पहली नजर का प्यार भी अब तय करेगा कम्प्यूटर!

26 फरवरी  2018

दुनिया में ऑनलाईन डेटिंग के कारोबार में लगी बहुत सी ऐसी कंपनियां हैं जो कि लोगों को अपनी पसंद के लोगों से मिलवाने का काम करती हैं। जिस तरह हिन्दुस्तान में लंबे वक्त से शादियां तय करवाने के काम में बहुत से वेबसाइटें लगी हैं, उसी तरह पश्चिमी दुनिया में डेटिंग एक बड़ा कारोबार है जिसमें शादी के नजरिए से देखे बिना भी लोगों को आपस में मिलवाया जाता है।
दरअसल इसकी जरूरत इसलिए बढ़ती चल रही है कि पहले तो लोग बाहर निकलते थे तो एक-दूसरे से बात करने के मौके आते भी थे। अब तो अपनी व्यस्त जिंदगी में लोग कानों में ईयरफोन लगाए हुए चलते हैं, और अगल-बगल के लोगों से बात करना घटते जा रहा है। लोग अब खरीददारी करने भी कम निकलते हैं, और वे घर बैठे ऑनलाईन शॉपिंग से काम चला लेते हैं। बाग-बगीचों या जिम में कसरत करते या दौड़ते हुए भी लोगों के कान अगल-बगल के लोगों की बात सुनने को खाली रहते नहीं हैं। ऐसे में लोगों की एक-दूसरे से मेल-मिलाप की गुंजाइश घटती चली गई है, बड़ी तेजी से।
दूसरी तरफ लोगों की उम्मीदें बढ़ती चली गई हैं क्योंकि वे पूरी दुनिया के लोगों को देखने लगे हैं, और महज आसपास के दायरे के गिने-चुने लोगों तक पसंद को सीमित रखने की बेबस मजबूरी उनके सामने नहीं रह गई है। अब लोग सोशल मीडिया पर एक-दूसरे से मिलते हैं, और वहां पर वे अपनी तमाम खामियों-कमजोरियों को छुपाकर या घटाकर भी अपनी एक बेहतर तस्वीर पेश करते हैं जिससे कि उनसे ऑनलाईन मिलने वालों की उम्मीदें बढ़ती जाती हैं।
अब ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि बढ़ी हुई उम्मीदों और घटी हुई संभावनाओं वाले लोगों को आपस में मिलवाने का काम किस तरह किया जाए कि जिससे लोगों के बीच तालमेल की गुंजाइश अधिक रहे? लोगों की पसंद-नापसंद, उनका पेशा, उनके शौक, उनके तौर-तरीके, खानपान, रहने और काम करने के पसंदीदा इलाके, अब ऐसी सैकड़ों चीजें हो गई हैं जो लोगों को एक जटिल ढांचा बना देती हैं, और उसके मनमुताबिक, उसकी जरूरत के मुताबिक एक दूसरे जटिल ढांचे से उसका मेल-मिलाप कराना अब जहां दिखने में पहले से आसान लगता है, वह हकीकत में पहले से अधिक मुश्किल हो गया है। लोगों की अपने साथी को लेकर कल्पनाएं और जरूरतें लगातार बढ़ गई हैं, और ऐसे दो लोगों को मिलाकर एक कामयाब जोड़ा बनाना बहुत आसान बात नहीं रह गई है।
ऐसे में अमरीका की एक बड़ी कंपनी ने कम्प्यूटर के ऑर्टिफीशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करके एक ऐसा लव-एल्गोरिद्म बनाया है जो कि कामयाब जोड़े या कि कामयाब मोहब्बत का दावा करता है। इस कंपनी के लोगों का कहना है कि दो लोगों के बीच एक जोड़ा बनने की, उनके बीच मोहब्बत पनपने की, और फिर कामयाब भी होने की जैसी संभावना उनका यह एल्गोरिद्म पेश करता है, ऐसा इसके पहले कभी नहीं हुआ था।
हिन्दुस्तानी लोगों को याद होगा कि यहां के हिन्दू समाज में जन्म कुंडली मिलाने की पुरानी परंपरा रही है। लोग शादी का जोड़ा तय करते हुए किसी ज्योतिषी के पास जाते हैं जो कि दोनों की कुंडलियों के ग्रह-नक्षत्र देखकर यह तय करता है कि दोनों के कितने गुण मिलते हैं। और जितने अधिक गुण मिलें, उतनी ही अधिक संभावना उस जोड़े के सफल होने की कही जाती है। अब पता नहीं यह बात कितनी सच है, और कितनी पाखंड, लेकिन यह परंपरा सैकड़ों बरसों से तो भारत में चल ही रही है, और अभी भी मैचमेकिंग की जो वेबसाइटें हैं, वे कुंडली पूछती हैं, और यह भी पूछती हैं कि कुंडली में अगर मंगल दोष है तो उसके लिए जोड़ीदार मांगलिक चलेगा/चलेगी, या नहीं। ग्रह-नक्षत्र के रास्ते जोड़ी तय करने का काम भारत में सैकड़ों या हजारों बरस चले आ रहा है, अब वह एक अलग शक्ल में पश्चिम में सामने आया है।
