दीवारों पर लिक्खा है, 18 अक्टूबर


 

खुद तो जाने किस कमाई की बड़ी-बड़ी गाड़ी में चलते हैं, लोगों को हेलमेट विरोध सिखाते हैं

 

  18 अक्टूबर 2021


छत्तीसगढ़ में एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब सडक़ों पर दुपहियों के एक्सीडेंट में किसी की मौत ना होती हो। और ऐसा करीब-करीब बाहर राज्य में होता होगा, बहुत छोटे राज्यों में शायद हर दिन मौत न होती हो, लेकिन देश के छत्तीसगढ़ जितने बड़े किसी भी राज्य में रोजाना सडक़ों पर कई मौतें होती हैं, और यहां इस राज्य में तो लगातार दुपहियों पर मौत दिखती है। पुलिस की जानकारी बतलाती है कि इनमें से शायद ही कोई हेलमेट पहने रहते हैं, और किसी भी हादसे में सिर पर लगने वाली चोट के बाद बचने की गुंजाइश कम रहती है, जो कि हेलमेट से बच सकती थी। देशभर में सडक़ों के लिए यह नियम तो लागू है कि बिना हेलमेट लोगों पर जुर्माना लगाया जाए, दुपहिया पर तीन लोग दिखें तो जुर्माना लगाया जाए, या कारों और बड़ी गाडिय़ों में लोग बिना सीट बेल्ट दिखें तो जुर्माना लगाया जाए, या किसी भी तरह की गाड़ी चलाते हुए लोग अगर मोबाइल फोन पर बात कर रहे हैं तो उन पर जुर्माना लगाया जाए, लेकिन ऐसा होता नहीं है। छत्तीसगढ़ की राजधानी में बैठकर हम देखते हैं जहां पर पुलिस की कोई कमी भी नहीं है वहां पर भी चौराहों पर से इन तमाम नियमों को तोड़ते हुए लोग निकलते हैं, लेकिन उनका चालान होते नहीं दिखता। नतीजा यह होता है कि बड़ों को देखकर बच्चे भी कम उम्र से ही इन तमाम नियमों को तोडऩा सीख जाते हैं, और उनके मिजाज में नियमों का सम्मान करना कभी आ भी नहीं पाता।

दिक्कत यह है कि जो लोग ऐसे नियम तोड़ते हैं वे न सिर्फ खुद खतरे में पड़ते हैं बल्कि सडक़ों पर दूसरे तमाम लोगों को भी बड़े खतरे में डालते हैं। कुछ लोगों की लापरवाही का दाम दूसरे लोग अपनी जिंदगी देकर चुकाते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार की वजह से या लापरवाही की वजह से, या ताकतवर लोगों से किसी टकराव से बचने के लिए, जब कभी पुलिस सडक़ों पर अपनी जिम्मेदारी से मुकरती है, वह बहुत सी जिंदगियों को खतरे में डालती है। इसी छत्तीसगढ़ में आज से 20-25 बरस पहले हमने एक जिले के एसपी को कड़ाई से हेलमेट लागू करवाते देखा था, और उस पूरे जिले में कोई दुपहिया बिना हेलमेट नहीं दिखता था। अगर लोगों पर हजार-पांच सौ रुपये जुर्माना होने लगे तो तुरंत ही सारे लोग नियमों को मानने लगेंगे। लगातार जुर्माना करके नियम लागू करवाने में पुलिस का कुछ भी नहीं जाता, लेकिन जैसे-जैसे सत्तारूढ़ दल, दूसरी राजनीतिक पार्टियां, मीडिया के लोग अपनी ताकत का इस्तेमाल करके ट्रैफिक पुलिस की कार्यवाही को रोकते हैं, वैसे-वैसे पुलिस का हौसला पस्त होते जाता है, और सडक़ों पर तमाम लोगों के लिए खतरा बढ़ जाता है।

हिंदुस्तान में कई ऐसे प्रदेश हैं जहां कई शहरों में हेलमेट लागू है और 100 फ़ीसदी लोग उसका इस्तेमाल करते हैं या फिर जुर्माना पटाते हैं। इन शहरों में बिना हेलमेट लोग 2-4 चौराहे भी पार नहीं कर पाते। हेलमेट जैसे नियम को लागू करना सत्तारूढ़ लोगों के लिए चुनाव के ठीक पहले तो एक परेशानी की वजह हो सकती है क्योंकि जिन लोगों की जिंदगी बचाने के लिए यह किया जा रहा है, वैसे वोटर भी इस बात को लेकर तात्कालिक रूप से नाराज हो सकते हैं, और अगर चुनाव कुछ महीनों के भीतर हों, तो उसमें सत्तारूढ़ पार्टी को इस नियम को लागू करवाने का नुकसान हो सकता है। लेकिन जब कोई चुनाव सामने नहीं रहता, वह वक्त किसी भी सरकार के लिए या स्थानीय संस्थाओं के लिए नियमों को कड़ाई से लागू करवाने का मौका रहता है, जिससे नियम भी लागू हो जाए और वोटरों की नाराजगी चुनाव तक शांत भी हो जाए. लोगों को यह समझ भी आ जाए कि हेलमेट सरकार की जिंदगी बचाने के लिए नहीं है, दुपहिया चलाने वालों की जिंदगी बचाने के लिए है। हमने इस अखबार में वर्षों तक हेलमेट की जरूरत को लेकर जन जागरण अभियान चलाया। लेकिन जब सरकार की नीयत ही इसे लागू करने की नहीं रहती, तो कोई अखबार इसमें क्या कर ले।

छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश की हालत यह है कि जब भाजपा में सरकार रहती है तो विपक्षी कांग्रेस पार्टी सरकार के फैसले को ‘हेलमेट के दलाल का फैसला’ करार देती है। और जब कांग्रेस सत्ता में आती है तो विपक्षी भाजपा हेलमेट के खिलाफ हो जाती है। राजनीति इतनी सस्ती और घटिया हो चुकी है कि नेता लोगों की जिंदगी की कीमत पर उन्हें जागरूकता से दूर रखना चाहते हैं, गैर जिम्मेदारी सिखाते हैं, और उनकी जिंदगी खतरे में डालते हैं। जो नेता हेलमेट के खिलाफ सडक़ों पर आते हैं वे खुद तो जाने कहां से की गई कमाई से खरीदी गई बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में चलते हैं खुद महफूज रहते हैं, और दुपहिया वालों की जिंदगी खतरे में डालकर अपनी नेतागिरी चलाते हैं। हम ऐसी किसी भी सरकार को गैर जिम्मेदार मानते हैं जो लोगों की जिंदगी बचाने की पूरी-पूरी संभावना रखने वाले नियमों को लागू करने की अपनी जिम्मेदारी से कतराती हैं, और लोगों को गैर जिम्मेदार बनाती हैं। छत्तीसगढ़ में अभी अगला चुनाव 2 बरस बाद है । अगर सरकार अभी से ट्रैफिक नियम कड़ाई से लागू करे तो अगले चुनाव तक लोगों का गैरजिम्मेदारी छोडऩे का दर्द जाता रहेगा, और वे हेलमेट लगाना सीख जाएंगे, सीट बेल्ट लगाना सीख जाएंगे, मोबाइल पर बात करते हुए गाड़ी चलाना छोड़ देंगे। लेकिन इसके लिए सरकार में जिम्मेदारी की जरूरत है। देश में नियम-कानून पर्याप्त बने हुए हैं, और उनका इस्तेमाल करना सरकार की एक बुनियादी जिम्मेदारी है।

 

मेरे बदन के कैंसर सेल पर किसका हक?

 17 अक्टूबर  2021


विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अभी एक ऐसी अफ्रीकी अमेरिकी महिला का सम्मान किया है जो 1951 में 31 बरस की उम्र में गुजर चुकी थी। उसे कैंसर था, और डॉक्टरों ने उसकी या उसके परिवार की इजाजत के बिना उसके कैंसर के कुछ सेल निकाल लिए थे। आज से करीब पौन सदी पहले लोगों के अधिकारों की इतनी खुलासे से बात नहीं होती थी, और डॉक्टरों ने उसके कैंसरग्रस्त सेल जब निकाल लिए, तो यह उस वक्त कोई मुद्दा नहीं बना। लेकिन अब जाकर हेनरिटा लैक्स नाम की इस महिला की स्मृति का सम्मान क्यों किया गया इसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है।

इन कैंसरग्रस्त सेल को इस महिला के बदन के बाहर प्रयोगशाला में बढ़ाया गया और उन्हें कई गुना किया गया। बाद में दुनिया भर की अलग-अलग प्रयोगशालाओं ने, दवा कंपनियों ने इन सेल्स का इस्तेमाल पोलियो का टीका विकसित करने में किया, जींस का नक्शा बनाने में किया, और कृत्रिम गर्भाधान तकनीक में किया। इस महिला के कैंसरग्रस्त सेल का इतना व्यापक और महत्वपूर्ण इस्तेमाल हुआ कि आज इसे ‘आधुनिक चिकित्सा की मां’ नाम दिया गया।

इस महिला के कैंसरग्रस्त सेल का इस्तेमाल एचआईवी-एड्स की दवाइयां विकसित करने में भी किया गया और अभी कोरोना का इलाज ढूंढने में भी इनका इस्तेमाल हो रहा है। दरअसल इस महिला के सेल ऐसे पहले मानवीय सेल थे जिन्हें शरीर के बाहर क्लोन करके बढ़ाया गया। इसके पहले जितने कैंसर मरीजों के कैंसर सेल अस्पतालों में लिए जाते थे ताकि उन पर कोई शोध हो सके, तो वे तमाम नमूने 24 घंटे के भीतर दम तोड़ देते थे। लेकिन हेनरिटा लैक्स के सेल्स करिश्माई तरीके से जिंदा रहे और हर 24 घंटे में वे 2 गुना होते चले गए, इस तरह वे मानव शरीर के बाहर बढऩे वाले पहले कैंसर सेल थे, और इसलिए रिसर्च में उसका भारी इस्तेमाल हो सका। डब्ल्यूएचओ का हिसाब-किताब बताता है की हेनरिटा लैक्स के सेल अब तक 75000 से ज्यादा स्टडी में इस्तेमाल किए जा चुके हैं।

