संपादकीय
11 मार्च 2015
कोयला घोटाले को लेकर आखिरकार भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अदालत से समन मिल गया है। एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री का कटघरे में पहुंचना छोटी बात नहीं होती, लेकिन हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले तीन-चार बरस में, जब से दूरसंचार घोटाला और कोयला घोटाला आना शुरू ही हुए थे, तभी से हमने लगातार यह लिखना शुरू किया था कि ऐसे मंत्रिमंडल के मुखिया की हैसियत से मनमोहन सिंह की जिम्मेदारी बनती है, और अदालती कटघरे के रास्ते उनके जेल जाने की नौबत आ सकती है। उन पर मुकदमा चलाने की सलाह हम तब से देते आ रहे हैं जब भाजपा ने भी यह मांग नहीं की थी, और हकीकत तो यह है कि भाजपा आज भी मनमोहन सिंह के बजाय सोनिया गांधी को निशाना बनाना बेहतर समझेगी, और इसीलिए मनमोहन सिंह पर सीधे-सीधे हमले से यह पार्टी कतराती रही है।
मनमोहन सिंह का अदालत जाना एक ऐसे वक्त हो रहा है जब देश में कोयला खदानों की नीलामी चल रही है तब पिछले सीएजी विनोद राय की एक बात याद पड़ती है कि कोयला खदान के आबंटन में गड़बड़ी करने से देश के खज़ाने को 1.86 लाख करोड़ का नुकसान हुआ था। लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि इस अनुमानित नुकसान को लेकर उस वक्त यूपीए सरकार के एक ताकतवर मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील कपिल सिब्बल ने एक प्रेस कांफ्रेंस में इस अनुमान का मखौल उड़ाया था और कहा था कि सरकार को कोयला खदानों के आबंटन से शून्य नुकसान हुआ है। अब विनोद राय के अनुमान को आज की हकीकत पार कर लेंगे। आज अभी तक 204 कोल ब्लॉक में से कुल 32 की नीलामी हुई है, और केन्द्र सरकार को दो लाख करोड़ से अधिक की कमाई हो चुकी है। यह बात अपने आप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके मंत्रिमंडल को जेल भेजने के लिए काफी है कि देश की दौलत को कारखानेदारों के साथ सरकार इस तरह बंदरबांट कर रही थी, कि मानो वह कांग्रेस पार्टी का अपना खजाना हो। आज इस बात को कौन मासूम मानेगा कि सरकार को और देश को इतना लंबा चूना लगाने वाली कांग्रेस-यूपीए सरकार को इसमें से कुछ नहीं मिला था।
हमारा पहले भी यह मानना था, और आज भी यह मानना है कि किसी पार्टी या सरकार का मुखिया अपने मातहत भ्रष्टाचार, बेईमानी, या जुर्म देखते हुए अगर चुप है, तो वह उसमें भागीदार है। हम यह बात आज हिंसक और साम्प्रदायिक बातें कहने वाले नेताओं के मुखिया लोगों के बारे में भी लिखते हैं, और कल भी यूपीए सरकार के मुखिया के बारे में लिखते थे। निजी शराफत सार्वजनिक जीवन और सरकारी कामकाज में कोई मायने नहीं रखती। शरीफ तो हर किसी को होना ही चाहिए, शराफत किसी की खूबी नहीं कही जा सकती। इसलिए मनमोहन सिंह अपनी खुद की सादी दाल-रोटी की थाली दिखाकर कोई रियायत नहीं पा सकते। यह पहले दिन से जाहिर था कि दूरसंचार घोटाला और कोयला घोटाला इन दोनों को पूरी तरह से समझते हुए मनमोहन सिंह इन अपराधों को अनदेखा कर रहे थे। वे राहुल गांधी की तरह के एक अनुभवहीन अधेड़-नौजवान नहीं थे। वे देश के वित्तमंत्री रहे हुए एक बहुत ही तजुर्बेकार नेता थे, जिनको सरकार चलाने का लंबा अनुभव था। प्रधानमंत्री की हैसियत से भी उन्होंने पहले पांच साल बिना ऐसे अपराधों के निकाले थे। इसलिए उनके दूसरे कार्यकाल का हर जुर्म उनकी समझ के भीतर का था। कुछ लोगों को यह तकलीफ हो सकती है कि राजनीति और भ्रष्ट सरकारी कामकाज के चलते एक शरीफ प्रोफेसर जेल जा सकता है। लेकिन जब हम इस गरीब देश के करोड़ों बच्चों को कुपोषण का शिकार देखते हैं, और जब यह देखते हैं कि मनमोहन सिंह जैसा प्रधानमंत्री देश के बिड़लाओं पर मेहरबान होते हुए जनता की दौलत को उनके हवाले कर देता है, तो हम इसके लिए सजा से कम कुछ नहीं सोचते।

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