैं कि उनकी असल जिंदगी वही ऑनलाइन वाली है, और जो ऑफलाइन, या जमीनी और असली जिंदगी है, उससे लोगों का लेना-देना घटते चल रहा है। यह सिलसिला एक खतरनाक हद तक बढ़ चुका है।
अब लोगों को खरीददारी करने बाजार नहीं जाना पड़ता, किसी असल इंसान से बात नहीं करनी पड़ती, सब कुछ ऑनलाइन हो जाता है। लोगों को खाने-पीने के लिए किसी इंसान से बात नहीं करनी पड़ती, मोबाइल ऐप से खाना ऑर्डर हो जाता है, और अगर पहले से भुगतान किया हुआ रहे तो डिलीवरी करने वाले लोग दरवाजे पर छोडक़र चले जाते हैं। बिना किसी मानवीय संपर्क के ट्रेन या प्लेन की टिकटें बुक हो जाती हैं, कार किराए पर मिल जाती है, और तो और अगर भाड़े पर कुछ देर के लिए संगी चाहिए, तो वैसी एस्कॉर्ट सर्विस भी ऑनलाइन हासिल है। किसी भी तरह के भुगतान के लिए, किराना या फल-सब्जी खरीदने के लिए किसी इंसान से बातचीत जरूरी नहीं रह गई है।
इससे परे लोग अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में सबसे करीबी और सबसे भरोसेमंद दोस्त ऑनलाइन भी, और बहुत से मामलों में शायद, ऑनलाइन ही बनाने लगे हैं, उन्हीं से राज बांटने लगे हैं, उन्हीं के सुख-दुख मायने रखते हैं, और लोग उसे काफी भी समझने लगे हैं। दरअसल आभासी दुनिया के ऑनलाइन रिश्तों में कोई असल नकारात्मक बात नहीं रहती। सब कुछ नकली रहता है, सांसों की बदबू, बदन से उठने वाली आवाजें, कुछ भी ऑनलाइन रिश्तों को परेशान नहीं करते। लोगों को किसी के बारे में कुछ भी सच पता लग जाए, यह जरूरी नहीं रहता। लोग अंधाधुंध झूठ बोल सकते हैं, और बरसों तक एक मुखौटा ओढक़र रह सकते हैं। ऐसा सहूलियत का झूठ असल जिंदगी में मुमकिन नहीं रहता। ऑनलाइन रिश्ते कुछ-कुछ खरीदे हुए देह-सुख सरीखे रहते हैं जिनके साथ असल लंबी जिंदगी की जिम्मेदारियां जुड़ी हुई नहीं रहतीं। ऐसे में ऑनलाइन सहूलियत को छोडक़र असल जिंदगी की खुरदुरी हकीकत बहुत से लोगों को नहीं सुहाती, और वे ऑनलाइन ही खुश रहने लगते हैं।
मनोवैज्ञानिक और सामाजिक शोधकर्ता लगातार यह महसूस कर रहे हैं कि आज नौजवानों की जिंदगी में मेटावर्स (फेसबुक, वॉट्सऐप, और इंस्टाग्राम की कंपनी मेटा में उलझे हुए लोगों की दुनिया) का हिस्सा उनकी असल जिंदगी से अधिक बड़ा होते जा रहा है। वे रोज की अपनी जिंदगी में जितना वक्त दूसरे इंसानों के साथ जीते हैं, असल जिंदगी की धरती पर काम करते हैं, उससे कहीं अधिक वक्त वे मेटावर्स पर गुजारते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि लाखों-बरसों में इंसान के मिजाज में धीरे-धीरे करके जो सामाजिकता आई थी, वह अब एक पीढ़ी के भीतर ही तेजी से कमजोर पड़ रही है। असली रिश्ते, भावनाएं, और सामाजिक संपर्क कमजोर होते चल रहे हैं। अमरीकी साइकोलॉजिकल एसोसिएशन, और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोध नतीजों में यह पाया गया है कि मेटावर्स का लंबे समय तक