अभी इसी तरह की मोहब्बत मिलवाने के कारोबार पर एक रिपोर्ट आई जिससे ऐसा लगता है कि कारोबारी दिल के फैसला लेने वाले हिस्से का काम अब कम्प्यूटरों से करने लगे हैं, जाहिर तौर पर, कमाई के लिए। एक वक्त हिन्दुस्तान में गांवों में रिश्ते सुझाने का काम नाई किया करते थे क्योंकि उनका हर घर में आना-जाना रहता था, वे बच्चों को बचपन से जानते थे, और परिवार की दूसरी बातें भी उनकी नजरों में रहती थीं। अब उसी किस्म की बहुत सी जानकारियों को लेकर कम्प्यूटरों के रास्ते यह कारोबार पनप रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि एक वक्त जिसे पहली नजर की मोहब्बत कहा जाता था, क्या उसके दिन लद गए हैं? अब यह कारोबार किसी को पहली नजर के असर का मोहताज नहीं रहने देगा, और खुद ही पहली, दूसरी, तीसरी, और चौथी नजर बनकर लोगों को एक-दूसरे से प्रभावित करेगा? अब ऐसे कारोबारी अपने कम्प्यूटरों, और उनकी कृत्रिम बुद्धि से यह फैसला ले लेंगे कि कौन सा दिल किस दूसरे दिल को अधिक पसंद करेगा? क्या समाज में हजारों बरस से चली आ रही एक व्यवस्था को, लोगों के एक-दूसरे से मिलने को, एक-दूसरे को परखने को, एक-दूसरे को पसंद करने को जो मेहनत लगती थी, वह अब ये कम्प्यूटर पल भर में कर लेंगे, और लोगों को एक भुगतान के एवज में उनकी सबसे अच्छी और संभावित मोहब्बत से मिलवा देंगे?
अभी दुनिया के कई दूसरे देशों में कुछ सौ बरस ही हुए हैं जब नौजवान अपनी मर्जी से शादी कर रहे हैं, पहले तो परिवार ही यह काम करता था, जैसा कि हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में आज भी करता है। बीच के कुछ सौ से लेकर कुछ बरस तक का यह दौर लोगों की अपनी पसंद का हुआ, और अब ऐसा लगता है कि एक बार फिर इंसान अपनी पसंद का काम दूसरों को दे रहा है, इस बार किसी नाई और अपने माता-पिता को न देकर एक कम्प्यूटर को दे रहा है!
यह बात सुनने में पहली नजर में अच्छी और कामयाब तरकीब लगती है कि लोग अपने सपने के राजकुमार, या सपनों की राजकुमारी से जितनी उम्मीदें हैं, उसमें से अधिकतर उम्मीदें पूरी करने वाले/वाली जोड़ीदार को पा लेंगे। लेकिन दूसरी तरफ यह लगता है कि समाज में जो सिलसिला लोगों को परखते हुए जोड़ीदार तय करने का विकसित हुआ था, क्या वह एक-दो सदी के भीतर ही हाशिए पर कर दिया जा रहा है, और यह जिम्मा, यह काम कारोबारी-कम्प्यूटरों के हवाले कर दिया जा रहा है? क्या इससे उन लोगों की मोहब्बत नाकामयाब होने, और दिल टूटने के खतरे खत्म होने लगेंगे जो कि उस दौर से निकलकर उर्दू की शायरी करते हैं?
ऐसे कारोबारियों का एक बड़ा दिलचस्प तर्क है, उनका कहना है कि जैसे-जैसे इंसान की जिंदगी लंबी होती जा रही है, वैसे-वैसे उसकी अपने साथी के साथ रहने की उम्र भी लंबी होती जा रही है। अब जब लोग सौ बरस के पार जीने लगेंगे, तो हो सकता है कि उनकी शादीशुदा जिंदगी पौन सदी की हो, और ऐसा लंबा वक्त जिस जीवनसाथी के साथ गुजारना हो, उसे अच्छे से ठोक-बजाकर तय करना अधिक जरूरी होते जाएगा ताकि दिक्कत-तकलीफ अधिक लंबे वक्त का बोझ न बने। इनकी बनाई जोडिय़ां ऐसे सभी किस्म का ख्याल रखकर बनाई जाएंगी जो मोहब्बत से शादी तक और डेटिंग से डेथ तक का ख्याल रख पाएं।
इससे समाज के ढांचे पर एक बुनियादी असर पड़ सकता है क्योंकि लोगों के बीच मेलजोल के मार्फत जो घरोबा होता था, उसे पूरी तरह घटाकर एक-दूसरे को तश्तरी पर धरकर पेश कर दिया जाएगा। क्या यह कुछ उसी किस्म का होगा कि फल-सब्जी खाने के बजाय उनसे मिलने वाले विटामिन का कैप्सूल ही खा लिया जाए? अब यह तो धीरे-धीरे समझ आएगा कि बहुत महीन उम्मीदों और जरूरतों के साथ तालमेल बिठाने वाले ऐसे जोड़ीदार तलाशने का कम्प्यूटरी-दिमाग समाज की अब तक चली आ रही व्यवस्था को किस तरह तोड़मोड़ कर रख देगा? इंसान ने जब कम्प्यूटर बनाए थे उसने अपने हिस्से का कुछ काम उन पर डाला था। आज कारोबारियों में उन कम्प्यूटरों में ऐसा आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस डाल दिया है कि अब वे इंसान के दिल के हिस्से वाला काम भी करने का दावा कर रहे हैं! (Daily Chhattisgarh)

