देश की अदालतों पर मेहरबानी भी करें...

संपादकीय
15 नवम्बर 2017


बैरूत की एक दिलचस्प तस्वीर इंटरनेट पर मौजूद है जिसमें एक इमारत एक मीटर से भी कम चौड़ाई की बनी हुई है। इसे देखकर हैरानी हो सकती है कि एक दीवार से जरा ही ज्यादा चौड़ी यह इमारत ऐसी क्यों बनाई गई है? तो वहां के बाशिंदे बताते हैं कि इसके पीछे की जमीन और उस पर मकान एक भाई के हैं, और उसे नुकसान पहुंचाने के लिए, वहां से समंदर तक जाने वाली नजर रोकने के लिए दूसरे भाई ने यह इमारत बना दी। अब यह कहानी पिछली आधी सदी से चली आ रही है, और हो सकता है कि इसमें कुछ नमक-मिर्च भी लगी हुई हो, लेकिन बैरूत के रिकॉर्ड में इस बिल्डिंग को ग्रज बिल्डिंग कहा जाता है, और ग्रज का हिन्दी मतलब द्वेष या घृणा, बैरभाव होता है।
यह दुनिया में पहला मौका नहीं है जब एक भाई दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए अपना खुद का नुकसान करने को तैयार हो जाता है। एक वक्त भारत में अंबानी भाईयों के बीच की खाई कुछ ऐसी ही गहरी और चौड़ी थी, जिसे बाद में कहा जाता है कि इनकी मां ने बीच-बचाव करके पाटा। लेकिन ऐसे कई ऐतिहासिक झगड़े चले आ रहे हैं जिनमें भाई दूसरे भाई के खून का प्यासा हो जाता है। भारत की अदालतों में ऐसे लाखों मामले चल रहे हैं जिनमें परिवार की दौलत के बंटवारे के लिए भाई-बहन या भाई-भाई एक-दूसरे के सामने खड़े हुए हैं। दूर क्यों जाएं, भारत और पाकिस्तान एक ही देश से टूटकर दो बने, और इन दोनों के बीच की कड़वाहट इतनी अधिक है कि खुद कंगाल हो जाएं, लेकिन दूसरे के खिलाफ फौजी तैयारियों में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। कुछ इसी तरह का हाल भारत के राजनीतिक गठबंधनों का देखने मिलता है, जिसके दल जब अलग होते हैं तो एक-दूसरे के अव्वल दर्जे के दुश्मन हो जाते हैं।
कुल मिलाकर इस चर्चा का मकसद यह है कि वक्त रहते लोगों को हकों और जिम्मेदारियों का बंटवारा किस तरह कर देना चाहिए कि बाद में उसे लेकर अगली पीढ़ी के बीच नफरत और हिंसा की नौबत न आए। होता यह है कि जब भाईयों, या कि एक पीढ़ी के वारिसों के बीच झगड़ा होता है, तो उसकी आग में घी डालने के लिए लोग अपनी जेब से खर्च करके, बाजार जाकर घी लेकर आते हैं। चाहे परिवार हो, राजनीतिक दल हो, फर्म या कंपनी हो, या कि देशों का मामला हो, इसे अगर समझदारी से नहीं निपटाया गया, तो इनकी बड़ी सी ताकत एक-दूसरे के खिलाफ बर्बाद होती रहती है, और समंदर का नजारा रोकने के लिए दूसरे की जमीन के सामने  अपने पैसे की बर्बादी करते दीवार जैसी पतली इमारत बना देते हैं।
हिन्दुस्तान में हम बहुत से परिवारों में झगड़े की एक जड़ यह भी देखते हैं कि बहुत लोगों को संयुक्त परिवार में गौरव प्राप्त होता है। वे सदस्यों के असंतोष की कीमत पर भी परिवार को एक छत के नीचे जोड़े रखना चाहते हैं, और ऐसे में लोगों के मन में सुलगती बेचैनी आगे चलकर तरह-तरह के झगड़े भी पैदा करती है। अधिक समझदारी की बात यह होती है कि परिवार के मुखिया वक्त रहते ही अगली पीढ़ी का अलग-अलग हिसाब कर जाएं, और देश की अदालतों पर मेहरबानी भी करें। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 नवंबर