इस्तेमाल लोगों को अकेलेपन के पैमाने पर बहुत अधिक अकेला कर देता है। जो लोग रोज तीन घंटे से ज्यादा मेटावर्स में जीते हैं, उनमें अकेलापन, उदासी, और सामाजिक अलगाव की भावना अधिक बढ़ जाती है। अब लोग मेटावर्स पर भी अपने खुद के चेहरे के बजाय अपनी पसंद के बनाए गए अवतार की शकल में सामने आते हैं, और वे धीरे-धीरे अपनी खुद की हकीकत से भी कट जाते हैं। भारत में 2025 में बेंगलुरू के देश के सबसे बड़े मानसिक केन्द्र, निम्हंस और एम्स-दिल्ली के एक संयुक्त अध्ययन में यह पता लगा कि 18 से 25 साल उम्र के लोगों में से 64 फीसदी लोग रोज दो-चार घंटे मेटावर्स पर गुजारते हैं, इनमें से 47 फीसदी ने यह माना है कि उनकी अपने असली दोस्तों से बात करने की इच्छा अब कम हो गई है। इस अध्ययन के 39 फीसदी नौजवानों में सामाजिक बेचैनी बढ़ी है, वे वास्तविक दुनिया में बात करने से डरते हैं, और अपने गढ़े हुए अवतार के पीछे से बात करने में सुरक्षित महसूस करते हैं। इस शोध के नतीजे बता रहे हैं कि आभासी दुनिया असल जिंदगी का पूरक नहीं बन रही है, वह असल जिंदगी को बेदखल ही कर दे रही है।
2025-26 में आईआईटी दिल्ली, और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंसेज मुम्बई के एक साझा अध्ययन, डिजिटल डी-टॉक्स में यह बात सामने आई कि जो नौजवान सात दिन तक मेटावर्स से दूर रहे, उनकी नींद 31 फीसदी बेहतर हुई, फिक्र एक चौथाई घट गई, और परिवार के साथ वक्त गुजारने की उनकी इच्छा बढ़ी। ऐसे कुछ अध्ययन बतलाते हैं कि लोग अपने गढ़े हुए चेहरे-मोहरे, और तस्वीरों के पीछे से आभासी जीवन जीते हुए अपने असली तन-मन की फिक्र करना भूल जाते हैं, और घंटों ऑनलाइन बैठे हुए वे अपने तन और मन दोनों को बर्बाद कर लेते हैं।
ये मुद्दा असीमित है, इस पर एक पूरी किताब भी कम पड़ सकती है, लेकिन हम आज लोगों को नकली-आभासी जिंदगी के खतरे, और असली जिंदगी की उपेक्षित संभावनाओं के बारे में आगाह भर करना चाहते हैं। लोगों को आभासी जीवन को ही सब कुछ मानकर असली जिंदगी, असली इंसानों, और असली रिश्तों की उपेक्षा के खतरे में नहीं पडऩा चाहिए। असल जिंदगी अधिक चुनौतियों भरी जरूरी रहती है, लेकिन चुनौतियों के साथ ही संभावनाएं इंसानों को परिपक्व और बेहतर बना सकती हैं। मुखौटों के पीछे छुपी हुई ऑनलाइन संभावनाएं बिना चुनौतियों के रहती हैं, लोग अपने गढ़े हुए झूठ को किसी परीकथा की तरह आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह झूठ उन्हें किसी किनारे नहीं ले जा सकता।
