बिहारी-दंगल में ताल ठोंकी विदेश से आई माटीपुत्री ने !

संपादकीय
09 मार्च 2020


महिला दिवस पर बिहार के अखबारों के पहले पन्ने पर वहां के एक नेता की योरप में पढ़ी एक युवती की तरफ से पूरे पेज के इश्तहार दिए गए हैं, जिसमें उसने अपने आपको इस बरस होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया है। उसने एक नई पार्टी बनाकर बिहार को एक बेहतर और कामयाब राज्य बनाने का अपना इरादा और दावा सामने रखा है। और कुछ हो न हो इस इश्तहार से एक सनसनी फैली है, और लोग इस महंगे विज्ञापन अभियान के महंगे होने की वजह से ही सही, इसे गंभीरता से ले रहे हैं। जैसा कि राजनीति में आने वाली किसी भी महिला के साथ होता है, कुछ या कई लोग इसका मखौल भी उड़ा रहे हैं। अभी हम पुष्पम प्रिया चौधरी नाम की इस युवती के बारे में उसकी खुद की दी गई जानकारी से अधिक कुछ नहीं जानते, लेकिन राजनीति में कई बार ऐसे नए लोग आते हैं जो खुद चाहे जीत न सकें, सरकार न बना सकें, वे एक फर्क खड़ा कर सकते हैं। अब आज से दस बरस पहले किसने सोचा था कि अरविंद केजरीवाल नाम का एक नौजवान झाड़ू चुनाव चिन्ह को लेकर, आम आदमी पार्टी जैसा अटपटा नाम छांटकर दिल्ली की दोनों परंपरागत पार्टियों, कांग्रेस और भाजपा को इस तरह कुचलकर रख देगा, और एक के बाद दूसरा कार्यकाल पाते जाएगा? 

राजनीति में किसी नेता या नई पार्टी का दाखिला महज बहुमत तक जीत पाना नहीं होता, बल्कि कई बार परंपरागत और घिसीपिटी पार्टियों और नेताओं के खिलाफ भांडाफोड़ करने के लिए, उनके पाखंड को उजागर करने के लिए भी कुछ पार्टियां और उनके नेता काम आ सकते हैं, काम आते हैं। लोग इस बात को भूल भी गए होंगे कि महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में ठाकरे परिवार से अलग हुए, और अब तक चुनावी नाकामयाबी वाले राज ठाकरे ने चुनाव प्रचार के दौरान अपनी पार्टी के बैनर पर कार्यक्रम किए थे जिनमें मैदान भर-भरकर लोग पहुंचते थे, राज ठाकरे की तेजाबी जुबान से मोदी और केन्द्र सरकार की आलोचना सुनते थे, और जब वोट देने की बारी आई, तो भाजपा के विरोधियों को वोट दिया, राज ठाकरे को वोट नहीं दिया। दिल्ली के ताजा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने जितना कुछ भी प्रचार किया, उसका उसे कोई फायदा नहीं मिला, एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन जो माहौल बना वह भाजपा के खिलाफ बना, और वह केजरीवाल को फायदा पहुंचाने वाला रहा। 

अब बिहार के आने वाले चुनाव में अगर साफ-सुथरी छवि लेकर खर्च करने की ताकत रखने वाली एक युवती मैदान में सच में ही उतरती है, तो वह मौकापरस्त नीतीश कुमार का भाजपा से संबंधों का भांडा भी फोड़ सकती है, वह लालू-कुनबे के भ्रष्टाचार और कुनबापरस्ती की बात भी वोटरों को याद दिला सकती है, और कांग्रेस के हाशिए पर चले जाने की बात भी सामने रख सकती है। ऐसी किसी पार्टी और युवती की संभावनाएं तो बाद में दिखेंगी, लेकिन उसके राजनीतिक-चुनावी मुद्दों की संभावनाएं अभी से दिखती हैं। आज भारतीय चुनावी राजनीति में भरोसेमंद और साफ-सुथरी छवि का वजन कम नहीं है। इन्हीं दो बातों को लेकर अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पर आए, और वहां काबिज रह गए। न सिर्फ बिहार में, बल्कि दूसरी जगहों पर भी नए और साफ-सुथरे दिखते लोगों की, पार्टियों की जरूरत है, और अगर किसी ने दूसरे देश में काम करके इतनी रकम जुटाई है कि यहां के चुनाव में खर्च करके अपनी बात सामने रख सके, तो उसमें बुराई क्या है? 

आम आदमी पार्टी की बाकी देश में एक यह भी नाकामयाबी रही कि वह बाकी राज्यों में वहां के परंपरागत सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के खिलाफ मुखर नहीं हो सकी, या असर नहीं छोड़ सकी। ऐसे में जब देश की विश्वसनीय वामपंथी पार्टियां लोकप्रिय-बहुमत खो बैठी हैं, और चुनाव जीतने की हालत में नहीं हैं, तो उन्हें भी असल मुद्दों को लेकर जनता के बीच जिस तरह सक्रिय रहना था, वे नहीं रह पाईं, और इसीलिए अधिकतर राज्यों में सत्ता या विपक्ष को वे उस तरह उजागर नहीं कर पाईं। ऐसे में कुछ नए चेहरों का आना अच्छा है, आज हालांकि पहले ही दिन इस युवती की इस पहल पर अधिक वजन के साथ कुछ लिखना ठीक नहीं है, इसलिए हम इसे एक मुद्दा मानकर इस पर नहीं लिख रहे हैं, हम इसे एक रूख और एक संभावना मानकर ऐसी तमाम पहलों के बारे में लिख रहे हैं। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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