अब गुजरात में सेक्स-सीडी की राजनीति हार्दिक के खिलाफ

संपादकीय
14 नवम्बर 2017


चुनावग्रस्त गुजरात में पिछले दो दिनों में ऐसी दो सेक्स-सीडी बाजार में आने की खबर है जिन्हें हार्दिक पटेल की बताया जा रहा है। हार्दिक एक नौजवान है, और शादीशुदा भी नहीं है। एक बंद कमरे में किसी महिला के साथ किसी एक नौजवान के बीच के देह संबंधों को चोरी-छुपे रिकॉर्ड करने वाली यह सीडी हार्दिक की बताते हुए कल जिसने इसे जारी किया है, वह गुजरात के एक भाजपा मंत्री का करीबी बताया जा रहा है, और आज सुबह तक मंत्री के साथ उस नौजवान की बहुत सी तस्वीरें भी सामने आ गई हैं। लोगों को याद होगा कि पिछले पखवाड़े ही छत्तीसगढ़ में भाजपा के एक मंत्री का नाम बताते हुए एक सेक्स-सीडी आई थी, और बाद में भाजपा ने उसे झूठा करार दिया, और एक दूसरी सीडी सामने आई जिसमें चेहरा बदलकर मंत्री का चेहरा जोडऩा बताया गया था। भाजपा ने इसे स्तरहीन और बिलो दि बेल्ट वार करना कहा था।
हमारा यह मानना है कि सेक्स-सीडी की राजनीति करना, हारे हुए लोगों का काम हो सकता है, जीते हुए लोग या जीतते हुए लोग ऐसा घटिया काम शायद न ही करते होंगे। जहां तक ऐसी वीडियो रिकॉर्डिंग हैं, हम पहले भी कई बार लिखते आए हैं कि जब तक ऐसी रिकॉर्डिंग में किसी जुर्म की बात न हो, तब तक उसे रिकॉर्ड करना ही जुर्म है। अगर दो वयस्क आपसी सहमति से बंद कमरे में कुछ कर रहे हैं, तो वहां पर जुर्म महज यह हो सकता है कि कोई बाहरी ताक-झांक करे, और उसकी रिकॉर्डिंग करे। अब एक दूसरा सवाल हमने पिछले एक पखवाड़े में ही इसी कॉलम में यह भी उठाया था कि राजनीति या सार्वजनिक जीवन के लोगों को बदनाम करने की नीयत से जो लोग ऐसी रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल करते हैं, वे ऐसे देह संबंधों में भागीदार महिला को भी बदनाम करते हैं जो कि सार्वजनिक जीवन में नहीं भी हो सकती हैं। इसे एक बड़ा जुर्म मानते हुए ऐसी रिकॉर्डिंग फैलाने वाले तमाम लोगों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, चाहे वह छत्तीसगढ़ में हो या फिर वे गुजरात में हों।
आज देश और प्रदेशों में मुद्दों की कोई कमी नहीं है, और उन्हें छोड़कर निजी जिंदगी में दखल देते हुए ऐसे आपराधिक काम को किसी भी पार्टी या किसी भी नेता को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। भारत का राजनीतिक इतिहास बताता है कि कांग्रेस छोड़ रहे जगजीवन राम के खिलाफ उनके बेटे के निजी जीवन की तस्वीरों पर एक पूरे का पूरा अंक ही मेनका गांधी ने अपनी पत्रिका का निकाला था। और जैसा बोएं वैसा काटें के कुदरती अंदाज में अभी कुछ समय पहले उनके बेटे वरूण गांधी की उसी किस्म की बहुत सी असली या नकली तस्वीरें चारों तरफ फैली थीं। हमारा यह मानना है कि लोगों का निजी जीवन अगर वह अपनी कुर्सी की ताकत का इस्तेमाल करते हुए, किसी का शोषण करते हुए नहीं है, तो उसके उजागर करने पर कड़ी सजा होनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है 14 November