अमरीका सहित योरप के कई बड़े देशों में मेटा प्लेटफॉम्र्स पर कई तरह के मुकदमे चल रहे हैं। इनमें बच्चों की मानसिक सुरक्षा की उपेक्षा करना एक आरोप है, लेकिन इसके अलावा भी लोगों को अपने प्लेटफॉर्म की लत में उलझा देना, यह दूसरा बड़ा आरोप है। मेटा के प्लेटफॉम्र्स जिस तरह नशा बन जाते हैं, उसे लेकर अमरीका में ही चल रहे एक मुकदमे की तुलना तम्बाकू कंपनियों की लत लगाने के एक पुराने मामले से की जा रही है। एक मामला यह भी चल रहा है कि फेसबुक ने किस तरह इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप खरीदकर सोशल मीडिया में अपना एक एकाधिकार बना लिया है, और जो लोग इस ककून में फंस जाते हैं, वे इससे बाहर ही नहीं निकल पाते। एक मुकदमा यह भी चल रहा है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम बच्चों को फंसाने वाले मुजरिमों की चारागाह बन गए हैं। जो जिम्मेदार देश हैं, वहां पर मेटा जैसी कंपनियों पर अरबों डॉलर के जुर्माने लग चुके हैं, लेकिन अधिकतर देश अपने बच्चों, नौजवान पीढ़ी, और बाकी लोगों की मानसिक सेहत, उनकी निजता को लेकर अधिक फिक्रमंद या जिम्मेदार नहीं हैं, इसलिए वहां पर जनता को आभासी दुनिया के इस बेताज तानाशाह, मार्क जुकरबर्ग से बचाने वाले कोई नहीं हैं। समाज के भीतर के लोगों को डिजिटल और ऑनलाइन तानाशाही के इस नए साम्राज्य के खिलाफ एकजुट होना पड़ेगा, आवाज उठानी पड़ेगी, वरना लोकतांत्रिक सरकारें भी अपनी राजनीतिक साजिशों में मेटा जैसी कंपनियों का साथ पाने के लिए उनके जहरीले असर को छूट देती रहेंगी।
पर्यटन संभावनाओं को बढ़ा सकता है चिकित्सा-पर्यटन
22 मार्च 2026
भारत बहुत सारी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच जीने वाला देश है। यहां एक तरफ आम जनता को हासिल सरकारी अस्पताल बदहाल हैं, कई प्रदेशों में तो इलाज का ढांचा इतना कमजोर है कि लोगों को पास के किसी महानगर जाकर वहां संघर्ष करना पड़ता है। दूसरी तरफ ऐसा कोई दिन नहीं होता जब देश के किसी न किसी शहर में कोई बहुत महंगा अस्पताल शुरू न होता हो, या कोई बड़ा सा डायग्नोस्टिक सेंटर न बनता हो। अमीर और गरीब के बीच बंटी हुई दो किस्म की चिकित्सा-सुविधाओं के अलावा एक तीसरे किस्म की चिकित्सा सुविधा देश में और विकसित होती चल रही है, और वह है दूसरे देशों से इलाज के लिए भारत पहुंचने वाले संपन्न विदेशियों की। दुनिया के संपन्न और विकसित देशों में इलाज इतना महंगा है कि वहां चिकित्सा बीमे के लिए लोगों को बड़ी मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। ऐसे में न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के कुछ दूसरे कम महंगे देशों की तरफ भी मरीजों का जाना चलते रहता है। और तो और एक महंगे देश ब्रिटेन से दूसरे देशों में, हंगरी, टर्की, पोलैंड, रोमानिया, स्पेन, पुर्तगाल, थाइलैंड, मैक्सिको, और भारत दांतों का इलाज कराने के लिए हर दिन हजारों लोग चले जाते हैं, और यह इलाज इन दूसरे देशों में ब्रिटेन के मुकाबले खासा सस्ता पड़ता है।