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 फरवरी : फोन और इंटरनेट से दुनिया के गरीबों की जिंदगी तब्दील

संपादकीय
26 फरवरी 2018


आज हिन्दुस्तान के किसी भी गांव-कस्बे से गुजरें, तो कुछ बरस पहले वहां जितने चाय-पानठेले हुआ करते थे, अब उससे कई गुना अधिक मोबाइल-फोन दुकानें हो गई हैं। इनमें से कुछ दुकानें फोन बेचती हैं, कुछ केवल सिमकार्ड-रीचार्ज करने का काम करती हैं, कुछ दुकानें फोन सुधारती हैं, और कुछ इनमें से तमाम काम करती हैं। इनकी गिनती को गांव-शहर में देखा जाए तो लगता है कि आज कारोबारी और कारीगरी के रोजगार का एक बहुत बड़ा जरिया यह बन गया है। दूसरी तरफ जिन लोगों के हाथों में फोन आ गया है, उनकी जिंदगी और उनके रोजगार पर क्या फर्क पड़ा है यह उन्हें बारीकी से देखने पर ही समझ आ सकता है। सबसे कम मजदूरी वाले मजदूर भी अब घर बैठे काम पर बुला लिए जाते हैं, एक दिन का काम पूरा होता नहीं है, और वे दूसरे दिन का काम तय कर पाते हैं। कारीगर काम पा रहे हैं, छोटे कारोबारी घरों तक सामान पहुंचा रहे हैं, और अभी 30-40 बरस पहले तक हिन्दुस्तान में टेलीफोन संपन्नता का एक सुबूत होता था, आज बेरोजगारों के हाथ में भी फोन है, सड़कों को साफ करती महिलाएं भी अपने फोन पर संगीत सुनते हुए काम करते दिखती हैं। 
इस बात पर चर्चा इसलिए जरूरी है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में अगले आधे बरस के भीतर ही राज्य सरकार करीब एक चौथाई आबादी के हाथ में स्मार्टफोन थमाने जा रही है। इसमें गरीब लोग, कॉलेज के छात्र-छात्राएं होंगे, और अगर एक परिवार में चार बड़े लोग हैं, तो उन चारों को सरकार से फोन मिलने जा रहा है। दुनिया की आर्थिक समझ रखने वाले लोगों का यह नतीजा निकाला हुआ है कि किसी इलाके में आबादी के अनुपात में जैसे-जैसे फोन बढ़ते चलते हैं, वैसे-वैसे वहां का आर्थिक विकास भी बढ़ते चलता है। अभी हम आंकड़ों पर बहुत ज्यादा जाना नहीं चाहते, लेकिन अगर छत्तीसगढ़ में सरकार 55 लाख लोगों को स्मार्टफोन थमाने जा रही है, इनमें से हर किसी की जिंदगी पर कुछ न कुछ असर पड़ेगा। परिवार का काम निपटेगा, और रोजगार या कारोबार में बढ़ोत्तरी-तरक्की होगी, अब तक जो बिना फोन के हैं, वे अपने घर या रोजगार की जगह से फोन से जुड़ जाएंगे। 
अमरीकी कारोबारी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने आज ही एक रिपोर्ट छापी है कि किस तरह इंटरनेट दुनिया के सबसे गरीब लोगों की जिंदगी को बदल रहा है। फोन और इंटरनेट से होने वाले फायदों को हिन्दुस्तान में भी देखा गया है कि किस तरह आन्ध्र में जब मछुआरे मछली मारकर किनारे लौटते होते हैं, तो समंदर की लहरों पर से ही वे मछली बाजार के व्यापारी से सौदा कर लेते हैं, और टोकरे उठाकर उन्हें व्यापारियों के पास घूमना नहीं पड़ता। छत्तीसगढ़ में सरकार ने स्मार्टफोन बांटना तो तय कर लिया है, लेकिन फोन और इंटरनेट से सबसे गरीब लोगों की जिंदगी में किस तरह का वैल्यू-एडिशन हो सकता है, इसके लिए भी सरकार को योजना बनानी चाहिए। यह हो सकता है कि रमन सरकार का मौजूदा कार्यकाल ऐसी लंबी योजना पर अमल करने के लिए छोटा हो, लेकिन दीर्घकालीन फायदे की योजनाओं के लिए सरकारों को अपने कार्यकाल से परे की भी निरंतरता जारी रखनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में लोगों की क्षमताओं के इस्तेमाल की भारी संभावना बाकी है, और सरकार को इसके लिए जनता से जुड़े हुए लोगों को शामिल करके योजना बनानी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 फरवरी

सहवाग में बल्ले का हुनर, लेकिन बाकी समझ में वे जीरो पर आऊट...

