संपादकीय
30 दिसंबर 2019

देश में चल रहे नागरिकता-कानून विवाद के बीच एक और बहस शुरू हुई है कि इस कानून का विरोध करते प्रदर्शनों में इस्लाम से जुड़े कुछ नारों को लगाना सही है या गलत? दरअसल ऐसे आंदोलन के जो वीडियो पोस्ट किए गए हैं, उनमें से कुछ में सार्वजनिक जगहों पर आंदोलनकारी इस्लाम के कुछ शब्दों को जोड़कर नारे लगा रहे हैं। यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन कांगे्रस सांसद शशि थरूर ने इसे लेकर यह पोस्ट किया कि हिंदुत्व-अतिवाद के खिलाफ लड़ाई में इस्लामी-अतिवाद की जगह नहीं होनी चाहिए। हम लोग, जो कि नागरिकता के मुद्दे पर सरकार का विरोध कर रहे हैं, वह भारत को एक रखने के लिए है, लेकिन भारत की विविधता और बहुलता की जगह किसी दूसरे धार्मिक कट्टरपंथ को नहीं दी जा सकती। थरूर के इस ट्वीट के जवाब में तुरंत बहुत से मुस्लिम लोगों ने लिखा कि कौन कहता है कि ला इलाहा इल्लल लाह अतिवाद है? उसने लिखा कि कम से कम यह तो समझने की कोशिश कीजिए कि आम मुसलमान कहते क्या हैं, अतिवाद से इसका कोई लेना-देना नहीं है। इस बहस में ट्विटर पर बहुत से लोग हिंदू और मुस्लिम की बहस में उलझ गए, और किसी जानकार ने यह भी लिखा कि अरबी भाषा के इस इस्लामी नारे का मतलब है- अल्लाह के सिवाय और कोई ईश्वर नहीं है।
यह बहस दिलचस्प है क्योंकि यह एक पूरी तरह राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन में धर्म के दाखिले को लेकर है। यह पहला मौका नहीं है कि ऐसा हो रहा है, देश में बहुत बार राजनीतिक आंदोलनों में हिंदू-पार्टियां जय श्रीराम या ऐसा कोई दूसरा नारा लगाते आई हैं। लेकिन इस बार का नागरिकता-कानून विरोधी आंदोलन किसी राजनीतिक दल का न होकर छात्रों का आंदोलन है जिसमें भाजपा-एनडीए विरोधी कई पार्टियां अलग-अलग हद तक शामिल हैं। यह बात समझने की जरूरत है कि ये पार्टियां या छात्र संगठन गैरमुस्लिम, गैरइस्लामिक भी हैं, और इनमें से बहुतेरे तो नास्तिक भी हैं। फिर एक बड़ी बात यह भी है कि चाहे नागरिकता कानून में संशोधन का खास निशाना मुस्लिमों पर हो, इस संशोधन के विरोधियों ने इसे महज मुस्लिमों का मुद्दा मानकर उन्हीं के जिम्मे नहीं छोड़ा है, बल्कि देश के बहुत से दूसरे धर्मों के, बिना धर्म वाले लोग बहुतायत से इस आंदोलन में शामिल हैं, और शायद मुस्लिमों के मुकाबले बढ़-चढ़कर शामिल हैं। इसलिए जब ऐसे आंदोलन में किसी एक धर्म के नारे जुड़ रहे हैं, तो वह फिक्र की बात है। जिस तरह यह कहा जाता है कि धर्म को राजनीति से जोडऩा गलत है, उसी तरह धर्म को राजनीतिक या सामाजिक आंदोलन से जोडऩा भी गलत ही रहेगा, और वह प्रतिउत्पादक (काउंटर प्रोडक्टिव) हो जाएगा। जो आंदोलन एक नाजायज कानून के खिलाफ है, और जो कानून हिंदुओं को भी बेजमीन, बेदखल करने जा रहा है, उसका विरोध करने का आंदोलन किसी धर्म से नहीं जोडऩा चाहिए। और अगर इस बहस में लगाए जा रहे नारे का मतलब किसी एक धर्म के ईश्वर को ही अकेला ईश्वर मानना है, तो इससे बहुत से आंदोलनकारी असहमत होंगे।
चाहे जेएनयू का विवाद रहा हो, चाहे जामिया का, या फिर एएमयू का, जहां-जहां कुछ या अधिक मुस्लिम छात्र-छात्राओं पर भी हमले हुए, वहां-वहां देश के तमाम धर्मों के लोगों ने यह देखे बिना छात्र-छात्राओं का साथ दिया कि वे किस धर्म के हैं। जेएनयू के कन्हैया कुमार का साथ देने में या शेहला राशिद का साथ देने में देश के लोगों ने यह सोचा भी नहीं कि वे किस धर्म के हैं। ऐसे में धर्म को छात्रों के आंदोलन, या नागरिकता आंदोलन से परे रखना ही आंदोलन को बचा सकेगा। लेकिन यह लिखते हुए हम शशि थरूर की बात पर गंभीर आपत्ति दर्ज करना चाहते हैं कि एक धार्मिक नारे को वे बड़ी हड़बड़ी और जल्दबाजी में धार्मिक-अतिवाद करार दे रहे हैं। धर्म को लेकर कोई लापरवाह टिप्पणी उस धर्म से नफरत करने वाले लोगों के हाथ में हथियार हो सकती है, और किसी भी धर्म को लेकर गैरजिम्मेदार बात अपना मकसद ही खो बैठती है। शशि थरूर अगर हमारे यहां लिखे हुए तर्कों को उठाते और धर्म को अलग रखने को कहते तो वह बात अधिक तर्कसंगत और न्यायसंगत होती, वह बात एक बेहतर असर डालती। लेकिन उन्होंने बड़ी हड़बड़ी में इसे अतिवाद करार दे दिया जो कि उनकी एक बुनियादी चूक है। कुल मिलाकर इस विवाद पर हम आखिर में यही कहना चाहते हैं कि यह आंदोलन देश के भलाई के लिए एक महत्वपूर्ण छात्र और राजनीतिक आंदोलन है, और इस पर धर्म का साया इसे कमजोर करने के अलावा और कुछ नहीं करेगा। धर्म को, किसी भी धर्म को, ऐसे आंदोलनों से अलग रखा जाना चाहिए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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