भारत के बारे में यह समझने की जरूरत है कि इतने विशाल देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम अलग-अलग रहता है, और दूसरे देशों से आने वाले लोगों को अपनी पसंद और प्राथमिकता के भारतीय इलाके मिल जाते हैं। फिर यहां के महंगे अस्पताल विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले हैं, हिन्दुस्तानी डॉक्टर पूरी दुनिया में कामयाबी से काम करते हैं, हर विकसित देश में भारतीय नर्सें दिख जाती हैं, और अब कोई ऐसी अंतरराष्ट्रीय आधुनिक चिकित्सा-मशीनें नहीं हैं जो कि भारत में न हों। ऐसे में महंगे देशों के मुकाबले भारत में इलाज का खर्च काफी कम पड़ता है, यहां मरीजों के साथ रहने वाले परिवार को भी बाहर सस्ते में मकान या होटल मिल जाते हैं। इसके साथ-साथ जब वे हिन्दुस्तान आ ही जाते हैं, तो वे ऑपरेशन या लंबे इलाज के साथ-साथ देश के अपने पसंदीदा हिस्से में घूमने भी जा सकते हैं। मरीजों और उनके परिवारों का इलाज का ऐसा भारत भ्रमण उन्हें कुल मिलाकर सस्ता और सहूलियत का पड़ता है। कई किस्म के महंगे इलाज पर अमरीका के मुकाबले भारत में एक चौथाई से भी कम खर्च आता है। भारत से जाकर दूसरे देशों में बसे हुए, और भारतीय पैमानों पर संपन्न हो चुके मरीज तो बड़े इलाज के लिए हिन्दुस्तान आते ही हैं, खाड़ी के देशों के संपन्न लोगों के लिए भी हिन्दुस्तान एक बड़ी पसंद है।
भारत और अंतरराष्ट्रीय जुबान में इसे भारत का मेडिकल टूरिज्म कहा जाता है। अब इस देश में बड़े अस्पतालों के ढांचे जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, हर तरह का पर्यटन भारत में जिस तरह बढ़ रहा है, वह देखने लायक है। इस क्षेत्र के एक जानकार विशेषज्ञ से अभी बीच में रूककर ही हमने बात की, तो पता लगा कि देश के कुछ सबसे बड़े निजी अस्पतालों का 30-40 फीसदी बिल तो विदेशी मरीजों का ही बन रहा है, और उनकी वजह से भारत के मरीजों का इलाज कुछ कम दाम पर हो जाता है। उन्होंने बताया कि आंध्रप्रदेश में तो पर्यटन विकास निगम मेडिकल टूरिज्म और वेलनेस टूरिज्म को अभियान के रूप में जोड़ चुका है, और इसकी वेबसाइट पर इसे अलग से बढ़ावा दिया जा रहा है। आंध्र की राजधानी में दो सौ एकड़ में एक मेगा ग्लोबल मेडिसिटी बनाई जा रही है, जो कि अंतरराष्ट्रीय मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देगी। इसी से जुड़ी हुई जानकारी खंगालते हुए यह दिखा कि केन्द्र सरकार ने अपने ताजा बजट में ऐसे पांच क्षेत्रीय मेडिकल केन्द्र बनाने की घोषणा की है, और टीडीपी के चन्द्राबाबू नायडू तो ऐसा फायदा उठाने वाले सबसे पहले राज्य रहेंगे ही।
भारत में एक-दो निजी कंपनियां ऐसी हैं जो कि दुनिया भर में भारतीय चिकित्सा सुविधाओं की मार्केटिंग करती हैं, और चिकित्सा सुविधाओं के साथ-साथ वे पर्यटन संभावनाओं की जानकारी देकर भी दुनिया भर से मरीजों और उनके परिवारों को भारत भ्रमण के लिए लाती हैं, साथ-साथ इलाज भी। देश में पर्यटन की संभावनाएं, और इलाज की संभावनाएं किस तरह मिलकर एक गाड़ी के दो पहिए बन सकती हैं, यह कोई रहस्य की बात नहीं है, कुछ प्रदेश