अभी इस महिला का सम्मान करते हुए स्विट्जरलैंड में डब्ल्यूएचओ के डायरेक्टर जनरल ने कहा कि उसके बदन के सेल का खूब दोहन हुआ, और वह अश्वेत या काली महिलाओं में से एक थी जिनके शरीर का विज्ञान ने बहुत बेजा इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि इस महिला ने अपने आपको चिकित्सा विज्ञान के हवाले किया था ताकि वह इलाज पा सके, लेकिन चिकित्सा व्यवस्था ने उसके बदन के एक हिस्से को उसकी जानकारी और उसकी इजाजत के बिना लेकर उसका तरह-तरह से इस्तेमाल किया। चिकित्सा विज्ञान की खबरें बताती हैं कि इस महिला के नाम पर रखे गए इन कैंसर सेल, ‘हेलो’, का उपयोग उस सर्वाइकल कैंसर के इलाज में भी हुआ, जिस सर्वाइकल कैंसर की शिकार वह महिला थी।

अभी जब इस महिला के वंशजों का सम्मान हुआ, उसके 87 बरस के बेटे सहित कुनबे के कई लोग मौजूद थे, तो दुनिया के कुछ लोगों ने यह भी कहा कि उसके परिवार को इसका मुआवजा मिलना चाहिए क्योंकि दवा कंपनियों ने उसके कैंसर सेल का इस्तेमाल करके टीके या दवाइयां बनाए, उनका खूब बाजारू इस्तेमाल हुआ। कुछ दूसरे लोगों का कहना था कि ऐसे बनाई गई सारी दवाइयों और सारे टीकों को बिना किसी मुनाफे के मानव जाति के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।

अभी कुछ हफ्ते पहले इस परिवार ने ऐसी एक कंपनी के खिलाफ एक मुकदमा किया है जिसने हेनरिटा लैक्स के कैंसर ग्रस्त सेल से दवा बनाकर अरबों रुपए कमाए हैं। परिवार का कहना है कि कंपनी इसे अपना बौद्धिक पूंजी अधिकार करार दे रही है। परिवार के वकील ने अदालत में यह मुद्दा उठाया कि किसी के शरीर का कोई हिस्सा कैसे उसकी इजाजत के बिना किसी दवा कंपनी की संपत्ति हो सकता है और इस महिला के सेल से विकसित की गई दवाइयों की कमाई का पूरा हिस्सा इस परिवार को दिया जाना चाहिए।

पश्चिमी दुनिया में चल रहे इस सिलसिले को देखें, तो लगता है कि हिंदुस्तान जैसे देश ऐसी भाषा से किस तरह पूरी तरह छूते हैं। यहां पर महिलाओं को जानवरों की तरह एक हॉल में लिटाकर उनकी नसबंदी कर दी जाती है, उनमें से कितनी जिंदा बचती हैं, और कितनी नहीं, इसकी कोई फिक्र नहीं होती। यहां इलाज के बीमे की रकम हासिल करने के लिए छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में गांव के गांव की जवान सारी महिलाओं को लाकर उनका गर्भाशय निकाल दिया जाता है, ताकि अस्पताल का बिल बन सके, और बीमा कंपनी से उसे वसूल किया जा सके। यहां कोई पूछने वाले भी नहीं रहते कि उस महिला को ऐसे ऑपरेशन की जरूरत थी या नहीं। किसी के बदन की कोई कीमत हो सकती है, उस पर उसका कोई हक हो सकता है, ऐसे तमाम मुद्दों से हिंदुस्तान मोटे तौर पर बेफिक्र रहता है। यहां बुनियादी इलाज के लिए आज भी सरकारी अस्पताल जाने वाले लोग उसे डॉक्टर और नर्सों का एक एहसान मानते हैं, फिर चाहे वह सरकारी अस्पताल ही क्यों ना हो। लोगों के नागरिक अधिकार इस कदर कुचले हुए हैं कि उनका हौसला ही नहीं होता कि वे कहीं अपने हक की बात गिना सकें। इसलिए हिंदुस्तान में किसी के शरीर के सेल अगर लिए भी जाते होंगे, तो शायद ही उसे इस बारे में कुछ बताया जाता होगा। और यह सिलसिला पश्चिम के पौन सदी पहले के इस सिलसिले जैसा आज भी यहां चल रहा होगा।

 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अक्टूबर 2021


 

भारत में धर्म की अराजकता का अंतहीन हिंसक मुकाबला जारी

 