आभासी दुनिया के बंदरगाह में सुरक्षित बंधे जहाज की तरह

13 नवंबर  2017

इन दिनों कोई भी शहरी, शिक्षित, संपन्न, सक्रिय शायद ही ऐसे हों जो कि सोशल मीडिया पर न हों। नतीजा यह है कि लोगों का सामाजिक दायरा जमीनी दायरे से हटकर एक ऐसा आभासी (वर्चुअल) दायरा बन गया है जिसमें वे अपनी पसंद के लोगों के साथ वॉट्सऐप पर बातें शेयर करते हैं, बहुत से समूहों में रहकर बिना खुद कुछ लिखे उस समूह के लोगों की पोस्ट पढ़ते हैं, और इसी तरह फेसबुक पर वे अपनी पसंद के दायरे के साथ रहते हैं। नतीजा यह होता है कि एक नापसंदी पड़ोसी के पड़ोस में रहने जैसा जमीनी तजुर्बा आजकल बहुत से लोगों को अपनी इस आभासी दुनिया में नहीं हो पाता। इस सोशल मीडिया पर उन्हें पल भर में अनसोशल और एंटीसोशल हो जाने की सहूलियत रहती है, वे जब चाहें किसी को अनफॉलो करके उसके पोस्ट देखना बंद कर सकते हैं, उसे अनफ्रेंड करके यह भी बंद कर सकते हैं कि वे लोग उसकी पोस्ट देख सकें, या उस पर टिप्पणी कर सकें।
इसके नफे और नुकसान दोनों हैं। घर के पड़ोस में रहने वाले पड़ोसी को जाकर पल भर में यह नहीं कहा जा सकता कि आज से तू मेरा पड़ोसी नहीं। लेकिन यह बात सोशल मीडिया पर हो सकती है। पड़ोसी के लिए अपने घर के सामने का रास्ता बंद नहीं किया जा सकता, लेकिन सोशल मीडिया पर ऐसा हो सकता है। और ऐसे हो सकने ने लोगों की सोच को बड़ी दूर तक बदलकर रख दिया है। असल जिंदगी की सोच जिस तरह शुरूआती दिनों में आभासी जिंदगी को बदल देती है, उस पर असल डालती है, उसी तरह अब आभासी जिंदगी के पल भर के फैसले असल जिंदगी को भी उसी तरह देखना चाहते हैं। ऐसा हो नहीं पाता, और इससे लोग एक बिल्कुल नई किस्म की दुविधा में जीते हैं, एक ऐसी दुविधा जो कि अभी कुछ बरस पहले तक लोगों को परेशान करने के लिए मौजूद नहीं थी।
असल जिंदगी में भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी पीढिय़ां एक ही घर में गिने-चुने पड़ोसियों के साथ उसी इलाके में गुजर जाती हैं, लेकिन आभासी जिंदगी में, सोशल मीडिया पर लोग आए दिन नए लोगों से मिल सकते हैं, मिलते हैं। ऐसे में लोगों के पास पीढिय़ों से एक ही घर में रहते हुए भी हर दिन नए मुहल्ले का तजुर्बा पाने का एक नया मौका आया है, और इसके बारे में चौकन्ना होकर कुछ सोचने की जरूरत भी रहती है। ऐसी संभावना जमीनी जिंदगी में नहीं रहती, लेकिन सोशल मीडिया की एक अभौतिक दुनिया में ऐसा जरूर रहता है।
अब अगर देखें कि जहां पर पल-पल में दोस्त बनाने या दोस्ती छोडऩे की गुंजाइश है, जहां पर दोस्ती के बिना भी सिर्फ कुछ दायरों की एक झलक रोज पाने की सहूलियत है, वहां पर लोग अपने वक्त का, अपनी भावनाओं का बेहतर इस्तेमाल कैसे करें? जैसे लोग असल जिंदगी में चौकन्ने रहते हैं, उसी तरह बहुत से लोग हैं जो कि सोशल मीडिया को अपने परिचित दायरे के संपर्क का एक जरिया बनाकर रखते हैं, और उससे परे या बाहर कम ही जाते हैं। इनका नफा या नुकसान भी सीमित रहता है। ये एक किस्म से उस जहाज की तरह होते हैं जो कि एक बंदरगाह पर बंधा हुआ है, और वहां पर लंगर के साथ वह बड़ा महफूज भी है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है, जहाज बंदरगाहों पर डेरे के लिए नहीं बने होते, वे बेचैन समंदर के तूफानों को झेलने के लिए बने होते हैं, और सात समंदर पार करने के लिए भी। इसलिए उस जहाज की जिंदगी भी भला क्या जिंदगी है जिसने अधिक वक्त बंदरगाह पर ही गुजार दिया हो?