इसमें दूसरे प्रदेशों के मुकाबले आगे हैं, और कुछ दूसरे प्रदेश आज घरेलू देसी मरीजों का भी मामूली इलाज करने लायक नहीं है, इसलिए वे सिर्फ ताजमहल और बनारस के पर्यटन के मोहताज हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों को इस मिलीजुली संभावना के बारे में अपने मौजूदा ढांचे को तौलना होगा। अगर कोई राज्य इन दो में से किसी एक पैमाने पर पिछड़ा रहेगा, तो वह दूसरे मोर्चे की संभावनाओं को भी खो बैठेगा। आज भारत एक संघीय ढांचे के तहत अलग-अलग राज्यों के बीच आपसी मुकाबले भी देखता है, केन्द्र सरकार अकेले ही किसी एक राज्य को अंधाधुंध बढ़ावा नहीं दे सकती, और खासी कोशिश कर रहे किसी राज्य को रोक भी नहीं सकती। देश के अलग-अलग राज्यों में प्राकृतिक और मानव निर्मित पर्यटन संभावनाएं अलग-अलग हैं। कुछ राज्यों को हिमालय नसीब है, कुछ को समंदर, कुछ को वन्यप्राणी मिले हुए हैं, तो कुछ को ताजमहल जैसी ऐतिहासिक इमारतें। अच्छे निजी अस्पताल जिनमें विश्वस्तरीय सुविधाएं हों, उन्हें कोई भी राज्य सरकार निजी क्षेत्र के साथ मिलकर बढ़ावा दे सकती है। यह मुकाबले का एक खुला बाजार है, और कल्पनाशील राज्यों की संभावनाएं अपार हैं। हमारा यह भी नहीं मानना है कि विदेशी मरीजों के आने से भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं व्यस्त हो जाएंगी, और उनकी वजह से देसी मरीजों को अस्पताल नहीं मिलेंगे। पूरी दुनिया का तजुर्बा यह है कि अधिक फीस देने में सक्षम छात्र हों, या मरीज, उनकी वजह से स्थानीय और घरेलू लोगों को रियायत मिल पाती है। ब्रिटेन जैसे बहुत से ऐसे देश हैं, जहां पर विदेशी छात्र-छात्राओं को खासी अधिक फीस देनी पड़ती है, और उसी वजह से वहां के घरेलू बच्चों को कम फीस में ऊंची और अच्छी पढ़ाई मिल पाती है। भारत में तो अगर विदेशी सैलानियों से कमाई न रहे, तो ताजमहल तक का रखरखाव ठीक से न हो पाए, और घरेलू सैलानी वहां की गंदगी देखकर जाना बंद कर दें। इसलिए हर विदेशी सैलानी हमलावर नहीं होते, वे यहां धर्मप्रचार के लिए, या देश पर कब्जा करने के लिए नहीं आते, वे यहां की अर्थव्यवस्था में कुछ न कुछ जोडक़र ही जाते हैं।
पर्यटन, और चिकित्सा-पर्यटन की मिलीजुली संभावनाएं इन दोनों क्षेत्रों की अलग-अलग संभावनाओं के मुकाबले खासी अधिक हो सकती हैं। राज्यों को कल्पनाशील होकर बाजार व्यवस्था के साथ तालमेल बनाकर इस तरफ बढऩा चाहिए, इससे राज्य को जो कमाई होगी, उससे भी गरीब मरीजों के लिए कुछ किया जा सकेगा, और विश्वस्तरीय निजी चिकित्सा का खर्च उठाने लायक भी कई भारतीय मरीज भी रहते हैं, उनको भी इस देश के पर्यटन केन्द्रों के आसपास बेहतर इलाज मिल सकेगा। हर महंगी चीज जनविरोधी नहीं होती, बहुत सी महंगी चीजों से मिलने वाले टैक्स से ही तो गरीबों का भला हो पाता है।
बिना ईमानदार अमल के पुराने कानून खारिज करके नए बनाने से क्या हासिल?
