अपने भीतर इंसानियत कितनी बची है यह तौलने का वक्त..

संपादकीय
20 मार्च 2020


छत्तीसगढ़ में कल एक युवती के कोरोना वायरस से ग्रस्त मिलने के बाद राज्य एकदम चौकन्ना हो गया है, इससे परिवार के इलाके में बाजार बंद करवाए गए हैं, और अतिरिक्त सफाई हो रही है। आसपास के इलाकों में लोगों को घरों के भीतर रहने की सलाह दी गई है, और पिछले कुछ दिनों में यह युवती बाजार और बैंक, जहां-जहां गई थी, उन सबकी पहचान और जांच की जा रही है। सरकार लोगों के जरूरत की सूचना और चेतावनी तो दे रही है, लेकिन जरूरत से परे की जानकारी नहीं दे रही जो कि दहशत भी फैला सकती है। अब लोग एक अभूतपूर्व तनाव और खतरे से गुजर रहे हैं, लोगों को एक अभूतपूर्व सावधानी बरतनी पड़ रही है, और इस आशंका की कोई सीमा भी नहीं है कि आने वाले दिन और कितने खराब होंगे। लेकिन ऐसे में आम जनता की क्या जिम्मेदारी होती है जिसे लेकर कोई सरकारी कानून सामने नहीं आ सकते, और न ही सरकार किसी को छोटी-छोटी बातों की सलाह ही दे सकती है। 

बुरा वक्त इंसानों के भीतर इंसान जितना बचा होता है, उसकी शिनाख्त का भी होता है। आज जो लोग पैसों की ताकत और पहचान के दम पर सौ-सौ मास्क खरीदकर रख ले रहे हैं, हैंड-सेनेटाइजर के पूरे बक्से कब्जा रहे हैं, उनको यह भी समझने की जरूरत है कि वे संक्रमित समुदायों के बीच किसी टापू की तरह अकेले नहीं बच पाएंगे, वे भी और लोगों के संक्रमित होने पर मारे जाएंगे। इसलिए बेहतर यही है कि जितनी सावधानी लोग अपने बारे में बरत रहे हैं, अपने परिवार के लिए बरत रहे हैं, उतनी ही सावधानी अपने घर-दफ्तर पर, अपने कारोबार में, अपने दायरे में काम करने वाले लोगों के लिए भी बरतनी चाहिए। अस्पताल का आइसोलेशन वार्ड ही एक किस्म का टापू हो सकता है, लेकिन बाहर की दुनिया में आसपास के सभी लोगों का ख्याल रखे बिना आप कोरोना जैसे वायरस-संक्रमण से नहीं बच सकते। 

यह वक्त लोगों की सामाजिक जिम्मेदारी का भी है कि वे सार्वजनिक जगहों को कितना साफ-सुथरा रखते हैं, अपनी धार्मिक-सामाजिक और राजनीतिक भावनाओं किनारे रखकर भीड़ बनाने से कितना बचते हैं, ये तमाम बातें आखिर में साबित करेंगी कि कोई मुहल्ला, कोई शहर, या कोई देश-प्रदेश कितने जिम्मेदार थे। केरल ने देश के सबसे शिक्षित प्रदेश, और राजनीतिक रूप से जागरूक, कानूनी अधिकारों के प्रति सजग प्रदेश होने का सुबूत दिया है, वहां की सरकार बच्चों के दोपहर के स्कूली भोजन को घर पहुंचाने से लेकर रोजी कमाने वाले कामगारों तक के जिंदा रहने का इंतजाम कर रही है, और कल केरल सरकार ने 20 हजार करोड़ का एक पैकेज घोषित किया है जो लोगों के इलाज, उनके खाने-पीने, और उनके जिंदा रह पाने का पूरा इंतजाम करने की एक बड़ी कोशिश है। सरकारों के हिस्से का काम सरकारें करें, और जनता के हिस्से का काम जनता करे तभी कुछ हो सकेगा, वरना ऐसी महामारी के वक्त एक-दूसरे के जिम्मे का काम करना मुमकिन नहीं हैं। 

जिन लोगों में थोड़ी सी भी अतिरिक्त ताकत और क्षमता है, वे आसपास देखें, कहीं कोई बुजुर्ग हो, बीमार हो, या किसी परिवार में अकेले बच्चे हों, तो उनकी जरूरतों को पूरा करने में अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाएं। वे अनाज न ला पाएं, और आपके घर कुछ अधिक अनाज हो तो उनके साथ बांटें, या बाजार से लाने में उनकी मदद करें, या दवाई और दूसरे सामान की उनकी जरूरत का ख्याल रखें। यह मौका इस सामाजिक जिम्मेदारी का भी है कि लोग खरीदने की अपनी ताकत से महीने भर का सामान खरीदने की ऐसी दौड़ शुरू न कर दें कि गरीबों के लिए सारा सामान ही महंगा हो जाए, बाजार से गायब हो जाए। यह याद रखने की जरूरत है कि भूखों के बीच अनाज के भंडार वाले लोग कभी सुरक्षित नहीं रह सकते। छत्तीसगढ़ के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह का इतिहास यही दर्ज है कि जब लोग भूखे थे, तो उन्होंने जमींदार के अनाज-भंडार लूटकर गरीबों में बांट दिए थे। आज कुछ लोगों को यह तुलना कुछ अधिक बड़ी लग सकती है, लेकिन किसी ने यह सोचा है कि कोरोना अगर कई हफ्ते बढ़ते चले गया, तो नौबत क्या आएगी? इसलिए समाज के भीतर एक गैरबराबरी को बढ़ाना किसी के लिए भी अच्छा नहीं है। 

यह वक्त खतरों के बीच ड्यूटी कर रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए शुक्रगुजार होने का भी है। पुलिस, एम्बुलेंस, अस्पताल, सफाई कर्मचारी, ऐसे कई विभागों के लोग रात-दिन खतरा झेलकर भी लोगों के इलाज में, उनके बचाव में लगे हुए हैं। ऐसे लोगों के लिए हम अपने इस अखबार में पिछले कई दिनों से लगातार सलाम लिख भी रहे हैं, और बीती रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उनके प्रति सम्मान जाहिर करने के लिए कहा है। यह सम्मान ताली या थाली बजाकर काफी नहीं हो सकता, लोगों को अपने आसपास के इन लोगों से सामना होने पर उनसे प्रेम की दो बातें भी करनी चाहिए, और अगर मुमकिन हो तो उन्हें चाय-बिस्किट के लिए भी पूछना चाहिए। यह भी पूछ लेना चाहिए कि उनके पास पीने का साफ पानी है या नहीं, उन्होंने कुछ खाया है या नहीं। यह वक्त अपने आपके भीतर यह टटोलने और तौलने का भी है कि अपने भीतर इंसानियत कितनी बची है यह तौलने का वक्त।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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