  17 अक्टूबर 2021


उत्तर प्रदेश के सोनभद्र की खबर है कि वहां ट्रैफिक जाम की वजह से एक एंबुलेंस उसमें फंसी रही उसमें एक गर्भवती महिला दर्द से छटपटाते रही। अस्पताल जाने का कोई रास्ता नहीं मिला, और एंबुलेंस में ही उस महिला और उसके गर्भस्थ बच्चे की मौत हो गई। यह बताया जा रहा है कि इस इलाके में अक्सर ऐसा ट्रैफिक जाम रहता है। दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के रायपुर का एक वीडियो किसी ने व्हाट्सएप पर भेजा था कि राजधानी में दुर्गा विसर्जन के जुलूस में किस तरह एक एंबुलेंस फंसी हुई थी, और वह अपना सायरन बजाते खड़ी थी किसी को उसे जगह देने की फुर्सत नहीं थी। छत्तीसगढ़ में ही जशपुर जिले में एक जगह दुर्गा विसर्जन के जुलूस पर गांजा तस्करों ने गाड़ी चढ़ा दी और एक मौत हुई, बहुत से जख्मी हुए। इसके बाद मानो यह काफी नहीं था, तो मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में दुर्गा विसर्जन के जुलूस में किसी ने कार चढ़ा दी और कई लोग घायल हो गए। हालांकि जिस बात से हमने यह चर्चा शुरू की है सोनभद्र का वह ट्रैफिक जाम किसी धार्मिक वजह से नहीं था, लेकिन हिंदुस्तान में आमतौर पर ट्रैफिक जाम की एक बड़ी वजह धार्मिक आयोजन रहते हैं। तरह-तरह के जुलूस निकलते हैं, और सडक़ों पर बेकाबू धार्मिक कब्जा हो जाता है, जिसे रोकने की ताकत पुलिस में भी नहीं रहती। इसके अलावा भी दूसरे किस्म की दिक्कतें लोगों को होती हैं और लाउडस्पीकरों के शोरगुल से लोगों का जीना हराम होते रहता है, लेकिन हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के आदेश थानों में धूल खाते पड़े रहते हैं, जिलों के अफसरों के लिए जब तक कोई निजी अवमानना नोटिस अदालत से ना आ जाए तब तक उनकी सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि धार्मिक गुंडागर्दी कितनी बढ़ रही है। और यह बात महज किसी एक धर्म की नहीं है, तकरीबन सभी धर्मों का यही हाल है, और हिंदुस्तान में तो स्थानीय शासन या राज्य शासन की लापरवाही और ढीलेपन के चलते हुए सरकारी या सार्वजनिक जमीन पर अवैध कब्जे, हर किस्म के अवैध निर्माण, और नियमों के खिलाफ शोरगुल, नियमों के खिलाफ ट्रैफिक जाम, यह इतनी आम बात हो गई है कि एक धर्म की अराजकता को देखकर दूसरे धर्म के लोग हौसला पाते हैं, और जब तक वह भी इससे अधिक ऊंचे दर्जे की अराजकता खड़ी ना कर दें वे मानो हीनभावना के शिकार रहते हैं।

यह सिलसिला बढ़ते ही चल रहा है, या कम होते नहीं दिखता। किसी भी धर्म स्थल को सडक़ तक कब्जा करते देखा जा सकता है, और वहां आने वाले लोगों के लिए कोई जगह न छोडक़र सब कुछ सडक़ों पर किया जाता है। धर्म स्थलों के अवैध कब्जे और अवैध निर्माण पूरी-पूरी रात जागकर होते हैं, और ऐसी साजिश के साथ होते हैं कि जिन दिनों पर अदालतें बंद हैं, सरकारी दफ्तर बंद है, उन्हीं दिनों पर इन्हें किया जाए ताकि कोई रोकने वाले लोग न रहे। सरकारें चलाने वाले राजनीतिक दल वोटरों के किसी भी तबके को नाराज करने से इस कदर डरे-सहमे रहते हैं कि धर्म या जाति के आधार पर बने हुए संगठनों की किसी भी किस्म की अराजकता पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती है। नतीजा यह होता है कि धर्म से जुड़े हुए लोग अब तक की जा चुकी अराजकता से आगे बढक़र और अधिक अराजकता की तरफ आगे बढ़ते रहते हैं। हिंदुस्तान की अदालतों के, और खासी बड़ी-बड़ी अदालतों के बड़े-बड़े जज जिस तरह से खुलेआम अपनी धार्मिक आस्था का प्रदर्शन करते हैं, उसके चलते भी लोगों को यह लगता है कि वे भी अपनी धार्मिक आस्था के प्रदर्शन को किसी भी दूसरे धर्म के मुकाबले अधिक बढ़-चढक़र दिखा सकते हैं, और इसके लिए जब तक सडक़ें बंद ना हो जाएं, जब तक शोरगुल से लोगों के कान न फट जाएं, तब तक धर्मांध लोगों को चैन नहीं पड़ता।