संपादकीय
25 फरवरी 2018


दुनिया में लोग ज्ञान, हुनर, प्रतिभा, और समझ, इन सबमें बड़ा घालमेल कर बैठते हैं। किसी प्रतिभाशाली को लोग ज्ञानी मान बैठते हैं, जबकि हो सकता है कि उसकी तमाम खूबी किसी एक दायरे में हो, और बाकी दायरों में उसकी समझ शून्य हो। इसी तरह किसी एक दायरे के हुनर वाले इंसान को लोग बड़ा समझदार मान बैठें, और यह समझ दूसरे दायरों पर भी लागू मान बैठें। दुनिया में बहुत से ऐसे अच्छे लोग हुए हैं जिनकी समझ किसी एक मामले में बहुत अच्छी रही, लेकिन दूसरे मामलों में उनका ज्ञान तो रहा, लेकिन समझ नहीं रही। अब इस थोड़ी सी मुश्किल लगती बात को आसान तरीके से समझने की कोशिश करें तो कुछ मिसालों को देखना होगा। 
कल भारत के एक क्रिकेट सितारे वीरेन्द्र सहवाग ने एक ऐसा ट्वीट किया जिसे लेकर चारों तरफ से समझदार लोगों ने उन्हें उनकी नासमझी समझा दी। केरल में एक आदिवासी युवक ने पेट भरने के लिए खाने का कुछ सामान एक दूकान से चुराया, गांव के लोगों ने उसे पकड़ा और भीड़ ने मार-मारकर उसकी हत्या कर दी। वह न सिर्फ गरीब था, बल्कि उसका मानसिक संतुलन भी बिगड़ा हुआ था। और जो तस्वीरें सामने आई हैं, उनके मुताबिक मारने वाले लोगों ने उसकी हत्या करते हुए उसके साथ सेल्फी भी लीं। इस पर वीरेन्द्र सहवाग ने एक ट्वीट कर लिखा कि यह सभ्य समाज के लिए एक कलंक है। आदिवासी को मारने वाले लोगों में उन्होंने तीन आरोपियों के नाम लिखे जो कि तीनों ही मुस्लिम थे। जबकि उस मामले में जो सोलह लोग अभी तक गिरफ्तार हुए हैं उनमें हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, इन सभी धर्मों के लोग हैं। हजारों लोगों ने सहवाग को इस बात के लिए कोसा कि उन्होंने इस मामले को साम्प्रदायिक बना दिया, यह लिखकर एक आदिवासी को तीन मुस्लिमों ने मारा। भारी आलोचना के बाद अब सहवाग ने बाकी नामों को छोड़कर इन्हीं तीन नामों को पोस्ट करने के लिए माफी मांगी है और लिखा है कि उनका कोई साम्प्रदायिक नजरिया नहीं था, बाकी नाम उनसे चूक गए।
सहवाग को याद दिलाते हुए देश के एक विख्यात समकालीन इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखा कि सहवाग के अपने राज्य हरियाणा में जिस तरह की हिंसा होती है, उस पर उनका मुंह नहीं खुलता, और इस मामले को उन्होंने साम्प्रदायिक रंग दिया है। दरअसल सहवाग ऐसा करने वाले अकेले खिलाड़ी नहीं है, कई और खिलाड़ी, कई और गायक, अभिनेता, और लेखक ऐसा करते हैं जो कि किसी जटिल मुद्दे के तमाम पहलुओं को समझे बिना उसके एक छोटे हिस्से को ही समझते हुए उस पर लिखते हैं, और उनकी शोहरत की वजह से उन्हें चाहने वाले या उनके फॉलोअर उनकी बात को गंभीरता से ले लेते हैं, अपनी सोच को प्रभावित कर बैठते हैं।
