फौजी वर्दी के राजनीतिक इस्तेमाल के बड़े खतरे

संपादकीय
29 दिसंबर 2019

एक बड़ी पुरानी कहानी है। एक आदमी के तीन बेटे थे, और तीनों ही तुतलाते थे। जवान हो जाने के बावजूद इस वजह से उनकी शादी नहीं हो पा रही थी। किसी तरह तीन कन्याओं के एक पिता से बात हुई तो इस आदमी ने अपने बेटों को समझाया कि मेहमान उन्हें देखने आएंगे, और उस वक्त अपना मुंह बंद रखना। किसी भी बात का जवाब मत देना, नहीं तो शादी नहीं हो पाएगी। कन्याओं का पिता आया, अच्छे-भले दिखने वाले लड़कों को देखा, और साथ में सब खाने बैठे। लड़कियों के पिता ने इन लड़कों से कुछ पूछना चाहा तो वे चुप रहे, उनके पिता ने कहा कि वे इतने सुशील हैं कि वे पिता की मौजूदगी में कुछ बोलते नहीं हैं। इतने में कहीं से एक छोटा सा चूहा आकर पिता की थाली के पास घूमने लगा, तो एक बेटे का सब्र जवाब दे गया, और उसने अपने पिता से चूहे के बारे में बताया। पिता ने घूरकर देखा, तो दूसरे बेटे ने अपने भाई को डांटा कि पिता ने चुप रहने कहा था, भूल गए? और दो भाईयों की यह लापरवाही देखकर तीसरे ने खुश होकर पिता के सामने शेखी बघारी, कि दोनों भाई बोले लेकिन वह तीसरा चुप रहा। लड़कियों के पिता को हकीकत दिख गई, और खाना खत्म करके वह चले गया।

यह कहानी बताती है कि किस तरह बेमौके बोलने का क्या नतीजा होता है। अभी दो दिन पहले भारतीय थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने देश में चल रहे नागरिकता संशोधन के विरोध पर कड़ा प्रहार करते हुए सार्वजनिक बयान दिया था और न सिर्फ नागरिकता कानून के बारे में कहा था बल्कि देश में नेता कैसे होने चाहिए और कैसे नहीं होने चाहिए यह भी कहा था। उनका यह बयान हक्का-बक्का करने वाला था क्योंकि यह देश के अंदरूनी, गैरफौजी, सामाजिक-राजनीतिक मामले पर दिया गया बयान था जो कि पहली नजर में ही फौज के अधिकार क्षेत्र और उसकी जिम्मेदारी दोनों से परे का मामला था। भारतीय लोकतंत्र पाकिस्तान के लोकतंत्र जैसा नहीं है जहां पर फौज के मुखिया कभी कारोबारियों को बुलाकर देश की आर्थिक स्थिति के बारे में बात करें, तो कभी वहां के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की निंदा का लिखित बयान जारी करें, उसका विरोध करें। जनरल रावत इसके पहले भारत और भारत सरकार की ओर से लगते हुए ऐसे बयान पाकिस्तान के खिलाफ कई बार दे चुके हैं जो कि पूरी तरह से नाजायज थे, भड़काने वाले थे, और राजनीतिक थे। किसी भी फौजी मुखिया के लिए ऐसे बयान देना अधिकार के बाहर का मामला था, लेकिन वे कई बार ऐसा करते आए थे, और बार-बार ऐसा करने पर यही माना जा सकता है कि वे केंद्र सरकार की सहमति और अनुमति से, या सरकार के कहे हुए ऐसा बयान देते थे। अभी ताजा राजनीतिक बयान को लेकर यह अटकलें भी लग रही हैं कि केंद्र सरकार ने सेना के तीनों अंगों के ऊपर एक संयुक्त कमांड बनाने का जो फैसला दो दिन पहले लिया है, क्या उसी कुर्सी को ध्यान में रखकर जनरल रावत ने यह बयान एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दिया जो कि मीडिया में खुलासे से आना तय ही था?