अब सवाल यह उठता है कि जब धर्मों के बीच आपसी मुकाबला बढ़ रहा है और यह मुकाबला किसी रहमदिली के लिए नहीं, अराजकता के लिए बढ़ रहा है, गलत कामों के लिए बढ़ रहा है, सडक़ों पर लोगों का जीना हराम करने के लिए बढ़ रहा है, उस वक्त जो लोग अमन-चैन से जीना चाहते हैं, जो लोग धर्म को निजी आस्था का बनाए रखना चाहते हैं, वे लोग क्या करें ? क्या उनको बचाने के लिए कोई है? कोई अदालत, कोई कानून, कोई सरकार कोई है? अभी तक का हमारा जो देखा हुआ है वह यही कहता है कि धर्म की अराजकता को कोई रोकना नहीं चाहते हैं, बल्कि लोग उसे बढ़ाते चले जाना चाहते हैं। राजनीति में धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने से लोगों को वोटों की शक्ल में फायदा होता है क्योंकि नफरत और हिंसा लोगों को आपस में तुरंत बांध लेते हैं, तुरंत जोड़ लेते हैं, और राजनीति ऐसा ही फेविकोल के समान मजबूत जोड़ चाहती है ताकि वोटरों को आपस में बांधा जा सके, उन्हें दूसरे धर्म का नाम लेकर डराया जा सके, अपने धर्म की रक्षा की जरूरत बताई जा सके, और यह साबित किया जा सके कि जिस नेता के नाम पर उनसे वोट मांगा जा रहा है वही एक नेता उनके धर्म को बचा सकता है। यह सिलसिला इस देश में बढ़ते चल रहा है और हर चुनाव धर्मांधता को सांप्रदायिकता को कट्टरता को कुछ और आगे तक बढ़ा देता है। ऐसे में सडक़ों पर बेकसूर लोग तकलीफ पाते रहेंगे, और पुलिस इस पूरी अराजकता को अनदेखा करने के लिए बेबस रहेगी क्योंकि उसे वैसा ही कहा गया है।

 

दुनिया के कोने-कोने में धर्म के लोकतंत्र पर जानलेवा हमले...

 

  16 अक्टूबर 2021

पिछले दो-तीन दिनों में दुनिया के अलग-अलग देशों में जो वारदातें हुई हैं, उन्हें अगर देखें, तो धर्म और लोकतंत्र को लेकर एक बुनियादी टकराव खड़ा होते दिखता है। यूरोप के नार्वे में दो दिन पहले तीर-धनुष लेकर एक मुस्लिम नौजवान ने 5 लोगों को मार डाला। पुलिस का मानना है कि इस हमलावर ने इस्लाम अपनाया था, और ऐसा लग रहा है कि वह कट्टरपंथ के असर में था। पुलिस इसे एक आतंकी हमला मान रही है। दूसरी तरफ कल की ताजा खबर यह है कि ब्रिटेन में वहां के एक कंजरवेटिव सांसद सर डेविड अमेस को एक नौजवान ने चाकू के कई वार करके मार डाला। वे अपने चुनाव क्षेत्र के एक चर्च में आम लोगों से मुलाकात कर रहे थे, और यह गिरफ्तार किया गया नौजवान 25 साल का ब्रिटिश नागरिक बताया जाता है, जो कि सोमालिया से वहां आकर बसा था, और पुलिस का कहना है कि यह इस्लामिक अतिवाद से जुड़ा हुआ हो सकता है। एक तीसरी वारदात हिंदुस्तान में दिल्ली-हरियाणा के सिंघु बॉर्डर पर हुई है, जहां एक दलित नौजवान को सिक्ख निहंगों ने तलवार से काटकर उसके शरीर के हिस्से, और उसके धड़ को टांग दिया और सार्वजनिक जगह पर उसकी नुमाइश की। इस हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए निहंगों ने यह कहा कि उसने एक धार्मिक ग्रंथ का अपमान किया था और इसकी सजा देने के लिए हत्यारे निहंग का बाकी निहंगों ने सम्मान करते हुए पुलिस के सामने समर्पण के लिए भेजा। यह ग्रंथ सिखों के सबसे पवित्र माने जाने वाले गुरु ग्रंथ साहिब से अलग एक ग्रंथ है जिसके कुछ हिस्सों को सिख मानते हैं, और कुछ हिस्सों को वे नहीं मानते। फिर मानो यह मामला काफी न हो, हाल के चार-छह दिनों में ही बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान हिंसक मुस्लिम भीड़ ने इस्कॉन मंदिर और दुर्गा पूजा पंडालों पर हमला किया, कई प्रतिमाओं को तोड़ा, और कई हिंदुओं को मार डाला। अभी तक वहां आधा दर्जन हिंदू मारे जा चुके हैं।