21 मार्च 2026
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने अभी दो नए विधेयक पास किए हैं, और राज्यपाल से इन पर मंजूरी मिल जाने पर वे कानून बन जाएंगे। भारत में जैसी राजनीतिक परंपरा है, उसके मुताबिक यह बात साफ है कि जिस पार्टी की राज्य सरकार रहती है, केन्द्र से अगर उसी पार्टी की सरकार ने राज्यपाल नियुक्त किए हैं, तो वे उस सरकार के भेजे विधेयकों पर अड़ंगा नहीं लगाते। छत्तीसगढ़ में एक कानून धार्मिक स्वतंत्रता का है जिसमें धर्मांतरण करवाने वाले लोगों पर पहले के मुकाबले कई गुना अधिक कड़ी कार्रवाई का इंतजाम है। पहले भी लालच देकर, दबाव डालकर, या प्रताडि़त करके, धोखा देकर धर्मांतरण करवाने पर सजा का इंतजाम था, अब उस सजा को इस नए विधेयक में बहुत बढ़ा दिया गया है। यह एक अलग बात है कि देश के अलग-अलग कई राज्यों के इसी तरह के धार्मिक स्वतंत्रता, या धर्मांतरण विधेयकों, या कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, और उन पर एक साथ सुनवाई चल रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा ने जो दूसरा विधेयक पास किया है, वह किसी भी तरह के इम्तिहान में पर्चे आउट करने वाले लोगों को बड़ी लंबी और कड़ी सजा देने का है। इसमें नकल करने वाले लोगों को भी कई बरस के लिए अपात्र कर दिया जाएगा, और साजिश के तहत पेपर लीक करने वालों को उम्रकैद तक की सजा, एक करोड़ तक का जुर्माना नए कानून में रहेगा, और उनकी सम्पत्ति जब्त करके उससे भी जुर्माना वसूल किया जाएगा। दोनों ही कानून बहुत कड़े हैं, और दोनों में ही उम्रकैद जैसे प्रावधान रखे गए हैं, जो कि आमतौर पर सामूहिक बलात्कार, या कत्ल जैसे हिंसक अपराधों में ही रहते आए हैं।
देश की सरकार को, या हर प्रदेश को अपनी विचारधारा के मुताबिक कानून बनाने का हक है, और उसके लिए संसद या विधानसभाओं में जितने बहुमत की जरूरत रहती है, वह अगर सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी को हासिल है, तो फिर सदन में असहमति कोई मायने नहीं रखती। संसदीय व्यवस्था, और परंपरा यही है कि बिना किसी बहस के ध्वनिमत से भी विधेयक पास हो जाते हैं, और विपक्ष अपनी असहमति को दर्ज कराने के लिए मतदान में हारने के बजाय कई बार सदन छोडक़र भी चले जाता है। लेकिन जहां कहीं भी कोई नया कानून बनता है, वहां एक लोकतांत्रिक परंपरा शुरू करने की जरूरत है। चूंकि सदनों में चर्चा का माहौल घटते चल रहा है, बहुत से मुद्दों पर विपक्ष को सदनों में बोलने की इजाजत ही नहीं मिलती, इसलिए इसे सरकार की जिम्मेदारी बनाना चाहिए कि वह सदन के अलावा सडक़ के लोगों को भी अपनी बात समझाने के लिए सरल शब्दों में यह बताए कि इस नए कानून की जरूरत क्या है। लोगों की राजनीतिक चेतना के लिए यह जरूरी है कि जटिल कानूनों की सरल व्याख्या उनके सामने रखी जाए। वैसे तो सरकारें यह कह सकती हैं कि वे विधेयकों को पेश करने के पहले उन पर जनता की राय जानने के लिए वेबसाइट पर लोगों से रायशुमारी करती हैं, लेकिन आम जनता वेबसाइट पर भी जटिल बातों को न पढ़ पाती है, न उन पर प्रतिक्रिया दे पाती है। इसलिए सरकारों को चाहिए कि वे अपने विधेयकों को एक सामाजिक ऑडिट के लिए जनता के सामने भी पेश करें। अब सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र में जनता के सामने कुछ पेश करने का एक माध्यम मीडिया होता है, लेकिन अगर उसके लोग अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हुए तल्ख सवाल न करें, और महज डिक्टेशन लेकर, बयान रिकॉर्ड करके लौट जाएं, तो जनता के लिए जरूरी उसका लोकतांत्रिक हक किनारे धरा रह जाता है।