इसलिए जो लोग जिंदा लोगों की तरह रहते हैं, सोचते हैं, और कुछ करने का हौसला रखते हैं, उन्हें अपने कम्फर्ट-जोन से बाहर निकलने की जहमत भी उठानी होती है। भरोसेमंद यारों के मखमली दायरे तक तो सब अच्छा रहता है, लेकिन इसके बाहर निकलने पर ही कुछ किया जा सकता है, और ऐसा करते हुए कुछ हो भी सकता है, और ऐसा होना जरूरी नहीं है कि हर बार खुशनुमा ही हो। जो लोग सोशल मीडिया पर वैचारिक या किसी और किस्म की बहस में उलझते हैं, उन्हें कुछ तो समझदार प्रतिक्रियाएं मिलती हैं, और कुछ प्रतिक्रियाएं ऐसी भी मिलती हैं जैसी कि फुटपाथ पर आते-जाते लोगों की रहती हैं, तकरीबन बेचेहरा, तकरीबन गुमनाम सरीखी, और तकरीबन गैरजिम्मेदार भी। ऐसे में बहुत से लोग कुछ कोशिशों के बाद ही दुस्साहस छोड़कर एक किस्म से घर बैठ जाते हैं कि असल जिंदगी के झगड़े क्या कुछ कम हैं कि सोशल मीडिया पर और पंगा लिया जाए?
लेकिन कुछ ऐसे दुस्साहसी भी होते हैं जो कि आए दिन दोस्ती का दायरा अनजाने लोगों तक बढ़ाते हैं, असहमत लोगों के साथ बातचीत जारी रखते हैं, बंधे-बंधाए दायरे में छंटाई कुछ उसी तरह करते हैं जिस तरह की एक माली पौधों के कुछ पत्तों को, कुछ डालियों को काटकर नए पत्तों के लिए रास्ता साफ करते हैं। यह बात तय है कि सात समंदर से अरबों गुना बड़े इस सोशल मीडिया पर अगर माली की तरह छंटाई नहीं की गई, तो नए दोस्तों, नई बातों के लिए रास्ता ही नहीं निकलता। ऐसे में यह भी होता है कि पुराने दोस्तों, या कि दायरे के आम लोगों की उन्हीं बातों से सोच पर एक किस्म से काई जमते चलती है, और सोशल मीडिया उनके लिए दोस्तों और परिवार की तस्वीरों के बढ़ते हुए एलबम जितना होकर रह जाता है। ऐसे लोगों के लिए मुझे कुछ नहीं कहना है।
लेकिन सोशल मीडिया पर जो लोग सामाजिक और राजनीतिक रूप से जिंदा लोग हैं, और जो दुनिया को कल भी जिंदा रखने के लिए कुछ करना चाहते हैं, उन्हें सोशल मीडिया पर पसंदीदा दोस्तों और चहेते लोगों के दायरे से बाहर निकलकर कुछ ऐसे लोगों को भी जोडऩा चाहिए जो कि नए हों, जो कि अलग हों, और जो कि असहमत भी होते हों। कम से कम कुछ अरसे तक ऐसे नए-नए लोगों को आजमाते जाना चाहिए कि वे आपकी इस आभासी दुनिया में कुछ जोड़ रहे हैं, कि आपका सुख-चैन महज तोड़ रहे हैं। और फिर इनके बारे में फैसला लेने की सहूलियत तो आभासी दुनिया में रहती ही है। लोगों को हर दिन कुछ नए लोगों से जुडऩा चाहिए, और हर दिन कुछ पुरानी डालियों की कटौती करनी चाहिए। यह काम बहुत से लोगों के लिए बहुत आसान भी नहीं होगा क्योंकि जब लोग अनजानी पगडंडियों पर चलते हैं, तो उन्हें सपाट, जानी-पहचानी सड़क की तरह की सहूलियत नहीं होती। लेकिन लोग दुनिया में आगे बढ़ पाते हैं नई पगडंडियों से ही, सैलानियों के लिए बनी किताबों को लेकर सफर करने वाले पर्यटक कभी खोज का इतिहास नहीं रच पाते।
आभासी दुनिया में लोगों को अपने दायरे में लगातार फेरबदल करना इसलिए भी जरूरी है कि धीरे-धीरे लोग अपने पसंदीदा दायरे के उसी तरह आदी हो जाते हैं जिस तरह कि अपने पसंदीदा गाने को बार-बार सुनने के आदी हो जाते हैं। ऐसे में नए गायक, नए संगीत, नए देश की नई विधा को जानने-समझने का काम तकलीफदेह लगने लगता है। लेकिन जिन लोगों ने नई-नई चीजों को जानने की कोशिश नहीं की, उन लोगों को नई मंजिल भी नहीं मिलती। वे बंदरगाह पर लंगर से बंधे हुए जहाज की तरह रह जाते हैं, सुरक्षित तो रहते हैं, लेकिन दुनिया नहीं देख पाते। (Daily Chhattisgarh)