इस पूरे सिलसिले को देखें तो दुनिया भर में अलग-अलग जगहों पर धर्म से जुड़े हुए लोग तरह तरह से लोगों की हत्या कर रहे हैं। खासकर दिल्ली-हरियाणा सीमा पर निहंगों ने जिस तरह एक दलित के टुकड़े-टुकड़े करके टांगे हैं, उसकी तो कोई मिसाल भी हिंदुस्तान में याद नहीं पड़ती है। और इस बात पर बाकी निहंगों को फख्र है. क्योंकि यह क़त्ल किसान आंदोलन के पास हुआ है, इसलिए बदनामी आज किसानों पर भी आ रही है। इनसे परे अभी-अभी अफगानिस्तान में काबिज हुए तालिबान के राज को देखें तो वहां पर इस्लामी आतंकी संगठन आई एस के हमले जारी हैं, और वह शिया मुस्लिमों की मस्जिदों पर, उनके जनाजे पर लगातार हमले कर रहे हैं, और एक-एक हमले में दर्जनों लोगों को मार रहे हैं। अफगानिस्तान के यह सारे के सारे लोग एक ही खुदा को मानने वाले लोग हैं, उनके रिवाजों और तौर-तरीकों में थोड़ा सा फर्क है, लेकिन सभी मुसलमान हैं, और एक-दूसरे को इतनी बड़ी संख्या में बिना किसी उकसावे के, बिना किसी वजह के, आतंक से मार रहे हैं।

अफगानिस्तान तो अभी किसी लोकतंत्र से कोसों दूर है, लेकिन जो लोग ब्रिटेन या नार्वे या हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र में जीते हुए यहां की सारी लोकतांत्रिक सहूलियतों का मजा लेते हैं, सारे अधिकार पाते हैं, वे भी धर्म की बारी आने पर किसी भी किस्म की हिंसा करने पर उतारू हो जाते हैं। एक दूसरी घटना अभी कुछ ही दिन पहले न्यूजीलैंड में सामने आई थी जहां पर श्रीलंका से गए हुए एक मुस्लिम छात्र ने चाकू से हमला करके आधा दर्जन लोगों को घायल कर दिया था। सितंबर के पहले हफ्ते में हुई इस वारदात में न्यूजीलैंड गया हुआ यह छात्र 2011 से वहां पढ़ रहा था, लेकिन उसकी शिनाख्त चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के समर्थक की थी। इसने जब कई लोगों को चाकू के हमले से घायल कर दिया, तो पुलिस ने मौके पर ही उसे मार डाला।


अब सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र में जहां सभी देशों से आए हुए, या सभी धर्मों के लोगों को बराबरी से मौका मिलता है, वहां पर अगर कुछ धर्मों के लोग लगातार हिंसा करते हैं, तो उससे सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं के धर्मों के बाकी लोगों को होता है जो शक के घेरे में आ जाते हैं, और जिनकी विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। हिंदुस्तान में भी जब पंजाब में आतंकवाद फैला हुआ था और भिंडरावाले के आतंकी स्वर्ण मंदिर से बाहर निकल लगातार आतंकी वारदातें करते थे छंाट-छांटकर गैरसिक्खों को मारते थे, तब भी पूरे हिंदुस्तान में सिखों के खिलाफ एक सामाजिक तनाव बना हुआ था। आज भी जब पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों पर हमले होते हैं, तो हिंदुस्तान में हिंदुओं की एक नाराजगी मुस्लिमों के खिलाफ होती है। ठीक वैसी ही नाराजगी आज बांग्लादेश को लेकर हिंदुस्तान में है। और ठीक ऐसी ही नाराजगी यूरोप के देशों में या न्यूजीलैंड में मुस्लिम समुदाय के लोगों को लेकर खड़ी हुई है, या दूसरे देशों से वहां आए हुए शरणार्थियों को लेकर स्थानीय लोगों के भीतर एक तनाव खड़ा हुआ है।

दुनिया का इतिहास इस बात को बताता है कि धार्मिक कट्टरता और लोकतंत्र का कोई सहअस्तित्व नहीं है। वे एक साथ नहीं चल सकते। लोग जब धर्म को लेकर कट्टर हो जाते हैं तो उनके लिए किसी देश का संविधान, या वहां की शासन व्यवस्था जरा भी मायने नहीं रखते। यह हिंदुस्तान में बहुत से धर्मों को लेकर बहुत से मामलों में सामने आ चुकी बात है, और पूरी दुनिया ऐसी धर्मांधता को भुगतते रहती है। दुनिया के जिस-जिस लोकतंत्र में राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा दे रहे हैं उन्हें यह बात समझ लेना चाहिए कि आज तो धार्मिक आतंकी लोग दूसरे धर्म के लोगों पर हमला कर रहे हैं, कल वे अफगानिस्तान की तरह अपने धर्म के ही दूसरी पद्धति से पूजा करने वाले लोगों पर हमला करेंगे और अधिक समय नहीं लगेगा जब वह लोकतंत्र पर हमला करने लगेंगे, और अपनी धार्मिक मान्यताओं को लोकतंत्र और संविधान से बहुत ऊपर मानने लगेंगे। लोगों को याद होगा हिंदुस्तान में बहुत बरस तक चले राम मंदिर आंदोलन का नारा ही यही था कि मंदिर वहीं बनाएंगे। अब जो मामला अदालत में चल रहा था वहां अदालत का फैसला आने के दशकों पहले से अगर लोग मंदिर वही बनाने को लेकर एक उग्र और हिंसक आंदोलन चला रहे थे और भीड़ की शक्ल में जाकर उन्होंने बाबरी मस्जिद को गिरा दिया था, तो यह समझने की जरूरत है कि धर्मांध और कट्टर भीड़ किसी कानून को नहीं मानती। दुनिया के अलग-अलग देशों की इन वारदातों को लेकर लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या वे लोकतंत्र खत्म करने की कीमत पर भी अपने धर्म को हिंसक और हमलावर बनाना चाहते हैं?