सामाजिक ऑडिट से हमारा एक मतलब यह भी है कि सरकारों को यह साफ करना चाहिए कि मौजूदा कानूनों में कौन सी कमी थी जिसकी वजह से नए कानून की जरूरत आन पड़ी है। क्या जांच की कमी, सुबूत दर्ज करने की कमजोरी, बेअसर हद तक धीमी हो चुकी अदालतें कानूनों के बेअसर होने के लिए जिम्मेदार हैं, या कि इन सब पहलुओं के मजबूत कर देने के बाद भी मुजरिम छूट जा रहे हैं, उन्हें सजा का खौफ नहीं रह गया है? आमतौर पर हमारा तजुर्बा यह है कि सरकारें मौजूदा कानूनों का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पातीं, जांच में कमी रहती है, सुबूत ठीक से दर्ज नहीं होते हैं, गवाही समय पर और सही तरीके से नहीं हो पाती, अदालत में सरकारी वकील कमजोर पड़ जाते हैं, और हर स्तर पर कुछ बाहरी वजहें भी असर डालने लगती हैं, जिनसे मुजरिमों को सजा नहीं हो पाती। अब अगर मौजूदा कानून, और उनकी जगह आने जा रहे अधिक कड़े कानून दोनों पर अमल की तुलना करें, तो अगर अमल ही कमजोर है, तो नया अधिक कड़ा कानून भला किस काम आएगा? अभी एक-दो दिन पहले ही दो नौजवानों को देश के एक सबसे कड़े और खतरनाक कानून यूएपीए से अदालत ने शायद सात बरस बाद रिहा कर दिया कि उनके खिलाफ जांच एजेंसियों के पास पर्याप्त सुबूत नहीं थे। अब जिस एक सबसे बड़े कानून के तहत पांच-पांच बरस तक तो जमानत नहीं होती, उस कानून की जगह अगर और कड़ा कानून भी लागू कर दिया जाए, और उसके तहत दस-दस बरस तक जमानत न हो, और सुबूतों के अभाव में अदालत से लोग छूट जाएं, तो ऐसे अधिक कड़े कानून किस काम के रहेंगे? सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि क्या सरकारें मौजूदा कानूनों का पूरी हद तक इस्तेमाल करने के बाद भी, पूरी बारीकी बरतने के बाद भी असफल हो रही हैं? अगर ऐसा है तब तो नए अधिक कड़े कानून की जरूरत है, वरना ऐसे कानून जनता को संतुष्ट करने के लिए अधिक बनते हैं कि सरकार किसी मामले में कितनी गंभीर है।
आज हेलमेट न लगाने पर दुपहिया चालकों पर अगर पांच सौ रूपए का जुर्माना है, और किसी का भी चालान नहीं हो रहा है, तो क्या हजार रूपए जुर्माना करने से लोग हेलमेट लगाने लगेंगे? जब चालान ही नहीं होते हैं, तो महज जुर्माना बढ़ाते चलने से कानून पर अमल नहीं बढ़ जाता। सरकारों को जनता के सामने यह खुलासा करना चाहिए कि नए अधिक कड़े कानूनों की जरूरत क्यों आ पड़ी हैं? संसदीय व्यवस्था में बहुमत से कानून बनाने का हक सरकार को है, और हम किसी एक कानून के गुण-दोष पर यहां बात नहीं कर रहे, हमारा सिर्फ यही कहना है कि एक कानून का सही और जायज इस्तेमाल किए बिना दूसरा नया कानून बना लेने से कुछ नहीं होता। और यह बात हम सिर्फ छत्तीसगढ़ के संदर्भ में नहीं कह रहे हैं, हम लंबे समय से देश-प्रदेश के ऐसे कानूनों को लेकर यही सैद्धांतिक बात करते आए हैं कि सरकारों को कानूनों पर अमल की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी की कमी को छुपाने के लिए नए कानूनों का सहारा नहीं लेना चाहिए, इससे कुछ समय के लिए तो लोगों को लग सकता है कि सरकार कुछ कर रही है, लेकिन ये कानून जिन मकसद को बताते हुए बनाए जाते हैं, वे मकसद पूरे नहीं होते।