भारतीय लोकतंत्र में सरकार का विकल्प अदालत नहीं

संपादकीय
13 नवम्बर 2017


जम्मू में हिन्दुओं के एक सबसे बड़े तीर्थ, वैष्णो देवी में भक्तों की भीड़ को देखते हुए राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया है कि वहां एक दिन में पचास हजार से अधिक लोगों को न जाने दिया जाए। इस तीर्थ में इससे अधिक लोगों को समाने की क्षमता नहीं है, और हादसे हो सकते हैं, इसलिए यह आदेश आया है। लेकिन यह आदेश एक दूसरे मायने में सोचने-विचारने लायक है कि हर मामले में किसी अदालत या किसी ट्रिब्यूनल के दखल देने की नौबत क्यों आनी चाहिए? बार-बार यह मुद्दा क्यों उठना चाहिए कि सरकार कार्रवाई नहीं कर रही है, इसलिए अदालत कार्रवाई करे? या इसके ठीक उल्टे यह मुद्दा भी उठता है कि अदालत सरकार का काम न करे। कई केन्द्रीय मंत्री यह बात कह चुके हैं कि अदालतों को सरकार का काम नहीं करना चाहिए, यह उनके दायरे से बाहर की बात है।
न सिर्फ केन्द्र सरकार के स्तर पर, बल्कि राज्य और स्थानीय शासन के स्तर पर भी जब बहुत से मामले सरकार नहीं सुलझाती है, तो उस पर लोगों को अदालत की दौड़ लगानी पड़ती है, और अदालतों का खासा समय सरकारी निष्क्रियता के मामलों को निपटाने में लगता है। अभी-अभी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक लंबी जांच के बाद रायपुर और बिलासपुर दो सबसे बड़े शहरों में लोगों के घर तक पहुंचने वाले म्युनिसिपल के पानी में बीमारी के कीटाणु होने पर आदेश दिया है। अब सवाल यह उठता है कि जिन शहरों के पास अपने को खूबसूरत बनाने के लिए हजारों करोड़ रूपए हैं, उन शहरों में पानी जैसी बुनियादी सहूलियत को अगर म्युनिसिपल पूरा नहीं करेगा, तो उसका घातक नतीजा यह निकलेगा कि हर कोई अपने घर में ट्यूबवेल खुदवाएंगे, और उसके बाद वे जितना पानी निकालने और खर्च करने की आदत डाल लेंगे वह पूरी धरती को भारी पड़ेगा। जब सार्वजनिक सुविधाओं को सरकार अपनी जिम्मेदारी से पूरा नहीं करती है, तो बहुत से मामलों में ऐसा नुकसान होता है। आज दिल्ली में छाए हुए जानलेवा प्रदूषण को देखें तो यह साफ होता है कि समय रहते दिल्ली में मेट्रो नहीं आई, बसों में महिलाओं की हिफाजत नहीं हुई, जरूरत जितनी बसें नहीं रहीं, और इन सबके चलते वहां पर लोग निजी कारों से चलने के आदी हो गए। नतीजा यह निकला कि दिल्ली में गाडिय़ों का धुआं, बाकी प्रदूषण के साथ मिलकर इतना बेकाबू हो गया है कि अभी कल अमरीका की एक एयरलाइंस ने दिल्ली की उड़ानें रद्द ही कर दी हैं।
सरकार अगर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती है, तो जनता को उसके खिलाफ अदालत तक जाकर एक बड़ी महंगी और थका देने वाली लड़ाई लडऩी पड़ती है। लोकतंत्र में अदालतें कुछ हद तक तो जनता के काम आ सकती हैं, लेकिन अदालतों से फैसला आने में बड़ा लंबा वक्त लगता है, सरकारें बदल जाती हैं, और जनता तकलीफ पाते रहती है। लोकतंत्र में सरकार का जिम्मा सरकार के पूरे करने पर ही यह तंत्र चल सकता है। अदालत अपना काम न करे, और संसद जजों के खिलाफ महाभियोग चलाती रहे, तो फिर संसद का पूरा वक्त हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ महाभियोग में निकल सकता है। आज केवल सरकार की बात नहीं है, संसद और विधानसभा भी काम करने से कतरा रही हैं, या कि वहां विपक्ष सरकार से जवाब लेने के अपने हक और जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर पा रहा है, इसलिए भी सरकारी निकम्मापन जारी है। आज देश को यह समझने की जरूरत है कि संविधान में कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका नाम के तीन स्तंभ बनाकर उन पर लोकतंत्र को टिकाया है। ये एक किस्म से एक तिपाई के तीन पाये हैं, और इनमें से एक भी अगर छोटा होता है, तो पूरी तिपाई लडख़ड़ाकर गिर जाती है। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात,

