जन्मदिन पर अटलजी को याद करने की कई वजहें

संपादकीय
25 दिसंबर 2019

भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने पूरे जीवन एक हिंदू नेता भी बने रहे, और हर बरस उनका जन्मदिन ईसाईयों के सबसे बड़े त्यौहार, यीशु मसीह के जन्मदिन, क्रिसमस पर आते रहा, मनाया जाते रहा। आज भी उनके जन्मदिन पर देश भर में उन्हें याद किया गया, और खासकर उनके कार्यकाल, उनकी कार्यशैली, और उनकी बातों को याद किया गया। वाजपेयी किसी भी कोने से भाजपा के किसी भी दूसरे नेता के मुकाबले कम हिंदू नहीं थे, और वे जनसंघ के दिनों से पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता भी थे जिन्हें जनसंघ का पोस्टरब्यॉय कहा जाता था। जब तक एनडीए के बहुमत के साथ वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री नहीं बने, तब तक जनसंघ और भाजपा का स्थाई नारा रहता था- अबकी बारी, अटल बिहारी।

जनसंघ और भाजपा के सबसे बड़े नेता रहने की वजह से वाजपेयी देश की बाकी अधिकतर पार्टियों की आलोचना का शिकार भी होते रहे, और उनके बारे में यह चर्चा भी रही कि उनका नर्म-हिंदुत्व एक सोची-समझी रणनीति के तहत है, और उनकी असली सोच वही है जो कि बाबरी मस्जिद के गिरने के वक्त एक भाषण के वीडियो में सामने आई थी। ऐसी तमाम आलोचनाओं और चर्चाओं के बीच एक बात उनके सारे संसदीय जीवन में बनी रही कि विचारधारा के टकराव से परे, उनकी व्यक्तिगत कड़वाहट और टकराहट लोगों को याद नहीं पड़ती। लोगों को उनका वह भाषण याद पड़ता है जो कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के गुजरने पर संसद में दिया था, और जिसे एक महान श्रद्धांजलि कहा जाता है। उनकी दरियादिली, उनके बड़प्पन, और नेहरू के प्रति उनके सम्मान से चाहे उनके चाहने वाले कुछ लोग खफा ही क्यों न हुए हों, उन्होंने नेहरू के प्रति सम्मान में कोई कटौती नहीं की। और एक वक्त ऐसा भी आया जब वाजपेयी को कई दशक बाद जाकर गंभीर इलाज की जरूरत पड़ी, तो उस वक्त के कांगे्रस प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें भारतीय संसदीय प्रतिनिधि मंडल का मुखिया बनाकर संयुक्त राष्ट्र संघ भेजा, ताकि वहां भारत का एक मजबूत प्रतिनिधित्व भी हो सके, और वाजपेयी का इलाज भी हो सके। यह बात अटलजी ने राजीव गांधी की बेवक्त की मौत के बाद एक से अधिक बार सार्वजनिक रूप से कही। उन्होंने लखनऊ के सांसद रहते हुए उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन के दौरान कांगे्रस के मोतीलाल वोरा के राजभवन के अपने संस्मरण भी कई बार सुनाए कि वे अपने चुनाव क्षेत्र के काम लेकर वोराजी के पास जाते थे, तो उनकी खातिर होने के साथ-साथ तुरंत ही उनका काम भी होता था, और कुछ मौकों पर वोराजी उन्हें लेकर भी मौकों पर जाते थे।

आज जब देश में राजनेताओं के बीच कड़वाहट इतनी अधिक हो गई है कि परस्पर विरोधी पार्टियों के लोगों का साथ उठना-बैठना भी बंद हो गया है, और संसद की छत तले बैठने की जब मजबूरी रहती है, तब भी बहुत से विरोधी लोग एक-दूसरे की तरफ देखे बिना, एक-दूसरे की हस्ती को नकारते हुए, या हिकारत के साथ जवाब दे देते हैं, या आरोप लगा लेते हैं। ऐसे माहौल में लोगों को अटलजी की याद और अधिक आती है कि राजनीतिक मतभेद को दुश्मनी के दर्जे तक ले जाए बिना भी किस तरह अपनी पार्टी की विचारधारा पर काम किया जा सकता है। उनके मिजाज और तौर-तरीकों की वही बात उनके धुरविरोधी वामपंथियों को भी उनके साथ उठने-बैठने में असहज नहीं करती थी। आज उनकी पार्टी सत्ता में है, और दूसरे कार्यकाल का पहला बरस चल रहा है। आज भाजपा को एनडीए के मुखिया की हैसियत से भी यह सोचने की जरूरत है कि इतने छप्परफाड़ वोट और बहुमत पाने के बाद भी वह विपक्षी पार्टियों की दोस्ती और सद्भावना क्यों नहीं पा रही है? लोकतंत्र महज गिनती नहीं होता है, लोकतंत्र का मतलब परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच भी सद्भावना का संबंध होता है। अटल बिहारी वाजपेयी के साथ काम की हुई कई पार्टियों, और कई नेताओं का उनके बारे में तजुर्बा बीच-बीच में छपते रहता है, और सद्भावना का वह एक महत्व लोकतंत्र में कभी कम नहीं आंका जा सकता, और उसी लिए अटलजी को भी कभी कम नहीं आंका जा सकेगा।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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