अब मानो किसी कुर्सी की रेस में लगे हुए लोग बयानों का मुकाबले कर रहे हों, कल भूतपूर्व वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल बीएस धनोआ ने एक बयान दिया कि पाकिस्तान पर हवाई वार करने के प्रस्ताव पिछली सरकारों ने दो बार खारिज कर दिए थे, 2001 में अटल सरकार ने, और 2008 में मनमोहन सरकार ने। उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच से कहा कि 2001 में संसद पर हमले के बाद, और 2008 में मुंबई पर आतंकी हमलों के बाद वायुसेना ने केंद्र सरकार को पाकिस्तान पर जवाबी हवाई कार्रवाई का प्रस्ताव दिया था, लेकिन दोनों वक्त सरकारें इस पर तैयार नहीं हुईं, और उससे दुश्मन को यह भरोसा मिला कि भारत जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा। धनोआ ने यह भी कहा कि वायुसेना की जवाबी कार्रवाई की क्षमता और तैयारी थी, लेकिन सरकारों ने हवाई वार का राजनीतिक फैसला नहीं लिया।

रिटायर होने के बाद भी किसी फौजी अफसर को अपने वक्त की सरकार के राजनीतिक फैसले लेने या न लेने की बात पर कुछ कहने का हक रहना चाहिए? प्रधानमंत्री के स्तर पर लिए गए होंगे ऐसे सर्वाधिक गोपनीय और राष्ट्रीय सुरक्षा के फैसलों के बारे में क्या उस वक्त वर्दी में रहे किसी फौजी को कभी भी कुछ बोलने का हक रहना चाहिए? यह सवाल छोटा नहीं बहुत बड़ा इसलिए है कि यह बयान इस देश के दो पिछले प्रधानमंत्रियों को नीचा और छोटा दिखाने वाला बयान भी है, और देश के ताजा हालात देखें, तो यह बयान बहुत मासूम भी नहीं लगता है, और बहुत अनायास भी नहीं लगता है। भारतीय लोकतंत्र में फौज के ऊपर निर्वाचित राजनीतिक सरकार को इसीलिए रखा गया है कि दूसरे देशों के साथ रिश्तों के फैसले वर्दियों के हाथ के बम-बंदूक न करें। लोकतंत्र में बहुत से ऐसे मौके आते हैं जब फौज की कार्रवाई को वाहवाही मिलती है, लेकिन फौज को लोकतंत्र में अगर नाजायज भूमिका दी जाएगी, तो उस लोकतंत्र का पाकिस्तान सरीखा होने का एक खतरा रहेगा जिसमें फौज सरकार और अदालत पर हावी हो जाती हैं। जिन लोगों का एक बड़ा शगल युद्धोन्माद है उन्हें यह खतरा समझ नहीं आएगा क्योंकि युद्धोन्माद को पूरा करने के लिए एक हमलावर-मिजाज वाली फौज की जरूरत पड़ती है। लेकिन जो लोग लोकतंत्र में अलग-अलग संस्थाओं की अलग-अलग भूमिकाएं देखते हैं, और उसकी गंभीरता को समझते हैं, वे वर्दियों की इस अतिसक्रियता, और ऐसे बड़बोलेपन के खतरों को समझ सकते हैं। 
जनरल रावत ने देश के भीतर के राजनीतिक और सार्वजनिक आंदोलनों, छात्र आंदोलनों को लेकर पूरी तरह नाजायज बयानबाजी की है, और कुछ एक बड़े रिटायार्ड फौजियों ने उनके खिलाफ यह सवाल उठाया भी है। एक फौजी के देश के लोकतांत्रिक आंदोलनों के खिलाफ दिया गया ऐसा बयान आंदोलनों की इज्जत तो मटियामेट नहीं करता, फौजी वर्दी की इज्जत को जरूर कम करता है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या आज किसी को सचमुच इस बात की परवाह रह गई है कि फौजी वर्दी का राजनीतिक उपयोग नहीं किया जाना चाहिए?

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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