भारत के मध्यम वर्ग के सबसे पसंदीदा राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम की कही एक लाईन को चारों तरफ लिखा जाता है जिसमें उन्होंने कहा था कि ब्लैक रंग भावनात्मक रूप से बुरा होता है, लेकिन हर ब्लैकबोर्ड छात्रों की जिंदगी को रौशन करता है। अब दक्षिण भारतीय होने के नाते डॉ. कलाम खुद भी काले थे, लेकिन काले रंग के साथ जुड़ी हुई नकारात्मक धारणाओं के पीछे की सामाजिक-वजहों को वे न समझ पाए, और न ही वैसी धारणाओं का विरोध कर पाए। उन्होंने काले रंग के प्रति समाज की नकारात्मक सोच को महज शब्दों के खेल में इस्तेमाल किया, न कि काले रंग के साथ भेदभाव का कोई विरोध किया। अब विज्ञान और टेक्नॉलॉजी में उनका योगदान देखते हुए, उनकी ईमानदार और सादी जिंदगी को देखते हुए, गीता में दिलचस्पी रखने वाले, वीणा बजाने वाले एक मुस्लिम होने को भी ध्यान में रखते हुए एनडीए सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति बनाया था। लेकिन रंगभेद की उनकी समझ कमजोर थी, रंगभेद का विरोध उनकी समझ से परे का था, और इसलिए काले रंग को लेकर वे महज शब्दों में उलझ गए, और उनके व्यक्तित्व की बाकी बातों की वजह से उनकी कही यह बात बड़ी इज्जत के साथ चल निकली। 
लोगों का ज्ञान बहुत हो सकता है, लेकिन हो सकता है कि उनकी समझ उनके ज्ञान के टक्कर की न हो। अभी कुछ समय पहले एक शहर में चौड़ी होती सड़क के बीच में पहुंच गए एक बहुत पुराने पेड़ को काटा गया, बहुत से ज्ञानी इससे विचलित हो गए। उन्हें पेड़ का इतिहास याद आया, और यह तो विज्ञान ने साबित किया ही है कि पेड़ से ऑक्सीजन मिलती है। लेकिन उन्होंने समझ का इस्तेमाल कुछ कम किया, और महज ज्ञान को अपने फैसले को प्रभावित करने दिया। ज्ञान ने पेड़ से मिलने वाली ऑक्सीजन तो दिखा दी, लेकिन समझ अगर इस्तेमाल की जाती, तो यह दिखाई पड़ता कि ऐसे पेड़ की वजह से सड़क संकरी होने से होने वाले टै्रफिक जाम में फंसी गाडिय़ां कितना काला धुआं उगलती हैं, और हजार पेड़ मिलकर भी उतनी ऑक्सीजन नहीं दे पाते। इसलिए यह समझ की जरूरत है कि ज्ञान तो आधी जानकारी से भी मिल सकता है, लेकिन उस ज्ञान का कोई मतलब पूरी समझ होने से ही निकाला जा सकता है। ज्ञान तो जापान पर गिराए गए हाईड्रोजन बम को बनाने में, उड़ाकर ले जाने में, और गिराने में, इन सभी में खूब इस्तेमाल हुआ था, लेकिन दसियों लाख इंसानों पर ऐसा बम गिराते हुए समझ का इस्तेमाल नहीं हुआ था। इसलिए समझ के बिना ज्ञान, हुनर, प्रतिभा, या क्षमता, इन सबका कोई खास इस्तेमाल नहीं रह जाता। जिसका हुनर बल्ला चलाने में है, और जिसकी प्रतिभा उसी जगह सीमित है, वह जब बिना समझ के जुबान चलाने लगे, या कि की-बोर्ड पर उंगलियां चलाने लगे, तो वह जानलेवा खतरनाक हो सकता है। एक अच्छा बल्लेबाज एक गैरसाम्प्रदायिक हिंसा को साम्प्रदायिक साबित करते हुए करोड़ों लोगों तक पहुंचा सकता है, पहुंचा चुका है। बाकी लोगों को ऐसी चूक से बचना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 24 फरवरी