दीवारों पर लिक्खा है, 13 नवंबर

दीवारों पर लिक्खा है,

मुख्य न्यायाधीश तुरंत ही इस मामले से अलग हों...

संपादकीय
12 नवम्बर 2017


सुप्रीम कोर्ट में एक मामला चल रहा है जिसमें निजी मेडिकल कॉलेजों को गलत तरीके से इजाजत देने पर हाईकोर्ट से रिटायर एक ऐसे जज को भी गिरफ्तार किया गया है जो कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में भी जज रह चुके हैं। इस मामले की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर देश के एक विख्यात वकील प्रशांत भूषण ने यह आरोप लगाया कि वे इसमें जरूरत से अधिक दिलचस्पी ले रहे हैं जबकि इस मामले के तार उनसे भी जुड़े हुए हैं। प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के दफ्तर और मुख्य न्यायाधीश के आदेशों का हवाला देते हुए यह सामने रखा कि दीपक मिश्रा किस तरह इस मामले की सुनवाई में जज बने रहना चाहते हैं, और उन्होंने इसके लिए बनाई बेंच में अपने साथ सबसे जूनियर जजों को रखा है।
प्रशांत भूषण और उनके पिता, देश के एक भूतपूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण पहले भी सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ ऐसी लड़ाई लड़ चुके हैं, और वे जजों के भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩे से डरते नहीं। पिता-पुत्र को सुप्रीम कोर्ट ने कई बार मानहानि का नोटिस भी दिया, लेकिन उन्होंने सजा की परवाह नहीं की, और वे अपने आरोपों पर डटे रहे। यह तो पुरानी बात हो गई कि उन्होंने आधा दर्जन जजों के भ्रष्ट होने का दावा किया था, अभी ताजा मामला यह है कि मुख्य न्यायाधीश एक ऐसे मामले में जाहिर तौर पर जरूरत से अधिक दिलचस्पी लेते दिख रहे हैं जिनमें पीछे कहीं उनका नाम भी जुड़ा हुआ दिखता है। आमतौर पर न्यायपालिका में कोई भी जज ऐसे मामले से अपने को तुरंत ही अलग कर लेते हैं जिनसे उनका दूर का भी कोई रिश्ता रहा हो, या दिखता हो, या कि ऐसा आरोप लगता हो। बहुत से जज वकालत के पेशे से आए हुए रहते हैं, और उनकी अदालत में जब ऐसे मामले लगते हैं जिनमें वे किसी एक पक्ष के वकील रह चुके हों। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश ऐसे में मुख्य न्यायाधीश अगर इस मामले से पहले किसी भी स्तर पर जुड़े हुए रहे हैं, तो उन्हें तुरंत ही खुद होकर अपने आपको इससे अलग कर लेना था। लेकिन प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के भीतर काम के बंटवारे को लेकर, सुनवाई के लिए जजों की बेंच बनवाने को लेकर जिस तरह मुख्य न्यायाधीश की नाजायज दिलचस्पी की बात कही है, अगर वह सच है, तब तो जज के खिलाफ महाभियोग का मामला भी बनता है, और अगर वह सच नहीं भी है, तो भी ऐसे आरोप लगने के बाद मुख्य न्यायाधीश का इस मामले की सुनवाई में जबर्दस्ती बने रहना ठीक नहीं है, इससे न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास खत्म होगा। प्रशांत भूषण पहले भी बहुत सारे मामलों में भ्रष्टाचार साबित किए हुए एक गंभीर वकील हैं, और उनके आरोपों के जो विवरण सामने आए हैं, वे पहली नजर में गंभीर लगते हैं। मुख्य न्यायाधीश को तुरंत ही इस मामले से अपने को अलग करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)