दीवारों पर लिक्खा है, 14 अक्टूबर 2021


 

उत्तर प्रदेश में प्रियंका गाँधी की कामयाबी असल में भाजपा की कामयाबी रहने जा रही है?

 

  14 अक्टूबर 2021

एक योगी कहे जाने वाले आदमी की चलाई जा रही उत्तर प्रदेश सरकार के तहत इस राज्य का हाल ऐसा हो गया है कि देखकर हैरानी होती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कुछ महीने बाद के चुनाव की तैयारी में आज हिंदुस्तान के अधिकतर समाचार चैनलों पर कई-कई मिनट का इश्तहार लेकर मौजूद हैं और यह साबित करने में लगे हुए हैं कि वहां एक रामराज्य चल रहा है। लेकिन हालत यह है कि उत्तर प्रदेश सांप्रदायिक घटनाओं से भरा हुआ है, बलात्कारों से भरा हुआ है, सत्तारूढ़ भाजपा के लोगों की गाडिय़ों से कुचले हुए किसानों की लाशें अभी आंखों के सामने ही हैं. खुद मुख्यमंत्री के गोरखपुर शहर में योगीराज का विकास देखने बाहर से आकर ठहरे हुए एक शरीफ इंसान को पुलिस आधी रात होटल के कमरे से निकालकर पीट-पीटकर मार डाल रही है, और सरकार को उसकी पत्नी को सरकारी नौकरी देनी पड़ रही है। खबरों की किसी भी वेबसाइट को खोलें तो उत्तर प्रदेश के तरह-तरह के जुर्म भरे पड़े रहते हैं। और जुर्म केवल सत्तारूढ़ लोग कर रहे हैं ऐसा भी नहीं है, अयोध्या की खबर सामने है कि दुर्गा पूजा के दौरान फायरिंग, एक मौत, दो बच्चियां गंभीर, एक दूसरी खबर है कि रामलीला के मंच पर अश्लीलता रोकने गए दारोगा, सिपाहियों को भीड़ ने दौड़ाया, इस तरह की खबरें उत्तर प्रदेश से हर दिन दर्जनों की संख्या में आ रही हैं। मतलब यही है कि वहां राजकाज बदहाल है और राम का नाम लेकर जैसे रामराज को गिनाया जा रहा है उसे सुनकर अगर राम कहीं हैं तो वह भी बेहद शर्मिंदा होंगे। अब कहने के लिए यह कहा जा सकता है उत्तर प्रदेश तो हमेशा से ऐसे जुर्म से भरा हुआ राज रहा है, कोई यह भी कह सकते हैं कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के राज में और ज्यादा जुर्म होते थे, कोई यह भी कह सकते हैं कि बसपा की मायावती मुख्यमंत्री थी तब भी जुर्म बहुत होते थे। लेकिन राम का नाम लेकर काम करने वाले, बिना परिवार वाले, अपने-आपको योगी और सन्यासी बताने वाले एक मुख्यमंत्री के राज में भी अगर यही हाल होना है तो फिर क्या बदला है? और यह तो इस राज्य का पांचवां साल चल रहा है, पांचवें साल के आखिरी महीने चल रहे हैं। उत्तर प्रदेश की पुलिस की हरकतें पूरी तरह से सांप्रदायिक भी दिखती हैं, जातिवादी दिखती हैं, और अपार हिंसा वहां की पुलिस के कामकाज में सामने आ रही है। बलात्कार की शिकार कोई लडक़ी या महिला थाने पहुंचे तो उसके साथ और बलात्कार हो जाए, इस किस्म की बातें वहां से आती हैं।

यह उत्तर प्रदेश हिंदुस्तान को सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाला प्रदेश रहा है, और महज कांग्रेस के प्रधानमंत्री नहीं, कई पार्टियों के प्रधानमंत्री यहां से दिल्ली पहुंचे हैं। ऐसे में यह प्रदेश न केवल पिछड़ा रह गया, न केवल अनपढ़ रह गया, न केवल आबादी अंधाधुंध बढ़ाने वाला रह गया, बल्कि यह प्रदेश देश की सबसे हिंसक पुलिसवाला प्रदेश बन गया है, और देश में सांप्रदायिकता शायद सत्ता की मर्जी से इस हद तक तो किसी और प्रदेश में चलती नहीं दिखती है। रही सही कसर किसान आंदोलन पर केंद्रीय मंत्री के बेटे का कार चढ़ा देना था, तो वह भी हो गया है और उत्तर प्रदेश सरकार से लेकर भारत सरकार तक के लिए एक शर्मिंदगी की बात खड़ी हुई है।