तमिलनाडू में महिलाओं के बदन सुडौल बनाने सरकारी सर्जरी!

संपादकीय
24 फरवरी 2018


तमिलनाडू सरकार का यह फैसला सामने आया है कि वह महिलाओं को दुपहिया खरीदने पर सरकारी सब्सिडी देगी। यह योजना आज से ही प्रधानमंत्री के हाथों शुरू करवाई जा रही है। लेकिन राज्य के स्वास्थ्य मंत्री की एक दूसरी घोषणा भी सामने आई है कि राज्य की जो भी महिलाएं अपने वक्ष का आकार सुडौल करवाने के लिए सर्जरी करवाना चाहती हैं, उनका खर्च राज्य सरकार उठाएगी। इसके पीछे सरकार ने तर्क यह दिया है कि बहुत सी महिलाएं और लड़कियां कामकाज की जगह पर या शादीशुदा जिंदगी में भी अपने शरीर के आकार को लेकर हीनभावना की शिकार रहती हैं, और उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए अगर उन्हें ऐसा जरूरी लगता है तो केवल खूबसूरती के लिए भी सरकार उनके ऑपरेशन का खर्च उठाएगी। इस बात पर चिकित्सा से जुड़े हुए कुछ लोगों का यह कहना है कि सरकार को ऐसे कॉस्मेटिक ऑपरेशनों के बजाय जीवन रक्षक ऑपरेशनों पर खर्च करना चाहिए। 
तमिलनाडू में यह पुरानी राजनीतिक परंपरा रही है कि सरकार गरीबों को अनगिनत रियायतें और तरह-तरह के तोहफे बांटकर सत्ता पर एक ही पार्टी को जारी रखने की कोशिश करती है। जयललिता ने इस सरकारी रूख को आसमान पर पहुंचा दिया था, और अम्मा कैंटीन, अम्मा मेडिकल स्टोर्स, अम्मा पानी जैसी अनगिनत योजनाएं लागू की थीं। अभी भी जयललिता की पार्टी का ही तमिलनाडू पर राज है, और रियायतें बढ़ते-बढ़ते महिलाओं के बदन तक पहुंच गई हैं, और सरकार की इस घोषणा से कई किस्म की निजी और सामाजिक दिक्कतें भी आने वाली हैं। इससे करोड़ों लड़कियों और महिलाओं में अपने खुद के बदन को लेकर एक हीनभावना विकसित होगी कि उनका बदन तस्वीरों की तरह किसी एक खास सुडौल आकार का होना चाहिए। यह बात प्रकृति के खिलाफ है क्योंकि कुदरत ने हर किसी का बदन अलग-अलग बनाया है, और बाजार ने बदन को एक खास शक्ल में ढालने का काम किया है ताकि उस आकार के हिसाब से अपने सामान बेचे, और ऑपरेशनों से बदन को ढालने का कारोबार चले। फिल्म और फैशन उद्योग ने सुंदरता के पैमाने तय किए हैं जो कि आम लोगों के किसी भी काम के नहीं हैं। इसलिए सरकार का यह फैसला निहायत फिजूल फैसला है, और शायद दुनिया के सबसे संपन्न देशों में भी सरकार इस किस्म के सौंदर्य-ऑपरेशनों पर जनता का खर्च नहीं करती। 
यह याद रखने की जरूरत है कि यह वही तमिलनाडू और वही चेन्नई हैं जहां पर गरीबी से निपटने के लिए अपनी किडनी बेचने वालों की पूरी कॉलोनी ही बनी हुई है। जनता बहुत गरीब है, उसके पास बीमारी का इलाज कराने, अपना घर चलाने का एक बड़ा मोर्चा लगातार जारी रहता है। ऐसे में एक निहायत ही फिजूल की सर्जरी पर बड़ा मोटा पैसा खर्च करने का यह सरकारी फैसला पूरी तरह से बेवकूफी का है, और यह बाजार की सोच को बढ़ावा देने वाला है। अगर इस राज्य की सरकार की संपन्नता उसके खजाने के बाहर भी उफन रही है तो उसे अपनी लड़कियों और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम करना चाहिए, उनकी पढ़ाई और आगे बढ़ाने का काम करना चाहिए, उनके व्यक्तित्व विकास का काम करना चाहिए, उनका हुनर अंतरराष्ट्रीय स्तर का करना चाहिए। जहां सरकार को स्तर उठाने की जरूरत है, वहां वह जनता के पैसों पर इस तरह बदन को उठाने पर खर्च करने की बेवकूफी कर रही है। 
हमारा ख्याल है कि किसी को अदालत जाने की जरूरत है कि जनता के पैसों की इतनी बड़ी ऐसी दानवाकार और ऐसी विकराल बर्बादी रोकी जाए। कोई अदालत ही इस राज्य सरकार से यह पूछ सकती है कि उसके राज्य में क्या और किसी बीमारी से इलाज की जरूरत बच ही नहीं गई है? क्या उसके राज्य में लड़कियों और महिलाओं को और किसी किस्म की कोई मानसिक चुनौतियां बची ही नहीं हैं? यह सिलसिला बहुत ही खराब है, और हमारा ख्याल है कि देश के महिला संगठनों को भी ऐसी बाजारू सोच का विरोध करना चाहिए जिसमें एक महिला के बदन को फिल्मों और पोर्नों की सोच के मुताबिक किसी आकार में ढालने को सरकार बढ़ावा देने जा रही है, उस पर गरीब जनता के पैसे खर्च करने जा रही है। यह मामला अदालती दखल के लिए एकदम फिट है, और उसके बिना इस बेवकूफी को रोकना मुश्किल होगा। (Daily Chhattisgarh)

कुछ करने के पहले याद रखें, ऊपरवाला सब देख रहा है..

