संपादकीय
17 मार्च 2020

सुप्रीम कोर्ट के पिछले मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक किस्म का रिकॉर्ड कायम किया है। अपने कार्यकाल के आखिर में उन्होंने लगातार जिस अंदाज में ठकुरसुहाती के फैसले दिए उनसे देश वैसे भी हक्का-बक्का है। रही-सही कसर कल तब पूरी हो गई जब राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति के मनोनीत किए जाने वाले लोगों में उनका नाम आया। भारतीय लोकतंत्र में कुछ कामों में राष्ट्रपति की बस सील लगती है, वह फैसला होता केंद्र सरकार का है। इसलिए मोदी सरकार ने उन्हें राज्यसभा में भेजने की घोषणा की, तो तुरंत लोगों को वे सारे फैसले एक बार फिर याद आए जो कि अपने आखिरी कुछ महीनों में रंजन गोगोई ने दिए थे। हर फैसला सरकार को खुश कर गया था, सरकार की सोच का था, और कानून की समझ रखने वाले लोग इस सिलसिले से हैरान भी थे। लोग रंजन गोगोई के कार्यकाल में भी उनसे इस बात के लिए हैरान थे कि उन पर जब एक मातहत छोटी कर्मचारी ने यौन शोषण का आरोप लगाया, तो देश के कानून को लात मारते हुए रंजन गोगोई ने उस शिकायत की सुनवाई की बेंच में खुद बैठना तय किया, और बैठे। यह अदालत का एक गजब का नजारा था जिसमें रंजन गोगोई कटघरे में भी, जज की कुर्सी पर भी थे, और बचाव पक्ष के वकील बनकर सवाल भी खड़े कर रहे थे। आज देश के बहुत से लोग अपनी उम्मीदों के खिलाफ जाकर भी रंजन गोगोई से उम्मीद कर रहे हैं कि वे राज्यसभा के इस मनोनयन से इंकार कर दें।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम रिटायर्ड लोगों को उनके कार्यक्षेत्र के किसी भी दफ्तर में बिठाने के खिलाफ लंबे समय से लिखते आए हैं। राज्यों में कई ऐसी संवैधानिक कुर्सियां और कई ऐसे आयोग बना दिए गए हैं जिन पर रिटायर्ड जजों, और रिटायर्ड अफसरों को बिठाया जा रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि अदालती फैसले सामने खड़े मामले के गुण-दोष को देखते हुए नहीं आ रहे, राज्य में खाली होने वाली बड़ी कुर्सी को देखते हुए आ रहे हैं। ऐसा ही हाल सरकारी ओहदों से रिटायर होने वाले अफसरों का है जो कि आखिरी के बरसों और महीनों में सत्ता की पसंद से सही-गलत हर किस्म के काम करते हैं, और बाद में अपनी छांटी हुई कुर्सी पर पहुंचकर मौत के करीब पहुंचने तक ऐश करते हैं। किसी राज्य में अदालत और सरकार हांकने वाले जजों और अफसरों को अगर ईमानदार बने रहने देना है, तो बाकी कई बातों के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि उस राज्य में उनका रिटायरमेंट के बाद का कोई मनोनयन न हो। अगर ये इतने ही काबिल हैं, तो कोई दूसरा राज्य उन्हें डोली में बिठाकर ले जाए, और उनकी ताजपोशी करे।
देश में रिटायर्ड जजों को लेकर भी ऐसा ही हो रहा है। कुछेक ऐसी कुर्सियां पहले से तय और घोषित हैं जिन पर सिर्फ रिटायर्ड जजों को ही बिठाया जा सकता है। लेकिन उनसे परे की कुर्सियां, चाहे वे राज्यसभा की हों, या देश के किसी प्रदेश में राज्यपाल की हो, या किसी और गैर-जज से भरी जा सकने वाली दूसरी कुर्सी हो, इन पर जजों को लाने का मतलब बाकी जजों को यह संदेश भेजना भी रहता है कि सरकार उनके रिटायर होने के बाद उन पर मेहरबानी भी कर सकती है।
अब दूसरी तरफ देखें तो कांगे्रस पार्टी ने अपने कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों को राज्यसभा भेजा था। जस्टिस बहरूल इस्लाम इंदिरा के कार्यकाल में राज्यसभा सदस्य बने थे, फिर वे इस्तीफा देकर गुवाहाटी हाईकोर्ट के जज बने, और फिर एक अभूतपूर्व फैसले के तहत उन्हें रिटायरमेंट के बाद सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। उन्होंने बिहार सहकारी बैंक घोटाले केस में वहां के कांगे्रसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को बरी करने वाला फैसला दिया था, और फिर सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफा देकर कांगे्रस टिकट पर राज्यसभा चले गए। यह पूरा सिलसिला लोगों को अब ठीक से याद नहीं है, लेकिन यह न्यायपालिका के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है। एक दूसरा मामला कांगे्रस पार्टी के नाम लिखा हुआ है जस्टिस रंगनाथ मिश्रा का। वे 1984 के सिख विरोधी दंगों की जांच करने वाले आयोग के अकेले सदस्य थे। उनकी जांच रिपोर्ट को हिंदुस्तानी थलसेना के जनरल जगजीत सिंह अरोरा ने दंगों के शिकारों के खिलाफ पूर्वाग्रह से भरी हुई कहा था। रिपोर्ट में कांगे्रस पार्टी को क्लीनचिट दी गई थी। बाद में उन्हें 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का पहला अध्यक्ष बनाया गया, और 1998 में कांगे्रस ने उन्हें राज्यसभा में भेजा। इसलिए आज जब रंजन गोगोई को राष्ट्रपति की सील से राज्यसभा में मनोनीत किया जा रहा है, तो वह इन पिछली दो मिसालों की वजह से कांगे्रस से कुछ भी कहने का नैतिक हक छीन रहा है।
अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट अपने जजों को इस तरह प्रभावित करने की कोशिशों या ऐसे खतरों वाली संवैधानिक व्यवस्था पर खुद होकर जब कुछ नहीं सोच रहा, तो सरकार और संसद से तो किसी तरह की उम्मीद की भी नहीं जा सकती। आज रंजन गोगोई पर पहला पत्थर कौन चलाए? कम से कम कांगे्रस के तो हाथ बंधे हुए हैं, और कांगे्रस के ऐसे पुराने फैसलों में जो दूसरी पार्टियां चुप रही होंगी, उनका भी आज बोलने का हक नहीं रह गया है। जगन्नाथ मिश्र के पक्ष में फैसला देकर राज्यसभा जाना अच्छा, और मोदी सरकार की पसंद के फैसले देकर राज्यसभा में जाना बुरा कैसे हो सकता है? केंद्र और राज्यों को ऐसे बुनियादी सुधार की जरूरत है, लेकिन सरकारें अपनी बदनीयत छोड़ेंगी, यह उम्मीद फिजूल की होगी। ऐसे में इन राजनीतिक दलों से परे आम लोगों को भी ऐसा जनमत खड़ा करना होगा जिससे ऐसे जजों के लिए शर्मिंदगी खड़ी हो सके और देश की संवैधानिक व्यवस्था में एक बुनियादी मरम्मत की जा सके।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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