ऐसे उत्तर प्रदेश में इस चुनाव में भाजपा के सामने आज कम से कम तीन पार्टियां तो दिख रही हैं जिनमें समाजवादी पार्टी की संभावनाएं सबसे अधिक बताई जा रही हैं, उसके बाद बसपा की, और उसके बाद कुछ लोगों का कहना है कि कांग्रेस को भी कुछ सीटें मिल सकती हैं। अभी-अभी एक चुनावी सर्वे सामने आया जो कांग्रेस को शायद दो-चार सीटें दे रहा है। चुनावी नतीजे आने के बाद कांग्रेस को कितनी सीटें मिलती हैं, और कितने वोट मिलते हैं, यह साफ होगा। लेकिन आज जब उत्तर प्रदेश में सरकार का इतना खराब हाल है तो कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भाजपा के खिलाफ समाजवादी पार्टी की संभावनाएं बहुत बड़ी हैं। और इसी के साथ-साथ कुछ लोगों का यह भी मानना है कि कांग्रेस वहां पर वोट काटने वाली एक पार्टी बनकर रह गई है, और प्रियंका गांधी को जितनी शोहरत मिलेगी, उतना ही नुकसान समाजवादी पार्टी का होगा। अब इस बात को बंगाल की मिसाल से समझना बेहतर होगा कि जिस बंगाल में भाजपा की संभावनाएं अंधाधुंध देखी जा रही थीं, और ममता को लोग डावांडोल मान रहे थे वहां पर कांग्रेस और वामपंथी जब शून्य पर चले गए, और ममता बनर्जी आसमान पर चली गईं, और भाजपा को बुरी तरह पीछे छोड़ा। अब अगर उत्तर प्रदेश में वैसी ही एक नौबत आनी है, तो यह जाहिर है कि कांग्रेस वहां पर भाजपा के परंपरागत वोटों में तो कोई सेंध लगा पाने से रही, वह समाजवादी पार्टी या बसपा को मिलने जा रहे ऐसे ही कुछ वोटों को कम करके अपनी थोड़ी सी गुंजाइश निकाल सकती है। ऐसे माहौल में लोग अगर भाजपा को हराने की सोच रहे हैं, तो लोगों को यह भी सोचना पड़ेगा कि क्या गैरभाजपा पार्टियां एक दूसरे के मुकाबले उम्मीदवार खड़े करके सचमुच ही भाजपा को हरा पाएंगी?

पिछला विधानसभा चुनाव गैरभाजपा दलों ने सीटों का बंटवारा करके लड़ा था और सबका तजुर्बा एक दूसरे से खराब था। चुनाव के तुरंत बाद ही सपा, बसपा, और कांग्रेस सभी ने यह कह दिया था कि अब साथ में मिलकर कोई चुनाव नहीं लड़ा जाएगा। ऐसे में यह भाजपा के लिए बड़ी सहूलियत की बात है कि उसके मुकाबले कोई एक अकेला ताकतवर उम्मीदवार नहीं रहने वाला है, और दो-तीन उम्मीदवार गैर भाजपा वोटों को बाटेंगे। फिर मानो यह तीन पार्टियां काफी नहीं हैं इसलिए हैदराबाद शहर के एक हिस्से के राष्ट्रीय नेता असदुद्दीन ओवैसी भी मैदान में आ गए हैं, और वे लगातार मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की एक ऐसी हमलावर कोशिश कर रहे हैं कि जिससे मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो या ना हो, हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में जरूर हो जाए। और उनका मकसद भी शायद यही है. ओवैसी चुनाव के पहले से जिस तरह से भाजपा को फायदा पहुंचाने वाला माहौल बनाने लगते हैं, उससे ऐसा लगता है कि वे भाजपा की एडवांस पार्टी हैं जो कि चुनावी राज्य में पहुंचकर भाजपा के लिए शामियाना बांधने का काम करते हैं। इसलिए आज उत्तर प्रदेश चाहे कितना ही बदहाल क्यों ना हो, जुर्म से कितना ही लदा हुआ क्यों ना हो, इस प्रदेश में चुनाव में विपक्ष जिस हद तक बिखरा हुआ है, और एक दूसरे के खिलाफ है, उससे योगीराज को खतरा कम ही दिखाई पड़ता है। आने वाले महीने बताएंगे कि भाजपा उत्तर प्रदेश में कितनी कामयाबी पाती है, लेकिन यह बात है कि अगर विपक्ष टुकड़ा-टुकड़ा रहे, तो फिर सरकार को अधिक मेहनत करने की जरूरत भी नहीं रहती, और सरकार के सारे कुकर्म धरे रह जाते हैं, उसे कोई सजा नहीं मिल पाती।