संपादकीय
23 फरवरी 2018


दिल्ली में इस वक्त मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के निवास पर पुलिस कार्रवाई चल रही है, और पुलिस वहां से सीसीटीवी कैमरे और उनकी रिकॉर्डिंग लेकर जा रही है क्योंकि राज्य के मुख्य सचिव ने यह रिपोर्ट लिखाई है कि मुख्यमंत्री निवास पर हुई बैठक में आधी रात उन पर सत्तारूढ़ विधायकों ने हमला किया, और उन्हें पीटा। पुलिस ने आज की इस जब्ती के बाद मीडिया से कहा है कि मुख्य सचिव की शिकायत के बाद मुख्यमंत्री निवास से यह रिकॉर्डिंग मांगी गई थी, लेकिन कोई जवाब न मिलने पर पुलिस ने आज सुबूत जुटाने के लिए यह कार्रवाई की। यहां यह जिक्र जरूरी है कि दिल्ली की पुलिस राज्य के मातहत नहीं होती, और वह केन्द्र सरकार के नियंत्रण में काम करती है, वरना किसी राज्य की पुलिस अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ शायद किसी भी हालत में ऐसी कार्रवाई न करती। 
दिल्ली के मुख्य सचिव की शिकायत सामने आने के बाद राज्य की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने इन आरोपों का खंडन किया था, और कहा था कि जनहित के मुद्दों पर विधायक महज बात करना चाहते थे, और मुख्य सचिव अपने को लेफ्टिनेंट गवर्नर के प्रति ही जवाबदेह बताते हुए वहां से जा रहे थे, उसी वक्त बहस हुई थी। पार्टी ने किसी मारपीट से इंकार किया है। और अब जब रिकॉर्डिंग जब्त की जा चुकी है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि इन दोनों पक्षों में से जिसकी बात झूठ होगी, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। जांच के नतीजे सामने आने के पहले किसी एक को कुसूरवार मानना ठीक इसलिए नहीं होगा कि अब तक सारी शिकायत दो पक्षों के एक-दूसरे के खिलाफ बयान तक सीमित है, और मुख्य सचिव की अगले दिन की गई शिकायत को लोग कुछ अटपटा भी मान रहे हैं कि अगर आधी रात उनसे मारपीट हुई थी, तो उन्होंने इसके बारे में कोई भी कार्रवाई अगले दिन क्यों की? 
खैर, हम इस मामले की सच्चाई को लेकर अटकल लगाए बिना एक दूसरे पहलू पर लिखना चाहते हैं। आज का वक्त मोबाइल फोन के कैमरों की रिकॉर्डिंग से लेकर सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग तक बहुत से सुबूत जुटाने का है। टेक्नालॉजी ने हर किसी के लिए यह आसान कर दिया है कि वे कई तरह के सुबूत खुद रिकॉर्ड कर लें,अ और सार्वजनिक या महत्वपूर्ण जगहों पर अब बिना कोशिश के वहां के कैमरे सब कुछ रिकॉर्ड करते चलते हैं। ऐसे में अब देश के सभी लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि अपनी हरकतों को ठीक रखना ही एक तरीका है जिससे वे महफूज रह सकते हैं। फोन पर किसी से बात करना, किसी जगह रूबरू बात करना, फोन पर संदेश भेजना, सोशल मीडिया में कुछ पोस्ट करना, सब कुछ आत्मघाती हो सकता है, अगर उसमें कोई बात गैरकानूनी है, या कि अनैतिक है। अब समय लोगों के भरोसे का नहीं रह गया है। अगर दिल्ली के मुख्य सचिव की शिकायत सही है, तो भला किसने यह सोचा था कि मुख्यमंत्री के सामने उसके विधायक राज्य के मुख्य सचिव को पीट सकते हैं? और अगर यह शिकायत झूठी है, तो भला किसने यह सोचा था कि किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ उसका मुख्य सचिव इस तरह की झूठी तोहमत लगा सकता है? और अब बात महज गवाही, और सुबूत पर जाकर टिक गई है। इसलिए ऐसी नौबत को ध्यान में रखते हुए लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि ऊपरवाला सब देखता है, और यह ऊपरवाला कोई ईश्वर नहीं है, सीसीटीवी कैमरा है। 
आज न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि बाकी दुनिया में भी हर कहीं बड़े-बड़े जुर्म ऐसी रिकॉर्डिंग से पकड़ में आ रहे हैं, और मुजरिमों को सजा हो रही है। अब पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों को सुबूत अधिक आसानी से जुट जाते हैं, और वे अदालत में महज गवाहों के मुकाबले अधिक मजबूती से खड़े भी रहते हैं। ऐसे में यह मामला बड़ा दिलचस्प होगा जिसमें दिल्ली के दो सबसे ताकतवर लोगों में से कोई एक झूठा साबित होने जा रहा है, और कोई एक सजा पाने जा रहा है। हम अपने किसी अंदाज के बिना दिलचस्पी के साथ इस बहुत ही कड़वी और अटपटी वारदात के नतीजे के इंतजार कर रहे हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 फरवरी

फौजी अफसरों के बयान अब साम्प्रदायिक और राजनीतिक भी

संपादकीय
22 फरवरी 2018


भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत एक बार फिर अपने एक बयान को लेकर सुर्खियों और विवाद में हैं। उन्होंने असम के एक राजनीतिक संगठन एआईयूडीएफ का नाम लेकर कहा कि यह संगठन तेजी से आगे बढ़ रहा है, और जनसंघ के दिनों से लेकर आज तक भाजपा जिस रफ्तार से आगे बढ़ी है, उसके मुकाबले ऑल इंडिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम का यह संगठन आगे बढ़ा है। असम में यह संगठन मुस्लिमों की आवाज उठाता है। और जनरल रावत ने यह पूरी चर्चा इस संदर्भ में की कि पड़ोसी देशों से जिस तरह कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए आतंकी भेजे जाते हैं, उसी तरह उत्तर भारत में अशांति फैलाने के लिए अवैध आबादी को भारत में भेजा जाता है। उनके इस बयान के बाद भारत की सबसे बड़ी मुस्लिम पार्टी एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि सेना प्रमुख को राजनीतिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए, उनका काम किसी राजनीतिक पार्टी पर कमेंट करना नहीं है, लोकतंत्र और संविधान में सेना हमेशा जनता द्वारा निर्वाचित सरकार के तहत काम करती है। 
यह पहला मौका नहीं है जब एक बड़े फौजी अफसर ने राजनीतिक या विदेश नीति से जुड़े बयान दिए हैं। बल्कि कुछ दिनों पहले कश्मीर में आतंकी हमलावरों के हमले से शहीद होने वाले हिन्दुस्तानी सैनिकों में बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिक थे, और जब ओवैसी ने उनकी शहादत की चर्चा करते हुए कहा था कि भारत में मुस्लिमों के देशप्रेम को शक की नजर से देखा जाता है, और वे इस तरह देश के लिए शहादत देते हैं। इस पर थलसेना के एक दूसरे अफसर ने तुरंत ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया जाहिर की थी कि सेना साम्प्रदायिक नजरिए से चीजों को नहीं देखती है, और जो लोग सेना के कामकाज, तौर-तरीकों को नहीं जानते हैं, वे ही ऐसी बातें कह सकते हैं। ओवैसी का यह बयान बड़ा साफ था, और वह किसी भी तरह से साम्प्रदायिक नहीं था। वह बयान भाजपा के और हिन्दू संगठनों के कुछ नेताओं के कुछ दिन पहले के ही बयानों को लेकर था जिसमें यह कहा गया था कि मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान बनाया गया था, और उन्हें भारत छोड़कर पाकिस्तान या बांग्लादेश चले जाना चाहिए। इस घोर साम्प्रदायिक बयान के जवाब में जब ओवैसी ने हिन्दुस्तान के लिए मुस्लिमों की शहादत की चर्चा की, तो उसका जवाब एक फौजी अफसर की तरफ से आना केन्द्र सरकार की बहुत ही बड़ी चूक थी। केन्द्र सरकार कभी पाकिस्तान को कोई संदेश देने के लिए भारत के थलसेना या वायुसेना प्रमुख से विदेश नीति और फौजी तैयारियों के बयान दिलवा रही है, और अब तो देश के भीतर के धार्मिक, साम्प्रदायिक, और राजनीतिक मामलों पर ये अफसर खुलकर बोलने लगे हैं। 
भारतीय लोकतंत्र को जो लोग गहराई से नहीं समझते हैं, वे ही ऐसी चूक कर सकते हैं, या ऐसा गलत काम कर सकते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है, और किसी भी मजबूत लोकतंत्र को अपनी फौज को बैरकों में ही रखना चाहिए, और सरहद पर भी इन फौजों को केवल सरकार के हुक्म और फैसले से जाना चाहिए, न कि अपनी मर्जी से। इसके साथ-साथ पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश के साथ एक नाजुक फौजी संबंध के चलते हुए इस रिश्ते को लेकर कोई बयान फौजी अफसरों की तरफ से नहीं आना चाहिए। आज देश का माहौल ऐसा लग रहा है, कि वर्दीधारी फौजी अफसर भी देशप्रेम और राष्ट्रप्रेम के नाम पर सरकार और सत्तारूढ़ दल की तरफ से बयानबाजी कर सकते हैं, या कि देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के नजरिए से बयान दे सकते हैं। यह पूरा सिलसिला बहुत ही गलत, और बहुत ही खराब है। भाजपा या दूसरी राजनीतिक पार्टियों के पास लोकतांत्रिक या अलोकतांत्रिक तरीके से बयानबाजी करने के लिए बहुत से लोग मौजूद हैं, और उनका काम किसी फौजी अफसर से करवाना, या कि उन्हें करने देना लोकतंत्र के लिए बड़ी घातक नौबत है। आज देश में राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह का उन्माद बढ़ाया जा रहा है, उसमें फौजी अफसरों की ऐसी बातों को उनकी फौजी जिम्मेदारियों का ही एक विस्तार मान लिया जाएगा, और यह देश की जनता में लोकतांत्रिक प्रशिक्षण की कमी का सुबूत भी है। हमाराख्याल है कि देश की भलाई के लिए, लोकतंत्र की भलाई के लिए फिक्रमंद लोगों को ऐसी गैरजरूरी और नाजायज बयानबाजी का खुलकर विरोध करना चाहिए ताकि आम जनता को यह समझ पड़ सके कि यह गलत है। लोकतंत्र में अलग-अलग किस्म की जिम्मेदारियों के अधिकार और किरदार दोनों बंटे हुए हैं। न तो राजनीतिक लोगों को सरहद पर जाकर गैरफौजियों के लिए जंग के फतवे देने चाहिए, और न ही फौजी लोगों को राजनीतिक या साम्प्रदायिक बातें करनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)